कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

जरथुस्‍त्र--नाचता गाता मसीहा-ओशो (दसवां--प्रवचन)

सर्जक के ढंग की बात—(दसवां—प्रवचन)


प्यारे ओशो

तुम्हें स्वयं को अपनी ही लपटों में जला देने को तैयार रहना जरूरी है : कैसे तुम नये हो सकते थे यदि प्रथमत: तुम राख न हो गये होते?....
अलग हट जाओ और मेरे आसुओ के साथ अकेले होओ मेरे बंधु। मैं उसे प्रेम करता हूं जो स्वयं के पार सृजन करना चाहता है और इस प्रकार मिट जाता है।

......ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा।


सृजनात्मकता संभवत: एकमात्र अस्तित्वगत धर्म है। सृजन के क्षण वे क्षण हैं जब तुम सृटि के साथ एक हो। एक प्रकार से तुम खो जाते हो, तुम अपना पुराना अहंकार अब और नहीं हो; एक दूसरे प्रकार से तुमने पहली बार अपने आप को पाया है।
केवल सर्जक ही जीवन की गहराइयों और प्रेम की ऊंचाइयों को जानता है। वे लोग जो सृजनात्मकता का आयाम नहीं जानते वे बेखबर रह जाते हैं कि सच्चा धर्म क्या है। सच्चा धर्म पूजा नहीं है। सच्चा धर्म ?एउधर्मग्रंथों में बंद नहीं है। सच्चे धर्म में एक ही बात होती है : तुम्हारा सृष्टिकर्ता के साथ भाग लेना। तुम्हारा यह भाग लेना चाहे फिर कितना ही छोटा क्यों न हो उसकी एक महत्ता है, क्योंकि केवल तुम्हीं उसको कर सकते हो, दूसरा कोई उसे नहीं कर सकता।
ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है कहीं — ईश्वर सृष्टि की समूची सृजनात्मक ऊर्जा का सामूहिक नाम है। जैसे ही तुम सृजनात्मक होते हो तुम उसके हिस्से हो, और जो लोग सृजनात्मक नहीं हैं वे अस्तित्व के प्रवाह से अलग— थलग बने रहते हैं। और वे लोग जो विध्वंसात्मक हैं, न केवल वे अस्तित्व से अलग— थलग हैं बल्कि वे अस्तित्व के विपरीत हैं। वे ही असली पापी हैं।
पुण्य कहलाने योग्य एकमात्र पुण्य सृजनात्मकता है। इससे भेद नहीं पड़ता कि तुम क्या सृजन करते हो, लेकिन उसे जीवन—उन्नायक होना चाहिए अस्तित्व को सौंदर्य प्रदान करना चाहिए जीने को और उल्लासमय बनाना चाहिए गीतों को थोडा और रसपूर्ण, प्रेम को थोड़ा और महिमावान बनाना चाहिए — और सर्जक का जीवन शाश्वतता और अमर्त्यता का अंग होने लगता है।
जरथुस्त्र सर्जक के ढंग के संबंध में बात कर रहे हैं। करोडों लोग जीते हैं जो कुछ भी सृजन नहीं करते। और यह जीवन का एक मूलभूत तत्व है कि जब तक तुम सृजन नहीं करते — चाहे वह एक चित्र हो, कि एक गीत, कि नृत्य — तुम आनदपूर्ण नहीं हो सकते, तुम दुख में ही बने रहोगे। केवल सृजनात्मकता तुम्हें तुम्हारी गरिमा प्रदान करती है। वह तुम्हें अपनी सम्पूर्णता में खिलने में सहयोग देती है।

 तुम्हें स्वयं को अपनी ही लपटों में जला देने को तैयार रहना जरूरी है : कैसे तुम नये हो सकते थे, यदि प्रथमत: तुम राख न हो गये होते? अलग हट जाओ और मेरे आसुओ के साथ अकेले होओ मेरे बंधु। मैं उसे प्रेम करता हूं जो स्वयं के पार सृजन करना चाहता है और इस प्रकार मिट जाता है।
स्वयं के पार कुछ सृजन करने का अर्थ है कि तुम्हें विदा होना होगा। केवल जब तुम अनुपस्थित होते हो तभी तुमसे महानतर कुछ तुममें उपस्थिति हो सकता है। जब तुम्हारा सारा नकली व्यक्तित्व गिर जाता है, तभी तुम्हारी असली निजता उत्पन्न होती है। 
वह तुम्हे बस तीन चीजो के प्रति सजग कर रहे हैं: एक, सर्जक हुए बिना तुम धार्मिक नहीं हो सर्जक हुए बिना तुम वास्तव में जिंदा नहीं हो; सर्जक हुए बिना तुम स्वतंत्र नहीं हो। तुम्हारी सृजनात्मकता स्‍वतंत्रता लाती है। शक्‍ति, प्रज्ञा, चेतना लाती है। किंतु वह खतरे भी लाती है। जिसके प्रति वह तुम्‍हें सजग कर रहे हैं।
यह साहसियों का मार्ग है, उनके लिए जो खतरनाक ढंग से जीना चाहते हैं, क्योंकि जीने का अन्य  कोई ढंग नहीं है। कायर सिर्फ बने रहते हैं; केवल बहादुर जीते हैं।
महानतम बहादुरी और शक्ति की जरूरत होती है जब तुम स्वयं का अतिक्रमण करते हो। तुम्हें एक लपट बनना होगा जिसमें तुम जलकेर राख हो जाओ, और एक नयी सत्ता, एक नया मनुष्य — जिसे जरथुस्त्र परममानव कहते हैं — तुममें से उत्पन्न हो।
सृजनात्मकता स्वयं तक और स्वयं के परममानव तक जाने की राह है। जब तक व्यक्ति अपना परममानव न खोज ले, वह व्यर्थ ही जीआ।

........ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा।