सांच-सांच सो सांच-(प्रशनोंत्तर)-ओशो
समाधि की सुवास—प्रवचन-दसवां
दिनांक 30 जनवरी, सन्
1981 ओशो आश्रम पूना।
पहला प्रश्न: भगवान,
आपने उस दिन आद्य शंकराचार्य का निम्नलिखित श्लोक
उद्धृत किया था, उस पर विस्तार से प्रकाश डालें--
तत्वं किमेकं शिवमद्वितीयं,
किमुत्तमं
सच्चरितं यदस्ति।
त्याज्यं सुखं किम् स्त्रियमेव,
सम्यग देयं
परमं किम् त्वभयं सदैव।।
एक तत्व क्या है? अद्वितीय शिवत्तत्व ही। सबसे उत्तम क्या है? सच्चरित्र।
कौन सुख छोड़ना चाहिए? सब प्रकार से स्त्री का सुख ही। परम
दान क्या है? सर्वदा अभय ही।
सहजानंद,
मैं तो इस सूत्र से किसी भी भांति राजी नहीं हो सकता हूं। इसमें
बुनियादी भ्रांतियां हैं। जैसे: "सबसे उत्तम क्या है?' शंकराचार्य कहते हैं: "सच्चरित्र।'
सबसे उत्तम है समाधि। सच्चरित्रता तो समाधि की सहज परिणति है, परिणाम है। समाधि है तो चरित्र अपने आप चला आता है, जैसे
तुम्हारे पीछे तुम्हारी छाया चली आती है।





