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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

केनो उपनिषद--ओशो (सोलहवां--प्रवचन)

तथाता का महान नृत्‍य—सोलहवां प्रवचन



            तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स एतदेवं
            वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाच्छन्ति।। ६।।

            उपनिषदं भो जूहीत्युक्ता त उपनिषद्
            ब्राह्मी वाव त उपनिषदमलूमेति।। ७।।

            तस्यै तपो दम: कर्मेति प्रतिष्ठा वेदा:
            सर्वाङगानि सत्यमायतनम्।। ८।।

            यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाणानमनन्ते स्वर्गे
            लोकेज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति।। ९।।।।

           
            केनोपनिषद समाप्त।।?


                  केनोपनिषद
               चतुर्थ अध्याय

                        6
            ब्रह्म तद्वनम—वह—के नाम से विख्यात है
      इसलिए उसका ध्यान तद्वनम की भांति ही करना चाहिए।
      जो ब्रह्म को ऐसा जानता है सारे प्राणी उसे प्रेम करते हैं।

                        7
            ''श्रीमन् मुझे उपनिंषद की शिक्षा दें। ''
उपनिषद तुम्हें दे दिया गया है। हमने वस्तुत: तुम्हें ब्रह्म से संबंधित उपनिषद दे दिया है।

                              8
तप, दमन और कर्म उपनिषद के आधार हैं वेर्द उसके अंग हैं और सत्य उसका आवास है

                              9
जो इसे जान लेता है— ब्रह्म का ज्ञान पा लेता? है—वह इस प्रकार पाप को नष्ट कर देता है और ब्रह्म में भलीभांति स्थित हो जाता है— जो कि असीम है आनंदपूर्ण है और सर्वोच्च है।            
                        केनोपनिषद समाप्त।?

'ईश्वर' शब्द' ईश्‍वर नहीं है। क्‍योंकि उस परम का कोई भी नाम नहीं हो सकता। वह अनाम है, क्‍योंकि नाम दूसरो के द्वारा दिये गये है। एक बच्‍चा पैदा होता है। वह बिना किसी नाम के पैदा होता है फिर उसे एक नाम दे दिया जाता है—वह नाम बच्‍चे की आंतरिक चेतना से नहीं आता। वह बाहर से आता है। वह एक लेबल है—उपयोगी है। कामचलाऊ है। लेकिन झूठा है। बच्‍चा उसका शिकार होगा, वह अपने को एक नाम के साथ जोड़ लेगा जो दिया गया है, जो कि श्रास्तव में उसका नहीं है।
लेकिन ब्रह्म को कौन नाम देगा? वहां कोई माता—पिता नहीं हैं; कोई समाज नहीं है, कोई दूसरा नहीं है। और फिर उसका उपयोग'' क्या हैं जब ब्रह्म ही अकेला है? नाम की जरूरत पड़ती है क्योंकि तूम अकेले नहीं हो। तुम्हें एक श्रेणी में डालना, तुम्हें नाम देना जरूरी है, जिससे तुम्हें बुलाया जा सके, याद किया जा सके। यदि तुम अकेले 'ही हो 'इस पृथ्‍वी पर 'तो फिर तुम्‍हें किसी नाम की कोई आवश्यकता नहीं होगी। और ब्रह्म अकेला है—तो कौन उसे नाम देगा? दूसरा कोई है ही नहीं। और उसकी कोई उपयोगिता भी नहीं है।
पहली और बहुत और बहुत आधारभूत बात उपनिषदों के बारे में समझ लेना हे। क्‍योंकि सभी धर्मों ने कुछ न कुछ नाम दिये है। हिंदुओं ने हजारों नाम दिये हे। उनके पास एक किताब है—विष्‍णु सहस्‍त्रनाम, जिसमें ईश्‍वर के एक हजार नाम दिये गये है। पूरी किताब बस नामों से भरी पड़ी है। ईसाइयों ने, मुसलमानों ने, हिंदुओं ने, सभी ने उसे कुछ न कुछ नाम दिये है। ताकि प्रार्थना की जा सके। सब नाम झूठे है। लेकिन तब तुम उस दिव्‍य को कैसे पुकारोगे? तुम उसे किस भांति बुलाओगे? तुम उससे किस तरह संबंधित होओंगे? तुम किसी नाम की जरूरत है। लेकिन उपनिषद कोई नाम देने के लिए राज़ी नहीं है।
उपनिषद शुद्धतम संभव देशना है। वे कोई समझौता नहीं करते। वे तुम्हारे लिए कोई समझौता नहीं करते। वे बड़े यथार्थ हैं, कठोर हैं और शुंर्द्धूं ही बने रहने की उनकी चेष्टा है। तो उपनिषद ब्रह्म को किस नाम से पुकारते हैं? वे उसे केवल 'तत्'—'वह:. 'कहते हैं। वे उसे कोई नाम नहीं देते। 'वह 'कोई नाम नहीं है। 'वह' एक संकेत है। और उसमें बड़ा भेद है। जब तुम्हारे पास'' कोई नाम नहीं होता, तो तुम इशारे से कहते हो 'वह'। यह अज्ञात की ओर उठी उंगली' हैं, किस दिशा में इशारा करती उंगली है। इसलिए उपनिषद उसे 'तत्' कह कर पुकारते हैं।
तुमने उपनिषदों का एक बहुत प्रसिद्ध वचन सुना होगा—'तत्वमसि'—तू भी वही है। तुम भी ब्रह्म हो, लेकिन उपनिषद उसे 'वह' कह कर ही पुकारते हैं। यह कहना भी कि उसे पुकारते हैं ठीक नहीं है, क्योंकि जैसे ही 'वह', 'उसे' शब्दों का उपयोग किया जाता है, वह परम एक व्यक्ति हो जाता है। उपनिषद नहीं कहते कि वह कोई व्यक्ति है। वह केवल एक शक्ति है, ऊर्जा है, जीवन है, लेकिन कोई व्यक्ति नहीं है। इसीलिए वे उसे 'तत्' कह कर पुकारते हैं। यही एकमात्र नाम है जो उपनिषद उस परम के लिए उपयोग में लाते हैं।
इसमें सचमुच बहुत—सी बातें अंतर्निहित हैं। एक, यदि कोई उसका नाम नहीं है, या यदि उसका नाम केवल 'वह' है तो प्रार्थना असंभव हो जाती है। तुम उस पर ध्यान कर सकते हो, लेकिन तुम प्रार्थना नहीं कर सकते। उपनिषद वास्तव में प्रार्थना में भरोसा नहीं करते, उनका भरोसा ध्यान में है। प्रार्थना किसी व्यक्ति से संबोधित होती है। ध्यान तो अपने में डूबना, भीतर उतरना है। व्यक्ति तो तुमसे कहीं बाहर है, लेकिन 'वह', ब्रह्म, वह परम शक्ति, तुम्हारे भीतर है। तुम्हें उससे किसी अन्य की भांति संबंधित नहीं होना है, तुम्हें तो सिर्फ भीतर गहरे डूब जाना है, तुम्हें सिर्फ अपने ही भीतर उतरना है और तुम उसे पा लोगे क्योंकि 'तू भी वही है'
ब्रह्म को अन्य की भांति लेना उपनिषदों के लिए असत्य है। नहीं कि दूसरा ब्रह्म नहीं है, सभी कुछ ब्रह्म है, दूसरा भी ब्रह्म ही है। लेकिन उपनिषद कहते हैं कि यदि तुम उसे अपने भीतर अनुभव नहीं कर सकते तो उसे बाहर अनुभव करना असंभव है—क्योंकि निकटतम स्रोत भीतर है, बाहर तो बहुत दूर है। और यदि निकटतम नहीं जाना गया तो तुम दूर को कैसे जान सकते हो ई यदि तुम उसे अपने भीतर ही महसूस नहीं कर सकते तो तुम उसे दूसरों के भीतर कैसे महसूस कर सकते हो? यह असंभव है।
पहला कदम भीतर उठाना है। वह, ब्रह्म, वहा से निकटतम है। तुम ही वह हो। निकटतम कहना भी गलत है, इतनी भी दूरी नहीं है वहा—क्योंकि जब कोई निकट भी है, तो भी दूरी है। निकटता भी दूरी बतलाती है, निकटता भी एक प्रकार की दूरी है। वह तुम्हारे निकट भी नहीं है—क्योंकि तुम ही वह हो। इसलिए बाहर क्यों भटकना? वह घर में ही है। तुम मेहमान की तलाश कर रहे हो और वह मेजबान है। तुम मेहमान के आने की प्रतीक्षा कर रहे हो और वह मेजबान पहले से ही बैठा है। वह तुम्हीं हो।
इसलिए पहली बात : उपनिषदों के लिए कोई प्रार्थना नहीं है, केवल ध्यान है। प्रार्थना दो के बीच संबंध है, जैसे कि प्रेम। ध्यान संबंध नहीं है दो के बीच। यह समर्पण की भांति है। ध्यान भीतर जाना है, स्वयं का स्वयं के प्रति समर्पण है—परिधि को नहीं पकड़ना है, बल्कि भीतर गहरे में केंद्र पर उतरना है। और जब तुम अपने केंद्र पर हो तो तुम उसी में हो—तत् ब्रह्म।
दूसरी बात : जब उपनिषद उसे 'वह' कह कर पुकारते हैं तो इसका अर्थ है कि वह स्रष्टा नहीं है, बल्कि वह सृजन है, क्योंकि जैसे ही हम कहते हैं कि ईश्वर स्रष्टा है, हमने उसे व्यक्ति बना दिया। और न केवल हमने उसे व्यक्ति बना दिया, हमने अस्तित्व को दो में बांट दिया—स्रष्टा और सृजन। द्वैत आ गया। उपनिषद कहते हैं कि वह सृजन है। अथवा अधिक ठीक होगा कहना कि वह सृजनात्मकता है, सृजन की शक्ति है।
मैं सदा इस बात को नृत्य के उदाहरण से स्पष्ट करना पसंद करता हूं। एक चित्रकार चित्र बनाता है, लेकिन जैसे ही उसने चित्र बना लिया, चित्रकार चित्र से पृथक हो गया। अब चित्रकार मर भी जाये तो भी उसका चित्र रहेगा। या तुम चित्र को नष्ट कर दो तो उससे चित्रकार नष्ट नहीं हो जायेगा। वे दोनों पृथक हैं। अब चित्र सदियों तक बिना चित्रकार के रह सकता है। चित्रकार की कोई आवश्यकता नहीं है। एक बार चित्र बन गया, बात पूरी हो गयी, संबंध टूट गया।

 तथाता का महान नृत्य 257

नर्तक को देखो। वह नाचता है, लेकिन उसका नृत्य उससे पृथक नहीं है, उसे पृथक नहीं किया जा सकता। यदि नर्तक मर जाये तो उसका नृत्य भी मर जायेगा। नृत्य नर्तक से अलग नहीं है, नृत्य नर्तक के बिना जी नहीं सकता। और नर्तक भी बिना नृत्य के नहीं हो सकता; क्योंकि जिस क्षण नृत्य नहीं है तो व्यक्ति भले ही हो सकता है, लेकिन वह नर्तक नहीं है।
उपनिषदों की दृष्टि में ईश्वर का संसार से संबंध नृत्य और नर्तक का है। इसीलिए हमने शिव को नटराज की भांति चित्रित किया है। इसका बहुत गहन अर्थ है—कि यह संसार कोई गौण चीज नहीं है जिसे ईश्वर ने एक बार बना दिया, और फिर भूल गया और अलग हो गया। यह संसार कोई द्वितीय श्रेणी की चीज नहीं है। यह इतना ही प्रथम कोटि का है जितना कि परमात्मा, क्योंकि यह संसार उसका नृत्य है, लीला है, खेल है। उसे पृथक नहीं किया जा सकता।
ब्रह्म को 'वह' कह कर पुकारने का अर्थ है. जो भी है, वह ब्रह्म ही है—प्रकट और अप्रकट, सृजन और स्रष्टा, वह दोनों है।
'तत्' शब्द का और भी एक सूक्ष्म अर्थ है। बुद्ध ने उस अर्थ का बहुत उपयोग किया है, और बौद्धों की अलग परंपरा भी है जो इस 'तत्' शब्द पर आधारित है। बुद्ध ने उसे 'तथाता' कहा है। इसीलिए बुद्ध का नाम 'तथागत' पड़ गया—वह व्यक्ति जिसने तथाता को उपलब्ध कर लिया, जिसने 'तत्' को पा लिया। यह शब्द 'तथाता' बड़ा अनूठा है। क्या अर्थ है इसका? यदि तुम पैदा हुए हो तो बुद्ध कहेंगे, '' बात ऐसी है कि तुम पैदा हुए हो—'सच इज द केस''' बस इससे आगे कोई कथन नहीं। यदि तुम मरते हो तो बुद्ध कहेंगे, ''बात ऐसी है कि तुम मरते हो! '' कोई और बात ही नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं। चीजें ऐसी हैं। तब सब कुछ स्वीकार हो जाता है। यदि तुम कहते हो, ''चीजें ऐसी हैं कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूं बीमार हो गया हूं बात ऐसी है कि मैं हार गया हूं बात ऐसी है कि मैं जीत गया हूं—बात ऐसी है. ''तब तुम कुछ भी दावा नहीं करते, और तुम निराश नहीं होते क्योंकि तुम कुछ अपेक्षा ही नहीं करते। चीजों की प्रकृति ही ऐसी है। तब जो भी पैदा होगा वह मरेगा, जो स्वस्थ है वह रुग्ण होगा, जो युवा है वह बूढ़ा होगा, जो सुंदर है वह कुरूप होगा। ऐसा चीजों का स्वभाव है।
तुम व्यर्थ ही चिंतित हो जाते हो—तुम्हारी चिंता से इस तथाता में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। तुम व्यर्थ ही उसमें उलझ जाते हो। तुम्हारी उलझन से कोई बदलाहट नहीं हो सकती। सब कुछ अपने ही हिसाब से होता रहेगा। तथाता, तथाता की यह सरिता, तुम्हारे बावजूद बहती रहेगी। तुम क्या करते हो इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, तुम क्या सोचते हो इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वस्तुओं के स्वभाव में तुम कोई फर्क नहीं ला सकते।
एक बार यह बात तुम्हारे दिल में बैठ जाए तो जीवन से तुम्हें कोई विषाद नहीं हो सकता। फिर जीवन तुम्हें कुंठित नहीं कर सकता, निराश नहीं कर सकता। और तथाता की इस प्रतीति के साथ तुम्हारे प्राणों में एक सूक्ष्म आनंद उमगता है। फिर तुम हर बात का आनंद ले सकते हों—वस्तुत: 'तुम' तो होते ही नहीं। 'ऐसा स्वभाव है, ऐसा अस्तित्व है, ऐसा चीजों का ढंग है', इस एहसास के साथ ही तुम्हारा अहंकार खो जाता है।
तुम्हारा अहंकार बच कैसे सकता है? वह तो तभी होता है जब तुम सोचते हो कि वस्तुओं के स्वभाव में तुम कुछ परिवर्तन ला सकते हो। वह तभी होता है जब तुम सोचते हो कि तुम स्रष्टा हो—तुम स्वाभाविक कम बदल सकते हो, तुम प्रकृति को संचालित कर सकते हो। उसी क्षण, जब तुम सोचते हो कि तुम प्रकृति को संचालित कर सकते हो, अहंकार आ जाता है, तुम अहंकारी बन जाते हो। तुम ऐसे सोचने और व्यवहार करने लगते हो जैसे कि तुम पृथक हो।

किसी ने रिंझाई से पूछा, ''तुम्हारी साधना क्या है? तुम्हारा ध्यान क्या है? ''
तो उसने कहा, ''कोई ध्यान नहीं। जब मुझे भूख लगती है तो मैं भूख अनुभव करता हूं और भिक्षा मताने जाता हूं। जब नींद आती है तो सो जाता हूं। जब नींद खत्म होती है और आख खुलती है तो मैं जाग जाता हूं। मेरी और कोई साधना नहीं है, और कोई ध्यान नहीं है और न कोई तपस्या है। प्रकृति जैसी है, मैं वैसा ही बहता हूं। जब गर्मी होती है तो मैं पेड़ की छाह में चला जाता हूं। मेरा स्वभाव ही छांह की ओर बढ़ता है। जब पेड़ की छाह में सर्दी लगने लगती है तो धूप में चला जाता हूं। लेकिन मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। वस्तुओं का स्वभाव ऐसा है। ''
जरा इसका सौंदर्य देखो. वह कहता है, ''ऐसा चीजों का स्वभाव है। जब भूख लगती है, मैं भीख मांगने जाता हूं—नहीं कि मैं भीख मांगने जाता हूं... ऐसा चीजों का स्वभाव है। भूख भीख मांगने जाती है। नहीं कि मैं धूप की गर्मी से पेडू की छाह में चला जाता हूं—ऐसा चीजों का स्वभाव है। शरीर जाता है और मैं इस सबको होने देता हूं और मैं आनंदित हूं क्योंकि मैं सब कुछ होने देता हूं। कुछ भी मुझे दुखी नहीं कर सकता। ''

दुख तभी आता है जब तुम बीच में आने लगते हो, तब तुम बाधा देने लगते हो। तुम तथाता को बहने नहीं देते, तुम उसमें प्रतिरोध खड़े करने लगते हो। तुम चीजों का ढंग बदलना चाहते हो, फिर दुख आता है। कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तुम्हारा सम्मान करता है—तुम फूल जाते हो। तुम सोचते हो कि तुम्हारे अंदर महान प्रतिभा है और अब लोग पहचान रहे हैं। वह थी तो हमेशा से—तुम्हें तो पता ही था—लेकिन लोग अब पहचाने हैं, अब लोग अधिक समझदार हो गये हैं इसलिए वे तुम्हारी महानता को पहचान सकते हैं।
लेकिन फिर पीछे अपमान आता है और चीजों का स्वभाव ही ऐसा है कि सम्मान के पीछे अपमान आता है, वह उसकी छाया है। वह दूसरा हिस्सा है, उसी सिक्के का दूसरा पहलू है। और जब वह आता है, तुम उदास हो जाते हो, तुम निराशा से भर जाते हो, तुमको लगता है कि आत्महत्या कर लें। चारों तरफ पूरी दुनिया तुम्हें गलत लगती है, पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन मालूम पड़ती है।
जो व्यक्ति चीजों के स्वभाव को समझता है, वह दोनों का मजा लेगा। वह कहेगा, ''ऐसा चीजों का स्वभाव है, कि लोग मुझे सम्मान दे रहे हैं। और ऐसा चीजों का स्वभाव है कि सम्मान के पीछे अपमान आता है, जीत के पीछे हार आती है, सुख के पीछे दुख आता है, स्वास्थ्य के पीछे बीमारी आती है—ऐसा चीजों का स्वभाव है! जवानी के पीछे बुढ़ापा आता है, और जन्म के पीछे मृत्यु आती है—ऐसा चीजों का स्वभाव है। ''
तो कोई भी परिस्थिति हो, अगर तुम यह महसूस कर सको कि ऐसा है और इससे अन्यथा होना संभव नहीं है, कि जो संभव है वही घटता है.. वह सदा ही घट रहा है—जो संभव है। और जो असंभव है वह कभी नहीं घटता। और अगर तुम असंभव की मांग कर रहे तो तुम चीजों के स्वभाव के विपरीत होने की कोशिश कर रहे हो। तथाता का जो दर्शन है वह सिर्फ इतना ही है : ''असंभव को पाने की कोशिश मत करो; जो संभव है उसके साथ बहो और तुम कभी दुखी नहीं होओगे। '' आनंद उन्हें. ही मिलता है जो तथाता के भाव के साथ बहते हैं।
बुद्ध के हुए। और उनके शिष्यों को लगा कि बुद्ध को तो का नहीं होना चाहिए। बुद्ध और के हों? शिष्य इस बात की कल्पना ही न कर सके क्योंकि शिष्यों की अपनी कल्पनाएं होती हैं। वे सोचते हैं कि बुद्ध प्राकृतिक नियमों के अधीन नहीं हैं। वे सोचते हैं कि उन्हें नहीं मरना चाहिए, कि उन्हें सदा युवा रहना चाहिए। तो आनंद ने बुद्ध से कहा, ''हमें बड़ा दुख होता है कि अब आप पर वृद्धावस्था उतर रही है। यह हमारी कल्पना के बाहर है कि आप जो कि प्रबुद्ध हो गये हैं, जिसने परम को जान लिया है, वृद्ध हो जायें। ''
बुद्ध ने कहा, ''चीजों का स्वभाव ऐसा है। हर किसी के लिए—फिर वह बुद्ध हो या अबुद्ध, ज्ञानी हो या अज्ञानी—चीजों का स्वभाव एक जैसा है, समान है। मैं का होऊंगा और मैं मरूंगा, क्योंकि जो भी पैदा हुआ है वह मरेगा। ऐसा चीजों का स्वभाव है। '' आनंद दुखी है, बुद्ध नहीं। क्योंकि आनंद असंभव की अपेक्षा कर रहा है—चीजों के स्वभाव के विपरीत।
जब श्री अरविंद की मृत्यु हुई तो पूरा अरविंद— आश्रम यह मानने को तैयार नहीं था कि अरविंद मर सकते हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। सारी दुनिया में फैले उनके शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि श्री अरविंद मर सकते हैं! कुछ महीनों तक तो यह अफवाह थी कि वे पुनरुज्जीवित हो जायेंगे। और कुछ दिनों तक उन्होंने उनके शव को भी सुरक्षित रखने की कोशिश की। उनके शिष्यों के बीच यह अफवाह थी कि वे मरे नहीं हैं, बल्कि गहरी समाधि में हैं, गहन ध्यान में चले गये हैं। लेकिन तीन दिन बाद शरीर सड़ने लगा और उसमें से बदबू आने लगी। वे सचमुच मर गये थे। ऐसा चीजों का स्वभाव है।
प्रकृति बहुत बड़ी साम्यवादी है। वह कोई भेद नहीं करती। और अच्छा है कि वह भेद नहीं करती। वह पक्षपातपूर्ण नहीं है। यदि तुम बुद्ध हो तो इतना ही फर्क होगा कि तुम इस तथाता को स्वीकार करोगे। यदि तुम अज्ञानी हो तो इतना ही फर्क होगा कि तुम तथाता से लड़ते रहोगे, उसका प्रतिरोध करते रहोगे। फर्क केवल इतना है—केवल इतना, मैं कहता हूं। लेकिन यह केवल इतना सा फर्क भी बहुत बड़ा है, बल्कि सबसे बड़ा है, क्योंकि जैसे ही तुम्हें बोध होता है कि चीजें अपने ढंग से चलती हैं, कि प्रकृति की अपनी व्यवस्था है, अपने नियम हैं, तल्ला तुम उससे मुक्त हो जाते हो। नहीं कि वह अपने नियम तुम्हारे लिए बदल लेगी, लेकिन तुम बदल गये हो, तुम्हारी दृष्टिकोण बदल गया है। तुम कहोगे, ''चीजों का ऐसा स्वभाव है। ''
ब्रह्म चीजों का आत्यंतिक स्वभाव है, तथाता है। इसी के साथ समग्र स्वीकार आता है। समग्रै स्वीकार में दुख विलीन हो जाता है। दुख तुम्हारा प्रतिरोध है, दुख तुम्हारा अस्वीकार है। तुम्हीं अपना दुख पैदा करते हो। आनंद सदा उपलब्ध है, लेकिन तुम्हारे दृष्टिकोण के कारण तुम उसे उपलब्ध नहीं हो।
अब हम सूत्र में प्रवेश करें

ब्रह्म तद्वनम— वह— के नाम से विख्यात है इसलिए उसका ध्यान तद्वनम की भांति ही करना चाहिए जो ब्रह्म को ऐसा जानता है सारे प्राणी उसे प्रेम करते हैं।

ब्रह्म 'तत्'— वह— के नाम से विख्यात है इसलिए उसका ध्यान 'तत्' की भांति ही करना चाहिए। उसका ध्यान किसी व्यक्ति की भांति नहीं करना है। तब तुम्हारी कल्पना प्रवेश कर जायेगी। वहां कोई व्यक्ति नहीं है। उसका ध्यान सगुण की भांति नहीं करना है। उपनिषदों की ऐसी देशना नहीं है। उसकी कल्पना किसी भी आकृति के रूप में मत करो। बस उसे 'तत्'—वह—की भांति स्मरण करो।
लेकिन यह बड़ा कठिन है। कैसे तुम उसे 'वह' की तरह याद कर सकते हो? तुम उसका कृष्ण की तरह, राम की तरह, क्राइस्ट की तरह, बुद्ध की तरह स्मरण कर सकते हो, लेकिन तुम उसका 'वह' की तरह कैसे स्मरण करोगे? 'वह' की धारणा ही तुम्हारे मन को तोड़ देगी। तुम्हारा मन रुक जायेगा। यदि तुम उसका स्मरण 'वह' की तरह करो, वस्तुओं के तथाता— भाव की भांति करो, इस विराट विश्व की भांति करो—और उसमें सभी कुछ शामिल है—तो तुम्हारा मन एक झटके से ठहर जायेगा। तुम उसके बारे में सोच नहीं सकते; या सोच सकते हो? तुम कृष्ण के बारे में सोच सकते हो, क्योंकि तुम चित्र खींच सकते हो कि कृष्ण बांसुरी लिए खड़े हैं या नाच रहे हैं, और उनके चारों ओर गोपिया नाच रही हैं। अथवा वे राधा के साथ प्रेम लीला कर रहे हैं।
तुम कृष्ण का चित्र खींच सकते हो, लेकिन तुम 'उसका' चित्रण कैसे करोगे? कोई बांसुरी नहीं है, कोई गोपियां नहीं हैं, कोई नृत्य नहीं चल रहा है। कुछ भी तो नहीं है चित्र बनाने को। तुम 'उसकी' कल्पना कैसे कर सकते हो? कल्पना रुक जाती है। यदि तुम सचमुच ही 'उस' की कल्पना करने लगो तो उस प्रयत्न से ही तुम्हारा मन ठहर जायेगा और तुम ध्यान में प्रवेश कर जाओगे। यह 'तत्' झेन कोआन जैसा है। यह कुछ ऐसा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। यदि तुम उसकी कल्पना करने का प्रयत्न करो तो तुम्हारा मन ठहर जायेगा, और मन का ठहर जाना ही ध्यान है।
उस पर ध्यान करने का प्रयत्न ही बेतुका है। तुम उस पर ध्यान नहीं कर सकते। कुछ ध्यान करने के लिए नहीं है, कोई वस्तु नहीं है। 'वह' कोई वस्तु नहीं है। लेकिन यदि तुम कठिन प्रयास करो तो उस प्रयास में ही., क्योंकि तुम उस पर ध्यान नहीं कर सकते। नहीं कि तुम तत् पर ध्यान करने में सफल हो जाओगे—लेकिन उस प्रयत्न में ही, इस असफलता में ही कि तुम उसके बारे में सोच नहीं सकते, विचार रुक जाते हैं—क्योंकि विचार के लिए कोई लक्ष्य नहीं है, वह उसके साथ नहीं चल सकता। और जब विचार की प्रक्रिया रुक जाती है तो तुम ध्यान में होते हो।
नहीं कि 'तत्', ब्रह्म तुम्हारे समक्ष प्रकट होगा, नहीं कि तुम सत्य को अपने समक्ष खड़ा पाओगे—नहीं! जिस क्षण तुम्हारी विचार की प्रक्रिया रुक गई, तुम स्वयं ही 'तत्' हो गये, तुम उसी में डूब गये। लहर सागर में खो गयी। और यह खोना सदैव भीतर होता है, क्योंकि वहीं से तुम डूबते हो। लहर सागर में खो जाती है। तुम ही वह हो। उस पर ध्यान से तुम भी 'वह' ही हो जाओगे।
उपनिषद कहे चले जाते हैं कि जो भी ब्रह्म को जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है, जो भी 'उस' पर ध्यान करता है वह 'वही' हो जाता है, वह तत् ही हो जाता है।
ब्रह्म 'वह' के नाम से विख्यात है इसलिए उसका ध्यान 'वह' की भांति ही करना चाहिए। जो ब्रह्म को ऐसा जानता है सारे प्राणी उसे प्रेम करते हैं
और जो भी व्यक्ति ब्रह्म को इस भांति जानता है, अस्तित्व के तथाता— भाव की भांति जानता है, स्वाभाविक है कि सभी प्राणी उसे प्रेम करते हैं।
ऐसा क्यों होता है? तुम्हें अचानक लगता है कि तुम्हारे भीतर से प्रेम उमड़ रहा है और उस व्यक्ति की ओर बह रहा है जिसने ऐसी 'तथाता' को पा लिया है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा भी नहीं है कि यह अनिवार्य ही हो; तुम ऐसे व्यक्ति को घृणा भी कर सकते हो, क्योंकि घृणा भी प्रेम का ही दूसरा रूप है। लेकिन तुम ऐसे व्यक्ति के प्रति उदासीन नहीं रह सकते, यही असली बात है। यदि ऐसा व्यक्ति मौजूद है तो या तो तुम उससे प्रेम कर सकते हो, या फिर तुम उससे घृणा कर सकते हो, लेकिन तटस्थ नहीं रह सकते। घृणा संभव है, क्योंकि घृणा प्रेम का ही उलटा रूप है। यह ऐसे ही है जैसे प्रेम शीर्षासन कर रहा हो। लेकिन तुम उदासीन नहीं रह सकते।
क्यों प्रेम घटता है? क्यों घृणा पैदा होती है? और क्यों तटस्थता संभव नहीं है? क्योंकि ऐसे व्यक्ति का अस्तित्व तुम्हारे हृदय को गहरे में छूता है, यह तुम्हारे हृदय के तारों को छेड़ता रहता है। और तुम्हारा हृदय एक वीणा हो जाता है। ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति ही तुम्हारे हृदय की वीणा के तारों को झंकृत कर देती है। ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति ही तुम्हारे भीतर के 'तत्' को जगा देती है। वह एक चुंबकीय शक्ति हो जाता है और तुम्हारे सोये ब्रह्म की नींद टूटने लगती है। तुम्हारा सोया ब्रह्म अपनी आखें खोलता है और इस जागे हुए ब्रह्म को देखता है, और फिर प्रेम अथवा घृणा पैदा होती है।
यदि तुम ग्रहणशील, समर्पणपूर्ण, श्रद्धावान हो, तो तुम्हारे भीतर प्रेम घटित होगा। यदि तुम शंकालु, संशयी, समर्पणरहित, अहंकारी हो तो तुम्हारे भीतर घृणा पैदा होगी। लेकिन तटस्थता असंभव है। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि बुद्ध गांव से गुजरें और कोई उनके प्रति तटस्थ रह सके। या तो प्रेम या तो घृणा होगी ही। लेकिन दोनों ही संबंध हैं : तुम संबंधित होने लगोगे।
प्रेम कहता है, ''मैं तुम्हारे साथ चलने को राजी हूं। '' घृणा कहती है, ''मुझे मत खींचो। मैं समर्पण करने को राजी नहीं हूं मैं प्रतिरोध करूंगी। '' प्रेम कहता है, ''मैं तुम्हारे पीछे चलने को और तुम्हारे साथ गिरने को राजी हूं। '' घृणा कहती है, ''मैं अपना अहंकार समर्पित नहीं कर सकती। और चूंकि मैं अपना अहंकार समर्पित नहीं कर सकती, मैं तुम्हें घृणा करूंगी, क्योंकि जैसे ही प्रेम होगा, समर्पण हो जाएगा। '' और कभी—कभी ऐसा होता है कि जब तुम किसी व्यक्ति के प्रेम में होओ तो शायद तुम इतने गहरे संबंधित नहीं भी होओ, जितने कि तुम उसके प्रति घृणा से भरने पर होते हो।

एक कहानी मैंने सुनी है

एक ऋषि किसी व्यक्ति पर बहुत क्रोधित हो गया। वह इतना क्रोधित हो गया कि उसने उसे श्राप दे दिया। श्राप बड़ा भयंकर था, और उस आदमी को उसकी यातना सहने के लिए बार—बार जन्मना पड़ेगा। वह आदमी उस ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा—याचना करने लगा। लेकिन श्राप तो बदला नहीं जा सकता, इसलिए ऋषि ने कहा, '' अब कुछ भी नहीं किया जा सकता श्राप को बदलने के लिए। तुम्हें उसे भोगना ही पड़ेगा। केवल एक बात की जा सकती है, यदि तुम परमात्मा के नाम का स्मरण करते रहो तो श्राप का इतना भयंकर प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम अलग ही छूट जाओगे; तुम इतने दुखी नहीं होओगे। लेकिन तुम्हें उसे भोगना तो पड़ेगा ही। ''
तो उस व्यक्ति ने पूछा, ''कृपया मुझे उसका नाम स्मरण रखने की तरकीब बता दें ताकि मैं उसका नाम नहीं भूलूं। ''तो ऋषि ने कहा, ''तब तुम परमात्मा से घृणा करो। उसे प्रेम मत करना, क्योंकि प्रेम में तो उसे भूल भी सकते हो, लेकिन घृणा में नहीं भूलोगे। परमात्मा को घृणा करो, और उसे गालियां दो, गालियों पर गालियां देते रहो। उसे गाली दें—देकर तुम उसे याद करते रहोगे।''
प्रेम भूल भी सकता है, लेकिन घृणा नहीं भूल सकती। प्रेम भूल सकता है क्योंकि धीरे— धीरे वह प्रेमी के साथ एक हो जाता है। परंतु घृणा एक सतत सतर्कता है, तुमको अपने को बचाना है। आकर्षण है वहा—एक बुद्ध तुम्हें खींच रहे हैं—तुम्हें संघर्ष करना है। यदि तुम जरा भी चूके, यदि तुम एक क्षण को भी भूले, तो तुम धारा में बह जाओगे। इसलिए तुम्हें लगातार सतर्क रहना पड़ता है। घृणा भी एक उल्टे ढंग का प्रेम—संबंध है।
एक व्यक्ति जो कि बुद्ध हो गया है, जिसने कि 'तत्' को जान लिया है, वह तुम्हें आकर्षित करेगा—या तो तुम उसे प्रेम करो या घृणा करो। लेकिन एक बात पक्की है, कि तुम उसके प्रति उदासीन नहीं हो सकते, क्योंकि वह इतने गहरे चला गया है कि उसकी गहराई तुम्हारे भीतर गूंजेगी, प्रतिध्वनि पैदा करेगी, प्रतिछवि बनाएगी। उसकी गहराई तुम्हारी गहराई को पुकारेगी। वह तुम्हारे लिए एक आह्वान हो जाएगा। नहीं कि वह व्यक्ति अपनी ओर से कुछ करेगा, केवल उसका होना ही, सिर्फ उसका अस्तित्व ही कुछ करेगा। उसकी अपनी तरफ से कोई भी प्रयास नहीं होता है।
एक फूल को देख कर तुम कह उठते हों—सुंदर! तुम्हारे भीतर कुछ हुआ। नहीं कि फूल ने कुछ किया है। फूल को तो पता भी नहीं है कि तुम वहां से गुजर रहे हो। लेकिन तुम कहते हों—सुंदर! जब तुम्हारा हृदय कहता है कि सुंदर, तो कुछ तुम्हारे हृदय के भीतर हुआ है, फूल ने तुम्हें कहीं गहरे में छुआ है। तुम रात्रि को पूरा चांद देखते हो, और अचानक तुम मौन हो जाते हो। उस गहराई, उस सौंदर्य, उस मनोहरता ने तुम्हें भी स्पर्श किया।
ऐसा ही है : जब कोई व्यक्ति जिसने ब्रह्म को जान लिया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया है, तुम्हें छूता है तो उसका वह स्पर्श किसी भी फूल के स्पर्श से, किसी भी पूरे चांद के स्पर्श से गहरा होता है, वह इस जगत की किसी भी चीज के स्पर्श से गहरा होता है, क्योंकि ब्रह्म की अनुभूति गहनतम है, आत्यंतिक है, मूलभूत है। ऐसे व्यक्ति के सिर्फ निकट होने से ही तुम रूपांतरित हो जाते हो।
इसीलिए भारत में गुरु के निकट रहने पर इतना जोर है—केवल गुरु के निकट, उसके सान्निध्य में रहना। उसका सान्निध्य ही तुम्हें रूपांतरित करता है, क्योंकि उसकी गहराई तुम्हारी गहराई को पुकारती है, उसकी भीतरी शाति तुम्हारी शाति को पुकारती है, उसका आनंद तुम्हारे आनंद के लिए भी आह्वान हो जाता है। गुरु की उपस्थिति ही सम्मोहक होती है। वह तुम्हें रूपांतरित करता जाता है, बदलता जाता है।  ''श्रीमन् मुझे उपनिषद की शिक्षा दें। ''
अब शिष्य बोलता है। अब तक गुरु बोल रहा था, और अब शिष्य पहला और आखिरी प्रश्न पूछता है—एकमात्र प्रश्न। बहुत ही सुंदर है! क्योंकि वह केवल प्रतीक्षा कर रहा था। तुम्हें पता भी नहीं होगा कि शिष्य भी वहा उपस्थित था। केवल गुरु ही बोल रहा था, जैसे कि शिष्य वहा था ही नहीं। वह केवल आख और कान ही हो गया होगा, उसने बीच में कोई दखल नहीं दिया। अब अंतिम क्षण वह एक प्रश्न पूछता है :
''श्रीमन् मुझे उपनिषद की शिक्षा दें। ''
उपनिषद शब्द का अर्थ होता है—रहस्यमय शिक्षा, गुप्त शिक्षा, गुह्य देशना। 'उपनिषद' का अर्थ होता है गुप्त मार्ग, गुप्त कुंजी—रहस्यपूर्ण, गढ़, अज्ञात। उपनिषद का अर्थ होता है—रहस्य।
शिष्य पूछता है : ''श्रीमन् मुझे उपनिषद की शिक्षा दें ''
और गुरु कहता है : उपनिषद तुम्हें दे दिया गया है। हमने वस्तुत: तुम्हें ब्रह्म से संबंधित उपनिषद दे दिया है
यहां पर एक बहुत ही सूक्ष्म और नाजुक बात समझने की है। गुरु समझा रहा था, बोल रहा था और शिष्य बहुत ही सतर्क होकर, एकचित्त होकर, बौद्धिक रूप से सजग होकर सुन रहा था, ताकि जो भी कहा जा रहा था उसे समझ सके। और जो भी कहा जा सकता है, कह दिया गया। ब्रह्म के बारे में जो भी ज्ञान दिया जा सकता है, वह दे दिया गया है। जो भी शब्दों में कहा जा सकता है, बोला जा सकता है बोल दिया गया है। और शिष्य पूछता है, '' अब मुझे उपनिषद की शिक्षा दें, उस गुप्त से भी गुप्त रहस्य को बताएं। इसका क्या अर्थ है? '' और गुरु कहता है, ''उपनिषद तुम्हें पहले ही दे दिया गया है। ''
गुरु बोल रहा है—यह एक तल पर है—और जब शिष्य सुनने में लगा है, तब एक दूसरे तल पर वह रहस्य उसे दिया जा रहा है।
इसीलिए शिष्य को पता नहीं है; वह बौद्धिक रूप से व्यस्त है। उसका ध्यान शब्दों पर है, पर भीतर गहरे में कुछ हस्तांतरित किया जा रहा है। और वह हस्तांतरण ही रहस्य है, वही वास्तविक उपनिषद है। लेकिन उसे कहा नहीं जा सकता। वह निःशब्द हस्तातरण है, मौन संप्रेषण है।
भारत ने जितने महान गुरु पैदा किए हैं उनमें से एक, बोधिधर्म, चीन गया। उसके बारे में कहा जाता है कि वह एक ऐसे शास्त्र के साथ चीन आया जो था ही नहीं—जिसका कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं था। उसने उस शास्त्र को बिना हस्तांतरित किए ही हस्तांतरित कर दिया। वह जरूर एक कुशल गुरु रहा होगा जिसने बिना शब्दों के ही सब कुछ संप्रेषित कर दिया।
वह दीवार की ओर मुंह करके बैठता था, वह कभी भी श्रोताओं की ओर मुंह करके नहीं बैठता था। उसकी पीठ ही तुम्हारी तरफ होगी। वह कभी तुम्हारी ओर नहीं देखेगा; वह सिर्फ दीवार की ओर ही देखेगा। और बहुत—से लोग बोधिधर्म से पूछते, ''यह कौन—सा ढंग है? यह कौन—सा तरीका है? आप किस तरह के आदमी हैं? हमने किसी को भी दीवार की ओर मुंह करके बैठते हुए नहीं देखा है, और हम आपको सुनने आए हैं। ''
बोधिधर्म कहा करता था, ''जब ठीक आदमी आ जायेगा तो मैं अपना मुंह पलट लूंगा। और ठीक आदमी वही होगा जो मुझे मौन में भी समझ सकता है। मुझे तुम लोगों में कोई भी रस नहीं है। ''
और तब एक दिन वह ठीक आदमी आया और उस ठीक आदमी ने बोधिधर्म से कहा, ''मेरी ओर घूमो, वरना मैं अपना सिर काट दूंगा। ''
तो बोधिधर्म तुरंत घूमा और बोला, ''तो तुम आ गये? अब मौन बैठ जाओ और मैं तुम्हें वह दूंगा। '' संप्रेषण में एक शब्द भी नहीं बोला गया, और दूसरा व्यक्ति भी गुरु हो गया। और बोधिधर्म विलीन हो गया। उसने कहा, ''मैं इस व्यक्ति की नौ वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था। '' और वह दूसरा आदमी गुरु हो गया। एक शब्द भी नहीं बोला गया।
तुम्हारे भीतर परतें हैं। सबसे ऊपर की जो परत है, सबसे सतही, वह भाषा को समझती है, और जो गहरी से गहरी परत है वह मौन को समझती है। और गुरुओं को उपाय खोजने पड़ते हैं। ये उपदेश, ये मौखिक प्रवचन—सब उपाय हैं, तरकीबें हैं।
मैं तुमसे बोलता रहता हूं। एक युवक अभी दो दिन पहले ही आया और उसने कहा, '' आप बड़े विरोधाभासी हैं। आप कहते हैं कि कुछ भी नहीं कहा जा सकता है और आप रोज सुबह—शाम तीन—तीन घंटे बोलते रहते हैं। आप बड़े विरोधाभासी हैं। आप कहते हैं कि उस के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, और आप कहे चले जाते हैं।''
वह सही है, मैं विरोधाभासी हूं। उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, पर फिर भी मैं कुछ न कुछ कहता रहता हूं। वह कुछ कहना सिर्फ तुम्हारे ध्यान को एक तल पर लगाये रखने के लिए है, ताकि दूसरे तल पर मौन में कुछ प्रवेश कर सके।
गुरु कहता है, ''उपनिषद तुम्हें पहले ही दे दिया गया है, और तुम कहते हो कि मुझे उपनिषद की शिक्षा दो। और मैं सारे समय कर क्या रहा था?''
लेकिन शिष्य बौद्धिक रूप से संलग्न था। उसे अभी पता नहीं है कि उसे क्या घटित हुआ है। खबर अभी उसकी बुद्धि तक नहीं पहुंची है। इसमें समय लगेगा। तो ऐसा होता है। जब तुम यहां हो तो शायद तुमने मुझे नहीं समझा हो, लेकिन उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। यदि मौन में संबंध जुड़ गया है तो थोड़ा समय लगेगा तुम्हें महसूस करने में कि भीतर कुछ हो गया है। खबर पहुंचने में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि बुद्धि तुम्हारे अंतर्तम केंद्र से बहुत दूर है। यदि वहां कुछ घटता है तो तुम्हें उसका पता नहीं चलेगा। बल्कि मुझे पहले उसका पता चल जायेगा। इसीलिए जब तुम ध्यान कर रहे होते हो तो मैं तुम्हें देखता रहता हूं ताकि मुझे पता चल सके कि क्या घटित हो रहा है—क्योंकि अभी तुम सक्षम नहीं हो कि तुम्हें उसका पता चल सके। उसमें समय लगेगा। एक दिन संदेश आयेगा, वह यात्रा करेगा, वह तुम्हारी सभी पर्तों व केंद्रों से गुजरेगा। और तब वह तुम्हारे मस्तिष्क तक पहुंचेगा और तब तुम उसे पहचान पाओगे। लेकिन इस सबमें वर्षों लग सकते हैं।
मेरे अति निकट लोगों में एक अभी कुछ दिन पहले कह रहा था, ''आपने मेरे लिए कुछ भी नहीं किया और मैं आपके साथ दो वर्षों से रह रहा हूं। '' अभी खबर नहीं पहुंची है, उसे वक्त लगेगा।
गुरु कहता है
उपनिषद तुम्हें दे दिया गया है हमने वस्तुत: तुम्हें ब्रह्म से संबंधित उपनिषद दे दिया है।
तप दमन और कर्म उपनिषद के आधार हैं। वेद उसके अंग हैं और सत्य उसका आवास है
संक्षेप में गुरु उपनिषद की परिभाषा करता है : तप?..। तप का अर्थ है प्रयास, अथक प्रयास। जब तुम किसी भी प्रयास में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हो तो वह तप हो जाता है—कोई भी प्रयास। यदि तुम्हारी पूरी ऊर्जा उसमें लग जाती है तो वह तप हो जाता है। ध्यान करते समय यदि तुम अपने को रोक लेते हो तो वह तप नहीं है। तुम प्रयत्न तो कर रहे हो लेकिन वह कुनकुना है, सतही है। तुम उसमें गहरे नहीं जा रहे हो, उसमें समग्रता से नहीं उतर रहे हो। जब तुम उसमें पूरी समग्रता से उतरते हो तो ताप पैदा होता है, इसलिए तप कहा है। तप का अर्थ होता है ताप, गर्मी। जब तुम किसी भी प्रयास में पूरे प्राण से उतरते हो तो उससे तुन्हारे भीतर एक गर्मी पैदा होती है। उससे वस्तुत: गर्मी पैदा होती है, और वह गर्मी बहुत सी चीजों को रासायनिक ढंग से बदल देती है। तुम दूसरे ही आदमी हो जाते हो, तुम तप के द्वारा एक भिन्न ही व्यक्ति हो जाते हो, क्योंकि वह गर्मी तुम्हारे भीतर रासायनिक परिवर्तन कर देती है। वह क्ज ० अलग प्रकार का व्यक्तित्व निर्मित कर देती है।

