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सोमवार, 18 जून 2018

फूल ओर कांटे--(कथा--06)


 कथा—छठवां -(संत औगास्टिनस)

विचार से सत्य नहीं पाया जा सकता है। 
क्योंकि, विचार की सीमा है और सत्य असीम है।
विचार से सत्य नहीं पाया जा सकता है। 
क्योंकि, विचार ज्ञात है और सत्य अज्ञात है।
विचार से सत्य नहीं पाया जा सकता है। 
क्योंकि, विचार शब्द है और सत्य शून्य है।
विचार से सत्य नहीं पाया जा सकता है। 
क्योंकि, विचार एक क्षुद्र प्याली है और सत्य एक अनंत सागर है।

संत औगास्टिनस एक सुबह सागर तट पर था। सूर्य निकल रहा था और वह अकेला ही घूमने निकल पड़ा था। अनेक रात्रियों के जागरण से उनकी आँखें थकी-मंदी थी। सत्य की खोज में वह करीब-करीब सब शांति खो चुका था।

फूल ओर कांटे--(कथा--05)


कथा—पांचवी (सहास और निरीक्षण)

सत्य की खोज में सम्यक निरीक्षण से महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। लेकिन, हम तो करीब करीब सोये-सोये ही जीते हैं, इसलिए जागरूक निरीक्षण का जन्म ही नहीं हो पाता है। जो जगत हमारे बाहर है, उसके प्रति भी खुली हुई आँखें और निरीक्षण करता हुआ चित्त चाहिए और तभी उस जगत के निरीक्षण और दर्शन में भी हम समर्थ हो सकते हैं जो कि हमारे भीतर है।

मैं आपको एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में ले चलता हूँ। कुछ विद्यार्थी वहाँ इकट्ठे हैं और एक वृद्ध वैज्ञानिक उन्हें कुछ समझा रहा है। वह कह रहा है : ‘सत्य के वैज्ञानिक अनुसंधान में दो बातें सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं- साहस और निरीक्षण।

फूल ओर कांटे--(कथा--04 )


कथा—चौथी (चरवाहा और हीरा)


प्रेम जिस द्वार के लिए कुंजी है। ज्ञान उसी द्वार के लिए ताला है।
और मैंने देखा है कि जीवन उनके पास रोता है जो कि ज्ञान से भरे हैं लेकिन प्रेम से खाली हैं।

एक चरवाहे को जंगल में पड़ा एक हीरा मिल गया था। उसकी चमक से प्रभावित हो उसने उसे उठा लिया था और अपनी पगड़ी में खोंस लिया था। सूर्य की किरणों में चमकते उस बहुमूल्य हीरे को रास्ते से गुज़रते एक जौहरी ने देखा तो वह हैरान हो गया, क्योंकि इतना बड़ा हीरा तो उसने अपने जीवन भर में भी नहीं देखा था।
उस जौहरी ने चरवाहे से कहा : ‘क्या इस पत्थर को बेचोगे? मैं इसके दो पैसे दे सकता हूँ?'

फूल ओर कांटे--(कथा--03)


कथा--तीसरी (ग्रंथियों की खोज)

एक वृद्ध मेरे पास आते हैं। वे कहते हैं : ‘नयी पीढ़ी बिल्कुल बिगड़ गयी है।’ यह उनकी रोज की ही कथा है।

एक दिन मैंने उनसे एक कहानी कही : ‘एक व्यक्ति के ऑपरेशन के बाद उसके शरीर में बंदर की ग्रंथियाँ लगा दी गयीं थीं। फिर उसका विवाह हुआ। और फिर कालांतर में पत्नी प्रसव के लिए अस्पताल गई। पति प्रसूतिकक्ष के बाहर उत्सुकता से चक्कर लगा रहा था। और जैसे ही नर्स बाहर आई, उसने हाथ पकड़ लिए और कहा : ‘भगवान के लिए जल्दी बोलो। लड़का या लड़की?’
उस नर्स ने कहा : ‘इतने अधीर मत होइए। वह पंखे से नीचे उतर जाये, तब तो बताऊं?'
वह व्यक्ति बोला : ‘हे भगवान! क्या वह बंदर है?'और फिर थोड़ी देर तक वह चुप रहा और पुनः बोला : ‘नयी पीढ़ी का कोई भरोसा नहीं है। लेकिन यह तो हद हो गई कि आदमी से और बंदर पैदा हो?'

फूल ओर कांटे-(कथा--02)


कथा—दूसरी (जीवन का जहाज़)

जीवन बहुत उलझा हुआ है लेकिन अक्सर जो उसे सुलझाने में लगते हैं वे उसे और भी उलझा लेते हैं।
जीवन निश्चय ही बड़ी समस्या है लेकिन उसके लिए प्रस्तावित समाधान उसे और भी बड़ी समस्या बना देते हैं।
क्यों? लेकिन एसा क्यों होता है?

एक विश्वविद्यालय में विधीशास्त्र के एक अध्यापक अपने जीवनभर वर्ष के पहले दिन की पढ़ाई तखते पर ‘चार’ और ‘दो’ के अंक लिखकर प्रारंभ करते थे। वे दोनों अंकों को लिखकर विद्यार्थियों से पूछते थे : ‘क्या हल है?'
निश्चय ही कोई विद्यार्थी शीघ्रता से कहता : ‘छः!’
और फिर कोई दूसरा कहता : ‘दो!’

फूल और कांटे-(कथा--01)


कथा-एक  (सुलतान महमूद)

मैं देखता हूं कि प्रभु का द्वार तो मनुष्य के अति निकट है लेकिन मनुष्य उससे बहुत दूर है। क्योंकि न तो वह उस द्वार की ओर देखता ही है और न ही उसे खटखटाता है।
और मैं देखता हूं कि आनंद का खजाना तो मनुष्य के पैरों के ही नीचे है लेकिन न तो वह उसे खोजता है और न ही खोदता है।
एक रात सुलतान महमूद घोड़े पर बैठकर अकेला सैर करने निकला था। राह में उसने देखा कि एक आदमी सिर झुकाए सोने के कणों के लिए मिट्टी छान रहा है। शायद उसकी खोज दिन भर से चल रही थी। क्योंकि उसके सामने छानी हुई मिट्टी का एक बड़ा ढेर लगा हुआ था। और शायद उसकी खोज निष्फल ही रही थी। क्योंकि यदि वह सफल हो गया होता तो आधी रात गए भी अपना कार्य नहीं जारी न रखता। सुलतान क्षणभर उसे अपने कार्य में डूबा हुआ देखता रहा और फिर अपना स्वर्णिम बहुमूल्य बाजूबंद मिट्टी के ढेर पर फेंक कर वायु वेग से आगे बढ़ गया।

फूल ओर कांटे--(ओशो का अप्रकासित सहित्य)


ओशो का अप्रकासित सहित्य-

ओशो ने जीवन में जो कुछ भी कहां बोल कर कहां, ओर उनकी जितनी भी पूस्तके हम ओर आप ये सारा जगत पढ़ रहा है उसमें उन्होंने 96% बोला है, अब बोले साहित्य के लिए एक तो अवेरनेश इतनी होनी चाहिए की आपने जो बोल दिया उसमें अब कांट-छांट करने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। ओर सच ओशो ने जीवन में जो बोल दिया उसे काटने ओर छांटनी की बात ही नहीं बचती।
शायद दूनियां में एैसे बुद्ध हुए है परंतु विज्ञानिक प्रगती के कारण हम उन्हें रिकार्ड नहीं कर सकते। तब वह श्रृति ओर स्मृति में संजो कर रखा गया जिसे ज्यादा दिन श्रेष्ठ ओर सत्य बना कर नहीं रखा जा सकता। एक पीढ़ी के बाद दूसरी-तीसरी इस तरह उसमें मिलावट हो ही जाती थी।
ओशो का ऐसा साहित्य जो उन्होंने लिखा था वह या तो पत्र थे या या बहुत पहले उन्होंने उसे बहुत पहले घर या कालेज के दिनों में लिखा था। जो कभी प्रकाशित नहीं हुए ऐसा ही कुछ सहित्य स्वामी शैलेन्द्र सरसवती (ओशो के छोटे भाई जो अब ओशो धारा के माध्यम से ओशो कार्य कर रहे है) ने मुझे कुछ ऐसा सहित्य भेजा की जिसे मैं आपना भाग्य समझता हूं ओर ओशो ने मुझे इस काबिल समझा। तब मुझे लगा की ये तो सब के पास पहूंचना चाहिए इस लिए उसे आप सब तक पहूंचा रहा हूं।

रविवार, 17 जून 2018

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-01

   कैवल्‍य उपनिषद--ओशो 

ओशो से अनंत—अनंत फूल झरे है,
                  झरते ही जा रहे है,
            झरते ही जा रहे है.....उनका एक—एक शब्‍द
               परम सुगंध का एक जगत है।
              माउंट आबू की सुरम्‍य पहाड़ियों में
            ऐसे ही एक अनुठे फूल के रूप में प्रगटा
      कैवल्‍य उपनिषद, जिसमें शाश्‍वत की सत्रह पंखुड़ियां है।
            अपूर्व था ओशो की भगवता का यह आयाम,
           जो माउंट आबू के विभिन्‍न ध्‍यान—योग शिविरों
                के रूप में देखने—सुनने को मिला।


स्‍वयं पूर्ण का अनुभव है कैवल्‍य—पहला प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
माऊंट आबू,
25 मार्च 1972, रात्रि।
राजस्‍थान।

केनोउपनिषद--प्रवचन--17

हरेक क्षण को उत्‍सव बनाओ—सतरहवां प्रवचन

दिनांक 16 जुलाई 1973संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।

प्रश्‍न सार :


*उपनिषदों की पाप की धारणा में और बाइबिल की पाप की धारणा में क्या अंतर है?

*आत्यंतिक रहस्य सामान्यतया एक ही शिष्य को क्यों हस्तांतरित किया जाता है?


पहला प्रश्न :

सुबह आपने कहा कि जो ब्रह्म को जान लेता है वह पाप को नष्‍ट कर देता है। और ब्रह्म में भलीभांति स्‍थित हो जाता है। इस संदर्भ में कृपया स्‍पष्‍ट करें कि उपनिषदों की पाप की धारणा में और बाइबिल की पाप की धारण में क्‍या अंतर है? और कृपया यह भी समझायें कि मनुष्‍य के जीवन पर उसका क्‍या प्रभाव है?

शनिवार, 16 जून 2018

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--02

वह परम भोग है—दूसरा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र:

            हरि ओम,
            ईशावास्‍यमिदं सर्वं यत्किज्व जगत्या जगत्।
            तेन त्यक्तेन पुज्जीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनमू।। 1।।


      जगत में जो कुछ स्थावर—जंगम संसार है, वह सब ईश्वर के द्वारा
      आच्छादनीय है। उसके त्याग— भाव से तू अपना पालन कर; किसी
                  के धन की इच्छा न कर।। 1।।

शावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा : सब कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है — ईश्वर का है सब कुछ।
मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्रांति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है — मालकियत, स्वामित्व — मेरा है। ईश्वर का है सब कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती।

शुक्रवार, 15 जून 2018

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-06

प्रवचन—छठवां   ( प्रश्‍न एवं उत्तर)

 बंबईदिनांक 20 फरवरी 1972, रात्रि
पहला प्रश्‍न:

     भगवान, काम-वृत्ति के उदाहरण को ध्यान में रखते हुए कृपया बतलाएं कि अचेतन को प्रत्यक्ष देखने के लिए क्या-क्या प्रयोगिक उपाय हैं और कैसे कोई जाने कि वह उससे मुक्त हो गया है?

      अचेतन वास्तव में अचेतन नहीं है। बल्कि वह केवल कम चेतन है अतः चेतन व अचेतन में विपरीत ध्रुवों का भेद नहीं है, बल्कि मात्राओं का भेद है। अचेतन और चेतन दोनों जुड़े हुए हैं, संयुक्त हैं। वे दो नहीं हैं।

      परन्तु हमारा सोचने का जो ढंग है, वह विशेष तर्क की झूठी पद्धति पर आधारित है जो कि प्रत्येक बात को विपरीत ध्रुवों में बांट देती है। वास्तविकता उस तरह कभी भी बंटी हुई नहीं है केवल तर्क ही उस तरह विभाजित है।

      हमारा तर्क कहता है--हां या नहीं। हमारी लाजिक कहती है--प्रकाश या अंधकार। जहां तक तर्क का संबंध है, उन दोनों में कोई संबंध नहीं है।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-05

(एक स्थिर मनः प्रभु का द्वार)-ओशो

प्रवचन—पांचवा
बंबईदिनांक 19 फरवरी 1972, रात्रि
निश्‍चल ज्ञानं आसनम।

      निश्‍चल ज्ञान ही आसान है।

      मनुष्य न तो केवल शरीर ही है और न मन ही। वह दोनों है। और यह कहना भी एक अर्थ में गलत है कि वह दोनों है क्योंकि शरीर और मन भी यदि अलग-अलग हैं, तो केवल दो शब्दों के रूप में। अस्तित्व तो एक ही है। शरीर कुछ और नहीं है वरन चेतना की सबसे बाहरी परत है, चेतना की सर्वाधिक स्थूल अभिव्यक्ति। और चेतना कुछ और नहीं बल्कि सर्वाधिक स्थूल अभिव्यक्ति। और चेतना कुछ और नहीं बल्कि सर्वाधिक सूक्ष्म शरीर है, शरीर का सबसे अधिक निखरा हुआ अंग। आप इन दोनों के मध्य में होते हैं।

      ये दो चीजें नहीं हैं, परन्तु एक ही वस्तु के दो छोर हैं। अतः जब कभी ज्ञान निश्‍चल हो जाता है, तो शरीर भी प्रभावित होता है और निश्‍चल ज्ञान से निश्‍चल शरीर भी नि£मत होता है। परन्तु इसका उल्टा सच नहीं है।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-04

प्रवचन—चौथाा  (प्रश्‍न एवं उत्तर)

 बंबईदिनांक 18 फरवरी 1972, रात्रि
पहला प्रश्‍न:  

     भगवान, कल रात्रि आपने कहा था कि वासनाएं मृत-अतीत से कल्पित भविष्य के बीच लगती हैं। कृपया समझाएं, क्यों और कैसे यह मृत-अतीत इतना शक्तिशाली व प्राणवान साबित होता है कि यह एक व्यक्ति को अंतहीन वासनाओं की प्रक्रिया में बहने के लिए मजबूर कर देता है? कैसे कोई इस प्राणवान अतीत--अचेतन व समष्टि अचेतन से मुक्त हो?

     
      अतीत प्राणवान जरा भी नहीं है, वह पूरी तरह मृत है। परन्तु फिर भी उसमें वजन है--एक मृत-वजन। वह मृत-वजन ही काम करता है। वह शक्तिशाली बिलकुल भी नहीं। क्यों यह मृत-वजन काम करता है, इसे समझ लेना चाहिए।

सोमवार, 11 जून 2018

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--32)

प्राण की यह बीन बजना चाहती है—प्रवचन—दूसरा

दिनांक 12 नवंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

आपने हमें संन्यास दिया, लेकिन कोई मंत्र नहीं बताया। पुराने ढब के संन्यासी मिल जाते हैं तो वे पूछते हैं, तुम्हारा गुरुमंत्र क्या है?

मंत्र तो मन का ही खेल है। मंत्र शब्द का भी यहीं अर्थ है, मन का जाल, मन का फैलाव। मंत्र से मुक्त होना है, क्योंकि मन से मुक्त होना है। मन न रहेगा तो मंत्र को सम्हालोगे कहां? और अगर मंत्र को सम्हालना है तो मन को बचाये रखना होगा।
निश्चय ही मैंने तुम्हें कोई मंत्र नहीं दिया। नहीं चाहता कि तुम्हारा मन बचे। तुमसे मंत्र छीन रहा हूं। तुम्हारे पास वैसे ही मंत्र बहुत हैं। तुम्हारे पास मंत्रों का तो बड़ा संग्रह है। वही तो तुम्हारा सारा अतीत है। बहुत तुमने सीखा। बहुत तुमने ज्ञान अर्जित किया। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है, कोई ईसाई है। किसी का मंत्र कुरान में है, किसी का मंत्र वेद में है।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--27)

वासना संसार है, बोध मुक्ति हैप्रवचनबारहवां
 दिनांक: 7 अक्‍टूबर, 1976;

      श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

अष्टावक्र उवाच:

            कृताकृते न द्वंद्वानि कदा शांतानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाभ्रव त्यागपरोऽव्रती ।। 83।।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा व बुभुत्सोयशमं गताः ।। 84।।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितय दूषितम्।
असारं निंदितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ।। 85।।
काउसौ कालो वया: किं वा यत्र द्वंद्वानि नो नृणाम्।
तान्युयेक्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाघ्नुयात।। 86।।
नाना मतं महर्षीणां साधुनां योगिनां तथा।
द्वष्टव निर्वेदमापन्‍न: को न शाम्यति मानव:।। 87।।
कृत्वा मूर्तियरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरू:।
निर्वेदसमतायक्तया यस्तारयति संसते: ।। 88।।
पश्य भूतविकारास्त्‍वं भूतमात्रान् यथार्थत:।
तत्‍क्षणाद बंधनिर्मुक्त: स्वरूयस्थो भविष्यसि।। 89।।
वासना एव संसार ड़ति सर्वा विमुज्‍च ता:।
तत्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ।। 90।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--22)

एकटि नमस्‍कारे प्रभु एकटि नमस्‍कारे!—प्रवचन—सातवां 

दिनांक: 2 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

कपिल ऋषि के सांख्य—दर्शन, अष्टावक्र की महागीता और कृष्णमूर्ति की देशना में क्या देश—काल अनुसार अभिव्यक्ति का ही भेद है? कृपा करके समझाइये!

 त्य तो कालातीत है, देशातीत है। सत्‍य को तो देश और काल से कोई संबंध नहीं। सत्य तो शाश्वत है; समय की सीमा के बाहर है। लेकिन अभिव्यक्ति कालातीत नहीं है, देशातीत नहीं है। अभिव्यक्ति समय के भीतर है; सत्य समय के बाहर है। जो जाना जाता है, वह तो समय में नहीं जाना जाता; लेकिन जो कहा जाता है, वह समय में कहा जाता है। जो जाना जाता है, वह तो नितांत एकांत में; वहां तो कोई दूसरा नहीं होता। लेकिन जो कहा जाता है, वह तो दूसरे से ही कहा जाता है।

सोमवार, 21 मई 2018

भजगोविंदम मुढ़मते (आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--05

आशा का बंधन—(प्रवचन—पांचवां)

सूत्र :

जटिलो मुण्डी लुग्चितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढ़ो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः।।
अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुग्चत्याशापिण्डम्।।
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुग्चत्याशापाशः।।
कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं नः भजति जन्मशतेन।।
सुरमंदिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः।।
योगरतो वा भोगरतो वा संगरतो वा संगविहीनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव।।

