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रविवार, 10 नवंबर 2013

केनोउपनिषद--ओशो (ग्‍यारहवां--प्रवचन)

सत्‍य या युक्‍ति—ग्‍यारहवां प्रवचन


प्रश्‍न सार :


*मन के अतिक्रमण के लिए क्‍या सारी समृतियों को नष्‍ट कर देना होगा?


*क्या आतरिक अतृप्ति भी इच्छाओं का ही एक हिस्सा है?


*हम कैसे जानें कि आप सत्य कह रह रहे हैं या कि कोई युक्ति कर रहे हैं?


पहला प्रश्‍न :

आपने कहा कि क्षण—क्षण जीने के लिए व्‍यक्‍ति को अपने मृत अतीत तथा स्‍मृतियों को फेंक देना चाहिए। क्‍या इसका यह अर्थ है कि मन का अतिक्रमण करने के लिए सारी स्‍मृतियों को विलीन तथा नष्‍ट कर देना होगा? लेकिन इस संसार में व्‍यवहार करने केलिए तेज और कार्यकुशल स्‍मृतियों का संचय होना भी तो जरूरी है।



अतीत के प्रति मर जाने का यह अर्थ नहीं होता कि तुम उसकी याद नहीं रख सकोगे। इसका यह अर्थ नहीं होता कि तुम्‍हारी सारी स्‍मृतियां विलीन हो जायेंगे। अथवा नष्‍ट हो जायेंगी। इसका अर्थ सिर्फ इतना ही है कि तुम इस स्‍मृतियों में नहीं जीते। तुम्‍हारा इन स्‍मृतियों सेकोई तादात्‍म्‍य नहीं है। तुम उनसे मुक्‍त हो गये। वे रहेंगी, लेकिन अब वे सिर्फ तुम्‍हारे मस्‍तिष्‍क का एक हिस्‍सा होंगी। न कि तुम्‍हारी चेतना का हिस्‍सा।
मस्‍तिष्‍क एक यंत्रिक बात है। जैसे कि टेप——रिकार्डिंग मशीन होतीहै। मस्‍तिष्‍क प्रत्‍येक बात को रिकार्ड करता चला जाता है। मस्‍तिष्‍क भोतिक अंग है। यह रिकार्ड करता चला जाएगा। और तुम्‍हारी स्‍मृति नष्‍ट नहीं हो सकती। जब तक कि मस्‍तिष्‍क को नष्‍ट नहीं कर दिया जाये। लेकिन वह कोई समस्‍या नहीं है। समस्‍या यह है कि तुम्‍हारी चेतना स्‍मृतियों से भरी है। तुम्‍हारी चेतना लगातार मस्‍तिष्‍क से तादात्‍म्‍य बनाये हुए हे। और मस्‍तिष्‍क सदा तुम्‍हारी चेतना से उद्वेलित है। और तुम्‍हारे भीतर स्‍मृतियों की बाढ़ आती रहती हे।
जब तुमसे कहा जाता हैं कि अतीत के प्रति मर जाओ, तो उसका अर्थ होता है कि मन लें अपना तादात्‍म्‍य मत करो। तुम मन का उपयोग कर सकते हो; तब तुम्हारा मन सिर्फ एक यंत्र है; जब भी तुम्हें इसकी जरूरत होगी, तुम इसका उपयोग कर लोगे। और तुम्हें इसकी जरूरत पड़ेगी। तुम्हें लौटकर घर जाना पड़ेगा, तुम्हें याद रखना पड़ेगा कि तुम कहौ रहते हो, कि तुम्हारा घर कहां है, तुम्हारा नाम क्या है। तुम इन स्मृतियों का उपयोग कर सकते हो। मगर तुम उनका उपयोग करो, उन्हें तुम्हारा उपयोग नहीं करने दो बस यही समस्या है।
जब तुम यहां पर हो तो तुम्हें अपने घर के विषय में सोचने की जरूरत नहीं है, जहां तुम रहते हो तुम्‍हारे गांव में, लेकिन तुम लगातार उसके बारे में सोचते रहते हो। तुम्हें अपनी पत्नी को याद करने की जरूरत नहीं है जब तक तुम यहां हो। लेकिन तुम उससे बात करते रहते हो, जबकि वह यहां उपस्थित नहीं है। जब तुम घर वापस लौटोगे तब तुम्हें उसे पहचानना चाहिए कि वह तुम्हारी पत्नी है, लेकिन अभी उसकी चिंता करने की क्या जरूरत है? उसे तुम्हारे मन में आने की जरूरत नहीं है। मन को अनावश्यक कार्य करने की जरूरत नहीं है। उस अतीत को बीच में लाने की जरूरत नहीं है; उस वर्तमान को अतीत से भरने की जरूरत नहीं है।
स्मृति तो रहती है। वह कोई नष्ट नहीं की जा सकती है। ध्यान में मन को नष्ट नहीं किया जाता। तुम सिर्फ उसका अतिक्रमण करने लगते हो। वह एक भंडारघर की भांति रहता है। तुम्हें उसमें रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम उसमें रहते हो तो तुम पागल हो। तुम्हें भंडारघर में रहने की जरूरत नहीं है। जब तुम्हें किसी चीज की आवश्यकता होती है तो तुम उसमें जाते हो और उस वस्तु को निकाल कर उसका उपयोग कर लेते हो। लेकिन एक भंडारघर कोई रहने का कमरा नहीं है।
लेकिन तुमने उसे रहने का कमरा बना लिया है। तुम्हारा स्मृतियों का भंडारघर ही तुम्हारा रहने का कमरा बन गया है। तुम वहां रहते हो। वहां मत रहो; बस इतना ही अर्थ है। वर्तमान में रहो, और जब भी अतीत की जरूरत हो उसका उपयोग करो। मगर व्यर्थ में ही उसे लगातार तुम्हारे ऊपर मत छाने दो। वह जो अतीत की बाढ़ लगातार आती रहती है, वही चेतना को धीमी और धुंधली कर देती है। तब तुम स्पष्ट आंखों से नहीं देख सकते, तुम स्पष्ट हृदय से अनुभव नहीं कर सकते। तब कुछ भी स्पष्ट नहीं होता। सभी बातें उलझी हो जाती हैं।
इसके विपरीत, जब तुम मन से तादात्म्य नहीं बनाते तो तुम्हारी स्मृति बड़ी स्पष्ट होगी। तुम्हारी स्मृति अच्छी नहीं है क्योंकि तुम अपने मालिक नहीं हो। तुम्हारा मन एक विक्षिप्त यांत्रिकता है। जब तुम कुछ याद करना चाहते हो तो तुम उसे याद नहीं कर पाते, और जब तुम उसे याद नहीं करना चाहते तो वही—वही याद आता है। और तुम मालिक नहीं हो सकते यदि तुम गुलाम से तादाक्य बना लो। यदि तुम गुलाम से बहुत ज्यादा आसक्त हो जाओ, तो गुलाम तुम पर हुक्म चलाने लगेगा।
अत: यदि तुम अतीत के प्रति मर जाओ तो तुम उस कारण अपने मन से कार्य लेने में कुछ कम कुशल नहीं हो जाओगे, बल्कि तुम ज्यादा ही कुशल हो जाओगे। एक मालिक सदा ज्यादा कुशल होता है। जब वह याद करना चाहता है तो वह याद कर लेता है, और जब याद नहीं करना चाहता तो वह याद नहीं करता। जब वह मन से कहता है कि कार्य करो, तो वह कार्य करता है। और जब कहता है कि रुको तो मन रुक जाता है।
मुझे भी स्मृतियों का उपयोग करना पडता है। मुझे तुमसे बात करनी होती है, मुझे शब्दों का उपयोग करना पडता है, मुझे भाषा का उपयोग करना पड़ता है। लेकिन जब मैं तुमसे बात कर रहा हूं केवल तभी मैं उनका उपयोग करता हूं। जिस क्षण भी मैं नहीं बोल रहा हूं मन रुक जाता है। फिर परिपूर्ण रिक्तता है—शून्य। तब कोई बादल नहीं है।
यह तुम्हारे पांवों की तरह है, जब तुम चलना चाहते हो तो तुम अपने पैरों का उपयोग करते हो। लेकिन तुम उन्हें तब भी हिलाते ही जाओ, जब तुम बैठे या खड़े हो तो लोग समझेंगे कि तुम पागल हो गये हो। तब तुम कह सकते हो कि मैं क्या कर सकता हूं? मेरे पैर हिलते ही जाते हैं, मैं इसमें कुछ भी नहीं कर सकता। तब तुम्हें यदि कोई कहे कि रोको इसे, तो तुम कहोगे कि यदि मैं रुक जाऊं तो जब मुझे चलना होगा तब मैं क्या करूंगा। मैं कम कुशल हो जाऊंगा। यदि मैं रुक जाऊं तो मेरी चलने की सामर्थ्य ही खो जायेगी, इसलिए मुझे इन्हें सतत चलाते रहना पडता है। याद रहे, यदि तुम उन्हें लगातार चलाते रहे तो जब चलने का समय आयेगा तो तुम्हें थकान महसूस होगी। तुम पहले से ही थके हुए हो।
जब बैठे हो, पैरों का उपयोग करने की कोई भी जरूरत नहीं है। जब बोल नहीं रहे हो तब शब्दों को उपयोग करने की कोई भी जरूरत नहीं है। अपने भीतर शब्द न निर्मित करो। जब अतीत का उपयोग नहीं कर रहे हो तो इसकी बाढ़ को तुम पर न आने दो। अतीत के प्रति मरने का अर्थ होता है, अपने मन के मालिक होना। तब तुम ज्यादा कुशल होओगे। लेकिन वह कुशलता एक दूसरा ही गुणधर्म लिए होगी—एक बिलकुल ही भिन्न प्रकार का गुणधर्म होगा। उसमें कोई प्रयास नहीं होगा।
अभी, जब कभी तुम कुछ याद करना चाहते हो तुम्हें प्रयास करना पड़ता है क्योंकि तुम इतने ज्यादा थके हुए हो। तुम्हारा मस्तिष्क लगातार काम करने में इतना ज्यादा थका हुआ है। उसके लिए कोई रुकना नहीं है, कोई विश्राम नहीं है। यहां तक कि जब तुम सो रहे हो तब भी शरीर तो विश्राम कर रहा है लेकिन मन कार्य करता ही चला जाता है। सपनों में वह सक्रिय है—सतत कार्य में लगा है। चमत्कार है कि तुम अभी तक पागल कैसे नहीं हुए। हो सकता है कि तुम पागल हो ही चुके हो, लेकिन तुम्हें पता नहीं है। अथवा, यह भी हो सकता है कि प्रत्येक तुम्हारी ही तरह पागल है, इसलिए तुम तुलना नहीं कर सकते, और तुम नहीं जान सकते कि तुम्हें क्या हो रहा है।
डरो मत। तुम्हारी कुशलता बढ़ जायेगी। और उसका गुणधर्म भिन्न ही होगा क्योंकि उसमें कोई भी प्रयास नहीं होगा। जब भी तुम्हें जरूरत होगी तुम मन का उपयोग कर सकोगे। वह सिर्फ एक यंत्र की भांति है, जैसे कि तुम्हारे हाथ हैं, पैर हैं, वह तुम्हारे शरीर का एक अंग है। स्मृति एक शारीरिक बात है, याद रहे। इसलिए यदि तुम्हारा मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो जाए तब भी तुम जीवित और होश में रह सकते हो लेकिन तुम अपनी स्मृति गंवा दोगे। इसलिए यदि तुम्हारे मस्तिष्क का एक खास हिस्सा नष्ट कर दिया जाये तो एक विशेष प्रकार की स्मृति खो जायेगी।
मेरा एक मित्र जो कि डाँक्टर है, ट्रेन से गिर पड़ा। वह सिर के बल गिरा था, कुछ अंदर टूट गया। तीन वर्ष तक उसकी सारी स्मृति खो गई। वह अपने माता—पिता को भी नहीं पहचान सका। वह जिंदा था, पूरी तरह जिंदा था, चेतन था, लेकिन वह लिख—पढ़ नहीं सकता था क्योंकि उसकी समस्त स्मृति खो गई थी। उसने पुन: अ, , स से शुरू किया। तीन वर्ष बाद ही वह फिर से अपने मस्तिष्क का उपयोग कर सका। लेकिन वह सिर्फ तीन वर्ष का बच्चा था। सारे चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान, सारी डिग्रियां खो गई थीं, क्योंकि उसके मस्तिष्क के कुछ विशेष तंतु—नाड़ियां आदि नष्ट हो गए थे, और उनके साथ उसकी सारी स्मृतियां भी नष्ट हो गई थीं।
अब चीन में वे ब्रेन वाशिंग करते हैं। मस्तिष्क के किन्हीं खास हिस्सों पर वे बिजली के झटके देते हैं। केवल बिजली के उन झटकों से वे भीतरी सारी स्मृति को नष्ट कर देते हैं। अत: यदि तुम धार्मिक आदमी हो तो मस्तिष्क में वे तुम्हें शॉकट्रीटमेंट देंगे और तुम्हारी सारी समृतिया—कि तुम धार्मिक हो, कि तुम इस चर्च को जाते हो, कि तुम वह बाइबिल पढ़ते हो, या तुम उस संप्रदाय से संबंध रखते हों—सब नष्ट हो जायेंगी। तब तुम्हें आसानी से एक कम्युनिस्ट में बदल दिया जाएगा, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है कि तुम कौन हो।