  इस युग में गुरजिएफ ने 'तप' की बहुत—सी विधियों का उपयोग किया। वह तुम्हें कोई भी विधि दे
देगा और तुमसे कहेगा, '' अपना पूरा प्रयास इसमें लगा दो; एक अंश भी पीछे देखने के लिए नहीं बचे।
अपने को पूरा ही लगा दो; प्रयास ही हो जाओ। ''
और तुम्हें आश्चर्य होगा कि कोई भी प्रयास—'कोई भी...
गुरजिएफ किसी से कहेगा, ''बगीचे में जाओ और गड्डा खोदो, और अपना सारा श्रम खोदने में रन—गइ दो, खोदने वाले को बिलकुल ही भूल जाओ, खोदना ही हो जाओ। '' वह आदमी जायेगा और खादेगा और खोदेगा। फिर गुरजिएफ आयेगा और सारी मिट्टी वापस गड्डे मैं दबवा देगा और कहा, ''यह सब बेकार है। कल सबेरे फिर से शुरू करना। ''
और वह आदमी दूसरे दिन सबेरे फिर से खोदना शुरू करेगा और यह सिलसिला कई दिनों तक चलेगा। और गुरजिएफ रोज शाम को आयेगा और मिट्टी वापस गड्डे में डलवा देगा और कहेगा, ''फिर से शुरू करो। ''
जब तक खोदने वाला खोदना ही नहीं हो जाता? जब पीछे कोई भी नहीं बचता, जब पूरे प्राण उस प्रयास में लग जाते हैं, तो वह 'तप' होता है, तो वह एक सूक्ष्म ऊष्मा हो जाता है।
गुरु कहता है कि तप और दमन..। दमन का अर्थ होता है अपने पर नियंत्रण, न कि स्वय कौ दबाना। दमन शब्द का बहुत ही गलत उपयोग किया गया है। वह स्वयं को दबाना नहीं है। वह स्वयं पर नियंत्रण रखना है। और इन दोनों में बहुत ही सूक्ष्म अंतर है। ध्यान करते समय या मौन में खड़े हुए तुम्हें ऐसा लग सकता है कि जैसे छींक .आ रही है। तुम उस' दबा सकते हो। तुम उससे लड़ने लग सकते हो, तो यह दबाना हुआ, सप्रेशन हुआ। लेकिन यदि तु;। उसके प्रति उदासीन रहे, यदि तुम उसके लिए कुछ भी नही करते, न तो तुम उसे दबाते और न तुम उसे व्यक्त करते, तुम उसके लिए कुछ भी नहीं करते, तुम सिर्फ तटस्थ खड़े रहते हो 'तो. यह स्व ——नियंत्रण है। तुम स्वयं में खड़े रहे, तुम छींक की ओर नहीं चले गये कि कुछ करो।
यदि तुम उसे अभिव्यक्त करने गये तो तुम अपने से बाहर आ गये। यदि तुम उसे दबाने चले तो फिर तुम अपने से बाहर आ गये। तुम सिर्फ अपने भीतर खड़े रहे जेसे कि छींक किसी और को' आ रही हे, और तुम्हारा कुछ लेना देना नहीं है; तुमने उसे दबाया भी नहीं, तुम उससे लड़े भा नहीं, तुम सिर्फ उदार्सान भाव से तटस्थ भाव से खड़े देखते रहे, साक्षी रहे, तो फिर यह स्व—नियंत्रण है।
दबाना बहुत सरल है क्योंकि तुम्हें कुछ करने को है। स्व —निएयंत्रण. बहुत कठिन है क्योंकि उसमें तुम्हे कुछ भी नहीं करना है। तुम्हें सिर्फ निष्कि्रय रहना है, अकर्ता, सिर्फ साक्षी बने रहना है।

