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बुधवार, 27 नवंबर 2013

जरथुस्‍त्र--नाचता गाता मसीहा--ओशो (उन्‍निसवां--प्रवचन)

आनंदमय द्वीपों की बात—(उन्‍निस्‍वां—प्रवचन)


प्यारे ओशो,  
ओ मेरे जीवन के अपराह्र।
मैने क्या नहीं दे दिया है कि मैं एक चीज पा सकूं : मेरे विचारों की यह जीवित रोपस्थली  (नर्सरी) और मेरी सर्वोच्च आशाओं का यह अरुणोदय!
एक बार स्रष्टा ने साथियों की और अपनी आशा के बच्चों की तलाश की : और लो ऐसा हुआ कि वह उन्हें नहीं पा सका इसके अलावा कि पहले वह स्वयं उनका सृजन करे।

मेरे बच्चे अपने प्रथम वसंत में अभी भी हरे हैं बहुत पास— पास खड़े हुए और हवाओं द्वारा समान रूप से कंपे हुए मेरे बगीचे और मेरी सर्वोत्तम मिट्टी के ये वृक्ष।

और सच में! जहां ऐसे वृक्ष साथ— साथ खड़े हो वहीं आनंदमय द्वीप हैं!
लेकिन एक दिन मैं उन्हें उखाडूगा और प्रत्येक को अकेला स्वयं भर के साथ लगाऊंगा ताकि वह एकांत सीख सके और अवज्ञा और दूरदर्शिता
तब वह समुद्र के किनारे खड़ा होगा गठीला और ऐठंदार और लचीली मजबूती के साथ अविजेय जीवन का एक सजीव प्रकाशस्तंभ।

..........ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा

रथुस्त्र जैसा व्यक्ति करीब—करीब एक माली है, प्रेम और फिक्र पूर्वक लोगों की देखभाल करता हुआ और उस समय की प्रतीक्षा करता हुआ जब वे फूल और फल लाने में समर्थ होंगे।
चेतना की अपनी ही खिलावट है, लेकिन अधिकाश लोग चेतना की विशाल संभावनाओं और उसके विकास के संबंध में विचार तक किये बिना यंत्रमानव (रोबोट ) की तरह जीए चले जाते हैं। वह तुम्हें केवल जन्म ले लेने भर से नहीं मिलती। जन्म तुम्हें जीवन दे देता है, अब यह तुम पर निर्भर है अपनी जीवन—ऊर्जाओं को चेतना की उच्चतर घटनाओं में रूपातरित करना।
चेतना ठीक एक फूल की तरह है। और जब तक तुम्हारे अंतर्प्राण न खिलें, तुम कभी भी संतुष्ट न महसूस करोगे, कभी भी परितृप्त न महसूस करोगे, क्योंकि तुम्हारा बीज एक बीज ही बना रह जाता है। बीज हजारों फूलों की कैद है। बीज को तोड़ना ही है; बीज को मिट्टी के साथ एक होना ही है ताकि वे फूल जो उसमें संभावना के रूप में छिपे हुए हैं, यथार्थ बनने शुरू हो जाएं।
समस्त महान सद्गुरु अन्य कुछ नहीं बस मानवता के माली हैं। वैसे ही जरथुस्त्र हैं। वह स्वयं से बात कर रहे हैं.
ओ मेरे जीवन के अपराह्न! मैने क्या नहीं दे दिया है कि मैं एक चीज पा सकूं. मेरे विचारों की यह जीवित रोपस्थली (नर्सरी ) और मेरी सर्वोच्च आशाओं का यह अरुणोदय!
एक बार स्रष्टा ने साथियों की और अपनी आशा के बच्चों की तलाश की : और लो ऐसा हुआ कि वह उन्हें नहीं पा सका इसके अलावा कि पहले वह स्वयं उनका सृजन करे।
वह कह रहे हैं कि एक बार वह परममानव की तलाश कर रहे थे, खोजपूर्ण निगाहों सहित उन घाटियों में घूमते हुए जहा मानवता रहती है, कि कोई कहीं हो सकता है जिसने अपनी संभावनाओं को उपलब्ध कर लिया हो, जो मानव होने का अतिक्रमण कर गया हो और परममानव हो गया हो। लेकिन वह असफल रहे; वह एक भी व्यक्ति ऐसा न खोज सके जिसने स्वयं का अतिक्रमण कर लिया हो। और अपने जीवन के अपराह्न में उन्होंने इस बात का अनुभव कर लिया कि परममानव कहीं अन्यत्र नहीं पाया जाने वाला है, तुम्हें उसका सृजन करना होगा। परममानव एक प्राप्ति नहीं, एक सृजन है, और तुम्हें उसका सृजन करना है ठीक जैसे कि एक माली एक सुंदर बगीचे का सृजन करता है।
एक बार स्रष्टा ने साथियों की और अपनी आशा के बच्चों की तलाश की। उनकी आशा बहुत ही एकनिष्ठ है। और उनकी आशा केवल उनकी आशा नहीं है, वही पूरी मानवता की आशा है। यदि परममानव प्रगट नहीं होता, मनुष्य का सर्वनाश निश्चित है। या तो मनुष्य को अपनी चेतना में परममानव का सृजन कर लेना है अथवा मनुष्य के दिन पूरे हुए।
केवल दो ही विकल्प हैं : या तो आत्महत्या अथवा परममानव।
मनुष्य ऐसे घिसटता नहीं जा सकता जिस ढंग से वह हजारों वर्षों से रहा आया है। जहां तक मनुष्य की चेतना का संबंध है, हजारों वर्षों से कोई ऊर्ध्व—विकास नहीं हुआ है। हा, यदा—कदा कोई गौतम बुद्ध, कोई जरथुस्त्र, कोई लाओत्सु खिल उठे हैं; लेकिन वे नियम नहीं हैं, वे अपवाद हैं।
लेकिन उनका होना भी अपरिसीम मदद रही है — आशा करते जाने को कि यदि यह जरथुस्त्र को घट सकता है तो यह तुम्हें भी घट सकता है। व्यक्ति को परममानव का सृजन करना होता है; व्यक्ति को परममानव की धारणा से गर्भवान होना होता है।
.. और लो ऐसा हुआ कि वह उन्हें नहीं पा सका इसके अलावा कि पहले वह स्वयं उनका सृजन करे। उनको पाने का एकमात्र उपाय है उनका सृजन करना। यह महान दिशा—परिवर्तन है। वह उनकी तलाश में अपना समय व्यर्थ कर रहे थे — जैसे कि वे पहले से ही कहीं अस्तित्व में हैं, तुम्हें बस केवल पता कर लेना है कि कहा हैं वे। वे कहीं भी अस्तित्व में नहीं हैं।

