जब भी मैं थक जाता चलते-चलते।
और देखता रहता उसी रास्ते को,
वह कैसा चिर परिचित आनंद में रहता था
किसी कमानिया मुस्कराते का बिखेरे हुए।
उस चिर-परिचित से उस थिर पत्थर को
न जाने क्यों ऐसा लगाता था
वो शायद करता सा दिखता था
हमेशा से मेरा ही आने का इंतजार
जब मैं चलते-चलते थक हार कर,
बैठ जाता कुछ पल उसके अंग-संग
वह कैसी शीतलता सी भर देता था
मेरे थके तन मन को, पल भर में
ही।
जब भी मैं वहां से गुजरता
वो मुझे अपनी और रिझाता
खिंचता कुछ इशारा सा कर
मानो बुला रहा है उसका मूक गान।
किस थिर तन्मयता से करता रहता था
वह नित ही इंतजार है मेरा?
उसके आस पास हमेशा
आह्लादित सुवास बहती थी
बिखरी रहती थी एक मीठी हंसी
उसके निर्बोध मुख मंडल पर,
किस नरम इशारे से लुभाता।
जब भी मैं उस के पास जाता
तो वो भर देता
एक नई ताजगी मुझमें,
हर लेता था मेरी सारी पीड़ा और संताप को।
और फैल जाता था मेरी रोएं-रेशे में।
आह्लादित, हर्ष, उत्साह, उमंग, का रस।
लेकिन न जाने क्यों मुझे अब लगता है।
कि वो मुझे अब तिरछी नजरों से
न जाने क्यों घूर-घूर कर देखता है,
उसकी क्रूर-भेदती पत्थर की आंखें।
कुछ हठी से हो गई है...थी।
खो गई थी उसकी तरलता कहीं
फिर भी मुझे लगता था
नहीं मुझे उसके पास जाना चाहिए।
उस पर बैठ कर कुछ सुनने के उसके दर्द गीत को,
और कुछ सुनाऊं अपने मन की पीड़ा को।
हाय वो दिन भी कैसे पंख से लगते है
कैसे जब भी बचपन में आता था,
पापा जी का हाथ पकड़ उनके साथ।
कैसे हर्षित सा भाग कर चढ़ जाता उसपर।
तब इसी पत्थर पर खड़ा हो कर
मैं इतराता और अपने को महान समझता था।
कहता, देखो मैं कितना बड़ा हो
गया।
नापता आपने आप को पापा से।
मैं बस जल्दी से उन से बड़ा हो जाना चाहता था।
इस बात पर पापा धीमे से हंसते थे,
एक मधुर मोदन व्यंगात्मक हंसी,
परंतु उसे समय मैं नहीं समझ पाता था।
पापा की उस मोदक हंसी को
और कैसे तालियां बजा-बजा कर,
अपने बड़ा होने पर गर्व दिखलाता था।
बार-बार करता विजय का उद्घोष।
तब भी ये पत्थर मुझे घूरता था।
एक अचरज भरी नजर से देखकर।
वह कुछ कहना भी चाहता था।
और वह आज भी वैसे ही देखता है मुझे
आज भी वैसा ही करता है अट्टहास,
पुछता सा लगता है मुझसे हो गए बड़े।
क्या पाया अब बड़ा हो कर?
थक-हारकर, इस जीवन से।
और मैं गर्दन झुकाये, मायूस, हताश सा।
भारी बोझिल तन-मन से लोट पड़ता हूं घर की और।
नहीं देखता उस पत्थर को पीछे मुड़ कर।
कहीं वो पुकार न मुझको फिर से।
तनिक रुको, करो विश्राम,
नहीं अब में उस पर चढ़ कर
और बढ़ा नहीं होना चाहता।
मैंने खो दिया बचपन अपना,
बुढ़ापे को भी नहीं खोना चाहता।
शायद उससे दूर घर के किसी अंधेरे कोने में,
छुपे बैठे उस अबोध बचपन को समेट लूं,
ओर नया बन चहक उठे मेरा बूढ़ा-बचपन,
और मैं तेज कदमों से चल देता हूं
घर की और, अपने खोए बचपन को पाने
के लिए
जो समा जाये मेरे में फिर मुझमें एक बार।
कैसा सूखा सन्नाटा फेल जाता है उस क्षण
और मैं अवाक अबोध बाल वत सा बू ढापे
को निहार रहा होता हूं।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें