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रविवार, 10 नवंबर 2013

केनोउपनिषद--ओशो ( बारहवां--प्रवचन)

ब्रह्म का विराट चक्र—बारहवां प्रवचन



                        तृतीयखंड

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयंत त
      ऐक्षंतास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति।।१।।
     
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति।।२।।
     
तेऽग्निमब्रुव जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति।।३।।

तदभ्यद्रवत तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति।।४।।                  
तस्मित्त्वयि किंवीर्यमिति। अपीद सर्व दहेयम् यदिदं पृथिव्यामिति।।५।।
     
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तंन्न शशाक दग्धु स तत एव
      निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति।।६।।
     
अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद्विजानीहि किमेतद यक्षमिति तथेति।।७।।

तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत्कोऽसीति। वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रबीन्मातरिश्वावा अहमस्मीति।।८।।
                 
तस्मिन्स्पयिकिवीर्यमिति? अपीदं सर्वमाददीयम् यदिदं पृथिव्यामिति।।९।।
     
तस्मै तृणं निदधावेतदादक्लेति। तदुपप्रेयायसर्वजवेनतन्नशशकादातुं सततएव
      निववृते, नैतदशकविज्ञातु यदेतद् यक्षमिति।।१०।।
     
अथेन्द्रमब्रुवत् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमितीं।
      तथेति। तदभ्यद्रवत्। तस्मात्तिरोदधे।।११।।
     
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमान्हैमवतीं
      तान्होवाच किमेतद् यक्षमिति।।१२।।

                       
                        केनोपनिषद
                    तृतीय अध्याय

                              1
      कहानी है कि ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की।
यद्यपि विजय ब्रह्म के कारण हुई थी। परंतु देवता गर्व से भर गये और उन्होने सोचा :
''यह विजय हमारे ही कारण हुई है इस गौरव के केवल हम ही मालिक हैं।''

                              2
ब्रह्म को उनके इस गर्व का पता चला?। वह स्वयं उनके सामने प्रकट हुआ,  
      किंतु उनकी समझ में नहीं आया कि यह यक्ष हौन है?

                              3
उन्होंने अग्नि से कहा : ''ओ जातवेद, पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है?''
                  अग्नि ने कहा ''अच्छा।

                              4
अग्नि शीघ्रता से यक्ष के पास गया? यक्ष ने उससे पूछा कि तुम कौन हो?
अग्नि ने उत्तर दिया:''वस्तुत: मैं अग्नि हूं। मैं जातवेद के नाम से भी जाना जाता हूं।‘’

                              5
यक्ष ने पूछा ''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो जो कि इतने प्रसिद्ध हो?''
अग्नि ने उत्तर दिया ''मैं जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है उसे जला सकता हूं।''

                              6
यक्ष ने उसके सामने एक तिनका रख? दिया और कहा ''इसे जलाओ।''
      अग्नि ने अपनी पूरी शक्ति से उस पर हमला किया
            लेकिन वह उसे नहीं जला सका।
  अत: वह वहां से लौटकर देवताओं के पास आ गया और कहा
      ''मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है''

                        7
      तब उन्होने वायु से कहा ''ओ वायु कृपंया पता लगाओ
         कि यह यक्ष कौन है।'' वायु ने कहा ''अच्छा।

                        8
      वायु शीघ्रता से यक्ष के पास गया। यक्ष ने उससे पूछा
                  कि तुम कौन हो।
            वायु ने उतर दिया ''मैं वस्तुत वायु हूं।
          मैं मातरिश्व के नाम से भी जाना जाता हूं।''

                        9
      यक्ष ने पूछा ''तुम किस ऊर्जा केस्वामी हो? जो कि इतने प्रसिद्ध हो?''
वायु ने कहा ''मैं जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है उसे वास्तव में ही उड़ा सकता हूं।''

                        10
    यक्ष ने उसके समक्ष एक तिनका रख दिया और कहा? ''इसे उड़ा दो।''
वायु ने पूरी शक्ति से उसे उड़ाने की कोशिश की लेकिन वह उसे नहीं उड़ा सका।
   इसलिए वह वहाँ से लौटकर देवताओं के पास आ गया और कहा
          ''मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है।''

                        11
तब देवताओं ने इंद्र से कहा ''ओमाघवन! कृपया पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है।
       इंद्र ने कहा ''अच्छा '' और वह शीघ्रता से यक्ष के पास गया।
              किंतु यक्ष उसकी दृष्टि से ओझल हो गया।



                        12
      और उसी स्थान पर इंद्र ने एक बहुशोभामान स्त्री,
हिमाचल कुमारी उमा को देखा और उससे पूछा ''यह यक्ष कौन था?''


गहरी शंति में कोई अहंकार नहीं होता। यह तभी होता है, जब तुम अशांत होते हो। वह रूग्‍णता का हिस्‍सा है। जब तुम गहरे शांत होते हो, तब तुम होते हो, किंतु, ‘’मैं’’ का कोई अहसास नहीं होता। वह शांति में नहीं हो सकता। जब तुम पूरी तरह शांत और मौन हो तो मैं नहीं होता। लेकिन जितने ज्‍यादा तुम अशांत होते हो, उतनी ही ज्‍यादा तुम्‍हें अहंकार की अनुभूति होगी।
अहंकार एक अशांत, रूग्‍ण चित की दशा है। अहंकार स्‍वास्‍थ्‍य नहीं है, वह एक रूग्‍णता हे। जब तुम समग्र रूप से समस्‍वर नहीं होते तो तुम्‍हें उसका पता चलता है। जब तुम समस्‍वरता को प्राप्‍त होते हो, तब तुम तो होते हो, लेकिन कोई अहंकार नहीं होता। कोई मैं की प्रतीति होती। हूं तो होता है, होना तो होता है, लेकिन कोई उसका केंद्र नहीं होता।
यह एक बहुत महत्‍वपूर्ण बात है जो कि समझ लेनी है। उदाहरण के लिए, तुम्‍हें अपने शरीर का पता ही तब चलता है जब तुम बीमार होते हो। यदि तुम वास्‍तव में स्‍वास्‍थ हो तो तुम्‍हारे पास कोई शरीर नहीं होता। एक स्‍वास्‍थ शरीर शरीरहीन होता है; कोई प्रतीति नहीं होती कि शरीर भी मौजूदहै। तुम्‍हारा सिर तभी होता है जब सिर में दर्द होता है। यदि सिरदर्द नहीं हो तो सर का पता नहीं चले।क्‍या तुम अपने सर को महसूस कर सकते हो। यदि तुम्‍हें उसका अनुभव होता है तो समझो की भारी पन है। कुछ अशांति है, कुछ बीमारी है। जब वह गड़बड़ होता है।''
यही स्वास्थ्य की परिभाषा है कि यदि शरीर का पता ही न चले तो तुम स्‍वस्‍थ हो, यदि शरीर का पता चलता है तो तुम अस्वस्थ हो, क्योंकि सिर्फ दर्द का ही पता चलता है। जब कभी भी दर्द होता है तो तुम्‍हें उसका अनुभव होता है। दर्द की जरूरत है शरीर का पता चलने के लिए, और दर्द की जरूरत है तुम्‍हें अपना पता होने के लिए। और वह दर्द ही 'मैं' को निर्मित करता है। दर्द, पीड़ा, संताप, चिंता—यें ही 'मैं' को निर्मित करते हैं।
अत: यदि तुम अहंकारी हो तो स्मरण रहे, यह बतंलाता है कि तुम्हारे अंतर की समस्वरता खो गई है। तुम सीधे अहंकार के साथ कुछ भी नहीं कर सकते—जब तक कि तुम अपनी आतरिक समस्वरता को वापस नहीं प्राप्त कर लो। यदि सीधे तुम अहंकार के लिए कुछ भी करोगे तो उससे कुछ भी नहीं होगा। उल्टे, तुम ज्यादा परेशान व अशात भी हो सकते हो। सारे धर्म कहते हैं कि निरहकारी हो जाओ। उनका आशय है कि समस्वरता को उपलब्ध हो जाओ। उनका निरहकारिता पर जोर भीतर की अशांति को मिटा देने के लिए है ताकि तुम एकस्वर हो जाओ, ताकि तुम भीतर एक शाति को पा लो। उनका जोर स्वास्थ्य पर है।
संस्कृत का शब्द स्वास्थ्य बड़ा सुंदर है। इसका अर्थ होता है : स्वयं में स्थित होना। जब तुम स्वयं में स्थित होते हो तो अहंकार नहीं होता।
अंग्रेजी का शब्द हेल्थ भी सुंदर है। वह उसी मूल से आता है जिससे 'होल' आता है। जब तुम 'होल' होते हो, पूरे होते हो तो तुम 'हेल्दी' होते हो। जब तुम खंड—खंड में टूटे हुए, विभाजित, बंटे हुए होते हो तो तुम अस्वस्थ होते हो। जब तुम्हारे भीतर पूरे होने की प्रतीति हो, जब तुम खंड—खंड में बंटे हुए नहीं होते हो, जब तुम अविभाजित होते हो तो तुम स्वस्थ होते हो। अंग्रेजी का 'होली' शब्द भी 'होल' से ही आया है। यदि तुम अविभाजित हो, 'होल' हो, तो तुम 'होली' हो, पवित्र हो, निर्दोष हो।
अहंकार तभी होता है जब तुम विभाजित होते हो, खंड—खंड, टूटे हुए होते हो; जब तुम एक नहीं होते। जब तुम्हारे खंड एक—दूसरे से द्वंद्व में होते हो, और भीतर की लयबद्धता छिन्न—भिन्न हो जाती है, और भीतर एक शोरगुल, संताप होता है, तो अहंकार होता है। जितना अधिक संताप होता है, उतना ही बड़ा अहंकार होता है। यदि तुम अपने अहंकार को भरने की कोशिश करोगे तो तुम और भी ज्यादा अशात हो जाओगे—और अहंकार की आखिरी अवस्था पागलपन है। यदि तुम वस्तुत: ही अहंकार को भरने की कोशिश करते हो तो तुम पागल हो जाओगे।
पूर्व में विक्षिप्तता इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी कि वह पश्चिम में है, क्योंकि सारा पश्चिमी चित्त अहंकार को भरने की महत्वाकाक्षा में लगा है। अमेरिका के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि चार में से तीन लोग मानसिक रोगी हैं। यह तो बहुत ज्यादा हो गया—विश्वास नहीं होता। और यदि यह बात सही है तो वह चौथा भी सीमा पर ही खड़ा होगा, क्योंकि चौथा भी उन तीन का हिस्सा है। वह भी उन तीन के साथ ही रहता है। वह वास्तव में स्वस्थ नहीं हो सकता—बस कामचलाऊ, सीमा पर खड़ा है। कभी भी वह पागलपन में गिर सकता है।
बहुत—से आधुनिक मनोविश्लेषकों का कहना है कि पूरी मनुष्यता ही विक्षिप्त है और अंतर सिर्फ मात्राओं का है। यदि तुम पागल नहीं हो तो इसका इतना ही अर्थ है कि तुम अभी सामान्य पागल हो, असामान्य पागल नहीं हो। तुम अभी सीमा में हो, सीमा में विक्षिप्त हो। तुम अभी काम कर सकते हो, बस इतना ही। लेकिन किसी भी क्षण तुम सीमा रेखा पार कर सकते हो। कोई भी घटना, कोई भी दुर्घटना—तुम्हारी पत्नी मर जाये, तुम्हारा धन खो जाये, तुम्हारे बैंक का दिवाला निकल जाये, तुम्हारे घर में आग लग जाये—और तुम एक क्षण में सीमा रेखा पार कर सकते हो। ज्यादा दूरी तय नहीं करनी है, और तुम विक्षिप्त हो सकते हो। तुम पहले से विक्षिप्त तो थे ही, बस केवल पानी के उबलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह कभी भी हो सकता है।
ऐसा पश्चिम में क्यों इतना अधिक हो रहा है? वहा हर कोई मनोविश्लेषकों के पास क्यों जा रहा है? वस्तुत: जो भी मनोविश्लेषण के लिए नहीं जाता, उसे अब गरीब समझा जाता है। जो लोग समृद्ध हैं, जो खर्चा कर सकते हैं, वे जरूरत की भांति मनोविश्लेषण के लिए जाते हैं। यह एक महंगा मामला है। यह एक विलासिता है, क्योंकि मनोविश्लेषण में वर्षों लगते हैं—दो साल, तीन साल, कभी—कभी पांच साल, और बड़ा महंगा इलाज है। केवल बहुत धनवान लोग ही खर्चा उठा पाते हैं। लेकिन यह धंधा बढ़ रहा है, और मनोचिकित्सक बड़े अमीर हो गये हैं। वे रोज—रोज अमीर होते जा रहे हैं।
यदि तुम अहंकार को भरने का प्रयत्न करते हो तो मनुष्य का मन और—और अशांत होता जाता है, क्योंकि बड़े अहंकार के लिए और बड़ी अशांति, और बड़ी बीमारी, ज्यादा विभाजन, ज्यादा खंडितता चाहिए। जब तुम्हारे अस्तित्व के खंड बहुत गहरे द्वंद्व में होते हैं तो वे तनाव पैदा करते हैं। उस तनाव में अहंकार हो सकता है। अहंकार के लिए संघर्ष चाहिए, एक युद्ध भूमि चाहिए, तुम्हारा सारा अस्तित्व एक युद्ध—स्थल हो जाये।
ऐसा दो तरीके से हो सकता है—या तो तुम दूसरों से लडो, या फिर तुम स्वयं से ही लड़ो। तुम इस प्रतिस्पर्धा के जगत में दूसरों से लड़ सकते हो। तुम महत्वाकांक्षी हो, दूसरे भी महत्वाकांक्षी हैं। तुम अपने अहंकार को भरना चाहते हो, दूसरे भी इसी राह पर चल रहे हैं। तुम उनसे लड़ते हो। यह सांसारिक रास्ता है अहंकार को प्राप्त करने का—राजनैतिक रास्ता अथवा आर्थिक रास्ता।
लेकिन धार्मिक रास्ते भी हैं। तुम दूसरों से लड़ना बंद कर देते हो। तुम अपने को ही बांट लेते हो और स्वयं से लड़ना शुरू कर देते हो। तुम काम से लड़ते हो, तुम क्रोध से लड़ते हो, तुम शरीर से लड़ते हो, तुम इस संसार से लड़ते हो, जो कि पापों से भरा है। तुम अपने को विभाजित कर लेते हो। तुम अपने को मन और शरीर में बांट लेते हो, शरीर और आत्मा में विभाजित कर लेते हो। इतना ही नहीं, तुम अपने शरीर के भी दो टुकड़े कर लेते हो—एक नीचे का हिस्सा, एक ऊपर का हिस्सा। इस विभाजन के द्वारा तुम अपने ही साथ मजे से लड़ सकते हो।
अत: याद रहे कि सांसारिक अहंकार होते हैं और आध्यात्मिक अहंकार होते हैं। एक आदमी धन कमा लेता है, सम्मान पा लेता है, शक्ति अर्जित कर लेता है, उसके पास एक अहंकार होता है, लेकिन ऐसा मत सोचना कि जो आध्यात्मिक साधना कर रहा है उसके पास अहंकार नहीं होता। उसके पास हो सकता है और भी ज्यादा सूक्ष्म अहंकार हो—एक गहरा, शुद्ध अहंकार, लेकिन उसके पास भी अहंकार होता है। तुम्हारे तथाकथित साधु बड़े अहंकारी हैं। वे अपने अहंकार को तप के द्वारा, तपश्चर्या के द्वारा प्राप्त करते हैं। वे अपने ही ऊपर विजय पाते हैं। उनके बाहर कोई शत्रु नहीं होते। उन्होंने भीतर ही शत्रु निर्मित कर लिये होते हैं और फिर वे लड़ते रहते हैं। और जब वे जीत जाते हैं तो उनको एक बड़ी अहंकारी प्रतीति होती है। उन्हें एक शक्ति का अनुभव होता है।
इसलिए दूसरी बात जो समझ लेनी है—जब भी तुम्हें शक्ति का अहसास हो तो स्मरण रहे, तूमने अहंकार का सूक्ष्म व सघन रूप प्राप्त कर लिया है। और जब भी तुम शक्तिशाली हो तो तुम परमात्मा से नहीं मिल सकते, तुम सत्य को नहीं पा सकते, क्योंकि शक्ति होती ही द्वंद्व में है, शक्ति होती ही युद्ध में है। शक्ति का निर्माण ही युद्ध के द्वारा, हिंसा के द्वारा, आक्रमण के द्वारा होता है। शक्ति प्रेम के खिलाफ है, शक्ति मौन के विपक्ष में है, शक्ति सर्व के विरोध में है।
तुम ब्रह्म से नहीं मिल सकते, यदि तुम स्वयं को शक्तिशाली महसूस करते हो। तुम परमात्मा से तभी मिल सकते हो यदि तुम अपने को बिलकुल ही शक्तिहीन महसूस करते हो, ना —कुछ, असहाय पाते हो। यदि तुम किसी भी तरह से शक्तिशाली महसूस करते हो तो तुम एक बाधा उत्पन्न कर रहे हो। जब तुम शक्तिशाली होते हो तो तुम सर्व के प्रति अंधे होते हो। और तुम अपनी शक्ति से इतने परेशान होते हो, भीतर इतने अशांत होते हो कि तुम्हारे भीतर वह मौन नहीं हो सकता जो कि उससे मिलने के लिए चाहिए, जो उस सर्व से संवाद के लिए जरूरी है। इसलिए सभी धर्मों का अहंकार को मिटाने पर इतना जोर है, कि केवल तभी तुम परमात्मा में प्रवेश कर सकते हो।
जीसस कहते हैं, ''केवल वे ही जो बच्चों की भांति हैं, मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। '' क्यों बच्चों जैसे ही? बच्चे असहाय होते हैं, वे शक्तिशाली नहीं होते। बच्चे अभी भी इस समष्टि के हिस्से होते हैं। वे अभी अहंकार नहीं हो गए हैं। अभी उनके अहंकार का केंद्र सघन नहीं है; वे अभी भी अविभाजित हैं। इसलिए बच्चे इतने सुंदर होते हैं। एक कुरूप बच्चा खोजना मुश्किल है, और एक सुंदर वृद्ध आदमी खोजना मुश्किल है। क्यों? यदि प्रत्येक बच्चा इतना सुंदर पैदा होता है तो फिर क्यों प्रत्येक वृद्ध इतना कुरूप हो जाता है? जरूर कहीं कुछ गड़बड़ हो जाती है। प्रत्येक बच्चा सुंदर होता है। सुंदरता समग्रता से आती है। बच्चा समग्र होता है, अविभाजित होता है। उसमें विभाजन नहीं होते। वह खंड—खंड नहीं होता; वह कहीं भी संघर्ष में नहीं होता। वह सिर्फ जी रहा होता है, श्वास ले रहा होता है बिना किसी द्वंद्व के। जीवन उसके लिए संघर्ष नहीं हुआ है अभी। और वह स्वयं से भी नहीं लड़ रहा है—वह अभी धार्मिक नहीं हुआ है। वह सिर्फ प्राकृतिक प्राणी है जैसे कि दूसरे पशु हैं, वृक्ष हैं, चट्टानें हैं। वह इस समष्टि का एक हिस्सा है।
वह उसमें से बाहर आ जायेगा। हम उसको उसमें से बाहर खींच लेंगे; हम उसे वैसा ही नहीं छोड़ सकते। और यदि हम छोड भी दें तो भी वह बाहर आ जायेगा, क्योंकि उसके पास विभाजित होने की संभावना है, उसके पास अहंकार होने की संभावना है। और यह शिक्षा का अंतिम हिस्सा है कि वह अहंकार बने, क्योंकि जब तक तुम्हारे पास अहंकार नहीं होगा, तब तक तुम उसे छोड़ भी नहीं सकते।
बच्चा अहंकार के पहले की अवस्था है। उसकी निर्दोषता स्वाभाविक है, किंतु उसकी यह स्वाभाविक निर्दोषता कभी भी गडबडा सकती है। जब भी वह एक मन होगा, वह चालाक हो जायेगा। जब भी वह अपनी वैयक्तिकता के प्रति सजग होगा, वह अहंकारी हो जायेगा।
यही अर्थ है बाइबिल की कहानी का कि अदम और ईव ईदन के बाग में बड़े भोले— भाले थे और परमात्मा ने उन्हें ज्ञान के वृक्ष से फल खाने से मना कर दिया था। क्यों ज्ञान का फल खाने को मना किया गया था? क्योंकि जैसे ही तुम जानते हो वैसे ही तुम अलग हो जाते हो। ज्ञान अलग कर देता है।
बच्चा निर्दोष होता है क्योंकि वह अभी अज्ञानी है। वह नहीं जानता कि वह कहां समाप्त होता है और तुम कहौ शुरू होते हो।
बच्चों के मनोचिकित्सक कहते हैं कि प्रारंभ में बच्चे को कुछ भी पता नहीं होता कि कहां वह समाप्त होता है और कहां उसकी मां शुरू होती है। उसे सभी कुछ एक लगता है। नौ महीने गर्भ में वह मां के साथ एक होकर जीता है। वह श्वास भी अपनी मां के द्वारा ही लेता है, वह जीता भी अपनी मां के द्वारा ही है। पैदा होने के बाद भी बहुत समय तक बहुत गहरे में वह अपनी मां के साथ एक होकर ही जीता है। उसके पास अपना कोई अहंकार नहीं होता और उसे पता ही नहीं चलता कि वह मां से अलग है। धीरे—धीरे उसे पता चलेगा कि वह मां से अलग है, धीरे—धीरे वह जानेगा कि तुम अलग हो।
स्मरण रहे कि बच्चे को 'तुम' का पता पहले चलता है और बाद में उसे 'मैं' का पता चलता है। जब उसे प्रतीत होने लगता है कि तुम अलग हो तब धीरे— धीरे उसे पता चलने लगता है कि वह तुमसे अलग है और वह तुम नहीं है। मां चली जाती है और वह फिर भी होता है। अब वह दूरी को अनुभव करने लगता है और अब उसे मैं की प्रतीति होने लगती है। लेकिन वह 'मैं' भी ठोस नहीं होता। शुरू में बच्चे अपने को सदा तीसरे व्यक्ति की तरह बोलते हैं। यदि बच्चे का नाम राम है तो वह कहेगा कि राम को प्यास लगी है। वह तीसरे व्यक्ति की भांति बोलता है। वह यह नहीं कहेगा कि मुझे प्यास लगी है। 'मैं' अभी ठोस नहीं हुआ है, वह दावेदार नहीं बना है। उसे अभी भी लगता है कि राम को प्यास लगी है—जैसे कि रहा कोई दूसरा व्यक्ति है, न कि मैं स्वयं हूं।
बच्चे सदैव अपने को अन्य पुरुष में संबोधित करते हैं। वे कहते हैं, ''राम को नींद आ रही है। ऐसा करो, राम को अच्छा लगेगा। वैसा मत करो, राम को बुरा लगेगा। '' वे अपने को ऐसे संबोधित करते हैं जैसे वे किसी और से बोल रहे हों। मैं अभी ठोस नहीं हुआ है। जितना अधिक उन्हें दूसरों की प्रतीति होने लगती है उतनी उन्हें अपनी भी प्रतीति होने लगती है। पहले दूसरा होता है, और फिर बाद में तुम होते हने। यह एक परछाईं है। 'मैं' प्रतिबिंब है 'तुम' का।
अदम और ईव को मना कर दिया गया था कि वे ज्ञान के वृक्ष के फल नहीं खायें, लेकिन उन्हें वह खाना ही था। वह उनकी प्रौढ़ता का हिस्सा है। वे भोले— भाले थे। जैसे ही उन्होँने फल को खाया वे सगा और सावधान हो गये। अचानक वे अपने शरीरों को ढांकने लगे। अब ईव अदम के होने के प्रति सजग थी और अदम ईव के होने के प्रति। कपड़े अहं के द्वारा अस्तित्व में आये। वे जान गये कि वे पृथक हैं। इसके पहले वे दोनों एक दूसरे के हिस्से थे; उन्हें पता ही नहीं था कि वे पृथक हैं। वे पृथक हो गये। और यही बात प्रत्येक अदम और ईव के साथ होती है। यह सिर्फ एक बार ही नहीं हुआ। जब भी कोई बना पैदा होता है, वह ईदन के बाग से बाहर आता है।
मां के गर्भ में वह ईदन के बगीचे में होता है, अस्तित्व के साथ एक होता है। कोई जिम्मेवारी नहीं होती, कोई चिंता नहीं होती, कोई अहकार नहीं होता। बच्चा होता है किंतु बिना किसी केंद्र के। फिर वह पैदा होता है। वस्तुत: बाइबिल की यह अदम और ईव की कहानी प्रत्येक बच्चे की कहानी है। उसे मा ये? बाहर निकाल दिया जाता है, और अदम और ईव ईदन के बाग से बाहर निकाल दिये जाते हैं। और प्रत्येक बच्चे को बाहर निकाला ही जाता है। फिर अहंकार बढ़ता है, बढ़ता ही जाता है। और उसके साथ ही साथ दुख बढ़ता जाता है।
इसीलिए प्रत्येक वृद्ध सोचता है कि बचपन स्वर्ग था। वह था! इस अर्थ में वह स्वर्ग था, क्योंकि तुम अभी भी अहंकार नहीं हुए थे। तुमने ज्ञान का फल नहीं चखा था; तुमने अपने को पृथक नहीं जाना था। पृथकता के साथ ही समस्या खड़ी होती है, तुम चिंतित हो जाते हो। पृथकता के साथ ही; मृत्यु पैदा होती है।
बाइबिल की कहानी में यह भी कहा गया है कि मृत्यु पहले नहीं होती थी। जब अदम और ईव ने वह फल खाया तो मृत्यु भी अस्तित्व में आई। उसके पहले वे लोग अमर थे। प्रत्येक बच्चा अमर है। उसे फृत्यु का कुछ भी पता नहीं है, क्योंकि मृत्यु अर्थपूर्ण ही 'मैं' के लिए हो सकती है, अहंकार के लिए हो सकती है। जब तुम्हारी यह धारणा हो कि तुम पृथक हो तो एकदम समस्या खड़ी हो जाती है कि तुम सदा —सदा यहं। रहने वाले हो या कि तुम मरोगे? वृक्ष. अमर हैं। ऐसा नहीं है कि वे मरते नहीं हैं, वे भी मरते हैं, र्लोकैन उन्हें मृत्यु का कुछ पता नहीं है। पशु अमर हैं, ऐसा नहीं कि मृत्यु उनके लिए नहीं होती, मृत्यु तो होगी लेकिन उन्हें उसका पता नहीं होता। उनके पास कोई अहंकार नहीं है, अत: वे कैसे जानें कि वे मरने वाले हैं? मैं का होना जरूरी है इसके पूर्व कि मुझे प्रतीति हो कि मैं मरूंगा। मृत्यु अहंकार का हिस्सा है।
अत: मैं तुमसे कहना चाहूंगा कि मृत्यु बीमारी से, रुग्णता से आती है। और मृत्यु आखिरी बात है, पराकाष्ठा है, जहा अहंकार समाप्त होता है। अहंकार ही तुम्हारे चारों ओर मृत्यु और भय उत्पन्न करता है। और यही विरोधाभास है कि जितने अधिक तुम मृत्यु से भयभीत होते हो, उतने ही ज्यादा तुम शक्तिशाली होने की कोशिश करते हो, क्योंकि तुम सोचते हो कि यदि तुम शक्तिशाली हो जाओ तो तुम मृत्यु के साथ कुछ कर सकते हो। कम से कम तुम उसे स्थगित कर सकते हो। तुम उसे थोड़ा आगे सरका सकते हो।
लेकिन जितने शक्तिशाली तुम बन जाते हो उतनी ही मृत्यु अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जितने शक्तिशाली तुम हो जाते हो उतने ही तुम मृत्यु से भयभीत हो जाते हो, क्योंकि शक्ति के साथ ही अहंकार बढ़ता जाता है। यदि तुम धनवान हो, राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली हो तो तुम मृत्यु से ज्यादा भयभीत होओगे। यदि तुम गरीब हो, कोई शक्ति नहीं है, तो तुम मृत्यु से इतने भयभीत नहीं होओगे।
पश्चिम से जब लोग पूर्व आते हैं तो उन्हें एक बात समझ में नहीं आती कि यहां पर लोग मृत्यु के प्रति इतने उदासीन क्यों हैं। वे इतने शक्तिहीन हैं! उनके पास कोई ठोस और मजबूत अहंकार नहीं है जिसके कारण कि वे मृत्यु से भयभीत हों। तुम ज्यादा भयभीत हो। तुम उसी अनुपात में भयभीत होते हो जिस अनुपात में मृत्यु तुमसे कुछ छीन लेगी। यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो मृत्यु तुमसे ले क्या लेगी? एक गरीब आदमी मृत्यु से नहीं डरता। वास्तव में मृत्यु उससे कुछ भी छीन नहीं सकती। वह मृत्यु से कुछ पा ही सकता है, खोने को उसके पास कुछ भी नहीं है।
जितने ज्यादा तुम अमीर होते हो, उतने ही भयभीत होते हो, क्योंकि तुम्हारा सारा धन छीन लिया जायेगा। और जो भी तुमने प्राप्त किया वह भी ले लिया जायेगा। जितनी शक्ति तुम्हारे पास है उतने ही शक्तिहीन तुम मृत्यु के समक्ष अनुभव करोगे, क्योंकि वह तुम्हें पुन: नपुंसक बना देगी। सारी शान तथा सारी शक्ति चली जायेगी और तुम भिखारी के समान मरोगे।
मृत्यु पूर्णरूप से साम्यवादी है, वह सबको समान कर देती है। जो सबसे नीचे है, स्वभावत: अधिक डरा हुआ नहीं हो सकता। जो सबसे बड़ा है वही सबसे ज्यादा भयभीत होगा क्योंकि उसे भीं नीचे खींच लिया जायेगा। मृत्यु तुम्हारा राष्ट्रपति का पद छीन लेगी, तुम्हारा प्रधानमंत्री का पद छीन लेगी और भिखारी से मृत्यु उसका भिखारीपन छीन लेगी! निश्चित ही राष्ट्रपति ज्यादा भयभीत होगा, उसे भिखारी की तुलना में अधिक गहरा भय होगा।
पश्चिम मृत्यु से बहुत भयभीत हो गया है। मृत्यु एक आतंक हो गई है। मन ग्रसित हो गया है निरंतर मृत्यु के विचार से। ऐसा होगा ही क्योंकि आज पश्चिम इतना अधिक शक्तिशाली हो गया है; उनके पास खोने को कुछ है। और जब वे पूर्व में मृत्यु के प्रति इतनी उदासीनता देखते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि इतनी उदासीनता क्यों है? यही एक कारण है : उनके पास खोने को कुछ नहीं है। वे अंतिम तल पर जी रहे हैं, मृत्यु उनको और नीचे नहीं गिरा सकती। वे पहले से ही गिरे हुए हैं, वे पहले से ही कब्र में सोये हैं। मेरा कहने का मतलब यह है कि शक्ति तुम्हें अहंकार प्रदान करती है, अहंकार और अधिक शक्ति की लालसा पैदा करता है, और यह एक दुश्चक्र बन जाता है। और जब तुम शक्तिशाली हो जाते हो तो तुम मृत्यु से भय खाने लगते हो। और जब तुम मृत्यु से भय खाने लगते हो तो तुम प्रभु के मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि परमात्मा एक प्रकार से मृत्यु है। वस्तुत: प्रभु में प्रवेश करने का, समग्र में प्रवेश करने का मतलब ही है कि स्वयं को खो देना एक व्यक्ति की भांति, ताकि फिर से बच्चे हो जाओ।
लेकिन यह जो बचपन होगा, यह जो दूसरा बचपन होगा, यह गुणात्मक रूप से पहले से भिन्न होगा। पहला बचपन पशुवत था, दूसरा बचपन परमात्मा जैसा होगा। पहले बचपन को अस्तव्यस्त होना ही था; दूसरे बचपन को अस्तव्यस्त करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। दूसरे बचपन से मेरा मतलब है—वह स्थिति जिसमें तुमने होशपूर्वक, समझ से, ध्यान के द्वारा, समर्पण के द्वारा अपने को समग्र में खो दिया है। वर्तुल पूरा हो गया है, तुम पुन: बच्चे हो गये। हिंदुओं ने इस दूसरे बचपन की अवस्था के व्यक्ति को द्विज कहा है। यह नया जन्म है। पुराना मर गया है और व्यक्ति फिर से बच्चा हो गया है।
एक संत, यदि वह सच में संत है तो वह पुन: बच्चा हो जायेगा। और जीसस कहते हैं कि केवल न बच्चे ही प्रभु में, मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। जब तक तुम अदम और ईव जैसे फिर से नहीं हो जाते, जब तक कि तुम अपने ज्ञान का फल पुन: अपने रग—रेशे में से निकाल कर नहीं फेंक देते, तब तक तुम बगीचे में प्रवेश नहीं कर सकते। यदि तुम यह बात समझ लो, तो फिर यह जो कहानी है तुमारि। समझ में आ जायेगी।

यह एक बोधकथा है—सर्वाधिक प्रीतिकर बोधकथाओं में से एक। यह कहानी बडी सरल है, लेकिन इसका तात्पर्य बड़ा जटिल है। पहले मैं इस कहानी को पढूंगा, और फिर हम इस पर चर्चा करेंगे।

कहानी है कि ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। यद्यपि विजय ब्रह्म के कारण हुई थी. पर देवता गर्व से भर गये और उन्होने सोचा: ''यह विजय हमारे ही कारण हुई है; इस गौरव के केवल हम ही मालिक हैं। ''

ऐसा सदा होता है। जो भी तुम उपलब्ध करते हो वह तुम्हारी आतरिक आत्मा के द्वारा पाया जाता से, न कि तुम्हारे अहंकार के द्वारा। लेकिन अहंकार सदा सारी विजय का फायदा उठाता है। वह कहता है कि यह मैंने किया है। और वास्तव में, अहंकार के द्वारा कुछ भी नहीं किया जाता। अहंकार शोषक है। आला—दरजे का शोषक। जन्म जैसी बातें भी अहंकार के द्वारा शोषित की जाती हैं। तुम कहते हो, ‘’यह मेरा जन्मदिन है ''—जैसे कि तुमने अपने जन्म के लिए कुछ किया हो। तुम कहते हो, ''मेरा जन्मदिन! 'मैं इस दिन पैदा हुआ था, '' जैसे कि 'मैं' ने उस दिन कुछ किया था। जन्म घटित हुआ था। यह एक घटना शे न कि कृत्य। लेकिन तुम्हारा अहंकार उसका भी फायदा उठाता है।
तुम कहते हो, ''मैं श्वास लेता हूं। '' यह बात पूर्णतया गलत है। श्वास घटित होती है, तुम श्वास नहीं लेते। श्वास बिना तुम्हारे भी चालू रहती है। तुम दखल दे सकते हो, लेकिन तुम श्वास ले नहीं सकते। श्वास एक प्राकृतिक घटना है। ब्रह्म ही तुम्हारे में श्वास लेता है। यदि वैसा ही हो जैसा कि हम कहते हैं कि मैं श्वास लेता हूं तो फिर मृत्यु असंभव हो जायेगी, क्योंकि अगर तुम श्वास लेते ही जाओ तो मृत्यु तुम्हारा क्या कर लेगी?
लेकिन तुम श्वास लेते ही नहीं रह सकते। यदि श्वास बाहर चली जाये और वापस न आये, तो तुम—क्या कर सकते हो? तुम कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि यदि श्वास बाहर चली गई है और वापस नही आ रही है, तो तुम वहां पर हो ही नहीं जो कि कुछ भी कर सको। तुम जिंदा ही नहीं रहे, तुम अस्तित्व से ही बाहर हो गये। श्वास लेना कुछ ऐसा नहीं है जो कि तुम करते हो। यह कुछ ऐसा है जो कि तुम्हारे पर घटित हो रहा है—एक विराट ऊर्जा, चाहे कहो जीवन। उपनिषद उसे ब्रह्म कहते हैं, जिसे बर्गसन ''एलन वाइटल'' कहता है, या जो भी नाम तुम देना चाहो।
जीवन तुम्हारे द्वारा श्वास लेता है, किंतु अहंकार हर चीज का शोषण करता रहता है, और कतत। रहता है, ''मैं श्वास ले रहा हूं।'' तुम प्रेम में पड़ जाते हो और कहते हो, ''मैं प्रेम करता हूं। '' वस्तुत: यह कभी भी तुम नहीं करते। क्या तुम प्रेम कर सकते हो? यदि मैं तुमसे कहूं ''इस स्त्री से प्रेम करो, ''तो तुम कहोगे, ''मैं इससे कैसे प्रेम कर सकता हूं यदि मैं इसके प्रेम में नहीं हूं?'' तुम करोगे भी क्या? तुम प्रेम करने का नाटक कर सकते हो, लेकिन तुम उसमें डूबे नहीं होओगे जब तक कि जीवन—ऊर्जा ही तुम्हें प्रेम में न डाले दे। जब तक कि जीवन—ऊर्जा के साथ ही यह घटना न घटे कि तुम प्रेम में पड़ जाओ, तुम कुछ भी नहीं कर सकते।
वस्तुत: सारा जीवन ही एक घटना है। जन्म, मृत्यु, प्रेम सब जो भी महत्वपूर्ण है वह घटता है। और यदि तुम थोड़े गहरे उतरो तो छोटी—छोटी बातें भी घटित होती हैं। तुम कहते हो कि यह मकान मैंने बनाया है, लेकिन पक्षी भी घोंसले बना रहे हैं। वास्तव में, यह कुछ ऐसा है जो जीवन—ऊर्जा कर रही है, न कि तुम। अपने आपको बहुत बुद्धिमान मत समझो, बहुत शक्तिशाली, बहुत चतुर मत समझो, क्योंकि तुमने यह मकान बनाया है। पक्षी भी सुंदर घोंसले बना रहे हैं—और बिना किसी प्रशिक्षण के, बिना किसी शान के, बिना किसी कालेज गये बना रहे हैं। यह सहज प्रवृत्ति से होता है। जीवन अपना घर बनाता है।
तुम धन इकट्ठा करते रहते हो और तुम सोचते हो कि तुम यह कर रहे हो। नहीं, जीवन—ऊर्जा इकट्ठा करती है। जानवर भी इकट्ठा करते हैं। वे भी संचय करने की कोशिश करते हैं। वे भी वर्षाकाल के लिए प्रबंध करते हैं। अगर तुम गहरे देखो तो अपने भीतर एक सूक्ष्म घटना घटते देखोगे. प्रत्येक बात जीवन—ऊर्जा के द्वारा की जाती है, और प्रत्येक बात जो कि जीवन—ऊर्जा के द्वारा की जाती है, उसे अहंकार शोषित करता है। अहंकार कहता है, ''मैं यह कर रहा हूं '' और तब उसे बड़ा गर्व लगता है।

कथा यह है :
कहानी है कि ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की।
हिंदू पुराणों में जितनी भी प्राकृतिक शक्तियां हैं वे देवता हैं। अग्नि एक देवता है—एक प्राकृतिक शक्ति है। वायु भी एक देवता है—एक प्राकृतिक शक्ति है। प्रत्येक प्राकृतिक शक्ति को एक देवता माना गया है।
ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की यद्यपि विजय ब्रह्म के कारण हुई थी परंतु देवता गर्व से भर गये और उन्होने सोचा. ''यह विजय हमारे ही कारण हुई है; इस गौरव के केवल हम ही मालिक हैं ''और यह कहानी सतत चलती रहती है—यह कहानी तुम्हारे साथ रोज घटती रहती है।
वायु, अग्नि, प्रकृति की सारी शक्तियां काम कर रही हैं ब्रह्म के गहरे मूल स्रोत के कारण। अन्यथा वे काम नहीं कर सकतीं। कुछ भी जीवित नहीं रह सकता, कुछ भी सक्रिय नहीं हो सकता, जब तक कि 'एलन वाइटल', ब्रह्म, वह मूल स्रोत उसमें सक्रिय नहीं होता। लेकिन तुम्हें उसका पता नहीं चलता।
सतह पर तुम काम करते रहते हो, और तुम सोचते रहते हो कि तुम उन्हें कर रहे हो, ''मैं ही इसका कारण हूं मैं ही इसका स्रोत हूं। '' तुम उसके स्रोत नहीं हो। यह ऐसा ही है कि जैसे गंगा सागर की ओर बह रही है। गंगा जरूर सोचती होगी कि वह सागर की ओर बह रही है। क्या वह सचमुच ही बह रही है, अथवा वह सिर्फ एक बड़े वर्तुल का हिस्सा है? वह सागर की ओर बहेगी, और फिर सूरज की किरणों से पानी भाप बनेगा और बादल का रूप ले लेगा। और हवा उन बादलों को उड़ा कर हिमालय पर ले जायेगी और फिर वे गंगोत्री पर बरस जायेंगे, और फिर नदी बनेगी और बहेगी, और वह बहती जायेगी। वह सागर में जाकर गिरेगी क्योंकि पानी के लिए यह प्राकृतिक है कि वह नीचे की ओर बहे।
यह गंगा नहीं है जो कि सागर की ओर बह रही है। यह सिर्फ प्रकृति का एक नियम है—दिव्य का हिस्सा है—कि पानी नीचे की ओर बहता है। इसलिए हिमालय से पानी नीचे की तरफ बहता है। नहीं कि गंगा बह रही है। गंगा का कोई अहंकार नहीं हो सकता, उसको अहंकार होने की सुविधा नहीं है। यह एक बड़े वर्तुल का हिस्सा है। फिर से पानी सागर में गिरेगा, और फिर से बादल आयेंगे, और फिर वे गंगोत्री पर बरसेंगे, और गंगा बहती रहेगी। यह एक महान वर्तुल है। बादल, गंगोत्री, गंगा, सागर... बादल, गंगोत्री, गंगा और सागर। यह एक महान वर्तुल है।
तुम भी ऐसे ही एक महान वर्तुल के हिस्से हो। ऊर्जा के इस महान वर्तुल को ही ब्रह्म कहते हैं। किंतु हिस्सा सोचता रहता है कि मैं कर रहा हूं। अत: देवता गर्व से भर गये और उन्होंने सोचा:
''यह विजय हमारे ही कारण हुई है इस गौरव के केवल हम ही मालिक हैं ''
और एक बात और—कि जब भी तुम पराजित होते हो, तुम कभी भी नहीं कहते, ''यह पराजय हमारे ही कारण हुई है। ''जब कभी तुम्हारा अपमान होता है, तुम कभी नहीं कहते, ''यह अपमान मेरा है, मैं इसका अधिकारी हूं। '' यह बड़ी अजीब बात है। यदि गौरव तुम्हारा है, तो फिर अगौरव क्यों नहीं? यदि विजय तुम्हारी है, तो फिर पराजय क्यों नहीं? जब भी तुम पराजित हो जाते हो तो तुम कहते हो, '' परिस्थितिवश, स्थिति के कारण, चीजें इस तरह से हुईं कि, नियति, परमात्मा, ये तुम्हारे खिलाफ थे। ''
जब तुम हारते हो, तो तुम जिम्मेवारी किसी और पर क्यों डाल देते हो? क्योंकि पराजय से अहंकार की तृप्ति नहीं होती। केवल जीत से उसकी तृप्ति होती है। इसलिए पराजय को ब्रह्म पर डाल देते हो। यदि देवता हार जाते तो वे अवश्य कहते, ''ब्रह्म हमारे विरुद्ध है, भाग्य हमारे खिलाफ है, नियति हमारे विरोध में है, और इसी कारण हम हार गये हैं। ''
यदि तुम जीत जाते हो तो तुम कहते हो कि जीत तुम्हारे कारण हुई है।
अहंकार की तरकीब तो देखो! या तो दोनों ही तुम्हारे कारण नहीं होते, या फिर दोनों तुम्हारे कारण होते हैं। निश्चय करो, और अहंकार मर जायेगा। यदि तुम कहते हो, ''दोनों मेरे कारण नहीं होते हैं, एक  विराट शक्ति काम कर रही है और मैं तो एक छोटा —सा कण हूं एक आणविक वस्तु हूं—एक कोष, जो कि असहाय है। चीजें मुझ पर घट रही हैं, और मैं उनका करने वाला नहीं हूं अत: चाहे जीत हो, चाहे हार हो दोनों परम के हैं, '' तो अहंकार नहीं बच सकता। अथवा कहो ''दोनों का कारण मैं ही हूं—विजय और पराजय, मान और अपमान, दोनों का कारण मैं हूं '' तब भी तुम्हारा अहंकार विलीन हो जायेगा, क्योंकि दोनो एक—दूसरे के विरोधी हैं, वे एक—दूसरे को काट देते हैं। विजय से थोड़ा—सा तुम्हारा अहंकार बढ़ेगा, और पराजय से वह कम हो जायेगा, और तुम बिना अहंकार के हो जाओगे।
ये ही दो रास्ते हैं। हिंदुओं ने पहले मार्ग का अनुसरण किया। उन्होंने कहा जीत और हार और सब कुछ परमात्मा का है, इस समष्टि का है, परम सत्ता का है। जैनों और बौद्धों ने दूसरे मार्ग का अनुसरण। उन्होंने कहा, ''कोई परमात्मा नहीं है; सभी कुछ हमारा है—पराजय हो चाहे विजय हो, हानि हो अथवा लाभ हो, मृत्यु हो चाहे जन्म हो, सभी कुछ हमारा है। '' तब ये दोनों विरोधी बातें एक —दूसरे को जट देती हैं, और अहंकार मिट जाता है।
दोनों ही तरह से घटना वही घटती है। अहंकार तभी तक बच सकता है जब तक कि तुम सारी विजय के मुकुट उसे ही पहनाते जाओ और पराजयों के लिए जगत को, नियति को, ब्रह्म को दोष देते जाओ। तब फिर अहंकार जीता रहता है। इसी तरह से अहंकार जीवित रहता है।

कहानी कहती है :
ब्रह्म को उनके इस गर्व का पता चला।
उसे उनके अहंकारों का पता चला, कि वे बड़े गर्व से फूले हुए हैं, कि वे कह रहे हैं कि विजय उनकी है, उनके कारण हुई है।
वह स्वयं उनके सामने प्रकट हुआ किंतु उनकी समझ में नहीं आया कि यह यक्ष कौन है।
इस कहानी का दूसरा पहलू : जब कभी परम सत्ता को, समष्टि के स्रोत को पता चलता है कि तुम गर्व से फूल रहे हो, कि तुम अहंकार से भरे जा रहे हो, तो वह तुम्हारे सामने प्रकट होता है, लेकिन तुम उसे नहीं पहचान सकते। अहंकार तुम्हें उसे पहचानने नहीं देगा। वह तुम्हारी आंखें बद कर देगा। वह तुम्हारे पास भी आता है, ऐसा नहीं है कि वह देवताओं के पास ही आये। यह एक मानवीय कहानी है, एक बहुत ही मनोवैज्ञानिक कहानी है। जब भी तुम गर्व से फूलते हो, तुम्हारे चारों ओर कुछ ऐसी बातें घटित होती हैं जो कि तुम्हें वापस जमीन पर ला देती हैं यदि तुम उन्हें पहचान सको। लेकिन तुम उन्हें कभी भी पहचान नहीं पाते। तुम पहचान ही नहीं सकते! तुम्हारी आंखें इस समय वास्तविकता पर नहीं होतीं। अभी तुम कल्पना की दुनिया में होते हो।
इसलिए देवता नहीं पहचान पाये कि यह यक्ष कौन है। ब्रह्म उनके समक्ष खड़ा हुआ था, परम सत्ता उनके सामने खड़ी थी, लेकिन वे लोग बंद थे। वे अपने सिरों में बंद थे। वे अपने अहंकारों में बंद थे। वे नहीं देख सके, वे नहीं समझ सके। जब कभी तुम अपनी अहंकारी स्थिति में होते हो, तुम उस समय कुछ भी नहीं देख पाते, तुम अंधे होते हो। जब भी तुम विजयी होते हो, तुम कुछ नहीं देख सकते, तुम कुछ भी नहीं समझ सकते। तुम्हारी ज्ञानेंद्रिया खो जाती हैं। तुम्हारी सामान्य समझ भी जाती रहती है। तुम अपनी विजय में, अपनी सफलता में पागल हो जाते हो।
उन्होंने अग्नि को संबोधित करके कहा— देवताओं ने अग्नि से कहा— ''कृपया पता लगाओ कि यह दिव्यात्मा कौन है—कौन इस रूप में प्रकट हुआ है—कौन है यह यक्ष?''
अग्नि ने कहा '' हां, मैं पता लगाने का प्रयत्न करूंगा। ''
अग्नि शीघ्रता से यक्ष के पास गया। यक्ष एक आकृति है, एक रूप है—जिस रूप में ब्रह्म प्रकट हुआ था.. यक्ष ने उससे पूछा कि तुम कौन हो। अग्नि ने उत्तर दिया ''वस्तुत: मैं उप्तिन हूं। मुझे जातवेद के नाम से भी जाना जाता है।''
यक्ष ने पूछा ''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो जो कि इतने प्रसिद्ध हो?''
अग्नि बहुत महत्वपूर्ण रही है। पुराने दिनों में अग्नि देवता सर्वोच्च थे, क्योंकि आदमी अंधकार में जी रहा था, वह गुफाओं में रहता था, जंगलों में रहता था, और बड़ा खतरनाक मामला था। पशु थे, और अंधेरे में वे हमला कर देते थे, और रात्रि बड़ी भयानक थी। और तब ऐसे में अग्नि ने सहायता की थी, उसको अंधकार से बाहर निकाला था। रात्रि भी इतनी भयानक नहीं रह गयी। इसलिए एक जमाने में अग्नि को सर्वोपरि रेवता माना जाता था। अग्नि की सारी दुनिया में पूजा होती थी। अग्नि परमात्मा का चिह्न हो गई थी।
इसलिए देवताओं ने सर्वप्रथम अग्नि से कहा कि जाओ और पता लगाओ कि वह यक्ष कौन है जो कि उस दिव्य रूप में प्रकट हुआ है। और यक्ष ने पूछा :
''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो? ''—जोर 'तुम' पर है— ''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो जो कि इतने प्रसिद्ध हो? ''
''मैं जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है उसे जला सकता हूं ''अग्नि ने उत्तर दिया।
जोर इस बात पर है कि ''मैं सब कुछ जला सकता हूं।''
यक्ष ने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा ''इसे जला दो ''ब्रह्म ने एक तिनका उसके सामने रख दिया और कहा कि इस तिनके को जला दो। अग्नि ने पूरी शक्ति से उस पर हमला किया... पूरी समग्रता से वार किया... लेकिन वह उसे नहीं जला सका
क्योंकि यह अग्नि नहीं है जो कि जलाती है। यह तो समष्टि की शक्ति है जो अग्नि के द्वारा जलाती है। बिना उस समष्टि की महान शक्ति के, अग्नि जला नहीं सकती। और जब ब्रह्म उसके समक्ष ही वहां  खडा था, अग्नि नपुंसक हो गई थी, क्योंकि स्रोत तो उसके पीछे नहीं था। अब सिर्फ अहंकार ही बचा था, स्रोत तो विलीन हो गया था। केवल शोषक बचा था—जो कभी भी कुछ नहीं करता परंतु जो सोचता रहता है कि मैं यह कर सकता हूं मैं वह कर सकता हूं।
अग्नि उस तिनके को नहीं जला सका अत: वह वहां से चला गया और उसने लौटकर देवताओं से  : कहा '' मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है ''
उसने ऐसा नहीं कहा कि वह असफल रहा, कि वह एक तिनके को भी नहीं जला सका। उसने सिर्फ इतना ही कहा कि मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है।
इस भांति अहंकार काम करता है। परमात्मा भी तुम्हारे समक्ष चाहे क्यों न खड़ा हो, तुम यही कहते चले जाओगे कि मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है। जीवन इस बात को प्रकट भी कर दे कि तुम्हारा अहंकार नपुंसक है, फिर भी तुम्हें प्रतीति नहीं होगी। जीवन बार—बार इस बात को बताये चला जाता है कि तुम्हारा अहंकार नपुंसक है—क्या नहीं बताता? हर क्षण जीवन तुम्हें कहे चला जाता है, ‘’दावा मत करो। तुम करने वाले, कर्ता नहीं हो। '' लेकिन तुम इस तथ्य को नहीं देखते।
तब उन्होने वायु से कहा ''ओ वायु कृपया पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है '' वायु ने कहा,  ''अच्छा।''
वायु शीघ्रता से यक्ष के पास गया यक्ष ने उससे पूछा कि तुम कौन हो वायु ने उत्तर दिया '' मै वस्तुत: वायु हूं। मैं मातरिश्व के नाम से भी जाना जाता हूं। ''
यक्ष ने पूछा ''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो जो कि इतने प्रसिद्ध हो? ''
वायु ने कहा ''मैं जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है उसे वास्तव में ही उड़ा सकता हूं।''
यक्ष ने उसके समक्ष एक तिनका रख दिया और कहा ''इसे उड़ा दो ''वायु ने पूरी शक्ति से उसे  उडाने की कोशिश की लेकिन वह उसे नहीं उड़ा सका।
'' पूरी शक्ति से ''—तुम्हारा अहंकार पूरी शक्ति से कुछ भी प्रयास कर सकता है, लेकिन उससे कुछ भी नहीं होगा। तुम्हारा अहंकार पूरे जोर से, पूरे प्रयत्न से कुछ भी कर सकता है, परंतु उससे कुछ भी नहीं होने वाला। इसे स्मरण रखो, यह बात बहुत सहायक सिद्ध होगी।
लोग मेरे पास आते हैं और वे कहते हैं, ''मैं इतनी मेहनत कर रहा हूं ध्यान करने की, लेकिन कुछ भी नहीं हो रहा है। '' कुछ भी नहीं होगा क्योंकि 'मैं' श्रम कर रहा है। तुम दिव्य को भीतर नहीं घटने दे रहे हो।
तुम स्वयं कुछ करने की केँग़शश कर रहे हो।
तुम नपुंसक हो। जो भी शक्ति तुममें है वह मौलिक स्रोत से आती है, समष्टि से आती है, ब्रह्म से आती है। वह तुम्हारी नहीं है। तुम तो सिर्फ वाहन हो। इसलिए जब 'मैं' कुछ करने की कोशिश करता है तो कुछ भी नहीं होता।
झेन आश्रमों मेँ वे अपने साधकी को एक गुप्त रहस्य सिखाते हैं, और वह रहस्य यह है कि कुछ ऐसा काम करो जिसके करने में 'मैं' नहीं आये। यदि तुम बिना अहंकार को बीच में लाये कुछ भी करोगे तो घटना घट जायेगी।
हेरीगल नामक एक जर्मन विचारक जापान में एक झेन आश्रम में था। वह वहां धनुर्विद्या सीख रहा था, और गुरु ने कहा, ''जीवन—ऊर्जा को निशाना लगाने दो, और जीवन—ऊर्जा को तीर छोड़ने दो, तुम कुछ भी न करो। '' यह बात बड़ी कठिन थी, वस्तुत: असभव थी—और विशेष कर एक जर्मन चित्त के लिए जो कि बुनियादी रूप से बुद्धि केंद्रित होता है। इसीलिए जर्मनी का अनुभव इतना खतरनाक साबित हुआ। बहुत अधिक बुद्धि, बहुत अधिक अहंकार, बहुत अधिक प्रयत्न। ओर तब वह अहंकार इस चरम सीमा पर पहुंच गया कि उसने जर्मन लौगों से कह दिया, '' अब तुम सारे संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हौ। '' हिटलर तो सारे अहंकार—केंद्रित लोगों के मनों की एक अभिव्यक्ति मात्र था।
हेरीगल नहीं समझ सका : ''यदि मैं तीर को नहीं छोडूं तो तीर छूटेगा कैसे? यदि मैं कोई प्रयत्न नहीं करूं तो फिर प्रयत्न होगा कैसे? '' और ऐसा ही हम भी महसूस करेंगे। तीन वर्ष तक वह वहां गुरु के पास रहा। उसने उस कला को पूरी तरह सीख लिया, जितना भी संभव हो सकता था उतना सीख लिया। उसके तीर सौ प्रतिशत निशाने पर लगते थे। तीर सदा निशाने पर ही लगते थे। लेकिन गुरु था कि सिर हिला देता। वह कहता, ''यह कुछ भी नहीं है। ''
सौ प्रतिशत परिणाम, फिर भी गुरु कहता, ''कुछ नहीं है यह, तुमने अभी तक कुछ भी नहीं सीखा। अभी भी तुम ही तीर चला रहे हो। और हम निशाने में दिलचस्पी नहीं रखते, हमारा तो रस तुममें है। हमारा उस दूसरे छोर में दिलचस्पी नहीं है, हमारा सारा रस तुममें है। तुम ही निशाना हौ। निशाना लक्ष्य नहीं है। जब तीर तुम्हारे बिना चले, जब जीवन—ऊर्जा तुम पर अधिकार कर ले, तभी केवल कुछ हुआ..? '' क्योंकि धनुर्विद्या मुख्य बात नहीं है, ध्यान मुख्य बात है।
गुरु ने कहा, ''यदि तुम निशाना चूक भी जाओ, यदि तुम निशाना बिलकुल ही चूक जाओ तो भी कोई बात नहीं। लेकिन तुम्हें जो मौलिक स्रोत है उसे नहीं चूकना है। ''
हेरीगल तौ निराश हो गया। और वह जितना निराश हुआ उतना ही श्रम उसने किया। और वह जितना अधिक प्रयत्न करता उतना ही गुरु उससे कहता, ''तुमने मुझे निराश कर दिया। ''
फिर एक दिन ऐसा आया कि हेरीगल ने सोचा, ''यह असंभव है, यह नहीं हो सकता। तीन साल रोज मेहनत करना काफी समय होता है। '' इतनी मेहनत करने के बाद उसे बड़ी हताशा हुई। तो उसने गुरु से कहा, '' अब मुझे जाने दें। मैं सोचता हूं यह मेरे लिए नहीं है। यह मुझे असंभव जान पड़ता है। और जो भी मुझसे हो सकता था वह मैंने करके देख लिया, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। ''
गुरु ने कहा, ''क्योंकि जो भी तुम कर सकते थे, तुम करते थे, और तुम जीवन—ऊर्जा को कुछ भी नहीं करने दे रहे थे। तुम ही बाधा हो। ''
हेरीगल ने वहा से जाने का निश्चय कर लिया। जिस दिन वह जा रहा था, वह गुरु से विदा लेने आया। गुरु एक दूसरे शिष्य को सिखा रहा था। हेरीगल वहा सिर्फ बैठा था। पहली बार वह तटस्थ भाव से बैठा था, क्योंकि अब वह जा रहा था और उसने सारी कोशिश छोड दी थी, और उसमें कुछ भी अर्थ नहीं था। इसलिए वह चुपचाप बैठा था और वह गुरु को देख रहा था तटस्थ भाव से, बिना किसी चाह के, आकांक्षा के, उपलब्धि के। उसने गुरु को सिर्फ देखा, और पहली बार इन तीन वर्षों में उसे लगा कि गुरु तीर नहीं चला रहा है, जीवन—ऊर्जा तीर चला रही है। तीर अहंकार के द्वारा नहीं बल्कि किसी और ही स्रोत से छोड़ा गया। वह गहरी ऊर्जा से आया था।
वह तो सम्मोहित—सा खड़ा रह गया। वह गुरु के निकट आया, धनुष को उसने उसके हाथ से ले लिया, और तीर चला दिया... और गुरु ने कहा, ''ठीक। तुमने आज कर दिया! '' और हेरीगल लिखता है, ''अब मैंने दोनों के बीच अंतर जाना कि जब जीवन—ऊर्जा तीर छोड़ती है और जब तुम तीर छोड़ते हो।''

यक्ष ने पूछा ''तुम किस ऊर्जा के स्वामी हो जो कि इतने प्रसिद्ध हो?''
वायु ने अपनी शक्ति दिखानी चाही।
वायु ने पूरी शक्ति से उसे उड़ाने की कोशिश की लेकिन वह उसे नहीं उड़ा सका अत: वह वहां से चला गया और देवताओं के पास जाकर बोला ''मैं पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है।''
और बात इतनी स्पष्ट थी। पता लगाने की कोई जरूरत नहीं थी। सारी बात ही इतनी साफ थी। वायु ने उस तिनके को उड़ाने की कोशिश की और वह उसे नहीं उड़ा सका। और अग्नि ने उस तिनके को जलाने की कोशिश की और वह सारी पृथ्वी को जला सकता था, परंतु वह उस तिनके को नहीं जला सका। सारी बात स्पष्ट थी कि वह यक्ष ही सारी मूल—ऊर्जा का स्रोत था।
लेकिन वे इतनी—सी बात नहीं जान सके कि ऊर्जा उनसे निकाल ली गई थी, और अब वे सिर्फ खाली वाहन थे। अग्नि एक तिनके को नहीं जला सका, वायु एक तिनके को नहीं उड़ा सका। बात इतनी स्पष्ट थी कि ऊर्जा का मूल स्रोत हटा लिया गया है। लेकिन वे इस बात को पहचान नहीं सके।
अहंकार वस्तुत: इतना अंधा होता है कि वह अपनी नपुंसकता को नहीं पहचान पाता। जबकि स्रोत हट गया है तब भी वह उसी पुरानी भाषा में सोचता रहता है। जबकि सभी कुछ पराजित हो चुका है, और सभी कुछ असफल हो गया है, तब भी वह पुरानी भाषा में ही सोचता रहता है।
तब देवताओं ने इंद्र से कहा।
भारतीय पुराण—कथाओं में इंद्र को देवताओं का मुख्य देवता कहा गया है। उन्होंने इंद्र से कहा:
''ओ इंद्र! कृपया पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है? ''इंद्र ने कहा ''अच्छा! '' और वह शीघ्रता से यक्ष के पास गया लेकिन यक्ष उसकी दृष्टि से ओझल हो गया
जब इंद्र यक्ष के निकट पहुंचा तो यक्ष उसकी दृष्टि से ओझल हो गया।
इंद्र शब्द बहुत अर्थपूर्ण है। यह शब्द उसी धातु से आता हैं जिससे 'इंद्रिय' शब्द आता है। इंद्रियों का अर्थ होता है 'सेंसेस'। और इंद्र इंद्रियों का मुखिया है। इंद्रियों का मुखिया कौन है? मन। सारी इंद्रियां.. तुम्हारी आंखें, तुम्हारे कान, तुम्हारे हाथ... ये सब मन के अनुचर हैं। वस्तुत: मन ही शरीर में इंद्र है, इसलिए मन मुख्य देवता है।
आंखें अग्नि से संबंधित हैं। और तुम्हारी सारी इंद्रियां किसी न किसी देवता से जुड़ी हैं, लेकिन तुम्हारा मन इंद्र से जुड़ा है। इंद्र का अर्थ होता है, इंद्रियों का मुखिया। अत: जब सारी इंद्रियां, सारे देवता असफल हो गये, तो उन्होंने मुखिया से, सरदार से कहा—मन से, मस्तिष्क से कहा। लेकिन तब क्या हुआ? यह बड़ा सुंदर है, यह कहानी बड़ी अनूठी है। जब इंद्रियां उस परम सत्ता के पास, उस ब्रह्म के पास पहुंचीं तो वह वहां मौजूद था। लेकिन जब मन पहुंचा तो वह विलीन हो गया।
मन से तुम उसे नहीं देख सकते, मन के द्वारा उस तक नहीं पहुंचा जा सकता। जब मन जानने की कोशिश करता है कि यह परम स्रोत क्या है तो वह ओझल हो जाता है। वह मन को दिखाई नहीं देने वाला है। बुद्धि के लिए वह ओझल है। इसीलिए विज्ञान को कुछ भी दिव्य तत्व पता नहीं चल पाता है। विज्ञान उस दिव्य को कभी नहीं खोज सकता, क्योंकि विज्ञान इंद्र है.. मन, बुद्धि, तर्क।
वह दिव्यात्मा इंद्र की दृष्टि से ओझल हो गई। यदि तुम अपने मन को बीच में ले आये तो फिर कुछ भी खोजने से नहीं मिलेगा! वह ओझल हो जाता है! एक बात और समझ: लेनी है : तुम परमात्मा का अनुभव शरीर से कर सकते हो, तुम परमात्मा का अनुभव स्वाद से कर सकते हो, तुम उसे गंध से जान सकते हो, लेकिन तुम उसे बुद्धि से नहीं जान सकते, तर्क से नहीं जान सकते। इंद्रियों से भी उस तक पहुंचा जा सकता है। यदि तुम बहुत संवेदनशील हो जाओ तो तुम उसे छू सकते हो। लेकिन बुद्धि से तुम कदापि उस तक नहीं पहुंच सकते। बुद्धि उसके लिए जरा भी द्वार नहीं है।
यदि तुम्हारे पास एक संवेदनशील शरीर है तो तुम परमात्मा में जी सकते हो, तुम उसमें श्वास ले सकते हो। लेकिन चाहे तुम्हारे पास कितनी ही तीव्र बुद्धि क्यों न हो, तुम उसे छू नहीं सकते, तुम उसके निकट नहीं आ सकते। यदि तुम बुद्धि को बीच में ले आये तो फिर वह वहा नहीं होगा। वह सिर्फ ओझल हो जाता है।
और उसी स्थान पर इंद्र ने एक बहुशोभामान स्त्री हिमाचल कुमारी उमा को देखा और उससे पूछा  ''यह यक्ष कौन था? ''
मन के द्वारा, यदि तुम मन को बीच में लाये, यदि तुम तर्क को बीच में लाये तो वह परम ओझल हो जाता है। और फिर क्या होता है? यह कहानी बहुत—से संकेत देती है, बहुत से आयाम बतलाती है। जब परम ओझल हो जाता है, तब सिर्फ काम ही बचता है सभी कुछ का स्रोत। तब तुम्हें लगता है कि काम ही, सेक्स ही, सब ऊर्जा का स्रोत है। जब तुम्हें परमात्मा स्रोत नहीं मालूम पड़ता है तो फिर काम ही सब ऊर्जा का स्रोत मालूम होने लगता है।
विज्ञान ने सिद्ध किया कि परमात्मा नहीं है, और फिर आया सिग्मंड फ्रायड, जिसने कहा कि सिर्फ स्त्री ही है। अथवा तुम कह सकते हो कि सिर्फ पुरुष है, यदि तुम स्त्री हो तो। विज्ञान ने भूमि साफ कर दी : परमात्मा अदृश्य हो गया। जब भी परमात्मा अदृश्य हो जाता है तो केवल काम ही परमात्मा रह जाता है। और तब तुम्हें लगता है कि सभी कुछ काम के कारण है; फ्रायड भी ऐसा ही कहता है। यदि फ्रायड को इस कहानी का पता होता, तो उसे बात समझ में आ सकती थी। यह कहानी एक आलोचना है—एक गहरी आलोचना है उसकी सारी फिलासफी की, उसके सारे सिद्धात की। जब कोई परमात्मा नहीं होता, तो काम ही परमात्मा हो जाता है।
एक अपूर्व सुंदरी इंद्र के समक्ष प्रकट होती है और उसने उस स्त्री से पूछा, ''उमा, यह कौन था जो कि ओझल हो गया है? ''
अभी मनोवैज्ञानिक काम से पूछ रहे हैं : ''जीवन का स्रोत क्या है? ''वे काम ऊर्जा के भीतर प्रवेश कर रहे हैं और उस मौलिक स्रोत के बारे में, काम के द्वारा जानने की कोशिश कर रहे हैं, काम के द्वार से जानने का प्रयत्न कर रहे हैं।
बुद्धि के साथ तुम सेक्स से ज्यादा गहरे नहीं जा सकते। काम निश्चित ही उस विराट ऊर्जा का ही एक हिस्सा है, लेकिन मन के द्वारा तुम सिर्फ उस हिस्से से परिचित हो सकोगे, न कि उस मौलिक स्त्रोत से। और मन काम में उलझ जाता है। सारा पश्चिमी चित्त इस समय सेक्स में उलझा है। यह एक भूल— भुलैया हो गई है। कोई भी उसमें से बाहर नहीं निकल सकता है। कोई चाहे कितना ही चले, वापस लौट—लौटकर वहीं आ जाता है।
प्रत्येक बात काम मैं सिकुड़ गई है। फ्रायड कहता है, ''यदि एक मां अपने बच्चे को प्यार करती है तो वह भी काम है। यदि एक पिता अपने बच्चे को प्रेम करता है तो वह भी काम है। यदि पिता अपनी बेटी को प्यार करता है तो वह विपरीत—लिंगी है और यदि पिता अपने बेटे को अधिक प्यार करे तो —वह सम—लिंगी है। ''
अभी थोड़े दिन पहले मैं एक किताब पढ़ रहा था। यह किताब एक मनोविश्लेषक के द्वारा लिखी गई है और वह कहता है, ''यह संभव है कि जीसस समलैंगिक थे। क्योंकि वे सदा अपने बारह शिष्यों वे? साथ, लड़कों के साथ घूमते थे। '' हमेशा लड़कों के साथ घूमने का अर्थ होता है समलैंगिकता! कहीं मैंने एक अन्य मनोविश्लेषक को पढ़ा है जो लिखता है कि बौद्ध भिक्षु जरूर समलैंगिक होने चाहिए क्योंकि —को सदा पुरुषों के संग—साथ रह रहे थे।
यदि मन के द्वारा जानने का प्रयत्न किया जाये तो प्रत्येक बात काम के तल पर सिमट जाती है।
इंद्र के सामने, मन के समक्ष, वह परम अदृश्य हो गया।
और उसी स्थान पर उसने एक बहुशोभामान स्त्री हिमाचल कुमारी उमा को देखा और उससे पूछा  ''यह यक्ष कौन था?''
यही बात हम भी पूछ रहे हैं—काम से पूछ रहे हैं : यह जीवन क्या. है?

दिनांक 14 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।