कौन है हम?
है कहां घर?
किस जहां से आये है
क्यों भटकते है युगों से?
इस उलझें गूढ़ रहस्य को
युगों कहां समझ हम पाए है?
देखना एक दिन
जब मैं मिलूंगा तुमसे
और पूछूंगा बार-बार
क्यों इस जग मे हम,
भटक फिर रहे है।
बिन आंखों के अंधे से
इस कूप भर अंधेरे में
सब कहते है....
न तुम रूप हो,
न तुम गंध हो,
न कोई आकर हो,
परंतु इस देखो मुझे
कहने को मैं आकार हूं
तुम तो बने रहे निराकार
क्या जानु क्या पहचानूँ
इस भटकन का
इस उलझन का
कोई तो होगा कहीं किनारा,
जिसे ढूंढ रहा मैं युगों-युगों
नहीं मिला अब तक कोई सहारा?
क्यों नित बदले हो रूप हमारा?
क्यों रोज खोती पहचान हमारी,
बने रहे गुमनाम तुम फिर भी
पूछ-पूछ कर हम खूद से हारे?
कुछ तो आकर कानों में कह जा
उस रहस्य बीज को हम को देजा
बीज दबेगा जिस दिन धरा में
उस घड़ी वो पा जायेगा सब कुछ
आस की बुंदों के संग साथ रहेंगी
विलीन हो कर अपने को खो कर
कुछ तेरी सुनेगी कुछ अपनी कहेंगी
मिटेगा प्याला अहं का मेरा
तभी स्वयं को पा मैं सकूंगा
अंकुर निकले जिस घड़ी तेरे
होगी तभी एक पहचान हमारी
है कहां पर डोर हमारी
कौन मंजिल नित पुकारती है
किन रूप रंगों में हे छुपा हुआ तू
बचता रहा क्यों युगों–युगों
भटकन भरी इन राहों पर
नित ठिठकती मंजिल डगर की
किस पर लुटाये किसको बसाये
है बुलबुलों में ये छवि सा
क्या उतार फेंकूँ सब आवरण अब
जो बने चले पहचान मेरी बन
या कोई निर्माण अब कर लूं
आ दर्शन दे पहचान बता जा।
(ओशो की मधुशालाा)
मनसा-मोहनी दसघरा
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