और अब ये तरकीबें सारे संसार को पता हो चुकी हैं। अब सभी सरकारों के पास रहस्य मौजूद हैं। और सारी दुनिया में जो सबसे खतरनाक बात घटित होने वाली है वह यह है कि अब शारीरिक हिंसा के स्थान पर मानसिक हिंसा शुरू होने वाली है। तुम्हें किसी आदमी को मारने की जरूरत नहीं है, तुम सिर्फ उसकी किसी खास स्मृति को नष्ट कर दो। एक बार उसकी ब्रेन—वाशिंग हो जाए, तो उसे फिर से अ, ,, से पढ़ना पड़ेगा। फिर वह तुमसे नहीं लड़ सकता।
यदि तुम उसे कम्मुनिस्ट अथवा कम्मुनिस्ट—विरोधी बनाना चाहते हो तो पहले स्मृति को नष्ट कर दो। तब फिर वह एक बच्चे की भांति हो जाएगा—असहाय। तब फिर से उसका प्रशिक्षण शुरू करो। अब एक नई स्मृति शुरू होगी, एक नई शिक्षा, एक नया संस्कार प्रारंभ होगा।
अणु—बम भी इतना खतरनाक नहीं है जितने ये रहस्य हैं, क्योंकि इनके द्वारा आदमी की आत्मा को भी गुलाम बनाया जा सकता है। यदि जीसस का पुन: रूस में या चीन में जन्म हो तो वे उन्हें क्रास पर नहीं लटकायेंगे। सर्वप्रथम वे उनकी स्मृति को नष्ट करने का प्रयास करेंगे। वे जीसस के साथ सफल नहीं हो सकेंगे, लेकिन वे तुम्हारे साथ सफल हो सकते हैं। वे जीसस के साथ सफल नहीं हो सकते क्योंकि जीसस का पहले ही अपनी स्मृति से कोई तादाक्य नहीं है। तुम यदि समृति को नष्ट कर दो तो वास्तव में उनका कुछ भी नहीं खोता क्योंकि वे अपनी चेतना में जीते हैं, न कि स्मृति में।
तुम्हारे पास अलग से कोई चेतना नहीं है जो कि तुम्हारी स्मृति से अलग हो। अत: यदि तुम्हारी स्मृति को नष्ट कर दिया जाए तो तुम्हारी चेतना भी नष्ट हो जाती है। तुम्हें पता ही नहीं है कि बिना स्मृति के किस तरह कार्य किया जाता है। इसलिए नई पीढ़ी के लिए, आने वाले संसार के लिए, ध्यान की बडी जरूरत है, क्योंकि केवल ध्यान ही तुम्हें राजनीतिक तानाशाही से बचा सकता है—और कुछ भी नहीं। वे तुम्हें साइबेरिया अथवा जेल में नहीं भेजेंगे। नहीं, वे सब बातें बहुत पुरानी हो गईं। वे तुम्हारी खोपड़ी के चारों ओर एक बिजली का यंत्र लगा देंगे और वे तुम्हारे मस्तिष्क को एक विशेष प्रकार के बिजली के झटके देंगे, और तुम बच्चे की तरह हो जाओगे। वे तुम्हारी स्मृतियों को वैसे ही पोंछ डालेंगे, जैसे कि तुम किसी टेप को साफ कर देते हो। जो किया जाता है वह इतना ही है कि कुछ बिजली के झटके, और जो भी रिकार्ड है वह सब साफ हो जाता है। तब तुम पुन: रिकार्ड कर सकते हो। यही बात मस्तिष्क के साथ भी संभव है, क्योंकि मस्तिष्क एक यांत्रिक घटना है।
अत: जब मैं तुमसे कहता हूं कि अतीत के प्रति मर जाओ तो मेरा मतलब है कि मन के साथ इतने मत जुड़ो कि तुम्हें पता ही नहीं चले कि तुम बिना मन के भी हो सकते हो। इस बात को जानकर, इस बात को अनुभव करने के बाद कि मैं बिना मन के भी हो सकता हूं कि मैं चेतना हूं न कि स्मृतियां; कि स्मृतियां सिर्फ मेरी साधन मात्र हैं; यह सब जान कर तुम अपने मन से मुक्त हो सकते हो। और एक बार तुम अपने मन से मुक्त हो जाओ, तो फिर कोई तुम्हें गुलाम नहीं बना सकता।
अन्यथा प्रत्येक छलपूर्वक इस कोशिश में लगा है कि कैसे तुम्हें गुलाम बनाया जाये। धर्मों, तथाकथित धर्मों ने यही किया है। वे तुम्हारे मस्तिष्क को बहकाए चले जाते हैं। जब तुम बच्चे थे तो वे तुम्हें सिखा रहे थे कि तुम हिंदू हो, ईसाई हो, कैथोलिक हो अथवा प्रोटेस्टेंट हो। वे तुम्हें बचपन से सिखाते चले आ रहे हैं जबकि तुम्हें कुछ भी पता नहीं था, जबकि तुम जरा भी सावधान नहीं थे, सजग नहीं थे, तब तुम यह भी नहीं पहचान सकते थे कि क्या सच है और क्या झूठ है। जब तुम सोच भी नहीं सकते थे, तबसे ही उन्होंने तुम्हें सिखाना शुरू कर दिया, संस्कार देना शुरू कर दिया था। उन्होंने तुम्हें हिंदू मुसलमान, ईसाई, जैन आदि न जाने क्या—क्या बना दिया। ये ही गुलामिया हैं।
अब बच्चों को पकड़ने की जरूरत नहीं है, एक बूढ़े को भी फिर से बच्चा बनाया जा सकता है, सिर्फ ब्रेनवाश की जरूरत है। तब उसे अ, , , से सीखना पड़ेगा। और जब तुम अ, , , से शुरू करते हो तो तुम विवाद नहीं कर सकते। जब तुम अ, , , से ही सीख रहे हो तो तुम अविश्वास भी नहीं कर सकते। इसीलिए प्रत्येक धर्म बच्चों को पकड़ना चाहता है और प्रत्येक धर्म कुछ धार्मिक शिक्षा बच्चों पर आरोपित करना चाहता है। क्योंकि केवल बचपन में ही...।
वस्तुत: यदि तुम सात वर्ष के पहले बच्चे को नहीं पकड़ पाते हो तो फिर बाद में उसे नहीं पकड़ा जा सकता। सात वर्ष के पहले उसे ग्गुलाम बनाया जा सकता है। और तब उसे कभी पता नहीं चलेगा कि वह गुलाम है, क्योंकि दासता उसकी सजगता से भी गहरी चली जायेगी।
तुम कभी भी नहीं सोच सकते कि ईसाई होने से तुम एक दास हो गये अथवा हिंदू होने से तुम एक दास हो गये। या कि तुम सोच सकते हो पू
समाज ने तुम्हारे साथ एक चालाकी की है। जब तुम पूरी तरह सजग नहीं थे तभी उसने तुम्हारे मन को संस्कारित कर दिया। अब जब तुम सोचते हो तो तुम्हारे संस्कार तुम्हारे विचार से भी गहरे जा चुके हैं। जो कुछ भी तुम सोचते हो, वे संस्कार उसको रंगते जाते हैं। यहा तक कि यदि तुम ईसाइयत विरोधी भी हो जाओ और तुम्हें ईसाई होना सिखाया गया था तो तुम्हारे ईसाइयत के विरोध में भी ईसाइयत मौजूद होगी। तुम्हारा ईसाइयत विरोध भी ईसाइयत के ही संस्कारों से प्रभावित होगा। तुम उसी बात से ग्रसित होओगे सिर्फ उसका रुख उल्टा होगा।
फ्रेडरिक नीत्शे ईसाइयत के विरोध में था, विशेष कर जीसस के। लेकिन उसे एक ईसाई की तरह पाला—पोसा गया था। वह अपनी सारी जिंदगी भर संघर्ष करता रहा। अपनी सारी जिंदगी वह क्राइस्ट के विरोध में लिखता रहा।
लेकिन वह क्राइस्ट से इतना ग्रसित था कि वह पागल हो गया। और अपने अंतिम दिनों में जबकि वह पागल हो गया तो वह अपने हस्ताक्षर 'क्राइस्ट—विरोधी फ्रेडरिक नीत्शे' करता था। उसका वह संस्कार इतना गहरे चला गया था! तुम विरोधी बन सकते हो लेकिन तुम तटस्थ नहीं रह सकते।
मरो अतीत के प्रति, जीयो वर्तमान में जिस क्षण में तुम हो—इससे तुम्हारा मन नष्ट नहीं हो जायेगा। वास्तव में उससे तुम्हारे बेचैन मन को विश्राम मिलेगा। तुम्हारी कुशलता बढ़ जायेगी, और कोई प्रयत्न अथवा प्रयास नहीं करना पड़ेगा। तुम्हें स्मरण करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम्हें स्मरण रहेगा ही। क्योंकि यह मन का कार्य है उसके लिए तुम्हें कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है।
मैं इस देश में पंद्रह साल तक घूमता रहा और हजारों लोगों से मेरा परिचय हुआ। और दस साल के बाद भी मैं दुबारा उस शहर में जाता तो मैं वे चेहरे पहचानता, उनके नाम भी मुझे याद रहते। मैं स्वयं आश्चर्यचकित होता। आखिर बात क्या है और इसके लिए मैंने कोई प्रयास नहीं किया था। लेकिन बात इतनी ही है कि मुझे लोगों में रुचि है। अगर तुम्हें किसी बात में सचमुच ही रुचि है तो वह तुम्हें स्मरण रहेगी। उसके लिए किसी प्रयास की जरूरत न पड़ेगी।
स्मरण रखना स्मृति की एक यांत्रिक प्रक्रिया है। यदि तुम किसी आदमी में वस्तुत: रुचि रखते हो तो तुम्हें उसका चेहरा कितने ही जन्मों तक याद रहेगा। मुझे कई जन्मों के बाद भी बहुत—से चेहरे याद हैं। तुम उन्हें भूल नहीं सकते क्योंकि मूलने का प्रश्न ही नहीं है। तुम्हारे मस्तिष्क का यांत्रिक हिस्सा प्रत्येक बात को रिकार्ड करता जाता है, केवल तुम्हारी रुचि की जरूरत है।
जब तुम रुचि लेते हो तो तुम्हारी यांत्रिकता उस व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है; वह कैमरे के लेंस की तरह रिकार्ड करती है। यदि तुम्हारा किसी चेहरे में रस है, तो कैमरा गति करता है और रिकार्ड कर लेता है। यदि जो भी तुम कह रहे हो उसमें मेरा रस है तो मेरा मन केंद्रित हो जाता है। वह रिकार्ड करता जाता है। उसके लिए किसी प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम्हारा रस नहीं है तो वह रिकार्ड नहीं करेगा, क्योंकि वह केंद्रित ही नहीं हुआ।
अत: यदि तुम चीजों को भूल जाते हो तो उसका कारण इतना ही है कि तुम्हें उनमें कोई रस नहीं है। यदि तुम चीजों को भूल जाते हो तो इसका मतलब है कि तुम्हारा मन उलझा हुआ है। यदि तुम चीजों को भूल जाते हो, और उन्हें याद नहीं रख सकते और कुशल नहीं हो तो इसका अर्थ है कि जब तुम एक चेहरे को देखते हो, तो तुम्हारे भीतर बहुत—सी स्मृतियां चल रही होती हैं। तुम्हारा दर्पण खाली नहीं है। तुम्हारा लेंस पहले से ही भीड़ से भरा हुआ है।
कोई कहता है कि मेरा नाम राम है, और तुम अपना सिर हिलाते हो कि ही; जैसे कि तुमने सुन लिया हो। लेकिन तुम्हारा मन बहुत—सी बातों से भरा हुआ है, तुमने सुना ही नहीं है। और फिर तुम कहते हो कि मैं नाम क्यों भूल गया? वास्तव में तुमने नाम सुना ही नहीं। तुम्हें उस व्यक्ति में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इतना रस नहीं था कि तुम्हारा मन मौन हो जाता। जब भी कभी तुम किसी बात में रुचि रखते हो तो मन शात हो जाता है और तुम्हारा सारा अस्तित्व खुल जाता है।
घटनाओं की स्मृतियां अंकित होती जाती हैं और जब भी तुम्हें किसी बात की आवश्यकता होगी तो वे ऊपर आ जायेंगी। लेकिन यह बात तुम्हारे लिए इतनी सरल नहीं है, क्योंकि तुम्हारा मन इतना भरा हुआ है कि जब भी तुम्हें किसी चीज की जरूरत पड़ती है तो प्रत्येक चीज उसके साथ उलझ जाती है। कुछ भी स्पष्ट नहीं है। प्रत्येक चीज एक—दूसरी से उलझी हुई है, एक—दूसरी में अतिक्रमण कर गई है। कुछ भी स्पष्ट नहीं है। स्पष्टता नहीं है, केवल उलझाव है। उसी उलझाव के कारण तुम कुशल नहीं हो, तुम बिना किसी प्रयत्न के कुशल हो सकते हो। यदि तुम इस क्षण के प्रति सजग हो जाओ और अपने को अतीत के बोझ से बोझिल न होने दो।


