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गुरुवार, 18 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-(प्रश्न-सार)

1--प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

2--मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।

3--मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती है। क्या करूं?

4--आप कहते हैं कि इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है। तो यह मनुष्य आपको क्यों नहीं समझ पा रहा है? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।


पहला प्रश्न: भगवान!
प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

स्वामी ज्ञान निर्मल उर्फ फली भाई!
मैं जिस फल की बात कर रहा हूं, उस फल के संबंध में न बोलना ही ठीक है। कबीर ने कहा है: हीरा पायो गांठ गठियायो, बाको बार-बार क्यों खोले। हीरा मिल जाए तो गांठ में बांध लेना चाहिए, उसे बार-बार खोलने की कोई जरूरत नहीं है; उसे खोल-खोल कर न देखना है, न दिखाना है; उसके प्रदर्शन का भी कोई अर्थ नहीं है।
यही उचित है कि चुप रह जाओ। यही उचित है कि आनंद से मुस्कुराओ। बोलो कुछ मत, क्योंकि शब्द उस रस को कहना भी चाहें तो कह न सकेंगे। भाषा प्रकट भी करना चाहे तो न कभी कर पाई है, न कभी कर पाएगी। वह तो राज है, जो राज ही रहता है। हृदय में उसकी गूंज होती है, तार छिड़ जाते हैं रोएं-रोएं में, तन-मन-प्राण में उसका नाद गूंजता है। अनुकंपा मालूम होगी, अनुग्रह का भाव उठेगा, आनंद होगा, आंसू झर सकते हैं, नाच घट सकता है, लेकिन कहने को कुछ भी नहीं है।
उस फल को ही तो अमृत फल कहा है। ध्यान के वृक्ष पर वही फल तो लगता है। वह तो मैं मजाक कर रहा था कि फली भाई चुप रह गए हैं। चुप बैठे हैं और मुस्कुरा रहे हैं। सीता मैया बोल गईं। सीता मैया भी बोल कर क्या बोल सकती हैं? वह भी अनुग्रह का ही भाव है। शब्द लड़खड़ा जाते हैं। सीता वृद्ध हैं। कभी जीवन में कविताएं न लिखी होंगी, सोचा भी न होगा, अब कुछ नहीं सूझता तो कविताएं लिख लाती हैं। साथ में लिख देती हैं यह भी कि मुझे कुछ कविता करना आता नहीं; पढ़ी-लिखी भी नहीं हूं; मगर क्या करूं, कुछ है भीतर जो इतने जोर से उठता है कि फूट पड़ना चाहता है, मार्ग नहीं पाता।
बोलो या चुप रहो, सब बराबर है। अनुग्रह का भाव ही असली बात है। और ऐसे फलों के संबंध में न बोलना ही उचित है, क्योंकि बहुत से लोगों को लोभ पैदा हो जाता है। संत महाराज को ही लोभ पैदा हो गया न! अभी जवान हैं, और साधारण जवान नहीं, पंजाबी जवान हैं; और उनके गैरेज में कोई फटियल एम्बेसेडर भी नहीं है, उन्नीस सौ अस्सी का मर्सिडीज़ मॉडल ही है, मगर फिर भी लोभ पैदा हो गया।
चंदूलाल का बेटा झुम्मनलाल जर्मनी गया था। वहां उसे पता चला कि नवीनतम खोज की है वैज्ञानिकों ने एक टिकिया की कि जिसे खा लेने से आदमी जवान हो जाता है। सोचा चंदूलाल बूढ़े हो गए हैं, मां भी बूढ़ी हो गई है, तो दोनों के लिए दो टिकियाएं खरीद कर...बड़ी मंहगी टिकियाएं थीं और झुम्मनलाल है तो चंदूलाल मारवाड़ी का ही बेटा, तो सिर्फ दो टिकियाएं उसने खरीदीं, तत्क्षण भिजवाईं और लिखा कि एक पिताजी आप ले लेना, एक माताजी को दे देना, दोनों जवान हो जाएंगे।
फिर महीने भर बाद जब झुम्मनलाल लौटा, हवाई जहाज से उतरा, तो देख कर हैरान हुआ, मां तो उतनी की उतनी बूढ़ी, उससे भी ज्यादा बूढ़ी मालूम पड़ती है, एकदम थकी-मांदी। और भी आश्चर्य हुआ यह देख कर कि एक छोटे से बच्चे को, जो रो रहा है, वह हिलकोरे दे रही है, सम्हाल रही है, समझा रही है। तो उसने कहा, अरे, यह छोटा सा बच्चा कहां से आया? यह किसका बच्चा है?
तो चंदूलाल की पत्नी, झुम्मनलाल की मां बोली कि अरे नालायक, यह बच्चा नहीं है, ये तेरे पूज्य पिताजी हैं--सेठ चंदूलाल मारवाड़ी!
उसने कहा, इनकी यह गति कैसे हो गई?
उसने कहा कि ये दोनों टिकियां लोभ में इकट्ठी खा गए। मुझे तो दी ही नहीं। सो जवान ही नहीं हुए...दो टिकियां खा गए, एक खाते तो जवान होते, दो खा गए तो यह हालत हो गई। सो महीने भर से इनका रोना-धोना, अब इस बुढ़ापे में इस बच्चे को सम्हालना, तो मेरी तो और दुर्गति हो गई। तूने भी कहां की टिकियां भेज दीं! बेटा, पांव छू, यह कोई बच्चा-वच्चा नहीं है, यह तेरी ही करतूत है।
ऐसा ही लोभ संत महाराज को पैदा हो गया। संत महाराज, वह फल का तुम्हें पता भी चल जाए तो खाना मत, नहीं तो यह हालत हो जाएगी। और तुम्हें पता ही है कि छोटे बच्चों को मैं आश्रम में घुसने नहीं देता। तुम्हारी पहरेदारी भी गई और भेज दिए जाओगे स्कूल में। फिर से पढ़ो क ख ग। तुम लाख चिल्लाओ कि मैं संत हूं, कोई नहीं सुनेगा।
मैं मजाक ही कर रहा था फली भाई। लेकिन यही उचित है, चुप रह जाना ही उचित है।
पश्चिम के एक बहुत बड़े दार्शनिक विटगिंस्टीन ने अपनी बड़ी अदभुत किताब, इस सदी की सबसे अदभुत किताब--ट्रेक्टेटस--में लिखा है: जिस संबंध में कुछ न कहा जा सके, उस संबंध में कुछ भूल कर कहना भी मत। क्योंकि तुम जो भी कहोगे वह गलत होगा; तुम जो भी कहोगे उससे भ्रांतियां फैलेंगी; तुम जो भी कहोगे उससे हानि होगी। जो कहा जा सके वही कहना; जो न कहा जा सके उस संबंध में चुप रह जाना। जो समझने वाले हैं, वे तुम्हारी चुप्पी समझ लेंगे; जो नहीं समझने वाले हैं, वे तुम्हारे शब्दों से और भी ज्यादा नासमझियों में पड़ जाएंगे।
इसलिए जो असली बात है, वह तो कभी नहीं कही जाती। मैं भी थोड़े ही कह रहा हूं। तुमसे जो बातें कह रहा हूं, वे बातें तो तुम्हें उस तरफ ले चलने की हैं, जहां तुम मेरे मौन को समझ सको। मैं मौन की तैयारी में लगा हुआ हूं। तुम तैयार हो जाओ तो मैं मौन हो जाऊं। बस तुम्हारी तैयारी की देर है। तुम सब फली भाई जैसे हो जाओ तो मैं चुप हो जाऊं।
बोलना मेरे लिए कष्टपूर्ण है--इसका तुम्हें अहसास नहीं है। तुम्हें अहसास हो भी नहीं सकता। चौबीस घंटे चुपचाप रहने के बाद रोज सुबह फिर उस गहन चुप्पी से वापस शब्दों में आना जितनी कठिन बात है उतनी कठिन और कोई बात नहीं। आकाश में उड़ना और फिर जमीन पर घसिटना--उड़ते पक्षी को कितना कठिन हो जाता होगा जमीन पर घसिटना! सागर में तैरती मछली को डाल दो रेत में तो वह जैसी परेशान हो जाती होगी वैसी मेरी परेशानी है।
मेरा तो शब्दों से छुटकारा हो चुका है, मगर तुम्हारे लिए बोल रहा हूं। और यह बोलने का सारा प्रयोजन इतना ही है--यह नहीं कि मैं सोचता हूं कि इससे तुम्हें सत्य पता चल जाएगा--इसका प्रयोजन सिर्फ इतना ही है कि शायद तुम मौन के लिए राजी हो जाओ, ध्यान के लिए राजी हो जाओ। यह सिर्फ ध्यान के लिए तुम्हें फुसलाने का उपाय है।
इसलिए कुछ भी तुम पूछो, मैं तुम्हें हर तरफ से यात्रा करा कर ध्यान की तरफ ले आता हूं। तुम उत्तर की पूछो कि दक्खिन की, तुम इस बीमारी की पूछो कि उस बीमारी की, मेरी चेष्टा होती है कि तुम्हें जल्दी से जल्दी ध्यान की तरफ ले आऊं। बीमारियों में मेरी उत्सुकता नहीं है।
एक ही उपचार है जीवन में और वह है--चित्त से मुक्त हो जाना। चित्त शब्दों से भरा है, इसलिए शब्दों के ही द्वारा चित्त से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। चित्त से मुक्त होने के लिए शब्दों से मुक्त होना होगा। इसलिए तो बार-बार कहता हूं: शास्त्रों से मुक्त हो जाओ, क्योंकि शास्त्रों में कितने ही प्यारे शब्द हों, शब्द शब्द ही हैं, और तुम्हें जाना है निःशब्द में, तुम्हें जाना है महाशून्य में।
सब शास्त्र बाधाएं हैं। मेरे शब्द भी बाधा हैं। इनको भी तुमने पकड़ा तो बाधा हो जाएगी। ये पकड़ने को नहीं हैं, ये इशारे हैं कि और आगे, और आगे। ये यूं हैं जैसे कि मील के पत्थर लगे होते हैं रास्ते पर, जिन पर तीर बना रहता है। तीर कहता है: और आगे, यहां मत रुक जाना, मंजिल आगे है। तुम पत्थर को ही पकड़ कर बैठ जाओ छाती से लगा कर कि बस आ गई मंजिल! वैसी ही दशा शास्त्रों को पकड़ लेने वालों की है।
और ध्यान रखना, जब मैं शास्त्रों की बात करता हूं तो मेरे शब्दों को मैं सम्मिलित कर रहा हूं, उनको बाहर नहीं छोड़ रहा हूं। यह नहीं कह रहा हूं कि और शास्त्रों को छोड़ दो और मेरे शब्दों को पकड़ लो। शब्द मात्र को छोड़ना है, वहां कौन मेरा, कौन तेरा!
लेकिन तुम एकदम से नहीं छोड़ सकोगे, इसलिए बोल रहा हूं, बोले जा रहा हूं। जितनी देर तक बन सकता है, बोलता रहूंगा। लेकिन जल्दी करो। चाहता हूं ऐसे लोगों को मैं...आते जाते हैं वे लोग, उनकी संख्या बढ़ती जाती है, ज्यादा देर नहीं है। इसलिए मैं प्रफुल्लित हूं, आनंदित हूं कि जल्दी ही मेरे पास उन लोगों का समूह होगा जो चुप बैठ सकेंगे; जो मेरे मौन में जुड़ सकेंगे, जो मौन संवाद में सम्मिलित हो सकेंगे। वही होगा सत्संग। अभी तो उसकी पूर्व-भूमिका चल रही है, बस तैयारी चल रही है। अभी तो सिर्फ आयोजन चल रहा है। मंदिर बन रहा है, दीवालें उठाई जा रही हैं, दरवाजे लगाए जा रहे हैं। जिस दिन तुम मौन में मेरे साथ होने को राजी हो जाओगे, उस दिन मंदिर में प्रभु की प्रतिमा प्रतिष्ठित होगी। और उसी दिन तुम समझ पाओगे कि सत्य क्या है।
विटगिंस्टीन से मैं राजी हूं। जो न कहा जा सके उसे कहने की कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। मैंने कभी की भी नहीं। जिन्होंने की है, वे लोगों को भरमा गए, भटका गए।
लेकिन किसी ने भी--बुद्ध ने या महावीर ने या लाओत्सु ने--कोशिश ही नहीं की उसको कहने की। और बातें कही हैं, और हजार बातें कही हैं, बस उस एक बात को छोड़ दिया है। मतलब की बात छोड़ दी है। हजार बातें हैं तुम्हें उस जगह ले आने के लिए, जहां तुम मतलब की बात खुद समझ सकोगे। वह तो तुम्हारे भीतर आविर्भूत होगी। वह ध्यान का वृक्ष तो तुम्हारे भीतर उगेगा। समाधि के फल तो तुम्हारे भीतर लगेंगे। वह सहस्रदल कमल तो तुम्हारे भीतर खिलेगा। बाहर से तुम जो भी पकड़ लोगे, वह सब रुकावट है।
फली भाई, ठीक कर रहे हो। यूं ही मुस्कुराए चलो। ऐसे ही संन्यासियों को चाहता हूं कि जो बैठें चुप, मुस्कुराएं, मौज हो तो नाचें, इकतारा हाथ में ले लें कि खंजड़ी बजाएं, गीत गाना हो गीत गाएं। मगर यह सब उत्सव होगा; इसमें कुछ कहा नहीं जा रहा है। और जब सब सन्नाटा छा जाए, सब मौन हो जाए, सब चुप हो जाए, तो सत्य की कली भीतर खिलती है, फूल बनती है।

दूसरा प्रश्न: भगवान!
मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।

श्रीचंद!
यदि कुछ पाने यहां आए हो, तो गलत जगह आ गए हो। यहां तो खोना ही खोना है। यहां तो इतना खोना है कि तुम्हारे पास खोने को ही कुछ न बचे। तब जो शेष रह जाएगा, जिसे तुम खोना भी चाहो और न खो सको, वही है सत्य, वही है तुम्हारा स्वरूप, वही है तुम्हारी निजता, वही है तुम्हारे भीतर बैठा हुआ परमात्मा।
पाने की बात तो अहंकार की बात है। पाने की बात तो लोभ की बात है। और अक्सर यह हो जाता है। संसार में भी हम पाने में लगे रहते हैं--धन पा लें, पद पा लें। फिर धन से ऊबते हैं, पद से ऊबते हैं। आखिर ऊबना ही पड़ेगा, क्योंकि कितना ही पा लो धन, हाथ कुछ लगता नहीं, बस राख लगती है। और कितने ही पद पा लो, हाथ कुछ लगता नहीं, जीवन यूं व्यर्थ ही बह जाता हुआ दिखाई पड़ने लगता है, निरर्थकता गहरी होती जाती है। बस इतनी ही बात समझ में आती है कि यह सब दौड़ बेकार थी, हम नाहक दौड़े, नाहक भागे। इस सब समय का हमने व्यर्थ दुरुपयोग कर डाला, सदुपयोग हो सकता था, यह अवसर बहुमूल्य था, और हमने कौड़ियों के दाम लुटा दिया। हीरे थे, हमने फेंक डाले। हम मूर्च्छा में सब गंवा बैठे।
सूफी कहानी है--एक मछुआ सुबह-सुबह जल्दी नदी पर पहुंच गया। अभी सूरज नहीं निकला था। सूरज निकले तो जाल फेंके, क्योंकि अभी मछलियां जागी भी नहीं थीं। और अभी जाल भी फेंके तो कहां फेंके, मछलियां दिखाई भी नहीं पड़ती थीं। तो प्रतीक्षा कर रहा था सूरज ऊगने की। जहां बैठा था वहीं उसे मिल गई एक थैली। सो उसने थैली खोल कर टटोल कर देखा कि क्या है! देखा कि पत्थर भरे हैं। खाली आदमी क्या न करता...हमारे भीतर ऐसी बेचैनी है, हम कुछ भी करने लगते हैं...वह उठा-उठा कर एक-एक पत्थर उस थैली में से और झील में फेंकने लगा। छप-छपाक की आवाज हो, आवाज को वह सुने, फिर दूसरा पत्थर निकाले और फेंके।
सूरज निकलते-निकलते थैली में सिर्फ एक पत्थर बचा। जब सूरज निकल रहा था, उसने आखिरी पत्थर निकाला, सूरज की रोशनी में पत्थर दिखाई पड़ा, छाती पीट ली--वह पत्थर नहीं था, हीरा था! वह घंटे भर से हीरे फेंक रहा था झील में। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी। अब तो कोई उपाय न था उन हीरों को पाने का। झील गहरी थी। किस अतल में गिर गए होंगे वे, कहां चले गए होंगे! सब दिशाओं में फेंक दिए थे उसने--अपने हाथ से फेंक दिए थे! अंधेरा जो था, मूर्च्छा जो थी!
ऐसा ही हमारा जीवन है--सूफी कहते हैं। यूं ही फेंक देते हैं। होश आते-आते अगर एकाध हीरा भी बच जाए तो बहुत। अक्सर तो वह भी नहीं बचता। उस कहानी में तो बड़ी दया की है, जिसने भी कहानी बनाई होगी, कि कम से कम एक हीरा तो बचाया। अक्सर तो वह भी नहीं बचता।
सौभाग्यशाली हो श्रीचंद, कि जीवन में और सब व्यर्थ है, यह जान कर यहां आ गए हो। धन, पद की दौड़ छूट गई, मगर दौड़ नहीं छूटी है। विषय बदल गए आकांक्षाओं के, लेकिन आकांक्षाएं नहीं बदली हैं। वही वासना जो धन पाने के लिए थी, अब ध्यान पाने के लिए हो जाएगी। तो फिर कोई क्रांति घटित हुई ही नहीं। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि तुम क्या पाना चाहते हो; सवाल यह है कि तुम पाना चाहते हो। जब तक पाने की दौड़ है, तब तक तुम भ्रांत ही रहोगे, मूर्च्छित ही रहोगे।
पाना नहीं है कुछ। जो है, वह पाया ही हुआ है; मिला ही हुआ है; एक क्षण को भी तुमने उसे गंवाया नहीं है। जब तक पाने की दौड़ रहेगी, तब तक तुम उसे न देख सकोगे जो तुम्हारे भीतर अभी मौजूद है, इसी क्षण मौजूद है। क्योंकि तुम्हारा मन तो उलझा हुआ है पाने में--देखे कौन? जागे कौन? तुम तो सपने देख रहे हो पाने के। पहले धन पाने के देख रहे थे, अब ध्यान पाने के देख रहे हो। पहले सोचते थे पद मिल जाएगा, अब सोचते हो परमात्मा मिल जाएगा। पहले सोचते थे सम्मान मिल जाएगा, अब सोचते हो समाधि मिल जाएगी। मगर आकांक्षा अटकी है कहीं दूर कुछ पाने में। चित्त वहां उलझा है, तो चित्त यहां कैसे आए! तुम दूर-दूर भटक रहे हो।
और ध्यान रखना, ध्यान तो और भी दूर का लक्ष्य हो गया--धन से भी दूर का। धन इतना दूर नहीं है--चोरी से भी मिल सकता है, पड़ोसी के घर में सेंध मार सकते हो, जेब काट सकते हो, भीख मांग सकते हो, लाटरी खुल सकती है, रास्ते पर चलते हुए किसी की गिरी हुई थैली मिल सकती है, संयोगवशात मिल सकता है--धन इतने दूर नहीं है। मगर ध्यान की न तो चोरी हो सकती है, न रास्ते पर पड़ा मिल सकता है, न किसी की जेब काट सकते, खरीद नहीं सकते, भीख नहीं मांग सकते--बहुत दूर है, सो और उलझन में पड़ जाओगे। धन से भी दूर का लक्ष्य है। अब तो दौड़ो जन्मों-जन्मों, तो भी यह यात्रा पूरी नहीं होगी। और इस उलझाव में उसकी तरफ पीठ हो जाएगी जो तुम्हारे भीतर मौजूद है, और अभी मौजूद है।
मेरी सारी देशना यही है कि तुम्हें कुछ पाना नहीं है, तुम्हें कुछ खोजना नहीं है, तुम्हें कहीं जाना नहीं है--तुम जो हो, जैसे हो, जहां हो, वहीं परमात्मा मौजूद है तुम्हारे भीतर। वही धड़क रहा है तुम्हारी धड़कनों में। वही श्वास ले रहा है तुम्हारी श्वासों में। वही है तुम्हारा चैतन्य। वही तुम्हारे भीतर साक्षी बन कर बैठा है। इस उदघोषणा का नाम ही मैं ध्यान कहता हूं। इस प्रत्यभिज्ञा का नाम ही समाधि है--इस पहचान का नाम।
लेकिन इस संबंध में भी हमारे पुराने ही ढर्रे फिर से लौट कर हमारी गर्दन पर सवार हो जाते हैं। इधर से बचे, उधर से फंस जाते हैं। और वही लोभ और वही कृपणता। मुझसे लोग पूछते हैं कि हम...बहुत से संन्यासी यहां हैं, किसी का पिता बीमार है, बूढ़ा है, मरने के लिए मरण-शय्या पर पड़ा है, और संन्यासी मुझे पूछता है कि तीन सप्ताह के लिए जाना पड़ रहा है--जाऊं या न जाऊं? जाने में डर लगता है कि कुछ खो न जाए! न जाऊं तो मन में अपराध-भाव पैदा होता है कि पिता मर रहे हैं, कम से कम मरते वक्त तो उनके पास मौजूद हो जाऊं।
मैं यहां रोज चीख-चीख कर तुमसे कह रहा हूं कि तुम खोना भी चाहो तो उसे नहीं खो सकते। कहीं भी चले जाओ तुम, नरक में भी चले जाओ, तो भी उसे नहीं खो सकते। जो खो जाए वह स्वभाव नहीं, और जो स्वभाव है वही तो परमात्मा है। मगर वे तीन सप्ताह में जाने से डरे हुए हैं कि कहीं कुछ खो न जाए। अभी भाषा वही है--वही कृपणता, वही कंजूसी!
मारवाड़ी सेठ धन्नालाल व्यापार के सिलसिले में एक बार शिमला गए। पहाड़ी रास्ता था। एक खतरनाक ढलान पर अचानक टैक्सी के ब्रेक खराब हो गए और गाड़ी तीव्र गति से नीचे की ओर लुढ़कने लगी। धन्नालाल जोरों से चिल्लाए, अरे भई, रोको-रोको! यह क्या कर रहे हो, क्या जान ही ले लोगे?
ड्राइवर ने घबराए हुए उत्तर दिया, सेठजी, मैं क्या कर सकता हूं! गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए हैं। अब गाड़ी का रुकना संभव नहीं है। भगवान से प्रार्थना करिए, वही चाहे तो रोक दे, कोई चमत्कार कर दे। मैं तो नहीं रोक पा रहा।
सेठ धन्नालाल बोले, अरे मूरख, टैक्सी रोकने की कौन कह रहा है, मगर कम से कम मीटर तो बंद कर ले भलेमानुस! बेकार में ही किराया बढ़ता जा रहा है।
ड्राइवर गुस्से में बोला, आप कैसी बातें कर रहे हैं श्रीमान! टैक्सी गङ्ढे में गिरने वाली है और आपको मीटर और भाड़े की पड़ी है!
सेठजी ने कहा, टैक्सी क्या मेरे बाप की है, जहां गिरना हो गिरे, मुझे क्या है!
ड्राइवर ने आश्चर्य से कहा, लेकिन मेरे बाप, टैक्सी के साथ-साथ आपका भी खात्मा हो जाएगा।
सेठजी ने निश्चिंतता से जवाब दिया, तू मेरी फिक्र मत कर, मेरा तो जीवन-बीमा है। जो मैं कहता हूं वह कर, पहले इस मीटर को बंद कर!
वही कृपणता, वही कंजूसी, वही लोभ, वही वासना तुम्हें धर्म के जगत में पकड़ लेगी। वही भय, वही चिंता, वही संताप; सिर्फ नाम बदल जाएंगे। वही अहंकार, वही मेरेत्तेरे का झगड़ा--यह मेरा धर्म, यह तेरा धर्म। यह हिंदू, यह मुसलमान, यह ईसाई, यह जैन, यह बौद्ध--ये सब वही के वही झगड़े। वही बाजार, वही दुकानें; मगर अब नाम अच्छे-अच्छे, तख्तियां धार्मिक! यह मेरा शास्त्र, यह तुम्हारा शास्त्र। मेरा शास्त्र सही और तुम्हारा गलत! मेरे पैगंबर सही और तुम्हारे गलत! सब रोग वही का वही है। कुछ भेद नहीं पड़ता--जब तक कि तुम्हें यह बात समझ में न आ जाए कि रोग की जड़, तुम क्या चाहते हो, इसमें नहीं है; रोग की जड़, तुम चाहते हो, इसमें ही है। चाह में जड़ है। चाह को गिर जाने दो।
श्रीचंद, अब यहां आ गए हो तो यह तो मत पूछो: "मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है।'
इच्छा है, तो फिर तुम चूक जाओगे, तो फिर तुम पाने से वंचित रह जाओगे। पाना चाहा कि पाने से वंचित रह जाओगे। उन्होंने ही पाया है, जिन्होंने पाने की इच्छा छोड़ दी। यह विरोधाभास तुम्हें लगेगा, मगर मजबूरी है, ऐसा ही है जीवन का नियम--एस धम्मो सनंतनो--यही सनातन जीवन का धर्म है, कुछ और उपाय नहीं है। जो बचाएगा, वह गंवा देगा; जो खोने को राजी है, वह पा लेगा।
तुम पूछते हो: "लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।'
यहां तो कुछ नहीं मिल सकता। क्योंकि मैं तो देखता हूं: तुम्हें जो भी चाहिए, तुम्हारे जीवन के लिए जो भी जरूरी है, वह तुम्हें मिला ही हुआ है--जन्म के साथ, तुम्हारे स्वभाव के साथ, तुम्हारे भीतर है। तुम लाख उपाय करो गंवाने के तो गंवा नहीं सकते।
लोग मुझसे पूछते हैं, परमात्मा को कैसे खोजें? मैं उनसे पूछता हूं, तुमने उसे खोया कब? तुमने उसे खोया कैसे? तुम मुझे यह बता दो कि तुमने खोया कब, किस तिथित्तारीख में, किस स्थान पर, किस अक्षांश, किस देशांश में, किस देश में, काबा में कि काशी में--कहां खोया, कब खोया, कैसे खोया? अगर तुम मुझे यह बता दो, तो फिर मैं तुम्हें यह बता दूं कि कहां मिलेगा।
अगर काशी में खोया हो, तो काबा में बेकार खोज रहे हो। अगर काबा में खोया हो, तो काशी में बेकार खोज रहे हो। क्योंकि जहां खोया है वहीं खोजना चाहिए। और कब खोया, यह भी पक्का होना चाहिए। फिर यह भी पक्का पता होना चाहिए कि परमात्मा कोई ऐसी पत्थर जैसी चीज है कि तुमने जहां खोया हो वहीं पड़ा हो। अगर दो-चार हजार साल पहले खोया हो, तो पता नहीं वह भी चल कर कितना आगे बढ़ चुका हो, कहां पहुंच चुका हो।
एक अफीमची ने एक मिठाई की दुकान से मिठाई खरीदी। पीनक में था, डोल रहा था। दुकानदार को रुपया दिया, अठन्नी की मिठाई ली थी। दुकानदार ने कहा कि भई, मेरे पास आठ आने टूटे हुए नहीं हैं लौटाने को, कल सुबह ले लेना।
अफीमची ने सोचा कि कहीं कल सुबह यह बदल जाए, क्या भरोसा, तो कुछ पक्का कर लूं कि बदल न सके। तो उसने चारों तरफ नजर डाल कर पक्का कर लिया, ठीक से देख लिया--कौन सी दुकान है, कहां है, क्या है! और उसने सोचा कि दुकान देखने से ही कुछ नहीं होता! अरे आदमी अगर पक्का बेईमान हो, बोर्ड बदल ले, यह बोर्ड ही निकाल कर रख दे सुबह। हम इसी बोर्ड को खोजते फिरें! तो उसने देखा एक भैंस दुकान के सामने ही बैठी हुई है। उसने देखा कि यह बोर्ड बदल लेगा, मगर इसको भी शायद ही याद आए कि सामने भैंस बैठी हुई है, इसको भगा दे! इतना क्या इंतजाम करेगा! अफीमची मस्त घर लौट आया।
दूसरे दिन सुबह पहुंचा। दुकान में घुसा और एकदम उसकी गर्दन पकड़ ली दुकानदार की, कि हद हो गई, आठ आने के पीछे न केवल तुमने धंधा बदला, दुकान भी बदल ली! अरे दुकान ही नहीं बदली, धंधा ही नहीं बदला, जात तक बदल ली! कल रात तक हलवाई का काम कर रहे थे, आज नाई का काम कर रहे हो! शर्म नहीं आती? अरे बेशर्म, अठन्नी रखनी थी, ऐसे ही मांग लेते तो ऐसे ही दे देता।
वह नाई तो बहुत घबड़ाया। उसने कहा, तू बातें क्या कर रहा है? कहां की मिठाई की दुकान? मैं जिंदगी भर से नाई हूं। जिंदगी भर से यही बाल काटने का धंधा कर रहा हूं।
उसने कहा, तू मुझको धोखा न दे सकेगा। देख ले वह भैंस! जहां छोड़ गया था, वहीं बैठी है। तूने सब बदल लिया--बोर्ड बदल लिया, शक्ल तक अपनी बदल ली। और हद हो गई, रात भर में चमत्कार कर दिया तूने। एकदम नाई होकर बैठा है!
तुमने कहां खोया? और परमात्मा कोई पत्थर जैसी चीज है कि वहीं पड़ा हो? और कब खोया--मैं पूछता हूं--कैसे खोया? क्योंकि जब तक इन सब बातों का ठीक उत्तर न हो तुम्हारे पास, तब तक तुम्हारी सब खोज व्यर्थ जाएगी।
बुद्ध एक दिन सुबह-सुबह प्रवचन देने आए और अपने हाथ में एक रूमाल लेकर आए। लोग बड़े चकित हुए, क्योंकि वे कभी रूमाल लेकर आते नहीं थे। और सामने ही बैठ कर उन्होंने प्रवचन देने के पहले, रूमाल को हाथ में लटका कर ऊपर उठाया। लोग तो बहुत चौंके कि आज बात क्या है! आज कोई नये ढंग की ही बात दिखता है वे कहेंगे। शायद रूमाल में कोई राज है, कोई रहस्य है। एकदम सन्नाटा हो गया। जो सोए थे, वे भी जग गए।
धर्मसभा में लोग सोते हैं। जिनको रात भर नींद नहीं आती, उनको भी धर्मसभा में नींद आती है। धर्मसभा में बड़ा राज है। नींद की दवा इससे अच्छी अभी तक कोई चिकित्सक नहीं खोज सके हैं।
सब चौंक कर, सम्हल कर बैठ गए। सबने अपनी-अपनी कुंडलिनी जगा ली। सब देखने लगे कि माजरा क्या है! आज कोई जादू दिखाने वाले हैं या क्या बात है! और बुद्ध ने उस रूमाल में एक गांठ बांधी, दूसरी गांठ बांधी, तीसरी बांधी, चौथी बांधी, पांच गांठें बांधीं और फिर भिक्षुओं से पूछा कि भिक्षुओ, तुमने देखा मैंने रूमाल में गांठें बांधीं! मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं, क्या यह रूमाल वही का वही है जो गांठें बांधने के पहले था? अब भी वही का वही है कि बदल गया?
एक भिक्षु ने कहा, आप बड़ी चालबाजी का प्रश्न पूछ रहे हैं। अगर हम कहें वही का वही है, तो आप कहेंगे पहले गांठें कहां थीं? हालांकि रूमाल वही का वही है। अगर हम कहें बदल गया, तो आप कहेंगे क्या खाक बदल गया! अरे गांठें लगने से क्या बदलता है? रूमाल तो वही का वही है। आप ऐसी पहेली पूछ रहे हैं कि हम इस तरफ कहें तो फंसें, उस तरफ कहें तो फंसें।
बुद्ध ने कहा, तुम चिंता न करो। तुम उत्तर दो जो तुम्हारे अनुभव में आता हो।
उसने कहा कि एक अर्थ में रूमाल वही है, क्योंकि स्वभावतः रूमाल बदला नहीं, जैसा था वैसा ही है। और एक अर्थ में रूमाल बदल गया, क्योंकि तब गांठें नहीं थीं, अब गांठें हैं।
बुद्ध ने कहा, ठीक। तुम्हारा उत्तर स्वीकार करता हूं। अब मैं ये गांठें खोलना चाहता हूं। देखो, क्या मैं ठीक कर रहा हूं गांठें खोलने के लिए जो आयोजन कर रहा हूं? और बुद्ध ने रूमाल के दोनों छोर पकड़ कर जोर से खींचे। गांठें और सिकुड़ कर छोटी होने लगीं!
वह भिक्षु चिल्लाया। उसने कहा, आप यह क्या कर रहे हैं? गांठें और मजबूत हो रही हैं!
तो बुद्ध ने कहा, मैं क्या करूं?
उस भिक्षु ने कहा, पहले हमें यह जानना चाहिए कि गांठें आपने लगाईं कैसे। जब तक यह पता न हो कि गांठें लगाईं कैसे, तब तक गांठें कैसे खुलेंगी, इसका पता करना असंभव है। लेकिन यह मैं देख रहा हूं कि गांठें छोटी होती जा रही हैं। बड़ी थीं तब तक खुलना आसान था, अब और कठिन हो गया; सूक्ष्म हो गईं।
श्रीचंद, यही मैं तुमसे कहता हूं। धन की गांठ मोटी गांठ है, स्थूल है। धन की चाह स्थूल है। सभी को है। कोई बड़ी खूबी की बात नहीं। ध्यान की चाह--गांठ और सूक्ष्म हो गई। अब दिखाई भी न पड़ेगी। क्योंकि यह दौड़ बाहर न रही, भीतर ही भीतर हो गई। बिलकुल मानसिक हो गई, बिलकुल काल्पनिक हो गई। और तुम खींचते जाना इस गांठ को, यह और सूक्ष्म होती जाएगी। यह इतनी सूक्ष्म हो जाएगी कि तुम्हें खुद भी दिखाई न पड़ेगी। मगर गांठ खुल नहीं रही, गांठ बंध रही है। तुम और भी ग्रंथियों में पड़ते जा रहे हो।
महावीर ने, जो जाग गए हैं, जो प्रबुद्ध हो गए हैं, उनको निर्ग्रंथ कहा है। निर्ग्रंथ का अर्थ होता है: जिसकी सारी ग्रंथियां खुल गईं, सारी गांठें खुल गईं। बड़ा प्यारा शब्द उपयोग किया, निर्ग्रंथ, जिसमें कोई गांठें न रहीं।
स्वभावतः तो तुम वही के वही हो, लेकिन कुछ गांठें तुमने बांध ली हैं। कुछ लोग स्थूल गांठें बांधे हुए हैं, कुछ लोगों ने और भी सूक्ष्म गांठें बांध ली हैं। ज्ञान की गांठ बड़ी सूक्ष्म गांठ है; बड़ी अकड़ पैदा हो जाती है; भारी अकड़ पैदा हो जाती है। राष्ट्र की गांठ बड़ी सूक्ष्म गांठ है। धर्म की गांठ बड़ी सूक्ष्म गांठ है; बड़ी अकड़ पैदा हो जाती है।
एक मित्र ने पूछा है कि भारत-ज्योति दयानंद सरस्वती जैसे आर्यपुत्र ने विश्व भर में आर्यावर्त की शान का झंडा फहराया; जोधपुर नरेश जैसे लंपटों को कुत्ती जैसी वेश्याओं से बचने की चेतावनी दी; और अपने को भोजन में जहर देने वाले रसोइए को माफ कर दिया; उसे आप कहते हैं कि उनमें सदव्यवहार ही नहीं था। तो मैं समझता हूं कि आप दयानंद जैसे प्रखर सूरज का तेज देख ही नहीं पाए हैं। आपको बिना समझे ऐसे महानुभावों के बारे में बोलना बंद कर देना चाहिए। वे भी जीसस, सुकरात जैसे लोगों की तरह मरे हैं। आप उनके साथ अन्याय न करें।
लिखा है ब्रह्मचारी दीपक वेदालंकार ने।
जरा शब्दों को देखते हो! अगर उन्होंने अपना नाम न भी दिया होता, तो भी मैं जानता कि वे दयानंद के शिष्य हैं, आर्यसमाजी हैं, वेदालंकार, वेद के जानकार हैं। मगर शब्द देखते हो, भारत-ज्योति! यह अकड़ भारतीय होने की, किसी की चीनी होने की, किसी की जापानी होने की--ये सूक्ष्म गांठें हैं, बड़ी सूक्ष्म गांठें। ये दुनिया भर में फैली हैं। ये कोई तुम्हें ही थोड़े पकड़े हुए हैं, सारी मनुष्यता इन्हीं से पीड़ित है। छोटे से छोटा देश भी अपने को क्या नहीं समझता!
सिसली छोटा सा द्वीप है। उसका राजदूत अफ्रीका जा रहा था। तो सिसली के राजा ने उसको कहा कि तू जा रहा है अफ्रीका, अफ्रीका के लोगों को यह भ्रांति है कि उनका देश महाद्वीप है। वे सोचते हैं कि सिसली से भी बड़ा है।
अब कहां सिसली और कहां अफ्रीका! सिसली को अफ्रीका में रखो तो हजारों सिसली जम जाएं अफ्रीका में। मगर राजा ने कहा कि वहां के लोगों को यह भ्रांति है कि वे सोचते हैं कि उनका देश सिसली से भी बड़ा है। राजनीतिज्ञ को इतनी कुशलता होनी चाहिए कि जब कोई इस तरह की बात कहे, तू चुप रह जाना। अपने दिल में तो तू जानता ही है कि सिसली महान है, मगर चुप रह जाना। क्योंकि कूटनीतिज्ञ को, जहां जा रहा है, उनको किसी तरह दुखी नहीं करना चाहिए।
सिसली की हैसियत ही क्या है? लंका भी बहुत बड़ा है। पच्चीस सिसली लंका को काटने से बन सकते हैं। अफ्रीका तो महाद्वीप है ही। मगर सिसली के राजा को भी यही भ्रांति है। और वह भ्रांति के लिए पोषण दे रहा है। वह कह रहा है, वहां के लोगों को यह भ्रांति है कि वे अपने देश को बड़ा देश समझते हैं, इस भ्रांति में मत पड़ना।
जब अंग्रेज पहली दफा चीन पहुंचे, तो अंग्रेजों ने लिखा है कि चीनियों को देख कर हमें पक्का भरोसा आ गया कि डार्विन ठीक कहता है। और अब तक इस बात की खोजबीन की जा रही थी कि बंदरों और आदमी के बीच की कड़ी कहां है? क्योंकि बंदरों से एकदम आदमी नहीं हो सकता, बीच में कोई कड़ी भी होगी जो बंदर और आदमियों के बीच में होगा। चीनियों को देख कर हमें भरोसा आ गया।
और चीनियों ने क्या लिखा? चीनियों ने भी यही लिखा कि अब हम समझे कि डार्विन क्यों कहता है कि आदमी बंदर से पैदा हुआ है। जब तक हमने यूरोपियंस को नहीं देखा था, हमको यह भरोसा ही नहीं आता था कि आदमी बंदर से पैदा हो सकता है। ये बिलकुल बंदर की औलाद हैं।
दोनों को डार्विन के सिद्धांत पर भरोसा आ गया एक-दूसरे को देख कर। हर एक देश को यही भ्रांति है, हर एक जाति को यही भ्रांति है कि हमसे महान और कोई भी नहीं!
पूछा है ब्रह्मचारी दीपक वेदालंकार ने: "भारत-ज्योति...!'
भारत, चीन और पाकिस्तान और ईरान राजनैतिक विभाजन हैं! पृथ्वी अखंड है। लेकिन दयानंद को ही वह भ्रांति थी, उसी भ्रांति को उनके शिष्य दोहराते हैं तो कुछ आश्चर्य नहीं।
कहा है कि "दयानंद सरस्वती जैसे आर्यपुत्र ने...।'
आर्यपुत्र का अर्थ होता है: श्रेष्ठ। आर्य शब्द का अर्थ होता है: श्रेष्ठ। किसको भ्रांति नहीं है श्रेष्ठ होने की?
अडोल्फ हिटलर अपने को आर्य कहता था। और मानता था कि सिर्फ, जर्मनों में एक खास जर्मनों की जाति--नार्डिक, वे ही असली आर्य हैं, बाकी कोई असली आर्य नहीं है। वे ही श्रेष्ठ लोग हैं। और उनको ही हक है सारी दुनिया पर राज्य करने का।
स्वभावतः, श्रेष्ठजनों को हक होना चाहिए अश्रेष्ठ लोगों पर राज्य करने का। इसी भ्रांति में दूसरा महायुद्ध लड़ा गया। इसी भ्रांति का परिणाम था कि लाखों-करोड़ों लोगों की हत्या हुई। लाखों यहूदी काट डाले अडोल्फ हिटलर ने। और जिन जर्मनों से कटवाए, उनसे क्यों कटवा सका वह? सिर्फ इस प्रचार से कि तुम श्रेष्ठ हो, और दुनिया को अगर श्रेष्ठ बनाना है तो हमें इसे अश्रेष्ठ लोगों से मुक्त करना होगा। यहूदी सबसे जघन्य हैं, और हम सबसे श्रेष्ठ हैं! बुरों को मिटाना होगा।
जहां भी यह भ्रांति पैदा हुई कि हम श्रेष्ठ हैं, वहां स्वभावतः दूसरा अश्रेष्ठ हो जाता है। और जब दूसरा अश्रेष्ठ हो गया, हम श्रेष्ठ हो गए, तो निश्चित ही हम ब्राह्मण, दूसरा शूद्र!
भारत के लोगों को यह आदत है कहने की--मुसलमानों को कहेंगे: मलेच्छ; अंग्रेजों को कहेंगे: मलेच्छ। मगर यह कुछ भारतीयों का ही मामला नहीं है, सारी दुनिया में यही पागलपन है। मैं जैन घर में पैदा हुआ। अगर तुम जैनों से पूछो तो वे हिंदुओं को भी मलेच्छ ही समझते हैं।
मैं छोटा था। एक जैन मुनि गांव में आए हुए थे। मैंने उनसे पूछा, रामकृष्ण परमहंस के संबंध में आपका क्या खयाल है? उन्होंने कहा, क्यों उस मलेच्छ की बात छेड़ते हो! मैंने कहा, मलेच्छ? हां, उन्होंने कहा, मछली जो खाए, उसको मलेच्छ नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?
अब यह बात तो सच्ची है कि रामकृष्ण मछली खाते थे। बंगाली और मछली न खाए, जरा मुश्किल ही है। और जैन मुनि को इससे ज्यादा दुख देने वाली बात और क्या हो सकती है--कोई मछली खाए!
हिंदुस्तान में जिनको तुम ब्राह्मण कहते हो, उनमें से भी अधिक मांसाहारी हैं। कश्मीरी ब्राह्मण मांसाहारी हैं। दक्षिण के ब्राह्मण मांसाहारी हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू मांसाहारी थे सिर्फ इस कारण क्योंकि वे कश्मीरी ब्राह्मण थे। अ?ब यह बड़े मजे की बात है कि महात्मा गांधी जैसे व्यक्ति को, जिसे अहिंसा का इस जगत में सबसे बड़ा पोषक समझा जाता है, उसने अपनी वसीयत--राजनैतिक वसीयत--जवाहरलाल नेहरू को दी, जो कि मांसाहारी थे! जिनका एक दिन बिना मांस खाए न चले!
मगर हिंदुओं को कुछ अखरने वाली बात नहीं है। जैनों को अखरती है। जैनों को लगता है यह बात मलेच्छ हो गई। आखिर जैनों ने और बौद्धों ने इसीलिए तो वेदों का विरोध किया, क्योंकि वेदों में समर्थन मिलता है मांसाहार का। गौवध का भी समर्थन है! अश्वमेध यज्ञ ही नहीं, नरमेध यज्ञ भी होते थे, जिनमें मनुष्यों की बलि दी जाती थी! इसलिए कभी-कभी अभी भी यह घटना घट जाती है, अखबारों में खबर मिल जाती है कि फलां गांव में लोगों ने एक आदमी की बलि दे दी। ये बेचारे कुछ भी नहीं कर रहे हैं, ये सिर्फ आर्यपुत्र हैं! ये शुद्ध वैदिक धर्म का अनुशीलन कर रहे हैं!
ब्रह्मचारी दीपक वेदालंकार कहते हैं: "विश्व भर में आर्यावर्त की शान का झंडा फहराया।'
ये बातें ही अधार्मिक हैं--झंडा फहराना! ये बातें राजनीति में तो शायद ठीक हों, क्योंकि राजनीति में हर तरह की मूढ़ता चल सकती है; मगर धर्म से इन बातों का क्या संबंध? झंडा फहराना--और शान का! तो फिर अहंकार किसको कहते हो?
"जोधपुर नरेश जैसे लंपटों को...।'
यह भाषा देखते हो, यह आर्यसमाज की भाषा है। यह दयानंद की वसीयत है। इसी तरह की भाषा वे बोलते थे। और इसलिए मैं कभी नहीं स्वीकार कर सकूंगा कि इस व्यक्ति को कोई आत्मज्ञान हुआ था या ब्रह्मज्ञान हुआ था। क्योंकि जिसको आत्मज्ञान हुआ हो, वह लंपट कहेगा? और बात सुनते हो!
"जोधपुर नरेश जैसे लंपटों को कुत्ती जैसी वेश्याओं से बचने की चेतावनी दी।'
और मजा यह है, ये वेश्याएं पैदा किसने की हैं? यह तुम्हारे ही साधु-महात्माओं की कृपा है। वेश्या विवाह का परिणाम है। जब तक दुनिया में जबरदस्ती, कानून से आरोपित विवाह जारी रहेगा, वेश्या भी जारी रहेगी। जब तक विवाह नहीं मिटता, वेश्या नहीं मिट सकती।
और यह तो बड़ी पुरानी आर्य-परंपरा है, यह कुछ नयी बात नहीं। पहले इसको नगरवधू कहते थे वेश्या को। बुद्ध के समय में प्रसिद्ध नगरवधू थी--आम्रपाली। उसका नाम जाहिर है। नगर में जो सुंदरतम लड़की होती थी, उसको पूरे नगर की वधू घोषित कर देते थे, ताकि लोगों में कलह न हो, झगड़ा न हो कि कौन इससे विवाह करे। सबकी वधू हो गई वह--नगरवधू। और सम्मानित होती थी। कोई अपमान नहीं था उसमें। यह गौरव की ही बात थी कि कोई नगरवधू चुनी जाए।
वेश्याओं को कुत्ती जैसा शब्द का उपयोग करना और वेदालंकार जैसे व्यक्ति को, वेदों के जानकार को...नहीं भी उन्होंने नाम लिखा होता तो भी मैं जान लेता कि ये एक शुद्ध आर्यसमाजी हैं। यह भाषा आर्यसमाज की है। यह भाषा अधार्मिक है। इस भाषा का धर्म से क्या संबंध हो सकता है? बुद्धपुरुष ऐसी भाषा नहीं बोल सकते।
और कहा है कि जीसस और सुकरात जैसे लोगों के साथ हम गिनती करेंगे।
लेकिन जीसस ने वेश्या को कुत्ती नहीं कहा है। जीसस ने तो अपने समय की प्रसिद्ध वेश्या मेग्दालिन को अपनी शिष्या स्वीकार किया। जीसस के जीवन में घटना है कि एक गांव के लोग एक वेश्या को पकड़ कर ले आए। जीसस नदी के किनारे रेत पर बैठे हुए थे। गांव के लोगों ने उन्हें घेर लिया और वेश्या को उनके सामने बिठा दिया। और कहा कि इस वेश्या को हमने पकड़ा है। यह व्यभिचारिणी है।...उन्होंने यही कहा होगा जो वेदालंकार कह रहे हैं।...कि यह कुत्ती है। और हमारा पुराना शास्त्र कहता है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थर मार-मार कर मार डालना चाहिए।
अब यह बड़े मजे की बात है कि यह वेश्या गांव में जी रही है तो किनकी वजह से जी रही होगी? आखिर पुरुष ही इसके पास जाते होंगे। इस वेश्या के पास जाता कौन है? मगर वे पुरुष पापी नहीं हैं! यह वेश्या पत्थर मार-मार कर मार डालने योग्य है।
आप क्या कहते हैं--उन लोगों ने जीसस से पूछा।
जीसस ने कहा कि मैं तुम्हारी बात समझा। मैं समझ गया भलीभांति कि तुम सोचते हो कि या तो जीसस कहेंगे इसे क्षमा करो, क्योंकि मेरी शिक्षा यही है कि सबको क्षमा करो, तो तुम कहोगे कि यह हमारे पुराने सिद्धांत के विपरीत बात कर रहा है। और अगर मैं कहूं कि इसको पत्थर मार-मार कर मार डालो, तो तुम कहोगे क्या हुआ तुम्हारे क्षमा के सिद्धांत का! लेकिन मैं ये दोनों बातें नहीं कहता। मैं तुमसे यह कहता हूं कि पत्थर वे लोग मारें जिन्होंने कभी वेश्यागमन न किया हो या वेश्यागमन का विचार न किया हो। उठाओ पत्थर! जिन्होंने कभी दूसरी स्त्रियों की तरफ ललचाई नजरों से न देखा हो, वे उठाएं पत्थर! वे आगे आएं!
और वे सारे बहादुर जो उस गरीब स्त्री को मारने को तैयार थे, चुपचाप पीछे सरकने लगे। कौन आगे आए? क्योंकि उन सबमें से अधिकतर तो वेश्यागामी थे। या नहीं थे तो कम से कम आकांक्षा रखते थे। या दूसरी स्त्रियों को जिन्होंने लालसा से न देखा हो, ऐसे पुरुष खोजने कहां संभव हैं! बहुत मुश्किल। धीरे-धीरे भीड़ छंट गई, लोग भाग गए। अकेले जीसस रह गए और वेश्या रह गई। वेश्या उनके चरणों पर गिर पड़ी। और उसने कहा कि मुझे क्षमा कर दें। आप पहले व्यक्ति हैं जिसने मेरे प्रति अपमानजनक शब्दों का उपयोग नहीं किया। इसलिए मैं स्वीकार करती हूं कि मैं पापिनी हूं।
जीसस ने कहा, मेरे सामने स्वीकार करने की कोई भी जरूरत नहीं है। यह तुम्हारे और तुम्हारे परमात्मा के बीच की बात है। मैं कौन हूं निर्णायक! मैं कौन हूं जो तुम्हें पापी कहूं! अगर तुझे दिखाई पड़ गया हो कि बात गलत है, तो बदल लेना। और तुझे दिखाई पड़ता हो कि बात ठीक है, तो जारी रखना। यह तेरे और तेरे परमात्मा के बीच निर्णय होना है। मैं कौन हूं!
लेकिन ये ब्रह्मचारी दीपक वेदालंकार "कुत्ती जैसी वेश्याएं' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं! ब्रह्मचारी हैं न। वेश्याएं आकर्षित करती होंगी। ब्रह्मचारी और वेश्याओं में एक आंतरिक संबंध है गणित का। इन दोनों में जोड़ है, तालमेल है। मगर यह आर्यसमाज की भाषा है। इसलिए मैं आर्यसमाज को कोई धार्मिक आंदोलन ही नहीं मानता।
और यह बात जरूर सच है कि अपने को जहर देने वाले रसोइए को दयानंद ने माफ कर दिया था। जैसे अच्छे से अच्छे आदमी के जीवन में एकाध बुरी घटना हो सकती है, वैसे बुरे से बुरे आदमी के जीवन में एकाध अच्छी घटना हो सकती है। लेकिन एकाध घटनाओं से निर्णय नहीं होते। निर्णय तो समग्र जीवन से होते हैं। निर्णय तो पूरे जीवन का निचोड़ होता है। उस एक घटना पर निर्णय को नहीं टांगा जा सकता।
फिर यह भी हो सकता है, जिसकी पूरी संभावना है...क्योंकि पूरा जीवन जिस व्यक्ति का गाली-गलौज से भरा हो, वह व्यक्ति अपने मारने वाले को माफ कर दे, यह बात तर्कसंगत नहीं मालूम होती, युक्तियुक्त नहीं मालूम होती; उसके जीवन में यह बात कहीं बैठती नहीं। तब फिर एक ही संभावना है और वह यह कि सदियों से यह धारणा रही है कि महात्मा व्यक्ति को अपने मारने वाले को क्षमा कर देना चाहिए। और अब मर ही रहे हैं तो कम से कम अपने को महात्मा सिद्ध करने का अंतिम मौका क्यों चूका जाए! क्षमा कर दो, मर तो रहे ही हैं। इतनी होशियारी!
आदमी होशियार थे। यह मैंने कभी कहा नहीं कि आदमी होशियार नहीं थे। और आदमी महापंडित थे। मैंने कभी उनके पांडित्य पर शक नहीं किया। संभवतः इस सदी में उनके मुकाबले कोई महापंडित नहीं है। आखिरी क्षणों में शायद सिर्फ इसीलिए क्षमा किया होगा कि अब मर ही रहे हैं, अब जीसस और सुकरात होने का मौका भी क्यों छोड़ा जाए!
मगर पूरा जीवन कुछ और कहता है। पूरे जीवन से इस घटना की कोई संगति नहीं है। जीसस के जीवन में तो उनकी अंतिम क्षमा की संगति है। सुकरात के जीवन में संगति है। मगर दयानंद के जीवन में कोई संगति नहीं है। दयानंद का जीवन तो अत्यंत क्रोध से भरा हुआ जीवन है--वैमनस्य, तर्कजाल। तर्क भी कम, वितर्क ज्यादा, वितंडा--और उसी में वे निष्णात कर गए हैं ये तथाकथित वेदालंकार और सिद्धांतालंकार इत्यादि-इत्यादि को। और ये गुरुकुल कांगड़ी से जो लोग तैयार होकर निकलते हैं, ये उसी भाषा में तैयार होकर निकलते हैं।
इनको अड़चन हो रही है कि मैं कहता हूं उनमें सदव्यवहार नहीं था। मैं पुनः दोहराता हूं: उनमें सदव्यवहार नहीं था। और यह जो घटना है, एक घटना जरूर...इसे मैं अस्वीकार नहीं करता। जो है, उसे मैं कभी अस्वीकार नहीं करता। यह घटना है, लेकिन इसकी उनके जीवन में कोई संगति नहीं है, कोई तालमेल नहीं है। यह जीवन में यूं लगती है जैसे ऊपर से चिपका दी गई हो। जैसे आदमी जिंदगी भर तो रोता रहा हो और मरते वक्त हंस दे, तो वह हंसी एकदम चिपकी हुई मालूम पड़े।
एक ईसाई फकीर को एक आदमी ने मारा एक चांटा गाल पर, तो उसने दूसरा गाल उसके सामने कर दिया। क्योंकि वह ईसाई फकीर कहता था बार-बार अपने प्रवचनों में कि जीसस ने कहा है--जो व्यक्ति एक गाल पर चांटा मारे, उसके सामने दूसरा कर देना।
मगर वह दूसरा भी एक पहुंचा हुआ ही सिद्धपुरुष रहा होगा। उसने दूसरे गाल पर और करारा चांटा जड़ दिया।
बस फिर वह ईसाई फकीर टूट पड़ा उस आदमी पर।
वह तो बिलकुल तैयार ही नहीं था इसके लिए। वह तो बिलकुल निश्चिंत। जब एक पर मारा था, तब तो थोड़ा डरा भी था कि पता नहीं यह अपने सिद्धांत का अनुसरण करेगा कि नहीं! लेकिन जब उसने दूसरा गाल कर दिया तो वह बिलकुल निश्चिंत था, उसने दिल खोल कर मारा था। जिंदगी में ऐसा मजा फिर कभी आए, न आए; मौका मिले, न मिले। अक्सर दूसरा गाल करने वाले आदमी मिलते कहां! उसने अच्छा करारा हाथ दिया था। जीवन भर की दबी हुई वृत्तियां प्रकट हो गई होंगी। उसको तो खयाल ही नहीं था, तो वह तैयार ही नहीं था।
और ईसाई फकीर एकदम उसकी छाती पर चढ़ गया; और इस तरह उसे दबोचा और इस तरह पीटा। उसका भी जिंदगी भर का दबा था--और भी दबा था--वह तो बेचारा एक गाल पर जो मारे उसको दूसरा गाल सामने करने वाला सिद्धांत मानता था।
वह आदमी जब पिटने लगा और इतने जोर से मारने लगा ईसाई फकीर, तो उसने कहा, भई, सुनो भी तो! तुम्हारे सिद्धांत का क्या हुआ?
उसने कहा, ऐसी की तैसी सिद्धांत की। जीसस ने जहां तक कहा था, वहां तक मैंने पालन कर दिया; उसके आगे अब मैं स्वतंत्र हूं। जीसस ने कहा था: जो एक गाल पर मारे, दूसरा गाल कर देना। तीसरा गाल तो है नहीं। अब मैं स्वतंत्र हूं। अब मैं तुझे मजा चखाता हूं बेटा। अगर पहले गाल पर मार कर तू लौट गया होता तो किसी को कभी पता भी नहीं चलता कि मामला कहां समाप्त होता है।
एक आदमी ने बुद्ध से पूछा कि आप कहते हैं क्षमा करो। मैं पूछता हूं, कितनी बार?
उसके पूछने का ढंग ही ऐसा था--कितनी बार? क्योंकि जो पूछे कितनी बार, उसका मतलब है कि फिर जब उतनी बार के आगे बात निकल जाए तो फिर मजा चखा देंगे। बुद्ध ने कहा, सात बार।
उस आदमी ने कहा, अच्छी बात है। ठीक है। सात बार सही।
बुद्ध ने कहा, रुक भाई! तू जिस ढंग से कह रहा है ठीक है, अच्छी बात है, चलो सात बार सही, उससे ऐसा लग रहा है कि आठवीं बार में तू ऐसा वार करेगा कि सौ सुनार की और एक लुहार की, कि एक ही बार में सातों बार का मामला हल कर देगा। तू ठहर! क्षमा में हिसाब नहीं होता, गणित नहीं होता। क्षमा का अर्थ ही है--क्षमा।
लेकिन दयानंद के जीवन में भारत का अहंकार, आर्य-धर्म की श्रेष्ठता का अहंकार, वेदों का अहंकार। और सब गलत हैं--महावीर गलत हैं, बुद्ध गलत हैं। और जिस ढंग से उन्होंने निंदा की है महावीर और बुद्ध की, जिन शब्दों में निंदा की है, और जो ओछे तर्क दिए हैं, जो बचकाने तर्क दिए हैं--वे सब बताते हैं कि ऐसा आदमी क्या क्षमा करेगा! अगर इसने कर भी दिया है क्षमा, तो शायद, निश्चित ही एक ही कारण हो सकता है क्षमा करने का कि अब मर ही रहा हूं, अब जाते वक्त महात्मा होने की यह आखिरी सील भी क्यों छोड़ी जाए! यह सील भी अपने जीवन पर लगा ली जाए।
उस घटना को मैं कोई बहुत ज्यादा मूल्य नहीं दे सकता। मैं घटनाओं को मूल्य नहीं देता। मैं घटनाओं की शृंखला को मूल्य देता हूं। और शृंखलाएं पूरे जीवन पर फैली होती हैं। एकाध फूल खिल जाए, इससे कोई वसंत नहीं आ जाता। वसंत जब आता है तो फूल ही फूल खिल जाते हैं। इतने फूल खिल जाते हैं कि पत्तों को जगह नहीं मिलती। एकाध फूल तो कभी-कभी असमय में भी खिल जाता है; वसंत आया न हो तो भी खिल जाता है। एकाध फूल से कुछ हल नहीं होता।
और वेदालंकार ने कहा है कि "मैं तो समझता हूं कि आप दयानंद जैसे प्रखर सूरज का तेज देख ही नहीं पाए हैं।'
तेज हो, तो देखना ही पड़े, दिखाई ही पड़े। कोई तेज वगैरह नहीं है। पांडित्य का जरूर एक अदभुत प्राकटय हुआ है। भाषा का, व्याकरण का चमत्कार है। शब्दों को तोड़ने-मरोड़ने की जितनी कुशलता दयानंद की थी, शायद कभी किसी आदमी की नहीं रही। ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेने की, जो कि उन शब्दों में हो ही नहीं सकते, जैसी उनकी प्रतिभा थी, वैसी किसी आदमी की नहीं रही।
जो है, वह मुझे दिखाई पड़ता है।
और अगर मुझे बुद्ध का तेज दिखाई पड़ता है, महावीर का दिखाई पड़ता है, कृष्ण का दिखाई पड़ता है, नागार्जुन का दिखाई पड़ता है, वसुबंधु का दिखाई पड़ता है, शंकर का दिखाई पड़ता है, रामानुज का दिखाई पड़ता है, निम्बार्क का दिखाई पड़ता है, वल्लभ का दिखाई पड़ता है, रामकृष्ण का दिखाई पड़ता है, रमण का दिखाई पड़ता है, कृष्णमूर्ति का दिखाई पड़ता है--तो दयानंद से ही मेरी ऐसी कौन सी दुश्मनी है? मुझे दूर-दूर के लोगों का भी--जरथुस्त्र का दिखाई पड़ता है, लाओत्सु, च्वांग्त्सु, लीहत्सु का दिखाई पड़ता है, जीसस और मोहम्मद का भी दिखाई पड़ता है--तो दयानंद से मुझे क्या अड़चन है? इतने नामों में दयानंद का भी एक नाम गिनने में मुझे कुछ कंजूसी नहीं हो जाती। नाम तो कुछ बुरा नहीं है, प्यारा नाम है--दयानंद। उसका अर्थ भी अच्छा है।
लेकिन मैं भी क्या करूं--रोशनी हो तो दिखाई पड़े! रोशनी हो तो दिखाई पड़ेगी ही। और कितने ही बादलों में घिरी हो, तो भी सूरज दिखाई पड़ जाता है। मोहम्मद का सूरज बहुत बादलों में घिरा है--फिर भी मैं उसे देख पाता हूं। और मूसा का सूरज भी बहुत बादलों में घिरा है--फिर भी मैं उसे देख पाता हूं। लेकिन दयानंद को न मूसा का सूरज दिखाई पड़ता है, न ईसा का सूरज दिखाई पड़ता है, न महावीर का, न बुद्ध का! दयानंद की तो सारी की सारी सीमा वेदों में बंधी हुई है। वेदों के बाहर उन्हें कुछ नहीं दिखाई पड़ता। और वेदों में निन्यानबे प्रतिशत कचरा है।
मैं भी क्या करूं! जैसा है, वैसा ही कहूंगा!
