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गुरुवार, 18 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 05 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवा-(प्रश्नसार)

पहला प्रश्न: भगवान!
आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है। अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर रोना फूट पड़ता है। यह क्या है? ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है; यह कैसे छूटे--ऐसा भाव सघन होता जाता है। यह क्यों? समझाने की अनुकंपा करें।

अक्षय विवेक!
मनुष्य को ऐसे गलत संस्कार दिए गए हैं कि न तो वह जी भर कर कभी रोया है, न जी भर कर कभी हंसा है। जी भर कर जीया ही नहीं है। किसी पहलू से, किसी आयाम में, जी भर कर कोई काम किया ही नहीं, सब अधूरा-अधूरा है! और इसलिए भीतर बहुत सी चीजें त्रिशंकु की भांति लटकी रह जाती हैं।

मैं तो कहता हूं ध्यान उत्सव है, लेकिन यह घटना जो तुम्हें घट रही है, औरों को भी घटती है। उत्सव मनाते-मनाते अचानक रोना न मालूम किस कोने से उभर आता है! दबा पड़ा होगा कहीं; जन्मों से दबा पड़ा होगा। विशेषकर पुरुषों को। क्योंकि बचपन से ही हम सिखाते हैं लड़कों को: रोना मत! रोती हैं लड़कियां। तुम हो मर्द बच्चे, रोना तुम्हारा काम नहीं है।
यह बात झूठ है। यह सरासर झूठ है। प्रकृति ने पुरुष और स्त्री की आंखों में आंसुओं की ग्रंथियां एक जैसी बनाई हैं। पुरुष की आंखों में आंसू की ग्रंथियां छोटी नहीं हैं स्त्रियों से। इसलिए एक बात तो तय है--प्रकृति चाहती थी दोनों बराबर रोएं। लेकिन पुरुष ने एक अहंकार निर्मित किया है कि पुरुष को रोना नहीं है। टूट जाए भला, रोए नहीं। मिट जाए भला, रोए नहीं। रोकर क्या अपनी कमजोरी प्रकट करनी है!
हमने पुरुष को कठोर होना सिखाया है। हमने पुरुष शब्द का अर्थ ही धीरे-धीरे कठोर होना कर लिया है। हमारी भाषा में एक शब्द है: परुष। और अधिकतर लोग सोचते हैं, परुष से ही पुरुष बना है। परुष यानी कठोर।
परुष से पुरुष नहीं बना है। पुरुष तो बड़ा अनूठा शब्द है। पुरुष तो बना है पुर से। पुर का अर्थ होता है: नगर। यह देह नगर है। इसके भीतर जो बसा है, वह पुरुष है। स्त्री के भीतर भी वही बसा है, पुरुष के भीतर भी वही बसा है। वह जो भीतर बसा है, वह न तो स्त्री है, न पुरुष है सामान्य अर्थों में। वह तो केवल पुर का वासी है। वह तो मेहमान है, अतिथि है। देह मेजबान है, आतिथेय है।
लेकिन हमने पुरुष की परिभाषा कर रखी है: परुषता, कठोरता। और जो बहुत कठोर होते हैं, उनका हम बहुत सम्मान करते हैं। जैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारत में लोग कहते थे: लौह-पुरुष। परुष होना ही काफी नहीं था, लौह-पुरुष!
अब लोहे के आदमी कहीं रोते हैं!
रूस में जोसेफ स्टैलिन ने जितनी हत्याएं कीं उतनी संभवतः मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी व्यक्ति ने नहीं कीं। तुम्हें याद दिलाना चाहता हूं, स्टैलिन का नाम स्टैलिन नहीं था; स्टैलिन का तो अर्थ लौह-पुरुष होता है--मैन ऑफ स्टील। धीरे-धीरे लौह-पुरुष ही उसका नाम हो गया, उसका असली नाम तो लोग भूल ही गए।
सदियों से हमने कठोरता की पूजा की है। और स्वभावतः इसका परिणाम यह हुआ है कि पुरुष में आंसू दबे रह गए हैं, रुदन प्रकट नहीं हो पाया। नहीं तो रोने का भी अपना हलकापन है। रोने का भी अपना राज है।
स्त्रियां कम पागल होती हैं। और मनोवैज्ञानिक कहते हैं, उसका कुल कारण इतना है कि वे जी भर कर रो लेती हैं। रोने में उनका पागलपन बह जाता है। पुरुष ज्यादा पागल होते हैं। स्त्रियां कम आत्महत्या करती हैं, पुरुष दोगुनी आत्महत्या करते हैं। स्त्रियों के हाथ में अगर दुनिया हो तो युद्ध बंद हो जाएं। पुरुषों के हाथ में दुनिया रहेगी तो युद्ध जारी रहेंगे, क्योंकि हमने पुरुष को मौलिक रूप से सैनिक के ढांचे में ढाला है। और सैनिक और संन्यासी में बुनियादी भेद है।
अक्षय विवेक मजबूत पुरुष हैं। तुम उनको देखोगे तो भी समझ जाओगे कि मजबूत पुरुष हैं। जब शुरू-शुरू मेरे पास आए थे तो मैं यूं ही समझा था कि शायद पहलवानी करते होंगे। फिर धीरे-धीरे नरम हुए--भीतर तो बहुत नरम थे, भीतर तो बहुत गीले थे, मगर ऊपर की कठोर पर्त टूट रही है। सदियों पुरानी है, जन्मों पुरानी है, टूटते-टूटते ही टूटेगी।
इसलिए अक्सर यह हो जाता होगा कि मुझे सुनते-सुनते रोना आ जाता होगा। तो रो लिए, जी भर कर रो लिए। बुरा क्या है? आंखें धुल जाती हैं--बाहर की ही नहीं, भीतर की भी धुल जाती हैं, स्वच्छ हो जाती हैं। आंसुओं की जरूरत ही इसीलिए है कि वे आंखों को स्वच्छ करते रहते हैं। प्रतिपल तुम्हारी पलकों को गीला करते रहते हैं, ताकि आंखें धुलती रहें। क्योंकि आंख तो बड?ी कोमल वस्तु है--तुम्हारी देह में सर्वाधिक कोमल। तुम्हारी देह में जो सर्वाधिक नाजुक तत्व है, वह आंख है। उसकी रक्षा का पूरा इंतजाम है। इसलिए पलक झपकते रहते हो तुम पूरे समय; पलक के झपकने का राज यही है कि झपक कर पलक साफ करते रहते हैं आंख को। और पलक गीले हैं, इसलिए प्रतिपल आंख पर कोई धूल नहीं जम पाती।
और जो बात आंसुओं के संबंध में बाहरी आंख के लिए लागू है, वही भीतर अंतर्चक्षु के लिए भी लागू है। जब ध्यान में तुम रो उठोगे, तो भीतर की आंख भी धुलेगी, वहां भी हलकापन आएगा, निर्भार हो जाओगे। तुमने रोने के बाद का निर्भारपन देखा या नहीं?
अगर कोई मर जाए तो स्त्रियां रो लेती हैं, छाती पीट कर रो लेती हैं, सिर धुन कर रो लेती हैं, और जल्दी ही मुक्त हो जाती हैं। लेकिन पुरुष तो कैसे रोएं! वे तो अकड़े रह जाते हैं, वे तो दबा कर रह जाते हैं। फिर यह दबा हुआ दुख उनके रग-रग में, रेशे-रेशे में फैल जाता है। फिर उनका जीवन पाषाणवत हो जाता है। फिर उनके जीवन में संवेदनशीलता कम हो जाती है। फिर उनको फूल नहीं दिखाई पड़ते। वे खुद ही कांटे हो गए तो फूल कैसे दिखाई पड़ेंगे!
हमें वही दिखाई पड़ता है, जो हम होते हैं। हमारा उससे ही तालमेल बैठता है, जो हम होते हैं। अगर हमारे भीतर संगीत है, तो बाहर के संगीत से हमारा तालमेल बैठता है। अगर भीतर विसंगीत है, तो बाहर के शोरगुल से हमारा तालमेल बैठता है। अगर भीतर सौंदर्य है, तो बाहर के सौंदर्य से तालमेल बैठता है। अगर भीतर कुरूपता है, तो बाहर भी हम सब तरह की कुरूपता को खोजते फिरते हैं। जो भीतर है उसका ही विस्तार बाहर होता है। और हम कुछ भी छिपा नहीं सकते।
ध्यान का यही तो रहस्य है कि ध्यान तुम्हारे भीतर जो भी दबा पड़ा है, उस सबको उभार कर ले आएगा, उस सबको धीरे-धीरे मुक्त कर देगा। तुम्हारा उससे छुटकारा हो जाएगा। हंसोगे भी, रोओगे भी। ऐसी घड़ियां भी आएंगी जब कि हंसोगे और रोओगे साथ-साथ भी। कोई भी देखेगा तो समझेगा पागल है। तुम खुद भी सोचोगे तो समझोगे कि क्या हुआ मुझे? क्या मैं पागल हुआ जा रहा हूं! हंसना और रोना तो सिर्फ पागल ही करते हैं एक साथ।
मगर प्रत्येक व्यक्ति पागल है कमोबेश, मात्रा का भेद होगा--कोई निन्यानबे डिग्री का पागल है, कोई अट्ठानबे डिग्री का पागल है, कोई सत्तानबे डिग्री का। जरा सा धक्का मार दो कि सौ डिग्री के उस तरफ हो गए कि पागलखाने के भीतर। दिवाला निकल जाए कि बस...एक डिग्री के पार होने में देर कितनी लगती है! दुख में भी एक डिग्री पार हो सकती है, सुख में भी एक डिग्री पार हो सकती है। अचानक लाटरी खुल जाए, एक दस लाख रुपये की लाटरी मिल जाए, तो एक डिग्री पार हो सकती है। सह न सको, इतना ज्यादा सुख हो जाए, टूट ही जाओ सुख के बोझ से। दुख ही नहीं तोड़ता, सुख भी तोड़ देता है। हम इतने ज्यादा कठोर हो गए हैं, हम लोच खो दिए हैं। हर चीज हमें तोड़ देती है। और हमें सिखाया ही यह गया है: झुकना मत, भला टूट जाना।
लेकिन जो जानते हैं वे कुछ और कहते हैं। लाओत्सु ने कहा है कि जब तूफान आता है तो बड़े वृक्ष गिर जाते हैं, मगर फिर उठ नहीं सकते। क्योंकि वे अकड़ कर खड़े रहते हैं। उनकी अकड़ ही उनकी मौत हो जाती है। वही तूफान उन्हीं बड़े वृक्षों के पास घास के पौधों पर से भी गुजरता है। घास के पौधे तूफान के साथ झुक जाते हैं, तूफान के साथ नाच लेते हैं; तूफान ऐसा तो ऐसा, तूफान वैसा तो वैसा; बाएं चले हवा तो बाएं बहने लगते हैं, दाएं चले हवा तो दाएं बहने लगते हैं; तूफान उन्हें जमीन पर बिछा दे तो जमीन पर लेट जाते हैं; कोई एतराज ही नहीं है; तूफान के हाथों में अपने को बिलकुल छोड़ देते हैं--समर्पित।
श्रद्धा का वही अर्थ है। ऐसे जीने का नाम श्रद्धा है। ऐसे जीने का नाम आस्तिकता है। अस्तित्व के साथ ऐसी तन्मयता कि जो अस्तित्व कराए वही कर लेते हैं।
तूफान जा चुका होता है, बड़े वृक्ष गिर गए सो गिर गए, अब कभी न उठेंगे। और घास के पौधे, पतले पौधे, कमजोर पौधे, नाजुक पौधे, फिर वापस अपनी जगह खड़े हैं--ताजे होकर। सारी धूल-धवांस झाड़ कर ले गया तूफान, उन्हें और हरा कर गया है, उनकी जड़ों को और मजबूत कर गया है।
लाओत्सु ने अपने शिष्यों को कहा है: बड़े वृक्षों की तरह मत होना; वह अहंकार का प्रतीक है बड़ा वृक्ष। घास के पौधों की तरह होना; वह निरहंकारिता का प्रतीक है।
अक्षय विवेक, जब रोना आए, रोए। बुरा क्या? जब हंसना आए, हंसे। बुरा क्या? और उत्सव के समय पर भी अगर रोना फूट पड़े तो विसंगति मत देखना, विरोधाभास मत देखना। क्योंकि जो भीतर दबा पड़ा है, वह कब फूट पड़ेगा कहना मुश्किल है।
असल में उत्सव के समय ही तुम्हारे भीतर जो गहरी से गहरी दबी हुई वृत्तियां हैं, उनके उभर कर आने का अवसर है। क्योंकि उत्सव के समय में तुम दबाना भूल जाते हो; तुम्हारी सारी ऊर्जा नृत्य में लग गई, उत्सव में लग गई; जो दबा रही थी, अब दबा नहीं रही है। उसी घड़ी तो मौका है कि सब दमित भावनाएं उभर कर परिधि पर आ जाएं।
सत्यों को छिपाया नहीं जा सकता। और ध्यान की कला ही क्या है? यही कि सारे सत्य प्रकट हो जाएं। अपनी विसंगतियों के साथ, अपने विरोधाभासों के साथ तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व परिधि पर आ जाए, तो तुम्हारा केंद्र मुक्त हो जाए, तुम्हारे केंद्र पर रह जाएगा सिर्फ साक्षी। वह हंसने को भी देखेगा, रोने को भी देखेगा। वह दोनों को देखेगा--और अलिप्त, और असंग, विमुक्त, अछूता।
अदालत में मुकदमा था। मटकानाथ ब्रह्मचारी पर आरोप था कि उन्होंने अपने पड़ोसी की बीबी के साथ बलात्कार किया है। जब कोई गवाह अथवा ठोस सबूत न मिला तो जज ने धमकाने के लिए कहा, ब्रह्मचारी जी, व्यर्थ दलीलें मत कीजिए; आप पर लगाया गया आरोप इस बात से सही सिद्ध हो चुका है कि पड़ोसी के दरवाजे पर, पलंग पर और उसकी पत्नी के गहनों पर आपके हाथों की अंगुलियों के निशान पाए गए हैं। क्या आपको अपनी सफाई में कुछ कहना है?
महामहिम मटकानाथ ने गुस्से में कहा, यह बात सरासर झूठ है, क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं रबर के दस्ताने पहन कर उसके घर में घुसा था।
ध्यान में तो सब प्रकट हो जाएगा। तुम्हारी परुषता गलेगी, तुम्हारे झूठ गिरेंगे, तुम्हारा जमाया हुआ आचरण उखड़ेगा, तुम्हारी सहजता प्रकट होगी, तुम्हारी प्रकृति, तुम्हारा स्वभाव पहली बार खिलेगा। इसलिए ऐसा हो रहा है।
तुम कहते हो: "आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है।'
तो रो लिए। मुझे सुन रहे हो, यही इस बात का सबूत है कि तुम्हारे भीतर कुछ हो रहा है। मेरे हृदय और तुम्हारे हृदय के बीच तार जुड़ रहे हैं। मेरी अंगुलियां तुम्हारी हृदयत्तंत्री पर टंकार देने लगी हैं। यूं ही थोड़े ही आंसू आ जाएंगे।
तुम कहते हो: "अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर भी रोना फूट पड़ता है।'
फूटने दो। वह भी उत्सव का अंग है। वह भी उत्सव का हिस्सा है।
पूछते हो कि "ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव भी जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है, कैसे छूटे?'
यह भी सदियों-सदियों तक सिखाई गई शिक्षाओं का परिणाम है। हमें शरीर की दुश्मनी सिखाई गई है। हमें सिखाया गया है: शरीर से मुक्त होना है। शरीर में होना पाप है। शरीर बंधन है। शरीर गर्हित है। शरीर कुत्सित है। वही भाव उठ रहा है और कुछ भी नहीं।
यह भाव भी विदा हो जाएगा। अगर तुम तूफान को चलने दिए और साथ-साथ डोलते रहे, नाचते रहे तूफान में, तो यह सब धूल झर जाएगी--आंसू भी जाएंगे, हंसी भी जाएगी; इस तरह की भावनाएं भी उठेंगी और विदा हो जाएंगी। तब शरीर तुम्हें पाप नहीं मालूम होगा और न ही बोझ मालूम होगा, न ही बाधा मालूम होगा--मंदिर मालूम होगा, क्योंकि जहां परमात्मा रह रहा हो वही जगह तो मंदिर है; तीर्थ मालूम होगा।
और प्रत्येक के भीतर तीर्थंकर विराजमान है। तुम उतने ही तीर्थंकर हो जितने महावीर। तुम उतने ही बुद्ध हो जितने बुद्ध। तुम उतने ही अवतार हो परमात्मा के जितने कृष्ण। तुम ईश्वर के उतने ही बेटे हो जितने जीसस--जरा भी भेद नहीं। बस तुम्हें पता नहीं है, उन्हें पता हो गया था। तुम्हें भी पता हो सकता है। ध्यान उस पता को पाने की ही कुंजी है।
हम जैसे जी रहे हैं, वह तो बिलकुल झूठ है। इस सारे झूठ का साक्षात्कार करना होगा। हमारे संस्कार भ्रांत हैं। मौलिक रूप से, आधारभूत रूप से हमारे ऊपर गलत बातें थोपी गई हैं। हमें जीवन-विरोध सिखाया गया है। और मैं तुम्हें सिखा रहा हूं जीवन-प्रेम; क्योंकि मेरे लिए जीवन ईश्वर का पर्यायवाची है। और कोई ईश्वर है ही नहीं सिवाय जीवन के। यह जीवन का विस्तार ही परमात्मा है। इसके अतिरिक्त, इसके अलावा, कहीं कोई दूर बैठा हुआ आकाश में कोई परमात्मा नहीं है, कि जिसके तीन मुंह हैं--ब्रह्मा, विष्णु, महेश; कि जिसके चार हाथ हैं--चतुर्भुज। ये सब बच्चों की कल्पनाएं हैं, बचकानी कल्पनाएं हैं। ठीक हैं छोटे बच्चों को समझाने के लिए; प्रतीक हैं।
मगर तुम जो कि प्रौढ़ हो, और अब मनुष्य प्रौढ़ हुआ है, पूरी मनुष्यता प्रौढ़ हुई है, अब इन झूठों के हमें बाहर होना होगा।
जीवन परमात्मा है। वृक्षों में, नदियों में, पहाड़ों में, पशुओं में, मनुष्यों में वह जो अनंत फैला हुआ है, परमात्मा उसी का नाम है। कहीं सोया है, कहीं जागा है। जहां जाग गया है, वहां बुद्धत्व है, वहां प्रतिपल आनंद ही आनंद है। जहां सोया है, वहां प्रतिपल दुख ही दुख है, उदासी है, बेचैनी है। बेचैनी है इसीलिए कि जो हमारा है, उसको ही हम भूले बैठे हैं। जो अपनी निज की संपदा है, उसका भी हमने अधिकार अभी तक छोड़ रखा है। हैं सम्राट और बन गए हैं भिखारी। और भिखारी भी कैसे भिखारी कि गरीब तो भिखारी हैं ही, भिखारी तो भिखारी हैं ही, हमारे सम्राट भी भिखारी हैं!
और भिखारी का भिक्षापात्र कभी भरता ही नहीं। दिखता तो छोटा है भिक्षापात्र, लेकिन कभी भरता नहीं, भर सकता नहीं, क्योंकि भिखमंगे का मन दुष्पूर है। फिर भीख मांगने के लिए हमें क्या-क्या झूठ नहीं बोलने पड़ते! एक-एक वासना को पूरा करने के लिए हमें कितने-कितने झूठों से नहीं गुजरना पड़ता!
फिर उन सारे झूठों से घबरा कर हम पंडित-पुरोहितों से पूछते हैं कि इससे छुटकारा कैसे हो? हम ही हैं जिन्होंने झूठें खड़ी कर ली हैं, फिर हम उनसे पूछते हैं--छुटकारा कैसे हो? सांप है ही नहीं, जिसको हम मारना चाहते हैं। फिर हम पूछते हैं किसी से कि सांप को मारें कैसे? तो वह हमें लकड़ी पकड़ा देता है, जो सांप ही जैसी झूठी है। वह कहता है, इस लकड़ी से मार डालो।
जिनको तुम आमतौर से धर्म मानते हो, वे तुम्हारे झूठों को काटने के ही झूठे उपाय हैं, और कुछ भी नहीं। ध्यान तुम्हें न केवल अधर्म से मुक्त करेगा, धर्म से भी मुक्त कर देगा; न केवल पाप से मुक्त करेगा, पुण्य से भी मुक्त कर देगा। ध्यान तुम्हें सिर्फ शुद्ध चैतन्य में विराजमान कर देगा। और वही सत्य है।
एक भिखमंगा भीख मांग रहा है। बोला, बाबूजी, भगवान के वास्ते इस अंधे को एक रुपया दस पैसे देते जाइए।
मगर तुम तो अंधे नहीं हो, तुम्हारी एक आंख तो बिलकुल ठीक नजर आती है।
बाबूजी, तो फिर पचपन पैसे ही दे दीजिए।
लेकिन तुम पचपन पैसे क्यों मांगते हो, सीधा आठ आना क्यों नहीं मांगते?
बाबूजी, देखते नहीं कैसी मंहगाई छा रही है, क्या हम भिखारी दस प्रतिशत मंहगाई भत्ता भी न मांगें?
अरे, तुम्हारी तो दूसरी आंख भी खुल गई। जान-बूझ कर बंद किए बैठे हो और अपने आप को अंधा बताते हो! बेईमानी की भी हद होती है!
बाबूजी, पैसा देना हो दे दीजिए वरना आगे बढ़िए। व्यर्थ की बकवास करके हमारा समय नष्ट मत करिए। मैं बेईमान नहीं हूं। मैं तो अपने अंधे दोस्त की जगह आज भीख मांग रहा हूं, पूरी ईमानदारी के साथ, इसीलिए तो आंखें बंद किए बैठा था। आपके साथ तर्क-वितर्क करने में मेरी आंखें खुल गईं। रात नौ बजे तक मेरा अंधा मित्र सर्कस देख कर वापस आएगा और उसे यह बात पता चलेगी तो वह बहुत नाराज होगा। मैं अंधा नहीं हूं, यह बात सच है; मैं तो बहरा हूं जो सामने की सड़क पर बैठ कर भीख मांगता है।
तुम्हें शर्म नहीं आती? भले-चंगे जवान आदमी हो और भीख मांगते हो! लानत है तुम पर। कुछ मेहनत का काम क्यों नहीं करते?