दूसरा प्रश्न :

मुझे इच्छाओं की व्यर्थता महसूस होती है और समझ में आती है। ऐसा लगता है कि मेरे भीतर कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। लेकिन फिर भी कोई प्यास है अभीप्सा है और एक आतरिक अतृप्ति का भाव है कृपया समझाएं कि क्या यह भी इच्छाओं का ही एक हिस्सा है?


ही, यह भी वासनाओं का ही एक हिस्सा है—नकारात्मक हिस्सा। प्रत्येक चीज के दो भाग होते हैं—विधायक तथा नकारात्मक। वासना का विधायक भाग होता है कि चीजों की वासना करे, महत्वाकाक्षा करे। जब किसी को वासना के विषय का पता होता है, तो वह विधायक वासना होती है। और जब वासना के विषय का पता नहीं होता तो वासना नकारात्मक होती है, लेकिन तब वासना की प्यास का—उसकी लालसा का—पता चलता है।
ये दो भाग हैं। अतृप्ति का अनुभव—यह महत्वाकांक्षा का नकारात्मक हिस्सा है। और किसी वस्तु की वासना से ग्रसित होना—यह महत्वाकांक्षा का विधायक हिस्सा है। दोनों ही वासनाएं हैं। और यदि तुम सिर्फ बुद्धि से समझ लेते हो कि वासना बेकार है तो नकारात्मक हिस्सा तुम्हारे साथ रहेगा—यदि तुमने सिर्फ बुद्धि से समझ लिया है कि वासना व्यर्थ है और यह कोई अस्तित्वगत अनुभव नहीं है।
तुम बातें सुनते रहे हो। तुम सुनते रहे हो और तुम पढ़ते रहे हो। और बुद्ध और क्राइस्ट जैसे लोग जगत से बोलते रहते हैं और वे कहते रहते हैं कि तुम दुख में हो क्योंकि वासना है, तुम दुख में हो क्योंकि इच्छा है। और वे कहते हैं कि वे बड़े आनंद में हैं, क्योंकि कोई इच्छा नहीं है। तुमने उन्हें देखा है; तुमने उनकी आंखों में झांका है; तुमने उनके चेहरे देखे हैं, और तुमने उनकी आभा, उनका आनंद भी देखा है जो कि उनके चारों ओर नाचता रहता है। उनकी छाया में भी आनंद है, नृत्य है। तुमने उन्हें देखा है, तुमने उन्हें सुना है और वे कहते हैं कि यदि तुम इच्छा करोगे तो तुम पीड़ा पाओगे, और यदिं तुम इच्छा नहीं करोगे तो तुम आनंद में रहोगे।
अब यह बात बौद्धिक रूप से तुम्हारी समझ में आ जाती है। क्योंकि वासना तनाव पैदा करती है, क्योंकि वासना भविष्य निर्मित करती है, क्योंकि वासना अपेक्षा को जन्म देती है, और जब वह पूरी नहीं होती तो तुम पीड़ा पाते हो। अथवा, जब वह पूरी भी हो जाती है तो भी तुम आनंद में नहीं होते। जब वह पूरी हो जाती है तो तुम्हें लगता है कि यह तो कुछ भी नहीं है; कि यह तुम्हारे सपनों की तुलना में, तुम्हारी अपेक्षा की तुलना में कुछ भी नहीं है। तुम किसी व्यक्ति के प्रेम में पड़ जाते हो, किसी लड़की या लड़के के प्रेम में पड़ जाते हो, या तुम कोई घर चाहने लगते हो, या तुम किसी कार को प्रेम करने लगते हो, और तुम सोचते हो कि यदि यह स्त्री मुझे मिल जाये तो मैं बड़े आनंद में होऊंगा। लेकिन यह तुम्हारा सपना है, कोई भी स्त्री इसे पूरा नहीं कर सकती।
यह सिर्फ कल्पना है जिसे कोई भी वास्तविक स्त्री पूरा नहीं कर सकती। हर स्त्री इस सपने की तुलना में फीकी पड़ जायेगी। लेकिन यह किसी स्त्री का कसूर नहीं है। यह तुम्हारा ही मन है जो कि सपने संजोता रहता है। तुम एक सपना, एक कल्पना खड़ी कर लेते हो और आकाश में उड़ने लगते हो। फिर तुम एक स्त्री से मिलते हो। यदि तुम उसे नहीं पा सके, उस पर मालकियत नहीं जमा सके तो तुम पीड़ा पाओगे; क्योंकि तुमने एक सपना देखा था और तुम्हारा सपना पूरा नहीं हुआ। तुम सदा अपने दिल में एक पीड़ा का अनुभव करोगे।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि यदि तुमको वह मिल भी जाती तो तुम और भी ज्यादा पीड़ा पाते! क्योंकि यदि तुम उससे नहीं मिल पाये तो कम से कम तुम्हारा सपना बना रहता है। तुम सपना देखते रह सकते हो। लेकिन यदि वह तुम्हें मिल गई तो तुम पाओगे कि कोई भी स्त्री स्वर्ग में नहीं रहती। जैसे तुम पृथ्वी पर रहते हो, वह भी पृथ्वी पर ही रहती है। वह भी उतनी ही इस पृथ्वी की है जितने कि तुम हो, बल्कि स्त्री पुरुष से ज्यादा ही पार्थिव होती है। वह तुम्हारे सारे सपनों को बिखेर देगी। और जब तुम अपने सपनों से जागोगे तो तुम और भी ज्यादा दुख में होओगे। चाहे तुम्हारा सपना पूरा हो जाये या न हो पाये, दुख ही होगा। सपनों से सिर्फ दुख ही फलित होता है।
यह बात तुम समझ सकते हो। तुम्हारा अनुभव भी सहायक होगा। बौद्धिक रूप से तुम इसे समझ सकते हो, और फिर तुम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हो कि कामना व्यर्थ है। वासना करना ही व्यर्थ है; यह हमें सिर्फ दुख में तथा नर्क में ले जाती है। लेकिन इससे वासना का विधायक हिस्सा ही रुकेगा, नकारात्मक तो वैसा ही रहेगा।
वस्तुत: तुम अभी भी कामना कर रहे हो। तुम अब निर्वासना की स्थिति की कामना कर रहे हो। अब तुम निर्वासना की वासना कर रहे हो। अब निर्वासना तुम्हारी इच्छा की विषय—वस्तु बन गई है। तुम्हें एक प्रकार की अभीप्सा होगी, खोज होगी, प्यास होगी, और एक अतृप्ति होगी।
अब क्या किया जाये? क्या किया जा सकता है? बौद्धिक समझ से तुम्हें कुछ भी नहीं होगा। तुम वासना की वस्तु बदलते रहोगे। और वह नकारात्मक हिस्सा तुम्हें नई—नई वासनाओं की ओर धकेलता रहेगा। उसे जीयो। बुद्ध पर विश्वास मत करो, जीसस पर विश्वास —मत करो, मुझ पर विश्वास मत करो—उसे जीयो। वासना करो और उसे जीयो, और वासना को उसकी परिपूर्णता में अनुभव करो। और कोई जल्दी मत करो, निर्णय लेने की इतनी जल्दी मत करो। तुम्हारी सारी पीड़ा ही इसलिए है क्योंकि तुम निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दी करते हो।
तुम किसी भी बात में विश्वास करने को इतने आतुर हो क्योंकि तुम अनुभव में नहीं जाना चाहते। अनुभव पीड़ादायी हो सकता है, लेकिन उसे होने दो। केवल अनुभव ही तुम्हारी मदद कर सकता है। अपरिपक्व निष्कर्ष, कच्चे विश्वास तुम्हारे किसी भी काम के नहीं होंगे। तुम सिर्फ अवसर को खो रहे हो। वासना करो और तीव्रता से वासना करो। मैं कहता हूं कि तीव्रता से वासना करो और पीड़ा झेलो।
बुद्ध अपने निष्कर्ष पर किन्हीं पूर्ववर्ती बुद्धों के कारण से नहीं पहुंचते हैं। उपनिषद तब उपलब्ध थे वे उन्हें पढ़ सकते थे। वे पढ़े—लिखे थे, सुसंस्कृत थे, उन्हें सारे शास्त्रों का ज्ञान था। लेकिन उनसे कुछ भी त्नाभ न हुआ। वे वासना के द्वारा ही चले, वे अनुभव से गुजरे। उन्होंने पीड़ा को झेला, वे आग से गुजरे। और केवल अपने ही अनुभव से वे इस नतीजे पर पहुंचे कि वासना व्यर्थ है।
तुम्हारा निष्कर्ष तुम्हारा अपना नहीं है; यही समस्या है। तुम्हारा निष्कर्ष उधार है। वस्तुत: तुम पीड़ा से गजरने में डरते हो, अत: पीड़ा से गुजरने के पहले ही तुम विश्वास करना शुरू कर देते हो।
लेकिन पीड़ा एक साधना है। पीडा ही एकमात्र साधना है। बिना उसके कुछ भी वास्तविक नहीं पाया जा सकता है।
