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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

संभोग से समाधि की और--ओशो (प्रवचन दसवां)

विद्रोह क्या हैप्रवचन दसवां

 

     हिप्‍पी वाद मैं कुछ कहूं ऐसा छात्रों ने अनुरोध किया है।  
      इस संबंध में पहली बात, बर्नार्ड शॉ ने एक किताब लिखी है: मैक्‍सिम्‍प फॉर ए रेव्‍होल्‍यूशनरी, क्रांतिकारी के लिए कुछ स्‍वर्ण-सूत्र। और उसमें पहला स्‍वर्ण बहुत अद्भुत लिखा है। और एक ढंग से पहले स्‍वर्ण सूत्र लिखा है: दि फार्स्‍ट गोल्‍डन रूल इज़ दैट देयर आर नौ गोल्‍डन रूल्‍स पहला स्‍वर्ण नियम यही है कि कोई भी स्‍वर्ण-नियम नहीं है।
      हिप्‍पी वाद के संबंध में जो पहली बात कहना चाहूंगा, वह यह कि हिप्‍पी वाद कोई वाद नहीं है, समस्‍त वादों का विरोध है। पहली पहले इस वाद को ठीक से समझ ले।
      पाँच हजार वर्षों से मनुष्‍य को जिस चीज ने सर्वाधिक पीड़ित किया है वह है वाद—वह चाहे इस्‍लाम हो, चाहे ईसाइयत हो, चाहे हिन्‍दू हो, चाहे कम्यूनिज़म हो, सोशलिज्‍म हो, फासिस्ट, या गांधी-इज्‍म हो। वादों ने मनुष्‍य को बहुत ज्‍यादा पीड़ित किया है।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--02)


अस्तित्व की विरलतम घटना: सदगुरु--(प्रवचन--दूसरा) 



पहला प्रश्‍न—

     

      बुद्ध कहते है, वासना दुष्‍पूर है। उपनिषद कहते हैं, जिन्होंने भोगा उन्होंने ही त्यागा। आप कहते हैं, न भोगो न त्यागो वरन जागो। कृपया इन तीनों का अंतर्संबंध स्पष्ट करें।


अंतर्संबंध बिलकुल स्पष्ट है।
बुद्ध कहते हैं, वासना दुष्‍पूर है। बुद्ध वासना का स्वभाव कह रहे हैं। कोई कितना ही भरना चाहे, भर न पाएगा। इसलिए नहीं कि भरने की सामर्थ्य कम थी। भरने की सामर्थ्य कितनी ही हो, तो भी न भर पाएगा। ऐसे ही जैसे पेंदी टूटे हुए बर्तन में कोई पानी भरता हो। इससे कोई सामर्थ्य का सवाल नहीं है, पेंदी ही नहीं है तो बर्तन दुष्‍पूर है। न सामर्थ्य का सवाल है, न सुविधा का, न संपन्नता का। गरीब की इच्छाएं भी अधूरी रह जाती हैं,

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन-01)


आत्मक्रांति का प्रथम सूत्र: अवैर--(प्रवचन-पहला)


मनो मृब्बड्गमा धम्मा मनो मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा,
ततो नं दुक्‍खमन्‍वेति चक्कं' व बहतो पदं।।1।।

मनो पुब्‍बड्गमा धम्मा मनो मनोमया।
मनसा वे पसन्नेन भासति वा करोति बा,
ततो नं. मुनमन्‍वेति छाया' व अनपायिनी ।।2।।

अक्कोचि मै अवधि मै अजिनि मं अहसि से।
ये च तं उपनय्हन्‍ति वेरं तेस क सम्मति ।।3।।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

एस धम्‍मो सनंतनो-(भाग--01) -ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो-(भाग--01) -ओशो 
(बुद्ध की सुललित वाणी धम्मपद पर दिए गएदस अमृत प्रवचनों का संकलन)


बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम- भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।

शनिवार, 10 अगस्त 2013

ओशो के हिंदी साहित्‍य की बहार....

पिछले दिनों एक मित्र सन्‍यासी जब मुझसे मिलने के लिए आई तब बातों ही बातों में बात ओशो के हिन्‍दी साहित्‍य तक आ गई। तब उसे सन्‍यासी ने कहां की ओशो की मधुर वाणी जितनी हिन्‍दी में लगती है। उतना रसा-स्‍वाद अंग्रेजी में नहीं आता। मुझे अंदर से खुशी हुई। और गर्व भी हुआ की हिंदी या संस्‍कृत में जरूर कुछ है जो अंग्रेजी या दुनियां की दूसरी भाषाओं में नहीं है। क्‍यों हिंदी मस्‍तिष्‍क के तीन आयामों में चहली है। और संस्‍कृत तो शायद इससे भी अधिक में। जबकि अंग्रेजी दो एक ही आयाम में फंस कर रह जाती है।

शनिवार, 3 अगस्त 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—21)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 



ओशो !   ओशो !   ओशो !