बाबूजी, आप अपने रास्ते लगिए। कीमती समय आप मेरा नष्ट कर रहे हैं। आपको क्या पता कि भीख मांगने में कितनी मेहनत लगती है! और शर्म तो आपको आनी चाहिए, बातों ही बातों में मैंने आपकी जेब काट ली, देखिए, इसमें एक पैसा भी नहीं निकला और आप अपने को मेहनतकश मान कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं! आपको तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।
यहां तो प्रत्येक व्यक्ति भिखमंगा है लेकिन। सभी हाथ फैलाए हुए मांग रहे हैं--और मिल जाए, और मिल जाए। और उस मांगने के लिए उन्हें जो भी जीवन में झूठ आरोपित करने होते हैं, वे आरोपित करने को राजी हैं। जिनकी आंखें हैं, वे अंधे बने बैठे हैं; जिनके कान हैं, वे बहरे बने बैठे हैं; जो दौड़ सकते हैं, वे लंगड़े बने बैठे हैं; जो प्रबुद्ध हो सकते हैं, वे ऐसी गहरी नींद में सोए हैं कि घुर्रा रहे हैं!
अक्षय विवेक, ध्यान जागरण की प्रक्रिया है। और इस जागरण के रास्ते पर बहुत कुछ घटेगा। और तुम बहुत चौंकोगे भी, क्योंकि तुमने अपने भीतर जिन बातों की कभी कल्पना भी नहीं की थी, उनको तुम पाओगे। क्योंकि तुम अपने भीतर कभी गए ही नहीं--कितने आंसू दबे पड़े हैं; कितनी हंसियां मुरझाई हुई पड़ी हैं; कितना जीवन कुचला हुआ पड़ा है; कितनी आंखें, जो साफ हो जाएं तो तुम सारा अस्तित्व देख लो, धूल में दबी हैं; और कितने हीरे, जिनकी कोई कीमत नहीं आंक सकता, यूं पड़े हैं जैसे कूड़ा-करकट हो! और सबसे गहराई में छिपी पड़ी है तुम्हारी चैतन्य की अपार संपदा; सागर की तरह जिसकी कोई थाह नहीं, जिसकी कोई सीमा नहीं।
मगर उस तक पहुंचते-पहुंचते बीच में बहुत सी चीजें मिलेंगी और उन सारे संस्कारों को तुम्हें पार करना होगा। यह भी एक संस्कार है, जो तुम्हें सिखाया गया है, शरीर की दुश्मनी का। इसलिए यह उठ रहा है। ध्यान करोगे तो यह संस्कार उठेगा कि कैसे छुटकारा हो जाए अब इस शरीर से; अब तो यह शरीर भी बाधा मालूम पड़ता है!
यह तुम नहीं कह रहे हो, यह तुम्हारे पंडित-पुरोहित बोल रहे हैं। यह तुम्हारे भीतर ग्रामोफोन रेकार्ड है जो बोल रहा है। जब तुम अपनी निजता में पहुंचोगे तो न तो शरीर से मुक्त होने का सवाल है, न शरीर में बंधने की आकांक्षा है--जब तक है, आनंदित; जब नहीं है, तब भी आनंदित। फिर प्रभु की मर्जी सब कुछ है। फिर हम उसकी मर्जी के साथ जीते हैं।
इस समर्पण को ही मैं संन्यास कहता हूं।

दूसरा प्रश्न: भगवान!
आप कहते हैं कि ध्यान पुनः जन्म है और व्यक्ति छोटे बच्चों की भांति प्रतिभावान हो जाता है। क्या छोटे-छोटे बच्चे सच ही इतने प्रतिभा-संपन्न होते हैं?

योगेश!
निश्चय ही। प्रत्येक बच्चा ताजा पैदा होता है। उसका दर्पण निर्मल होता है। न विचारों की कोई भीड़-भाड़ होती उसके भीतर, न आकांक्षाओं का कोई जाल होता उसके भीतर, न अहंकार की अकड़ होती उसके भीतर--अभी उसके भीतर कुछ भी नहीं होता। अभी कोई उपद्रव खड़ा नहीं हुआ है।
उपद्रव खड़े होंगे अभी। हम शिक्षा देंगे उसको और उपद्रव खड़े करेंगे। न तो अभी वह हिंदू है, न मुसलमान है; न अभी उसे मस्जिद से लेना है कुछ, न मंदिर से लेना है कुछ। अभी तो हम उसे संसार की शिक्षा देंगे। अभी उसे अगर हम कहें भी कि तू राष्ट्रपति बन जा। तो वह कहेगा, क्यों? मैं क्यों बनूं राष्ट्रपति? अभी वह अपने में मस्त है। अभी तितलियों के पीछे दौड़ने में ऐसा मजा है, अभी तो समुद्रत्तट पर सीपियां बीन लेने में इतना आनंद है कि अगर हम उसको कहें भी कि धन कमा, तो वह हंसेगा। उसकी समझ में ही नहीं आएगा कि धन किसलिए? कि पद किसलिए?
लेकिन बीस साल, पच्चीस साल हमारी शिक्षण की प्रक्रिया से गुजर कर...और पच्चीस साल तुम सोचते हो कितना समय होता है? तुम्हारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा! और सबसे बहुमूल्य हिस्सा! क्योंकि फिर इतने ताजे भी तुम कभी नहीं होओगे, इतने जिंदा भी कभी नहीं होओगे। पच्चीस वर्ष की शिक्षाओं के बाद हम प्रत्येक बच्चे को विषाक्त कर देते हैं। उसको महत्वाकांक्षाओं से भर देते हैं; उसे राजनीति से भर देते हैं, कूटनीति से भर देते हैं; तरहत्तरह के झूठों से भर देते हैं। इसी सब में उसकी प्रतिभा दब जाती है। उसके दर्पण पर इतनी परतें जम जाती हैं धूल की कि दर्पण खो ही जाता है, फिर दर्पण में प्रतिबिंब बनता ही नहीं। नहीं तो प्रत्येक बच्चा प्रतिभा के साथ पैदा होता है।
इसे तुमने अनुभव भी किया होगा कि प्रत्येक बच्चा सुंदर मालूम होता है। उसकी आंखों में एक दमक मालूम होती है। उसके चेहरे पर एक चमक मालूम होती है। धीरे-धीरे दमक खो जाती है, चमक खो जाती है, सौंदर्य भी खो जाता है। कहां चला जाता है सारा सौंदर्य? हम छीन लेते हैं। हमारी पूरी की पूरी व्यवस्था अब तक की अमानवीय है।
दुनिया एक बिलकुल ही नयी शिक्षा के लिए आतुर है। एक नयी मनुष्यता के लिए, एक नये मनुष्य के लिए तैयारी करनी है। क्योंकि पुराना मनुष्य काम नहीं आया। और जो हमने मनुष्य बनाया था, उसमें कहीं कुछ बुनियादी चूकें हो गईं। वह ठीक था युद्ध के लिए, हत्या करने के लिए, मरने-मारने के लिए; लेकिन जीने की कला उसे नहीं आती थी। हमने सिखाया ही उसे यही था: छीना-झपटी, मारपीट, कलह,र् ईष्या, जलन, महत्वाकांक्षा, अहंकार। हमने उसे कोई प्रेम की शिक्षा तो दी नहीं। हमने उसे कोई प्रतिभा की शिक्षा तो दी नहीं। हमने यह तो नहीं किया कि उसकी प्रतिभा पर और धार रखते।
तुम जरा छोटे बच्चों की बातें सुनो, योगेश, और तुम्हें मेरी बात समझ में आ जाएगी।
बाप ने बेटे को डांटा। कहा, मैं जब बच्चा था तो कभी झूठ नहीं बोलता था।
बेटे ने अपने बाप की तरफ देखा और पूछा, फिर आपने झूठ बोलना कब से शुरू किया पिताजी? जब बच्चे थे तब झूठ नहीं बोलते थे। फिर कभी तो शुरू किया होगा, कब से शुरू किया?
उसकी आंख साफ देख रही हैं कि यह बात भी झूठ है। यह बात भी सरासर झूठ है। यह बाप का कहना कि मैं जब बच्चा था तो कभी झूठ नहीं बोलता था--यह भी झूठ है।
एक महिला ने अपने बच्चे को डबल रोटी पर मक्खन लगा कर दिया। उसे खाते-खाते बच्चा रोता रहा। मां ने पूछा, रोते क्यों हो? मैंने तो तुम्हें काफी बड़ा टुकड़ा दिया है!
इसीलिए तो मैं रो रहा हूं, क्योंकि यह लगातार छोटा होता जा रहा है।
यही तो स्थिति जिंदगी की है, लेकिन कितने लोगों को होश है? कितने लोगों के पास प्रतिभा है जो यह देख सकें कि हम रोज मर रहे हैं, कि जन्म के बाद सिवाय मरने के हम और कुछ भी नहीं कर रहे हैं, कि जिस दिन हम जन्मे हैं उस दिन से मरना शुरू हो गया है, कि रोटी का टुकड़ा रोज छोटा होता जा रहा है, कि मौत रोज करीब आती जा रही है! और हमने क्या तैयारी की है मौत के स्वागत की? मेहमान द्वार पर आने को है, हमने उसके स्वागत का क्या आयोजन किया है? मौत आएगी तो तुम्हें बिलकुल ही गैरत्तैयार पाएगी। तुम आलिंगन कर सकोगे मौत का? तुम शहनाई बजा सकोगे? तुम कह सकोगे कि आओ स्वागत है? कि कंपोगे, कि डरोगे, कि रोओगे, कि घबड़ाओगे, कि चीख-पुकार मचाओगे--कि और थोड़ी देर जी लेने दो?
जो आदमी मौत को सामने देख कर कहता है और थोड़ी देर जी लेने दो, वह आदमी जीया ही नहीं। अगर वह जीया होता, तो वह मरने को भी राजी होता; क्योंकि मरना, जिसने जीया है उसके लिए जीवन का शिखर है, जीवन की आत्यंतिक ऊंचाई है, गौरीशंकर है। लेकिन जो जीया ही नहीं उसके लिए मरना तो ऐसा लगता है कि बात ही खत्म हुई जा रही है, और हम तो जीए भी नहीं! तो जीवन यूं ही निकल गया, बिना जीए निकल गया! कारवां निकल गया, गुबार उड़ती रह गई! अब सिर्फ धूल ही धूल हाथ में मालूम पड़ती है, तो रोए न तो क्या करे? अलेक्जेंडर भी रोता हुआ मरता है! सिर्फ कोई बुद्ध जैसा व्यक्ति ही हंसते हुए विदा होता है--आनंदपूर्वक। जीवन ने बहुत दिया, जीवन को धन्यवाद देता हुआ, अनुग्रह से विदा होता है।
एक अध्यापक एक छोटे से बच्चे से बार-बार पूछ रहे थे, बता पानीपत की लड़ाई किसने लड़ी थी?
जब बहुत बार पूछने पर भी लड़का कुछ नहीं बोला, तो अध्यापक ने एक थप्पड़ जड़ दिया। लड़का रोते हुए बोला, मास्टरजी, मैं सच कहता हूं, मैंने नहीं लड़ी थी।
अब पानीपत की लड़ाई, सच तो यह है, यह मूढ़तापूर्ण बात है कि हम बच्चों को सिखाएं कि किसने लड़ी थी। यह मूढ़तापूर्ण बात है कि हम बच्चों को सिखाएं नादिरशाह के संबंध में और तैमूरलंग के संबंध में और चंगेज खां के संबंध में और औरंगजेब के संबंध में। यह पागलपन की बात है कि हम बच्चों को कहें कि तुम अतीत को घोंटो। यह निपट मूढ़तापूर्ण बात है। उनको जीना है भविष्य में और सिखाते हैं हम उनको अतीत!