तुमने पूछा है श्रीचंद: "मैं नहीं जानता क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।'
यहां पांडित्य नहीं मिलेगा। यहां ज्ञान नहीं मिलेगा। यहां तो खोना पड़ेगा--शास्त्र खो जाएंगे; अगर वेदालंकार हो, तो वेदालंकार होना खो जाएगा; अगर ब्रह्मचारी का अहंकार लिए घूम रहे हो, तो वह खो जाएगा; अगर आर्य होने का दंभ है, तो वह खो जाएगा; हिंदू, जैन, बौद्ध होने की अगर अकड़ है, तो वह खो जाएगी। मैं तो तुमसे छीनूंगा, ताकि तुम्हारे भीतर बस उतना ही बच रहे जितना छीना ही नहीं जा सकता। और जिस दिन उतना ही बच रहेगा जो छीना नहीं जा सकता, उस दिन तुमने पा लिया जो पाने योग्य है। और उसे पाने से नहीं पाया जाता, दौड़ कर नहीं पाया जाता--बैठ कर पाया जाता है, रुक कर पाया जाता है, ठहर कर पाया जाता है।


तीसरा प्रश्न: भगवान!
मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती है। क्या करूं?

सुधाकर!
ध्यान करने की अथक चेष्टा? चेष्टा में ही उपद्रव है। ध्यान कोई चेष्टा नहीं है। चेष्टा से तो तनाव पैदा हो जाएगा। चेष्टा कौन करेगा? वह तो मन ही करेगा। और ध्यान है मन का अतिक्रमण। ध्यान चेष्टा से नहीं होता, ध्यान तो होता है विश्राम में।
पतंजलि ने ठीक कहा है कि समाधि और सुषुप्ति में एक समानता है। जैसे सुषुप्ति घटती है जब तुम विश्राम में पड़ जाते हो, वैसे ही समाधि भी घटती है विश्राम में। भेद भी है, समानता भी है। समानता है कि दोनों विश्राम में घटते हैं; और भेद है कि सुषुप्ति में होश नहीं होता और समाधि में होश होता है। मगर भूमिका में दोनों समान हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन मुझसे कह रहा था, भगवान, मुझे नींद नहीं आती।
मैंने पूछा, क्यों नहीं आती?
मुल्ला बोला, मालूम नहीं। रात को रोज मैं बारह बजे तक नींद की प्रतीक्षा करता हूं, अथक चेष्टा करता हूं कि आए, आए, आए। जब वह नहीं आती तो मैं तंग आकर सो जाता हूं।
सुधाकर, करो अथक चेष्टा। जब तंग आ जाओगे, तब हल होगा।
बुद्ध ने छह वर्ष ध्यान की अथक चेष्टा की। फिर तंग आ गए, फिर एक दिन ध्यान भी छोड़ दिया। और जिस दिन ध्यान छोड़ा, उसी दिन समाधि फली।
बुद्ध के जीवन की यह घटना अपूर्व है। छह वर्ष की अथक चेष्टा में नहीं घटी घटना। घटी उस दिन, जिस दिन वे थक गए--बिलकुल थक गए। और उन्होंने कहा कि होना ही नहीं है अब, यह बात ही फिजूल है। यह मालूम होता है सिर्फ काल्पनिक है। उस सांझ पूरी रात वे बिलकुल बिना चेष्टा के सोए। नहीं तो सोए ही नहीं थे छह वर्ष से ठीक से। वह ध्यान ही उनको सता रहा था--कि जीवन कब खो जाए! कल हो या न हो! इसलिए सब समय लगा रहे थे, पूरी ताकत लगा रहे थे।  जितनी ताकत लगा रहे थे, उतना ही मुश्किल होता जा रहा था।
तुमने कभी खयाल किया एक छोटी सी घटना का? राह पर तुम्हें एक आदमी मिलता है। शक्ल पहचानी मालूम पड़ती है। नाम भी लगता है जबान पर रखा है, मगर याद नहीं आता। तुम कहते भी हो कि मालूम है कि यह आदमी कौन है, नाम भी मालूम है, मगर बस जबान पर रखा है।
अब जबान पर रखा है तो निकालते क्यों नहीं? और तुम गलत भी नहीं कह रहे हो, यह भी मैं जानता हूं। जबान पर ही रखा है। मगर बस कुछ अटकन है, कुछ अड़चन है। तुम जितनी कोशिश करते हो कि आ जाए, आ जाए, उतना ही मुश्किल होता जाता है।
फिर तुम थक जाते हो। फिर तुम छोड़-छाड़ कर अखबार पढ़ने लगे कि भाड़ में जाए, हमें करना क्या है! और अखबार पढ़ रहे हो, कुछ का कुछ पढ़ रहे हो, और तब अचानक वह नाम आ जाता है।
मैडम क्यूरी तीन वर्ष तक एक गणित के सवाल को हल करती रही। नहीं आया, नहीं आया। और एक रात वैसा ही घटा, जैसा बुद्ध को घटा था। वह रात थक कर सोई। उसने कहा, खत्म, अब नहीं करना, कल से बात खत्म। अब जिंदगी में और भी सवाल हैं। तीन साल काफी हो गए। और उसी रात हल हो गई बात। उत्तर उभर आया। यूं उभरा कि खुद मैडम क्यूरी को चकित कर गया।
वह नींद में उठी और जाकर टेबल पर उत्तर लिख कर और फिर वापस सो गई। सुबह जब उठी, टेबल पर उत्तर लिखा हुआ पाया। दरवाजे भीतर से बंद थे। कमरे में कोई आ सकता नहीं था। और कोई आ भी जाता, तो जिस उत्तर को मैडम क्यूरी तीन वर्ष तक नहीं ला सकी, उसको कौन लाने वाला था! घर में एक नौकर जरूर था, मगर उस नौकर की क्या हैसियत थी! मैडम क्यूरी को, नोबल पुरस्कार विजेता महिला को अगर गणित हल नहीं हो रहा है, तो नौकर क्या करेगा हल! और दरवाजे बंद थे तो नौकर भी नहीं आ सकता।
फिर जब गौर से देखा तो हैंड राइटिंग भी पहचाना हुआ लगा--अपना ही था। तब तो और भी चकित हुई। फिर धीरे-धीरे याद आनी शुरू हुई। तब उसे खयाल आया कि रात उसे ऐसा लगा था कि वह सपने में उठी है और उठ कर उसने कुछ लिखा है टेबल पर। फिर तो धीरे-धीरे सारी बात याद आ गई। उसने ही जाकर टेबल पर वह उत्तर लिखा था। और उसी सांझ उसने तय किया था कि अब छोड़ दी यह बात।
ऐसे ही एक सांझ बुद्ध ने तय किया था--पूरे चांद की रात थी--कि अब छोड़ दी यह बात। अब नहीं करनी चेष्टा। हो गई बहुत चेष्टा। और जब बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को, जो छह वर्ष से उनके पीछे चलते थे छाया की तरह, उनको कहा कि भई, मैं थक गया इस तप से, तपश्चर्या से। यह सब मूढ़ता मालूम होती है। जो मुझे कहा गया है, मैंने किया, लेकिन ध्यान नहीं लगा। इसलिए अब मैं यह छोड़ता हूं। वे पांचों शिष्यों ने यह सोच कर कि यह गौतम सिद्धार्थ भ्रष्ट हो गया, बुद्ध का साथ छोड़ दिया। वे उसी सांझ बुद्ध का साथ छोड़ कर चले गए! कह गए बुद्ध को कि गौतम, तुम भ्रष्ट हो गए! अब तक हम मानते थे तुम हमारे गुरु हो, क्योंकि हम जो तपश्चर्या नहीं कर सकते थे, वह तुम करते थे। हम अगर घंटे भर सिर के बल खड़े होते थे, तुम छह-छह घंटे खड़े होते थे। हम तुमसे चमत्कृत थे। हम अगर एक बार भोजन करते थे, तुम दो दिन में एक ही बार भोजन करते थे।
किसी ने बुद्ध को कहा कि भोजन को रोज कम करते जाओ। इतना कम करो कि सिर्फ एक चावल के दाने तक आ जाओ। छह महीने में कम करते-करते रोज, एक चावल के दाने पर आए। इतने क्षीणकाय हो गए--अस्थि सब दिखाई पड़ने लगीं। पेट पीठ से लग गया। मगर नहीं हुआ ध्यान। अब कोई अस्थिपंजर हो जाने से थोड़े ही ध्यान का संबंध है। नींद भी खो गई। ध्यान तो दूर, नींद भी खो गई। चैन भी खो गया।
जब उन्होंने यह सब छोड़ दिया और गांव की एक युवती--सुजाता ने मनौती मनाई थी: पीपल के देवता को खीर चढ़ाएगी अगर वह गर्भवती हो जाए। वह गर्भवती हो गई थी। तो पूरे चांद की रात थी, पूर्णिमा की रात थी, वह खीर चढ़ाने आई। वहां उसने बुद्ध को बैठे देखा। उसने समझा कि देवता स्वयं पीपल से प्रकट होकर खीर स्वीकार करने को मौजूद हैं। उसका तो धन्यभाग! वह तो चरणों पर गिर पड़ी। और कोई दिन होता तब तो बुद्ध लेते ही नहीं खीर उसकी। रात को लेते ही नहीं थे। लेकिन उस दिन तो उन्होंने सब त्यागत्तपश्चर्या छोड़ दी थी--खीर स्वीकार कर ली।
उन पांचों भिक्षुओं ने देखा कि यह तो हद हो गई भ्रष्ट होने की बात कि रात को भोजन हो रहा है! यह आदमी बिलकुल गया काम से। वे तो एकदम नमस्कार करके कि भैया, अब हम चले। भाग ही गए। छोड़ कर ही चले गए। उन्हें क्या पता था कि आज की ही रात वह क्रांतिकारी घटना घटने वाली है! एक सिलसिला आज की रात शुरू होगा जो सदियों तक न मालूम कितने लोगों के जीवन में रोशनी को जलाएगा! आज एक दीया जलेगा जिस दीये से फिर न मालूम कितने दीये जलेंगे! जिससे एक दीयों की शृंखला पैदा होगी! वे छोड़ कर चले गए।
और उसी रात बुद्ध को घटना घटी। इतने विश्राम में पड़े थे। सुबह जब आंख खुली, आखिरी तारा डूब रहा था। उस आखिरी तारे को डूबते देख कर--सिर्फ साक्षी उनके भीतर था--बस तारे को डूबते देखा, तारा डूब गया और उन्हें साक्षी का बोध हो गया। कोई विचार न था। कोई तनाव न था। वह ध्यान की वासना भी जा चुकी थी।
तुम कहते हो सुधाकर: "मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती।'
अथक चेष्टा करोगे तो सफलता हाथ लगेगी नहीं। ध्यान विश्राम की कला है। तुम्हारी चेष्टा ही सब गड़बड़ किए दे रही है। तुम मेरी बात को नहीं समझ पा रहे। मैं यहां विश्राम सिखाता हूं। मैं यहां तुम्हें तपश्चर्या नहीं सिखा रहा हूं। मैं यहां तुम्हें सिखा रहा हूं कि कैसे तुम शिथिल, शांत, विश्राम को उपलब्ध हो जाओ; कैसे तुम्हारे जीवन से सारे तनाव चले जाएं। तुम उलटा ही कर रहे हो। उलटा करोगे तो फिर हारोगे। लेकिन हारने का दोष तुम मुझे मत देना।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी गुलजान एक दिन भागती हुई चिकित्सक के पास पहुंची और हांफते हुए बोली कि डाक्टर साहब, जल्दी कुछ करिए। मेरे पति मुल्ला नसरुद्दीन सुबह से संडास गए हैं, तो शाम होने को आई, अभी तक निकलने का नाम ही नहीं ले रहे हैं!
डाक्टर ने पूछा, लेकिन बात क्या हुई, जरा विस्तार से तो कहो।
गुलजान बोली कि बात दरअसल यह है कि पिछले एक माह से हमारी कजरी भैंस ने गोबर देना बंद कर दिया था। दाना-पानी तो खाए, मगर गोबर न करे। इससे नसरुद्दीन को बड़ी परेशानी थी। सो आज वे चिकित्सक के पास गए थे और उसे अपनी भैंस की तकलीफ के बारे में बताया। चिकित्सक ने उन्हें कुछ गोलियां दीं और कहा--इन्हें भैंस को खिला देना। जब उनसे पूछा कि इन गोलियों को कैसे खिलाया जाए? तो बोले कि इन्हें एक पाइप में रखना, तथा पाइप का एक छोर अपने मुंह में तथा दूसरा भैंस के मुंह में रख कर जोर की फूंक मारना, बस गोलियां भैंस के अंदर चली जाएंगी।
चिकित्सक गुलजान को टोकते हुए बोला, लेकिन इस किस्से का नसरुद्दीन से क्या संबंध है?
गुलजान बोली, वही तो मैं बताना चाह रही हूं कि नसरुद्दीन के फूंक मारने के पहले ही भैंस ने फूंक मार दी और गोलियां नसरुद्दीन के पेट में चली गईं। उसी के परिणामस्वरूप नसरुद्दीन संडास में जो घुसे हैं, सो निकलने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अब उन्हें संडास से कैसे निकालना है, यही पूछने आपसे आई हूं!
उलटा हो गया। भैंस ने पहले फूंक मार दी। भैंसों का कोई भरोसा!
तुम कह रहे हो: "मैं अथक चेष्टा में लगा हूं।'
वही मैं समझा रहा हूं कि चेष्टा भर न करना। तुम चेष्टा ही नहीं कर रहे--अथक चेष्टा कर रहे हो।
ये भ्रांत धारणाएं सदियों पुरानी हैं। ये हमारी छाती पर चढ़ी बैठी हैं। तप, तपश्चर्या, चेष्टा, श्रम--हमने इतना मूल्य दे दिया है इन बातों को जिसका हिसाब नहीं! जैनों की पूरी परंपरा, पूरी संस्कृति श्रमण संस्कृति कहलाती है। श्रमण संस्कृति का अर्थ होता है: श्रम करने वाले लोग। अथक चेष्टा में लगे हैं!
मैं तुम्हें विश्राम सिखा रहा हूं, विराम सिखा रहा हूं। यहां नाचो, गाओ--मगर मस्ती में, चेष्टा में नहीं--आनंदमग्न, उत्सवपूर्वक! यहां जो भी हो रहा है, वह सब तुम्हारे तनावों को क्षीण करने की व्यवस्था है। तुम्हारा चित्त जितना तनाव-शून्य हो जाएगा, उतनी ही शीघ्रता से ध्यान फलित होगा।

चौथा प्रश्न: भगवान!
आप कहते हैं कि इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है। तो यह मनुष्य आपको क्यों नहीं समझ पा रहा है? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।

धर्म सरस्वती!
मैं जब कहता हूं इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि इस सदी में रहने वाले सभी लोग इस सदी के हैं। इस सदी में रहने वाले बहुत ही कम लोग बीसवीं सदी के हैं। जो बीसवीं सदी के हैं, वे तो प्रौढ़ हैं और उनको मेरी बात समझ में आ रही है। लेकिन वे बहुत कम हैं।
अब ये ब्रह्मचारी दीपक वेदालंकार, इनको मैं इस सदी का नहीं मान सकता हूं। ये समसामयिक नहीं हैं। एक ही साथ यहां इतने लोग बैठे हैं, इससे तुम यह मत सोचना कि सभी लोग एक ही साथ हैं। इनमें कोई पांच हजार साल पुराना है! खोपड़ी-खोपड़ी अलग-अलग सदियों की हैं। किसी की खोपड़ी में वेद भरे हैं। जिनकी खोपड़ी में वेद भरे हैं, वे कम से कम पांच हजार साल पुराने तो हैं ही।
और मजा तो यह है कि जिनकी खोपड़ी में वेद भरे हैं, वे न केवल यह चेष्टा करते हैं कि वे पांच हजार साल पुराने हैं वेद, उनकी चेष्टा यह होती है कि पांच हजार साल! कौन कहता है पांच हजार साल? नब्बे हजार साल पुराने हैं।
इसी तथाकथित पुण्य की नगरी पूना में बालगंगाधर तिलक ने सिद्ध करने की कोशिश की थी कि वेद नब्बे हजार साल पुराने हैं। और भारतीय अहंकार को खूब आनंद आया। इसलिए बालगंगाधर तिलक एकदम लोकमान्य हो गए। हो ही जाना चाहिए लोकमान्य। जो तुम्हारे अहंकार की तृप्ति करे वह लोकमान्य हो जाए, लोकनायक हो जाए, लोकनेता हो जाए! जितने पुराने हों वेद, इसकी खींचने की कोशिश की जाती है। जैसे वेद न हुए कोई शराब हुई कि जितनी पुरानी हो उतनी अच्छी। एक अर्थ में शराब ही है।
कार्ल माक्र्स से मैं राजी हूं, निन्यानबे प्रतिशत राजी हूं। उसने कहा है कि तुम्हारे तथाकथित धर्म जनता के लिए अफीम का नशा हैं। निन्यानबे प्रतिशत मैं राजी हूं। क्योंकि निन्यानबे प्रतिशत तथाकथित धार्मिक लोग अपने धर्मों का उपयोग नशे की तरह कर रहे हैं। सिर्फ एकाध प्रतिशत लोग हैं जो धर्मों का उपयोग जागरण की तरह करते हैं; बाकी लोग तो सोने के लिए, सांत्वना के लिए--सत्य के लिए नहीं।
तो सारे लोग इस सदी के नहीं हैं। इस सदी में हैं, लेकिन तरहत्तरह के लोग हैं--कोई तीन सौ साल पुराना है, कोई पांच सौ साल पुराना है, कोई हजार साल पुराना है, कोई दो हजार साल पुराना है, कोई पांच हजार साल पुराना है, कोई दस हजार साल पुराना है। इनको मेरी बात कैसे समझ में आ सकती है? मैं जो कह रहा हूं, वह अभी की बात है--इतनी ताजी जैसे सुबह की ओस, जैसे अभी खिला-खिला फूल! स्वभावतः समझ में आना मुश्किल होगा, कठिनाई होगी, अड़चन होगी।
रेलगाड़ी रुकने पर चंदूलाल ने अपने बगल में बैठे ढब्बूजी के कंधे पर हाथ रख कर पूछा, क्यों भाई, यह कौन सी स्टेशन है?
ढब्बूजी ने हाथ को झिड़कते हुए कहा, माफ करिए, यह कोई स्टेशन नहीं, मेरा कंधा है।
मुल्ला नसरुद्दीन को फास्ट ड्राइविंग का बड़ा शौक था। एक दिन वे और उनके मित्र चंदूलाल अपनी-अपनी मोटर साइकिलों पर शाम गुजारने के लिए निकले। नसरुद्दीन की मोटर साइकिल एकदम तीर की तरह चल रही थी और चंदूलाल बार-बार पीछे छूट जाते। अचानक सामने से एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया, जिसकी दो लाइटें चमक रही थीं। लेकिन दूर से उसे देख नसरुद्दीन ने चंदूलाल से कहा कि देखो, अब इन दो मोटर साइकिलों के बीच से किस तरह मैं अपनी मोटर साइकिल निकालता हूं! चंदूलाल ने उन्हें मना किया कि रहने भी दो, लेकिन वे न माने और तेजी से अपनी मोटर साइकिल ले गए। और वही हुआ जो होना था। भयंकर एक्सीडेंट हुआ। अस्पताल में मुल्ला को भरती किया गया। उनके शरीर पर फ्रैक्चर ही फ्रैक्चर हो गए थे। पूरे सात दिन बात उन्हें होश आया। तो चंदूलाल उनसे मिलने गए और मुल्ला से हाल-चाल पूछा। मुल्ला से चंदूलाल ने कहा कि देखो, मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि इस प्रकार मोटर साइकिल न चलाओ।
मुल्ला नसरुद्दीन बोला, ऐसी की तैसी मोटर साइकिल की जी, पहले यह बताओ कि उन दो मोटर साइकिलों के बीच वह बिना बत्ती की मोटर साइकिल वाला कौन था? कौन था वह हरामजादा जिसकी गाड़ी में लाइट नहीं थी?
मनुष्य को जब मैं कहता हूं प्रौढ़ है आज की सदी का, तो यह थोड़े से लोगों के संबंध में लागू होता है। जो हिंदू है, वह कैसे आज की सदी का हो सकता है! जो मुसलमान है, वह कैसे आज की सदी का हो सकता है! जो ईसाई है, वह कैसे आज की सदी का हो सकता है! असंभव। जो कम्युनिस्ट है, वह भी आज की सदी का नहीं है। वह भी माक्र्स के इर्द-गिर्द भटक रहा है। माक्र्स को गए भी समय हो गया। जो फ्रायड को मानने वाला है, वह भी आज की सदी का नहीं है। फ्रायड को भी गए समय हो गया। सिर्फ ध्यानी ही समसामयिक होता है, क्योंकि वह प्रतिपल नया होता चलता है, वह अतीत को इकट्ठा नहीं करता। ऐसे थोड़े से लोगों की ही समझ में मेरी बात आ सकती है। बाकी लोग तो तरहत्तरह की बेहोशियों में हैं। और वे अधिक हैं। उनकी संख्या बड़ी है।
कल ही मुझे स्विटजरलैंड से एक महिला का पत्र मिला। उसका बेटा संन्यासी था। महीने भर पहले वह कैंसर से मर गया। उसने पत्र में बड़ी नाराजगी जाहिर की है। उसने पत्र में लिखा है कि मेरे बेटे की मृत्यु की जिम्मेवारी आपकी है।
मैं भी थोड़ा चौंका। उसके बेटे को कैंसर हुआ, इसमें मेरी क्या जिम्मेवारी हो सकती है? लेकिन पत्र आगे पढ़ने से जाहिर हुआ कि उसका कहने का मतलब क्या है।
उसने लिखा है कि मेरा बेटा मरते समय तक आपकी तस्वीर अपनी आंखों के सामने रखे रहा। अगर उसने आपकी जगह जीसस को याद किया होता, तो क्यों मरता?