गुरुवार, 17 मई 2018

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-31

शिक्षा में क्रांति-ओशो
प्रवचन-इक्कतीसवां
शिक्षा: नया धर्म

मेरे प्रिय आत्मन्!
बीसवीं सदी नये मनुष्य के जन्म की सदी है। इस संबंध में थोड़ी सी बात आपसे करना चाहूंगा। इसके पहले कि हम नये मनुष्य के संबंध में कुछ समझें, यह जरूरी होगा कि पुराने मनुष्य को समझ लें।
पुराने मनुष्य के कुछ लक्षण थे। पहला लक्षण पुराने मनुष्य का था कि वह विचार से नहीं जी रहा था, विश्वास से जी रहा था। विश्वास से जीना अंधे जीने का ढंग है। मानव की अंधे होने की भी अपनी सुविधाएं हैं। और यह भी माना कि विश्वास के अपने संतोष हैं और अपनी सांत्वनाएं हैं। और यह भी माना कि विश्वास की अपनी शांति और अपना सुख है लेकिन यदि विचार के बाद शांति मिल सके और संतोष मिल सके, विचार के बाद यदि सांत्वना मिल सके और सुख मिल सके तो विचार के आनंद का कोई भी मुकाबला, विश्वास का सुख नहीं कर सकता है।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-30

शिक्षा में क्रांति-ओशो
प्रवचन-तीसवां
बोध का जागरण
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

पहली बात तो, साधारणतः हम ऐसा ही सोचते हैं कि गुलामियों के कारण हमारे चरित्र का पतन हुआ, गुलामी के कारण हमारा व्यक्तित्व नष्ट हुआ!
गुलामी आई, तभी हम चरित्रहीन हुए! गुलामी आई तभी, जब कि हम चरित्रहीन हुए?
 उसको ही मैं कहना चाहता हूं कि चरित्रहीनता जो है वह गुलामी के कारण नहीं आई, बल्कि चरित्रहीनता के कारण ही गुलामी आई। और चरित्रहीन हम बने, ऐसा कहना मुश्किल है, चरित्रहीन हम थे। बनने का तो मतलब यह होता है कि हम चरित्रवान थे, फिर हम चरित्रहीन बने। तो हमें कारण खोजने पड़ें कि हम चरित्रवान कैसे थे, कब थे। और कैसे हम चरित्रहीन बने! मुझे नहीं दिखाई पड़ता कि हम कभी चरित्रवान थे। हमारी चरित्रहीनता बड़ी पुरानी है और चरित्रहीन का काफी जो बुनियादी कारण है, वह हमारी संस्कृति में सदा से मौजूद है।

शिक्षा में क्रांति-प्रवचन-29

शिक्षा में क्रांति-ओशो
प्रवचन-उन्नतीसवां
नई दिशा, नया बोध
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

लक्ष्मी ने जो पूछा है, वह सवाल तो छोटा मालूम पड़ता है लेकिन उससे बड़ा कोई और दूसरा सवाल नहीं है। नई पीढ़ी को कैसे शिक्षित करना, यह बड़े से बड़ा सवाल है। और मनुष्यता का सारा भविष्य इस पर निर्भर है। इसकी दो-तीन गहरी बातों को खयाल में लेना चाहिए।
एक तो अब तक बच्चे का पूरी दुनिया में कहीं भी कोई आदर नहीं है। बच्चे से आदर हम मांगते थे, बच्चे को आदर देते नहीं थे। प्रेम देते थे, आदर नहीं देते थे। इसके बहुत ही भयानक परिणाम हुए। इसका सबसे बुरा जो परिणाम हुआ, वह यह हुआ कि जब तक बच्चे को आदर न दिया जाए तब तक हम किसी न किसी गहरे रूप में यह प्रकट करते हैं कि वह हमसे हीन है। हम उसमें हीनता का भाव पैदा करते हैं।