स्वप्न मिले
धूल में।
प्रीत बनी
रेत सी
उड़ गई
गुबार सी
चला चल की बेला अब,
है आ गई वो सांझ भी,
छल लिया जीवन सारा,
कर-कर के नित नये सिंगार।
बगिया यूं ही लूट गई,
फिर स्वप्न बन बैठी बहार।
तार भी बेसुरा हुआ,
वो रंग भी सब फीके पड़े।
और क्या कहें तुम्हें,
जीवन हो गया तार-तार।
क्या कहेगा उस राग को,
सब सुर बिछुडते रह गये।
गीत होंठों पर जमें,
पर लब तरसते रहे गये।
और क्या कहे तुम्हें,
हम फिर लुटे से रह गए।
अधखिले से फूल भी,
निहारते थे सब हमें
और हम खड़े-खड़े
कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
गुबार देखते रहे।
फूल बने सब शूल से,
स्वप्न मिले धूल में।
प्रीत बनी रेत सी
उड़ गई गुबार सी
अधखुले नयनों में भी,
आंसू जम के रहे गए।
नींद न खुली सी थी,
दूर वो साये ढल गए।
पाँव जब तलक उठे
कि ज़िन्दगी फिसल गई
पैर की बिवाई ने,
पथ पर हम चलने न दिया
पीले पात झर गये,
टूट गई सब साख-साख
मन की बात मन में ही,
यूं दब सिसक कर रह गई
प्यार के खुमार का
उतार देखते ही रहे
फूल बने सब शूल से,
स्वप्न मिले धूल में।
प्रीत बनी रेत सी
उड़ गई गुबार सी
सांस भी अब यूं लगे
वो दूर होती ही गई
होंठों पर लकीर एक,
दर्द बन ठहर गई।
आंखों की पौर पर,
दर्द भी जम कर रह गया।
मंजिल के पास पहुंच कर,
कारवां ठिठक गया।
साया तो मेरा ही था,
वो भी साथ छोड़ गया
वो पराई दुलहन सा
हमसे बिछुड कर रह गया।
और क्या कहें तुम्हें,
हम किसी के हो न सके
हम पराये ही रहे,
वो पराये न हो सके।
रात तो ढली नहीं
पर तमस ने घेर लिया
दूर होता कारवां
आँख से ओझल हुआ
हम शिला बन कर यूंहीं
थिराता की मूर्ति बन निहारते ही रह गये....
श्याम के धुंधलके का अंबार देखते रहे।
कारवां गुजर गया, गुब्बार देखते
रहे।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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💞ये कविता महान कवि नीरज जी को पी कर और ओशो को जी कर.... ह्रदय से निकले उन शब्दों को पिरोया है....छंद वही है....कहीं की बोल भी टकराते है....बस एक प्रयास है💞-मनसा-मोहनी दसघरा
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