मेरे बच्चे अपने प्रथम वसंत में अभी भी हरे हैं बहुत पास— पास खड़े हुए और हवाओं द्वारा समान रूप से कंपे हुए मेरे बगीचे और मेरी सर्वोत्तम मिट्टी के ये वृक्ष।
और सच में! जहां ऐसे वृक्ष साथ— साथ खड़े हो वहीं आनंदमय द्वीप हैं!
जरथुस्त्र व्यक्ति को प्रेम करते हैं। वह भीड़ से नफरत करते हैं, वह समूह से नफरत करते हैं। वह पूरे भीड़—मनोविज्ञान के खिलाफ हैं, क्योंकि जहा तक मनुष्य के ऊर्ध्व—विकास का संबंध है भीड़ निम्नतम हे। भीड किसी व्यक्ति को ऊपर नहीं जाने देती; वे सब के सब उसका पांव पकड़कर उसी कीचड़ में वापस खींच लेते हैं जिसमें भीड़ जी रही है। यह उनके अहंकारों के खिलाफ है कि कोई निजतावान बने। वे उन लोगों का सम्मान करते हैं जो अपनी निजता का बलिदान करते हैं — वे उन्हें संत कहते हैं। और वे समस्त संत कुछ भी नहीं हैं केवल परछाइयां, लाशें, भीड़ की अपेक्षाएं पूरी करती हुईं।
जितना ज्यादा तुम भीड़ की अपेक्षाओं को पूरा करते हो, उतना ज्यादा सम्मान, उतना ज्यादा आदर वे तुम्हें देते हैं; वे तुम्हें एक महान संत बना देते हैं। बस केवल तुम्हें अपने ही सहारे नहीं खड़ा होना चाहिए  — वही बात है जिसे भीड़ नफरत करती है। तुम्हें अपनी निजता पर जोर नहीं देना चाहिए — वही बात है जिसे भीड़ नफरत करती है। और जब तक तुम अपनी निजता पर जोर न डालो तुम परममानव को गर्भ में धारण नहीं कर सकते।
परममानव एक निजतावान व्यक्ति है।
जरथुस्त्र कह रहे हैं, और सच में! जहां ऐसे वृक्ष साथ— साथ खड़े हो वहीं आनंदमय द्वीप हैं! लेकिन उन्हें अलग करना पड़ेगा; तब वे आनंदमय द्वीप बन जाएंगे। हर माली जानता है : वह बीज बोता है, पौधे ऊगते हैं, और वे एक भीड़ होते हैं। तब वह उन्हें अलग—अलग करना शुरू करता है — उन्हें अलग जगह लगाना, उन्हें अपना ही क्षेत्र, अपना ही स्थान प्रदान करना। वह उन्हें निजतावान बनाता..है। वह उन्हें द्वीप बनाता है। लेकिन एक दिन मैं उन्हें उखाडूगा और प्रत्येक को अकेला स्वयं भर के साथ लगाऊंगा ताकि वह एकांत सीख सके और अवज्ञा और दूरदर्शिता। तीन बातें वह कह रहे हैं : ताकि वह एकांत सीख सके.... भीड़ तुम्हें कभी भी एकात का सुंदर आयाम नहीं सीखने देती। वे तुम्हें हमेशा, हर कहीं चारों ओर से घेरे रहते हैं। वे तुम्हें मौन नहीं होने देते, वे तुम्हें अकेला नहीं छोड़ते। वे ऐसे लोगों से बहुत विद्वेष करते हैं जो शात व मौन हैं, अकेले रहते हैं, एकात से प्रेम करते हैं। भीड़ को लगता है वे दुश्मन हैं — वे उनमें से ही एक नहीं हैं, वे बाहरी हैं, वे उनके अपने नहीं हैं।
लेकिन किसी के भी लिए अपनी ही चेतना का अनुभव करने के लिए एकांत सर्वाधिक मूलभूत बातों में से एक है जिसकी जरूरत होती है।
पहली बात एकांत है, दूसरी बात है अवज्ञा।
व्यक्ति को विद्रोही तो होना ही पड़ता है, व्यक्ति को भीड़ को नहीं कहना तो सीखना ही पडता है।
व्यक्ति को अपना निर्णय स्वयं लेना पड़ता है।
व्यक्ति को सब को स्पष्ट कर देना होता है कि कोई भी उसके लिए निर्णय नहीं लेने जा रहा है।

...........ऐसा जरथुस्‍त्र ने कहा।