जब भी कोई कहीं पुकारता है।
मुझे लगता है तुम आ गए।
तब क्यों मैं सहम-सुकड़ कर,
भयभीत सी खड़ी रह जाती हूं।
किसी छोटे बच्चे कि तरह,
तब मैं झांक कर देखता हूं
मन के दरवाज़े के छेद से,
और फिर बंद कर लेता हूं अपनी आंखें,
सोचता हूं अच्छा हुआ तुम नहीं आए?
अगर तुम मेरे पुकारने से आ गए होते तो
फिर मैं तुमसे से कहां छिप सकती थी।
शायद कहीं भी वो जगह मुझे नहीं मिलती
फिर भी ढूँढता है तुझे ही ये पागल मेरे मन
घर आंगन के हर एक कोने-कोने में,
कि तुम आओ और मैं छुप जाऊं
परंतु तुम मुझे न ढूंढ सको
या कहीं ऐसी जगह मुझे मिल जाये
जहां मैं फिर छुप सकूँ बचपन की तरह
शायद फिर रूक जाये ये समय पल भर के लिए
उस बचपन की मासूम घड़ी की तरह बंध कर
जहां खेलती थी मैं मां के साथ छुप्पा-छुप्पी,
खेलते-खेलते जब मैं छुप जाती थी कहीं भी।
जहां मां मुझे जानते हुए भी,
न जानने का भ्रम दिखलाती थी !
कि मैंने तो तुम्हें देखा ही नहीं
शायद किसी मीठे भ्रम में रखने के लिए
लेकिन तेरी आंखें तो भेद देगी मेरे अंतस को,
मेरे द्वेष, अहंकार, छल कपट से भर ह्रदय को,
तब मैं सिहर जाती हूं, लरजते
पीपल पात की तरह।
और मैं जब देखती हूं तुम नहीं आये,
चैन की एक गहरी उसांस भर लेती हूं,
और जब कहीं दूर देखती हूं आपन चारों और,
आह! कि मैं अब भी हूं, एक सुखद खुशी
पल भर के लिए घेर लेती है मेरे होने को
और तब मन करता है,
करूं फिर वो ही शरारत कोई बाल हठ सी,
भागूं दोडुं रोऊं इस धूल-धमास से लिपट कर।
पर न जान क्यों केवल छुप-छुप कर ही रो पाती हूं।
फिर भी न जाने क्यों करती हूं,
केवल तुम्हारा ही इंतजार,
तुम तो हो पूर्ण समस्वरता समेटे अपने में
तुम जान जाओगे मेरे अंतस की प्यार को
मैं ये भी जानती हूं,
तब एक दिन तुम जरूर आओगे,
शायद तुम्हीं आकर,
मेरे दामन पे लगे,
इस कृतघ्नता के,
दाग को मिटाओगे।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें