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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

केनोउपनिषद--ओशो ( दसवां--प्रवचन)

अस्‍तित्‍व का शाश्‍वत खेल—दसवां प्रवचन




                  यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद स:।
                  अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।३।।

                  प्रतिबोधविदितं मतममृतत्व हि विदन्ते।
                  आत्मना विदन्ते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्।।४।।

                  इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:।
                  भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।५।।



                      केनोपनिषद
                    द्वितीय अध्याय


                        3
वही उसे जानता है जो उसे नहीं जानता है और वह उसे नहीं जानता है।
जो उसे जानता है सच में जानने वाले व्यक्ति के लिए वह अज्ञात है।
            जबकि अज्ञानी के लिए वह ज्ञात है।

                        4
वस्तुत: वही अमरत्व को उपलब्ध होता है जो उसे पूरी तरह बोधपूर्वक जानता है।
आत्मा के द्वारा वह शक्ति तथा तेज को प्राप्त करता है।
            और उसके ज्ञान से अमरत्व को?


                        5
उसके लिए जो कि उसे यही इसी संसार में जान लेता है। सत्य जीवन है,
वह जो कि उसे नहीं जान पाता बहुत बड़ी हानि को उपलब्ध होता है।
            प्रत्येक प्राणीमात्र में आत्मा को जानकर
            ज्ञानीजन इंद्रियों के अनुभव वाले
            इस संसार के प्रति मर कर
                  अमर हो जाते हैं।




बह्म का ज्ञान असंभव है, लेकिन उसकी अनुभूति संभव है। ज्ञान तथा अनुभूति बुनियादी रूप से भिन्‍न बातें है। एक बहुत ही बारीक—से भेद को समझ लेना है। अनुभूति सदैव वर्तमान में है, ज्ञान सदा अतीत की बात हो गई। वह तुम्‍हारी स्‍मृति का हिस्‍सा हो गया। जब तुम कहते हो कि मैं अनुभूति की प्रेक्रिया में हूं, तो अनुभव अभी जारी है। तुम अभी भी अनुभव कर रहे हो। वह कोई स्‍मृति का हिस्‍सा नहीं बना। तुम्‍हारा अस्‍तित्‍व उसमें अभी भी लगा है।
संसार के विषय में अनुभूति रूक जाती है—यह ज्ञान बन जाती है। इस संग्रहीत ज्ञान को विज्ञान कहते है। जो भी मनुष्‍य जानता है वह विज्ञान हो जाता है। विज्ञान ज्ञान है। धर्म कभी विज्ञान नहीं बन पाता। वह सदा वर्तमान ही रहता है। उस परम को अतीत में नहीं बदला जा सकता है, उसे ज्ञान में नहीं बदला जा सकता है। वह सदा अनुभूति की बहती हुई सरिता की भांति है।
अंत: तुम नहीं कह सकते कि तुमने परमात्‍मा का अनुभव कर लिया है। क्योंकि: उसका तो अर्थ होता है कि अब वह अतीत की बात हो गई। और उसका तो अर्थ हुआ कि 'तुम' उसके पार चले गये। तुम पहले से अनुभव कर चुकें और उसके पार—चलें गए हो। तुम परमात्मा के पार कभी भी नहीं जा सकते, इसलिए तुम कभी पूरे अर्थों में ऐसा नहीं कह सकते कि तुमने जान लिया कि तुमने अनुभव 'कर लिया। तुम उसे कभी भी अतीत में नहीं रख सकते। उसे तुम्हारी स्मृति का हिस्सा कभी भी नहीं बनाया जा सकता। तुम अनुभूति की प्रक्रिया में हो सकते हो, लेकिन वह कभी अनुभव नहीं बन सकता। वह सदा ही अनुभूति है—एक जीवंत प्रक्रिया, एक मृत स्मृति कभी नहीं।
गद्य ऐसे ही है जैसे कि तुम यह नहीं कह सकते कि मैंने श्वास ले ली है। तुम श्वास ले रहे हो। श्वास अतीत की बात नहीं बन सकती। यदि वह अतीत की बात बन जाये तो तुम नहीं रहोगे। कोई कहने वाला ही नहीं बचेगा कि उसने श्वास ले ली है। श्वास लेना एक सतत प्रक्रिया है। तुम सदा श्वास ले रहे हो। नष्ट वह सदा वर्तमान की बात है। तुम नहीं कह सकते कि मैं जी लिया क्योंकि तब फिर तुम कौन हो? तुम जीवन हो, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि मैं जी चुका हूं। जीवन एक सतत प्रक्रिया है। वह सदा यहां ओर अभी में, इसी क्षण में है। परम का अर्थ है आत्यंतिक जीवन, आत्यंतिक श्वास की प्रक्रिया, उस आत्यंतिक का अनुभव, वह परम अनुभूति।
अत: पहली बात समझने की यह है कि ब्रह्म को शान में नहीं बदला जा सकता है। इसलिए जो भी कहता है कि मैंने जान लिया है, उपनिषद कहते हैं कि वह अभी अज्ञानी है। वह जीवन के उस महान रहस्य के प्रति असंवेदनशील है। और जो भी कहता है कि उसने जान लिया है, उसने अभी नहीं जाना है। उसने शास्त्रों से जान लिया होगा, उसने दूसरों से जान लिया होगा, उसने सूचनाएं इकट्ठी कर ली होंगी, लेकिन उसने जाना नहीं है। क्योंकि जो भी जानता है वह यह भी जानता है कि परमात्मा को ज्ञान में नहीं बदला जा सकता है। वह सदा प्रक्रिया बना रहता है।
परमात्मा कोई वस्तु नहीं है। वस्तु को जाना जा सकता है। परमात्मा एक प्रक्रिया है। वस्तु का अर्थ होता है कुछ जो रुक गया है। प्रक्रिया का अर्थ होता है कि वह चलती जाती है, चलती ही जाती है। साधारण बुद्धि से हम परमात्मा को भी एक वस्तु की भांति ही सोचते हैं। परमात्मा कोई वस्तु नहीं है। वह एक प्रवाह है, एक सातत्य है। वह शाश्वत रूप से चलता चला जाता है। वह कभी रुकता नहीं, वह कभी रुक नहीं सकता। न रुकना ही उसकी प्रकृति है। अत: तुम एक प्रक्रिया को कैसे जान सकते हो? जैसे ही तुम कहते हो कि मैंने जान लिया, तुम रुक गये—और प्रक्रिया चलती चली जाती है। तुम अपने ज्ञान में रुक गये और प्रक्रिया चलती चली जाती है। फिर तुम खो जाते हो, तुम्हारा संपर्क छूट जाता है। अब तुम्हारा उस प्रक्रिया से कोई संपर्क नहीं रहा।
प्रक्रिया के साथ तुम्हें चलना होगा। तुम रुक नहीं सकते। परमात्मा के साथ रुकना संभव नहीं है। तुम रुक सकते हो, लेकिन परमात्मा नहीं रुक सकता। और जब तुम रुक जाते हो और सरिता बहती चली जाती है, तो तुम्हारा उससे संबंध छूट गया। अब तुम उससे जीवंत रूप से संबंधित नहीं हो।
इसलिए जो लोग कहते हैं कि उन्होंने जान लिया है, वे संबंध खो चुके हैं। वास्तव में, उन्होंने उसे जाना ही नहीं है। उन्होंने सूचनाएं संगृहीत कर ली हैं। बौद्धिक रूप से उन्होंने कुछ समझ लिया है, लेकिन उसे उन्होंने जीया नहीं है। क्योंकि जो उसे जीता है, वह जानता है कि यह तो एक नदी है, जो कि शाश्वत रूप से बहती ही जाती है। तुम्हें उसके साथ—साथ बहते जाना है। एक क्षण को भी रुके और संबंध छूटा। तुम कदापि यह नहीं कह सकते कि मैंने जान लिया। तुम सिर्फ इतना ही कह सकते हो कि मैं जान रहा हूं।
अनुभूति एक खुली बात है, शान एक बंद चीज है। ज्ञान में पूर्ण विराम आ गया। अनुभूति एक विकासमान घटना है, यह विकसित होती जाती है। इसलिए शान मृत है। वह पहले ही रुक गया है। अब उसकी श्वास नहीं चल रही है। उसमें खून नहीं बह रहा है, हृदय ने धड़कना बंद कर दिया है। यह मुर्दा है। शान एक लाश है। और यदि तुम ज्ञान को ढो रहे हो तो तुम एक लाश को, एक मृत शरीर को ढो रहे हो। इसीलिए पंडित, ज्ञानी लोग जो कि यह सोचते हैं कि वे जानते हैं, सब मरे हुए लोग हैं। पापी भी परमात्मा तक पहुंच जाते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं सुना गया कि कभी कोई पंडित परमात्मा तक पहुंच गया हो। एक पापी को प्रवेश मिल सकता है, लेकिन एक व्यक्ति जो कि ज्ञानी है, जो सोचता है कि वह जानता है, प्रवेश नहीं कर सकता।
उपनिषदों की दृष्टि में वास्तविक पाप एक ही है—शान, क्योंकि वही एकमात्र बाधा है। लेकिन यह बड़ा ही सूक्ष्म है, और तुम्हें इसका अर्थ समझना पड़ेगा। अनुभूति तो मना नहीं है, लेकिन ज्ञान मना है। परमात्मा के साथ क्षण— क्षण चलना है—जीवंत, संस्पर्शित, खुले हुए। मत कहो कि मैंने जान लिया है। सिर्फ इतना ही कहो कि मैं सजग हूं कि मैं अनुभव कर रहा हूं कि मैं जान रहा हूं। सभी कुछ खुला है,

  और मुझे कुछ भी पता नहीं है कि अगले क्षण क्या होने वाला है। अत: मैं बंद नहीं कर सकता, मैं नहीं कह सकता कि वह समाप्त हो गया और उसका अंत आ गया। कोई आखिरी अध्याय नहीं है, अंतिम पृष्ठ नहीं है। शास्त्र अंतहीन है। तुम उसे बंद नहीं कर सकते, और हर क्षण कुछ नया प्रकट हो रहा है क्योंकि परमात्‍मा या ब्रह्म प्रतिक्षण नया है, ताजा है और युवा है। केवल हम ही के होते हैं और हम ज्ञान के कारण ही के होते हैं।
सिर्फ शरीर ही बूढ़ा नहीं होता। शरीर तो का होगा ही, लेकिन तुम्हारी चेतना को का होने की जरूरत नहीं है। यदि वह भी बूढ़ी होती है तो उसका अर्थ होता है तुमने ज्ञान संग्रह कर लिया है। तब ज्ञान का बोझ तुम्हें का कर देता है। अन्यथा तुम्हारी आंखें भोली तथा कुंवारी होतीं, तुम खुले हुए होते और वह खुलापन ही कुंआरापन है। तुम खोज रहे होते और ढूंढ रहे होते। तुम पूछ रहे होते और ध्यान कर रहे होते, मनन कर रहे होते और तुम हमेशा ही तैयार होते कि नया घट सके। क्योंकि वह तो हर क्षण घट रहा है। परमात्मा कभी भी का नहीं होता। यदि वह भी का होता तो किसी न किसी दिन उसे भी मरना पड़ता, क्‍योंकि बुढ़ापा मृत्यु में ले जाता है।
ब्रह्म सदा युवा है, सदाबहार है। वहा बुढ़ापा नहीं घटता। इसीलिए तो उसकी मृत्यु नहीं होती। अस्‍तित्‍व सदाबहार है, जीवंत है, धड़कता रहता है।
ज्ञान के कारण तुम बूढ़े होते हो। जिस क्षण तुम कहते हो कि मैंने जान लिया, तुम जानने से रुक गये। तुम सोचते हो कि तुमने अनुभव कर लिया, उसी क्षण अनुभव होना रुक गया। इस क्षण से ही तुम विकसित होने से रुक गये। तुम एक मृत बीज ही रह गये।
उपनिषद अनुभूति में विश्वास करते हैं, न कि शान में। यह अनुभूति क्या है और अनुभूति की प्रक्रिया। क्‍या है? जान से तुम अतीत को इकट्ठा करते हो। अनुभूति में तुम उसे विसर्जित कर देते हो। जो भी जान लिया उसे फेंक देना है ताकि तुम फिर से खुल जाओ नया जानने के लिए। तुम्हें अतीत के प्रति मर जाना है केवल तभी तुम वर्तमान के प्रति जीवंत हो सकोगे।
हम सब अतीत में जीते हैं—वह जो कि अब नहीं है, वह जो कि चला गया है, वह जो कि मृत है। हम अतीत में जीते हैं, इसीलिए हम इतने मुर्दा हैं। जीवन सदा वर्तमान में है, और मन सदा अतीत में है। इसलिए मन कभी भी जीवन को नहीं जान सकता। उनका कोई मिलन स्थल नहीं हो सकता है। ऐसी कोई भी जगह नहीं हो सकती जहां कि मन, जीवन से मिल सके। इसीलिए उपनिषद मन के विरुद्ध हैं।
मन सदा उसकी स्मृति ही है जो कि तुम जी चुके, उसकी जो कि गुजर चुका, उसकी जो कि अब नहीं है। कुछ और नहीं, बस तुम्हारे ऊपर अतीत की जमी हुई धूल है। उसे दूर फेंक दो। उसे धो डालो ताकि, तुम ताजा और युवा हो सको, और वर्तमान से, शाश्वत युवा ब्रह्म से मिल सको।
जानने की प्रक्रिया में अतीत को सदा पीछे छोड़ते जाना है। यही बुनियादी त्याग है। अतीत के प्रति मर जाओ ताकि तुम वर्तमान के प्रति जीवंत हो सको। तुम दोनों नहीं कर सकते। यदि तुम अतीत के प्रति जीवित हो तो तुम वर्तमान में मृत होओगे। यदि तुम वर्तमान में जीना चाहते हो तो अतीत के प्रति मर जाओ हर क्षण अतीत की धूल को झाडू कर फेंकते जाओ। उसे इकट्ठा मत होने दो, उसे त्यागते जाओ, उसे दूर फेंकते जाओ। उसका कोई उपयोग नहीं है। तुमने उसका उपयोग कर लिया है, अब वह सिर्फ मुर्दा खोल है। पक्षी उसके बाहर उड़ गये हैं। मृत खोलों को संगृहीत मत करो। वे कारागृह हो जायेंगे, वे तुम्हे रो लेंगे। वे इतने भारी हो जायेंगे कि वे तुम्हें हिलने भी नहीं देंगे।

मेरे लिए संन्यासी वह नहीं है जिसने घर—बार छोड़ दिया है, धन छोड़ दिया है, परिवार छोड़ दिया है, बल्कि वह है जिसने अतीत को छोड़ दिया है—क्योंकि वही तो बुनियादी संपदा है। वही तुम्हारा परिवार है। तुम मृत के साथ जीते चले जाते हो।

मैंने सुना है.

जीसस एक बार एक राह से गुजर रहे थे। सुबह का समय था, और सूरज निकलने को था, और उन्होंने एक मछुए को झील में जाल फेंकते हुए देखा। उन्होंने उस मछुए से बात की। वे उसके निकट आये और बोले—क्यों तुम अपना जीवन मछलियां पकड़ने में ही व्यर्थ गंवा रहे हो? मेरे पीछे आओ और मैं तुम्हें बताऊंगा कि कैसे परमात्मा के साम्राज्य को अपने जाल में फंसाया जाता है।
मछुए ने पीछे मुड़ कर देखा। जीसस की आंखों में कोई अलग ही रोशनी थी। वह आदमी तो सम्मोहित हो गया। उसने अपना जाल एक ओर फेंका और वह जीसस के पीछे चल दिया। लेकिन वे गांव के बाहर निकल ही रहे थे कि एक आदमी भागा हुआ आया और उसने मछुए से कहा, ''तुम कहा जा रहे हो? तुम्हारे पिता मर गये हैं। '' उसके पिता बीमार थे, बहुत के थे। किसी भी क्षण उम्मीद थी कि मर सकते हैं।
तो मछुए ने जीसस से कहा, ''जीसस! मुझे कुछ दिन के लिए जाने दो ताकि मैं मृत पिता के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर सकुं और वह सब कर सकूं जो कि एक बेटे को करना चाहिए।''
जीसस ने कहा, ''तुम्हें जाने की जरूरत नहीं है। मुर्दे मुर्दे को दफना देंगे।''
जीसस के लिए वह सारा गांव ही मुर्दा था। इसलिए उन्होंने कहा कि और मुर्दे हैं जो मुर्दे को दफना देंगे; उसके लिए तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
क्यों कहा जीसस ने कि मुर्दे मुर्दे को दफना देंगे? क्योंकि जो लोग भी अतीत में जीते हैं वे सब मुर्दे ही हैं। केवल वही जिंदा हैं जो कि वर्तमान में जीते हैं। जीवन का अर्थ होता है वर्तमान, यहीं और अभी। यह पल बड़ा क्षणिक है। तुम उसे पकड़ ही तब सकते हो जबकि तुम अतीत से जरा भी बोझिल नहीं हो, वरना तुम चूक जाओगे। यदि तुम्हारा मन अतीत की ओर भाग रहा है तो जीवन का वह क्षणिक पल चूक जाओगे। वह इतना क्षणिक है कि यदि तुम अतीत से जुड़े रहे तो तुम उसे चूकते ही जाओगे।
और यही हो रहा है। जब तुम अतीत की नहीं भी सोच रहे हो तब भी तुम उस अतीत की सोच रहे हो जो भविष्य में झलक रहा है। लेकिन तुम वर्तमान में कभी भी नहीं हो, इतना पक्का है। या तो तुम अतीत में हो जो कि अब नहीं है, अथवा भविष्य में हो जो अभी होने को है। दोनों ही नहीं हैं। दोनों का अस्तित्व नहीं है। एक मुर्दा है, और एक अभी पैदा नहीं हुआ है। और जो भी तुम भविष्य की सोचते हो वह अतीत की ही परछाईं है, अतीत का ही प्रक्षेपण है। क्योंकि तुम भविष्य की सोच भी क्या सकते हो, तुम आने वाले कल के संबंध में बीते हुए कल की भाषा में ही तो सोच सकते हो, क्योंकि दूसरी तो कोई भाषा तुम्हें आती नहीं है।
तुमने कल किसी को प्यार किया था, अब तुम उसको कल फिर प्रेम करने की सोचते हो। वह सिर्फ अतीत को पुनरुक्त करना होगा—थोड़े—बहुत परिवर्तन के साथ। और वे परिवर्तन भी अतीत के अनुभवों से ही आते हैं। कुछ भी नया भविष्य में प्रक्षेपित नहीं होने वाला है। केवल अतीत ही प्रक्षेपित होगा। अत: तुम एक पेंडुलम की तरह अतीत तथा भविष्य के बीच डोलते रहते हो, और उस डोलने में ही वर्तमान की वह क्षणिक घड़ी चूक जाती है जो कि वास्तविक जीवन है। और केवल जीवन के द्वारा ही तुम ब्रह्म में प्रवेश कर सकते हो।
उपनिषद कहते हैं कि ज्ञान से मत जुड़े रहो, स्मृति से ही मत जुड़े रहो, अतीत से ही मत जुड़े रहो। उसके प्रति मर जाओ ताकि तुम सदा युवा, ताजा तथा कुंआरे रहो। पुन: —पुन: खुले रहो। कोई अतीत तुम्‍हारे चारों ओर कारागृह न बन पाये। तुम सदा आगे बढ़ जाओ और अतीत के मृत खोलों को पीछे ही। छोड़ दो।

यह सूत्र कहता है :

वही उसे जानता है जो उसे नहीं जानता है...

वही जिसने कि उसे ज्ञान नहीं बना लिया है। केवल वही उसे जानता है जो कि अभी भी उसे जानने की प्रक्रिया में है, जो कि अभी भी खोज रहा है और पूछ रहा है, जो कि अभी बंद नहीं हुआ है, जो कि अभी भी आगे बढ़ता जा रहा है, अभी भी प्रवाहमान है। और ऐसा शाश्वत रूप से होता रहेगा। कोई भी कभी लक्ष्य तक नहीं पहुंचता; कोई पहुंच भी नहीं सकता। जीवन का वस्तुत: कोई लक्ष्य नहीं है। यह बस एक शाश्वत खेल है—अनादि, अंनत। मनुष्य लक्ष्य बनाता है। क्यों? मनुष्य लक्ष्य निर्मित करता है ताकि वह निश्चित हो सके। लक्ष्य उपलब्ध हो गया और अब तुम विश्राम कर सकते हो। अब तुम मर सकते लते हो, अब तुम्हारी कोई भी जरूरत नहीं है। जीवन का तो कोई भी लक्ष्य नहीं है। वह बहुत—से लक्ष्य निर्मित करता है, लेकिन वे सब लक्ष्य अस्थायी होते हैं। प्रत्येक लक्ष्य आगे के लक्ष्य के लिए साधन होता है, और अंत में कोई लक्ष्य नहीं होता। अन्यथा ब्रह्म किसी भी समय रुक गया होता, क्योंकि अपने लक्ष्य तक पहुंच गया होता।
अस्तित्व अनादि रूप से अस्तित्व में है। नहीं तो कभी भी ऐसा हो सकता था कि लक्ष्य पर पहुंचना हो जाता और अस्तित्व रुक जाता। लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं, ऐसा कभी होगा नहीं। लक्ष्य मनुष्य निर्मित है। जीवन लक्ष्यहीन है, इसलिए वह शाश्वत है। यदि कोई लक्ष्य हो तो वह शाश्वत नहीं हो सकता, क्योंकि जब लक्ष्य पर पहुंचना हो जाये तो जीवन समाप्त हो जाये। सारे लक्ष्य बस अस्थायी हैं। जब तुम इस बात को जान लोगे तो ब्रह्म को भी जान लोगे कि वह एक उद्देश्यहीन, बिना किसी लक्ष्य की और गतिमान ऊर्जा है, जो कि सब ओर जा रही है, लेकिन किसी विशेष की ओर नहीं जा रही है, बल्कि कहीं नहीं जा रही है। गति अपने आप में बड़ी सुंदर है; वह अपने आप में आनंदपूर्ण है। आनंद किसी लक्ष्‍य में नहीं है, वह अभी और यहीं है। इसी क्षण में, जीने की धड़कन में है।
जब कभी तुम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे बैठे देखो, अथवा जीसस को क्रास पर लटके देखो, अथवा महावीर को आकाश के नीचे खड़े देखो तो तुम्हारे मन में एक सवाल जरूर उठता होगा कि ये लोग कर क्‍या रहे हैं? यह बात कल्पना के ही बाहर है कि बुद्ध किसी धंधे के बारे में सोच रहे हैं। उनके पास कोई धंधा नहीं है; अपने परिवार के विषय में सोच रहे हैं, वहां कोई परिवार नहीं है; भविष्य के विषय में सोच रहे हैं—क्या सोच सकते हैं वे भविष्य के लिए? क्या कर रहे हैं बुद्ध बोधिवृक्ष के नीचे? वे कुछ भी नहीं कर रहे हैं। वे सिर्फ हैं। जीवन का होना ही, श्वास का भीतर—बाहर होना, जीवित होना ही आनंदपूर्ण है। वे कुछ और नहीं कर रहे हैं। वे सिर्फ आनंदित हैं।
लेकिन जब भी तुम आनंद की बात सोचते हो तो तुम सदा इस तरह सोचते हो जैसे आनंद उनके हाथ में कोई वस्तु हो। आनंद कोई वस्तु नहीं है। आनंद होने का ढंग है—होने का सम्यक ढंग। कोई अतीत नहीं है, कोई भविष्य नहीं है। बस बोधिवृक्ष के नीचे इस क्षण बुद्ध जीवंत हैं। हृदय धड़क रहा है, श्वास भीतर —बाहर आ—जा रही है, खून दौड़ रहा है, और सब कुछ जीवंत है, स्पंदित हो रहा है। वे कहीं भी नहीं जा रहे हैं, वे सिर्फ हैं। इस होने में ही आनंद है।
इसीलिए सदा जोर इस बात पर है कि जब तुम कुछ भी कामना नहीं कर रहे हो तो तुम आनंद में हो। क्यों? क्योंकि कामना तुम्हें कहीं ले जायेगी। कामना कहेगी कि चलो, कहीं और चलो, लक्ष्य कहीं भविष्य में है। कामना ही भविष्य का निर्माण करती है, और तुम्हें भविष्य की ओर ले जाती है। जब तुम कामना शून्य होते हो, जब कोई इच्छा नहीं होती, तो तुम यहीं और अभी में होते हो। तो तुम बोधिवृक्ष के नीचे होते हो, तुम बुद्ध हो गये होते हो।
बुद्ध का अर्थ होता है चैतन्य की एक अवस्था—चैतन्य की वह अवस्था जब चेतना कुछ पाने के लिए कहीं जा नहीं रही है। इस बोध के कारण ही बुद्ध ने कहा था कि कोई परमात्मा नहीं है। क्योंकि वे तुम्हारे प्रति अत्यंत करुणा से भरे थे इसलिए उन्होंने कहा कि कोई परमात्मा नहीं है। क्योंकि यदि उन्होंने कहा होता कि परमात्मा है तो तुम उसकी भी वासना बना लेते। तुम उसे पाना चाहोगे। तुम परमात्मा तक पहुंचना चाहोगे, तुम परमात्मा को जानना चाहोगे—तुम एक इच्छा बना लोगे।
इसलिए बुद्ध कहते हैं कि कोई परमात्मा नहीं है, छोड़ो सारी आध्यात्मिक कामनाओं को। ऐसा नहीं है कि परमात्मा नहीं है, बल्कि ऐसा उन्होंने इसलिए कहा ताकि तुम सारी कामनाएं तथा सारे भविष्य को छोड़ सको। वरना तुम भविष्य को बदलते जाओगे। कभी कामना संसार की होती है, तो कभी वह आध्यात्मिक हो जाती है, लेकिन कामना वहीं की वहीं होती है।
बुद्ध कहते हैं कि कोई मोक्ष नहीं है। स्वर्ग में परम मुक्ति जैसी कोई अवस्था नहीं है। वे कहते हैं कि कोई मोक्ष नहीं है। ऐसा नहीं है कि मोक्ष नहीं है, लेकिन वे ऐसा छोड़ने में तुम्हारी सहायता करने के लिए कहते हैं, वरना तुम मोक्ष की मुक्त अवस्था की कामना करने लग जाओगे। और कामना करना ही बंधन है। अत: जब तुम मोक्ष की, मुक्ति की भी कामना करते हो तो तुम बंधन में होते हो। वे तुम्हारी मदद करने के लिए ही ऐसा कहते हैं कि कोई मोक्ष नहीं है। ताकि तुम समस्त कामनाएं छोड़ सको, ताकि तुम अभी और यहीं पर हो सको।
लोग बुद्ध के पास जाते और उनसे बार—बार पूछते, ''जब हम मर जायेंगे तब क्या होगा?''
बुद्ध कहते, ''कुछ भी नहीं होगा, सिर्फ तुम मर जाओगे। ''
वे बुद्ध से मृत्यु के बाद भी भविष्य निर्मित करने के लिए कह रहे थे। वे इस भविष्य से संतुष्ट नहीं थे। वे मृत्यु के बाद भी भविष्य चाहते थे ताकि वे अपना मन आगे भी प्रक्षेपित कर सकें, ताकि वे मृत्यु के बाद की भी योजना बना सकें। बार—बार जहां भी बुद्ध जाते वहा के लोग एक ही बात पर जोर देते, ''आप जैसे बुद्ध पुरुष का मरने के बाद क्या होगा?''
बुद्ध कहते, ''कुछ भी नहीं होगा। मैं सिर्फ मर जाऊंगा। जैसे दीये की ज्योति बुझ जाती है वैसे ही मैं 'भी बुझ जाऊंगा।''
वे लोग इस बात से संतुष्ट नहीं होते। उन्हें बड़ी बेचैनी होती। वे कहते, ''आखिर ज्योति कहा जाएगी? क्‍या वह ब्रह्म में मिल जाएगी? क्या वह समष्टि में खो जाती है? क्या होता है एक प्रबुद्ध आत्मा का?
''बुद्ध सख्त आदमी थे। वे कहते, ''कुछ भी नहीं होता; जैसे दीये की लौ बुझ जाती है, तब क्या तुम पूछते हो कि वह कहां चली गयी। कोई भी नहीं पूछता कि वह कहां गयी, क्योंकि सभी जानते है कि वह बुझ गई है। ''
निर्वाण शब्द का अर्थ ही होता है लौ का बुझ जाना। इसलिए वे कभी 'मोक्ष' शब्द का उपयोग नहीं करते हैं, वे कभी भी 'स्वर्ग' नहीं कहते हैं, वे कभी स्वर्ग के विषय में नहीं बोलते हैं—उन्होंने ऐसे किसी भी शब्द का उपयोग नहीं किया जिससे भविष्य निर्मित होता हो। वे सिर्फ कहते हैं, निर्वाण। निर्वाण का अर्थ होता है.. दीये का बुझ जाना। वे कहते कि यह बात ही मत पूछो कि क्‍या होता है। क्यों? क्या सच।। लौ मिट जाती है। वह कभी भी नहीं मिटती, परंतु फिर भी वे कहते हैं करुणावश कि वह बुझ जाती है। सच वे असत्य कह रहे हैं क्योंकि सत्य तुम्हारे मन में कामना को पैदा कर देगा।
यदि वे कहें कि आनंद होगा, सच्चिदानंद होगा, वहां सत, चित, आनंद होगा; अथवा वे कहें कि प्रभु का राज्य होगा, तो फिर कामना निर्मित हो जायेगी। और यदि कामना निर्मित हो गई तो फिर प्रभु का राज्य नहीं होगा। कामना का मिट जाना ही तुम्हें अभी और यहीं में ला देगा। भविष्य में गति करने की कोई संभावना नहीं रहेगी। तुम वर्तमान में फेंक दिये जाओगे। और एक बार तुम वर्तमान में आ जाओ तो तुम स्वर्ग में होओगे। तुम परमात्मा में ही होओगे, तुम ब्रह्म के साथ एक हो जाओगे।

उपनिषद कहते हैं.
वही उसे जानता है जो उसे नहीं जानता है..

कोई स्मृति न बनाओ; अतीत का सृजन करने में सहयोग मत करो। उसे तो गिराते जाओ। उसका उपयोग तुमने कर लिया। अब उसे ढोने से क्या मतलब? उसे ज्ञान मत बनाओ।
लोग मेरे पास आते हैं और वे मुझसे कहते हैं कि कल का ध्यान बहुत अदभुत था। कल के ध्यान के कारण तुम्हारा आज का ध्यान गड़बडा गया। अब वह आदमी कल जैसे ध्यान को आज पुन: दोहराना चाहेगा। वह उसकी प्रतीक्षा करेगा। वह ध्यान नहीं कर रहा होगा, वह उसमें पूरी तरह नहीं डूबेगा। उसके मन का एक हिस्सा पीछे देखता रहेगा कि वही बात फिर कब होती है। और वह बात अब नहीं होगी। कल वह पीछे नहीं देख रहा था इसलिए ऐसा हुआ। उसका मन पूरी तरह उस क्षण में डूबा था। अब नहीं डूबा है!, अब वह पीछे की ओर देख रहा है, अब उसमें एक नई बात आ गई। अब वही स्थिति नहीं है। वह समग्र उसमें नहीं है, वह परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा है। अब वह नहीं घटेगा। और तब वह मेरे पास आयेगा और कहेगा, क्या गलत हो गया है? कल तो हुआ था, लेकिन आज कुछ भी नहीं हुआ और मुझे बड़ी निराशा हो रही है।
इसकी क्रियाविधि बड़ी सीधी और साफ है। कल घटना घट सकी क्योंकि तुम्हारे पास उसका कोई अतीत नहीं था। स्मरण रहे, कल उसका कोई अतीत तुम्हारे पास नहीं था, इसकी कोई अपेक्षा भी नहीं थी। तुम कोई भविष्य का प्रक्षेपण नहीं कर सकते थे, क्योंकि तुम्हें कुछ भी पता नहीं था। तुम अनजान थे, इसलिए हुआ था। तुम सरल थे, निर्दोष थे, उस क्षण में जी रहे थे। तुम सिर्फ कर रहे थे बिना किसी अपेक्षा के, क्योंकि परिणाम का कुछ पता नहीं था।
अब वह ज्ञात है। अब वह हो गया है। अब वह अतीत हो गया। अब वह तुम्हारा ज्ञान हो गया। अब यह ज्ञान ही बाधा बन जायेगा। अब तुम जो चाहो कुछ भी कर लो, किंतु वह नहीं होने वाला। ज्ञान ही बाधा बन जाता है। अतीत ही वर्तमान के रास्ते में बाधा बन जाता है। अत: यदि वह कल हुआ था तो भूलो; उस कल को गिरा दो।
और एक और बात याद रहे—तुम निराश हो जाओगे यदि वह फिर से न हुआ तो। और यदि वह हुआ तो भी तुम निराश ही होओगे 'क्योंकि वह एक पुनरुक्ति ही होगा। तुम उससे थक जाओगे। तुम अपने ध्यान से भी थक जाओगे, यदि वह पुनरुक्त होने लगे—वही का वही रोज हो। अतीत को गिरा दो क्योंकि यदि अतीत वहां होगा तो कुछ भी नहीं हो सकता। और यदि कभी होता भी है तो भी वह अतीत की पुनरुक्ति ही होगा, और तुम ऊब जाओगे। दोनों तरह से ही, अतीत वर्तमान के रास्ते में बाधा डालता चला जाता है।
क्यों तुम्हें ऐसा लगता है कि यह पुनरुक्ति है? ऐसा तुम्हें इसलिए लगता है क्योंकि तुम उसी अतीत से तुलना करते चले जाते हो। यदि तुम अतीत को गिरा दो तो वह सदा नया होगा; वह कभी भी पुनरुक्ति नहीं होगा। पुनरुक्ति का अर्थ होता है कि तुम लगातार उसकी अतीत के अनुभव से तुलना करते जाते हो। अतीत को पूरी तरह गिरा दो, और तुम वर्तमान के प्रति खुल जाओगे। तब जो भी होगा नया होगा, और तुम कभी भी नहीं ऊबोगे।
इसी नासमझी के कारण प्रत्येक आदमी ऊबा हुआ है। क्योंकि वह बार—बार अतीत को बीच में ले आता है। तुमने तुम्हारी प्रेमिका को कल चूमा था, और आज फिर तुम चूमते हो और तुलना करते हो। तब चुंबन का सारा सौंदर्य खो जाता है क्योंकि तब वह सिर्फ पुनरुक्ति हो जाता है। देर अबेर तुम उससे ऊब जाओगे। आज नहीं कल तुम अपनी प्रेमिका से बचकर भागना चाहोगे। वह तुम्हें शत्रु जैसी लगेगी क्योंकि वह अब एक स्थिति के समान हो गई है जहां हर बात एक पुनरुक्ति जैसी लगती है। अतीत को भूल जाओ। वह तुम्हें मार डाल रहा है। वह तुम्हारे प्रेम को नष्ट कर रहा है, वह तुम्हारे जीवन को समाप्त कर रहा है, वह सारी संभावनाओं को ही मिटा डाल रहा है। गिरा दो अतीत को। उसे ज्ञान मत बनाओ। पुन: —पुन: ताजा हो जाओ। प्रत्येक क्षण चलो र और अतीत को साथ मत ढोओ।
वही उसे जानता है जो उसे नहीं जानता है; और वह उसे नहीं जानता है जो उसे जानता है।
जो कहता है कि मैं जानता हूं। यह इस बात का संकेत है कि उसने जानना बंद कर दिया है। ज्ञान पूरा हो गया है, किताब बंद हो गई। यह आदमी मुर्दा हो गया। एक मृत व्यक्ति एक जीवंत शक्ति से संबंधित नहीं रह सकता।
सच में जानने वाले व्यक्ति के लिए वह अज्ञात है; जबकि अज्ञानी के लिए वह ज्ञात, है।
इस पृथ्वी पर चलो; गिरजे हैं, मंदिर हैं, गुरुद्वारे हैं, मस्जिदें हैं। प्रत्येक वहां पर पूजा कर रहा है। सारी पृथ्वी धार्मिक मालूम पड़ती है। प्रत्येक आदमी परमात्मा के बारे में जानता है, और फिर भी जीवन इतना दुखपूर्ण है, इतनी पीड़ा से भरा है। और प्रत्येक परमात्मा के बारे में जानता है—औr केवल जानता ही नहीं है, बल्कि उसके लिए तर्क करता है।
दो प्रकार के अज्ञानी लोग हैं—एक तो वे जो कि कहते हैं कि परमात्मा है और उसके लिए तर्क करते हैं। और दूसरे वे लोग हैं जो कि कहते हैं कि परमात्मा नहीं है और तर्क करते हैं कि नहीं है। लेकिन दोनों का विश्वास है कि वे जानते हैं। आस्तिक और नास्तिक, दोनों विश्वास करते हैं कि वे जानते हैं। एक बात में वे दोनों सहमत हैं कि उनके पास ज्ञान है। इतना ही नहीं बल्कि वे तर्क करते हैं कि उनके पास सच्चा ज्ञान है।
उपनिषद कहते हैं कि केवल अज्ञानी लोग ही दावा कर सकते हैं कि वे जानते हैं; कि परमात्मा को जान लिया गया है; कि रहस्य उदघाटित हो गया है; कि अब कोई रहस्य बाकी नहीं है, बस केवल सिद्धात बचा है, एक दर्शन, एक शास्त्र, अब कोई रहस्य शेष नहीं है, सभी कुछ जान लिया गया है।
केवल अज्ञानी ही ऐसा कर सकते हैं। परम को जान लिया गया है, ऐसा दावा करने के कारण वे रहस्य की हत्या कर सकते हैं। जो बुद्धिमान हैं वे तो जोर देंगे कि रहस्य तो रहस्य ही है, तुम चाहे उसके आमने—सामने ही क्यों न आ जाओ, चाहे तो तुम उससे मिल ही क्यों न लो, साक्षात्कार कर लो, फिर भी रहस्य का उदघाटन नहीं होता है। बल्कि इसके विपरीत, वह तो और गहरा होता जाता है, और ज्यादा रहस्यपूर्ण होता जाता है। यह और— और रहस्यपूर्ण होता जाता है। जितना तुम उसे जानते हो, वह उतना ही ज्यादा अज्ञात होता जाता है।
धार्मिक अनुभूति का यही रहस्य है : जितना ही अधिक तुम इसे जानते हो उतना ही अधिक यह अज्ञात रह जाता है; उतना ही अधिक तुम्हें अनुभव होता है कि इसे जानना कितना असंभव है, कितना कठिन है। जितना ही अधिक तुम इसे जानते हो उतना ही अधिक तुमको अपनी अक्षमताओं, अपनी असहाय अवस्था, अपने अज्ञान का बोध होता है। जितना ही अधिक परमात्मा तुमको अज्ञात लगता है उतना ही अधिक तुम परमात्मा के निकट होते हो। और जब कोई सच में परमात्मा में प्रवेश कर जाता है तो उसे पता चलता है कि वह न केवल अज्ञात है बल्कि अज्ञेय है। तब पता चलता है कि उसे जानने की कोई संभावना ही नहीं है। इसका क्या अर्थ हुआ? इसका इतना ही अर्थ हुआ कि ऐसी कोई संभावना नहीं है कि जहा उसका जानना समाप्त होता हो। यह तो शाश्वत रूप से चलेगा। तुम उसे समाप्त नहीं कर सकते; तुम यह नहीं कह सकते कि मैं अब यह धार्मिक खोज छोड़ सकता हूं। अब मैं यह धार्मिकता छोड़ सकता हूं बात खतम हो गई। नहीं, वह खतम नहीं हो सकती।
लोग मेरे पास आते हैं और वे मुझसे पूछते रहते हैं, ''ऐसा कब होगा कि खोज समाप्त हो जायेगी, कि हम पहुंच जायेंगे और वह अंतिम बात घट जायेगी? ''
वे लोग इतनी जल्दी में हैं। याद रखो यह कहीं खतम होने वाली बात नहीं है। यह खोज शाश्वत है। तुम बढ़ते ही चले जाओगे। तुम और गहरी चेतना में विकसित होते जाओगे, गहरे आनंद में उतरते चले जाओगे। लेकिन फिर भी कुछ सदा शेष रहेगा छिपा हुआ, और तुम अनावृत करते ही चले जाओगे। लेकिन वह पूरा कभी भी अनावृत नहीं होता। ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसा ही उस परम सत्ता का स्वभाव है।
लेकिन गुरु कहे चले जाते हैं, चिंता मत करो। देर— अबेर तुम पहुंच ही जाओगे। मैं स्वयं कहता रहता हूं। लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि हम इतने समय से ध्यान कर रहे हैं, वह घटना कब घटेगी? मैं उनसे कहता हूं प्रतीक्षा करो। जल्दी ही घटना घटेगी। लेकिन ये सब बातें झूठ हैं। यदि मैं कहूं कि घटना कभी घटने वाली नहीं है, तो तुम सारा प्रयास ही छोड़ दोगे। तुम निराश हो जाओगे। इसलिए मैं कहता ही चला जाऊंगा कि बस होने ही वाली है।
घटना तो घट ही रही है, लेकिन वह इस तरह से कभी भी नहीं होने वाली कि यात्रा समाप्त हो जाये। और एक दिन तुम स्वयं इस कभी समाप्त न होने वाली यात्रा के सौंदर्य को जान सकोगे और तब तुम यह महसूस करोगे कि तुम कितना भद्दा प्रश्न पूछ रहे थे! तुम पूछ रहे थे कि इसे कैसे समाप्त करें। यह सवाल ही बड़ा कुरूप और अर्थहीन है। तुम्हें पता नहीं, बल्कि जो तुम पूछ रहे हो वह तुम्हारे ही विरुद्ध है। क्योंकि यदि यह समाप्त हो गया तो तुम भी समाप्त हो जाओगे। यदि कोई खोज नहीं है, यदि कुछ भी जानने को नहीं है, कुछ भी प्रेम करने को नहीं है, कुछ भी प्रवेश करने को नहीं है, तो फिर तुम कैसे हो सकोगे? यदि तुम ऐसी स्थिति में होते, तो तुम आत्मघात करना चाहते।
बट्रेंण्ड रसल ने कहीं पर मजाक की है। उसने कहा है कि मैं हिंदुओं की जो मुक्ति की धारणा है—मोक्ष की—उसमें विश्वास नहीं कर सकता। क्योंकि वह कहता है, हिंदुओं की धारणा के अनुसार मोक्ष में तुम सब बातों से मुक्त हो जाते हो। न कुछ करना है और न कुछ घटेगा, तुम सिर्फ बैठे रहते हो, बैठे ही रहते हो बोधिवृक्ष के नीचे और कुछ भी नहीं होगा, क्योंकि सभी कुछ समाप्त हो गया है। इसलिए रसल कहता है, यह तो बहुत ज्यादा हो गया। यह तो बहुत बड़ा बोझ हो जायेगा। हर एक आदमी तंग आ जायेगा, हर एक आदमी प्रार्थना करने लगेगा कि हमें पृथ्वी पर वापस भेज दो, अथवा नर्क में भेज दो। नर्क भी बेहतर होगा क्योंकि वहां पर कुछ तो करने के लिए होगा, कुछ तो समाचार आदि वहां होगा। मोक्ष में तो कोई समाचार ही नहीं होगा, कोई घटना ही नहीं घटेगी। सोचो जरा—शाश्वत रूप से कोई घटना ही नहीं घटती, कोई आंदोलन नहीं। किस तरह का यह मोक्ष होगा?
असल में, जब हिंदू अथवा जैन मोक्ष की बात करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि ऐसा कोई मोक्ष मौजूद है, अथवा कोई ऐसी स्थिति मौजूद है। यह तो सिर्फ तुम्हारी सहायता करने के लिए है, क्योंकि तुम उस शाश्वत प्रक्रिया को नहीं समझ सकते। इसलिए वे कहते हैं कि ही, चिंता मत करो। देर—अबेर सभी कुछ संभव हो जायेगा, और तब तुम्हें कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। किंतु तुम नहीं जानते कि यह किस प्रकार का दुख होगा। यह पृथ्वी से भी ज्यादा बड़ा दुख होगा।
मोक्ष कोई रुकी हुई स्थिति नहीं है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है। और मोक्ष कोई भौगोलिक स्थान भी नहीं है। यह सिर्फ चीजों की ओर देखने का ढंग है, यह एक रुख है। यदि तुम क्षण— क्षण जीवंत हो तो तुम कभी भी नहीं पूछोगे कि यह सब कब समाप्त होने वाला है। यह प्रश्न ही बताता है कि तुम जीवित नहीं हो और तुम जीवन का आनंद नहीं ले रहे हो, जैसा भी वह है। यदि तुम जीवन का आनंद ले रहे हो तो तुम कभी भी नहीं पूछोगे कि यह कब समाप्त होने वाला है। तुम नहीं पूछोगे कि इस जीवन से कब मुक्ति मिलेगी। तब तुम पहले से ही मुक्त हो। उस आनंद में ही मुक्ति भी आ गई। चाहे वह समाप्त हो, चाहे न हो, अब उसकी कोई चिंता नहीं है। यदि यह खतम हो जाये तो भी अच्छा है, यदि यह कभी समाप्त न हो तो भी अच्छा है। तब तुम समग्रता से स्वीकार करते हो।
यह सूत्र कहता है :
सच में जानने वाले व्यक्ति के लिए वह अज्ञात है.
यह बात बड़ी विरोधाभासी लगती है।
सच में जानने वाले व्यक्ति के लिए वह अज्ञात है जबकि अज्ञानी के लिए वह ज्ञात है।
केवल अज्ञान ही उसका ऐसा दावा कर सकता है। और जितना अधिक मूर्ख मस्तिष्क होगा, उतना ही अहंकारपूर्ण दावा होगा, उतना ही कट्टर दावा भी होगा।
मतांधतापूर्ण दावा हो तो तुम प्रभावित हो सकते हो। सारे संसार में धर्मांध लोग हैं जो कि दावा करते हैं और उनका दावा लोगों को प्रभावित करता है। क्योंकि उनकी आक्रामकता से, उनकी मतांधता से उनकी परिपूर्ण निश्चयात्मकता से तुम पराजित हो जाते हो। तुम सोचते हो कि इस आदमी ने जरूर पा लिया होगा, क्योंकि कितने साहस से दावा करता है। तुम स्वयं अपने बारे में इतने अनिश्चित हो कि कोई भी मूढ़ अपनी निश्चितता से दावा करके तुम्हें प्रभावित कर सकता है। लेकिन इसे स्मरण रखना? केवल अज्ञान के लिए ही ऐसी निश्चितता होती है। एक समझदार आदमी कभी भी मतांधतापूर्ण ढंग से निश्चित नहीं होता। वह सर्वथा निश्चयपूर्वक कोई भी बात नहीं कह सकता; वह किसी भी बात को आदेशात्मक ढंग से नहीं कह सकता।
उदाहरण के लिए—महावीर—यदि तुम उनसे कोई भी बात पूछो तो वे बड़े अनिश्चित दिखाई पड़ेंगे। वे हैं नहीं, लेकिन वे समझदार हैं। यदि तुम उनसे पूछो कि क्या परमात्मा है? तो वे कहेंगे कि शायद है, शायद नहीं है। यह ऐसा चित्त है जो कि दावा नहीं करता। क्योंकि यदि वे कहें कि वह है तो यह एक दावा हो जाता है, और यदि वे कहें कि वह नहीं है तो यह भी एक दावा हो जाता है। वे कहते हैं—हो सकता है, शायद। उनका शब्द है. स्यात—शायद, हो सकता है।
तुम उनसे प्रभावित नहीं होओगे। इसीलिए इतना बड़ा आदमी पैदा हुआ और इतने कम उसके अनुयायी हैं। तीस लाख से ज्यादा जैन नहीं हैं। पच्चीस सौ साल हो गये। यदि एक अदम और ईव भी महावीर के द्वारा धर्म—परिवर्तन करते तो वे भी इतनी संख्या तो पैदा कर देते। पच्चीस सौ सालों में केवल तीस लाख लोग। और वे भी सिर्फ जन्म से ही जैन हैं। क्योंकि जैन का अर्थ होता है जिसका दृष्टिकोण है : शायद, संभवत:।
क्यों महावीर लगातार 'शायद' कहे चले जाते हैं चाहे तुम उनसे कुछ भी पूछो? तुम उनसे पूछो कि क्या आत्मा है? तो वे कहेंगे—शायद है, शायद नहीं है। क्यों इतना शायद पर जोर है? क्योंकि कभी उन्होंने ज्ञान का दावा नहीं किया और उन्होंने हर बात को अज्ञात ही रहने दिया। इसलिए शायद पर इतना जोर है। क्योंकि तब बात अज्ञात ही रहती है; अनिश्चित, अस्पष्ट ही रहती है; और तुम खोज कर सकते हो। जब सभी कुछ निश्चित हो जाता है तो खोज समाप्त हो जाती है। यदि उन्होंने कहा होता—हा, परमात्मा है या आत्मा है या आनंद है तो खोज रुक जाती।
अब तुम क्या कर सकते हो? चाहे तुम उनका अनुकरण करो या न करो, लेकिन वे कहते हैं कि  'शायद'। वे हर बात खुली छोड़ देते हैं। यही अर्थ होता है स्वात का—कि हर बात खुली है। वे तुम पर कुछ भी आरोपित नहीं करते। वे मतांधतापूर्वक 'हौ' भी नहीं कहते, वे मतांधतापूर्वक '' भी नहीं कहते हैं; क्योंकि उनका आक्रामक ढंग तुम्हें प्रभावित कर सकता है। यह तुम्हारे लिए घातक हो सकता है। सिर्फ उनको सुनना ही.. '' भी नहीं कहते। और महावीर ऐसे आदमी हैं कि तुम उनके प्रभाव में आ जाओगे। तुम सम्मोहित हो जाओगे। यदि वे कहते हैं कि परमात्मा है तो यह तुम्हारे लिए ज्ञान हो जायेगा। तुम विश्वास करते चले जाओगे कि परमात्मा है, और वह विनाशकारी सिद्ध होगा। ज्ञान निर्मित करना विध्वंसात्मक है।
लेकिन जो बहुत संवेदनशील लोग हैं वे ही महावीर को समझ सकते हैं। जो लोग असंवेदनशील हैं, अज्ञानी हैं, मूर्ख हैं, वे सोचेंगे कि यह आदमी' नहीं जानता है। हमारे गांव' का पंडित इससे बेहतर है। कम—से —कम वह कहता है कि ही, परमात्मा है, और मैं साबित कर सकता हूं। मैं तुम्हें शास्त्रों से सबूत दे सकता हूं वेद, उपनिषदों से साबित कर सकता हूं। मैं तर्क कर सकता हूं कि परमात्मा है और मैं तुम्हें आश्वस्त कर सकता हूं। और यह आदमी कहता है शायद। क्या मतलब है इसका? इसने जाना भी है या नहीं? लोग महावीर से पूछते रहे हैं, ''यदि आपने जाना हो तो फिर ही क्यों नहीं कहते? और यदि आपने जाना हो कि परमात्मा नहीं है तो ना क्यों नहीं कह देते? स्पष्ट बात कह दें। ''
क्यों तुम स्पष्टता के लिए कहते हो? तुम स्पष्टता के लिए कहते हो ताकि तुम अंधे होकर अनुगमन कर सको। तुम स्पष्टता के लिए जोर देते हो ताकि तुम्हारे लिए खोज—खबर करने के लिए कुछ भी न बचे। तुम आलसी हो इसलिए तुम स्पष्टता चाहते हो। महावीर तुम्हें स्पष्टता नहीं देंगे। वास्तव में, जब भी तुम महावीर जैसे आदमी से मिलोगे तो वह तुम्हारे भीतर और भी ज्यादा उलझन पैदा कर देगा, क्योंकि उलझन से खोज पैदा होती है, सुनिश्चितता से केवल अज्ञान।
यह सूत्र कहता है : वह परम ज्ञानियों को अज्ञात ही बना रहता है, उन्हें जो कि जानते हैं, उनके लिए अज्ञात ही रहता है, जबकि अज्ञानियों के लिए वह ज्ञात है
बहुत ज्यादा सुनिश्चित मत होओ। अनिश्चित रहो। अनिश्चितता का अर्थ होता है बहाव; अनिश्चितता का अर्थ होता है कि प्रत्येक विकल्प संभव है। तुम कोई स्थिर इकाई नहीं हो। भविष्य केवल अतीत की पुनरुक्ति नहीं होने वाला है। कुछ न कुछ नया प्रतिक्षण संभव है। अस्पष्ट रही। संगत होने पर जोर मत दो। ऊपरी तौर से विरोधाभास दिखाई दे तब भी जल्दी में चुनाव मत करो। प्रतीक्षा करो, तौलों, और विरोधों में भी किसी ऐसी चीज को खोजो जो कि दो विरोधों को जोड़ रही हो। तीसरी चीज सत्य के ज्यादा निकट होगी बजाय विरोधों के।
सारा जोर ग्राहकता की स्थिति में रहने पर है, ताकि अज्ञात तुम पर घटित हो सके। संवेदनशील, तरल तथा उपलब्ध रहो; जैसे कि कोई अतिथि आने को है और तुम उसकी प्रतीक्षा कर रहे हो। द्वार खुला है। यदि हवायें वृक्षों से गुजर रही हैं अथवा सूखी पत्तियों से सरसरा रही हैं तो भी तुम द्वार की ओर लपकते हो। हो सकता है अतिथि आया हो! तुम सजग हो।
अतिथि अभी आया नहीं है। तुम सिर्फ उसकी प्रतीक्षा कर रहे हो। इसी सजगता में कोई सत्य के आत्यंतिक केंद्र को जान पाता है। वस्तुत: अतिथि कभी भी नहीं आता। वह सदा आ ही रहा है। वह आ ही रहा है सदा—सदा। वह सदा निकट है, और निकटतर और निकटतर, और पास और पास, लेकिन वह कभी आता नहीं। तुम सदैव प्रतीक्षा में रहते हो। यह प्रतीक्षा सुंदर है। यह आनदपूर्ण है... यदि तुम प्रतीक्षा कर सको। लेकिन तुम्हारे पास एक अति संवेदनशील चित्त होना चाहिए। वहां निम्न श्रेणी का मूढ़ मन कुछ भी काम का न होगा। मूड मन कहेगा, अब आ भी जाओ; वरना मैं द्वार बंद करने वाला हूं और विश्राम करने जा रहा हूं। मैंने बहुत प्रतीक्षा कर ली है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, अब तक लिखी गई सर्वाधिक सुंदर कविताओं में से एक है। कविता का शीर्षक है—'दि किंग ऑफ द नाइट।'

एक मंदिर है, एक बड़ा मंदिर जिसमें सौ पुजारी हैं, जो कि मंदिर के देवता की सेवा में हैं। एक रात वहां के मुख्य पुजारी को एक सपना आया। उसने सपने में देखा कि सम्राट, मंदिर का देवता प्रकट हुआ और उसको बोला कि आज रात मैं आने वाला हूं। वह तो हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसे बड़ी चिंता होने लगी कि क्या यह सपना बस एक सपना है या अतींद्रिय दर्शन। यह बस सपना ही है, मेरा मन सपना देख रहा है? या सच में मुझे सूचना दी गई है? क्या देवता, मंदिर का परमात्मा सच में आने वाला है? या यह मेरी ही कल्पना मात्र है?
उसे दूसरों से भी यह बात कहने में भय लगा, कहीं ये लोग उसे पागल न समझें। वे लोग कहेंगे, ''देवता यहां कभी भी नहीं आया। हम मंदिर के देवता की मूर्ति को जब से यह मंदिर बना है तब से पूजते आ रहे हैं, लेकिन वह कभी भी नहीं आया। तुम सपना देख रहे हो। तुम अपनी ही कल्पना के शिकार हो रहे हो।''
लेकिन तब उसे यह भी डर लगा कि यदि उसने यह बात नहीं बताई और सचमुच ही देवता आ गया तो ये लोग उसका स्वागत करने के लिए तैयार नहीं होंगे। तब फिर क्या होगा? अत: उसने सोचा कि मूर्ख सिद्ध होने में हर्जा नहीं है, कह देना ज्यादा उचित है।
अत: उसने सबेरे सब पुजारियों को बुलाया और कहा कि रात मंदिर का देवता उसके सपने में प्रकट हुआ था और उसने कहा है कि मैं आज रात आ रहा हूं। अत: मेरी प्रतीक्षा करो, मेरे स्वागत की तैयारी करो। उन सबने हंसना शुरू कर दिया और कहने लगे—यह सपना है, सपनों पर विश्वास मत करो। पागल हुए हो? यदि यह खबर फैल गई और यदि देवता नहीं आया तो लोग हंसेंगे।
अत: उन सबने फैसला किया कि वे किसी को कुछ भी नहीं कहेंगे, लेकिन वे तैयार रहेंगे। कहीं आ ही जाये! अत: उन्होंने सारे मंदिर की सफाई की, सारी तैयारी की। लेकिन वे जानते थे कि यह केवल सपना है, इसलिए आधे मन से सब किया। यह भी इसलिए कि कहीं वह आ ही जाए। उन्होंने सब किया लेकिन प्रेम से नहीं किया, प्रतीक्षारत होकर नहीं किया। वे पहले से ही जानते थे कि यह सिर्फ सपना है। सपने ने उन्हें उन्‍मुख नहीं किया। वे जानने वाले लोग थे, और उन्हें इतिहास का पता था कि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। वे शास्त्र जानते थे, और प्रकाण्ड पंडित थे। इसलिए उन्होंने कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और यh अभी भी होने को नहीं है।
पंडित सदैव सोचते हैं कि भविष्य अतीत की पुनरुक्ति है बार—बार; वह कभी भी नया नहीं होता। लेकिन फिर भी वे खतरा मोल लेना नहीं चाहते इसलिए तैयारी भी करते हैं। वे सफाई करते हैं, वे सजावट करते हैं, बहुत—सा भोजन तैयार किया जाता है आने वाले देवता के लिए। लेकिन वे जानते हैं कि यह उनके स्वयं के लिए ही है। यह सब उनके लिए ही है, देवता आदि कुछ आने वाला नहीं है। अत: उनके हृदय तैयार नहीं हैं, केवल मंदिर तैयार है। और जब हृदय तैयार नहीं हो तो मंदिर क्या कर सकता है? अत: वे प्रतीक्षा करते हैं। रात्रि उतर आती है, अंधेरा छा जाता है। रास्ता सुनसान हो गया है, उस पर कोई आता—जाता नहीं है। आस—पास के सब लोग सोने चले गए हैं।
तब वे कहते हैं, बहुत हो गया। केवल एक सपने के लिए हमने बहुत देर इंतजाम कर लिया है। हम बड़े मूर्ख हैं। अब हमें भोजन कर लेना चाहिए जो कि हमने बनाया है। सारा दिन बेकार में ही हम उपवास करते रहे। अत: उन्होंने भोजन कर लिया ओर आनंद मनाते रहे। और उसके बाद वे सो गये। वे थके हुए थे सारे दिन सफाई की थी, सजावट आदि की थी—अत: वे गहरी नींद सो गये।
ठीक आधी रात को उन्होंने अपनी नींद में सुना कि एक रथ उनके मंदिर के पास आ रहा है। उसकी आवाज आ रही है। एक पुजारी सुनता है। उसने कहा, ''लगता है कि सम्राट, देवता आ गया है। मुझे रथ के पहियों की आवाज आ रही है। ''किसी और ने कहा, ''बेवकूफ मत बनो और हमारी नींद खराब मत करो। हमने बहुत प्रतीक्षा कर ली है, बहुत हो गया। अब परेशान मत करो। '' अत: वे लोग फिर से सो गये। तब किसी ने पैरों की आहट सुनी। कोई मंदिर की सीढ़ियों से ऊपर आ रहा है—मंदिर की बहुत—सी सीढ़िया हैं।
फिर कोई आधी नींद में कहता है, ''लगता है, सम्राट आ गया है। कोई दरवाजे तक आ पहुंचा है। और पैरों की आहट ऐसी है कि किसी मनुष्य की नहीं हो सकती।''
तब मुख्य पुजारी स्वयं कहता है, ''मूर्खता की बातें मत करो। सारी रात हमें तंग मत करो। हम लोग सारा दिन काम करते रहे हैं। यदि उसे आना ही होता तो वह शाम तक आ गया होता। कोई आवश्यकता नहीं—ऐसा कभी नहीं सुना गया कि वह आधी रात को आया हो।''
तब कोई द्वार पर दस्तक देता है, और फिर किसी को सुनाई पड़ता है कि द्वार पर दस्तक दी जा रही है। तब तो पुजारी एकदम पागल हो जाता है और कहता है, ''बंद करो यह बकवास। कुछ नहीं है बल्कि दरवाजे पर हवा धक्का दे रही है।''
अत: वे फिर सो जाते हैं। सुबह उठ कर वे सब रोते—चिल्लाते हैं और छाती पीटते हैं, क्योंकि रथ आया था। उसके निशान मार्ग पर हैं और देवता मंदिर तक आया था। सीढ़ियों पर उसके पैरों के निशान हैं। लेकिन अब तो कुछ भी नहीं किया जा सकता। वह क्षण, वह अवसर तो चला गया।

यही सारी स्थिति है। वास्तव में, वह तो सदैव ही आ रहा है, उसका रथ तो सदा ही द्वार पर है। वह सदा ही द्वार पर दस्तक दे रहा है, लेकिन तुम बंद हो। खुले रहो—यही उपनिषद की आधारभूत देशना है। ज्ञानी मत बनो। अतीत से, इतिहास से, स्मृति से मत चिपको। खुले रहो और अज्ञात के घटित होने के लिए प्रतीक्षा करो। और जब भी वह घटता है उसे ज्ञात बनाने की कोशिश मत करो। जो भी हो उसे फेंक दो और फिर से तैयार हो जाओ। कुछ फिर से नया होगा। ब्रह्म सदा ही अज्ञात रहता है।
वस्तुत: वही अमरत्व को उपलब्ध होता जो उसे पूरी तरह बोधपूर्वक जानता है
कोई भी ज्ञान आत्यंतिक नहीं है। प्रत्येक ज्ञान सिर्फ एक स्पंदन की भांति है—बस एक स्पंदन, एक कंपन। किसी भी कंपन को आत्यंतिक मत बनाओ। गहरे ध्यान में तुम्हें एक विराट मौन का अनुभव होगा। वह सिर्फ एक स्पंदन है। इसे ब्रह्म मत समझ लेना। ब्रह्म इससे बहुत बड़ा है। जो भी घटित होता है ब्रह्म उससे बहुत बड़ा है। किसी भी घटना को ब्रह्म के साथ एक मत करो, वरना तुम रुक जाओगे।
ध्यान में तुम्हें कई बार गहरे आनंद की अनुभूति होगी। तुम बह जाओगे। लेकिन नहीं कहो कि यह ब्रह्म है, क्योंकि जैसे ही तुम कहते हो कि यह ब्रह्म है, तुम बंद हो जाते हो। यह सिर्फ बोध का स्पंदन है, सिर्फ अनुभूति का स्पंदन है। सिर्फ चेतना का स्पंदन है, सिर्फ एक तरंग है। लेकिन कभी किसी तरंग को सागर मत समझ लेना। स्मरण रहे कि जब भी तुम किसी लहर को सागर बना देते हो तो वह ज्ञान हो जाता है। तब तुम बंद हो जाते हो। प्रत्येक लहर को एक लहर ही रहने दो, और सागर की प्रतीक्षा करो।
और यह भी स्मरण रहे कि सागर कभी भी नहीं आता, सदा लहरें ही आती हैं। सागर लहरों के द्वारा ही आता है, ये लहरें ही हैं जो कि आती हैं। सागर तो कभी भी नहीं आता। इसलिए स्वयं को एक जगह न रोको और यह मत कहो कि यह लहर सागर ही है। जैसे ही ऐसा तुम कहते हो, तुम बंद हो जाते हो।
बहुत से लोग उस गहरे आनंद को उपलब्ध हुए हैं, और फिर वे रुक गये हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि यही ब्रह्म है, उस आत्यंतिक को उपलब्ध कर लिया गया। स्मरण रहे कि उसे कभी उपलब्ध नहीं किया जा सकता। वह प्राप्य है, लेकिन प्राप्त कभी नहीं बन सकता। पहुंचा जा सकता है लेकिन कभी कोई पहुंचा नहीं। यात्रा बाकी ही रहती है। और यह बड़ी सुंदर बात है कि यात्रा बाकी ही रहती है। इसलिए तुमको जो भी अनुभूति होती है, उपनिषद कहते हैं कि वह सिर्फ ज्ञान और सजगता की तरंग है। और यदि तुम इस ज्ञान तथा सजगता की तरंग को अनुभव कर सको तो तुम अमरत्व को उपलब्ध हो जाओगे। क्यों? तुम मरणधर्मा हो, तुम मृत्यु के शिकार होते हो क्योंकि तुम मृत को पकड़ते हो, मृत अतीत को। यदि तुम मृत अतीत से नहीं चिपके तो फिर तुम्हारी कोई मृत्यु नहीं होने वाली है, वह हो ही नहीं सकती। शरीर विलीन हो जायेगा, लेकिन वह कोई मृत्यु नहीं है। वह तुम्हें मृत्यु लगती है क्योंकि तुम शरीर से इतने ग्रसित हो क्योंकि अतीत में तुम शरीर में जीए हो।
एक व्यक्ति सौ वर्षों तक अपने शरीर में रहता है। उस सौ साल के शरीर में रहने के अनुभव के कारण वह शरीर से ग्रसित हो जाता है। अब वह सोचता है कि वह शरीर ही है। वह सौ साल तक शरीर में रहने के कम से, उसकी आदत से उसे गलत खयाल पकड़ जाता है कि वह शरीर ही है। इसीलिए उसे ऐसा लगता है कि मृत्यु आ रही है।
बूढ़ों की अपेक्षा बच्चे मृत्यु से कम डरे हुए होते हैं। क्यों? क्योंकि वे शरीर में अभी नये हैं। वह उनका अभी अनुभव और ज्ञान नहीं हुआ है। वे ताजा हैं। बच्चे सांप के साथ खेल सकते हैं बिना किसी भय के। वे जहर से खेल सकते हैं। वे किसी भी खतरे में उतर सकते हैं। वे भयभीत नहीं हैं। क्यों? क्योंकि वे इस घर में नये हैं। वे इससे इतने नहीं चिपके हुए हैं। यह उनके लिए अतीत नहीं हुआ है। लेकिन देर—अबेर जब वे भी इसमें बहुत साल रह चुके होंगे, वे भी इससे चिपकेंगे। तब वे भी डरे होंगे। तब वे भी मृत्यु से डरने लगेंगे। क्योंकि मृत्यु में शरीर मर जायेगा, और उन्हें अब ऐसा लग रहा है कि वे शरीर ही हैं।
एक आदमी जो कि क्षण— क्षण जीता है, और जो अतीत के प्रति मरता चला जाता है, वह कभी भी किसी चीज से आसक्त नहीं होता। आसक्ति आती है अतीत के इकट्ठे होने के कारण।
यदि तुम अतीत से हर क्षण अलग होते चले जाओ, तो तुम सदा ताजा, युवा तथा नवजात रहोगे। तुम जीवन के साथ धड़कोगे, वह धड़कना ही तुम्हें अमरत्व प्रदान करेगा। तुम अमर हो ही, सिर्फ तुम्हें इस बात का पता नहीं है।
वस्तुत: वही अमरत्व को उपलब्ध होता है जो उसे पूरी तरह बोधपूर्वक जानता है। आत्मा के द्वारा वह शक्ति तथा तेज को प्राप्त करता है और उसके ज्ञान से अमरत्व को।
जितना अधिक तुम जीवन को जानते हो, आंतरिक जीवन को, आत्मा को, उतना ही अधिक तुम जानते हो कि तुम अमर हो। कोई मृत्यु नहीं है; तुम अमर हो।
उसके लिए जो कि उसे यही इसी संसार में जान लेता है सत्य जीवन है
इसलिए किसी अन्य जीवन के लिए मत परेशान होओ। मत परेशान होओ कि मृत्यु के बाद कुछ होगा। यदि यह यहां नहीं हो सकता तो फिर कभी नहीं हो सकता। यदि यह हो सकता है तो केवल यहीं और अभी हो सकता है। यह पृथ्वी, यह जीवन, अभी है। इसे अन्य किसी जीवन के लिए मत गंवाओ। और कोई जीवन नहीं है। जीवन हमेशा यहां है, जीवन हमेशा इस क्षण में है। इसे टालो मत, क्योंकि इसे टालने से तुम यह अवसर चूक सकते हो।
उसके लिए जो कि उसे यही इसी संसार में जान लेता है सत्य जीवन है। वह जो कि उसे नहीं जान पाता बहुत बड़ी हानि को उपलब्ध होता है प्रत्येक प्राणी— मात्र में आत्मा को जानकर ज्ञानीजन इंद्रियों के अनुभव वाले इस संसार के प्रति मर कर अमर हो जाते हैं
अतीत के प्रति मरते चले जाओ, और तुम्हारे चारों ओर कोई संसार नहीं होगा जिससे कि तुम जुड़ सको, ग्रसित हो सको। अतीत के प्रति मर कर तुम इस संसार के प्रति मर जाते हो। स्मरण रहे कि यह संसार तुम्हारे ही अनुभवों से निर्मित होता है, यह तुम्हारा ही अनुभव है। इस अनुभव के प्रति मर कर तुम इतने युवा हो जाते हो कि तुम अपने चारों ओर कोई संसार निर्मित नहीं करते। वास्तविक संसार कोई समस्या नहीं है—तुम्हारे मन के चारों ओर जो संसार है वही समस्या हैं।