तप दमन और कर्म—आधार हैं।
ये तीनों बातें गढ़—देशना, उपनिषद का आधार हैं। कर्म—सारे कृत्य कर्म नही, हैँ। जब कम समर्पित हो, जब कर्म अहंकाररहित हो, जब कर्म एक पूजा हो, ध्यान हो., जब कर्म बाहर—बाहर से तो कर्म हो, पर भीतर से कुछ और ही परमात्मा की तरफ उठ रहा हो, तभी वह कर्म है; तभी वह समर्पित कर्म है।
उदाहरण के लिए तुम किसी के आदमी की सेवा कर रहे हो या रुग्ण की सेवा कर रहे हो। यदि तुम उसे ध्यान बना सको, पूजा बना सको, यदि तुम उस बूढ़े अथवा रुग्ण की तरफ परमात्मा की भांति देख सको 'उसे' देख सको; यदि तुम उसकी सेवा 'कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि गहरे ध्यान के लिए, इस क्षण में होने के लिए कर सको—तो तुम्हारी सेवा ध्यान हो जाती है, तब वह 'कर्म' हो जाती है। यदि तुम उसमें से कुछ भी पाना चाहते हो तो उससे कारण और कार्य की शृंखला बनेगी।
यदि तुम सोचते हो कि यह का आदमी—चाहे वह तूम्हारे पिता ही क्यों न हों—इसके पास 'काफी जायदाद है, बैंक—बैलेंस है, यदि तुम्हारी आंखें उस बैंक—बैलेंस पर लगी हैं, तो फिर यह कर्म नहीं है। लेकिन यह बैंक—बैलेंस कई रूपों में हो सकता है। तुम इस के आदमी की सेवा स्वर्ग पाने के लिए भी कर सकते हो; वह भी बैंक—बैलेंस ही है। तुम शायद इस वृद्ध की सेवा इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम्हें सिखाया गया है कि सेवा से परमात्मा मिलता है, तो वह भी एक तरह का बैंक—बैलेंस ही है। तुम यहां नहीं हो, तुम्हारा मन कहीं और है।
जब कर्म यहां और अभी समग्र भाव से होता है, जब तुम्हारा मन भविष्य में किसी भोई भांति नहीं जा रहा होता है, तब फिर उससे कोई शृंखला नहीं बनती। तब वह इस क्षण में ही ध्यान बन जाता है।
ये तीन—तप, दमन और कर्म—उसके आधार हैं।
वेद उसके अंग हैं..
'वेद' बड़ा सुंदर शब्द है। इसका अर्थ होता है शान। जो भी ब्रह्म के बारे में जाना गया है, जहां भी जाना गया है, वह सब वेद है। इसलिए मैं बाइबिल को भी वेद कहता हूं कुरान को भी वेद कहता हूं। मेरे लिए हजारों—हजारों वेद हैं। और जब भी कोई व्यक्ति जान को उपलब्ध होता है तो वह जो भी कहता है वह वेद है। इसलिए वेद सिर्फ चार नहीं हैं। 'वेद' शब्द विद् से निकला है। विद् का अर्थ होता है जानना। और जहा कहीं भी यह ज्ञान संगृहीत है, जहा कहीं भी इस जानने को प्रतीकों में बताया गया है, वह वेद हो जाता है।
वेद उसके अंग हैं और सत्य उसका आवास है
ये तीन बातें स्मरण रखने योग्य हैं—पूरी तरह से, तीव्रता से प्रयास करो ताकि एक आतरिक ताप पैदा हो और तुम्हें रासायनिक रूप से बदल दे। स्व—नियंत्रण रखो ताकि तुम 'स्वयं' में केंद्रित रहो—अचल, अकंप, स्थिर, अडिग। और अपने कृत्यों को कर्म बना लो—एक समर्पित प्रार्थना, ध्यान। जो भी पहले जाना गया है उसे जानने का प्रयास करो। नहीं कि तुम उसके द्वारा सत्य तक पहुंच जाओगे, लेकिन उससे तुम्हें सहायता मिलेगी। वह अवरोध भी बन सकता है, यदि तुम उससे बहुत ज्यादा जकड़ जाओ। अन्यथा, वह सहायक होगा।
और अंत में सत्य उसका आवास है। और सत्य का अर्थ होता है वह—तत्। और वह तुम्हारे पास तभी आता है जब तुम तथाता का जीवन जीते हो।
जो इसे जान लेता है; वह इस प्रकार पाप को नष्ट कर देता है और ब्रह्म में भलीभांति स्थित हो जाता है— जो कि असीम है आनंदपूर्ण है और सर्वोच्च है।

दिनांक 16 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।