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शुक्रवार, 19 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आट्ठवां-(प्रश्न-सार)

01—मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?
02—उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व देखने में लोग उत्सुक होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं?
03—मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी। कोई मार्ग बतावें।


पहला प्रश्न: भगवान!
मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?

कृष्ण चैतन्य!
कल्पना और सत्य में बड़ा भेद है। मीरा के लिए कृष्ण कल्पना नहीं हैं, कृष्ण बाहर भी नहीं हैं। मीरा के लिए कृष्ण उसके अंतर्तम में विराजमान हैं। वह जिस कृष्ण की बात कर रही है, कृष्ण की मूर्ति में तुम उस कृष्ण को नहीं पाओगे। उस कृष्ण का कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है। तुमने कल्पना की, वहीं चूक हो गई, वहीं भेद पड़ गया।
मीरा के लिए कृष्ण एक आंतरिक सत्य हैं और तुम्हारे लिए केवल कल्पना की बात। कल्पना से कैसे तुम तरंगित होते, कैसे नाच उठता, कैसे पुलक जगती? यूं समझो कि जैसे भोजन की कोई कल्पना करे, उससे कैसे पेट भरे? प्यास लगी हो और पानी की कोई कल्पना करे, उससे कैसे तृप्ति हो? पानी चाहिए।
लेकिन यह तुम्हारी ही भ्रांति नहीं थी, यह करोड़ों-करोड़ों लोगों की भ्रांति है। कल्पना सस्ती होती है, सत्य मंहगा--सत्य बहुत मंहगा--प्राणों से दाम चुकाने पड़ते हैं। कल्पना के लिए तो कुछ करना ही नहीं होता, जब चाहो तब कर लो, मन की मौज है।
मीरा ने सब गंवाया। कल्पना के लिए कोई कुछ भी नहीं गंवा सकता। लेकिन मीरा को पढ़ोगे, उसके शब्द तुम्हें प्रभावित कर सकते हैं। उन शब्दों में रस है। उन शब्दों में अनुगूंज है मीरा की वीणा की, मीरा की पायल की झंकार, लेकिन उन शब्दों से तुम सत्य तक न जा सकोगे। उन शब्दों को तुम प्रेरणा-स्रोत बना लोगे, तो सपनों में खो जाओगे।
ऐसे ही सपने में तुम खो गए थे। मीरा ने तुम्हें प्रभावित किया। और स्वभावतः, मीरा ने प्रभावित किया तो कृष्ण तुम्हारे इष्टदेव हो गए।
अब यह दूर कोयल की आवाज सुनते हो! ऐसी आवाज तुम भी कर सकते हो, कुहू-कुहू करने में कोई कठिनाई तो नहीं। मगर वह होगी नकल। तुम्हारे प्राणों में कुछ भी न होगा, बस कंठ में ही होगी बात, ऊपर-ऊपर होगी। जीवन नहीं होगा। सत्य नहीं होगा। यथार्थ नहीं होगा। तुम दोहरा दोगे। और यह भी हो सकता है कि तुम कोयल से भी बाजी मार लो, क्योंकि नकलची नकल का अभ्यास कर सकता है, गहन अभ्यास कर सकता है। लेकिन अंतिम परिणामों में तो तुम हारोगे, बुरी तरह हारोगे, क्योंकि तुम्हारे हाथ में कुछ भी न होगा।
कृष्ण की मूर्ति पर तुमने अपनी सारी कल्पनाओं का प्रक्षेपण कर दिया। कृष्ण की मूर्ति तो केवल एक सहारा बन गई, एक खूंटी बन गई, जिस पर तुम कल्पनाओं और भावनाओं को टांगते चले गए।
मेरे पास तुम आए तो कृष्ण भूल गए। इसलिए भूल गए कि जो तुम चाहते थे सदा से घटना, वह घटने लगा। अब क्यों कोई कल्पना करे! जब वस्तुतः जलधार मिल गई, तो क्यों कोई कल्पना और सपना देखे जल का! भूखे आदमी ही रात भोजन के सपने देखते हैं; जिनके पेट भरे हैं, वे नहीं। भिखमंगे ही सपने देखते हैं सम्राट होने के, सम्राट नहीं।
यहां तो वस्तुतः पुलक पैदा होने लगी। तुम्हारे भीतर की कोयल जाग उठी। अब तुम्हें यहां कोई काल्पनिक कृष्ण के सहारे नहीं जीना है। यहां वस्तुतः जिसे तुम खोजते थे उसकी मौजूदगी है, उस ऊर्जा में तुम जी रहे हो, वह ऊर्जा तुम पर बरस रही है। मैं तुम्हें कल्पना नहीं सिखाता, मैं तुम्हें ध्यान सिखाता हूं। और ध्यान सीखने का अर्थ ही होता है: कल्पनाओं से मुक्त हो जाना; मन से ही मुक्त हो जाना। फिर कैसी कल्पना, कैसी स्मृति, कैसा विचार! इसलिए सब गया--तुम्हारी कल्पना गई, तुम्हारी भावना गई, तुम्हारी पूजा गई, तुम्हारी अर्चना गई।
और स्वभावतः अब उस खूंटी को देख कर तुम्हें शर्म आती होगी कि इस खूंटी के सहारे तुमने कितना अपने को धोखा दिया! इसलिए आज कृष्ण की छवि को देखते भी तुम्हें संकोच होता है। आंखें मिलाते भी तुम्हें संकोच होता है।
उस संकोच में सिर्फ एक बात की घोषणा है कि तुम्हें अपनी ही नासमझी याद आती है। उस संकोच का कृष्ण से कोई संबंध नहीं है। वर्षों तक तुमने जो नासमझी की, कैसे कर सके इतनी नासमझी--यही याद आता है। यह याद आकर पीड़ा होती है, शर्म से सिर झुक जाता है। लेकिन कृष्ण पर कल्पना करने की जरूरत न रही; वास्तविक से तुम्हारा संबंध होना शुरू हो गया है।
इसलिए तुम कह रहे हो आज कि "मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा।'
यही तो तुम चाहते थे। जो तुम चाहते थे, वह हो गया है। अब क्यों तुम व्यर्थ के सहारे खोजोगे! कृष्ण तुम्हें मिल गए। तुम्हें मैंने नाम ही "कृष्ण चैतन्य' इसीलिए दिया था। यही देख कर दिया था कि कृष्ण से तुम्हारा गहरा लगाव है। लेकिन झूठे कृष्ण को तो छोड़ना पड़ेगा। वह तुम्हारी कल्पना थी। और तुम जब कल्पना छोड़ दोगे, तो सत्य का साक्षात हो सकता है। सच्चे कृष्ण में तो क्राइस्ट भी समाए हुए हैं, बुद्ध भी, महावीर भी, जीसस भी--जिन्होंने भी जाना है सत्य को, वे सभी समाए हुए हैं।
कृष्ण शब्द बड़ा प्यारा है। कृष्ण का अर्थ होता है: जो आकृष्ट कर ले, जो खींच ले। जादू, कृष्ण का अर्थ होता है। उस जादू में तुम आ गए। किसी ने तुम्हें खींच लिया। उस गुरुत्वाकर्षण में तुम हो अब। अब तस्वीरों का क्या करोगे? जब मालिक मिल जाए तो तस्वीरों का क्या करना है? सब तस्वीरें फीकी पड़ जाती हैं। सब तस्वीरें झूठी हो जाती हैं।
एक महिला ने प्रसिद्ध चित्रकार पिकासो से कहा, कल तुम्हारी एक तस्वीर, तुम्हारी एक फोटो एक घर में टंगी देखी। बड़ी प्यारी थी। किसी बड़े महत्वपूर्ण छविकार ने, फोटोग्राफर ने उतारी होगी। मुझे तो इतनी प्यारी लगी कि मैं उसे बिना चूमे न रह सकी।
पिकासो ने कहा, फिर क्या हुआ? तस्वीर ने तुम्हें चुंबन का उत्तर दिया या नहीं?
उस महिला ने बहुत चौंक कर पिकासो को देखा। उसने कहा, आप होश में हैं? तस्वीर कहीं चुंबन का उत्तर दे सकती है?
पिकासो ने कहा, तो फिर वह मैं नहीं था। मुझे चूमो, और तब तुम भेद पाओगी। वह सिर्फ कागज ही था, भ्रांति थी। अगर तस्वीर ने उत्तर न दिया, तेरी जैसी प्यारी स्त्री के चुंबन का कोई उत्तर न मिला, तस्वीर कुछ बोली भी न, धन्यवाद भी न दिया, तुझे गले से भी न लगाया, वह झूठी थी। वह मैं नहीं था, इतना मैं तुझसे कहता हूं।
पिकासो ठीक कह रहा है।
कृष्ण चैतन्य, तुम कृष्ण की तस्वीर से बंधे थे इतने दिन तक। यहां आकर तुमने कृष्ण के यथार्थ को पहचाना है, जाना है। अब क्यों तस्वीर तुम्हें बांधेगी? लेकिन प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
तुम पूछते हो: "यह क्या है भगवान? संकोच लगता है उस छवि के पास जाते, आंखें मिलाते भी, कि जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की!'
संकोच इसीलिए लगता है। यह सोच कर, यह विचार कर कि मैं भी कैसा पागल था! मैं क्या कर रहा था! मैं कैसे बचकानेपन में खोया था! मैं कैसी नासमझी कर रहा था!
लेकिन तुम सौभाग्यशाली हो, समय रहते जाग गए। बहुत हैं अभागे जो यूं ही मर जाएंगे, यूं ही तस्वीरों में अटके मर जाएंगे।
शास्त्रों में जो अटका है, वह तस्वीरों में अटका है। मूर्तियों में जो अटका है, वह झूठों में अटका है। सत्य के खोजी को जीवंत गुरु खोजना होता है, उसके सिवाय कोई उपाय न कभी था, न है, न होगा।
और जीवंत गुरु के साथ जुड़ना निश्चित ही साहस का काम है--दुस्साहस का काम है। क्योंकि जीवित गुरु के साथ जुड़ने का अर्थ है: अहंकार की मृत्यु। जो मरने को राजी है, वही शिष्य हो सकता है। जो अपने को बचाए, वह शिष्य नहीं हो सकता। मूर्ति में यही तो सुविधा है--तुम जब चाहो कृष्ण को लिटा दो, जब चाहो बिठा दो, जब चाहो भोग लगा दो, जब चाहो घंटी बजाओ, पूजा करो--जो तुम्हें करना हो करो--जब पट खोलने हों मंदिर के, खोल दो; जब बंद करने हों, बंद कर दो। कृष्ण न हुए, तुम्हारे खिलौने हैं।
जीवित सदगुरु के साथ तो तुम ऐसा न कर सकोगे। जीवित सदगुरु पर तो तुम्हारा कोई वश न चलेगा। जीवित सदगुरु के साथ तो मामला उलटा ही हो जाएगा--उसका वश तुम पर चलेगा, उसका जादू तुम पर चलेगा।
इसलिए तो लोग मुर्दों की पूजा करते हैं। जीसस मर जाते हैं, तब करोड़ों लोग ईसाई हो जाते हैं। जीसस जब जिंदा थे, तो सौ-पचास आदमी भी जीसस के साथ नहीं थे। जीसस को जिस दिन सूली लगी, उस दिन उनके शिष्य भी भाग गए थे। क्या खाक शिष्य रहे होंगे!
जिस रात जीसस पकड़े गए, जब दुश्मन उन्हें ले चले, तो उनका एक शिष्य पीछे हो लिया। जीसस ने यूं कहा जैसे हवा में बोल रहे हों, जैसे आकाश से बात कर रहे हों। कहा कि लौट जा! क्योंकि सुबह होने के पहले, इसके पहले कि मुर्गा बांग दे, तू तीन बार मुझे इनकार करेगा।
निश्चित ही शिष्य समझ गया। और लोग तो जरा हैरान हुए! लेकिन लोग तो समझते ही थे कि यह आदमी पागल है। यह क्या कह रहा है, किससे कह रहा है--मुर्गा बांग देगा उसके पहले तीन बार तू मुझे इनकार करेगा! लेकिन शिष्य समझ गया। उसने मन ही मन में कहा--इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि जोर से कहता "कभी नहीं,' क्योंकि तभी पकड़ लिया जाता--मन ही मन में कहा कि कभी नहीं। लेकिन जीसस ने कहा, मैं कहता हूं, तू तीन बार इनकार करेगा मुर्गे के बोलने के पहले।
और यही हुआ। थोड़ी ही देर बाद, जो दुश्मनों की भीड़ जीसस को पकड़ कर ले जा रही थी--रात थी, अंधेरी थी, मशालें जला रखी थीं--उन्होंने देखा कि एक अजनबी सा आदमी साथ में है, जो उनका परिचित नहीं है, जो उनका साथी तो निश्चित नहीं है। यह कौन है? उन्होंने पूछा उससे कि तुम कौन हो? क्या तुम जीसस के साथी हो?
उसने कहा कि नहीं। कौन जीसस? मैं तो पहचानता भी नहीं। मैं तो बाहर से आया हुआ एक यात्री हूं। मुझे भी शहर की तरफ जाना है, मशालों की रोशनी देख कर साथ हो लिया हूं।
जीसस हंसे और उन्होंने कहा, देखा, अभी मुर्गे ने बांग नहीं दी है। चौंका शिष्य कि एक दफे तो इनकार कर दिया, मगर अब नहीं करूंगा। जीसस ने कहा, तू देख तो। तू तीन बार इनकार करेगा।
और ऐसा हुआ बार-बार। फिर थोड़ी देर बाद किसी दूसरे ने पूछा कि तू है कौन? तेरा ढंग संदिग्ध मालूम पड़ता है। क्योंकि वह छिपा-छिपा सा, चोर-चोर सा मालूम हो रहा था। अपने को बचाने की कोशिश में लगा था। रोशनी में चेहरा न आ जाए, ऐसा-ऐसा चल रहा था, अंधेरे-अंधेरे में दब कर। तू है कौन?
उसने कहा, मैं एक अजनबी हूं। बाहर के गांव से आया हुआ हूं। इस गांव के रास्तों से परिचित नहीं हूं, इसलिए साथ हो लिया हूं।
उस आदमी ने पूछा, तू इस आदमी को पहचानता है जिसको हम पकड़ कर ले जा रहे हैं?
उसने कहा, कभी देखा नहीं।
जीसस ने कहा, देखा, अभी मुर्गे ने बांग नहीं दी और दो बार तू इनकार कर चुका!
उसने भीतर ही भीतर कसम खाई कि कसम खाता हूं अब, कसम तुम्हारी, कसम परमात्मा की, नहीं तीसरी बार इनकार करूंगा। मगर सुबह होने के पहले तीसरी बार भी इनकार करनी ही पड़ी। और बाकी तो भाग ही गए थे। यह एक गया भी था तो तीन बार इनकार कर दिया!
जब जीसस को सूली लगी और उन्होंने पानी मांगा।...क्योंकि यहूदियों का जो सूली देने का ढंग था वह बहुत बेहूदा था, बहुत ही आदिम था। आदमी को हाथों में, पैरों में खीले ठोंक कर तख्ते पर जड़ देते थे। आदमी इतनी आसानी से नहीं मरता, उसके गले में फांसी भी नहीं लगाते थे, तो किसी को छह घंटे लगते मरने में, किसी को बारह घंटे लगते, किसी को अठारह घंटे लगते, किसी को चौबीस घंटे, किसी को अड़तालीस घंटे। कभी-कभी तो यूं होता कि आदमी को मरने में तीन दिन लग जाते, क्योंकि खून धीरे-धीरे बहता, बहता--हाथ से, पैर से, बहते-बहते आदमी क्षीण होता और मरता।
जीसस को प्यास लगी और उन्होंने कहा, मुझे प्यास लगी है, कोई मुझे पानी पिला दो।
वह एक शिष्य मौजूद था। उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं हो सकी कि जीसस को पानी पिला दे। वह भीड़ में चुपचाप ही खड़ा रहा।
जिंदा गुरु के साथ होना खतरनाक मामला है--बहुत खतरनाक सौदा है।
और वे जो ग्यारह भाग गए थे और यह बारहवां साथ था, ये ही बारह जीसस के गणधर हुए। इन्हीं बारह को अवसर मिला ईसाइयत को पैदा करने का। अब तुम समझ लो कि ईसाइयत शुरू से ही झूठ हो गई।
आज करोड़ों लोग ईसाई हैं। आज ईसाई होना बड़ी सुविधा की बात है। इसमें कुछ अड़चन नहीं है। इसमें कुछ उपद्रव नहीं है। आज कितने लोग ईसा के सामने आंसू बहाते हैं बैठ कर--तस्वीर के सामने। आज कितने घरों में सूली पर लटके हुए ईसा की तस्वीर या मूर्ति है! कितने लोग चर्चों में जाते हैं! आज रविवार का दिन है, सारी दुनिया में चर्च ईसाइयों से भरे होंगे। प्रवचन दिए जा रहे होंगे, पादरी समझा रहे होंगे। लेकिन अब कुछ खतरा नहीं है। अब मजे से बात सुनो, चर्चा करो। अब इसमें कुछ लेना-देना नहीं है। अब कुछ अड़चन नहीं है।
लेकिन जीसस के साथ कितने लोग थे? बुद्ध के साथ कितने लोग थे? आज पूरा एशिया बौद्ध है, तब कितने लोग बुद्ध के साथ खड़े हुए? महावीर के साथ कितने लोग खड़े थे? नानक के साथ कितने लोग खड़े थे? कबीर के साथ कितने लोग खड़े थे?
कारण साफ है--जिंदा गुरु के साथ होने में तलवार की धार पर चलना है। कल्पना करने में क्या कठिनाई है! बैठो और जो कल्पना करना हो करो--कृष्ण की करो, बुद्ध की करो, क्राइस्ट की करो--तुम्हारी मौज है। और जैसी करना हो, जैसा रंग भरना हो कल्पना में वैसा रंग भरो।
कृष्ण चैतन्य, तुम सौभाग्यशाली हो कि कल्पना की तूलिका से ही रंग नहीं भरते रहे। तुम सौभाग्यशाली हो कि जिस बात की तुम्हें अपेक्षा थी, जिसे तुमने चाहा था, वह घट सकी; जो तुम्हारी अभीप्सा थी, वह पूरी हो सकी। तुमने हिम्मत की तो पूरी हो सकी। तुमने साहस किया तो पूरी हो सकी। तुम चल पड़े। और जो चल पड़ा उसकी मंजिल दूर नहीं है।
संकोच तुम्हें इसलिए नहीं लगता कि कृष्ण से तुम्हें कुछ एतराज है। कृष्ण से क्या एतराज होगा! कृष्ण का तो मैं दीवाना हूं। कृष्ण को जितना प्रेम मैं कर रहा हूं, संभवतः मीरा ने भी नहीं किया होगा। कृष्ण की जैसी प्रतिष्ठा मेरे भीतर है, शायद ही किसी के भीतर रही होगी।
यह तुम्हारे भीतर जो संकोच उठ रहा है, वह कृष्ण के प्रति नहीं है, वह अपनी ही नासमझी के प्रति है। लेकिन अब उस खूंटी को देख कर तुम्हें अड़चन होती होगी कि अरे, मैं इसी खूंटी से बंधा था! यही खूंटी सबूत है मेरे बंधनों का। मेरी अर्चना, मेरी पूजा--सब झूठी थी। इतने दिन मैं कैसे धोखा खाया, कैसे अपने को धोखा दिया--इससे तुम्हें संकोच पैदा होता है।
लेकिन सच यह है कि तुम पहली बार कृष्ण के करीब आने शुरू हुए हो। और पहली बार तुम्हारे भीतर भी मीरा जैसी पुलक पैदा हुई है। पहली बार तुम्हारे पैरों में भी नृत्य की क्षमता आई है, तुम्हारा हृदय भी गीत गा रहा है। तुम्हारे जीवन में धन्यता का क्षण आ गया है।


दूसरा प्रश्न: भगवान!
उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व नग्नता देखने में लोग उत्सुक होते हैं, और लोग उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं?

कृष्ण वेदांत!
इस देश का मन बहुत कुंठित मन है। और इस देश की कुंठा का जो मूल आधार है, वह है कामवासना का दमन। इस तरह दबाया है सदियों से कामवासना को कि वह अनेक विकृत रूपों में प्रकट होती है। ये विकृतियां हैं। वह जिन्हें तुमने देखा प्रदर्शन करते, वे भी विक्षिप्त लोग हैं।
अब यह क्या पागलपन है? इसका धर्म से क्या संबंध हो सकता है? परमात्मा ने मनुष्य को जननेंद्रिय जीप गाड़ियां खींचने के लिए नहीं दी है। यह कौन सी धार्मिकता है? अगर यह धार्मिकता है तो फिर मूढ़ता किसको कहोगे? यह तो निपट गंवारी है। यह तो निपट शोषण है।
लेकिन वे नागा साधु एक बात से भलीभांति परिचित हैं कि भारत का मन नग्नता में बहुत उत्सुक है। जितनी निंदा करता है, उतना ही उत्सुक है। वह निंदा भी उत्सुकता के ही कारण है। वह निंदा भी गहरे में उत्सुकता को दबाए बैठी है। सदियों से दबाई गई है बात, उभर-उभर कर आती है।
और एक नियम समझ लेना कि जो प्राकृतिक है, उसे अगर दबाओगे तो वह अप्राकृतिक होकर प्रकट होगा। कुछ भी प्राकृतिक दबाया कि अप्राकृतिक ढंग से प्रकट होना निश्चित है। उससे बचना असंभव है, जब तक कि तुम्हारी प्रकृति रूपांतरित न हो। और प्रकृति के रूपांतरण में दमन का कभी कोई सहयोग नहीं होता। बाधा पड़ती है दमन से रूपांतरण में। तुम जिसे दबा लेते हो उसका कभी रूपांतरण न कर सकोगे। भारतीय मन जितना कामवासना से पीड़ित है उतना पृथ्वी पर कोई दूसरी जाति का मन, देश का मन नहीं है। और कारण? कारण कि भारत का धर्म बड़ा पुराना है, और सदियों से हमें एक ही बात सिखाई जा रही है कि कामवासना पाप है।
क्यों आखिर कामवासना के विरोध में इतना प्रचार किया गया है?
एक सीधे से कारण से। मनुष्य को अगर अपराध के भाव से भरना हो, तो सबसे सुगम उपाय यह है--उसकी किसी ऐसी नैसर्गिक वृत्ति को पाप घोषित कर दो, जिसको वह लाख चाहे तो भी बदल न सके। स्वभावतः उसके भीतर अपराध-भाव की वृत्ति पैदा हो जाएगी। और जैसे ही व्यक्ति में अपराध-भाव पैदा हो जाता है, पंडित और पुरोहित को उसका शोषण करने का मौका मिल जाता है।
अपराध-भाव से भरा हुआ व्यक्ति डरा हुआ व्यक्ति हो जाता है, घबड़ाया हुआ व्यक्ति हो जाता है। फिर उसे नर्क से डराओ तो वह डरता है, क्योंकि वह जानता है मैं पापी हूं। जो पापी नहीं है, वह क्यों नर्क से डरेगा? जो पापी नहीं है, उसे नर्क की धारणा में ही कुछ अर्थ नहीं मालूम होता।
कोई नर्क कहीं भी नहीं है। वह सिर्फ तुम्हारी अपराध-भावना के कारण ही तुम्हारे मन में पुरोहित पैदा करने में सफल हो पाए हैं। और उन्होंने उसके ही दूसरे अंग की तरह स्वर्ग का प्रलोभन दिया है। लोभ और भय के बीच में आदमी को पीस डाला है।
और पुरोहित का धंधा आदमी के शोषण का धंधा है। और जिस आदमी का भी शोषण करना हो, पहले उसे कमजोर बनाना जरूरी है। अगर वह शक्तिशाली है, अगर वह अपने निज के पैरों पर खड़ा है, खुद की बुद्धि पर उसे भरोसा है, तो तुम उसका शोषण न कर सकोगे। न तुम उसे गुलाम बना सकोगे। वह अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करेगा। वह अपनी प्रतिभा से जीएगा। वह ये दो कौड़ी के पंडित और पुरोहितों के चरण छूने नहीं जाएगा। लेकिन एक बार उसको कंपा दो, डरा दो, घबड़ा दो; एक बार उसके भीतर भय की लहर दौड़ा दो और लोभ का बवंडर खड़ा कर दो, बस फिर ठीक। फिर वह किसी के भी हाथ में पड़ जाएगा। फिर कोई भी उसका शोषण कर सकता है। बुद्धिमान से बुद्धिमान आदमी भी बुद्धुओं के हाथ के नीचे पड़ गए हैं।
पश्चिम का बहुत बड़ा वैज्ञानिक नाइल्सबोर, नोबल प्राइज विजेता था, उससे एक अमरीकी गणितज्ञ मिलने आया था। वह देख कर हैरान हुआ कि नाइल्सबोर ने अपने बैठकखाने में अपनी टेबल के पीछे ही, घोड़े के पैर में जो लोहे का टुकड़ा हम ठोंक देते हैं, जिससे वह चलने में सीमेंट की रोड पर तकलीफ न पाए, तेजी से दौड़ सके--हॉर्स शू--उसको उसने उलटा लटका हुआ देखा।
पश्चिम में यह धारणा है कि हॉर्स-शू अगर उलटा लटका हुआ हो तो मंगलदायी है।
वह अमरीकी गणितज्ञ तो बड़ा हैरान हुआ कि नाइल्सबोर जैसा वैज्ञानिक इस तरह के अंधविश्वास में भरोसा करता होगा! उसने कहा, और बातें पीछे होंगी, पहले मैं यह पूछना चाहता हूं कि यह आपने अपनी कुर्सी के पीछे हॉर्स-शू को उलटा क्यों लटका रखा है? क्या आप भी अंधविश्वासी हैं? आप जैसा व्यक्ति! यह तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। क्या आप भी सोचते हैं कि इसको उलटा लटका रखने से मंगल होगा, शुभ होगा?