यह यूं हुआ जैसे कोई बहुत पागल आदमी, मूढ़ आदमी कार बनाए और जहां ड्राइवर बैठता है वहां दर्पण भर लगा दे जिसमें पीछे का रास्ता दिखाई पड़े। जहां कांच होता है जिसमें से वह आगे का रास्ता देखता है, वहां दर्पण लगा हो--पूरा बड़ा दर्पण--कि पीछे का रास्ता दिखाई पड़े जहां से कार गुजर चुकी, और जहां जा रही है कार वहां का कुछ भी दिखाई न पड़े। तो क्या गति होगी? गति होगी या दुर्गति होगी?
यह कार गिरने ही वाली है किसी गङ्ढे में। यह उतरेगी ही गङ्ढे में। क्योंकि दिखाई वह रास्ता पड़ रहा है जिस पर अब चलना नहीं है, जिससे हम चल चुके; और वह रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है जिस पर चलना है। यह भी पता नहीं कि रास्ते की तरफ जा रहे हैं, कि दीवाल की तरफ जा रहे हैं, कि खड्ड की तरफ जा रहे हैं!
सच्ची शिक्षा वर्तमान में जीना सिखाएगी, और इतनी मेधा देगी कि हम भविष्य की तरफ देखने में समर्थ हो सकें। लेकिन अभी हमारी सारी शिक्षा अतीत-उन्मुख है। मगर हम बड़े बहानों से उसकी शिक्षा देते हैं, बड़ी तरकीबों से उसकी शिक्षा देते हैं। और ऐसे सुंदर बहाने हम खोज लेते हैं कि लगता है कि शिक्षा देने जैसी है। सारी दुनिया में यह चलता है।
मैं भी इतिहास का विद्यार्थी रहा। मेरी हमेशा झंझट रही अध्यापकों से। इस बात की झंझट रही कि मुझे लेना-देना क्या कि पानीपत की लड़ाई कहां हुई, क्यों हुई! सच तो यह है कि होनी ही नहीं थी। हुई ही क्यों?
मेरे अध्यापक कहते कि यह भी हद हो गई। तुमसे हम यह पूछ ही नहीं रहे हैं कि हुई क्यों या कि होनी नहीं थी कि होनी थी। हम पूछ रहे हैं--कहां हुई? किनके बीच हुई?
मैं कहता, मुझे लेना-देना क्या है? मुझे लड़ना नहीं। मैं पानीपत की लड़ाई के संबंध में क्यों समय खराब करूं? कुछ मूढ़ लड़े, कुछ मूढ़ पढ़ा रहे हैं वे जो लड़े उसको, और कुछ मूढ़ उसको याद करें--प्रयोजन क्या है? लेना-देना क्या है?
अगर अतीत के संबंध में भी कुछ बहुमूल्य कहना हो, तो बुद्ध के संबंध में कुछ कहो, महावीर के संबंध में कुछ कहो, कृष्ण के संबंध में कुछ कहो, क्राइस्ट के संबंध में कहो। इनके बाबत तो कोई खास चर्चा नहीं होती। इतिहास में ये तो पाद-टिप्पणियों में भी नहीं आते। इतिहास में तो गधों की चर्चा होती है--निपट गधों की, जिनको हमें बिलकुल ही भुला देना चाहिए। जो होने ही नहीं थे, पहली तो बात। और अगर हो गए तो अब उनको क्यों घसीटते हो? अब क्या उनकी याद करने की जरूरत है? कि किस सन में कौन सा राजा इंग्लैंड में राज्य करता था--क्या प्रयोजन है?
यह बच्चा ठीक कह रहा है कि पानीपत की लड़ाई मैंने नहीं लड़ी थी।
एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा, पिताजी, परमात्मा ने यह आकाश क्यों बनाया? आकाश की जगह छप्पर क्यों न बनाया?
किसी तरह उससे छुटकारा पाने के लिए...बाप अपना अखबार पढ़ रहा है और यह बेटा उसका ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछ रहा है जिनका कोई उत्तर भी नहीं हो सकता...बचने के लिए बाप ने कहा कि इसलिए बेटा, कि ऊपर से भूत-प्रेत नीचे उतर कर बच्चों को तंग न करें। अगर छप्पर होता तो भूत-प्रेत नीचे उतर आते। उसने इतना बड़ा आकाश बना दिया है कि उतरते-उतरते भी उनको सदियां लग जाएंगी। कहां उतरेंगे? उतर ही नहीं सकते। अनंतकाल लग जाएगा। इसलिए! अब मुझे पढ़ने दो।
बेटे ने कहा, एक सवाल और, तो फिर मास्टरजी कहां से आए? जब भूत-प्रेत उतर ही नहीं सकते, तो ये मास्टरजी कहां से आए?
यह बात मुझे जंचती है। क्योंकि मास्टरजी का कुल धंधा इतना है कि भूत-प्रेत के संबंध में पढ़ाना। जो बीत गया, वह भूत; जो अब नहीं है, वह प्रेत। अब औरंगजेब क्या है? भूत-प्रेत।
मगर हम बच्चों की प्रतिभा नहीं देख पाते। हम उनके प्रश्नों से बेचैन जरूर होते हैं। और बेचैनी का कुल कारण इतना होता है कि उनके प्रश्नों के अगर हम उत्तर दें तो हमें अपनी मूढ़ता दिखाई पड़नी शुरू होती है। हम उन्हें टालते हैं। हम अपने प्रश्नों से जबरदस्ती उनका मुंह बंद कर देना चाहते हैं। और हमारे हाथ में ताकत जरूर है कि हम उनके मुंह बंद कर सकते हैं।
एक बार एक मास्टर ने लड़कों से कहा कि कोई महत्वपूर्ण लड़ाई बताओ।
एक लड़के ने कहा, मेरे डैडी ने कहा है, घर की बातें बाहर नहीं बतानी चाहिए।
पति गुस्से में था। उसने पत्नी से कहा, मैं सारे घर में आग लगा दूंगा।
बच्चा हंसते हुए बोला, आपको चूल्हे में तो आग लगानी आती नहीं, इसी पर तो मां नाराज हो रही हैं, और आप सारे घर में आग कैसे लगा देंगे, जरा मैं भी सुनूं।
बच्चे चीजें सीधी देखते हैं, साफ देखते हैं कि चूल्हा जलता नहीं इनसे, और घर में आग लगाने की बात कर रहे हैं! चूल्हा ही जल जाता तो झगड़ा ही क्यों खड़ा होता? मां इसीलिए तो नाराज हो रही हैं कि चूल्हा नहीं जला पाए।
एक बच्चा दूसरे से: तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं?
दूसरा: लोगों में सुख-दुख बांटते हैं।
पहला: अरे, क्या वे भगवान हैं?
दूसरा: नहीं, पोस्टमैन हैं।
एक अध्यापक ने पूछा, घटना व दुर्घटना में फर्क समझाओ।
बच्चे ने कहा, अगर विद्यालय में आग लग जाए, तो वह घटना होगी। और अगर आप आग में बच जाएं, तो वह दुर्घटना होगी।
छोटा लड़का पहले दिन स्कूल गया। वहां से लौट कर आया तो मां ने पूछा, कैसा लगा? स्कूल कैसा लगा, बेटा?
ठीक था। लेकिन मम्मी, हमारे मास्टरजी बड़े मूर्ख हैं, उन्हें कुछ नहीं आता; हर बात बच्चों से पूछते हैं।
छोटे बच्चों को अगर तुम गौर से निरीक्षण करो तो तुम उनमें एक स्पष्ट प्रतिभा पाओगे; एक सूझ-बूझ पाओगे; एक मौलिकता पाओगे। लेकिन हम इस मौलिकता को मार डालते हैं। हम इस मौलिकता को सहारा नहीं देते, हम इसको पोषण नहीं देते; हम इसकी हत्या कर देते हैं। अगर इस मौलिकता को पोषण मिले तो इस दुनिया में इतना सौंदर्य हो सकता है, इतने अदभुत व्यक्ति हो सकते हैं...और प्रत्येक व्यक्ति के फूल अलग-अलग होंगे।
मगर हम सबको तोड़-मरोड़ कर, यंत्रवत, एक जैसा बना देते हैं। हमारी पूरी फिक्र इस बात की है कि किस तरह हम सबको एक सांचे में बिठा दें, एक सांचे में ढाल दें! हमारे स्कूल और विद्यालय और विश्वविद्यालय अभी विद्यापीठ कहलाने योग्य नहीं हैं। अभी तो वे फैक्टरियां हैं जहां हम आदमियों को मशीनों में ढालते हैं। अभी वहां हम चेतना को जन्म नहीं देते। अभी हम चेतना की हत्या करते हैं वहां। अभी वहां हम जहर निर्मित करते हैं।
मगर जहर को हमने इतने अच्छे नाम दे रखे हैं कि हमें भी पता नहीं चलता, औरों को भी पता नहीं चलता कि यह जहर है। जब तुम बच्चों को कहते हो कि प्रथम आना, तो तुम उन्हें महत्वाकांक्षा सिखा रहे हो; तुम उन्हें युद्ध सिखा रहे हो; तुम उन्हें अहंकार सिखा रहे हो। एक तरफ तुम उनसे कहते हो कि प्रथम आना और दूसरी तरफ तुम उनसे कहते हो कि विनम्रता सीखो! तुम विरोधाभास भी नहीं देखते। एक तरफ कहते हो अहंकार बुरी चीज है, और दूसरी तरफ कहते हो कि महत्वाकांक्षा अगर नहीं होगी तो जीवन में विकास कैसे करोगे!
मेरी यह बात स्कूल के दिनों से ही कभी समझ में नहीं आई।
मेरे एक शिक्षक ईसाई थे। और धार्मिक ईसाई थे, नियम से चर्च जाते थे। मेरे गांव में ज्यादा ईसाई नहीं थे। और एक ही चर्च था। और चार-छह ईसाई परिवार थे। उनसे मैंने पूछा कि आप बाइबिल पढ़ते हैं, बाइबिल में जीसस ने कहा है: धन्य हैं वे जो अंतिम होंगे, लेकिन कक्षा में आप यह व्यवहार नहीं करते। आप कैसे ईसाई हैं? जो अंतिम बैठे हैं वे धन्य हैं या जो प्रथम पंक्ति में बैठे हैं वे धन्य हैं?
उन्होंने मुझसे कहा कि देखो, ऊलजलूल बातें नहीं पूछा करो।
इस बात को मैं भूल ही नहीं सकता कि यह आदमी, जो बाइबिल पढ़ता है, चर्च जाता है, यह इस बात को ऊलजलूल कहता है! मैंने कहा, अगर यह बात ऊलजलूल है, तो बाइबिल में आग लगा दो। मैं यह जानना चाहता हूं कि मैं कहां बैठूं? आप साफ-साफ कर दो। यूं मैं पीछे ही बैठना पसंद करता हूं। क्योंकि पीछे बैठने के कई फायदे हैं।
उन्होंने कहा, तुम्हारा मतलब?
मैंने कहा, पीछे बैठ कर ताश खेलो, उपन्यास पढ़ो, कंकड़-पत्थर फेंको, लोगों के कपड़े खींचो...। मैं तो जीसस की बात का मतलब बिलकुल ठीक समझ गया कि धन्य हैं वे जो अंतिम हैं! मगर मुझे आप आगे बैठने को कहते हैं!
वे कहते, इसीलिए तो हम आगे बैठने को कहते हैं कि तुम बिलकुल आंख के सामने होने चाहिए।
तो फिर मैंने कहा कि वह वचन जीसस का क्या होगा?
फिर वे बोले कि ऊलजलूल बातें न करो!
