इक दीप जलाए बैठे है,
इक आस लगाए बैठे है।
हम दिल के
टूटे तारों से,कोई गीत बनाए बैठे है।
1-कोई आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।
जो महक उठी थी प्राणों में, खोया
हुआ एहसास सी थी।
वो दूर भले ही रहते थी, पर रहती
दिल के पास ही थी।
जो आकर जाती थी न कभी, वो अनबूझी प्यास सी थी।
वो आ न सके, हम रो न सके,
पर आस लगाए बैठे है,
बस आस यही विश्वास यही ये श्वास नहीं टूटे तब तक।
वो आ न सके हम मर न सके, हम पलक
बिछाए बैठे है।
2-तुम तो कब का भूले गए, ये हिचकी क्यों आती है हमें।
जीवन के सूने आंगन में, गा कोयल
क्यों तड़पाती है हमें।
कभी छूती हे वो यादों तेरी, क्यों
दर्द सिहरन भरती हमें।
नासूर बन गया है दर्द तेरा, पर
हम जख्म सजाए बैठे है।
आंखों के आंसू सूख गये,
सपने भी हमसे सब रूठ गये,
सूनी आंखें के पलकों पर
हम सपने सजाए बैठे है..।
इक दीप जलाए बैठे है, इक आस जगाए
बैठे है।
हम दिल के टूटे तारों से, कोई
गीत बनाए बैठे है।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

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