नाइल्सबोर हंसा और उसने कहा, कभी नहीं, मैं इस तरह के अंधविश्वासों में भरोसा करता ही नहीं। मेरी इसमें कोई श्रद्धा नहीं है।
तो फिर उसने कहा, फिर आप मुझे और हैरान करते हैं। फिर क्यों इसे लटका कर रखा हुआ है अपने कमरे में?
नाइल्सबोर ने कहा, लेकिन जिस पुरोहित ने मुझे यह दिया है, उसने कहा है कि श्रद्धा हो या न हो, विश्वास हो या न हो, मगर मंगल तो होता ही है। लटकाओ। मुझे श्रद्धा नहीं है। मगर उसने कहा--श्रद्धा हो या न हो, लाभ तो होगा ही। सो मैंने सोचा हर्ज क्या है लटकाने में! अपना बिगड़ता क्या है लटकाने में।
बड़े से बड़े वैज्ञानिक के भीतर भी वही मूढ़ता, वही भय--मंगल हो जाए, शुभ हो जाए! कुछ भी बेवकूफी करवाना आसान है आदमी से, मगर पहले उसे डराओ, घबड़ाओ। और सबसे आसान तरकीबें दो हैं और दोनों का धर्मों ने उपयोग किया है। एक तो है भोजन, क्योंकि आदमी बिना भोजन के जी नहीं सकता। इसलिए कुछ धर्मों ने भोजन पर हमला बोल दिया है--यह मत खाओ, वह मत खाओ। उन्होंने इतने नियम बना दिए हैं कि आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है।
और स्वभावतः आदमी स्वादिष्ट भोजन करना चाहेगा। करेगा तो अपराध-भाव पैदा होता है। नहीं करेगा तो तड़फेगा, परेशान होगा, हैरान होगा, मुश्किल में पड़ेगा। अगर नियम मान कर चले तो मुसीबत। अगर तुम ठीक-ठीक सारे नियम मान कर चलो तो जिंदा रहना मुश्किल। शायद ही कोई चीज बचती है जो तुम खा सको। क्या खाओगे?
सिर्फ पके हुए फल, जो अपने आप गिरते हैं वृक्ष से, वे खाए जा सकते हैं। वे भी तभी तक, जब तक बहुत मीठे न हो गए हों। क्योंकि जैसे ही बहुत मीठे हो जाते हैं, उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं। उनकी मिठास कीटाणु ले आती है। तो हिंसा हो जाएगी।
अब यह समझना। जब तक वे बहुत न पक जाएं, अपने से गिरेंगे नहीं। बहुत पक जाएंगे, उनमें कीटाणु पैदा हो जाएंगे। असल में पकने की जो प्रक्रिया है वह बैक्टीरिया से ही होती है, कीटाणुओं से ही होती है। वह जो मिठास है, वह भी बैक्टीरिया की ही प्रक्रिया है, वह भी कीटाणुओं के द्वारा ही पैदा होती है। तो जब फल पूरा पकेगा, वह कीटाणुओं से भर जाएगा, तभी वह अपने आप गिरेगा। अगर फल कच्चा है, तो उसमें कीटाणु अभी कम हैं, इसलिए पका नहीं है। जब तक कच्चा है, अगर तुम तोड़ते हो तो वृक्ष को चोट पहुंचती है। और वृक्ष में जीवन है। फल तोड़ कर खा सकते नहीं। फल तोड़ कर खाना भी पाप है।
दूध पीते हो, वह भी पाप है। तुम शायद चौंकोगे, क्योंकि भारत के धर्म ऐसा नहीं मानते। लेकिन क्वेकर हैं ईसाइयों में, वे दूध पीने को पाप मानते हैं। और उनकी बात में भी बल है। वे कहते हैं कि दूध जो है वह एक तरह से मां का रक्त ही है, खून ही है। आखिर अंडा जैसे शरीर से आता है वैसे ही खून भी शरीर से आता है। इसीलिए तो दूध पीने से तुम्हारा खून बढ़ जाता है, चेहरे पर सुर्खी आ जाती है। खून बढ़ाने के लिए दूध से बढ़िया और कोई चीज नहीं है।
तो दूध पीना मत।
एक क्वेकर मेरे घर में मेहमान थे। मैंने उनसे सुबह पूछा, आप चाय लेंगे, काफी लेंगे, दूध लेंगे--क्या लेंगे?
वे ऐसे चौंके जैसे मैंने उनसे कोई बहुत गहन अपराध करने के लिए निवेदन किया हो। उन्होंने कहा, क्या कहते हैं आप? मैं और काफी, चाय और दूध? कभी नहीं! क्या आप दूध पीते हैं?
मैंने कहा कि आप तो इतने गर्म हुए जा रहे हैं, मामला क्या है?
उन्होंने कहा, मामला यह है कि दूध पीना तो पाप है। कोई क्वेकर दूध नहीं पी सकता।
हालांकि सब क्वेकर दूध पीते हैं, मगर तब पाप का भाव पैदा होता है, तब अपराध का भाव पैदा होता है।
काफी पी नहीं सकते, चाय पी नहीं सकते, उसमें दूध डालना पड़ेगा। और अगर दूध न भी डालो तो भी चाय में निकोटिन है। निकोटिन की वजह से चाय पी नहीं सकते। निकोटिन यानी नशा। काफी, कोको में भी नशा है। वही निकोटिन जो सिगरेट में होता है।
क्या खाओगे? क्या पीओगे? कैसे जीओगे? जीना असंभव कर दिया उन्होंने। अगर उनकी तुम बात मान कर चलो तो सिवाय भूखे मरने के कोई उपाय नहीं है। और स्वभावतः, भूखे मरोगे तो दिन-रात भोजन की सोचोगे।
तुम पूछ सकते हो, जो लोग पर्युषण में--जैनियों से--कि दस दिन का व्रत-उपवास करते हैं, दस दिन क्या सोचते हैं? आत्मा-परमात्मा की याद आती है?
ऐसे कभी-कभी आ भी जाती हो आत्मा-परमात्मा की याद, मगर उन दस दिनों में कभी नहीं आती। उन दस दिनों में तो बस पकवानों की याद आती है। कहां का परमात्मा! एक से एक अदभुत चीजें दिखाई पड़ती हैं--रसगुल्ले तैरते हुए दिखाई मालूम होते हैं! पकौड़े उड़ रहे हैं, पंख लग गए हैं पकौड़ों को! रात क्या-क्या कल्पनाएं और सपने दिखाई पड़ते हैं!
और उससे भी पाप का भाव पैदा होता है, अपराध का भाव कि मैं कैसा पापी हूं! और वे मुनि महाराज हैं जो निरंतर गाली दे रहे हैं कि अपनी जीभ पर वश पाओ, काबू पाओ। तुम्हारी जीभ ही तुम्हें नर्क ले जाएगी। जिह्वा ही पाप का कारण है।
ध्यान रखना, एक तो भोजन का उपयोग किया है आदमी को पापी करार देने में और दूसरा कामवासना का। और दोनों ही संयुक्त हैं। जैसे बिना भोजन के व्यक्ति नहीं जी सकता, वैसे ही बिना कामवासना के समूह नहीं जी सकता। अगर तुम्हारे मां-बाप कामवासना से भरे न होते तो तुम होते नहीं दुनिया में। अगर महावीर के मां-बाप कामवासना से भरे न होते तो महावीर न होते दुनिया में। अगर बुद्ध के मां-बाप कामवासना से न भरे होते तो बुद्ध न होते दुनिया में।
तुम जरा सोचो तो कि ये दस-पांच लोग अगर ब्रह्मचारी होते तो यह जमीन की क्या गति होती! महावीर, बुद्ध, जीसस, कृष्ण, जरथुस्त्र, लाओत्सु, कबीर, नानक--इनके मां-बाप अगर ब्रह्मचारी होते तो क्या हालत होती जमीन की! यहां रेगिस्तान ही रेगिस्तान होता। यहां आदमियत नाम को न मिलती। वह तो भला हो इनके मां-बापों का कि उन्होंने बकवास नहीं सुनी पंडित-पुरोहितों की। उनको ब्रह्मचर्य का भूत सवार नहीं हुआ। मगर भीतर कहीं न कहीं पाप का दंश तो रहा होगा, कि हम यह क्या कर रहे हैं--पाप कर रहे हैं!
समाज जीता है कामवासना से। वह समाज का भोजन है। इसलिए कामवासना और भोजन दोनों जुड़े हैं। अगर तुम्हें भोजन न दिया जाए तो तुम्हारी कामवासना भी मर जाएगी। इक्कीस दिन के उपवास के बाद कामवासना क्षीण हो जाती है।
इसलिए जो लोग लंबा उपवास करते हैं, वे इस भ्रांति में पड़ जाते हैं कि उनकी कामवासना समाप्त हो गई। समाप्त वगैरह कुछ नहीं हुई, सिर्फ सूख गई। फिर से भोजन दो, फिर सजग हो जाएगी। कुछ बदला नहीं है।
जैन मुनियों को यह भ्रांति होती है कि कामवासना को उन्होंने विजय कर लिया है। क्योंकि भोजन इतना कम करते हैं कि वह उनकी जरूरतें ही न्यूनतम शरीर की पूरी नहीं कर पाता। कामवासना तो पैदा होती है जब तुम्हारे भीतर इतना भोजन जाए कि तुम्हारी जरूरतों से ज्यादा ऊर्जा पैदा हो--तब कामवासना पैदा होती है। कामवासना तो यूं समझो कि तुम्हारे जीवन का फूल है। जिस वृक्ष को ऊर्जा ही नहीं मिल रही, उसमें क्या खाक फूल लगेंगे! उसमें पत्ते ही नहीं लगते, फूल तो बहुत दूर। वह तो सूखा डंठल रह जाएगा।
सदियों तक मनुष्य को पापी करार दिया गया है। और पापी करार देने का परिणाम यह हुआ है कि प्रत्येक व्यक्ति बहुत गहरे में उन्हीं बातों में उत्सुक हो गया है, आतुर हो गया है, जिन बातों का निषेध किया गया है। निषेध का एक गुण होता है: इनकार करो--रस पैदा होता है। जिस बात का इनकार करो, उसी में रस पैदा हो जाता है।
इसलिए कृष्ण वेदांत, तुम कहते हो: "सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी।'
होगी ही। भारत है यह। दुनिया में कोई और देश होता, तो इन नागा साधुओं को पकड़ कर पागलखाने में रख दिया जाता। इनका इलाज किया जाता। इनको बिजली के शॉक दिए जाते। ये होश में नहीं हैं। ये क्या कर रहे हैं! ये विक्षिप्त हैं। मगर यहां ये महात्मा हैं! यहां पागल परमहंस समझे जाते हैं! यहां विक्षिप्त मुक्त समझे जाते हैं! और भीड़ तो वहां सबसे ज्यादा होगी, क्योंकि ऐसा मौका क्यों चूकना! नग्न आदमी को देखने की आकांक्षा तो बड़ी प्रबल है। और फिर इस तरह के बेहूदे प्रदर्शन...
तुम्हारा प्रश्न ठीक है कि इस तरह के बेहूदे प्रदर्शनों को देखने लिए भीड़ इकट्ठी होती है और इसका कोई विरोध नहीं है।
विरोध क्यों होगा? यह सदियों पुरानी परंपरा है। यह परंपरावादी देश है। यह रूढ़िवादी देश है। यहां कोई भी मूर्खता पुरानी होनी चाहिए, बस फिर ठीक है। जितनी पुरानी हो उतनी ज्यादा ठीक है।
तुम पूछ रहे हो कि आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं।
उनके नाराज होने का कारण ही यही है कि मैं रूढ़िवादी नहीं हूं, परंपरावादी नहीं हूं। मैं रूढ़ि-विरोधी हूं, परंपरा-विरोधी हूं। मैं अतीत-विरोधी हूं। मैं राष्ट्र-विरोधी हूं, जाति-विरोधी हूं, वर्ण-विरोधी हूं। मैं चाहता हूं कि तुम्हें सारी सीमाओं से मुक्त कर दूं, तुम पर कोई सीमा न रह जाए। तुम सिर्फ चैतन्य हो, इसका बोध पर्याप्त है। तुम साक्षी मात्र हो। तुम देह भी नहीं हो तो भारतीय कैसे हो सकते हो? हिंदू कैसे हो सकते हो? मुसलमान कैसे हो सकते हो? ये सब तो मन के खेल हैं, मन के जाल हैं।
तो मुझसे तो हिंदू भी नाराज होगा, मुसलमान भी नाराज होगा, ईसाई भी नाराज होगा। क्योंकि वे सभी परंपराओं में जी रहे हैं। उन सबका जीवन अतीत में है। और मैं चाहता हूं कि तुम अतीत से बिलकुल मुक्त हो जाओ, तो ही तुम्हारे जीवन में वर्तमान से संस्पर्श होगा। और वर्तमान ही परमात्मा है। और वर्तमान से जुड़ जाओ, तो परमात्मा का तुम्हें स्वाद मिले।
इस तरह की मूर्खतापूर्ण चीजें, जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, बड़ी-बड़ी चट्टानों को उठाना--यह सदियों से चलता रहा है। मंदिर इसके अड्डे रहे हैं। आखिर खजुराहो, कोणार्क, पुरी के मंदिरों में सब तरह के लैंगिक प्रदर्शन हैं। उनकी दीवालों पर सब तरह की अश्लील से अश्लील मूर्तियां खोदी गई हैं। यूं भारतीय फिल्म में भी चुंबन पर बाधा डालेंगे, आलिंगन पर बाधा डालेंगे। चुंबन भी लो तो छह इंच की दूरी होनी चाहिए। और यही भारतीय मंदिरों में जाएंगे और इनको कोई अड़चन नहीं होगी।
मंदिर में कोई भी मूर्खता चलती हो, चूंकि परंपरा उसके साथ है, इसलिए कोई अड़चन नहीं है, कोई बाधा नहीं है, कोई विरोध नहीं है। तुम भूल ही गए हो, तुम अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी ले जाते हो, क्योंकि साधु जो भी कर रहे हैं वह ठीक ही कर रहे हैं। यहां ठीक करने वाला साधु नहीं होता; यहां जो साधु है, वह जो करे वही ठीक है!
मैं साधु नहीं हूं। मैं किसी परंपरा का न ऋषि हूं, न मुनि हूं, न महात्मा हूं। मैं बगावती हूं। मेरा कौन साथ दे? मेरा विरोध बिलकुल स्वाभाविक है। मैं उसे अंगीकार करता हूं। मैं स्वागत भी करता हूं। चलो कुछ चहल-पहल तो है। चलो कुछ आंधी तो उठी। चलो सदियों से जड़ बुद्धि में कुछ हलचल तो मची, कुछ तरंगें तो उठीं, कुछ जीवन का तो बोध हुआ।
तुम जाते हो शंकर जी के मंदिर में, वहां शिवलिंग है। तुम्हें कभी संकोच नहीं लगता, शर्म नहीं लगती, अपने बच्चों को भी ले जाओगे, अपनी लड़कियों को भी ले जाओगे! हालांकि फिल्म देखने जाओगे तो पहले पता कर लोगे कि फिल्म वयस्कों के लिए है कि बच्चों के लिए भी है। फिल्मों में लिखा होता है: सिर्फ वयस्कों के लिए। तब तुम अपने बच्चों को नहीं ले जाते, क्योंकि फिल्म में कुछ दृश्य होंगे स्त्री-पुरुषों के प्रेम के और वे तुम अपने बच्चों को नहीं दिखाना चाहते।
लेकिन शंकर जी के मंदिर में क्या है? जिसको तुम शिवलिंग कहते हो, वह जननेंद्रिय का प्रतीक है। और सिर्फ पुरुष की जननेंद्रिय नहीं है वहां, उसी शिवलिंग के नीचे स्त्री की जननेंद्रिय भी है। पुरुष और स्त्री की जननेंद्रिय संभोग की अवस्था में हैं। मगर हम भूल ही गए हैं, क्योंकि परंपरागत है, स्वीकृत है, तो ठीक है।
जो भी परंपरागत है, वह ठीक है! फिर उसमें कोई एतराज नहीं उठा सकता। नहीं तो अभद्र है, बेहूदा है। चुंबन में क्या खराबी हो सकती है? जब शुद्ध जननेंद्रियों के प्रतीक मंदिरों में रखे जा सकते हैं, तो चुंबन में क्या खराबी हो सकती है! दो स्त्री-पुरुषों के आलिंगन में क्या विरोध हो सकता है!
और बच्चों से कब तक छिपाओगे? और छिपाने की जरूरत क्या है? जो सत्य है, सत्य है। बच्चे आज नहीं कल जानेंगे। तुमसे नहीं जानेंगे तो गलत रास्तों से जानेंगे, गलत स्रोतों से जानेंगे। और बेहतर यह है कि ठीक स्रोतों से जानें।
मैं इस पक्ष में हूं कि फिल्मों में, जो-जो सत्य है, वैसा ही सत्य होना चाहिए, ताकि बच्चे सत्य से पहले से ही परिचित हों। नहीं तो एक दिन अड़चन खड़ी होती है--भारी अड़चन खड़ी होती है। बहुत दिनों तक हम बच्चों को अंधकार में रखते हैं, फिर एक दिन उनका विवाह कर देते हैं! फिर विवाहित युवक और युवती दोनों अपने को अपराधी अनुभव करते हैं। क्योंकि अब तक इस युवती को कहा गया था कि किसी पुरुष को छूना भी पाप है। अगर बीस वर्ष तक किसी युवती को कहा गया है कि किसी पुरुष को छूना भी पाप है, तो आज अचानक इस पुरुष के साथ सो जाना कैसे पुण्य हो सकता है! सो जाए भला, लेकिन प्राण सकुचाएंगे। भीतर पाप का बोध होगा।
इसलिए मेरे अनुभव में...हजारों स्त्रियों ने मुझे कहा है कि हमारे पति हमें पाप में घसीटते हैं। पाप में घसीटते हैं, प्रेम में नहीं! उसका नाम है पाप।
और उनका भी कोई कसूर नहीं है; उनको यही सिखाया गया था। बीस साल का संस्कार ऐसे छूट नहीं जा सकता। उनके प्राण पूरे के पूरे विषाक्त हो गए हैं। और फिर ऐसी स्त्रियां कैसे पति को पूरा का पूरा प्रेम दे सकती हैं? असंभव। वे मुर्दे की तरह पड़ी रहती हैं। फिर यह पति को इनसे कुछ रस नहीं मिलता। फिर यह दूसरी स्त्रियों में उत्सुक होता है। तबर् ईष्या जगती है, वैमनस्य जगता है, क्रोध जगता है। और यही पुरुष फिर वेश्याओं को जन्म देता है। क्योंकि इसकी पत्नी तो बिलकुल मुर्दे की तरह पड़ी रहती है, बिलकुल ठंडी--उसमें जैसे कोई गर्मी नहीं, कोई जीवन नहीं। अगर वह गर्मी और जीवन बताए, तो यह भी एतराज उठाएगा कि यह अच्छा लक्षण नहीं है। अच्छी स्त्रियां रस नहीं लेतीं इन बातों में। ये तो बुरी स्त्रियां इन बातों में रस लेती हैं।
यह बड़ी अजीब हालत हो गई। बुरी स्त्रियां रस लेती हैं बुरी बातों में, मगर वे ही जीवंत मालूम होती हैं। और अच्छी स्त्रियां तो इस तरह की बातों में रस लेती नहीं!
एक पुलिसवाले ने, एक स्त्री डूब गई सागर में, उसको खींच कर निकाला। सांझ हो रही थी, उसे तट पर लिटाया, बहुत कोशिश की उसे जिलाने की, मगर वह मर ही चुकी थी, तो बेचारा उसे वहीं छोड़ कर भागा पुलिस स्टेशन खबर करने। जब लौट कर आया तो देखा कि एक आदमी उससे संभोग कर रहा है। उसने उस आदमी को हिलाया और कहा, अरे मूरख, उठ, यह स्त्री मुर्दा है! उसने कहा, मुझे क्या मालूम, मैं समझा कि भारतीय है।
भारतीय स्त्री को बिलकुल मुर्दा-भाव से पड़े रहना चाहिए, हिलना-डुलना भी नहीं चाहिए! हिली-डुली तो भी उसका मतलब हुआ कि वह कुछ रस ले रही है।
उसको तो बिलकुल आंख बंद करके पड़े रहना चाहिए, आंख भी नहीं खोलनी चाहिए। आंख खोली, मतलब यह कि वह रस ले रही है। आंख खोलना, मतलब खतरनाक है। प्रकाश भी बुझा देना चाहिए। तो रात के अंधेरे में, चुपचाप, बिना बोले...महाचोरी का कार्य हो रहा है!
और इसी महाचोरी से फिर बच्चे पैदा होंगे। वे बच्चे भी कैसे होंगे! उन बच्चों में भी क्या सौंदर्य होगा! उन बच्चों के पास भी क्या आत्मा होगी!
मगर तुम शास्त्रों में एतराज नहीं उठाओगे। तुम्हारे पुराण बेहूदी कहानियों से भरे हैं। तुम्हारे मंदिर बेहूदे चित्रों से भरे हैं। ऐसी बेहूदी कहानियां कि तुम सोच कर भी चकित होओ, मगर शास्त्रों में हैं, तो सुंदर हैं। और मैं चूंकि उनका विरोध करता हूं, इसलिए स्वभावतः कौन मेरे पक्ष में खड़ा होगा!
एक मित्र ने मुझे यह किसी पुराण से कहानी भेजी है। मुझे पता नहीं किस पुराण में है। जरूर होगी किसी पुराण में।
एक बार पार्वती शिव से रूठ कर अपने मायके चली गईं और बहुत दिनों तक वापस नहीं लौटीं। शिवजी महाराज भी परेशान हो गए। उन्होंने नंदी से कहा, यार नंदी, मेरी प्रेम करने की बड़ी इच्छा हो रही है और पार्वती भी हैं कि अभी तक लौटी नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि भैया मैं तुझसे प्यार कर लूं? इस पर नंदी ने कहा, शिवजी महाराज, यह भी कोई बात है! क्या मैं आपके प्यार के लायक हूं?
बहुत मनाने पर नंदी इस बात पर मान गया कि बाद में मैं भी फिर आपसे प्यार करूंगा। शिवजी ने नंदी बाबा से जी भर कर प्यार किया और जब नंदी बाबा की बारी प्यार करने की आई तो उठाया अपना डंड-कमंडल और भागे। और बोले, अरे मूरख, तू बैल होकर और मुझसे प्यार करेगा? उल्लू के पट्ठे, अपनी स्थिति समझ!
इस पर नंदी बाबा को भी बहुत गुस्सा आया और वे भी पीछे-पीछे भागे। पर शिवजी एक मंदिर में घुस गए और अंदर बैठ गए--नंगे ही। इसलिए शिव की प्रतिमा नग्न है। वह जो शिवलिंग है, वह नग्न प्रतिमा का प्रतीक है। इस पर नंदी मंदिर के सामने बैठ गया और बोला, शिवजी महाराज, आप जब बाहर निकलोगे तब आपसे प्यार करूंगा, छोडूंगा नहीं। और तब से नंदी महाराज वहीं बैठे हुए हैं। वे कहते हैं, कभी तो निकलोगे न!