सारी शिक्षा आदर किसको देती है? जो प्रथम आ जाए उसको आदर, उसको सम्मान, उसको प्रतिष्ठा, उसको गोल्ड मेडल। और आश्चर्य की बात तो यह है कि अब जैसे अभी कलकत्ता की मदर टेरेसा को नोबल प्राइज मिली, तो मदर टेरेसा भी इनकार न कर सकी नोबल प्राइज लेने से! ऐसी निष्णात ईसाई होकर भी यह पुरस्कार लेने से इनकार नहीं कर सकी। और यह पुरस्कार लेने के बाद जगह-जगह सम्मान शुरू हो गए। तब से साल भर बीत चुका है, सम्मान चल रहे हैं। सेवा वगैरह तो अब भूल ही गई। अब सेवा वगैरह की फुरसत कहां है! आज लखनऊ में सम्मान है, कल कलकत्ते में सम्मान है, परसों मद्रास में सम्मान है, फिर दिल्ली में सम्मान है, फिर हिंदुस्तान के बाहर। जगह-जगह सम्मान हो रहे हैं। अब सेवा वगैरह का तो सवाल ही कहां है! वह नोबल प्राइज क्या मिली, अब सारे विश्वविद्यालयों को डी.लिट. देना है, और सारे लोगों को सम्मान बांटने हैं, और भारत-रत्न की उपाधि देनी है। अब तो सम्मान ही सम्मान लेने में समय गुजरना है।
और जीसस कहते हैं: धन्य हैं वे जो अंतिम हैं।
अगर ईसाई होती यह महिला, तो इसे कहना था कि हमें नोबल प्राइज नहीं चाहिए। इससे तो ज्यां पाल सार्त्र कहीं ज्यादा ईमानदारी का काम किया। जब उसे नोबल प्राइज मिली, वह हालांकि ईसाई नहीं था, नास्तिक था...मगर इसीलिए तो मैं तुमसे कहता हूं कि अक्सर नास्तिक आस्तिकों से ज्यादा ईमानदार होते हैं। तुम्हारे तथाकथित आस्तिक बिलकुल बेईमान होते हैं। उनकी सबसे बड़ी बेईमानी तो यह होती है कि वे नास्तिकता की आग से गुजरे ही नहीं और आस्तिक हो गए! उन्होंने नहीं कहने की कभी क्षमता ही नहीं जुटाई और उन्होंने हां कह दिया! उनकी हां लचर-पचर तो होगी ही। उनकी हां में कोई जान तो हो नहीं सकती।
ज्यां पाल सार्त्र को जब नोबल प्राइज मिली तो उसने इनकार कर दिया। सधन्यवाद नोबल प्राइज वापस लौटा दी। और उत्तर में जो उसने बात कही वह बिलकुल ठीक कही। उसने कहा कि मैं नहीं मानता हूं, जो स्थापित समाज है उसके किसी मूल्य में मेरा भरोसा नहीं है, इसलिए इस स्थापित समाज के द्वारा किसी तरह का सम्मान स्वीकार करना समझौता होगा। मैं एक नया समाज चाहता हूं। मैं इस समाज का दुश्मन हूं; इसलिए इस समाज से किसी तरह का सम्मान लेना, रिश्वत लेना होगा। इस समाज से सम्मान लेना और फिर इसका विरोध करना, दोनों में संगति नहीं होगी। इसलिए क्षमा करें, मैं यह पुरस्कार नहीं ले सकता हूं। यह पुरस्कार आप उन चापलूसों को दें जो स्थापित न्यस्त स्वार्थों के हित में हैं।
इतनी भी हिम्मत मदर टेरेसा न कर सकी। और यह जीसस की अनुयायी है, गले में क्रॉस टंगा हुआ है! मगर इस क्रॉस का कोई मूल्य नहीं है, इसका कोई अर्थ नहीं है। प्रथम होने की दौड़ में अगर मौका मिल जाए, तो कौन पीछे होना चाहेगा? यह मदर टेरेसा मर कर भी अगर साथ ले जा सके नोबल पुरस्कार का तगमा, तो लेकर पहुंचेगी स्वर्ग। परमात्मा को दिखाएगी कि मैं कोई साधारण महिला नहीं हूं, यह देखो नोबल पुरस्कार का तगमा लेकर आई हूं। किसी और ईसाई सेवक को नहीं मिला, सिर्फ मुझको मिला है। मैं सब सेवकों में प्रथम हूं। किसी पोप को भी नहीं मिली नोबल प्राइज, और मुझे मिली है। मुझे स्थान विशेष मिलना चाहिए अब स्वर्ग में।
मुझे ज्यां पाल सार्त्र की बात में अर्थ मालूम पड़ता है, संगति मालूम पड़ती है, ईमानदारी मालूम पड़ती है। यद्यपि वह नास्तिक है--न वह ईश्वर में मानता है, न वह मानता है कि जीवन का कोई अर्थ है, न वह मानता है कि कोई आत्मा है जो बचेगी--मगर फिर भी उसकी हिम्मत, उसका साहस, उसका बल! एक बात उसको साफ दिखाई पड़ती है कि जिस समाज के सारे मूल्यों का मैं विरोध करता हूं, उस समाज से कोई सम्मान मैं कैसे स्वीकार कर सकता हूं!
जैसे मुझे कोई भारत-रत्न की उपाधि दे, तो मैं कैसे स्वीकार कर सकता हूं! असंभव! क्योंकि मैं देशों के विरोध में हूं। मैं किसी देश का रत्न नहीं हो सकता। कंकड़-पत्थर होना ठीक। मैं किसी देश का रत्न नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो फिर राष्ट्रीयता में मान लेना हो जाएगा। वह तो राष्ट्रीयता को स्वीकार कर लेना हो जाएगा। मैं तो मानता नहीं कि पृथ्वी को विभाजित होना चाहिए। मैं तो मानता नहीं कि पासपोर्ट होने चाहिए। मैं तो मानता नहीं कि लोगों को एक-दूसरे देश में जाने में कोई बाधा होनी चाहिए।
प्रत्येक देश का विधान कहता है: आवागमन की स्वतंत्रता। मगर कुछ स्वतंत्रता वगैरह क्या खाक है! क्या आवागमन की स्वतंत्रता है? अपने ही देश में आवागमन की स्वतंत्रता नहीं होती। आसाम में ही जो भारतीय रह रहे हैं, वे भी विदेशी हैं! भारत के ही लोग, मगर वे भी विदेशी हैं, क्योंकि एक खास तारीख के बाद वे वहां पहुंचे। उसके पहले पहुंचते तो देशी होते, उसके बाद पहुंचे तो विदेशी हैं!
मुझे कोई नोबल प्राइज दे, मैं स्वीकार नहीं कर सकता।
सच तो यह है कि जिस व्यक्ति ने नोबल प्राइज स्थापित की, तुम्हें पता है वह कौन था? जिस आदमी ने नोबल प्राइज शुरू की, वह आदमी दुनिया का सबसे बड़ा अस्त्र-शस्त्रों का उत्पादक था--नोबल। पहला महायुद्ध उसके ही अस्त्र-शस्त्रों से लड़ा गया। वह दुनिया का सबसे बड़ा बमों का बनाने वाला आदमी था। यह सारा धन जो नोबल प्राइज में मिल रहा है लोगों को, उसने बमों और हत्याओं और युद्धों से कमाया था। फिर उसे पश्चात्ताप होने लगा बुढ़ापे में कि यह मैंने क्या किया! उसे अपने हाथ खून से रंगे हुए मालूम पड़े। उसे दिखाई पड़ा कि मैंने जीवन भर जो किया है, वह पाप है निहित, निश्चित रूप से पाप है। मेरा सारा धन खून से निचुड़ा हुआ है। लाखों लोग मेरे कारण मरे और कटे हैं। अब मैं क्या करूं! वह मरते वक्त घबड़ाया होगा कि अब शायद जवाब देना पड़ेगा। परमात्मा का आमना-सामना मैं कैसे करूंगा!
तो प्रायश्चित्त करने के लिए उसने नोबल प्राइज शुरू की। सारी संपत्ति को उसने ट्रस्ट बनाया। और निश्चित ही उसने काफी संपत्ति इकट्ठी की होगी। प्रत्येक वर्ष हर विषय में नोबल प्राइज दी जाती है। और एक-एक नोबल प्राइज...करीब अठारह लाख रुपया एक-एक नोबल प्राइज के साथ मिलता है। और उसने इंतजाम ऐसा किया है कि यह सदा चलता रहेगा। यह सिर्फ ब्याज से चल रहा है! ये करोड?ो रुपए जो प्रतिवर्ष बांटे जाते हैं, यह सिर्फ ब्याज है उसकी संपत्ति का।
उसने तो प्रायश्चित्त किया है, मगर किसी ईसाई में तो यह हिम्मत होनी चाहिए कि इस खून से भरे हुए पैसे को, इस लहूलुहान हाथ से दिए गए पैसे को लेने से इनकार कर दे। और ऐसा नहीं है कुछ कि प्रायश्चित्त करके नोबल ने अपने कारखाने बंद कर दिए। कारखाने जारी रहे।
यही तो मजा है तथाकथित धार्मिक लोगों का। गंगा भी नहा आते हैं, पाप से छुटकारा भी हो गया, जब पाप से छुटकारा हो गया तो फिर पाप करने के लिए छूट हो गई। अब फिर करो, फिर नहा लेना गंगा। कारखाने भी जारी रहे, बम भी बनते रहे, वे उसके बेटे सम्हाल रहे हैं, वे उसके बच्चे सम्हाल रहे हैं, और उसने जो कमाई की थी, उसने उसका एक ट्रस्ट भी बना दिया, उससे पुरस्कार भी बंटते रहेंगे। शांति का पुरस्कार भी मिलता है, सेवा का पुरस्कार भी मिलता है, वैज्ञानिक शोधों के लिए पुरस्कार मिलता है! और मिलता है किसकी संपत्ति से? इस सदी के सबसे ज्यादा बड़े हत्यारे आदमी की संपत्ति से। उसने तो गंगा नहा ली, ठीक। मगर गंगा नहा लेने से भी कृत्यों में कोई भेद नहीं पड़ता। वही के वही कृत्य जारी रहते हैं।
मगर ईसाई में भी कहां इतनी हिम्मत होती है। और उससे भी कहो, तो वह भी कहेगा, क्या बकवास लगा रखी है!
छोटे बच्चों में स्पष्टरूपेण देखने की क्षमता होती है, आर-पार देख सकते हैं।
एक छोटा-बच्चा चर्च से घर आया। उसकी मां ने पूछा, आज पादरी ने क्या पढ़ाया?
उस बच्चे ने कहा, आज पादरी ने बताया मोजेज के संबंध में कि जब मोजेज इजिप्त से अपने अनुयायियों को लेकर आया और बीच में समुद्र पड़ा, तो उसने अपने सारे इंजीनियर लगा दिए। बड़ी-बड़ी दीवालें उठाईं इंजीनियरों ने, समुद्र को दो हिस्सों में काट दिया। दुश्मन पीछा कर रहा है। और उसकी सेनाएं और उसके मित्र, सब उन दीवालों के बीच से गुजर कर समुद्र को पार कर गए। और जैसे ही वे इस पार हुए और दुश्मन की सेनाएं पीछे आईं कि दीवालें एकदम गिर गईं। इस ढंग से दीवालें बनाई गई थीं कि इंजीनियरों ने बटन दबाया कि दीवालें गिर गईं, समुद्र अपनी जगह हो गया। दुश्मन उस पार और मूसा और उसके अनुयायी इस पार।
मां ने कहा कि सच में तेरे पादरी ने यह कहानी तुझे सुनाई है?
उसने कहा, मम्मी, अब तुमसे क्या कहना, जिस ढंग से उसने सुनाई अगर मैं तुम्हें सुनाऊंगा, तो तुम मानोगे ही नहीं। इसलिए मैं उसको वैज्ञानिक बना कर सुना रहा हूं, ताकि तुम्हारी समझ में आ सके और तुम मान सको। उसने तो बिलकुल ऊलजलूल...गप्प मार रहा था। वह तो कह रहा था कि मोजेज आए, न इंजीनियर, न स्थापत्य के जानकार, न कोई, न कोई, एकदम चमत्कार हुआ और परमात्मा ने समुद्र को दो हिस्सों में बांट दिया। यह कहीं हो सकता है? और वे निकल गए बीच में से, समुद्र खुद खड़ा रहा कटा हुआ। और जब वे निकल गए तो परमात्मा ने दूसरा चमत्कार किया, समुद्र को वापस जोड़ दिया। उसने तो ऐसी झूठी कहानी सुनाई थी, मगर यह तो मैं तुमको ढंग से सुना रहा हूं।
बच्चे देख लेते हैं कि कहां की बात झूठ हो रही है, कहां तक बात सच हो रही है। छोटे बच्चों से कहो कि जीसस का जन्म हुआ था कुंआरी कन्या से। वे भी चकित होकर सुनते हैं यह बात।
एक बच्चा अपने बाप से पूछ रहा था कि मैं कहां से आया? बाप बैठा अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहा है बाहर। इससे छुटकारा पाने के लिए...मां-बाप ने बच्चों से छुटकारा पाने के लिए खूब कहानियां गढ़ी हुई हैं। कोई कहता है परमात्मा छप्पर से डाल देता है। कोई कुछ, कोई कुछ।...सामने से ही एक बगुला उड़ा जा रहा था। बाप ने कहा, यह बगुला देखता है, बगुला ही तुझे लाया।
उस लड़के ने कहा कि डैडी, इसका यह मतलब कि तुम जो हरकतें मम्मी के साथ करते हो वे ही बगुले के साथ भी करनी शुरू कर दीं! शर्म नहीं आती? अगर मम्मी को पता चल गया तो ऐसी मुसीबत खड़ी होगी! और मैं मम्मी को बताऊंगा कि तुम क्या-क्या काम में लगे हुए हो।
बच्चे भलीभांति जानते हैं। लेकिन हम बच्चों की आंखों में धूल झोंके चले जाते हैं। हम कुछ भी उनको समझाते चले जाते हैं। और सोचते हैं हम धूल झोंकने में समर्थ हो रहे हैं। बच्चे हंसते हैं। मगर जल्दी ही वे भी हमारी बेईमानी के शिकार हो जाते हैं। उन्हें भी अपनी प्रतिभा खोनी पड़ती है।
मेरे गांव में मेरे पिता के एक मित्र थे--पंडित भागीरथ प्रसाद द्विवेदी। वे गांव के बड़े प्रतिष्ठित वैद्य थे। और वैद्य से भी ज्यादा, उनका घर ब्रह्मज्ञानियों का अड्डा था। वहां सत्संग चलता ही रहता था। कभी कोई महात्मा आएं, कभी कोई महात्मा आएं; कभी करपात्री जी ठहरे हुए हैं, कभी शंकराचार्य आए हुए हैं, कभी कोई और बाबा आए हुए हैं। मतलब यह कि शायद ही कभी ऐसा होता हो कि उनका घर खाली हो। और वहां सत्संग जारी रहता। मैं भी वहां पहुंच जाता। मुझे देख कर ही वे मुझे पास बुलाते और कहते, देखो, बिलकुल चुपचाप बैठना। कुछ प्रश्न वगैरह नहीं करना। बड़े जब हो जाओगे, तब सब समझ में अपने आप आ जाएगा। अभी प्रश्न करने की कोई जरूरत नहीं।
मगर मुझसे रहा न जाता, जब मैं बेवकूफी की बातें सुनता, तो मुझसे रहा न जाता। हालांकि वे मुझ पर गुर्राते, आंखें दिखलाते, मगर फिर मैं उनकी तरफ देखता ही नहीं, फिर तो महात्मा से मुझे जो कहना होता, कह लेता।
धीरे-धीरे उनके घर आने वाले सारे महात्मा और करीब-करीब भारत के सारे महात्मा, महात्माओं से मेरा परिचय बचपन से उन्हीं के घर हुआ, वे भी मुझे जानने लगे। वे उनसे कहते कि देखो, यह छोकरा नहीं आना चाहिए। यह आया कि यह कुछ ऐसी बात पूछेगा, पूछेगा ही, कि जिसमें झंझट खड़ी होती है। और दूसरे लोगों पर भी प्रभाव कम होता है। इसको डांटो-डपटो तो यह मानता भी नहीं। डांटने-डपटने से यह और उलटा तेजी में आ जाता है। अगर इस पर गुस्सा हो जाओ, तो यह कहता है कि यह कैसा महात्मापन है कि बस जरा से में गुस्सा आ गया। और अभी समझा रहे थे अक्रोध, और भूल ही गए, और खुद ही क्रोध में आ गए! और अभी कह रहे थे कि मनुष्य को जल में कमलवत रहना चाहिए, और अब क्या हुआ! जरा चाबी घुमाई कि भूल ही गए कि जल में कमलवत रहना है, एकदम डुबकी मार गए जल में! यह कुछ न कुछ गड़बड़ करता है।
तो वे मेरे पिता को खबर भेज देते थे कि महात्मा आए हैं आज हमारे घर में, तुम्हारे बेटे को पता न चले। मगर मैं उनके घर के सामने से दिन में दो दफे निकलता ही था।
और उनकी पत्नी महात्माओं के खिलाफ थी, स्वभावतः, क्योंकि इनकी सेवा करते-करते थक मरी थी वह। और एक से एक मूढ़ों की सेवा उसको करते-करते...। तो अगर मुझे पता भी न चले, उनकी पत्नी खबर भिजवा दे कि बेटा, तू आ जाना। लगा दे इसको ठिकाने। मैं तो कुछ कर नहीं सकती, क्योंकि वह पतिदेव के पीछे।...उनकी पत्नी महात्माओं से भी ज्यादा मेरी सेवा करती थी। मालपुए खिलाती, यह करती...कि बिलकुल ठिकाने लगा दे इस महात्मा को। ऐसा ठिकाने लगाओ कि यह कभी आए ही नहीं वापस।
तो मैं भी उनसे कहता कि मैं क्या करूं, मुझे तो पता ही नहीं था, संदेश आपके घर से ही मिला है।
वे कहते कि भेजा होगा मेरी पत्नी ने। मैं जानता हूं उसको कि वह तेरे पक्ष में है। और वह क्यों तेरे पक्ष में है, वह भी मैं जानता हूं। वह मुझसे बदला ले रही है तेरे द्वारा।
मैंने कहा, तुम अपने महात्माओं को क्यों नहीं कहते कि जवाब क्यों नहीं देते! सत्संग का मतलब ही यह है कि जवाब दे दो। और मैं कोई कठिन सवाल नहीं पूछता, सीधे-सादे सवाल पूछता हूं।
अब एक महात्मा समझा रहे थे कि रामचंद्र जी सोने के हिरण के पीछे भागे और तभी रावण आया और सीता को चुरा ले गया। मैंने कहा, ठहरो, तुमने रामचंद्र जी को इतना बुद्धू समझा है? उनको भी इतनी अकल नहीं है? गधे से गधे आदमी को यह अकल होती है। अगर मुझे भी--मैं निपट गंवार हूं समझो--मुझे भी अगर सोने का हिरण दिखाई पड़े, तो मैं मानूंगा नहीं कि यह सचाई हो सकती है। हिरण कहीं सोने के होते हैं? तुम अपनी ही कहो, अगर तुम्हें कहीं रास्ते पर हिरण दिखाई पड़ जाए और सोने का, तो तुम उसके पीछे जाओगे?
वे कहते, नहीं, मैं पीछे नहीं जाऊंगा।
तो मैंने कहा, तुम सोचते हो कि रामचंद्र जी तुमसे भी ज्यादा गए-बीते थे? सोने के हिरण के पीछे चले गए! सोने के कहीं हिरण होते हैं? इतनी अकल तो उनमें होनी चाहिए। अरे जो कहते हैं कि सारा जगत मृग-मरीचिका है, वे मृग की ही मरीचिका में आ गए, हद हो गई!
जवाब नहीं है तो बेचैनी खड़ी होती, पसीना छूट जाता, गुस्से में आ जाते।
मेरा अपना अनुभव यही है कि छोटे बच्चों को अगर मौका मिले...। उन्हें हम मौका ही नहीं देते। हम उन्हें डांट-डपट कर रखते हैं, अवसर ही नहीं देते, नहीं तो तुम पाओगे कि उनके पास से ताजगी और उनके पास से मौलिक सूझ-बूझ, दृष्टि...। और हम अगर उनको सहारा दें, तो हम उनकी दृष्टि को निखार सकते हैं, उसे बलवान बना सकते हैं।
छोटे बच्चों के पास जो क्षमता है, अब तक हमारी सारी चेष्टा उसे नष्ट करने में लगी रही है, इसीलिए मनुष्य-जाति इतनी मूढ़ है, अन्यथा बुद्धों से भरी होती। और बुद्धों से भर सकती है पृथ्वी, मगर हमें काम बच्चों से ही शुरू करना पड़ेगा। और जब तक हम बच्चों की प्रतिभा को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम मनुष्य को बदलने में समर्थ नहीं हो सकते हैं।

तीसरा प्रश्न: भगवान!
आपके पास आते-आते मेरी बुद्धि खो गई है। मैं क्या करूं?

प्रेम चैतन्य!
यह तो होना ही चाहिए। जो होना था, वही हुआ है। लेकिन तुम शायद मन में अपेक्षा और ही लेकर आए होओगे। मेरे पास जो लोग आते हैं प्रारंभ में, वे यही सोच कर आते हैं कि ज्ञानी होकर लौटेंगे, थोड़ा ज्ञान लेकर लौटेंगे। नये-नये लोग जो प्रश्न मुझे लिखते हैं, उनमें यही होता है कि भगवान, हमें ज्ञान दें।
ज्ञान तुम्हारे पास काफी है, जरूरत से ज्यादा है। वही तो तुम्हारे प्राण ले रहा है। सदगुरु वह है जो तुम्हारा ज्ञान छीन ले। ज्ञान तो तुम्हें दे दिया है न मालूम किन-किन ने! सब तुम्हें ज्ञान देने में लगे हुए हैं। मां-बाप दे रहे हैं, पड़ोसी दे रहे हैं, जो मिले वही ज्ञान दे रहा है। ज्ञान देने में कोई कमी है? तुम लो न लो, यह तुम्हारी मर्जी, मगर देने वाले दिए ही चले जाते हैं।
इस दुनिया में सबसे ज्यादा मुफ्त दी जाने वाली चीज सलाह है। हर कोई देता है। तुम न भी मांगो तो लोग देते हैं! तुम नहीं लोगे, यह भी जानते हैं, फिर भी देते हैं! और ऐसी सलाहें देते हैं जो उन्होंने खुद नहीं मानीं अपने जीवन में, वे भी तुम्हें दे रहे हैं सलाहें! सलाह देने में तो लोग बिलकुल ही कृपण नहीं होते, कंजूस नहीं होते।
मगर सदगुरु सलाह नहीं देता, ज्ञान नहीं देता, बुद्धि नहीं देता--बुद्धि छीन लेता है। जिसको तुम बुद्धि समझते हो, उसको छीन लेता है। अभी तुम्हारी बुद्धि कहां तुम्हारी है! अभी तो सब उधार है, बासी है। इसके छिन जाने पर ही तुम्हारी अपनी निजता आविष्कृत होती है। तुम्हारे भीतर अंकुरित होती है प्रतिभा। तुम्हारी मेधा बढ़नी शुरू होती है, उसमें अंकुर आते हैं, पत्ते लगते हैं, फूल खिलते हैं।
यह तो अच्छा हुआ। मगर तुम्हें अड़चन हो रही होगी, क्योंकि तुम आए कुछ और खयाल से, और हो गया उलटा।
सदगुरु के पास होना, है तो मामला ही उलटा। इसलिए तो जो चालाक हैं, चालबाज हैं, वे भागे-भागे रहते हैं, दूर-दूर रहते हैं, बचे-बचे रहते हैं; बचने के न मालूम कितने उपाय खोज लेते हैं, कितने बहाने खोज लेते हैं, कितने तर्कजाल बिछा लेते हैं अपने चारों तरफ।
इसीलिए तो मेरे जैसे व्यक्तियों के खिलाफ इतनी झूठी अफवाहें उड़ाई जाती हैं। वे इसीलिए उड़ानी पड़ती हैं। उनके पीछे मनोविज्ञान है। और उनको मानने वाले लोग मिल जाते हैं। मानने के पीछे भी अर्थ है। कौन उन झूठी अफवाहों को मान लेता है? वही मान लेता है जो बचना चाहता है। उन झूठी अफवाहों को मान कर वह अपने को भरोसा दिला लेता है--जाने की कोई जरूरत नहीं, ऐसे आदमी के पास क्या जाना! क्या हम पागल हैं जो ऐसे आदमी के पास जाएं!
जो आ जाता है यहां, वह गलत कारणों से आता है। अक्सर तो गलत कारणों से ही तुम आओगे। तुम्हारे पास ठीक कारण कैसे हो सकते हैं?
रमण महर्षि से एक जर्मन प्रोफेसर ने कहा कि मैं आपके पास कुछ सीखने आया हूं, अध्यात्म सीखने आया हूं। रमण महर्षि ने कहा, फिर तुम कहीं और जाओ। अगर सीखना है, तो कहीं और जाओ। अगर भूलना हो, तो यहां रुको। जितना तुम्हें अध्यात्म आता है, वह भी यहां भुलाना हो, तो रुक जाओ। भुलाने का काम मैं करता हूं।
मेरा काम भी यही है कि तुम्हारी स्लेट पट्टी को साफ कर दूं। मैं ये जो उत्तर दे रहा हूं तुम्हें, ये तुम्हारे ज्ञान को बढ़ाने के लिए नहीं हैं, ये तो एक कांटे से दूसरा कांटा निकाल लेने वाली बात है। एक कांटा तुम्हें लगा है, वह दूसरे कांटे से निकाल रहा हूं, फिर दोनों कांटे फेंक देने हैं।
मगर प्रथमतः प्रेम चैतन्य, यह झंझट होती है जब उलटा हो जाता है। तुम आए कुछ सोच कर, हो गया कुछ। तुम आए थे सोच कर कि आवागमन से छुटकारा पाना है, और यहां आकर तुम्हें पता चला कि यह बात ही मूढ़तापूर्ण है। छुटकारा किसी चीज से नहीं पाना है। छुटकारा पाने का खयाल ही मौलिक रूप से जीवन-विरोधी है। तुम आए थे ज्ञान इकट्ठा करने कि थोड़े ज्ञानी होकर लौटोगे, थोड़े पंडित होकर लौटोगे। यहां आकर पता चला कि पांडित्य मूढ़ता को छिपाने का उपाय है। पंडित से तो बेहतर है अज्ञानी। तो स्वभावतः एकदम घबड़ाहट होती है कि यह तो सब उलट-पुलट हुआ जा रहा है!
चंदूलाल को उदास देख कर नसरुद्दीन बोला कि क्या बात है भई, बड़े उदास लग रहे हो!
चंदूलाल बोले, क्या बताऊं यार, न ही पूछो तो अच्छा है। आजकल तुम्हारी भाभी के मोटापे की वजह से बहुत परेशान हो गया हूं। बात तो यहां तक बढ़ गई है कि सड़क पर उसके साथ निकलता हूं तो लोग कहने लगते हैं कि भाई चंदूलाल, माताजी को कहां ले जा रहे हो? यह सब सुन कर तो मैं शर्म से गड़ जाता हूं। दुनिया भर के यम-नियम, व्रत-उपवास, जो भी बन सका किया, मगर उसका मोटापा है कि कम होने का नाम ही नहीं लेता। और जब से उसे झाडूवाले बाबा से झड़वाया है, तब से तो और भी मोटी होनी शुरू हो गई है। अब तो तुम्हारा ही सहारा है। यदि तुम्हें इस संबंध में कुछ पता हो तो बताओ।
नसरुद्दीन कुछ क्षण तो आंख बंद किए सोचता रहा, फिर बोला, ऐसा करो, तुम एक महीने के लिए उन्हें हॉर्स-राइडिंग करवाओ। खुदा के फजल से शायद दुबली हो जाएं।
एक महीना बाद चंदूलाल जाते हुए दिखे तो नसरुद्दीन ने उन्हें रोक कर पूछा, क्यों भाई चंदूलाल, कुछ हुआ?
चंदूलाल बोले, हां मित्र, बिलकुल सूख कर आधी रह गई है। नसरुद्दीन तो प्रसन्नतापूर्वक बोले कि देखो, मैंने कहा था न...चंदूलाल बीच में ही बात काट कर बोले कि मियां, मैं तुम्हारी भाभी की नहीं, घोड़ी की बात कर रहा हूं! बिलकुल सूख कर आधी रह गई है। भाभी तो जैसी थीं, उससे दोगुनी हो गई हैं।
जब उलटा हो जाएगा, तो तुम चौंकोगे ही, हैरानी तो तुम्हें होगी ही। तुम क्या सोच कर आए और क्या हो गया!
इसलिए पूछते हो: "अब मैं क्या करूं?'
अब मत पूछो। बुद्धि खो गई, अब यह कर्तापन भी जाने दो। इतना बड़ा विराट जिस ऊर्जा से चल रहा है, उसी ऊर्जा के अंग तुम हो, उसको ही चलाने दो, तुम्हें भी चलाने दो। अब कहो कि जो तेरी मर्जी! जो करवाए, वह करो। खुद कर्ता न रहो। बांस की जैसे पोंगरी होती है पोली, ऐसे हो जाओ। गीत गाए--जो गाए--गुजर जाने दो गीत उसका।
संन्यास का यही अर्थ है, प्रेम चैतन्य। अपने को खो देना और परमात्मा के हाथों में इस तरह छोड़ देना कि जो करवाए उससे ही राजी, जो करवाए वही शुभ, वही सुंदर। तुम चकित होओगे, अपूर्व आनंद की वर्षा हो जाएगी, प्रसाद ही प्रसाद के फूल खिल जाएंगे, ऐसी सुगंध उठेगी, ऐसा संगीत जगेगा तुम्हारे भीतर कि तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। यह बुद्धि-अतीत मामला है। यह कर्ता के पार की बात है। यह तुम्हारे हाथ की बात नहीं है, यह विराट के साथ अपने को एक कर लेने का राज है। लहर अपने को सागर से अलग समझे कि बस उपद्रव में पड़ी और सागर से अपने को एक जाना कि सब उपद्रव शांत हुए, समाप्त हुए।
अच्छा हुआ तुम्हारी बुद्धि खो गई। धीरे-धीरे तुम भी गलोगे और खो जाओगे। यहां अगर बने ही रहे, भाग न गए, तो निश्चित खो जाओगे। और तब जो शेष रह जाता है, वही परमात्मा है।
इसलिए तो पलटू ने कहा न कि मैं पहले ही सचेत किए देता हूं कि दीवाल कहकहा, इस पर चढ़ कर मत झांकना--मत कोई झांकन जाय--क्योंकि जिसने भी झांका, वह खो गया। खोने की हिम्मत हो, तो कोई झांके। मिटने की हिम्मत हो, तो कोई झांके। मगर मिटने में कोई मिटता थोड़े ही है। वस्तुतः मिटने में ही पहली बार तुम होते हो। बूंद जब मिट जाती है तो सागर हो जाती है।
खो गई बुद्धि, अच्छा हुआ। यूं थी भी तो क्या कर लेते? क्या कर लिया था बुद्धि से? क्या पा लिया था? दुख ही देती थी। कांटे की तरह गड़ती थी, चुभती थी। और भी कुछ बचे हों कांटे, जाने दो।
अहंकार बचा है अभी भी, क्योंकि पूछ रहे हो: "अब मैं क्या करूं?'
अब यह मैं भी जाने दो। अब यह कर्ता भी जाने दो। अब चल ही पड़े तो क्या रुकना! अब चल ही पड़े तो क्या पीछे लौट कर देखना है!
चौथा प्रश्न: भगवान!
उस फल दी मैंनूं सख्त जरूरत है, जो कल आप सीता मैया और फली भाई को देने के लिए मा लक्ष्मी से कह रहे थे।
सदगुरु साहब, तुसी मैंनूं क्यों भूल गए?

संत महाराज!
मुझे क्या पता कि तुम भी अब वृद्धावस्था की अवस्था में आ गए हो। अच्छा किया तुमने बता दिया।
सीता मैया ने तो पत्र लिखा है कि भगवान, आपने कहा, उसके पहले ही मैंने वह फल खा लिया है। और जब से वह फल खाया है, बस ऊपर-ऊपर से बूढ़ी दिखती हूं, भीतर तो बच्ची जैसी हो गई हूं।
और यह बात सच है। नाचती-फुदकती रहती हूं। सीता मैया को तुम देखोगे तो तुम मानोगे यह बात कि नाचती-फुदकती रहती है। और फली भाई भी खा चुके हैं, कहें कि न कहें! ये राज की बातें हैं, कह देनी जरूरी भी नहीं हैं। सीता मैया नहीं रोक पाईं, कह गईं।
स्त्रियों से कुछ बात छिपती नहीं। इसलिए कहते हैं जो बात पूरे गांव में फैलानी हो, किसी एक स्त्री को बता दो। बस फिर तुम चिंता छोड़ो, चौबीस घंटे में पूरे गांव में अपने आप फैल जाएगी। अखबार में छपवाने की भी जरूरत नहीं, एक स्त्री को बता देना पर्याप्त है। हां, बताते वक्त इतना जरूर कह देना कि बाई, किसी और को न बताना। फिर तो निश्चित ही समझो, गारंटीड है मामला। अखबार में कोई पढ़े न पढ़े विज्ञापन!