मैंने सुना है :
एक बार ऐसा हुआ कि एक घर में आग लग गई। घर का मालिक रोने, चीखने, चिल्लाने लगा और अपनी छाती पीटने लगा। उसका सारा जीवन बर्बाद हो गया। तभी अचानक एक आदमी आया और बोला, ''तुम क्यों रो रहे हो? क्या तुम्हें पता है? तुम्हारे बेटे ने कल तय कर लिया था, मकान बेचा जा चुका है। '' आंसू गायब हो गये, और वह आदमी मुस्कुराने लगा। वह बोला, ''ऐसा है क्या? '' घर अभी भी जल रहा था, लेकिन अब उसका आंतरिक घर नहीं जल रहा था। घर कोई समस्या नहीं था, वह जो भीतर आसक्ति थी वही समस्या थी।
थोड़ी देर बाद उसका बेटा आया और बोला, ''ही, हम तय करने ही वाले थे, लेकिन अभी कोई मामला तय नहीं हुआ था।''

उस आदमी के आंसू फिर से बहने लगे। फिर से वह छाती पीटने लगा, मगर उस घर को कुछ पता नहीं था कि उस आदमी को क्या हो रहा था। कुछ ही मिनटों में सभी कुछ बदल जाता है—आंतरिक संसार बदल जाता है। यदि घर उसका न होता तो उसको कोई समस्या नहीं थी। वह घर कोई समस्या नहीं थी, लेकिन घर मेरा है—यह 'मेरा' ही सारे भीतर के संसार को निर्मित करता है।
यदि तुम अतीत को उठा कर फेंकते जाओ, तो फिर तुम्हारा कुछ भी नहीं है। तब तुम्हारी मालकियत किसी चीज पर भी नहीं है, तुम सदा बिना किसी मालकियत के होते हो। यही संन्यास है। ऐसा नहीं है कि तुम घर का उपयोग नहीं करोगे, नहीं कि तुम कपड़े नहीं पहनोगे, नहीं कि तुम इस संसार में नहीं रहोगे, लेकिन तुम्हारी मालकियत किसी भी चीज पर नहीं होगी।

मन का भीतरी संसार विलीन हो जाता है बस। तब जो यह वास्तविक जगत है, सुंदर है। सारी कुरूपता तुम्हारे मन के द्वारा प्रक्षेपित की जा रही है, मृत अतीत के द्वारा थोपी जा रही है। तब जीवन कुरूप हो जाता है। जीवंत वर्तमान के साथ जीवन बस सुंदर है और आंनदपूर्ण है।

दिनांक 13 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।