मगर यह तो कुछ भी नहीं, शास्त्रों में ऐसी कहानियां हैं कि तुम चकित होओगे। मैंने पढ़ा है, एक पुराण कहता है कि ब्रह्मा और विष्णु किसी गहन समस्या में विवादग्रस्त हो गए, हल न होता था, तो शिवजी के पास गए। लेकिन जब वे पहुंचे तो जैसा कि द्वारपालों की अक्सर अवस्था होती है, जैसे संत महाराज हमारे द्वारपाल हैं, नंदी बाबा समझो, अक्सर सोए हुए मिलेंगे। गणेश जी द्वारपाल थे। अब गणेश जी, ज्यादा खा-पी गए होंगे, तोंद पर हाथ फेरते-फेरते सो गए होंगे। सूंड़ थोड़ी देर हिलाते रहे होंगे, फिर झपकी आ गई होगी। तो वे झपकी मार रहे थे।
ब्रह्मा और विष्णु ने भी सोचा कि क्यों बेचारों को जगाना, सोने दो। वे दोनों चुपचाप अंदर चले गए। शिवजी पार्वती से प्रेम करने में संलग्न थे। दोनों सज्जन शुद्ध भारतीय रहे--हटे ही नहीं। नागा बाबाओं का प्रदर्शन हो रहा था, वे हटते भी तो कैसे हटते! कोई और होता, कोई अंग्रेज होता, तो फौरन क्षमा मांग कर बाहर हो जाता कि माफ करना। लेकिन वे तो जमे रहे। देखते ही रहे।
और शिवजी को तो तुम जानते ही हो, ज्यादा भांग चढ़ा गए होंगे, उनको होश ही नहीं था कि कौन आया, कौन गया, क्या हो रहा है! उनकी प्रेम-क्रीड़ा चलती ही रही--छह घंटे! और ये दोनों सज्जन भी गजब के थे--खड़े ही रहे। अरे जब लिंग में बांध कर जीप खींची जा रही हो, तो ब्रह्मा-विष्णु जाएं तो जाएं कहां। वहीं रुके रहे। मगर अपमानजनक भी अनुभव किया कि हम खड़े हैं, और इन लोगों को यह भी लापरवाही है कि इसकी भी फिक्र नहीं कर रहे हैं। यह तो फिक्र नहीं की कि हमको हट जाना चाहिए। वह भारतीय ढंग नहीं है। यह फिक्र की कि यह किस तरह का व्यवहार है? दर्ुव्यवहार है! कि हम खड़े हैं, छह घंटे हो गए, और शिवजी को अंदाज ही नहीं है और ये अपने कार्य में संलग्न हैं।
जब शिवजी को होश आया थोड़ा, देखा कि कोई दो सज्जन खड़े हैं, उठे। मगर वे बहुत क्रुद्ध हो गए थे कि हमसे बैठने को नहीं कहा, छह घंटे से हम खड़े हैं!
देखते हो मजा! एक तो खड़े ही नहीं होना ऐसी जगह...।
लेकिन भारत में प्राइवेसी को तो कोई अंगीकार करता ही नहीं, मानता ही नहीं। वह तो हमारा लक्षण नहीं है। वह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है।
मैं उदयपुर में सोया था एक दोपहर। मुझे कुछ ऊपर खपड़ों पर खड़र-बड़र की आवाज आई। तो मैंने ऊपर आंख खोल कर देखा--एक आदमी खपड़ा उघाड़ कर ऊपर से नीचे झांक रहा है। और कोई गैर पढ़ा-लिखा आदमी नहीं, हाईकोर्ट का वकील! मैंने पूछा कि भैया क्या कर रहे हो? कोई वर्षा वगैरह आ रही है, खपड़े ठीक कर रहे हो?
उसने कहा कि जी नहीं, बस आपके दर्शन को चला आया।
मैंने कहा, और भी आएंगे इस तरह दर्शन को लोग कि तुम्हीं आए हो? यह कोई वक्त है दर्शन का कि मैं सोया हूं दोपहर...!
नहीं, उन्होंने कहा कि सतपुरुष को उसकी सभी अवस्थाओं में देखना चाहिए। आप कैसे सोते हैं--यह देखने में मैं उत्सुक था।
तो मैंने कहा, देखो। मैं अपना सो गया। मगर वे भी ब्रह्मा-विष्णु-महेश से कुछ पीछे नहीं थे। जब दो घंटे बाद मैं उठा, वे बैठे थे अपने छप्पर पर। मैंने कहा, भैया, अब उतर भी आओ, गिर-गिरा पड़ो, कुछ हो जाए।
ब्रह्मा-विष्णु हटे तो नहीं, मगर नाराज हुए कि हमारे साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं हुआ है। हम अभिशाप देते हैं कि तुम्हारी सदा लैंगिक प्रतीकों की तरह पूजा की जाएगी।
इसीलिए मंदिरों में शंकर की पूरी प्रतिमा नहीं होती, सिर्फ लैंगिक प्रतीक होता है। वह उस अभिशाप की वजह से। यह शिवलिंग के पीछे जो कथा है, वह यह है।
इन शास्त्रों को मैं कचरा कहता हूं। ये जला देने योग्य हैं। इनसे हमारा छुटकारा हो जाए तो अच्छा।
वेदांत तुम पूछते हो कि लोग आप पर और आपके आश्रम पर नाराज क्यों हैं?
इसलिए नाराज हैं। धर्म का मैं इन सारी बातों से कोई संबंध नहीं देखता। धर्म का संबंध तो सिर्फ एक चीज से है--वह ध्यान है। और धर्म की एक ही खोज है, एक ही अन्वेषण है--वह समाधि है। ध्यान समाधि तक कैसे पहुंचे, इसका विज्ञान धर्म है। शेष सब बकवास है। शेष सबसे छुटकारा हो जाना चाहिए।
मगर उस शेष सबके जंगल में ही असली चीज खो गई है। मैं तो उतने भर को बचा लेना चाहता हूं, जितना मूल्यवान है--वस्तुतः मूल्यवान है, और बाकी कूड़ा-करकट को बिलकुल आग लगा देना चाहता हूं। इसलिए लोग मुझसे नाराज हैं। उनका नाराज होना स्वाभाविक है।
मैं तुम्हारे भोजन पर जबरदस्ती नहीं करना चाहता। हां, मैं जरूर चाहता हूं कि तुम्हारे जीवन में सौंदर्य का एक बोध हो। स्वाद का भी एक बोध हो। क्योंकि परमात्मा ने तुम्हें जो भी इंद्रियां दी हैं, प्रत्येक इंद्रिय को निखार देना चाहिए। मैं चाहूंगा कि तुम्हारी आंखें सुंदरतम को देखें। तुम्हारे कान, जो मधुरतम है, उसे सुनें। तुम्हारे स्वाद की क्षमता, जो अत्यंत स्वादिष्ट है, उससे परिचित हो। तुम्हारा जीवन संवेदनशील हो।
मैं संवेदना-विरोधी नहीं हूं, क्योंकि संवेदना-विरोधी जो हुआ उसका तो जीवन धीरे-धीरे जड़ हो जाता है। वह जीवित रह नहीं जाता, मुर्दा हो जाता है।
मुर्दा और जिंदा आदमी में फर्क क्या है? यही तो फर्क है कि मुर्दे की कोई संवेदना नहीं होती। उसके पास से सुंदर स्त्री गुजर जाए, तो भी वह जरा आंख उठा कर नहीं देखेगा।
चंदूलाल मारवाड़ी मरे। सब तो रो रहे हैं, मगर उनकी पत्नी नहीं रो रही है। लोग समझे कि सदमे में नहीं रो रही है। पति के मरने का सदमा भारी है। और तभी एक भिखारी आया, और जोर-जोर से अपने डब्बे में पैसे पड़े थे उनको बजा-बजा कर चंदूलाल के पास खड़ा हो गया, और कहने लगा, मिल जाए सेठ जी कुछ! अंधा भिखारी। जब चंदूलाल कुछ नहीं बोले, तो एकदम पत्नी दहाड़ मार कर रोने लगी। लोगों ने पूछा, अभी तक तू चुप थी, एकदम से तुझे क्या हो गया?
उसने कहा, जब वे भिखारी को देख कर भी नहीं उठे और भागे नहीं, तो मैं समझ गई कि मर गए। अब तक मुझे पक्का भरोसा नहीं था। डाक्टर भूल कर सकते हैं, हो सकता है बेहोश ही हों। कई दफे ऐसा हो गया है। पहले भी ऐसा हो चुका है दो दफे। चंदूलाल मरे, मगर मरे नहीं थे, सिर्फ डाक्टरों की गलती थी। तो मैं सोच रही थी कि पता नहीं फिर गलती न हो। लेकिन जब भिखारी ने अपना डब्बा भी बजाया और वे कुछ नहीं बोले, और भागे नहीं, और उन्होंने उठ कर कहा नहीं कि हट, आगे बढ़! मैं पक्का मानती हूं कि अब वे मर चुके। यह सबूत है उनकी मृत्यु का।
मुर्दा आदमी और जिंदा आदमी में फर्क क्या है?
मैं धर्म को जीवन की कला कहता हूं। इसलिए मैं नहीं चाहूंगा कि तुम सूरदास की तरह अपनी आंखें फोड़ लो। मैं चाहूंगा कि तुम्हारी आंखें उज्ज्वल हों। मैं चाहूंगा कि तुम्हारी आंखें दूर-दृष्टि से भरी हों। मैं चाहूंगा कि तुम्हारी आंखें सौंदर्य की परख को सीखें। स्थूल से मुक्त हों, सूक्ष्म को पहचानें।
एक भारतीय पेरिस गया हुआ था। तो वह लुव्र म्यूजियम को देखने गया, जो कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध म्यूजियम है, जहां श्रेष्ठतम कलाकृतियां संगृहीत की जाती हैं। वह एक चित्र के पास खड़ा हो गया और एकदम उसके मुंह में लार टपकने लगी।
संयोग की बात थी कि चित्र का बनाने वाला चित्रकार भी पास से गुजर रहा था। उसने इस आदमी को इतनी देर तक खड़े देखा तो सोचा कि है कोई पारखी, दूर देश से आया है। तो वह भी उत्सुक हो गया। उसने पूछा कि आपको चित्र बहुत पसंद पड़ा?
उसने कहा कि बहुत पसंद पड़ा। एकदम मेरे मुंह में लार आ गई।
चित्रकार भी थोड़ा हैरान हुआ कि मुंह में लार आ गई! क्या बात कर रहे हो?
उसने कहा कि जिसने भी बनाई हैं, क्या जलेबियां बनाई हैं!
उस चित्रकार ने कहा, धत तेरे की! ये जलेबियां नहीं हैं, ये जीवन की जो उलझी समस्याएं हैं, उनका प्रतीकात्मक चित्र है। यह सिंबालिक आर्ट है। अरे मूरख, तू इनको जलेबियां कह रहा है!
उसने कहा, भई, बिलकुल जलेबियां मालूम पड़ती हैं।
एक तो स्थूल--कि तुम्हें सुंदरतम चित्र भी दिखाया जाए, तो तुम्हें वही दिखाई पड़े, जो दिखाई पड़ सकता है। और एक--तुम्हारी इंद्रियां सूक्ष्मतर होने लगें।
सदियों से धर्म ने तुम्हें समझाया है: अपनी इंद्रियों को जड़ करो। इसलिए कांटों पर कोई लेट जाए तो उसको हम सम्मान देते हैं। मैं नहीं दूंगा। कांटों पर लेटने का एक ही अर्थ हुआ कि उसकी जो स्पर्श की क्षमता थी, जड़ हो गई। उसने अपने शरीर को मार डाला। उसकी पीठ मुर्दा हो गई, असंवेदनशील हो गई। उतना वह मर गया। मैं उसको सम्मान नहीं दूंगा। मेरे मन में उसके लिए कोई सम्मान नहीं है। वह कोई महात्मा नहीं है, सिर्फ मूढ़ है।
जो आदमी अपनी आंख फोड़ ले, इस कारण कि आंखों के कारण वासना जगती है, वह निपट गंवार है। क्योंकि आंखों के कारण वासना नहीं जगती। आंखों से वासना का क्या लेना-देना? वासना तो मन की चीज है। अंधे के भीतर भी वासना होती है। सच पूछो तो आंख वाले से ज्यादा होती है--कुंठित होती है, दबी होती है, भीतर ही भीतर भनभनाती है; बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं होता। नहीं तो अंधे तो धन्यभागी हैं फिर। वे जन्म से ही सूरदास। इसलिए तो हम अंधों को सूरदास कहते हैं। धन्य है उनका भाग्य।
परमात्मा ने बड़ी गलती की जो तुम्हें आंखें दीं। तुम्हें पीठ देनी थी कछुए जैसी कि तुम सब कांटों की सेज पर महात्मा बन कर लेटते। और आंखें तुम्हें देनी नहीं थीं, ताकि तुम जन्म से ही सूरदास होते। कान भी तुम्हें नहीं देने थे, क्योंकि पता नहीं कोई मधुर स्वर कान में पड़ जाए। तुम्हें बहरा बनाना था। असल में तुम्हें पैदा ही नहीं करना था। तुम्हारा पैदा होना ही गलती हो गई है।
हमारी धारणा ऐसी मालूम पड़ती है कि सबसे सौभाग्यशाली वे हैं जो पैदा ही नहीं हुए। नंबर दो के सौभाग्यशाली वे हैं जो पैदा होते ही से मर गए। और नंबर तीन के सौभाग्यशाली वे हैं जो जिंदा तो हैं मगर नाममात्र को जिंदा हैं। उनके हम महात्मा कहते हैं।
मेरी दृष्टि बिलकुल भिन्न है। इसलिए मेरी आलोचना होगी। लोग मुझ पर नाराज होंगे। मैं उनकी पूरी धार्मिक धारणा के खंडन के लिए खड़ा हूं। मैं कह रहा हूं कि उनकी पूरी धार्मिक धारणा गलत रही है। वे जीवन के पक्षपाती नहीं रहे, मृत्यु के पूजक रहे हैं। उन्होंने लाशें पूजी हैं, उन्होंने जीवन को सम्मान नहीं दिया। और मेरे लिए जीवन परमात्मा है। जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है--न कहीं कोई ब्रह्मा हैं, न कोई विष्णु, न कोई महेश। जीवन परमात्मा है। और जीवन पक्षियों में गीत गा रहा है, वृक्षों में फूल बन कर खिला है, आदमियों में प्रेम बन कर जगा है, आंखों में ज्योति है, कानों में संगीत है, हृदय की धड़कन है। जीवन क्या नहीं है! जीवन समग्रता का नाम है।
मैं चाहता हूं कि तुम्हारा जीवन संवेदनशील हो, गहन संवेदना से भरा हो। और इसी सारी संवेदना के बीच में ध्यान की संवेदना पैदा होती है। ध्यान परम संवेदना का नाम है। जब तुम्हारी सारी इंद्रियां अपनी समग्रता में, अपनी परिपूर्णता में सक्रिय होती हैं, जागरूक होती हैं, तो उन्हीं सबके बीच में एक नया फूल खिलता है, जिसका तुम्हें अब तक कोई भी पता नहीं था। मगर उसी भूमिका में वह फूल खिलता है--वह है ध्यान।
ध्यान का अर्थ है: जीवन के गहनतम की संवेदना। जीवन में जो रहस्यपूर्ण है, उसकी संवेदना। जो आंखों से नहीं दिखाई पड़ता, वह भी दिखाई पड़ने लगे--तो ध्यान। जो कान से नहीं सुनाई पड़ता, वह भी सुनाई पड़ने लगे--तो ध्यान। जो हाथ से नहीं छुआ जा सकता, उसका भी स्पर्श होने लगे--तो ध्यान। ध्यान तुम्हारी सारी संवेदनाओं का सार-निचोड़ है।
इसलिए मैं तुम्हें किसी भी चीज से वंचित नहीं करना चाहता। हां, प्रत्येक चीज को निखार देना चाहता हूं, धार देना चाहता हूं। मैं तुम्हारी प्रतिभा की तलवार पर धार रखना चाहता हूं। मैं तुम्हारे भीतर जो बुद्धिमत्ता है, उसको अंधविश्वासों में दबा कर मार नहीं डालना चाहता।
मैं तुम्हें कोई अंधविश्वास नहीं देता। मैं कहता हूं, न मानना स्वर्ग में, न मानना नर्क में। क्योंकि न कोई नर्क है कहीं, न कोई स्वर्ग है कहीं। नर्क है तुम्हारा मूर्खतापूर्वक जीना; उससे तुम जो दुख पैदा कर लेते हो, वह नर्क है। स्वर्ग है तुम्हारा बोधपूर्वक जीना; उससे तुम जो आनंद पैदा कर लेते हो, वह स्वर्ग है। स्वर्ग और नर्क तुम्हारी अंतर-दशाएं हैं।
और परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसने जगत का निर्माण किया है। परमात्मा जीवन है। निर्माण करने वाला नहीं--जो है, जो सदा से है, कभी निर्मित नहीं हुआ और कभी विनष्ट भी नहीं होगा; जो शाश्वत है; रूप बदलते हैं जिसके, सागर में जैसे लहरें बदलती हैं।
और उस परमात्मा को जानने का जो उपाय है, वह है तुम्हारी संवेदनशीलता का गहन होता जाना--गहन से गहन होता जाना, सूक्ष्म से सूक्ष्म होता जाना।
इसलिए कृष्ण वेदांत, लोग मेरा विरोध करेंगे, मुझ पर नाराज होंगे। उनका कोई कसूर भी नहीं है। जब सदियों पुरानी धारणाओं पर चोट की जाती है, तो बेचैनी होती है, तिलमिलाहट होती है। यह स्वाभाविक है। मगर यह करना ही होगा, अन्यथा मनुष्य के लिए फिर कोई आशा नहीं है। तथाकथित धर्मों ने मनुष्य को मार डाला है।
मैं दमन-विरोधी हूं, रूपांतरण का पक्षपाती हूं। तुम जिसको दबाओगे, उसे दबाते ही रहना पड़ेगा बार-बार। और कितना ही दबाओ, वह उभर-उभर कर वापस आएगा। जो भी तुम्हें दिया है जीवन ने, उसमें कुछ भी पाप नहीं है और कुछ भी गलत नहीं है। जो भी तुम्हें दिया है जीवन ने, वह परम धन है--लेकिन ऐसा है जैसे अनगढ़ हीरे। उन पर चमक रखनी होगी, उनको पहलू देना होगा, उनको साफ करना होगा, तब वे कोहिनूर बनेंगे।
यह तो तुम्हें पता होगा कि कोहिनूर जब मिला, जिस व्यक्ति को मिला, उसके बच्चे उससे खेलते रहे तीन साल तक, यही समझ कर कि कोई चमकदार पत्थर है। वह तो संयोग की बात थी कि एक संन्यासी मेहमान हुआ, जो कि संन्यास लेने के पहले जौहरी रह चुका था। उसने बच्चों को उस पत्थर से खेलते देखा। उसने बच्चों के पिता को कहा कि तुम पागल तो नहीं हो! मैं जौहरी हूं--था, इससे बड़ा हीरा मैंने अपने जीवन में न देखा, न सुना। यह क्या कर रहे हो?
उन्होंने कहा, यह तो तीन साल से हमारे घर में है। मैं खेत पर था, वहां मुझे मिला। मेरे खेत में से एक छोटा सा झरना निकलता है, उसकी रेत में मुझे पड़ा मिल गया, मैंने सोचा बच्चे खेलेंगे। तो यह तो पड़ा रहता है यहीं आंगन में, बच्चे खेलते रहते हैं। कोई उठा भी ले जाता तीन साल में, मुझे क्या पता कि हीरा है।
तब उसे जौहरी के पास ले जाया गया।
आज कोहिनूर दुनिया का सबसे बड़ा हीरा है। करोड़ों उसकी कीमत है। उससे बड़ा कीमती कोई हीरा नहीं है। इंग्लैंड की महारानी के मुकुट में वह जड़ा है। जब मिला था तो उसका तीन गुना वजन था, अब सिर्फ एक तिहाई वजन है, लेकिन कीमत उसकी करोड़ों गुना ज्यादा है। क्या हुआ? दो तिहाई वजन कहां गया? दो तिहाई वजन छांटना पड़ा, काटना पड़ा। वह कट गया तो यह सौंदर्य प्रकट हुआ। वह छंट गया तो यह सौंदर्य प्रकट हुआ।
तुम्हारे भीतर जो भी है, अनगढ़ पत्थर है अभी। बहुत कुछ छांटना होगा, बहुत कुछ काटना होगा, धार रखनी होगी, चमकाना होगा। लेकिन हीरे हैं। सब हीरे हैं।
कामवासना ही तुम्हारे भीतर ब्रह्मचर्य बनती है। कामवासना ऐसा समझो कि जैसे सिर के बल खड़ा हुआ आदमी, और ब्रह्मचर्य ऐसा समझो कि पैर के बल खड़ा आदमी। बस इससे ज्यादा फर्क नहीं है। तुम्हारे भीतर जो क्रोध है, यही करुणा बनती है। जिसके भीतर क्रोध नहीं है, उसके भीतर करुणा पैदा नहीं हो सकती। और तुम्हारे भीतर जो आसक्ति है, वही प्रेम में रूपांतरित होती है।
मैं रूपांतरण का पक्षपाती हूं। मैं रूपांतरण की कीमिया को ही धर्म कहता हूं। और तुम्हें सिखाया गया है दमन। और दमन से कभी रूपांतरण नहीं होता।
इसलिए सिंहस्थ मेले में नागा साधुओं को देखने के लिए भीड़ होगी। हर मेले में, हर कुंभ में नागा साधुओं को देखने के लिए जो भीड़ होती है, वह और कहीं नहीं होती। स्त्रियां, पुरुष, बच्चे, सब इकट्ठे होते हैं। क्योंकि यह मौका कौन चूके! धर्म के नाम पर यह अवसर चूकने जैसा नहीं है। और उन नागा साधुओं के चेहरे तुम देखो, तुम चकित हो जाओगे--साधुता जैसी कोई चीज दिखाई नहीं पड़ेगी।
मैं एक ही बार कुंभ गया हूं। सिर्फ देखने गया था कि किस-किस तरह की मूढ़ताएं वहां चलती हैं। उनमें सबसे बड़ी मूढ़ता नागा साधु हैं। और जो मैंने उनके चेहरे पर देखा, उसमें साधुता तो है ही नहीं; साधुता का नाममात्र नहीं है। जो हाव-भाव गुंडों के चेहरों पर होते हैं, वही हाव-भाव इन नागा साधुओं के चेहरों पर होते हैं। जरा भी भेद नहीं है। वही दुष्टता, वही दंभ, वही उपद्रव की वृत्ति। हर कुंभ के मेले में जो उपद्रव होते हैं, झगड़े होते हैं, खून-खराबे होते हैं, वे नागा साधुओं की वजह से हो जाते हैं।
मगर दमन ऐसी चीज है कि इसके ये परिणाम होने वाले हैं।
मैं भावनगर में था। भावनगर के टाउन हाल में बोल कर मैं निकला। बड़ी भीड़ थी। बाहर भी बहुत भीड़ थी। मुझे आयोजकों ने कहा कि मैं खुली हुई गाड़ी में खड़ा हो जाऊं, क्योंकि बाहर बहुत से, हजारों लोग थे जो हाल में अंदर प्रवेश नहीं पा सके, वे मुझे देख लें। तो मैं खुली गाड़ी में खड़ा हो गया। जो मैंने देखा, उसमें एक चीज मुझे कभी नहीं भूलती। जब भी खुली गाड़ी देखता हूं, वह चीज मुझे याद आ जाती है।
एक सर्वोदयी नेता, जिनको मैं जानता था, जो मुझसे मिलने आते थे, और जो बड़ी ब्रह्मज्ञान की बातें करते थे, बूढ़े आदमी, उम्र होगी कोई साठ के करीब, सब बाल सफेद...भीड़-भाड़ भारी थी, इतनी भीड़-भाड़ थी, इतनी कशमकश थी...मुझे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं आया। मैंने अपनी आंखें मीड़ कर देखीं। मेरी आंखें बिलकुल ठीक-ठाक हैं, चश्मे की मुझे कोई जरूरत नहीं है। जो मैंने देखा, मुझे भरोसा नहीं आया। वह सर्वोदयी नेता ने एक स्त्री के स्तन पकड़ रखे थे और वह स्त्री चिल्ला रही थी!
मैंने गाड़ी रुकवाई, घबड़ा कर उसने उस स्त्री के स्तन छोड़ दिए। नेताजी पीछे थे, स्त्री आगे थी। जवान स्त्री और उसको इस तरह लोंचे डाल रहा था वह बुङ्ढा...।
मैंने उससे पूछा कि ब्रह्मज्ञान का क्या हुआ? वेदांत का क्या हुआ? वह सिर झुका कर खड़ा हो गया। मैंने कहा कि जो मैं अभी भीतर बोल रहा था, ये उसके प्रमाण हैं।
फिर बहुत बार मैं भावनगर गया, फिर वे कभी नहीं दिखाई पड़े। फिर कभी उनका पता नहीं चला। जब भी जाता था, पूछता था कि भई, सर्वोदयी नेता कहां हैं? कुछ वेदांत, कुछ ब्रह्मचर्चा करने नहीं आना? तो लोगों ने बताया कि आप जब भावनगर आते हैं, वे भावनगर से चले जाते हैं। क्योंकि उनको पता है कि जब आप आते हैं, पहले उनको पूछते हैं कि वे कहां हैं। और जब से वह घटना घटी है, बड़ी मजबूरी हो गई उनकी, बड़ी मुश्किल हो गई--सबको पता चल गया। आपने गाड़ी रोक कर जो किया है काम, वह ठीक नहीं किया। उनकी भद्द हो गई। उनका सब सर्वोदयीपन खत्म हो गया है।
ये तुम्हारे तथाकथित साधु, तुम्हारे सर्वोदयी, तुम्हारे महात्मा, तुम्हारे सेवक! यह होने वाला है। इसमें मैं कुछ असंगति नहीं देखता। जिसको तुम दबा कर बैठे हो, वह कोई भी मौके की तलाश में है, वह प्रकट हो जाएगा।
मैं पक्ष में हूं इसके कि दबाना कुछ भी मत। जीवन तुम्हारा है। जागो! जाग कर जीवन को अनुभव करो! सारी भावनाओं, सारी वृत्तियों से गुजरो, पहचानो! सिवाय जागरण के मुक्ति का और कोई उपाय नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर से निकल रहा था कि उसका एक मित्र जो कई वर्षों बाद मिलने आया था, वह घोड़े से उतरा। मुल्ला ने कहा कि वर्षों के बाद आए हो, मगर बड़े बेवक्त आए। मुझे दोत्तीन जगह मिलने जाना है। तुम विश्राम करो, स्नान करो, भोजन लो; मैं लौट कर आता हूं; मैं जल्दी से निपटा कर आता हूं।
उस मित्र ने कहा कि इतने वर्षों बाद आया हूं; मैं क्षण भर नहीं खोना चाहता। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं, राह में बातें भी होती चलेंगी। मगर मेरे कपड़े सब गंदे हो रहे हैं, अगर तुम्हारे पास ढंग के कपड़े हों तो मुझे दे दो।
मुल्ला को सम्राट ने एक सुंदर अंगरखा भेंट किया था--साफा, जूते, चूड़ीदार पजामा। उसने रख छोड़ा था कि कभी कोई ठीक अवसर पर पहनेगा। वह अवसर कभी आया ही नहीं। हमेशा टालता ही रहा कि कोई ठीक अवसर पर पहनूंगा। सोचा कि आज यह मित्र इतने वर्षों बाद आया है, यह भी क्या कहेगा, निकाल कर ले आया जोश-खरोश में।
पहना तो दिए, पहना कर फिर पछताया। जब दोनों चले रास्ते पर तो सबकी नजरें मित्र पर, नसरुद्दीन को कोई देखे ही नहीं। दिल ही दिल में दुख होने लगा कि मैं भी एक मूढ़ हूं, इतनी कीमती चीज, खुद तो मैंने कभी पहनी नहीं, इस मूरख को पहना दिया! अरे बहुत सालों बाद आया तो क्या हो गया! कुढ़ रहा था।
पहले घर में पहुंचे। अंदर गए। जैसे ही पहुंचे अंदर, घर के मालिक, मालकिन, सबकी नजर मित्र पर पड़ी, नसरुद्दीन को कौन पूछे! वह तो उसके सामने नौकर मालूम हो रहा था। वह तो एकदम सम्राट मालूम हो रहा था उसका मित्र।
उन्होंने पूछा नसरुद्दीन से, आप कौन हैं?