और तुम छोटे बच्चों के समान आचरण कर रहे हो उनकी किताबों में सवालों के जवाब पीछे दिये रहते हैं। छोटे बच्चे उन उत्तरों को देख लेते हैं। उन्हें उत्तर तो मिल जाते हैं लेकिन उन्हें प्रक्रिया का पता नहीं होता। सवाल दिया हुआ है, और आखिर में उत्तर दिया है। वे उत्तर को देख लेते हैं, अब उन्हें उत्तर का पता है, लेकिन यह उनका उत्तर नहीं है। वे समस्या को भी जानते हैं, और वे उसका उत्तर भी जानते हैं लेकिन वे उस प्रक्रिया को नहीं जानते—जिससे कि उत्तर प्राप्त किया जाता है।
तुम भी बिना प्रक्रिया से गुजरे ही उत्तर की तलाश में हो। उत्तर मौजूद हैं। बुद्धपुरुष हुए हैं; उन्होंने वह सब कह दिया है जो कहा जा सकता है, और तुम उत्तरों को कंठस्थ कर सकते हो। किंतु बिना प्रक्रिया के तम रूपांतरित नहीं होओगे। अत: उत्तरों को भूलो। यही तो उपनिषद कहते हैं ज्ञान ही बाधा है। भूलो शान को। यदि तुम अज्ञानी हो तो तुम अज्ञानी हो। तुम अपने अज्ञान से ही शुरू करो; किसी और के ज्ञान से शरू मत करो।
ज्यादा अच्छा है कि तुम अपने अज्ञान से प्रारंभ करो, क्योंकि वह तुम्हें ज्ञान की ओर ले जायेगा। प्नेकिन तुम सदा किसी और के ज्ञान से प्रारंभ करते हो। तब तुम एक झूठे संसार में पहुंच जाते हो। तब तम निष्कर्षों को इकट्ठा करना प्रारंभ कर देते हो। और तुम बिना कुछ भी जाने सभी कुछ जानने लगते हो। तम इतनी जल्दी में होते हो, कि तुम कहते हो कि मैं किसी प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहता, मुझे तो उत्तर चाहिए।
उत्तर तुम्हें दिये जा सकते हैं—लेकिन जब तक तुम प्रक्रिया से नहीं गुजरो, वे उत्तर तुम्हारे जीये हुए उत्तर नहीं —होंगे। और जब तक जीये हुए न हों, बेकार होंगे। तुम जानते हो कि वासना करना व्यर्थ है, तुम जानते हो कि क्रोध जहर है, तुम जानते हो कि लोभ दुख में ले जाता है—तुम सब कुछ जानते हो। लेकिन यह सारा ज्ञान किसी काम का नहीं है। इसे फेंको। यह कचरा है।
सिर्फ अपनी मनःस्थिति के प्रति सजग होओ—वहां इच्छा है, प्यास है, अतृप्ति है। इसका अर्थ होता है कि तुम इच्छा करने के लिऐ तैयार हो। अब इच्छा करो, और बुद्धों की मत सुनो, वे खतरनाक हैं। वासना करो। और चलो। तुम्हें अपनी ही राह पर चलना पड़ेगा। तुम्हें अपनी ही राह पर यातना सहनी पड़ेगी। कोई भी पीड़ा से बच नहीं सकता। यह सार्वभौमिक नियम है। कोई भी सुगम मार्ग से नहीं चल सकता—ऐसे सुगम मार्ग हैं भी नहीं। तुम्हें अपनी राह पर ही चलना पड़ेगा; तुम्हें अपने नर्कों से गुजरना ही पड़ेगा।
जब तुम उनसे गुजर जाओगे, उनका अतिक्रमण कर लोगे, ज्यादा समृद्ध हो जाओगे, उनका अनुभव ले लिया होगा और तुममें एक प्रौढ़ता आ गई होगी, केवल तभी वासना गिरेगी। वासना तब विलीन हो जायेगी। और तब उसका कोई निषेधात्मक हिस्सा नहीं होगा। तब समग्र रूप से वासना विलीन हो जायेगी, क्योंकि तुम्हें पता चलेगा कि यह तो मूढ़ता है ''मैं ही अपने लिए नर्क निर्मित करता रहा! '' और अब यह बात बौद्धिक नहीं होगी, यह सिर्फ मन की बात नहीं होगी। तुम्हारा सारा अस्तित्व, तुम्हारा सारा होना ही इस निष्कर्ष पर पहुंच जायेगा। और यह निष्कर्ष तुम्हारे अनुभव से आयेगा, न कि किसी और के अनुभव से।
तब वासना विलीन हो जाती है और यह वासना अन्य किसी भी वेश में फिर उद्भूत नहीं होती। वरना तुम वासना की वस्तु बदलते रहोगे। कभी तुम धन की वासना करोगे और तुम्हें पीड़ा का अनुभव होगा, तब तुम निर्णय लोगे कि वासना दुख है। तो तुम परमात्मा की वासना करने लगोगे, या तुम स्वर्ग की कामना करने लगोगे, अथवा मोक्ष की वासना करोगे, अथवा ध्यान की चाह करोगे, आनंद की कामना करोगे, लेकिन तुम वासना करते ही रहोगे। और यदि तुम वासना करते ही रहे तो सिर्फ तुम वासना की सूरत बदल लोगे, कामना की वस्तु बदल लोगे। किंतु वासना तो वही की वही रहेगी। तुम नहीं बदले, तुम वही हो। तुम एक ढांचे में, एक वर्तुल में घूम रहे हो। तुम कहीं भी नहीं जा रहे हो।
इसलिए मैं बार—बार कहता रहता हूं कि सावधान रहो बुद्धों से, क्राइस्टों से, कृष्णों से। मुझसे भी सावधान रहो, क्योंकि मैं भी ऐसी बातें कहता रहता हूं जिनमें तुम आसानी से विश्वास कर लोगे, और तब बात खतरनाक हो जाती है। जब मैं कुछ कहता हूं तो उसे समझने की कोशिश करो, उसके द्वारा निष्कर्ष मत निकालो। निष्कर्ष तो तुम्हारे अपने जीवन से ही आने चाहिए; तभी केवल रूपांतरण होगा। और किसी जल्दी में मत पड़ो। कोई जल्दी नहीं है, समय शाश्वत है।
अनुभव में उतरो। बनो अपने अनुभव के प्रति प्रामाणिक, और निष्कर्षों को अपनी विशिष्ट एवं व्यक्तिगत खोज से आने दो। सत्य तुम पर घटित होगा, लेकिन यदि तुम दूसरों से उधार लेते रहे तो वह कभी भी घटित नहीं होगा। वह सत्य का परिपूरक बन जाता है। वैसा सत्य समस्याएं ज्यादा खड़ी कर देता है, सुलझाता कम है।
तुम्हारी समस्याएं, जहा तक मैं देखता हूं नब्बे प्रतिशत तुम्हारे उधार शान के कारण हैं। केवल दस प्रतिशत समस्याएं ही सही हैं। नब्बे प्रतिशत तो झूठी हैं क्योंकि वे तुम्हारी अपनी नहीं हैं। पहले तुम किसी बात में विश्वास करना शुरू कर च्छै हो, और फिर उस विश्वास में से समस्याएं पैदा होने लगती हैं। अब यह समस्या उधार है क्योंकि तुमने 'विश्वास कर लिया है, क्योंकि तुमने बौद्धिक रूप से निष्कर्ष ले लिया है, तर्क से इस नतीजे पर पहुंच गये हो कि वासना व्यर्थ है। यदि सचमुच ही यह तुम्हारा अपना निष्कर्ष है तो फिर अतृप्ति कैसे हो सकती है? अतृप्ति वासना का ही बीज है 1
जब तुम अतृप्त होते हो तो उसका अर्थ है, कहीं तृप्ति की खोज करो, वासना करो। जब तुम अतृप्त हो तो इसका अर्थ होता है कि तुम वही नहीं हो जो कि तुम होने चाहिए थे; तुम वहां नहीं हो जहा तुम्हें होना चाहिए था। अत: चाहो, खोजो, चलो! अतृप्ति का अर्थ होता है—स्वयं से असंतोष। तृप्ति का अर्थ होता है कि मैं जो भी हूं सो हूं मैं जहा हूं वहीं मुझे होना चाहिए था। अथवा जहां भी मैं हूं स्वयं से पूर्ण रूप से संतुष्ट हूं तृप्त हूं। तब वासना की कोई गति नहीं होती।
गति तो होती है, लेकिन वह गति जीवन की होती है, न कि वासना की। मैं चलता चला जाऊंगा, और हर गति मेरे जीवन की ऊर्जा से आयेगी, न कि मेरी वासना से। वासना मन से होती है। जीवन चलता चला जाता है, किंतु मैं सरिता के समान बहता चला जाऊंगा। वह ऊर्जा ही गति पैदा करेगी, लेकिन वह गति किसी वासना के कारण नहीं होगी। नहीं कि पहले मैं वासना करूंगा और फिर चलूंगा। इस भेद को समझने का प्रयत्न करो।
मैं तुमसे बोल रहा हूं। यह बोलना दो तरह से हो सकता है : यह सिर्फ जीवन—ऊर्जा की गति के फलस्वरूप हो सकता है, अथवा यह किसी कामना के कारण हो सकता है। यदि मैं इसकी कामना करूं तो मुझे पहले इसकी पूर्व तैयारी करनी पड़ेगी। तब यहां आने के पहले मेरे मन में तुम सब मेरे सामने उपस्थित होने चाहिए। तब मैं मेरे मन में विचार करूंगा कि मुझे क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, किस तरह कहना है, और किस तरह नहीं कहना है। तब मैं योजना बनाऊंगा, और इस तरह मैं भविष्य में उतर जाऊंगा। तब मैं इसे दोहराऊंगा, और यदि यह ठीक स्तर का नहीं हुआ जैसा कि मैंने चाहा था तो मेरे मन में विषाद पैदा होगा।

