ओशो
किसी और तैयारी
में थे--
जैसा कि
हमने पीछे
देखा, धर्म और राजनीति
की मशीनरी या
तो ओशो के
जबरदस्त
विरोध में थी
या मौन समर्थन
में जिसे कोई
खास समर्थन
नहीं कहां जा
सकता। लेकिन
इस दौर में ज्यों-ज्यों
उनकी आवाज
ऊंची और पैनी
होती गई, उनके
कार्य के
प्रति भारतीय
समाज के धुरंधरों
का ध्रुवीकरण
होता गया।
जहां राजनेता और
धर्माचार्य
उनके प्रति
अपने वैमनस्य
में सने हर
कोशिश कर रहे
थे कि उन्हें
बोलने ही नहीं
दिया जाए, उन्हें
गोली ही क्यों
न मार दी जाए,
वही साहित्य और
कला के
क्षेत्र से
जुड़े हुए
प्रमुख नाम
उनके पक्ष में
आकर खड़े होते
हुए—और उनका
समर्थन नेहरू
या शास्त्री
की तरह मौन
नहीं मुखर था।






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