हे अविचल, अटल दृढ़, संकल्प तेरा।
आलोक मय दैदीप्यमान तेज न घेरा।।
क्या बादलों की गड़गड़ाहट, से
तू सहम जायेगा।
क्या रात्रि की तड़पन, में भय
क्रांत खड़ा होगा,
एक कोने में
सुकड़ सहम, कर तू विलीन होगा,
या अविरल तम
से,
गुथेगा इक हार,
कुछ मधुर प्यार,
और फिर सिंगार,
वही
देगा सांसों का नया हार,
खुल
जायेगा देख इक नया द्वार
जीवन में बह उठेगी एक धार।
एक स्वेत बिंदु, बुझ-बुझ के,
तुझे निहारता सा दिखता रहेगा,
छल-छल, पल-पल। तेरी विरसता का,
करता है लगता है वह अट्टहास,
है क्या तुझको इसका कोई अहसास।
जीवन में जब तुम उथले बनो,
मारना गोता, उसी निश्छलता में।
पल भर को।
एक नवनीत की,
सुगंध तुम्हें घेर लेगी,
पल-पल को भोगो।
जागो ओर केवल जागो।
हर उस पल को पी लो।
जो बह रहा है तुमसे
उसमें फिर
हो विष, या अमृत,
तभी तो तुम बनोगे
वहीं अभेद्य,
और देखना बन जाओगे क्षण भर में।
फिर वहीं, वहीं नवनीत,
तुम्हारी ‘’एकाकी
पीडा’’
है
तुम्हारी मंजिल डगर......पुकार रही होगी।
निहार रही होगी.....बुहार रही होगी वो पथ।
जो
बने शायद इक दिन तुम्हारी मंजिल।
नहीं तो फिर वहीं तुम और तुम्हारी एकाकी पीड़ा।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

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