इसका तो मतलब यह हुआ कि किसी ईसाई को कैंसर से नहीं मरना चाहिए। और जितने ईसाई कैंसर से मर रहे हैं, दुनिया में कोई नहीं मर रहा कैंसर से। क्योंकि कैंसर विकसित देशों की बीमारी है। गरीब देश कैंसर जैसी बीमारियों का लाभ नहीं ले सकते। उनकी बीमारियां भी गरीब होती हैं। ये अमीरों की बीमारियां हैं। ये शाही बीमारियां हैं। इसलिए तो आयुर्वेद में टी.बी. को राजरोग कहा, क्योंकि वह पहले सिर्फ राजाओं को होता था। गरीब आदमी को हो कैसे सकता है! गरीब आदमी के जीवन का ढंग ऐसा है--आठ घंटे मेहनत करेगा, टी.बी. होने की फुर्सत कहां, समय कहां! समय भी चाहिए न, इस तरह की बातों के लिए सुविधा भी चाहिए।
कैंसर के लिए तुम्हारे पास खर्च करने के उपाय चाहिए। कैंसर यूं ही नहीं हो जाता! टेलीविजन देखो पांच-छह घंटे; सिगरेट पीओ तीन-चार पाकेट दिन में; कोई श्रम न करो; शराब पीओ; मांसाहार करो; उलटी-सीधी चीजें खाओ; जिनका कोई पौष्टिक मूल्य नहीं है, इस तरह का कूड़ा-करकट भरते रहो, कभी आइसक्रीम के नाम से, कभी किसी और नाम से; जहां हवा बिलकुल दूषित हो गई है--जैसे न्यूयार्क, लासएंजेल्स, सानफ्रांसिसको--ऐसे नगरों में रहो, जहां हवा जहर है। तो ईसाइयों को जितनी कैंसर की बीमारी होती है, उतनी तो किसी और को होती नहीं।
मगर उस महिला ने लिखा है कि अगर उसने आपकी तस्वीर की जगह जीसस की तस्वीर रखी होती, तो क्यों मरता? लाख उसे समझाया, नहीं माना। बस आपकी तस्वीर ही आंख के सामने रखे-रखे मर गया। और यही नहीं, मरते वक्त कह गया कि मुझे मेरी माला के साथ दफनाया जाए। हमारी बिलकुल इच्छा नहीं थी कि आपकी माला के साथ उसे दफनाया जाए। कम से कम मरते वक्त तो उसकी छाती पर क्रॉस रख दिया जाए। मगर उसकी इच्छा को ध्यान में रख कर--मरते समय की इच्छा--हमें आपकी माला के साथ ही उसे दफनाना पड़ा है। दुखपूर्वक हमें लिखना पड़ रहा है यह। लेकिन जिम्मेवारी आपकी है।
अब यह जो महिला है, इसको तुम बीसवीं सदी का कहोगे? भला स्विटजरलैंड में रहती हो, मगर यह बीसवीं सदी की नहीं है। यह दो हजार साल पुरानी किसी दुनिया में रह रही है। इसको खयाल है कि जीसस पानी पर चलते हैं, और मुर्दों को जिलाते हैं, और अंधों की आंखें छूकर ठीक कर देते हैं। यह सब कहानियों में इसका भरोसा है। ये कहानियों में बच्चे भी भरोसा नहीं करते अब। जो आधुनिक बच्चे हैं, वे इन कहानियों में भरोसा नहीं करते। लेकिन जो आधुनिक नहीं हैं, वे इन कहानियों में ही जी रहे हैं। क्या-क्या कहानियां हैं!
मैं छोटा था। एक स्वामी जी प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हनुमान जी जब संजीवनी बूटी लेने गए, तो वे खोज नहीं पाए संजीवनी बूटी, सो पूरा पहाड़ ले आए उठा कर।
मैंने उनसे कहा कि क्या इतने बुद्धू थे कि संजीवनी बूटी न खोज पाए? आप तो कहते हैं महाशक्तिशाली थे। राम की उन पर कृपा थी। राम की कृपा हो जिस पर, जो महाशक्तिशाली हो, जो पहाड़ उठा कर ले आए, वह संजीवनी बूटी न खोज सका?
बस वे एकदम नाराज हो गए कि तुम नास्तिक हो।
मैंने कहा, मैं नास्तिक हूं या आस्तिक, इसकी चिंता आप छोड़ें। उससे मेरा नर्क या स्वर्ग तय होगा। मैं तो यह पूछता हूं कि हनुमान जी बेचारे इतना भी नहीं समझ पाए कि संजीवनी बूटी क्या है? और चिकित्सक ने समझा कर भेजा था कि संजीवनी बूटी कैसी होती है। सब लक्षण दे दिए थे। फिर पूरा पहाड़ उठा कर ला सकते हैं।...
और इस पर अभी भी भरोसा चलता है कि वे पूरा पहाड़ उठा कर ले आए। अब इस पर जो आज भी भरोसा करने वाले लोग हैं कि पूरा पहाड़ उठा कर ले आए, उनको अंदाज नहीं है कि वे क्या भरोसा कर रहे हैं! और उनका भरोसा उन्हें समसामयिक नहीं होने दे रहा है।
ऐसे लोगों को मेरी बात समझ में नहीं आ सकती है। ऐसे लोग बेहोशी में हैं, नशे में हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन शराबघर के सामने से गुजर रहा था कि उसे अंदर से लड़ाई-झगड़े की आवाजें सुनाई दीं, और तभी भीतर से एक आदमी को उठा कर बाहर फेंक दिया गया। वह आदमी नसरुद्दीन के पास आकर गिरा। नसरुद्दीन ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि भाई, फिक्र मत करो। शराबघर में ऐसी मामूली मार-पीट तो चलती ही है।
वह व्यक्ति तो एकदम गरम हो गया और बोला कि ऐसी की तैसी उन हरामजादों की। तुम अभी यहीं रुको, मैं इनको एक-एक करके अभी यहां उठा-उठा कर फेंकता हूं। मैं उन्हें भीतर से बाहर फेंकूंगा, तुम जरा गिनती करना।
यह कह कर वह भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद फिर धमाचौकड़ी होने लगी। मार-पीट, लात-घूंसे चलने की आवाजें आने लगीं। और धड़ाम से एक आदमी को अंदर से बाहर फेंका गया।
नसरुद्दीन जोर से चिल्लाया, एक।
वह आदमी उठा और बोला, माफ करना नसरुद्दीन, अभी तो मैं ही हूं।
बेहोश लोग तरहत्तरह की बेहोशियों में हैं। उनको मेरी बात समझ में नहीं आ सकती है। धर्म सरस्वती, लेकिन जो मैं कह रहा हूं उसमें जरा भी भूल-चूक नहीं है। यह सदी पहली दफा प्रौढ़ हुई है। कुछ ही लोग प्रौढ़ हुए हैं। मगर इतने लोग भी कभी प्रौढ़ नहीं थे।
आज इतने लोग मुझे चुपचाप बैठ कर शांति से सुन रहे हैं। एक आदमी उठ कर खड़ा हुआ, उपद्रव करने की आकांक्षा जगी होगी उसके भीतर। अगर आज से दो हजार साल पहले मैंने ये बातें कही होतीं, तो एक आदमी शायद सुनता और बाकी सब लोग उठ कर खड़े होते। इतना फर्क पड़ा है। अब एक आदमी उठता है और बाकी लोग चुपचाप बैठे सुन रहे हैं, समझने की कोशिश कर रहे हैं। वह एक आदमी होगा कोई ब्रह्मचारी, कोई वेदालंकार, कोई सिद्धांतालंकार, कोई गुरुकुल कांगड़ी का स्नातक, कोई आर्यसमाजी, उसके बरदाश्त के बाहर हो गया होगा, खून खौल गया होगा उसका।
इतना दमन किए लोग बैठे हैं, इतना ईंधन दबाए बैठे हैं कि उनका खून खौलता ही रहता है!
मुल्ला नसरुद्दीन मुझसे कह रहा था कि मेरी पत्नी सुबह से ही खौलने लगती है। इधर चाय का पानी गरम होता है, उधर मेरी पत्नी गरम होती है। बस साथ ही साथ गरम होती है। इधर मैं चाय पीता जाता हूं, उधर पत्नी की बकवास सुनता जाता हूं। और चाय पीकर जो भागता हूं घर से, सो फिर जितने दूर बन सकता है निकल जाता हूं; यही मेरे स्वास्थ्य का राज है, इसी की वजह से मैं स्वस्थ हूं।
जब सौ वर्ष का नसरुद्दीन हो गया, उससे पूछा पत्रकारों ने कि तुम सौ वर्ष के कैसे हुए?
उसने कहा, इसका राज है कि जब मेरा विवाह हुआ, मैंने और पत्नी ने यह तय कर लिया था कि अगर मुझे गुस्सा आ जाए तो मैं बाहर जाकर घूमने निकल जाऊं; अगर उसको गुस्सा आ जाए तो वह बाहर जाकर घूमने चली जाए। सो मेरा जीवन बाहर ही घूमने में बीता है। शुद्ध हवा! उसका परिणाम है! पत्नियां तो मैं सात दफना चुका, मगर हर पत्नी से मैंने यही वायदा पहले ही कर लिया। इससे मैं सुरक्षित हूं। पत्नियां आईं और गईं। अरे यह तो लगा ही है संसार में आवागमन, मगर मैं सुरक्षित हूं। खुली हवा, ताजी हवा, और घूमना-फिरना, और दिन भर घूमना-फिरना--जूते जरूर घिस गए, मगर मैं नहीं घिसा।
कुछ लोग खौलने के लिए ही बैठे हैं। उनके भीतर जल रही है आग। दमन किए बैठे हैं--कोई कामवासना का, कोई क्रोध का, कोई लोभ का। और न मालूम क्या-क्या दबाए बैठे हैं! जरा सा उनको मौका मिल जाए। उनके भीतर तो जैसे बारूद पड़ी है, जरा सी चिनगारी पड़ जाए! और यहां तो मैं चिनगारियां ही फेंक रहा हूं।
यहां इतने लोग शांत बैठे हैं, यह तुम्हें प्रौढ़ता का लक्षण नहीं मालूम पड़ता? और जिस देश में जितने ज्यादा प्रौढ़ लोग होंगे, उस देश से उतने ही ज्यादा लोग मेरे पास आएंगे। जिस देश में जितने ज्यादा दकियानूसी लोग होंगे, उतने ही कम लोग मेरे पास आएंगे। जहां जितना ज्यादा पुराणपंथ होगा, उतनी ही मेरी बात नहीं समझी जा सकेगी। जहां जितनी मुक्त चेतना होगी, समझ के खुले द्वार होंगे, जहां कपाट खुले होंगे मस्तिष्क के--हवा के लिए, सूरज के लिए, वर्षा के लिए, फूलों की गंध के लिए, चांदत्तारों के लिए--वहां मेरी बात समझी जा सकेगी।
यह देश पुराणपंथी देश है, दकियानूसी देश है। यहां मुझे गालियां पड़ रही हैं। दूर-दूर के देशों में प्रतिष्ठित विचारक, दार्शनिक, लेखक, कवि, चित्रकार, संगीतज्ञ प्रशंसा कर रहे हैं--जो मैं कह रहा हूं उसकी। उसके सम्मान में उदगार प्रकट कर रहे हैं। और यहां सिर्फ मुझे गालियां पड़ रही हैं! वे सिर्फ एक बात की सूचना देती हैं--यह देश अभी भी बीसवीं सदी में नहीं आया है!
इस देश में वे ही लोग मुझसे संयुक्त हो सकेंगे जो बीसवीं सदी में आ गए हैं। मुझसे जुड़ सकते हैं वही जिनकी बुद्धि में थोड़ा निखार है, और जिनमें थोड़ी प्रतिभा है, और जिनमें साहस है अपने सब कटघरों को तोड़ देने का, अपनी सारी जंजीरों को तोड़ देने का, अपने सारे कारागृहों को तोड़ कर बाहर निकल आने का।
मैं खुले आकाश का निमंत्रण हूं!

आज इतना ही।