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शनिवार, 30 नवंबर 2013

अंगुलीमाल--कहानी


 अंगुलीमाल

      क्ष शिला विद्यालय का प्रांगण, संध्‍या की बेला थी। सूर्य प्राचीर की उतंग पहाड़ियों  के पीछे छिपने के लिए ललाईत था। मानो दिन भर की इस धुल—धमास और भाग दोड के बाद वि‍श्राम के लिए आपने घर जा रहा हो। अभी भी उसकी कुछ किरणें लालिमा लिए हुए तक्ष शिला के प्रागंण पसरी—फैली पड़ी थी। परन्‍तु वह  शायद उन्‍हें बहका फुसला कर, अपने साथ ले जाने के लिए मना रहा था। और किरणें हे कि एक छोटे बच्‍चें की भाति‍ तक्ष शिला का प्रांगण छोड़ कर जाने के लिए तैयार ही न हो रही थी। वह की हवा, मिट्टी, पानी, और वातावरण इतना भा गया था कि उनका वहां से जाने को मन ही न कर रहा था। दूर वृक्षों की परछाई लम्‍बी होने के साथ—साथ धुँधली भी होती जा रह थी। अंधेरी की चादर उन रंगों को धीरे—धीरे अपने चीवर से ढक रही थी। मानों अंधकार छद्म रूप से अपना जाल फैला रहा हो। एक बलिषट नवयुवक गुरु माता कि कुटिया के आँगन में फूल पौधों की नलाई—गुड़ाई  में इतना तल्‍लीन था। उसे सुर्य छिपने और घटती रोशनी का अहसास ही नहीं रहा था। जब अंदर से गुरु माता ने उसे आवज लगाई,  वह आवाज सूनकर अचानक अहिंसक चौका।

      गुरु माता ने कहा: ‘अरे अहिंसक संध्‍या का समय हो गया है क्‍या तुम्‍हें इतना भी पता नहीं है, तू कहा खोया रहता है। तू तो इन पेड़ पौधों में इतना खो जाता है कि तुझे न खाने का न किसी और बात का होश ही रहता है। क्‍या आज संध्‍या वंदना न करोगा? जाकर देख उधर तुम्‍हारे गुरु जी नाराज हो रहे होंगे। ये सब बोलते—बोलते गुरु माता कुटिया से बहार आई।
      अहिंसक: ‘माता ध्‍यान ही नहीं रहा, काम में इतना खो गया कि पता ही नहीं चला।’ और जल्‍दी—जल्‍दी पोखरे की तरफ हाथ पैर धोने के लिए चल दिया। और गुरु माता मुसकराई और कहा: ‘काम में इतना खो जाता है कि खाने पीने का या समय का भी अहसास नहीं रहता। घर पर माता को कितनी फिक्र हो जाएगी जब पता चलें कि तू यहां पर ऐसे रहता है।‘ और मीठी सी डाट खा कर अहिंसक नीची गर्दन किये मुस्काता हुआ चला गया। कितना भाग्‍य शाली है कि गुरु माता का इतना लाड़ दुलार पा रहा है। सच बात तो यह है कि अहिंसक को अपनी माता की याद भी इसलिए नहीं आती है। गुरु माता के इस प्‍यार और लाड़ दुलार की वजह से, कई बार अहिंसक सोचता है मेरा भाग्‍य देखो मुझे इस जीवन में दो-दो मां का प्‍यार मिल रहा है। गुरु माता मेरी असली माता भी मुझे अधिक प्‍यार देती है। एक छोटे बच्‍चे की भाती मेरा कितना ख्‍याल रखती है। कल जब यहाँ से जाना होगा...यही सब सोच कर उसका कलेजा बैठ जाता था। उसे लगता था, यहां  कि पढाई कभी खत्‍म न हो...ओर समय कुछ दिनों के लिए यूं ही रूक जाये। पर क्‍या समय को रोका जा सकता है।
      चारों तरफ नीरव शांति छाई हुई थी। दोनों पहरों का मिलन की बेला, वातावरण को कैसा अद्भुत बना देती है। ये संध्‍या बेला का समय भी कुदरत का एक करिश्मा है, बस आप केवल आँख बंद कर के कुछ क्षण के लिए बैठ जाइए, पल भर में आप किसी और लोक में पहुंच जाओगे। इस लिए पुरा तक्षशिला अपनी अंतिम गति विधि में लीन था। ये नित प्रति दिन का नियम था, फिर चाहे वह आयुद्ध विद्या, ज्‍योतिष, राजनीति‍शास्‍त्र, युद्ध कोशल, आयुर्वेद, धर्माचार्य, या समाज शास्‍त्र की शिक्षा ले रहा विद्यार्थी हो। कार्य का शुभ आरंभ और श्‍याम कि इति संध्‍या वंदना से ही होती थी।
      अहिंसक गोरे वर्ण, बलिष्ठ शरीर, लम्‍बा कद काठी, बड़ी—बड़ी सजीव आंखे जो उसके चेहरे पर बहुत भाती थी, एक नजर में ही लाखों की भीड़ में वो अपनी और किसी को भी आकर्षित कर लेता था। ब्राहमण घर में जनम लेने पर भी उसकी कद काठी से वो क्षत्री स्‍वभाव का अधिक लगता था। शस्‍त्र विधा के साथ वह राजनीति और धार्मिक विषयों की शिक्षा ले रहा था। वह मधु भाषी, अचार प्रिय, आज्ञाकारी, शांत स्वभाव, विशेष पारिश्रमिक और कुशाग्र बुद्धि भी था। वह पांचों आयुद्धों में अति निपूणता पा गया था।
      अहिंसक कोशल नरेश के पुरोहित भार्गव का पुत्र था। उसकी माता का नाम मैत्रायणी था। जन्‍म के समय ही पिता ने कुण्डली देख कर माता का बता दिया था कि केन्‍द्र  मैं गुरु के साथ चंडाल योग है। लड़के कि स्थिति अजीब है, अगर मेरे देखे लड़के को डाकू होना चाहिए फिर दुसरी तरफ मुक्ति योग है लड़के के पेर में पद्म है। जो चक्रवर्ती राजा या बुद्धत्व की प्राप्ति का संकेत देती है। माता पिता की इकलौता संतान होने पर  उन्‍होंने बात कुदरत के हाथ में छोड़ दी क्‍या पता कही भूल चुक हो रही हो। लेकिन जब भी अहिंसक तक्ष शीला से घर आता उसका सील स्‍वभाव और कुशाग्र बुद्धि को देख माता पिता नित भगवान से दुआ मांगते की वो सब गलत होगा हमारा बेटा शुद्ध सोना है।
      उसके गुणों के कारण वह गुरु माता व गुरुवार को बहुत प्रिय था। इससे कुछ राज कुमार और धनाढ्य परिवार से आये कुछ युवकों को वो फूटी आँख न सुहाता था। उनके मन में अहिंसक के गणों को देख कर जलन इस अति पर पहुंच गई की वो उससे बदला लेने  की फिराक में रहने लगे। क्‍योंकि वो शस्‍त्र युद्ध में अच्‍छे से  अच्‍छे योद्धा को कुछ ही पल में हरा देता था। वो लाख उसे झँकाते उसे बिगाड़ने की कोशिश करते उसे खाने पीने का लालच देते चलो पाटली पुत्र में तुझे नृत्‍य आदि दिखा के लाएँगें परन्‍तु अहिंसक को इन बातों में कोई रस ही न था। इससे दुःखी होकर उन उदण्ड राज कुमारो ने नि‍श्‍चय कर लिया कि इसको नीचा दिखा कर ही रहेगें। उन्‍होंने अहिंसक और गुरु माता के संबंधों को कुकृत्‍य बता कर धीरे—धीरे बात को इतना बढा दिया  कि तक्ष शीला में ये बात एक से दूसरे के कानों में फैलती चली गई। इसमें सबसे बड़ी शय मिली अहिंसक के एकाकी स्‍वभाव को उसकी पूरे तक्ष शीला में किसी से भी खास मैत्री नहीं थी।
      गुरु माता के कोई पुत्र न था। इस लिए उसका अहिंसक से अति दुलार हो गया था। विद्या अध्ययन के बाद जितना भी समय मिलता वो गुरु माता कि कुटिया में ही व्यतीत करता था। वहाँ पर उसने एक सुन्‍दर बगिया लगा रखी थी, जिसमे सुंदर मौसमी पुष्‍प फलों के वृक्ष शाक सब्‍जी आदि, वह अति कठोर परि‍श्रम करता था अहिंसक उनमें खाद पानी इस प्रकार डालता कि वो पेड़ पौधे ने हो कर किसी संगीत कार कि वीणा या किसी चित्रकार की  तुलिका हो। उसके काम करते चेहरे को देख कर आप समझ नहीं सकेगें की को बागवानी कर रहा है या पृथ्‍वी पर कोई कलाकार चित्र उरेर रहा है। और पास ही गुरु मात का सान्निध्य और मातृ तुल्‍य स्नेह से वो भाव विभोर हुआ रहता था। शायद उनके भाग्‍य भी उसके इस देव तुल्‍य जीवन को देख कर ईश और दुवेश से भर गया। उसके चारो तरफ छद्म रूप से जाल फैलाया जा रहा है। गुरु की मति में धीरे—धीर संदेह बूंद—बूंद कर भरता जा रहा था। संदेह भर दिया कहना समय परिणत अनुरूप अवश्‍य लगेगा। अपितु कहना चाहिए संदेह जो गुरु ह्रदय में छुपा हुआ था उसे उर्वरक कर दिया।
      तक्ष शिला विद्यालय में शिक्षा के साथ—साथ, धर्म, राजनीति, ज्योतिष, युद्ध विद्या भूगोल ज्ञान, आयुर्वेदिक ज्ञान ..आदि भी दिया जाता था। आज एक विशेष सभा है जिसमें अनेक धर्मा चार्य आये है। जो अपने धर्म का सार बताएँगे, जिसमें विद्याथिर्यों की जिज्ञासा को शांत करने के उनमें मुमुक्षा होने  का बीजा रोपण करेंगे। क्‍योंकि कुछ छात्र इस महा अपनी विद्या पूर्ण कर आपने अपने ग्रह देश जाने वाले है। अहिंसक की विद्या भी पूर्ण हो हुई है, कल का जो विदाई समारोह आयोजन होने वाला है। उस के बाद उन्‍हें सोलह साल के बाद अपने—अपने घर जाने की अनुमति मिल जाएगी। जो अन उतीर्ण रह जाएँगे उन्‍हें फिर साल—या अधिक समय तक इंतजार करना होगा। सालों से यहाँ रहते यहां से जाने से अचानक उसका दिल कट रहा था। भीगी आंखों से गुरु माता से वि‍दा के भाव से  कुटिया में चला गया। गुरु माता का भी आज मन भारी हो रहा था, भले ही उसने अहिंसक को अपनी कोख से पैदा न किया हो परन्तु उसे वो पुत्र से भी अधिक प्रेम करती थी न जाने ऐसा क्‍या था अहिंसक में उसे लगता है बड़े भाग्‍य से ऐसा पुत्र रत्‍न पैदा होता है1 ध्यान हो गई होगी मैत्रायणी जिसने ऐसा पुत्र जना। अहिंसक गुरु माता को देख कर अपने आँसू नहीं रोक पा रहा था। जैसे बाढ का पानी अति रेक हो कर सारे तटबंध तोड़ देना चहा रहा हो। गुरु माता ने आज अहिंसक को अपनी गोद में छुपा लिया, कुछ क्षण के लिए ये समय यही रूक जाए तो कितना अच्‍छा होता। पर मनुष्‍य क्‍या खुद प्रकृति के बस में नहीं रूक पाना। लाख रोकने पर भी उसका ह्रदय जवाब दे गया और उसकी आँखों से भी पोर—पोर आंसू झरने लगे, वो पुत्र तुल्‍य रतन जो सालों से उसके सुने आँगन को भरे रहा था, आज छोड़ कर चला जाएगा, वो प्रेम जो सालों  से मातृत्‍व बन कर महक रहा था, आजा आंसू की धार बन कर बह जाना चहा रहा था।
      इसी सब के बीच गुरु वर ने कुटिया में प्रवेश किया, गुरु माता और अहिंसक को उस मुद्रा में देख कर, गुरु के मन में सालों से जो शंका का बीज दबा पडा था, उसे हवा  पा कर और पोषित कर दिया, और उस ज्वलनशील पदार्थ को भभका दिया। उस दबे शक के अंकुर को मानों आज अचानक सुर्य की किरण मिल गई, जिससे उसमें अंकुर निकल आया। गुरु अंदर तक सिहर गया। क्रोध में वो थर—थर कांपने लगा। उसकी मन स्थिती ही बदल गई, उस पर जैसे शैतान सवार हो गया। उन्‍होंने बहुत जोर से चीख मारी: ..’’कुलटा‘’। एक शब्‍द ने कुटिया का मौन भंग कर दिया, आंसुओं से भरी ओखों से दोनों ने देखा, और वो मूर्ति व‍त अवाक गुरु वर को देखते ही रह गए। मानों दो पाषाण की मूर्ति अभी प्राणों को इंतजार कर रही है। परंतु यहाँ तो इसका ठीक उलट ही हुआ दो जीवत शरीर मानों पाषाण की मूर्ति बन गये हो। एक ‘कुलटा’ शब्‍द ने उनके प्राण  शरीर से निकाल दिये हो। दोनों की समझ में नहीं आया की गुरु वर आज इतनी क्रोधित क्‍यो हो रहे है।
      ‘कुलटा आज मेरी शंका सत्‍य में बदल गया, तुमने गुरु माता के नाम को कलंकित किया है। एक शिष्‍य ने गुरु और गुरु के नाते को अति निंदित किया है। अहिंसक तू पापी है....तुझे इसका फल मिलेगा, अगर त ब्राहमण न होता तो शायद आज में तेरी हत्‍या कर देता...। और गुरु वर  न थोड़ी देर दम ले कर फिर कहां अहिंसक आज गुरु दक्षिणा का दिन है। और आज में तुझसे गुरु दक्षिणा में एक सहस्‍त्र मनुष्‍यों की हत्‍या का गुरु ऋण मांग रहा हूं। इसे मेरा अभी श्राप समझ या वरदान। तभी मेरे जलते मन को शांति मिलेगी।
      अहिंसक कांप गया...गुरू वर मैं ब्राहमण हूं, मेरा कुल अहिंसक है...मैं भार्गव वंश से हूं मैं हत्‍या कैसे कर सकता हूं, कृपा मेरी बात तो सुने..।
      शायद ये शब्‍द पूरे भी उसकी जबान से नही निकले थे कि इससे पहले गुरु वर तेज कदमों से कुटिया छोड़ा कर बहार चले गये।
      अहिंसक की आंखों के सामने अंधेर छा गया, बार—बार पिता की भविष्‍य बाणी उसके मस्‍तिष्‍क में कौंध गई, क्‍या मनुष्‍य के हाथ में कुछ नहीं होता, वो एक अंजान सी ड़ोर से बंधा है, जिसे दूर कोई बैठा कठपुतली की तरह चला रहा है। ये कैसा जीवन, इसमे कहा मुक्‍ति‍ हे ये तो एक कैद है चाहें इसे अच्‍छा सा नाम दे दो ‘परमात्‍मा’  पकृति या कुछ और कहां जा सकता है। लेकिन फिर इसमें हमारी मुक्‍ति हमारे हाथ में कहां है, न जनम हमारे हाथ में न मृत्‍यु हमारे हाथ में ये केसी लाचारी....ओर उसकी आंखों के सारे आंसू मानों जम गए। आज कैसी होनी अनहोनी हो गई...एक गार्गी और मैत्रायणी गोत्र को कोई कलंकित करेगा। अहिंसक को लगा अपनी ही कटार से अपना धड़ सर से अलग कर दें.....लेकिन फिर गुरु ऋण से कैसे मुक्‍त होगा। शायद मरना आसान है, पर उसे तिल—तिल मरने के लिए वाद्यय किया जा रहा है। ये कैसा बंधन,ये कैसी लाचार, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसकी मस्‍तिष्‍क धीरे—धीरे बर्फ की तरह जमता जा रहा था। उसकी सोचने की क्षमता भी धीरे—धीरे जवाब‍ दे रही थी।
      गुरु देव गुस्‍से में पेर पटक कर चले गए। गुरु माता को तो जैसे लकवा मार गया, बस निरीह आंखों से ही अहसास  हो रहा था की वो अभी जीवन है। कुछ देर कुटिया में सन्‍नाटा छाया रहा, फिर अहिंसक उठ और तक्ष शिला के द्वार को पार करता हुआ, एक अनजानी, अन चाही, अवमाननीय, अनहोनी डगर पर चल दिया। चार दिन और चार रातें उसने जालानी के जंगल में एक निर्जन स्‍थान पर अचेत होने तक गुजारी। इस बीच में किसी जंगली जानवर भी उसके आस पास नहीं आया। शायद उससे निकलती अहिंसक तरंगों को वो पहचान गए। नहीं तो शायद कुदरत उसे एक बहुत बड़े पाप से बचा ले‍ती।
      होनी के गर्व में क्‍या छीपा है बीज को क्‍या पता होता है। वो कहा जानता है इस काली शाह रात के बाद जब प्रकाश में अपने अंकुर अपनी शाखाएं निकलेगा तो उस पर पक्षी अपना डेरा डालेंगे, अठखेलिया करेंगे, उसे पर फल फुल लगेंगे। सुर्य की रोशनी से नहाय हुऐ उसके कोमल पत्‍ते हवा के साथ एक मधुर नाद कर रहे थे। आज वे गहन मौन से टुट कर एक अनजाने मार्ग पर चल दिया है। इसे वह अभिशाप समझे या वरदान ये होनी थी या अनहोनी...इस सब का रहस्‍य तो समय के गर्त में छुपा था। सामने जो दिखाई दे रहा था वह नरक तुल्‍य जीवन। क्‍या ऐसा जीवन जीना चाहिए....क्‍या ये भी बाध्‍यता है मनुष्‍य के लिए....ऐसा सब के साथ नहीं होता तो फिर इसे कर्म फल कहा जाये या कुछ और ये सब विचार उस समय तेजी से अंगलीमाल के मस्‍तिष्‍क में बिजली की तेजी से कौंध रहे थे। अपने को कुदरत के हाथों में सोप दे। केवल मिट जाना चाहिए,  उसके सामने ये पहाड़ से प्रश्‍न सामनेखड़े थे और वह किसी से परमर्श भी नहीं कर सकता। परन्‍तु कुछ पर बस भरोसा तो करना पड़ेगा ही उसे....। चार निर्जन रात के‍ बाद अहिंसक का बीज जब मिटा तो उससे जो पौधा अंकुरित हुआ वह था ‘अंगुलीमाल’ और वो धीरे—धीरे इतनी विशाल हो गया कि उसने अपनी जड़ें पाताल तक फैला ली।
      उसकी मन स्थिती ठीक नहीं थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्‍या करू। अचानक वहां एक से राहगीर निकला, उसने अंगुली माल  को इस अवस्‍था में देख कर वह उसके पास गया।  उसने उसके माथे पर हाथ रख कर देखा वो जल रहा था। पर उसे थोड़ी खुशी अवश्‍य हुई भले ही इसे ताप है पर जीवित तो हे। उसने उसे उठा कर उसका सर अपनी गाद में ले लिया। और जल का भरा पात्र उसके होठों से लगा दिया। शीतल जल  की छ़ुआन से अंगुलि माल ने आंखें खोली। वो अंगारे की तरह लाल थी। वह राह गीर भी क्षण भर के डर गया। मानों उसने कुछ अनहोनी देख ली हो। फिर भी डरते कांपते हाथों से पानी का पात्र उसने उसके होठों से लगा दिया धीरे—धीरे पानी कंठ से नीचे उतरने से उसमें प्रणों का संचार हुआ और चेतना शरीर में फैलने लगी। पानी पी उसने पुरी तरह से आंखें खोली, उसने दिखा कोई अंजान मुसाफिर उससे पूछा रहा है: ‘’क्या हो गया भाई इस विराने में अकेले क्‍या पड़ें हो, यहां तो जंगली जानवरों का भी डर है। भाई कछ खाओगे मेरे पास कुछ पाथेय है थोड़ा तुम भी ले लो।‘’
      अंगुलीमाल के शरीर में धीरे—धीरे चेतना लौटने लगा थी। उसे गुरु माता कि निरीह आंखें धुर रही था। और साथ ही गुरु का क्रोधित चेहरा। माने वो अब भी उसे गुस्से से  देख रहे है कि मेरा गुरु ऋण कहा हे लाओ... दो मेरा गुरु ऋण, अचानक अंगुली माल जोर से चीख मारी, सारा जंगल क्‍या शायद आसमान भी थोड़ी देर के लिए थरथरा गया। पास जो पेड़ों पर पक्षी विश्राम कर रहे थे अचान डर कर फुर्र से उड़ गये। जैसे काल आ गया हो और अपनी जान बचाने के लिए दुर निकल गये। कहीं शांत बैठे मोर की पींऊपींऊ—..की पुकार साथ फड़फड़ाहट भी सुनाई दी। पास बैठा मुसाफिर भी डर गया। और उसे लगा कि अब यहाँ से चल देना चाहिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, जैसे ही वो मुसाफिर चलने के लिये उठने लगा, अंगुली माल ले तलवार के एक ही वार से उसकी गर्दन अलग कर दी। जो जीवित प्राणी दया का देवता बन अभी उसके प्राण बचा रहा था ओर अभी उसे पानी पीला रहे था, वो पल भर में वही खून से लथपथ हो तड़प रहा था।
      समय बीतता चला गया, अंगुली माल और भी हिंसक होता चला गया। वह हत्‍या पर हत्‍या करता चला गया। अब उसने और भी खतरनाक हथियार ले लिया जो कभी एक और ब्राहमण परशुराम ने उठाया था ‘फरसा’...जांलानी के जंगल में मनुष्‍य तो क्‍या जंगली जानवर भी उसके आस पास नहीं आते थे। राजा प्रसेनजित ने सैनिक भेजे की उसे जिन्‍दा या मुर्दा पकड़ कर ला आओ। वो जंगल का एक—एक  चप्‍पा जानने लगा था।  वह कितने ही सैनिकों की हत्या कर चुका, आखिर कर सैनिक भी वहाँ जाने से डरने लगे।  प्रसेनजित ने लोगो को आदेश दे रखा था इस जंगल में जाना मना है, यह जौलानी  का जंगल नहीं है मात का जाल है। इस में जो भी गया वो आपने प्रणों से हाथ धो बैठा। आस पास के पचासों गांव को खाली कर श्रावस्‍‍ती के आस पास शरणार्थी शिविर लगा दिये थे। फिर भी कोई भुला भटका उसका शिकार बन ही जाता था। उसने गि‍नती के लिए एक अचूक बात कि जिसे मारता उसकी चितली अंगुलि काट एक माला बना लेता। लोग धीरे—धीरे उसका असली नाम ही भूल गए, परन्‍तु कहा था अब वह अहिंसक वो तो खो गया था की अंधेर के गर्त में और उसकी जगह ले ली थी एक कुरूप हत्यारे ने। उसकी मा मैत्रायणी ने जब सुना की उसका बेटा खुंखार पशु हो गया है, तो वह उससे मिलने के लिए जंगल की और चल दी। लेकिन लोगों ने समझाया  कि उस को किसी बात रिश्ते नाते का होश नहीं है वह तुम्‍हें नहीं पहचानेगा और वह तुम्‍हारी भी हत्‍या कर देगा।
      भगवान श्रावस्ती में जैत बन में ठहरे थे। जब उन्हें पता चला कि अंगुली माल ने भयंकर आतंक मचा रखा है। एक दिन आनंद को साथ ले सुबह—सुबह ही जालानी के जंगल की और चल दिये, अपने मन की बात उन्‍होंने आनंद को भी नहीं बताई। लोगों ने रस्‍ते में टोकना शुरू कर दिया  कि भगवान कहा जा रहें हो, आगे रास्‍ता बीहड़ है, और डाकू अंगुली माल का आतंक भी है। एक सीमा के बाद जहां पर राज्‍य के सिपाहियों ने डेरे डाल रखा थे। की इससे आगे वहां कोई मनुष्‍य न जा पाये, और अंगुली माल को और हत्‍या को मोका न मिले। फिर भी अगर वह बहार तक आता है तो उसे शहर में न जाने दिया जाए। चौकी पर सिपाहियों न लाख समझाया परन्‍तु भगवान नहीं माने तो नहीं माने और आनंद को भी हिदायत दे दी की तुम भी अब मेरे साथ मत चलो। आनंद ने कहा: ‘भंते वह आदमी बड़ा खतरनाक है, वह पागल है, वह यह भी नहीं देखेंगे की कौन आ रहा है। उस ने 999 आदमियों को मार दिया है, उसकी माता भी अब अंदर जाने से डरती है कही उसकी भी हत्‍या न कर दे।’
      भगवान बोले: ‘देखो उसे अब एक ही आदमी की जरूरत है फिर अगर एक बुद्ध को मार कर वह अपनी शपथ पूरी कर लेता है, तो इससे बढ़कर पुण्‍य का और क्‍या काम है।’  मेरा जीवन तो पूर्ण हो गया है। इससे और भगवान ने एक ना सुनी। आनंद भगवान के चेहरे पर एक खास आभा देख रहा था जो उसने तीस सालों में पहले कभी नहीं देखी थी। वो तो छाया की तरह भगवान के साथ रहता था परन्‍तु आज तो छाया भी साथ नहीं जा रही। आनंद केवल देखता ही रह गया। उन आंखों में सौम्‍यता एक तेज का अद्भुत मिश्रर्ण था। वह समझ गया कि आज कुछ घटने वाला है ब‍स समय कि प्रतीक्षा मात्र है। जो इतिहास बन सालों तक अस्मरणीय  बन जाएगा। जो शायद का के गर्त में छुपा है, जिसे भगवान ने देख लिया, उस ही शुभ घड़ी के लिए समय इंतजार कर रहा था.......। सच कहो तो आनंद का साहस भी नहीं हो रहा था, हाला कि वह क्षत्री थी, एक लड़ाका था, प्राणों को पल में मिटाने का साहस था परंतु न जाने क्‍यों आज वो जड़ वत खड़ा रह गया...शायद ये भगवान का ही चमत्‍कार है कि उनकी उपस्थिति में बाधा न पड़े।
      अंगुली माल ने जंगल में एक आदमी को आते हुए देखा, वो एक पहाड़ी की उच्चय चट्टान पर बैठा था। उसे तो भरोसा ही नहीं हुआ, महीनों से कोई इधर परिंदा भी नहीं फटका था मनुष्‍य की क्‍या बिसात, उसे लगा मेरी आंखों का धोखा है। कोन ना समझ मरने के लिए यहाँ आयेगा। लेकिन नहीं वो सत्‍य है, उसे गैरिक वस्‍त्र भी दिखाई दिए। उसने सोचा की कोई मुक्‍कदर का मारा संन्‍यासी रास्‍ता भूल—भटक कर आ गया है। चलो मुझे क्‍या है, मेरा एक सहस्त्र वां शिकार एक भिक्षु भी हो तो यही सही।
      भगवान जैसे—जैसे करीब आते जाते उनकी गौरव मय: चाल, चेहरे पर तेज, एक निर्भीकता, एक गरिमा, उसने ऐसा आदमी कभी नहीं देखा था। वो अंदर तक कांप गया। उसका मन न जाने क्‍यों विचलित होने लगा। ने जाने क्‍यों आज उसका अंदर से दबा भय बहार निकल कर आ रहा है, जैसे सूर्य के प्रकाश में सब साफ दिखाई देने लगा हो। वो अपने भय को छुपाने के लिए जोर से चिल्ला या ‘कौन ना समझ है, रूक जा आग मत आ जानता नहीं मैं कौन हूं।‘
      बुद्ध की मोजूदगी कुछ करने लगी थी, सत्‍य के सामने असत्‍य कैसे टिके, क्‍या अंधकार प्रकाश का सामना कर सकता है। अंगुली माल को लगा की उसके शरीर से कोई प्राण निचोड़ रहा है। लगता था उसका दम घूँट रहा है। लेकिन भगवान तो आगे आते ही रहे बिना किसी भय के, अंगुली माल ने फिर हिम्‍मत कर के कहा: ‘रूक जा, आगे मत बढ़। तू भिक्षु है मुझे तुम पर दया आ रही है। वापस चला जा मैं तुझे छोड़ दूँगा।‘
      भगवान: ‘मेरा चलना तो कब का रूक गया है, मैं तो ठहरा हुं अपने में, चल तो तू रहा है।’
      अंगुली माल को लगा कि इस आदमी का दिमाग खराब हो गया है। नहीं तो ऐसा एक भी आदमी अपने जीवन में नहीं देखा जो मृत्‍यु को देख कर न कांप जाए, लोगों को गिड़गिड़ाते—मिमियाते जीवन की भीख मांगते देखा था.....। जरूर ये पागल टकरा गया, खेर मुझे क्‍या, परन्‍तु आज मुझे क्‍या हो गया है मेरा दिल क्‍यों बैठा जा रहा है। क्‍यों बार—बार मुझे इस पर दया आती है। वो ये सब सोच ही रहा था कि इतनी देर में भगवान उसके बिलकुल पास आ गए।
      अगर तू जिद्दी हे तो मैं महा जिद्दी हूं, अंगुली माल का पूरा शारीर पसीने से तर बतर हो गया, और उसके हाथ कांपने लगे, लग रहा था फरसा जो सालों से उसकी पकड़ में था आज वो कमजोर हो रही है। उस मन जो सालों से पाषाण था, आज वर्क की तरह पिंगल रहा था। आज वो अपने को कितना कमजोर लाचार महसूस कर रहा था। दुनियां में जितने भी हिंसक मनुष्‍य होते है वो अंदर से उतने ही भीरू होते है अपने अन्‍दर की कायरता को छिपाने के लिए वो क्रूरता का आवरण पहन लेते है। चाहे हिटलर, मुसोलनी, तैमुर लंग आदि।
      भगवान के चेहरे पर भय कि कोई लकीर तक नहीं थी। आंखों एक  दम स्फटिक मणि के समान चमक रही थी। लेकिन उस तेज में सुर्य के प्रकाश की चुभन नहीं एक शीतलता थी।
भगवान ने कहा: ‘अंगुली माल मारने में भी कोई कला है। यह तो कोई साधारण से साधारण आदमी भी कर सकता है। कोई कायर, भीरू भी कर सकता है। इस पेड़ की शाखा को काट कर मुझे दे।’
      अंगुली माल मानों भगवान की बातों से अभिभूत हो गया, एक आज्ञाकारी बच्‍चें की भाती उसने जल्‍दी से पेड़ की शाखा काट कर भगवान की तरफ बढा दी।
      भगवान ने कहा: ‘अब जोड़ दे इसे वापस उस तने पर, जहां से काटी थी।’
      मारने में क्‍या महानता जोड़ने में कुछ गुण गौरव है। मैं जानता हुं जोड़ना क्‍या होता है। अब तू फरसा ले और मेरी गर्दन काट....फिर तू चाहे जोड़ य ना जोड़। परंतु जोड़ने से ही कोई महान बन पाता है।  तोड़ना तो बच्‍चे भी कर लेते है। भूल जा उस सब को जो तेरे साथ हुआ है, वह एक दुःख स्वप्न की तरह था। वो अतीत जो एक काली छाया कि तरह तेरा पीछा कर रहा था और अगर आज न जागा तो जन्‍म—जन्‍म करता रहेगें ।शायद फिर लग जाए हजारों लाखों साल आज तेरे सामने सुर्य खड़ा है। खोल दे अपने आप को प्रकाश खुद अपना रास्‍ता देख लेगा। अंधकार को अपना कोई आस्‍तित्‍व नहीं होता है, वह तो केवल प्रकाश की अनुपस्थित मात्रा है। इस लिए स्वप्न का अपना कोई महत्‍व नहीं जो किया वो सब नींद में है। अब जाग ओर साहस कर, चल पकड़ मेरा हाथ आज मैं तुझे प्रकाश की तरफ चलने का निमंत्रण देता हूं, साहस है तुममें तो थाम मेरा हाथ। सूर्य तेरी आंखों के सामने खड़ा है, देख वो स्‍वर्ण पथ....आज मैं केवल तेरे लिए ही इतनी दूर से चल कर के आय हूं तुझे ले जाने। तू मेरा पिय पुत्र है......।‘
      अंगुलि माल की आंखों से झर—झर आंसुओं की धार बहने लगी। वो पत्‍थर बनी आंखों मोम की तरह बह कर चल दी। उसका शरीर में अचानक उत्‍ताप पैदा हो गया। आज वह फिर वहीं पर पहुंच गया जहां से चला था। वहीं मन स्थित हो गई। उसे कुछ समझ में नहीं आया कुछ ऐसा हो रहा था जो उसके बस के बहार था। वो एक अनजानी सी डोर से बंधा खींचा चला जा रहा था। वह चहा कर भी अपने आप को रोक नहीं पा राह का। फरसा  उसके कांपते  हाथ से गिरने ही वाला था उसे छोड़ दिया। शरीर उसका झुकता चला गया और वह पृथ्‍वी पर लेट गया भगवान के चरण में, जो कोई अथाह समुद्र में डुबता प्रणी किसी नाव को अचानक पास आया देख उसे पकड़ कर एक अबोध बच्‍चें के समान फफक कर रोने लगा जाये। भगवान ने उसकी पीठ सहलाने लगी, स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरा, अंगुली माल को लगा ये हाथ भगवान का न हो कर गुरु माता का दुलार उसे फिर मिल रहा है। भगवान ने उसे उठा कर सीने से लगाया। खूब प्‍यार किया...आज सालों बाद उसके जलते सीने पे मानों अमृत की वर्ष हो गई थी, आज भगवान के रूप में उसे अपने सामने गुरु माता दिखाई दे रही थी । उसे लगा आज किसी ने मेरे ह्रदय को देखा है। जो जख्‍म उसे मिला था वो फोड़ा आज मवाद बन सड़ रहा है। जैसे उस फोड़े की उसके पास से दु गंध आ रही है। आज उस पर भगवान ने प्‍यार ओर स्नेह का मरहम लगा दिया।
      यह खबर आग की तरह फेल गई कि अंगुली माल न भगवन के सामने अपने को समर्पण कर दिया और भिक्षु बन गया है। लोग दुर—दुर से उसे देखने के लिए जैत बन में आने लगे। मानों वह कोई मानव न हो हंसक पशु हो जिसे जीवत  पकड कर पिंजरे में कैद कर लिया हो और लोग उसे देखना चाहते है। एक जिज्ञासा कौतूहल चारों तरफ फेल गया इस कौतूहल से कोन बच पता चाहे वो राजा हो या रंक, अजातशत्रु को पता चला तो वह भी अपनी जिज्ञासा को रोक न सका। और अंगुली माल को देखने के लिए जैत बन पहुंच गये। वहीं गंध कुटी में भगवान के सामने जा प्रणाम किया, कि देखे कहां है अंगुली माल।
      अजातशत्रु: ‘भगवान ये मैं क्‍या सुन रहा हूं, अंगुली माल भिक्षु हो गया। विश्‍वास नहीं होता, अगर ये हो सकता है तो दुनिया में सब कुछ हो सकता है। मेरा मन तो मान ही नहीं सका, इसी लिए अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए में खुद चल कर उसे देखने आपके पास आया हूं। जिसे हजारों सैनिक नहीं पकड पाये पकडना तो दूर रहा उसकी परछाई तक कोई छू तक नहीं पाये वो काम आपके प्रेम ने निहत्‍थे कर दिया। कही ये कोरी अफवाह तो नहीं है।’
      भगवान: ‘ये जो भिक्षु, मेरे पास बैठा पंखा झल रहा है, देख रहे हो इसे, इसे जरा गोर से देखो, यही है मेरा पुत्र ‘अंगुली माल’।’
      अजातशत्रु ने अपनी तलवार तुरंत म्यान से निकल ली, भगवान ये इतनी खतरनाक है, इसको आपने यू खुल्‍ला छोड़ रखा है। आप इसकी बात का भरोसा नहीं करना चाहिए। कहीं यह भी इसकी अपनी जान बचाने की चाल बाजी तो नहीं। क्‍योंकि सब जानते है भिक्षु को मृतयु दंड नहीं दिया जा सकता। कहीं से भेड़ के रूप में सियार बन कर अपनी चाल बाजी से अपने प्राण बचा रहा हो।‘
      भगवान: ‘तलवार भीतर कर लो अजातशत्रु, अब अंगुली माल वह अंगुली माल नहीं रहा। वो मेरा पुत्र बन गया, अब वो दो बारह फिर पुरना अहिंसक बहीं अहिंसक हो गया वह ‘मैत्रायणी’ भार्गव बाह्मण हो गया।‘
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आज एक माह भगवान के पास रहने के बाद अंगुली माल भिक्षा मांगने के लिए श्रावस्ती नगर में पहली बार प्रवेश करेगा। इससे पहले वे जैत बन में भगवान की गंध कुटी में भगवान के सान्निध्य में ही रहा। श्रावस्‍ती नगरी में इससे पहले किसी ने भी अंगुली माल को नहीं देखा था। जिस भी अभागे ने भी उसे देखा था वे आज जीवत नहीं बचा था। जाने से पहले उसने भगवान से आज्ञा चाही। अपने दोनों हाथ जोड़ कर निवेदन किया की भगवान एक जिज्ञासा है फिर शायद मैं पूछ पाउ या न पाउ.......गुरू माता ..(और उसकी आवाज भर्रा गई) का क्‍या हुआ?
      भगवान बोले: ‘अहिंसक गुरु माता ने उसी दिन से अन्‍न जल त्‍याग दिया था। वो 15 दिन में इस शरीर से मुक्‍त हो गई। बाद में तुम्‍हारे गुरु को अपनी गलती का अहसास हुआ और लेकिन तब तक बहुत देर हाँ चुकी थी, ओर सब खत्‍म भी हो गया था। समय हाथ से चला जाए तो उसे लौटाया नहीं जा सकता। फिर अगर वो अपना प्रायश्चित करना भी चाहता तो प्रकृति ने उसे मोका ही नहीं दिया। इस सदमे को वह सहन नहीं कर सका और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। वो पागल हो गया, फिर जोर—जोर से रोता गलियों में घूमता रहा। तेरा नाम ले कर पुकारता था। शायद तेरे कानों में आवाज पहुँचा पाता तो उसे कुछ राहत महसूस हो जाती। बो बार—बार अपनी गुरु दक्षिणा को कोसता रहा और गुरू माता पर लगाये कलंक को रोता रहा। पर वो इतना पक्‍का और शाह रंग था उसे वो धो नहीं पाया। तेरा गुरु आज भी मृत्‍यु को तरस रहा है। न जाने पागल हो दुर दराज कहा पर निकल गया। कोई कहते है दक्षिण में वैशाली कोई कहते है मथुरा में देखा गया है। अब उसका कोई पता ठीकाना नहीं है।’
      अंगुलि माल श्रावस्ती में भिक्षा मांगने के लिए चल दिया। जैसे की प्रत्‍ये‍क भिक्षु की दैनिक प्रकिया थी। भिक्षु ही नहीं खुद भगवान को भी भिक्षा टन के लिए जाना पड़ता था। शहर के दरवाजे बंध हो गए लोग छतों पर चढ़ गए। अंगुलि माल को आते देख कर उनकी आंखों में खून उतर आया था। कभी न कभी किसी न किसी के घर से कोई न कोई सगा संबंधी अंगुलि माल के हाथों मृतयु को जरूर प्राप्‍त हुआ था। क्‍योंकि उसके हाथों मरने बालों की फहरिस्‍त बहुत लम्‍बी थी। और श्रावस्‍ती के पास जलानी का जंगल होने के कारण यही के लोगो की हत्‍याये सबसे ज्‍यादा हुई थी। उस को इस तरह से निहत्‍थे आते देख लोगो ने अपना आपा खो दिया। जिस के हाथ में जो आया वो अंगुलि माल पर फैंकने लगें। चारो तरफ से इट पथर बरस रहे थे । लेकिन अंगुलि माल मानो इस सब के लिए पहले से ही तैयार हो करा आया था। वो आंखे बंद किये खड़ा रहा। अपना बचाव तक नहीं किया। शायद यही वह चा‍ह रहा था। महीने भर भगवान के संग सान्‍निध्‍य में उसे थिर कर दिया था।  वह ये सब होते देखता रहा, ईट,पत्‍थर उसके शरीर पर लगते रहे, खून बहता रहा, वह न दर्द से चीखा न चिल्‍लाया बस उसने अपनी आंखे बंध कर ली शायद यही उसकी परीक्षा थी पश्‍चाताप थ। लोग अपना आपा खो चुके थे। उन्‍होंने ये भी नहीं देखा जिसे हम मार रहे है क्‍या वो अंगुल माल है या अहिंसक है। शायद वो अंगुली माल होता तो आज भी वो इतनी हिम्‍मत नहीं सकते थे। काहिल कायर भीरु लोग उस  मारते रहे। और वह केवल देखता रहा अपने आप को... केवल ये मंत्र दोहराता रहा।
....बुद्धः शरणम गछामि,
    सधं शरणम गछामि‍,  
             धम्म शरणम गछामि........
      जब शरीर ने जवाब दे दिया तो वह गीर पडा, जमीन पर, सारे शरीर से खून बह रहा था। भगवान को खबर लगी, अखरी घड़ी है, अंगुली माल की। भगवान आए, और उसका सर अपनी गोद में ले कर पूछने लगे। ‘अंगुली माल जब लोग पत्‍थर मार रहे थे। तुन अपना बचाव क्‍यों नहीं किया। तू क्‍यों खड़ा रहा आरे पत्‍थर खाता रहा। तेरे मन में कैसा भाव उठ रहे था।’
      अंगुली माल ने कहा: ‘भगवान में अपने में जाकर ठहर गया। आप ही ने तो कहा था, कितना तो चल चुका था। अब और चलने का साहस नहीं था में ठहर गया ठहरना तो था ही आज नहीं कल फिर शायद आज जैसा किनारा नहीं आता। मेरे मन में  न कोई विचार, न कोई भाव बचा, में नितान्त‍ अपने होने को बस देखता ही रहा। ये सब मुझ पर जो मेरे घट रहा था मैं इसका साक्षी मात्र बन गया। फिर मेरा शरीर भी मेरा कहा रहा। दुर कहीं पर कोई मेरे घर की दीवारों को तोड़ता रहा। कितना अच्‍छा लग रहा था। निर्भार न मन के विचारों का कोई बोझ था न इस शरीर का ही कोई भार था। न इस पर पड़ने वाली चोटों का ही मुझे दर्द हो रहा था। कैसा चमत्‍कार हो गया। में अपने को इस बंधन से अपने को मुक्‍त महसूस कर रहा था। क्‍या सुंदर स्वतंत्रता है। आपने मेरे जीवन को धन्‍य कर दिया। इस शरीर से जो भी मेंने पाप किये थे उसे में उसी के हाथों छोड़ दिया मेंने उसका कोई भी में बिना शरीर भी अपने को पूर्ण देख रहा था। ये जो पीड़ा शरीर पर गुजर रही थी ये में नहीं था। अजीब हालात अजीब सी मन स्‍थिती में खड़ा हो गये था। पीड़ा की बजाय मेरे अंदर पूर्ण आनंद बह रहा था। शांति की सीतल छाया को मैने सालों बाद जिसे महसूस किया है क्‍या ये सब मेरा भ्रम है, या ये सत्‍य है। ’मैं एक द्रष्‍टा बन गया। एक छाया की तरह से सब कुछ गुजरते में देखा है पर मेरे से काफी दुर था।  यही तो आपने समझाया था। वहीं सब मेंने अपने पर होते हुए पाया। अब किसी से कोई सिकवा शिकायत नहीं है। कोई बंधन नहीं है। मन पर कोई भी चित्र नहीं वह कोरा हो गया है। न कुछ होने की चाह, न मिटने का डर, क्‍यों जो मिट रहा है उसे में देख रहा हूं....शरीर धीरे—धीरे निष्क्रिय होता जा रहा है। फिर भी में अपने को पूर्ण महसूस कर रहा है। बिना शरीर के भी अपने होने को देख रहा है। ये कैसा चमत्‍कार है...ओर अंगुली माल ने दोनों हाथों को जोड़ और का... अब भगवान बिदा चाहता हूं आपने जो मुझ पर ऋण से उऋण किया है। उसके लिये शबद नहीं है। बुद्धम: शरणम.......। और शब्‍द जैसे अंगुली माल के होठों से धीरे—धीर हवा में विलीन हो गए कहीं दुर चले गये । शरीर निर्जीव हो भगवान की गोद में लुढक गया। खून बहता रहा...उसे शायद पता ही न चला कि इस से पक्षी तो उड़ चला ...एक लम्‍बी डगर पर।
      भगवान ने अपना हाथ अंगुली माल के माथे पर रख दिया। और अपनी दोनों आंखें बंद कर ली। चारों तरफ भिक्षु खड़े ये सब देख रहे थे। जिन लोगों ने अंगुली माल को पत्‍थर मारे थे उन्‍हें भी जरा सा होश आया जब पता चला कि उन्‍होंने क्रोध में क्‍या कर दिया। शायद उन में भी पश्‍चाताप का भाव जग रहा था। अंगुली माल का इस तरह से शांति पूर्ण तरह से मरना सब लोगों अभिभूत कर गया तब जा कर लोगों ने समझा उसे देखा की हम लोग मृत्‍यु से किस प्रकार डरते है। क्‍या कोई मृत्‍यु को इस तरह से स्वीकार कर सकता है। लोगों को ये चमत्‍कार आज सालों बाद भी नहीं भुलाया जा रहा। है आज भी... लोग उस घटना को पढ़ या सुन करे कैसे किर्तव्‍यवुम्‍ध और स्तब्ध हो जाते हे।
      अंगुली माल जब मर गया तो बाद में भिक्षुओं के मन में अनेक तरह कि जिज्ञासा , कौतूहल, के प्रश्न बार—बार उठने लगे। आखि‍र भिक्षुओं से न रहा गया तो अपनी जिज्ञासा को भगवान के सामने प्रश्न के रूप में रख ही लिया,  इतनी हत्‍या करने के बाद भी कोई कैसे मुक्‍त हो सकता है। भगवान, क्‍या ये सच है कि अंगुलि माल अरिहंत हो कर मरा है। या फिर दोबार उसे एक जन्‍म ओर लेना पड़ेगा।‘
      भगवान: ‘मेरा पुत्र अंगुली माल, परिर्निवृत हो गया है। परनिवार्ण को अपलब्‍ध हो गया है अब उसका कोई जन्‍म नहीं होगा। वह जन्‍म मरण के पार हो गया। अब वह वापस नही लोटेगा, उनका कोई जन्‍म नहीं होगा।’
      सोए—सोए जो पाप उसने किये वे निंद में एक सपन के समान थे। क्‍या सुबह नींद में हत्‍या का आप उठ कर प्रशचित करगे।। नही। या जाग कर उसे उन पुण्‍यो से दुर करने की कोशिश करेगा। जाग कर उसने उन सब को अपने पुण्‍य से कांट दिया। निंद ही पीप है जागरण ही पूण्‍य है। मरते हुए वे ऐसे शुन्‍य भाव में था कि मारने वालो के प्रति कोई शिकवा शिकायत तक उसके मन पन अंकित नहीं था। छोटी से प्रकाश की किरण भी करोड़ो गुण अंधकार को छिन्‍न—भिन्‍न कर देती है। होश की ज्‍योति जो मृत्‍यु के सामने भी अडिग अकंप जलती यहीं संकल्प उसे मुक्‍त कर गया। करोड़ो पापों को काटने के लिए करोड़ जन्‍म थोड़े ही चाहिए एक पूण्‍य ही काफी है, साक्षी होने का पूण्‍य, कर्ता होने में पाप है, साक्षी होने में पूण्‍य है।
      सब भिक्षु भगवान की अपूर्व बात को सून कर अभिभूत हो गये, ....साधु...साधु...साधु।

मनसा आनंद मानस