अब फली भाई भी खा लिए हैं, मगर चुप। पुरुष छिपा सकता है बातों को। चुप्पी साधे हैं। कुछ कह ही नहीं रहे। मुस्कुरा लेते हैं बैठे-बैठे। यहीं सामने बैठे मुस्कुरा रहे हैं कि ये सीता मैया ने हमारा भी राज खोल दिया।
संत महाराज, तुम सीता मैया से मिलो। उसे पता है कि कौन सा फल खाना है।
इसीलिए तो आदमी ने कपड़े ईजाद किए। अगर कपड़े न होते तो बड़ा मुश्किल हो जाता। अगर कपड़े न होते...।
स्वामी अगेह भारती ने सुझाव दिया है कि भगवान, यह शुभ होगा, सुंदर होगा कि जो लोग भी आएं, वे कपड़े दरवाजे पर ही छोड़ दें और सभा में दिगंबर होकर बैठें। तो ये छुरा इत्यादि फेंकने वाले, छुरा वगैरह नहीं ला सकेंगे।
बात तो बड़े पते की है। यूं अगेह भारती थोड़े झक्की हैं, मगर कभी-कभी पते की बात कह देते हैं। मुझे तो बात जंची। और मजा आ जाएगा। अखबारों में तहलका मच जाएगा। सोचेंगे अगेह, विचारेंगे इस पर। मामला ठीक है, बस गड़बड़ यह हो जाएगी कि अब जैसे अगर यह बात हो गई होती, तो फली भाई और सीता मैया का जब नाम लिया तो मैंने संत महाराज का भी नाम लिया होता--कपड़े अगर न होते। कपड़े की भ्रांति से मैं समझा कि संत महाराज अभी काफी दूर हैं बुढ़ापे से। देखा, कपड़े कैसी भ्रांति पैदा कर देते हैं!
चंदूलाल एक महिला को अपना बगीचा घुमा रहे थे। महिला बड़ी बेचैन थी। सर्दी की सुंदर सुबह, मगर उसको पसीना आ रहा था, क्योंकि चंदूलाल की पतलून के बटन खुले हुए थे। और वह महिला परेशान थी कि कहीं और कोई न आ जाए। और कहे तो चंदूलाल से क्या कहे। और तभी देखा कि तीन-चार आदमी दरवाजे से प्रवेश किए। उस महिला ने कहा अब मारे गए, अब तो कहना ही पड़ेगा। तभी उसने कहा कि कोई न कोई तरकीब निकालनी पड़ेगी। महिलाएं ईजाद करने में होशियार होती हैं। और बातें ही ईजाद करनी हों, तो उनका कोई मुकाबला नहीं। उसने कहा कि सेठ चंदूलाल, आपके गैरेज का दरवाजा खुला हुआ है।
मगर चंदूलाल भी सिद्धपुरुष हैं। उनकी अकल में कुछ न घुसा। अकल हो तो कुछ घुसे। वे बोले, गैरेज का दरवाजा खुला हुआ है! तो मेरी नयी मर्सिडीज़ गाड़ी दिखाई पड़ रही है कि नहीं?
उस महिला ने कहा, धत तेरे की! असली मर्सिडीज़ गाड़ी? अरे वही एम्बेसेडर गाड़ी दिखाई पड़ रही है जिसमें बाबा आदम अदन के बगीचे से निकले थे, और जिसके चारों टायर पंक्चर, और जिसको बैलगाड़ी भी कहने में शर्म आए। कहां की मर्सिडीज़ लगा रखी है!
तब उनको होश आया कि माजरा क्या है! जल्दी से अपने बटन बंद किए।
अब संत महाराज, तुमने खुद ही कह दिया! कहते हो कि "सदगुरु साहब, तुसी मैंनूं क्यों भूल गए?'
ये कपड़ों की बदौलत भैया। मगर कुछ बात नहीं, अभी कुछ बिगड़ा नहीं, सीता मैया से मिलो।
ध्यान ही वह फल है जो ऐसा ताजा कर जाए, जो सदा के लिए युवा कर जाए। ध्यान को जिसने चखा, फिर न मौत है, न बुढ़ापा है। शरीर तो बूढ़ा होगा और शरीर तो मरेगा भी--वह तो शरीर का गुणधर्म है, उससे कुछ लेना-देना नहीं--लेकिन तुम न कभी जन्मे हो और न तुम कभी मरोगे। तुम न कभी बच्चे थे, न तुम कभी जवान हुए, न तुम कभी बूढ़े होओगे। तुम तो शाश्वत हो, तुम तो अजर-अमर हो। मगर तुम्हारे इस होने का स्वाद ध्यान के फल से ही लगता है!
ध्यान का फल चखो। सीता मैया चख रही हैं, फली भाई चख रहे हैं, और लोग चख रहे हैं। और संत महाराज, चख तो तुम भी रहे हो, कह नहीं रहे। लोभी हो। चख भी रहे हो और सोचा होगा कि शायद कहीं और भी तो फल नहीं हैं इससे, नहीं तो हम यह ध्यान को ही चखते रहें और लोग आगे और भी कुछ चख रहे हों--समाधि वगैरह चख रहे हों--तो पूछ ही लेना उचित है!
नहीं, तुम ठीक रास्ते पर चल रहे हो। इसी रास्ते से वह क्रांति घट जाएगी जहां सब ताजा हो जाता है, सदा के लिए ताजा हो जाता है; फिर कभी बासा होता ही नहीं।

आखिरी प्रश्न: भगवान!
मैं ज्योतिष छोड़ कर कवि हो जाऊं तो कैसा रहे?

पंडित कृष्णदास शास्त्री!
तुम कोई झंझट में ही पड़ने को आतुर हो, तो तुम्हारी मर्जी। जब ज्योतिष ही नहीं चल रहा, तो कविता क्या खाक चलेगी! ज्योतिष तो, इतने मूढ़ हैं कि चल ही जाना चाहिए। अगर वह भी नहीं चल रहा, तो कविता का मामला तो बहुत मुश्किल है। तुम्हें इस देश में होने वाले कवि-सम्मेलनों का कुछ अंदाज नहीं, तो एकाध-दो कवि-सम्मेलनों में जाकर देख आओ। लोग सड़े टमाटर फेंकते हैं कवियों के ऊपर, केले के छिलके फेंकते हैं, सड़े केले फेंकते हैं, अंडे फेंकते हैं, जूते घिसते हैं जब लोग कविताएं पढ़ते हैं फर्श पर, हू-हल्ला मचाते हैं, बंद करो का शोरगुल करते हैं। और कवियों को इसी के लिए तो आयोजक पैसा देते हैं कि कुछ भी होता रहे, तुम सुख-दुख में समभाव रखना, तुम तो गीता की स्थितप्रज्ञ की अवस्था साधे रखना। और कवि भी हैं कि डटे रहते हैं। जब पैसा लिया है तो डटे रहना पड़ता है--कितने ही पिटें, कितने ही कुटें, कुछ भी हो जाए।
ज्योतिष नहीं चल रहा है, अब तुम्हें कविता की सूझी! तुम कुएं से बचो तो खाई में गिरोगे। भले आदमी, कोई काम की बात करो। कविता से क्या हाथ लगेगा? कविता कुछ ऐसी चीज भी नहीं है कि जो चाहे कर ले। कवि पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते। बने-बनाए कवि कवि नहीं होते, केवल तुकबंद होते हैं। तुकबंदी कविता नहीं है। सच्ची कविता तो जीवन की एक नयी शैली का नाम है--ऐसी जीवन की शैली जिसमें सौंदर्य हो, प्रसाद हो, अहोभाव हो। फिर चाहे तुम कविता लिखो या न लिखो, तुम्हारा उठना काव्य हो, तुम्हारा बैठना काव्य हो।
कवि-सम्मेलन में
संचालक ने सबसे पहले सिने गीतकार को बुलाया।
उन्होंने गाया--
मेरी मां है जब बीमार, भला मैं कैसे गाऊं!
भीड़ में बैठा हुआ एक स्थानीय कवि चिल्लाया--
भइया, जब अम्मा बीमार थी तो तू कवि-सम्मेलन में क्यों आया?
गीतकार ने गीत को आगे बढ़ाया--
घर में टाट भी नहीं, टूटी खाट भी नहीं।
आवाज आई--
यार, तू गीत सुना रहा है या घर की इकोनॉमिक कंडीशन बता रहा है?
तंग आकर गीतकार ने दूसरा गीत शुरू किया--
मेरे देश को बचा लो, मेरी जान ले लो रे।
अनिमंत्रित लोकल कवि चिल्लाया--
मेरी नाक को बचा लो, मेरे कान ले लो रे।
मुझे गीत न सुनाओ, मेरे प्राण ले लो रे।
पब्लिक की फरमाइश पर दूसरा कवि आया
और उसने अपना कारवां शुरू किया--
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।
भांग खाए हुए एक कवि ने पैरोडी बनाई--
चोर माल ले गए, लोटे-थाल ले गए
मूंग और मसूर की सारी दाल ले गए
और हम डरे-डरे, खाट पर पड़े-पड़े
सामने खुले हुए किवाड़ देखते रहे।
संचालक ने तब एक कवयित्री को बुलाया और कहा--
आप आइए और कवि-सम्मेलन जमाइए।
कवयित्री शुरू हुईं, बोलीं--
एक मुद्दत से हूं मैं तुम्हें अपने दिल में बसाए हुए।
भीड़ में से एक श्रोता चिल्लाया--
कितने दिन हो गए जी तुमको नहाए हुए?
कहां की झंझट में, पंडित कृष्णदास शास्त्री, तुम पड़ना चाहते हो? कुछ काम की बात पूछो। और झंझट ही लेनी हो तो संन्यासी हो जाओ, झंझटों पर झंझटें आएंगी, मुसीबतों पर मुसीबतों के द्वार खुल जाएंगे। और अब यहां आ गए हो...पहले मुझसे पूछा कि ज्योतिष छोड़ देने का मन होता है! अब पूछते हो--क्या कविता करने लगूं?
न मैं कोई ज्योतिषी हूं, न मैं कोई कवि हूं। मैं तो एक ही उपद्रव जानता हूं--संन्यास! संन्यासी हो जाओ, फिर सब मुसीबतें अपने आप टूट पड़ेंगी। क्या छोटे-मोटे खड्डों में गिरते हो--कविता, ज्योतिष! मैं तुम्हें समुंदर में ले चलता हूं, कि डूबे सो डूबे, फिर लौटना नहीं है। जैसे कोई नमक की पुतली सागर की थाह लेने जाए और जैसे-जैसे भीतर डूबे वैसे-वैसे गलती जाए, कभी लौटेगी नहीं खबर देने कि थाह मिली या नहीं। थाह मिलते-मिलते ही नमक की पुतली सागर में एक हो जाएगी। ऐसा ही संन्यास है।
एक उपद्रव से छूटना चाहते हो तो दूसरे उपद्रव में! मैं तुम्हें रास्ता देता हूं मिट जाने का। और तुम्हीं मिट गए, तो फिर कोई उपद्रव नहीं है। तुम्हीं न बचे, तो फिर कोई बीमारी नहीं है। तुमने यह बात तो सुनी है कि ऐसे चिकित्सक होते हैं कि मरीज को ही मिटा देते हैं। मैं उन्हीं चिकित्सकों में से हूं। मैं बीमारी की उतनी फिक्र नहीं करता, बीमार को ही मिटाने में लग जाता हूं। क्योंकि बीमार ही मिट गया तो फिर बीमारी किसको रहेगी? बीमारी तो अपने आप मिट जाएगी। और जब तक बीमार है, एक बीमारी से बचोगे तो दूसरी लगेगी, दूसरी से बचोगे तो तीसरी लगेगी। हजारों बीमारियां हैं, किस-किस से बचते फिरोगे? एक ही चीज जड़ से काट डालो न!
यह कहां का पांडित्य और कहां का शास्त्रीयपन तुमने पकड़ रखा है! आज ही छलांग मारो। मरने दो पंडित को और मरने दो शास्त्री को, बीच की बात बचा लो--कृष्णदास प्यारा है। स्वामीकृष्णदास भारती ठीक रहेगा!

आज इतना ही।