मैंने सुना है :

एक बार मार्क—ट्वेन एक प्रवचन—स्थल से प्रवचन देकर वापस आ रहा था। जब वह वापस लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि प्रवचन कैसा रहा? मार्क—ट्वेन ने पूछा, ''कौन से प्रवचन की बात कर रही हो? —उसकी जो कि मैंने पहले से तैयार किया था, अथवा उसकी जो मैंने वास्तव में दिया, अथवा उसकी जो मैं देना चाहता था और मैंने लौटते समय कार में दिया?''

यदि मैं उसके बारे में पहले से विचार करूं तो फिर यह वासना है। यदि मैं सिर्फ तुम्हारे पास आ जाऊं और मेरे भीतर से जो भी प्रति—संवेदन हो, अनियोजित, पहले से बिना सोचे—विचारे, मात्र जीवन—ऊर्जा की गति हो, उसके लिए पहले से कोई योजना नहीं हो, तो ही वह जीवन ऊर्जा की गति है। यदि वह सुनियोजित हो तो फिर यह मन की वासना है।
गति तो होगी, लेकिन वह अनियोजित होगी, स्वतःस्फूर्त होगी। वासना गति को पंगु कर जाती है। वह जीवन—ऊर्जा को गति ही नहीं करने देती। यह योजना बनाती है, चुनाव करती है, पहले से निर्णय करती है। वास्तविक स्थिति के पहले ही तुम निर्णय कर चुके होते हो। तुम सदा ही मुश्किल में रहोगे, क्योंकि कभी भी यह सही प्रति—संवेदन नहीं होगा, क्योंकि तुम पहले से ही वास्तविक स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। वह सदा अज्ञात रहती है। तुम विषाद का अनुभव करोगे।
जो मन इच्छा करता है, वह सदा ही विषाद में होता है। सिर्फ वही मन जो कि कुछ वासना नहीं, करता, जो जहा परमात्मा ले जाये, जीवन ले जाये, वहीं जाता है—चाहे सही, चाहे गलत, चाहे स्वर्ग, चाहे नर्क.. जो कि चलता जाता है जहां जीवन की ऊर्जा ले जाये। ऐसा व्यक्ति कभी विषाद से नहीं भर सकता। कैसे तुम उसे निराश करोगे? और कुछ भी तुम्हें तृप्त नहीं कर सकता। कैसे कोई तुम्हें तृप्त कर सकता है?
वासना के साथ तृप्ति का कभी मिलन नहीं होता।
निर्वासना के साथ विषाद का कभी मिलन नहीं होता।
स्वयं के प्रति सच्चे तथा प्रामाणिक बनो। और यदि तुम वासना के पार नहीं गये हो तो मत मान लो कि तुम उसके पार चले गये तो; उससे कुछ भी नहीं होगा। जानो कि इच्छा, आकाक्षा है। जानो कि जैसे तुम अभी हो, तुम अतृप्त हो। तुम्हें किसी और चीज की जरूरत है। वह जरूरत चाहे धुंधली ही हो, चाहे तुम उसे जानो चाहे न जानो, इससे कुछ भी अंतर नहीं पड़ता। तुम अभी इसी क्षण पूरे तथा समग्र नहीं हो, स्‍वयं के साथ सुखी नहीं हो। तुम अपने घर में नहीं हो, तुम्हारा घर कहीं और है, तुम उसी को खोज रहे हो।
इसे ठीक से जानो, क्योंकि यह जानना तुम्हारे लिए अच्छा तथा सहायक होगा। इसे जानो, और वासना में उतरी। उसकी यातना को, पीड़ा को सहो। उसका दुख भोगो, उसके विषाद का स्वाद चखो और  जीवन को अपने आप निष्कर्ष पर पहुंचने दो। कृपा कर तुम निष्कर्ष मत निकालो। जीवन को स्वयं निष्कर्ष पर आने दो।
और जब जीवन स्वयं निष्कर्ष पर पहुंचता है तो वासना अपने से ही गिर जाती है, बिना किसी और वासना को अपनी जगह पैदा किये। वह सिर्फ गिर जाती है। जैसे कि सूखे पत्ते वृक्षों से झर जाते हैं, ऐसे ही वासना भी गिर जाती है—समग्र वासना। तब उसके पीछे कोई उसका निषेधात्मक हिस्सा बचा हुआ नहीं रहता। और जब तुम निर्वासना की ऐसी स्थिति में होते हो, तो वह जो कि आनदपूर्ण है तुम पर घटता है, वह जो अतिसुखदायी है, वह तुम पर बरसता है। तुम पहली बार खिलते हो। पहली बार तुम पुष्पित होते हो। और तब कुछ भी अतृप्ति नहीं होती, तुम जैसे हो वैसे ही तृप्त होते हो।
लेकिन इसके पहले कि वह हो, यदि तुम उधार लेते चले गये तो फिर मामला कठिन होगा। तुम व्यर्थ ही अपने लिए बाधाएं पैदा कर रहे हो। निष्कर्ष तुम्हें अच्छे लगेंगे, लेकिन उनका अच्छा लगना कोई माने नहीं रखता। मैं तुम्हें किसी भी चीज के बारे में राजी कर सकता हूं लेकिन वह राजी होना किसी अर्थ का नहीं है, क्योंकि वह मेरे द्वारा लादा गया है। मैं तर्क कर सकता हूं मैं तुम्हें समझा सकता हूं और तुम्‍हें लग सकता है कि बात बिलकुल ठीक है, किंतु वैसा लगना कुछ भी सहायता नहीं करेगा, जब तक कि तुम्‍हारी स्वयं की जीवन—ऊर्जा ही उस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे, जब तक कि यह आतरिक समझ नही बन जाये कि तुम्हारे भीतर से ही आये, न कि बाहर से थोपी जाये।
इसलिए मैं कहता हूं कि बुद्धपुरुष खतरनाक हैं—क्योंकि वे इतने अधिक आश्वस्त करने वाले होते है। तुम उनके साथ चलते हो तो बहुत अधिक संभावना है कि तुम उनकी बातों से प्रभावित हो जाओ उनका होना ही बड़ा आश्वस्त करने वाला होता है। इसलिए बहुत—से धर्म निर्मित हो जाते हैं, इतने सारे संप्रदाय खड़े हो जाते हैं क्योंकि जहां कहीं भी एक बुद्ध पैदा होता है, तुम अनिवार्य रूप से उससे प्रभावित हो जाते हो। तुम सम्मोहित हो जाते हो, और तुम निष्कर्षों को उधार लेने लगते हो। और फिर तुम जन्‍मों तक उन उधार निष्कर्षों को ढोते रहते हो। वे एक बोझ बन जाते हैं।
इस बोझ के प्रति मर जाओ। स्वयं के प्रति प्रामाणिक बनो और पता लगाओ कि तुम कहां खड़े हो। यदि वह नर्क भी हो तो भी स्वीकार करो कि ''मैं नर्क में हूं। '' इस बात की स्वीकृति कि तुम नर्क में हो एक परिस्थिति निर्मित करेगी ताकि तुम इसमें से बाहर निकल सको। किंतु तुम रहते तो नर्क में हो, लेकिन तुम यह मानते रहते हो कि तुम स्वर्ग में हो। यह बात बड़ी मूढ़ता की है, और इससे कुछ भी हल नहीं होता।

अंतिम प्रश्न :


कल रात आपने कहा कि कभी— कभी आप असत्य बोलते हैं और हमारे विषाद के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हैं ऐसी हालत में कब हम आपमें विश्वास करें और कैसे जानें कि आप हमसे सत्य बात कर रहे हैं या कोई युक्ति कर रहे हैं?