नसरुद्दीन ने कहा, आप कौन हैं! अरे मैं मिलने आया हूं कि ये मिलने आए हैं? मैं हूं नसरुद्दीन!
उन्होंने कहा, आपको तो हम जानते ही हैं, मगर आप कौन हैं?
उन्होंने कहा, ये हैं मेरे मित्र जमाल। और रहे कपड़े, सो कपड़े मेरे हैं।
मित्र को तो बहुत सदमा पहुंचा कि यह क्या भद्दी बात कही! बाहर निकल कर उसने कहा कि भई, यह क्या बात कही? कपड़ों की उन्होंने पूछी भी नहीं थी। और यह कहना शोभा देता है? अगर ऐसा ही करना था तो मुझे कपड़े पहनाए किसलिए? चार आदमियों में आकर बदनामी करवानी थी?
तब तक नसरुद्दीन भी पछताया। उसने कहा, क्षमा करो, मुझसे भूल हो गई। अब यह भूल दोबारा दूसरे घर में नहीं होगी, बिलकुल नहीं होगी। अब यह कहूंगा ही नहीं।
दूसरे घर में पहुंचे। मगर वही हुआ। घर की सुंदर गृहिणी ने द्वार पर ही स्वागत किया और पूछा, आप कौन हैं? नसरुद्दीन, आप कौन हैं?
नसरुद्दीन को तो तीर चुभ गया। भूल-भाल गया वह जो रास्ते में उसने कहा था कि अब नहीं कहेंगे। कहा, आप कौन हैं! आप मेरे मित्र हैं, जमाल आपका नाम है। रहे कपड़े, सो कपड़े किसी के भी हों, तुम्हें क्या मतलब? क्यों कपड़ों के पीछे पड़ी हो?
बाहर निकलते ही से मित्र ने कहा कि भई, तेरे साथ आगे कदम बढ़ाना ठीक नहीं। यह कपड़े की बात तू छेड़ ही देता है। फिर तूने वही हरकत की! क्या कपड़ों की बात करनी है? वे मेरे संबंध में पूछते हैं, तू कपड़ों की क्यों बात करता है?
नसरुद्दीन ने कहा, क्षमा करो, मुझसे फिर भूल हो गई। एक मौका मुझे और दो।
तीसरे घर में गए। और वही सवाल--आप कौन हैं? तो कहा, आप हैं मेरे मित्र, जमाल। और जहां तक कपड़े की बात है, हम कपड़े की बात न ही करें तो अच्छा। यह बात छेड़नी ठीक ही नहीं है। यह तुम बात ही न उठाओ। मैं वचन दे चुका हूं कि यह बात छेड़ेंगे ही नहीं, बात ही नहीं करेंगे। किसी के हों जी! अरे मेरे हुए कि इनके हुए सब एक ही बात है। मेरे मित्र ही हैं, कई सालों बाद आए हैं। और कपड़ों में रखा क्या है? कपड़े कपड़े हैं। मित्र को देखो, कपड़ों पर क्या अटके हो?
वह जो तुम दबाओगे, इधर से दबाओगे, इधर से निकलेगा। इधर से दबाओगे, उधर से निकलेगा। निकल-निकल कर बाहर आ जाएगा।
मैं दमन-विरोधी हूं। मैं पाखंड-विरोधी हूं। और तुमने पाखंड की इतनी पूजा की है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि मुझे गालियां पड़ेंगी, लोग मुझ पर नाराज होंगे।
मुझसे तो केवल वे ही लोग राजी हो सकते हैं, जिनके पास थोड़ी प्रतिभा है, जिनके पास थोड़ी बौद्धिक क्षमता है, जिनके पास थोड़ा आत्मबल है, थोड़ा आत्मगौरव है, जो थोड़े आत्मवान हैं; जिनमें इतना साहस है कि छोड़ दें सारे अतीत को और चल पड़ें मेरे साथ अज्ञात की यात्रा पर--उनके अतिरिक्त, मेरे साथ भीड़ नहीं चल सकती है।

तीसरा प्रश्न: भगवान!
मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी! कोई मार्ग बतावें।

पंडित तोताराम शास्त्री!
गजब का नाम! आज समझ में आया कि कबीर ने क्यों कहा है कि दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय! मैं कई बार सोचता था--वे दो पाट कौन से हैं जिनके बीच में साबित नहीं बचता? आज पता चला--पंडित और शास्त्री! दो पाटन के बीच में और तोताराम की अगर राम-राम सत हो जाए तो कुछ आश्चर्य नहीं।
मगर एक लिहाज से नाम तुम्हारा बड़ा सार्थक है। सभी पंडितों का नाम तोताराम होना चाहिए। पोपटलाल, मियांमिट्ठू, ऐसे-ऐसे अच्छे-अच्छे नाम पंडितों के होने चाहिए। मौलवी हों तो मियांमिट्ठू, गुजराती हों तो पंडित पोपटलाल शास्त्री!
तोतों में भी लेकिन तुमसे ज्यादा अकल होती है; इसका खयाल रखना।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी तोता खरीदने गई बाजार, क्योंकि सामने की औरत ने तोता खरीद लिया। और औरतें तो औरतें हैं! वे तो यह देख कर चलती हैं कि कौन ने क्या खरीदा। इससे उन्हें प्रयोजन ही नहीं कि हमको तोते की जरूरत है या नहीं। सामने की औरत ने तोता खरीदा तो उससे शानदार तोता खरीदना है। गई तोते की दुकान पर।
तोते के दुकानदार ने कहा, तोता तो है एक गजब का, बोलता भी है, मगर जरा संग-साथ इसका अच्छा नहीं रहा। एक वेश्याघर में था, सो थोड़ी अंट-शंट बातें बोल देता है। कभी-कभी गलत शब्द भी बोल देता है। अब इसका कसूर भी नहीं है, रहा ही ऐसे लोगों के साथ। तो मैं सलाह नहीं दूंगा कि इसको ले जाओ, लेकिन बोलने में बड़ा कुशल है। बोलता गजब का है।
अरे--उसने कहा--तुम फिक्र छोड़ो। इसकी जो खराब आदतें हैं, वे हम ठीक कर लेंगे। अगर मैं नसरुद्दीन की खराब आदतें ठीक कर सकी, तो यह तोता क्या है! कर लेंगे ठीक। जब आदमी को रास्ते पर लगा दिया, तो इसको भी लगा देंगे। तोता ही है न? गर्दन दबा दूंगी अगर गड़बड़ की ज्यादा तो। हम ठीक कर लेंगे, मगर चाहिए बोलने वाला।
उसने कहा, बोलने वाला तो क्या बिलकुल बक्कार है। ऐसा बोलता है कि घंटों बोले चला जाता है। और क्या गजब फिल्मी गाने गाता है!
बस--उसने कहा--फिर ठीक है। सामने वाली औरत के तोते को हराना है।
ले आई तोते को। और तोता रास्ते में ही फिल्मी गाना गाने लगा--एक से एक गाने, कव्वालियां। नसरुद्दीन की पत्नी तो बड़ी खुश हुई कि चीज तो गजब की मिल गई। घर लाकर तोते को टांगा। जैसे ही घर में तोते को टांगा, तोते ने कहा कि वाह-वाह, नया घर, प्यारा घर!
नसरुद्दीन की पत्नी तो बहुत ही खुश हुई। तभी लड़कियां स्कूल से, कालेज से लौटीं। उसने कहा, अरे वाह-वाह, गजब की लड़कियां, नयी-नयी लड़कियां! क्या कहने! एक से एक सुंदर, एक से एक बढ़-चढ़ कर!
नसरुद्दीन की पत्नी तो बोली कि गजब का तोता है। और तभी नसरुद्दीन दफ्तर से लौटा। तोता ने कहा, हलो नसरुद्दीन! नया घर, नयी मालकिन, नयी छोकरियां, मगर ग्राहक वही पुराने के पुराने।
तोतों में भी थोड़ी अकल होती है!
अब तुम भी क्या बात पूछते हो कि मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी! जैसे कोई तुम्हें दे सकता है ये चीजें--और जल्दी से जल्दी! पहली तो बात, कोई तुम्हें दे नहीं सकता। न कोई तुम्हारा दुख छीन सकता है, न तुम्हें कोई आनंद दे सकता है। दुख तुमने दिया है अपने को और आनंद भी तुम्हीं अपने को दे सकते हो। और दुख तुमने जल्दी-जल्दी नहीं दिया है, जन्मों-जन्मों में तुमने दुख की आदतें सीखी हैं; तो जल्दी-जल्दी तुम काट भी न सकोगे। और जितनी जल्दी करोगे, उतनी ही देर हो जाएगी। जल्दबाजी में अक्सर देर हो जाती है।
तुम्हें पता है, जब गाड़ी पकड़नी हो जल्दी-जल्दी, तो बटन ऊपर का नीचे लग जाता है, कोट का बटन पतलून में लग जाता है। सब गड़बड़ हो जाता है। भागते हो एकदम। जो सूटकेस ले जाना था वह घर ही रह जाता है, जो नहीं ले जाना था वह लेकर चल पड़े। कुछ का कुछ हो जाता है। जल्दी में सब गड़बड़ हो जाता है।
यह कार्य तो धैर्य से। इसके लिए बहुत धैर्य चाहिए--अनंत धैर्य चाहिए।
मगर पंडित हो, शास्त्र पढ़ते रहे होओगे कि दुख से छुटकारा चाहिए, मुक्ति चाहिए, मोक्ष चाहिए। शब्द तुम्हें याद हो गए हैं। मगर तुम्हें इस बात का कोई बोध नहीं है कि तुमने कितनी आयोजना की है दुख का जाल अपने चारों तरफ फैलाने की। तुमने किस तरह का जाल बुना है दुख का। उस सारे जाल को काटना पड़ेगा। जल्दी कैसे होगा? होश को जगाना पड़ेगा। सारी अचेतना को तुम्हारे भीतर से चेतना में रूपांतरित करना होगा। जल्दी कैसे होगा। लेकिन लोग समझते हैं जादू-टोना हो जाएगा कोई। कोई मंत्र दे देगा, कोई ताबीज दे देगा, बस सब जल्दी-जल्दी हो जाएगा काम।
लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, बस आप आशीष दे दें, सब ठीक हो जाएगा। जैसे मेरे आशीष न देने से वे अब तक नरक भोग रहे हैं! मेरा कोई हाथ ही नहीं उनके नरक में, तो मेरे आशीष से कैसे ठीक हो जाएगा? नरक तुम बनाओ और मेरा आशीष तुम्हारे नरक को कैसे काट सकेगा?
काश, बात इतनी आसान होती! मगर पंडितों ने, पुरोहितों ने यही समझाया है तुम्हें कि बात इतनी ही आसान है। तुम्हारे शास्त्र तुम्हें यही समझाते हैं कि अजामिल मर रहा था, मरते वक्त... पापी था, महापापी था, लुटेरा था, डाकू था...मरते वक्त उसने अपने बेटे को बुलाया--बेटे का नाम नारायण था--और ऊपर के नारायण धोखे में आ गए और उन्होंने समझा मुझे बुला रहा है। अजामिल मरा और एकदम स्वर्ग गया!
पंडित तोताराम शास्त्री, इसी तरह की बातों में लोगों को भरमाया गया है। ऐसे कहीं स्वर्ग नहीं मिलता। ये ऊपर के नारायण न हुए, पक्के कोई छंटे हुए बुद्धू हुए, जो यह भी न समझ सके कि अपने बेटे को बुला रहा है। कोई किसी को बुला रहा है, ये समझ गए कि हमको बुला रहा है! जिंदगी भर इनको नहीं बुलाया, मरते वक्त कैसे बुला लेगा! मरते वक्त आदमी के ओंठ पर तो जिंदगी भर का निचोड़ होता है। जिंदगी भर जो किया है, उसकी ही गंध मरते वक्त होती है। अगर जिंदगी भर फूल बोए हैं तो सुगंध होती है और अगर कांटे बोए हैं तो कैसे सुगंध हो सकती है!
और यह नारायण को किसलिए बुला रहा था, यह भी तो सोच लिया होता! यह शायद बुला रहा हो कि बेटा, धन कहां गड़ाया हुआ है, अब तेरे को बता दूं, अब मैं मर रहा हूं। या बुला रहा हो कि बेटा, चोरी की आखिरी तरकीब तुझे समझा दूं, डाके का आखिरी राज तुझे बता दूं, अब मैं तो चला, तू अपना काम सम्हालना। बाप-दादों से हम यही काम करते रहे हैं। रघुकुल रीति सदा चली आई--तू भी चलाना। हमारी प्रतिष्ठा है। वंश का नाम है। यूं ही डूब न जाए।
यह आदमी जो जिंदगी भर डकैत रहा, लुटेरा रहा, बेईमान रहा, चोर रहा--यह मरते वक्त क्या तुम सोचते हो बेटे को बुला रहा होगा कि आ बेटा, तुझे मैं गायत्री मंत्र सिखा दूं? इसकी जिंदगी भर का जो है, उसमें ही से कुछ यह अपने बेटे को कहना चाहता होगा।
मगर किन्होंने ये कहानियां गढ़ी हैं?
ये बेईमानों ने, धोखेबाजों ने कहानियां गढ़ी हैं। ये उन्होंने कहानियां गढ़ी हैं, जो लोगों को यह कहना चाहते हैं: तुम्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं, मरते वक्त नाम ले लेना। नाम भी न ले पाओ, तो कोई किराए का पंडित तुम्हारे कान में नाम दोहरा देगा। अगर वह भी सुनाई न पड़े, क्योंकि मरते वक्त पता नहीं होश रहे न रहे, तो एक चमची भर गंगाजल पिला देना। बोतल में भरा हुआ गंगाजल घर में रखो। वह सड़ा-सड़ाया गंगाजल, वह पिला देना। बस सब ठीक हो जाएगा। गायत्री मंत्र पढ़ कर सुना देना कि नमोकार मंत्र पढ़ कर सुना देना, कि सब ठीक हो जाएगा।
काश मामला इतना आसान होता, तब तो कहना ही क्या था!
नहीं, पंडित तोताराम शास्त्री, मामला इतना आसान नहीं है। मामला जटिल है, बहुत उलझा हुआ है। सुलझाने की चेष्टा करनी पड़ेगी। और चेष्टा के लिए श्रम करना होगा, साधना करनी होगी, ध्यान की गहराइयों में डुबकियां मारनी होंगी।
और सबसे पहले तो ये दो जो तुमने अपने गले में फांसी के फंदे लगा रखे हैं--पंडित और शास्त्री के--इनका त्याग करो।
मैंने सुना नहीं कभी कोई पंडित मुक्त हुआ हो। हो नहीं सकता। पहले तो पांडित्य से मुक्त होना पड़ता है। अगर ज्ञान चाहिए, तो थोथे ज्ञान से मुक्त होना पहला कदम है। अगर अपना अनुभव चाहिए, तो उधार अनुभव से छुटकारा करना होगा। और मैंने सुना नहीं कभी कोई शास्त्री वहां गया हो, उस परम लोक में। क्योंकि शास्त्री तो शास्त्रों में दबा-दबा मरता है, वह कहां उड़ेगा? उसके पंख कहां होते हैं? वह तो गधा है जो शास्त्रों को ढोता रहता है। हां, उसके कंठ में शास्त्र भरे होते हैं, प्राणों में नहीं। प्राणों से उसके शास्त्रों का कोई संबंध नहीं।
शास्त्र तो तुम्हारे भीतर पैदा होना चाहिए, तुम्हारे चैतन्य से आविर्भूत होना चाहिए। तुम्हारी गीता तुम्हारे भीतर जन्मे तो ही श्रीमद्भगवद्गीता है। यूं बाहर से सीख ली, तो बस तुम अपना नाम ही सार्थक कर रहे हो--तोताराम। ऐसे तो तोते भी राम-राम जप रहे हैं, मगर उनको क्या लेना है राम-राम से! क्या प्रयोजन है राम-राम से!
एक महिला एक तोते को खरीद कर लाई। वह तोता गालियां बके, मां-बहन की गालियां दे। महिला तो बहुत दुखी हुई--यह मैं कहां के जाल में पड़ गई! और खासकर जब भी पादरी घर में आए, तब तो वह बहुत बकवास करे कि ऐसी की तैसी इस पादरी की! इस हरामजादे को बाहर करो! फिर आ गया! न दिन देखे न रात, जब देखो तब चला आता है।
उसने कहा पादरी से कि अब आप ही कुछ करिए। अब मैं ले ही चुकी हूं, पैसा काफी खर्च किया है। बोलता तो है, मगर बस कभी-कभी अंट-शंट बातें बोल देता है।
अगर वह महिला अपने प्रेमी को घर में लाए, तो तोता एकदम खिलखिला कर हंसे कि हां, ले आई फिर! अब हो जाने दे रास! एक-एक पोल-पट्टी खोल दूंगा। सब उखाड़ कर रख दूंगा। मोहल्ले भर को बता दूंगा। आने दे पादरी को।
उस महिला ने कहा, यह तो बड़ी झंझट की बात है।
पादरी ने कहा कि मेरे पास एक तोता है, जो बड़ा धार्मिक है, बड़ा...यही समझो कि एक संतपुरुष। वह एकदम बैठा-बैठा बस प्रभु के ही गुणगान गाया करता है, स्तुति करता रहता है कि हम पतित, तुम पतितपावन। और क्या-क्या बातें कहता है! इसको तू वहीं ले आ। दोनों को एक ही पिंजरे में रख देंगे, सत्संग का तो असर होता ही है।
महिला ने कहा, यह बात तो ठीक है, सत्संग का असर होता है। आपके सत्संग में रहते-रहते मुझ पर ही कितना असर हो गया! ले जाइए।
वह ले आई पिंजरा। रख दिया पादरी के पिंजरे के भीतर अपने तोते को।
पांच-सात दिन बाद पता लगाने आई कि कुछ बदलाहट हुई? सत्संग का कोई परिणाम हुआ? पादरी ने जैसे ही उसे देखा और कहा कि बाई, ले जा अपने तोते को, जल्दी कर!
उसने कहा, क्यों? सत्संग का कुछ असर नहीं हुआ?
अरे--उसने कहा--उलटा असर हो रहा है। उस हरामजादे तोते ने मेरे तोते को बिगाड़ दिया। मेरा तोता, जो हमेशा प्रार्थना में लीन रहता था, वह प्रार्थना ही नहीं करता। दोनों पता नहीं क्या गुटरगूं करते रहते हैं!
तो महिला पास गई, दोनों, पादरी भी पास गया। महिला ने पूछा कि बात क्या है? पादरी के तोते से पूछा कि तू तो सत्संगी तोता था, तू तो महापुरुष, तूने क्यों प्रार्थना करनी छोड़ दी?
उसने कहा, अरे हम जिसके लिए प्रार्थना करते थे, वह मिल गई। यह तोता नहीं है, यह तोती है। इसी के लिए तो प्रार्थना करते थे--हे प्रभु, भेज! एकाध तोती को भेज!
मगर पादरी ने कहा, इसने जरूर प्रार्थना छोड़ दी, मगर चमत्कार की बात यह है कि यह बता रहा है कि तोती है, अपने को तो पहचान भी क्या कि कौन तोता कौन तोती, मगर तेरे तोते ने गाली-गलौज बंद कर दी।
उसने कहा, मैं गाली-गलौज अब क्यों दूं जब मैं खुद ही रासलीला कर रही हूं! जब यह हरामजादी रासलीला करती थी तो मैं तड़फती थी, कि ले आई, फिर ले आई। और हम बंद हैं, और सदा के लिए बंद हैं। अब हम क्यों?...हमको अलग मत करो। इसने प्रार्थना छोड़ दी, मैंने गालियां छोड़ दीं, अब हम दोनों मजे में हैं। बस अपना गुटरगूं चलती है। अब हम अलग नहीं होना चाहते।
तुम प्रार्थना भी करोगे तो तुम्हारी प्रार्थना में भी वासना ही छिपी होती है। और वासना जहां है, वहां कैसी प्रार्थना!
तुम कहते हो: "जल्दी से जल्दी मुक्ति चाहता हूं।'
चाह? चाह ही तो बाधा है। चाह यानी वासना। चाहो मत। चाह को समझो, चाह को बूझो, चाह की प्रकृति को पहचानो--और चाह गिर जाएगी। लोग धन को चाहते हैं, कुछ लोग मोक्ष को चाहते हैं--मगर चाह तो वही की वही है, कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी की जंजीरें लोहे की, किसी की सोने की--क्या फर्क पड़ता है? असल में सोने की जंजीरें लोहे की जंजीरों से ज्यादा खतरनाक! क्योंकि लोहे की जंजीरें तो छोड़ने का भी मन होता है, सोने की जंजीरें तो लोग समझते हैं आभूषण हैं, पकड़ लेने की इच्छा होती है।
चाह को समझो। चाह भटकाती है। चाह ही संसार है। जिस दिन चाह को समझ लोगे, उस दिन यह भी समझ में आ जाएगा कि चाह ने ही दुख पैदा किया है। तुमने चाहा और नहीं हुआ, जो चाहा वह नहीं हुआ, तो दुख। जिस दिन तुम्हारी कोई चाह नहीं रह जाएगी, उसी दिन सारे दुख भी विदा हो जाएंगे। न अपेक्षा होगी, न विषाद होगा। न जीत मांगोगे, न हार हो सकती है। जब सुख ही नहीं मांगोगे, तो दुख कैसे होगा? जब मांगोगे ही नहीं, तो तुम्हारी पराजय नहीं है फिर।
चाह को समझो, पंडित तोताराम शास्त्री। चाह के समझने में से मुक्ति का फूल खिलता है। चाह गिर जाती है और चाह में छिपी ऊर्जा मुक्ति बन जाती है। और आनंद कुछ अलग से नहीं आता। तुम्हारी ही ऊर्जा जो अभी दुख बन रही है चाह के कारण, चाह के हट जाने पर आनंद बन जाती है।
और जल्दबाजी भूल कर मत करना। यह रास्ता जल्दबाजी का नहीं है, धैर्य चाहिए--अनंत धैर्य चाहिए। परमात्मा को खोजने जो चले हैं उनके लिए बहुत प्रतीक्षा चाहिए। परमात्मा दूर नहीं है। परमात्मा तुम्हारे भीतर विराजमान है।
लेकिन तुम जितनी जल्दी करोगे, उतने ही चूकते रहोगे। जल्दी तनाव पैदा करती है, अधैर्य पैदा करती है। जहां कोई जल्दी नहीं है, वहां शांति आ जाती है, तनाव-मुक्ति आ जाती है, विश्राम आ जाता है। यूं समझो कि जब मिलेगा, मिलेगा, जल्दी क्या है!
अभी अपने दुख को पहचानो, दुख को गिर जाने दो। दुख के गिरते ही आनंद से भर जाओगे। और आनंद आया कि वसंत आया। आनंद आया कि खिला फूल परमात्मा का। फिर एक क्षण की देर नहीं होती।
मगर तुम जल्दी मत करना; तुम जल्दी करोगे--देर हो जाएगी। अगर तुम राजी हो अनंत प्रतीक्षा के लिए, तो अभी घट सकती है घटना, यहीं घट सकती है--इसी क्षण!

आज इतना ही।