मेरा कभी विश्वास मत करो। कभी भूल कर भी मेरा विश्वास मत करो। सावधान रहो! मैं जो भी कहता हूं सब झूठ हो सकता है। हो सकता है कि वह सिर्फ तुम्हें सांत्वना देने के लिए, सिर्फ तुम्हें एक कदम और आगे चलाने के लिए एक युक्ति हो। मेरा विश्वास न करो। और फिर तुम्हारे लिए यह पता लगाना बड़ा मुश्किल है कि मैं कब झूठ बोल रहा हूं और कब सच बोल रहा हूं। इसीलिए मैं इकट्ठा ही कहे दे रहा हूं : मेरा विश्वास मत करो—क्योंकि तुम तय कैसे करोगे? तुम्हें पता नहीं है कि सत्य क्या है, फिर तुम कैसे तय करोगे?
यदि तुम पहले से ही जानते हो कि सत्य क्या है, तो फिर मेरे झूठ बोलने में भी कोई अर्थ नहीं है। लेकिन तुम्हें कुछ भी पता नहीं है; और तुम सत्य की भाषा भी नहीं समझ सकते। वह भाषा तुम्हारे लिए बेबूझ होगी। तुम सिर्फ असत्य की भाषा ही समझ सकते हो।
लेकिन झूठ भी दो प्रकार के होते हैं, ऐसे झूठ जिनसे और भी झूठ की ओर जाना पड़ता है, और ऐसे झूठ जो तुम्हें अपने पार ले जाएं।
उदाहरण के लिए, हम यहां बैठे हैं। यदि तुमने बाहर क्या है, कभी नहीं जाना है तो तुम्हें पता नहीं कि बाहर फूल हैं, वृक्ष हैं, और आकाश में चांद निकला है। और मैं तुम्हें कहता हूं ''बाहर आ जाओ, बाहर चांद निकला है, पूर्णिमा की रात है, बाहर आ जाओ, '' तुम मुझमें विश्वास नहीं करोगे। तुम पूछोगे, ''रात क्या होती है? चांद क्या होता है? पूर्णिमा क्या होती है? ''
और इस कमरे में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे मैं तुम्हें बता सकूं कि चांद ऐसा होता है। और मैंने चांद को जाना है, और मैंने फूलों को जाना है, और खुले आकाश को देखा है, और मैं अपने आनंद को तुम्हारे साथ बांटना चाहता हूं। और मैं चाहता हूं कि तुम भी बाहर आ जाओ, इसलिए मैं एक तरकीब निकालता हूं। मैं एक झूठ का उपयोग करता हूं। मैं कहता हूं कि घर में आग लगी है। तुम यह बात समझ सकते हो। तुम डर जाते हो, तुम कापने लगते हो। और मैं तुम्हारे भीतर ऐसा विश्वास पैदा कर देता हूं कि घर में आग लगी है, और तुम घर के बाहर भागने लगते हो।
हां, बाहर आ जाने पर तुम मुझे समझ लोगे। तुम नहीं कहोगे कि मैंने झूठ बोला था। तुम कृतज्ञ होओगे, तुम हसोगे। तुम कहोगे, ''कोई आग नहीं लगी है, लेकिन अब हम समझ सकते हैं। ''केवल आग ही तुम्हें बाहर निकाल सकती थी—और कुछ भी नहीं—क्योंकि वही भाषा तुम समझ सकते हो। दुख ही तुम समझ सकते हो, आनंद तुम नहीं समझ सकते।
इसलिए बुद्धपुरुष सदा कहते हैं कि जीवन दुख है। ऐसा है नहीं। फिर भी वे कहे चले जाते है कि जीवन दुख है, संताप है, पीड़ा है। वे कह रहे हैं कि जीवन के मकान में आग लगी है, इससे बाहर निकलो। और वे तुम्हें अवश्य अपनी बात से कायल कर देते हैं, क्योंकि उनमें ऐसी ताजगी है जैसी बाहर आ गये लोगों में होती है। उनमें वह सुगंध है जो उन लोगों में होती है जो कि खुले आकाश में आ गये हैं। वे एक खुशबू लिए होते हैं।
तुम्हें भरोसा आ जाता है क्योंकि तुम देखते हो कि जो भी वे कहते हैं वह सच है। और उन्होंने कुछ पा लिया है, और उनकी वह उपलब्धि भरोसा पैदा कर देती है। और जब वे कहते हैं कि घर में, जीवन में आग लगी है, तो तुम इस घर से बाहर निकलने के लिए प्रयत्न करते हो।
जब तुम बाहर आ जाते हो तो तुम देखते हो कि यह पूर्णिमा की रात है, और जीवन कोई दुख नती था। जीवन दुख लग रहा था क्योंकि तुमने अपने को पिंजरे में कैद कर रखा था।
जीवन विराट है, इसलिए तुम नहीं जान सकते कि मैं कब झूठ बोल रहा हूं और कब सत्य बोल रहा हूं। और यदि तुम मुझसे पूछते हो कि मैं तुम्हें कह दूं कि मैं कब सच बोल रहा हूं और कब झूठ बोल रहा हूं तो सारा अर्थ ही खो जायेगा। और यदि मैं कह भी दूं कि यह बात झूठ है और यह बात सच है, तो भी तुम मुझ पर विश्वास कैसे कर सकते हो? कि मैं तब भी सच ही बोल रहा हूं अथवा झूठ बोल रहा हुं?   
इसलिए तुम्हारे लिए यही आसान होगा कि यदि तुम मुझमें विश्वास कर सकते हो तो पूरा विश्वास करो, और यदि तुम मुझमें विश्वास नहीं कर सकते हो तो बिलकुल भी विश्वास मत करो। यह आसा न होगा; या तो सोचो कि जो भी मैं कह रहा हूं सच है, या फिर जो भी मैं कह रहा हूं झूठ है। ये तो सारी संभावनायें हैं। दोनों तरह से ही तुम्हारी मदद हो जायेगी। मैं कहता हूं कि दोनों ही तरह से तुम्हारी मदद है। जायेगी। तुम किसी उलझन में नहीं पड़ोगे।
यदि तुम मुझमें पूरा—पूरा विश्वास करो कि यह व्यक्ति जो भी कहता है सच है, तो इससे तुम सहायता मिलेगी। नहीं कि जो भी मैं कहता हूं वह सही ही होगा, लेकिन अंततः तुम पाओगे कि वही एक बात थी जो कि तुम्हारे लिए सहायक सिद्ध हो सकती थी। लेकिन वह तुम बाद में ही जान सकोगे।
यदि तुम मुझमें बिलकुल भी विश्वास नहीं करते तो वह भी अच्छी बात होगी। वह भी आसान नहीं है। सबसे सरल रास्ता तो यही है कि कुछ बातों पर विश्वास कर लेना और कुछ बातों पर विश्वास नहीं  करना। यदि तुम मुझमें पूरा ही विश्वास कर लो, या फिर पूरा ही न करो, तो दोनों ही हालत में तुम समग्र हो जाते हो।
पहले ढंग में तुम मेरे प्रति समर्पित हो जाते हो और कहते हो कि आप चाहे सच बोलो चाहे झूठ बोलो, इसकी आप जानो, मैं तो विश्वास करता हूं तो तुम समग्र हो जाते हो, तुम विभाजित नहीं रहते अथवा तुम कहो कि चाहे आप सच कहते हो चाहे झूठ कहते हो, मैं विश्वास नहीं करता, आप झूठे हैं, तो भी तुम समग्र हो जाते हो। और समग्रता सहायक होती है।
लेकिन सरल मार्ग तो यह है कि कुछ बातों में विश्वास कर लेना और कुछ में नहीं करना। यह सरल क्‍यों है? यह सरल है क्योंकि जो भी तुम विश्वास करना चाहते हो उसके बारे में तुम सोचोगे कि यह आदमी सच है; और जो भी तुम विश्वास करना नहीं चाहते उसके बारे में तुम सोचोगे कि यह आदमी झूठ कह रहा है। इससे तुम्हें कुछ अधिक लाभ नहीं होगा। वस्तुत: इससे कुछ भी लाभ नहीं होगा। अत: चुनाव न करो।
मेरी सलाह है कि मुझमें जरा भी विश्वास मत करो। लेकिन यदि तुम सोचते हो कि दूसरी बात बेहतर है, तो पूर्णतया विश्वास करो।

दिनाक 13 जुलाई 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।