      जब ओशो के देहावसान पर मैंने एक अध्याय लिखना प्रारम्भ किया तो मुझे लगा कि यह सम्भव नहीं क्योंकि ओशो की मृत्यु नहीं हुई है। यदि उनकी मृत्यु हो गई होती तो मुझे उनका अभाव महसूस होता, परन्तु जब से वे हमें छोड़कर गए हैं मुझे कुछ खो जाने का एहसास नहीं हुआ। मेरा अभिप्राय यह नहीं कि मैं उनकी आत्मा को एक प्रेत की भांति अपने आसपास मंडराते हुए पाती हूं या बादलों में से आती उनकी आवाज़ को सुनती हूं। नहीं, केवल इतना ही है कि मैं आज भी उन्हें इतना अनुभव करती हूं जितना तब करती थी जब वे शरीर में थे । जब वे 'जीवित' थे, उनके आसपास मैं जिस ऊर्जा का अनुभव करती थी वह वही शुद्ध ऊर्जा होगी जो अमर है। क्योंकि अब भी वैसा ही लगता है जबकि उनका शरीर नहीं है। मैं उन्हें जितना वीडियो पर देखती हूं या उनके शब्द पड़ती हूं मेरी समझ और गहराती जाती है कि जब वे शरीर में थे उनकी उपस्थिति एक व्यक्ति की भांति नहीं थी।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—20)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
सेक्‍स और मृत्‍यु—

          मैं हैरान हो जाती हूं कि ओशो को वे लोग सेक्‍स गुरु कहते है जिन्‍होंने शायद उन्‍हें न कभी सुना ओर न कभी पढ़ा। ओशो सेक्‍स के वरना में कहते क्‍या है धर्म गुरूओं की तरह उन्‍होंने कभी भी सेक्‍स को निन्‍दित नहीं किया और यही कारण रहा है तो ऐसा लगता है कि पूरा संसार सेक्‍स से ग्रसित है और यह पक्‍का है कि समाचार-पत्र की सुर्खियों में सेक्‍स शब्‍द आ जाने से उसके पाठकों में वृद्धि तो होती ही है।
      और स्‍वच्‍छन्‍दता ओर समग्रता से ऊर्जा के बहाव को मार्ग देना—दोनों बातों में एक सूक्ष्‍म–सी तार है। ओशो में हमें इस सूक्ष्‍मता की तार पर साथ लिए चलने में एक अदम्‍य साहस व प्रज्ञा है।
      हमें सम्‍बोधि की दिशा में ले चलने के लिए ओशो के कार्य में सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण बात है कि सेक्‍स को सही दिशा मिल क्‍योंकि वह नैसर्गिक है परन्तु उनका ज़ोर इसके अतिक्रमण पर है। और अतिक्रमण दमित मन से नहीं होता। तो उसका पहला क़दम उसकी अभिव्‍यक्‍ति है। यह कितना सरल-सी बात है।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-01

 उपनिषदों की परंपरा व ध्यान के रहस्य
प्रवचन--पहला 
 

 दिनांक 15 फरवरी, 1972, रात्रि 

ओशो आश्रम पूूूूना 

ओम्। तस्य निश्‍चितनं ध्यानम्।

ओम्। उसका निरंतर स्मरण ही ध्यान है।

     
 इसके पूर्व कि हम अज्ञात में उतरें, थोड़ी सी बातें समझ लेनी आवशयक हैं। अज्ञात ही उपनिषदों का संदेश। जो मूल है, जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह सदैव ही अज्ञात है। जिसको हम जानते हैं, वह बहुत ही ऊपरी है। इसलिए हमें थोड़ी सी बातें ठीक से समझ लेना चाहिए, इसके पहले कि हम अज्ञात में उतरें। ये तीन शब्द ज्ञात, अज्ञात, अज्ञेय समझ लेने जरूरी है सर्वप्रथम, क्योंकि उपनिषद अज्ञात से संबंधित हैं केवल प्रारंभ की भांति। वे समाप्त होते हैं अज्ञेय में। ज्ञात की भूमि विज्ञान बन जाती है अज्ञात दर्शनशास्त्र या तत्वमीमांसा और अज्ञेय है धर्म से संबंधित।

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—19)

माई डायमंड डे विद ओशो--(मां प्रेम शुन्‍यो)-आत्म कथा
अन्‍तिम स्‍पर्श—

वे कुछ सप्‍ताह ही अस्‍वस्‍थ रहे और मार्च में फिर प्रवचन के लिए आने लगे। मैने उनसे अंतिम प्रश्‍न पूछा और पहली बार हमने अपने प्रश्‍न बिना हस्‍ताक्षर के भेजे। यद्यपि मैंने पुनर्जन्‍म के सम्‍बंध में कुछ नहीं पूछा था, ओशो ने उत्‍तर दिया।
      .....पुनर्जन्‍म की धारणा जो पूर्व के सभी धर्मों में है, कहती है कि आत्‍मा एक शरीर से दूसरे में, एक जीवन से दूसरे जीवन में प्रवेश करती है। यह धारणा उन धर्मों में नहीं है जो यहूदी धर्म से निकले है। जैसे ईसाई और मुस्‍लिम धर्म। अब तो मनोवैज्ञानिकों को भी यह बात सत्‍य प्रतीत होती है, क्‍योंकि लोगों की लोगो की अपने पूर्व जन्‍म की स्‍मृति रहती है। पुनर्जन्‍म की धारणा जड़ पकड़ रही है। परंतु मैं तुम से एक बात कहना चाहूंगा: पुनर्जन्‍म की धारणा मिथ्‍या है। यह सच है कि जब व्‍यक्‍ति मरता है उसका जीवन पूर्ण का भाग हो जाता है। चाहे वह पापी हो या पुण्‍यात्‍मा इससे कोई अंतर नहीं पड़ता,परंतु उसके पास कुछ होता है उसे मन कहो या स्‍मृति। प्राचीनकाल में कोई ऐसी जानकारी उपलब्‍ध नहीं थी जो यह स्पष्ट कर सके कि स्‍मृति विचारों को, विचार तरंगों का समूह है, परंतु अब सरल है।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—17)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
पुणे दो विश्‍लेषण: थैलीयम ज़हर (अध्‍याय—17)


     पुलिस कमिशनर ने आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया। लेकिन आश्रम के लिए आचार-प्रतिमानों के रूप में कुछ शर्तों पर उसे स्‍थापित कर देने की इच्‍छा  प्रकट की शर्तें चौदह थी। उनमें से कुछ शर्तें ऐसी थी जो यह भी निश्चित करती थी कि ओशो किस विषय पर और कितना समय प्रवचन दें। वे किसी धर्म के विरूद्ध न बोले या कोई भड़काने वाली बात न कहें। केवल एक सौ विदेशियों को ही आश्रम के द्वार के भीतर प्रवेश कर सकते है; प्रत्‍येक विदेशी का नाम पुलिस के पास होना चाहिए, हमें कितने ध्‍यान करने होंगे और ध्‍यान की समयावधि क्‍या होगी यह भी निर्धारित किया जाएगा; पुलिस को किसी भी समय आश्रम में प्रवेश करने और प्रवचन में सम्‍मिलित होने का अधिकार होगा।

    ओशो ने शेर की तरह गरजते हुए इन शर्तों का प्रतिसंवेदन किया। उनके उत्‍तर में दिए गए प्रवचनों में आग बरसी: क्‍या यह वही स्‍वतंत्रता है जिसके लिए हजारों व्‍यक्‍तियों ने अपने प्राण गवांए।

रविवार, 19 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—16)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
रिश्‍ते—(अध्‍याय—16)

      ओशो के भारत चले जाने के बाद मैंने लंदन में एक माह प्रतीक्षा की। फिर मुझे लगा कि भारत में प्रवेश करने का प्रयत्‍न सुरक्षित होगा। विवेक दो महीने पहले ही चली गई थी। उसने मुझे बताया कि जब मेरे भार आने की तिथि आई तो उसने ओशो से कहा कि मेरे बारे में कोई समाचार नहीं मिला और वह चिंतित थी कि मैं पहुंची हूं या नहीं। ओशो बस मुस्‍कुरा दिए। मैं पहले ही पहुंच चुकी थी।
      ओशो सूरज प्रकाश के घर में ठहरे हुए थे। कई वर्ष पुराने संन्‍यासी है। वे रजनीशपुरम भी आए थे। ओशो के भारतीय संन्‍यासी, जो रजनीशपुरम में उनके साथ रह चुके है। कुछ इस तरह परिपक्‍व हो गए है कि वे भारतीयों से सर्वथा भिन्‍न लगते है। वे पूर्व और पश्‍चिम का एक आदर्श मेल है—नया मनुष्‍य जिसकी ओशो ने चर्चा कि है।

गुरुवार, 16 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—15)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
तुम मुझे छुपा नहीं सकते—(अध्‍याय-15)

      ओशो को संसार से छिपाए रखना उचित नहीं लग रहा था। एक हीरे के इन्द्रधनुष रंग प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति पर प्रतिबिम्‍बित होने चाहिए ताकि वह चकाचौंध हो जाए। इसी कारण उन्‍होंने भारत छोड़ा था। हम ओशो के लिए विश्‍व में एक ऐसा स्‍थान ढूंढ़ रहे थे जहां वे अपने लोगों से जो कहना चाहते है कह सकें। उन्‍हें कुछ ज्‍यादा नहीं चाहिए था—बस इतना ही कि वे अपने अनुभव को दूसरों के साथ बांट सकें।      
      मैंने ये सप्‍ताह बिस्‍तर में ही बिताए, क्‍योंकि मेरे पैरों में एक विचित्र-सी सूजन आ गई थी। उसका कारण कभी ढूंढा न जा सका। परंतु एक विषैले मकड़े के काटने से लेकिन हड्डियों के किसी रोग तक कुछ भी हो सकता था। मैं सारा दिन अपने बिस्‍तर में पड़ी खिड़की के बाहर सोने की भांति चमकते पुष्‍पित अखरोट के वृक्ष देखती रहती। और चीड़ के शंकुओं को निरंतर तड़-तड़ की ध्‍वनियों सुनती रहती। जो सूर्य की गर्मी से फट जाते और अपने बीजों को धरती पर बिखेरते रहते।

बुधवार, 15 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—14)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
उरूग्‍वे—(अध्‍याय—14)

      चार अंगरक्षकों सहित मैं लंदन एयरपोर्ट से उरूग्‍वे रवाना हुई। हास्‍या तथा जयेश ने सुरक्षा कर्मियों का प्रबंध किया। जो प्रति-विद्रोह प्रति आतंकवाद के कार्य में निपुण थे तथा सूचना पहुंचाने, विध्‍वंस तथा गोलाबारी में प्रशिक्षित थे। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अपने-अपने विशेष कार्य में प्रवीण था। उरूग्‍वे में वे ओशो की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए थे क्‍योंकि हमें मालूम नहीं था कि वहां कैसा रहेगा। वे मेरे आस-पास सिपाहियों की भांति खड़े थे और उनकी सूरतें धमकाने वाली रही थी। और मुझे लगा कि मेरी अच्‍छी देख भाल हो रही है।
      ओशो मोर्ट विडियो के एक होटल में रुके हुए थे। जब में वहां पहुंची और उसी दिन मैं उनका कमरा सुव्‍यवस्‍थित करने गई। वे खिड़की के पास पड़ी एक कुर्सी पर बैठे थे और थके हुए लग रहे थे। देवराज ने मुझे बताया कि ओशो आयरलैंड में बहुत दुर्बल हो गए थे तथा अपने कमरे के बाहर के बरामदे तक का फासला भी तय नहीं कर सकते थे। मैंने उनके पैर छुए तथा मुस्कराती हुई वहां बैठ गई। मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे है। उन्‍होंने हां में सिर हिला दिया।

मंगलवार, 14 मई 2013

सेवन पोर्टलस आफ़ समाधि:-(059)

सेवन पोर्टलस आफ़ समाधि:-मैडम ब्‍लावट्स्‍की—
 
(हवा का एक झोंका है ब्‍लावट्स्‍की। और कोई उससे बहुत महानतर शक्‍ति उस पर आविष्‍ट हो गई है: और वह हवा का झोंका उस सुगंध को ले आया है।)
      इस जगत में जो भी जाना लिया जाता है। वह कभी खोता नहीं है। ज्ञान के खोने का कोई उपाय नहीं है। न केवल शास्‍त्रों में संरक्षित हो जाता है ज्ञान, वरन और भी गुह्म तलों पर ज्ञान की सुरक्षा और संहिता निमित होती है। शास्‍त्र तो खो सकते है। और अगर सत्‍य शास्‍त्रों में ही हो तो शाश्‍वत नहीं हो सकता। शास्‍त्र तो स्‍वयं भी क्षणभंगुर है। इसलिए शास्‍त्र संहिताएं नही है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। तभी ब्‍लावट्स्‍की की यह सूत्र पुस्‍तिका समझ में आ सकती है।
      ऐसा बहुत पुराने समय में भारत ने भी माना था। हमने भी माना था कि वेद संहिताओं का नाम नहीं है। शास्‍त्रों का नाम नहीं है। वरन वेद उस ज्ञान का नाम है, जो अंतरिक्ष में , आकाश में संरक्षित हो जाता है। जो इस अस्‍तित्‍व के गहरे अंतस्‍तल में ही छिप जाता है। और होना भी ऐसा ही चाहिए। बुद्ध अगर बोले और वह केवल किताबों में लिखा जाए तो कितने दिन टिकेगा। और बुद्ध का बोला हुआ अगर अस्‍तित्‍व के प्राणों में ही न समा जाए तो अस्‍तित्‍व ने उसको स्‍वीकार ही नहीं किया।

सोमवार, 13 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—13)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
मौन प्रतीक्षा—(अध्‍याय—13)
6मार्च 1986, रात्रि 1.20बजे।
      ओशो के साथ एक छोटे जैट विमान में विवेक देवराज,आनंदों, मुक्‍ति और जॉन सवार हुए। एथेंस से विमान ने एक अज्ञात लक्ष्‍य की और उड़ान भरी—जिसका पता पायलेटों को भी नहीं था। आकाश में उन्‍होंने जान से पूछा, किधर। जॉन भी यह नहीं जानता था।
      हास्‍या व जयेश ओशो के बीसा के लिए स्‍पेन में व्यस्त थे तथा जॉन के साथ उनका सम्‍पर्क टेलीफ़ोन द्वारा बना हुआ था। हास्‍या ने कहा अभी स्‍पेन तैयार नहीं हुआ और स्‍पेन कभी तैयार भी नहीं हुआ था। उन्‍हें तो न कहने के लिए भी दो महीने लग गये।
      विमान ने एक ऊंची उड़ान ली तथा यह तीव्र गति से उड़ रहा था—दिशाहीन।
      क्रेट के बंगले में मैं शांत खड़ी थी। सामान के तीस नगों के साथ चलने की तैयारी कर रही थी।
      मैंने बंगले के चारों और नज़र दौड़ाई—टूटी हुई खिड़कियाँ, क़ब्ज़ों के साथ झूलते दरवाजे तथा पुलिस द्वारा बनाई इनकी दुर्गति—अन्‍याय व बर्बरता के प्रतीक।

रविवार, 12 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—12)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
क्रीट—(अध्‍याय—12)

      यह फरवरी का मध्‍य था और ‘’एजियन’’ समुंद का पानी ठंडा था, लेकिन चट्टानों के बीच बन गए गहरे और स्‍वच्‍छ ताल में, जहां समुंद चट्टानों के ऊपर से धीमे-धीमे बहकर आ रहा था, मुझे उसमे नग्‍न तैरना बहुत ही अच्‍छा लगता था। सूर्य चमक रहा था, और मैंने चट्टान में बने घर और उस तक जाती चट्टान में से कांट कर बनाई गई घुमावदार सीढ़ियों की और देखा। मकान के सबसे ऊपरवाले कमरों में ओशो रहते थे। और उनकी बैठक की गोलाकार खिड़की से समुद्र व खड़ी चट्टानें दिखाई देती थी। उनका शयनकक्ष मकान के पिछवाड़े में बना हुआ था। इसलिए वहां अँधेरा रहता था। और वह गुफा जैसा लगाता था। यह वह समय होता जब वे दोपहर को झपकी ले रहे होते। इन दोनों के मध्‍य में था स्‍नान गृह जिसका आधुनिकरण करने के लिए मां अमृतो ने बहुत कुछ करवाया था। मां अमृतो ने इस घर को अपने फिल्‍म निर्देशक मित्र निकोस कॉन्‍डोरोस सक एक महीने के लिए किराये पर  लिया था।

शुक्रवार, 10 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—11)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
नेपाल—(अध्‍याय—11)

      विमान के धरती को छूने से पहले ही में नेपाल के जादू को महसूस कर रही थी। मैं धीरे से फुसफुसाई, मैं घर लौट रही हूं।एयरपोर्ट अधिकारी भद्र व्‍यक्‍ति थे। उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी तथा सड़को पर आ जा रहे लोगों के चेहरे इतने सुंदर थे जो मैंने पूरे विश्‍व में कही नहीं देखे थे1 यद्यपि नेपाल भार से अधिक निर्धन है परंतु वहां के लोगों में एक गरिमा है। जो इस तथ्‍य का खंडन करती है।
      पोखरा को जानेवाली घुमावदार सड़क पर हरे-भरे जंगल में से गुजरती थी। जब मैं लधु शंका के लिए बाहर निकली तो एक बनी की और सम्‍मोहित हो कर बढ़ती चली गई जहां एक जल प्रपात चट्टानों से घिरे एक ताल में गिर रहा था। आर्किड बड़े-बड़े मकड़ों की भांति पेड़ों से लिपटे हुए थे। एक छोटा सा नाला एक मोड़ लेकिर दृष्‍टि से ओझल एक रहस्मयी घाटी कीओर जा रहा था। चेतना--चेतना। मेरा नाम पुकारा जा रहा था। अपना नाम की पुकार सुन कर मेरा जादू टूटा। जि गाड़ी में हम थे उसे दो संन्‍यासी जो हमें एअरपोर्ट पर मिले थे—उन पहाड़ों की चढ़ाई उतराई से होते हुए चले आ रहे थे। जहां से घान के परतदार खेत थे। बाँसों के झुरमुट और तीव्र गति से बहती नदियों वाली तंग घाटियाँ दिखाई दे रही थी।

गुरुवार, 9 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—10)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
कूल्लू मनाली—(अध्‍याय--10)

      हवाई जहाज़ ने दिल्‍ली से प्रात: दस बजे कूल्‍लू मनाली के लिए उड़ान भरी। वह सुबह पहल ही बहुत व्‍यस्‍त रही थी क्‍योंकि सात बजे हयात रिजेंसी होटल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई थी। जिसमें ओशो ने अमरीका के प्रति अपने विचारों को निर्भीकता पूर्वक व्‍यक्‍त किया था।
      इससे पहले कि दिल्‍ली की सड़कों पर हमारी लारी की रोंगटे खड़ी कर देनेवाली अराजक दौड़ शुरू होती, मैंने कुछ घंटों की नींद चुरा ली थी। लारी में वे संदूक थे जिनका वर्णन करते हुए भारतीय समाचार पत्रों ने उन्हें रजत और रत्‍न-जड़ित कहा था। ये वही संदूक थे जिन्‍हें मैंने रेडनेक्स प्रदेश के एक हाई वेयर स्‍टोर से खरीदा था और दो रातों पहले ही पैक किया था।
      ओशो की माता जी अपने परिवार के कुछ सदस्‍यों के साथ वहां हमारे पास पहुंच गई और पीछे-पीछे हरिदास भी आ गया जो रजनीशपुरम में हमारे साथ रहता था। आशु ओशो की दंत दर्श जिसके बालों का रंग लाल था। त्‍वचा चीनी मिट्टी जैसी थी और हंसी शरारत-भरी थी। मुक्‍ता और हरिदास के साथ वहां पहूंच गई।

मंगलवार, 7 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—09)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
सूली देने का अमेरिकी ढंग—(अध्‍याय—09)

      जब हम मध्‍य नवम्‍बर की एक शाम को बारिश से भीगी पोटलैंड़ की सड़कों पर ड्राइव कर रहे थे। प्रिसीडेंट के मोटर काफ़िले जितने एक दस्‍ते ने रोल्‍स रायस को घेर लिया। कम से कम पचास पुलिसवाले होंगे जो चमकते काले कपड़ों में दैत्‍यों जैसे लग रहे थे। उनके चेहरे ऐनक तथा हैल्मेट से ढँके हुए थे तथा वे शक्‍तिशाली हारले डेविडसन मोटर साइकिलों पर सवार थे। सभी सड़कों के प्रत्‍येक जंकशन पर घेरा डाल लिया गया था। मोटरसाइकल सवारों ने बड़ी नाटकीय ढंग अपनाया ऐसे कि अगले दो कार के दानों और खड़े दो लोगों का स्‍थान आसानी से ले सकते थे। वे ट्रैफिक के बीच में तथा उसके आस-पास कला बाजों के समान ड्राइव कर रहे थे।
      इन भोंपुओं के तुरही नाद तथा दैत्या कार अंगरक्षकों के बीच ओशो कार से बाहर आए, सदा की भांति बाहर जो भी घटित हो रहा है उससे अनछुए सादे वस्‍त्र पहने छह या आठ पुलिसकर्मियों के साथ न्‍यायालय के भीतर चुपचाप शांति से सरक गए प्रवेश कर गए। मैं कार की दूसरी और से उस भीड़ में उतर गई। धक्‍का-मुक्‍का करते लोगों का झुंड पत्रकार, टेलीविजन दल के लोग।

रविवार, 5 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—07--B)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
रजनीशपुरम—02/B (अध्‍याय—07)

      एक बुद्ध पुरूष कैसे जीता है और किस प्रकार हम पर कार्य करता है....उस दिन की घटना द्वारा बताया जा सकता है। जब मैं उनके साथ कार में जा रही थी।
      कार में एक मक्‍खी थी जो हमारे सिरों के ऊपर भिनभिना रही थी। मैं उसे पकड़ने के चक्‍कर में अपनी दोनों बांहें घूमा रही थी। हम एक चौराहे पर जाकर रुके और ट्रैफिक के चलने की प्रतीक्षा करने लगे। मैं खिड़कियों और सीटों पर हाथ मार रही थी। ओशो सामने देखते हुए शांत बैठे थे और मैं मक्‍खी को पकड़ने के लिए पसीना-पसीना हो रही थी। अपना सिर बिना घुमाएं, यहां तक कि बिना आंखें घुमाएं.....उन्‍होंने खिड़की पर लगा स्‍वचलित बटन बड़ी कोमलता से दबाया। उनकी और से खिड़की का शीशा नीचे हुआ और वे चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे। जब मक्‍खी उन के पास से उड़ी तो उन्‍होंने धीरे से अपना हाथ हिलाया और मक्‍खी खिड़की से बाहर उड़ गई। फिर उन्‍होंने बटन को छुआ तथा खिड़की बंद हो गई। उन्‍होंने एक बार भी आंखें सड़क से नहीं हटाई। कितना ज़ेन, कितना गरिमापूर्ण।
      शीला के साथ भी उनकी यहीं ढंग था। जब तक वह स्‍वयं निर्वासित नहीं हो गई उन्‍होंने गरिमापूर्ण ढंग से प्रतीक्षा की। वे अब भी उसके गुरु थे। उसे प्रेम करते थे और उसके भीतर बैठे बुद्ध में उनका विश्‍वास था।

शनिवार, 4 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—07)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
जनीशपुरम—02 (अध्‍याय—07)

               जब तक न्‍यायालय हमारे पक्ष में कोई निर्णय न दे व्‍यावसायिक क्षेत्र (कमार्शियल-जोन) में न होने के कारण हम कोई व्‍यवसाय स्‍थापित नहीं कर सकते थे; पर्याप्‍त टेलीफ़ोन भी लगवा सकते थे। निकटतम क़सबा एंटिलोप था जिसके लगभग चालीस निवासी थे। यह क़सबा ऊंचे-ऊंचे पॉपलर (पहाड़ी पीपल) वृक्षों के बनों में बसा हुआ था। तथा रजनीशपुरम से अठारह मील की दूरी पर था। व्‍यापार के लिए हम वहां एक ट्रेलर ले गए थे। मात्र एक ट्रेलर और थोड़े से संन्‍यासी, और हम पर कस्बे पर अधिकार जमाने का आरोप लगा। भय के कारण स्‍थानीय निवासियों ने अपने नगर का अनिवासी करण कर दिया। हमने उनके विरूद्ध न्‍यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। जीत हमारी हुई। इस घटना ने ऐसे कुरूप नाटक का रूप ले लिया कि अमरीका वासियों में इसकी चर्चा उनके नवीनतम धारावाहिकों से भी अधिक होने लगी।
      समाचार पत्र तथा टेलीविजन स्‍टेशन इसमे बहुत रूचि दिखाने लगे थे। समाचार-पत्रों और टेलीविज़न पर शीला एक बहुत बड़ी जादूगरनी सी प्रतीत होती थी। एंटिलोप के निवासियों ने अपना भय प्रकट करा शुरू किया और अपना घर बचाते गृह स्‍वामी का नाटक छेड़ दिया।

शुक्रवार, 3 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—06)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
रजनीश पुरम—भाग-1 (अध्‍याय—06)
            रजनीशपुरम अमरीका में नहीं था। वह अपने में एक देश था—अमरीकी स्‍वप्‍नों से मुक्‍त। शायद  यही कारण था कि अमरीका राजनीतिज्ञों ने उसके साथ युद्ध छेड़ दिया।
      आशीष, अर्पिता, गायन और मैं हवाई जहाज़ से अमरीका के पार आ गए।
      आशीष लकड़ी का जादूगर था। वह केवल एक उत्‍कृष्‍ट बढ़ई ही नहीं था जो ओशो के लिए कुर्सीया बनाता है। बल्‍कि और कोई भी तकनीकी या बिजली का काम हो तो वह उसे करने में सक्षम है। जब भी कहीं कुछ जोड़ना होता  या लगाना होता, आशिष-आशिष, कहां है, आशिष? यही पूकार सुनाई देती। इटालियन होने के नाते उसके पास हाथों के माध्‍यम से बोलने की महान कला है।
      अर्पिता ने हमेशा ओशो के लिए चप्‍पलें बनाई है। वह मनमौजी किस्‍म की महिला है। ज़ेन चित्र बनाती है। सनकी सा उसका व्‍यक्‍तित्‍व है। जब उसने ओशो के कपड़ों को डिजायन करने में सहायता की तो उकसा वह रूप प्रकट हुआ।

बुधवार, 1 मई 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—05)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
न्‍यूजर्सी—दुर्ग  (अध्‍याय—05)

               ओशो ने लगभग बीस शिष्‍यों के साथ भारत छोड़ दिया। अलविदा कहते हुए उनके संन्‍यासी हाथ जोड़े उनके द्वार के बाहर रास्‍ते, कार पोर्च में तथा आश्रम की सड़क के दोनों और कतार में खड़े थे। विवेक और निजी चिकित्‍सक देवराज के साथ उन्‍होंने मरसीडीज़ से प्रस्‍थान किया।
      विवेक, जिसमें बच्‍चों जैसी सुकुमार चंचलता थी जो उसके चारित्र्य बल और किसी भी परिस्‍थिति को संभालने की उसकी योग्‍यता को छिपाए रखती और देवराज जो एक लम्‍बा उँचा चाँदी जैसे बालों वाला सुशिष्‍ट-सुरुचिपूर्ण युवक था-दोनों एक सुंदर जोड़ी बना रहे थे।
      मैंने एक घंटे के उपरांत प्रस्‍थान किया, मुझे लगा कि आश्रम का अंत हो जाएगा और एक प्रकार से हो ही चुका था; क्‍योंकि वह पुन: कभी वैसा न हो पाया। हो भी कैसे सकता था। कम्‍यून एक उर्जा एक देह की भांति था; हम सब उर्जा दर्शनों और ध्‍यान के माध्‍यम से एक दूसरे से जुड़े हुए थे। और यह सोचकर कि अब हम विश्‍व भर में बिखर जाएंगे। मैं उदास हो गई।

रविवार, 28 अप्रैल 2013

माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय--03)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
प्रेम मुख विहीन आता है—(अध्‍याय—03)

       लाओत्से हाउस (ओशो-गृह) एक महाराजा की सम्‍पति था। जिसका चुनाव इसके बीच खड़े बादाम के उस विशाल पेड़ के कारण किया गया था। जिसके रंग गिरगिट की भांति लाल से केसरी पीले फिर हरे रंग में बदल जाते है। इसके मौसम कुछ सप्‍ताह उपरान्‍त बदलते रहते है। और फिर भी मैंने इसकी शाखाओं को कभी पत्र-विहीन नहीं देखा। उधर एक पत्‍ता गिरा कि नया चमकीला हरा पत्‍ता उसका स्‍थान लेने को आतुर होता है। पेड़ के पत्‍तों की छाया के नीचे एक छोटा सा झरना है और एक रॉक गार्डन है। जिसका निर्माण एक सनकी दीवाने इटालियन ने किया था। जो उसके बाद कभी दिखाई नहीं दिया।
      कुछ ही वर्षों में यह उद्यान ओशो के जादुई स्‍पर्श से एक जंगल बन गया है—यहां बांस के उपवन है, हंस-सरोवर है। एक श्‍वेत संगमरमर का जल प्रपात है जो रात्रि में नीले प्रकाश से जगमगा उठता है और जैसे ही जल छोटे-छोटे कुंडों में से गुजरता है, वे कुंड सुनहरे पीले प्रकाश से चमकने लगते है। राजस्‍थान की खदानों से लाई गई विशाल चट्टानें, लाइब्रेरी की ग्रेनाइट पत्‍थर से बनी काली दीवारों की पृष्‍ठभूमि में सुर्य की रोशनी में जगमगा उठती है।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

(माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय--02)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
ज्‍योतिर्मय अंधकार—(अध्‍याय—02)

       भारत में पूना के एक होटल में प्रथम रात्रि व्‍यतीत करने के बाद मैंने सत्‍य की खोज का परित्‍याग करने का निश्‍चय किया। यह होटल बाहर से देखने में अच्‍छा लग रहा था। मैं भारतीय हवाई-अड्डे और रेलवे स्‍टेशन के अपने प्रथम अनुभव के उपरान्‍त थकी-घबराई, कुछ डांवाडोल सी यहां पहुंची थी। स्‍टेशन किसी शरणार्थी शिविर जैसा लग रहा था। वहां प्‍लेटफार्म के ठीक मध्‍य में लोग अपने पूरे परिवार के साथ गठरियों पर सोये हुए थे। और दूसरे यात्री उनके उपर से; उनके आसपास से आ-जा रहे थे। लंगड़े-लूले व भूखे से पीड़ित लोग मेरी और टूट पड़े। भीख मांगने लगे और मुझे यूं घूरकर देखने लगे जैसे मुझे ही खा जाएंगे। कुली और टैक्‍सी ड्राइवर एक दूसरे पर चिल्‍ला रहे थे। हाथापाई कर रहे थे। एक दूसरे के मुंह पर घूंसे मार रहे थे। और सवारी लेने के लिए एक दूसरे का लगभग गला ही घोंट रहे थे। चारों और हजारों लोग-लोग, जनसंख्‍या विस्‍फोट।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

महसाना एक परिक्रमा-(भाग 2)

स्‍वामी देवातीत शास्‍ता--

      स्‍वामी देवातीत शास्‍ता का असली नाम ईश्‍वर लाल प्रजापति है। वह गुजरात के एक गांव रुद्रा बीजा पूर में गरीब घर में पैदा हुए। किसी तरह से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्‍हें एक सरकारी स्‍कूल में अध्‍यापक की नौकरी मिल गई। नौकरी के बाद परिवार ने उनकी शादी कर दी। परन्‍तु कुदरत को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। पत्‍नी का स्‍वभाव बहुत दुष्ट था। वह बात-बात में लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाती थी। लेकिन जिस तरह से स्‍वामी का स्वभाव आज है उसी तरह से वह बचपन से ही शांत प्रकृति के थे। समय गुजरता चला गया। लेकिन घर में कोई औलाद नहीं हुई। स्‍वामी देवातीत ने तो इसे भगवान का वरदान मान कर स्‍वीकार कर लिया परंतु पत्‍नी और-और हिंसक होती चली गई। और बात इतनी बढ़ी की एक दिन घर छोड़ कर मायके चली गई इस के बाद कभी नहीं लोटी। मिलने के लिए जितनी ही बार गये तो केवल स्‍वामी जी। ताकी उन्‍हें आर्थिक रूप से तंगी न हो। लेकिन वहां भी वह अपनी आदत नहीं छोड़ पाई। और वहां पर भी वह अपनी परिवार के साथ लड़ती झगड़ती रही।

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों -(अध्याय-01)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
मैं यहीं हूं  (अध्‍याय—01 )

       कुछ कहना है?
      एक आवाज भीतर पुकार-पुकार कर कहती है। मैं यहीं हूं, मैं यहीं हूं। मैं अवाक हूं। और तभी वे आंखें।
      जब गुरु शिष्‍य की आंखों में देखता है, यह देखता है, और वह देखता है। वह पूरी कहा कहानी देख रहा है अतीत वर्तमान और भविष्‍य—सभी कुछ। गुरु के सामने शिष्‍य पारदर्शी है। और यह उसमें छिपे अप्रकट बुद्ध को देख सकता है। मैं वहां बैठी ही रह सकती थी ताकि वे मेरे भीतर तक पहुंच जाएं.....क्‍योंकि हीरे को पाने का बस यही एकमात्र उपाय है। भीतर एक भय है कि कहीं वे मेरे अचेतन में पड़ी उन बातों को ने देख लें। जिन्‍हें मैं छिपाए रखना चाहती थी। परंतु वह मेरी ओर ऐसी प्रेम पूर्ण दृष्‍टि से देखते है कि मैं केवल इतना ही कह पाती हूं, हां।
      कभी-कभी ऐसी दृष्‍टि-स्‍मृति पटल पर कोई चिन्‍ह छोड़ सकती बस एक हर्षोल्‍लास की अनुभूति, एक आनन्‍द पूर्ण ऊर्जा का ज्‍वार मुझे अश्रु धारा में बह जाने के लिए छोड़ जाता है।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

महसाना मनन नीयो--कम्‍युन (एक परिक्रमा) भाग--1

ओशो मनन नियो-संन्‍यास कम्‍यून महसाना गुजरात। महसाना-अहमदाबाद मार्ग पर रेलवे ओवर ब्रिज के पास पलावासना में एक सुंदर रमणीक एकांत में बना है। ओशो इसी मार्ग से अनेक बार माऊँ टाबू शिविर लेने के लिए जाते थे। एक दिन अचानक कार को रूकवाया और उसे पीछे ले जाने के लिए कहा। और आज जहां कम्‍यून बना है उस और इशारा कर के कहां। देखो उसे वह कितनी सुंदर जगह ध्‍यान और मौन लिए खड़ी है। वहां जगह केवल ध्‍यान के लिए बनी है। वहां कुछ करो, साधकों के लिए यहां पर एक आश्रम बनाओ। और ठीक कुछ दिनों बाद वहां की जमीन खरीद ली गई और वहां पर आश्रम का काम चलने लगा। ओशो के अमेरिका से आने के बाद यहां के ट्रस्‍टी ओशो से मिलने मनाली गए और चाहा की यह आश्रम की जमीन बेच कर ओशो के लिए धन एकत्रित किया जाये। बाद में ओशो से भेट होने के बाद जब उन्‍हें यह स्थान बेचने को कहां तो ओशो हंस दिये। और कहां की नहीं तुम नहीं जानते यह जगह भारतीय संन्यासियों के काम आयेगी।

रविवार, 21 अप्रैल 2013

एक प्रेम प्रीत की पाती जो......कविता

बहता जीवन पल-पल उत्‍सव
कल-कल बहता झरना बन जा
कुछ मधुर राग किन्‍हीं छंदों में
कानों में आकर कुछ कह जा
देखो मेरे तुम उत्‍सव को
नित खेल खेलता अटखेली
वह नहीं पकड़ता दीवारे
बह नहीं बाँधता बंधन हार
नित रूप बदलता जाता है
जीवन के काल चक्र पर वो
वह नहीं देखता मुड़कर कल
वह नहीं सिमटना चाहत में
न तटबंध की दीवारों में

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

तुम हो एक अंधकार

कुछ दीवारें दे  रही थी
एक रूप और आकर का भ्रम मुझे
गिरा दिया मैंने उसे एक रात के अंधेरे में
थी एक पकड़ वह भी मेरे होने की
जो चिपक गई थी
किसी कोने में अंहकार बन कर
की में हूं एक रूप,
जो देता था मुझे एक गुरूर
उस होनी-अनहोनी से हमने
मोड़ लिया मुख इक मोड़ पर जाकर

अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें—

धीरे-धीरे ध्‍यान तुम्‍हारे संपूर्ण जीवन में व्‍याप्‍त हो जाना चाहिए। यहां तक की सोने के लिए जाते समय भी।
बिस्‍तर पर लेटने पर कुछ ही मिनटों में तुम नींद की गोद में चले जाओगे। इन कुछ मिनटों में मौन, अँधेरा और विश्रांत शरीर इनके संबंध में सजग रहो। जब तक पूरी तरह से नींद न आ जाए तब तक ऊँघते समय सजग रहो और तुमको आश्‍चर्य होगा। जब तक पूरी तरह नींद आती है तब तक के अंतिम क्षण तक यदि तुम ऐसा अभ्‍यास जारी रखते हो तो फिर सुबह में भी पहला विचार सजगता के संबंध में ही होगा। सोते समय जो तुम्‍हारा अंतिम विचार होगा वही सुबह में जागने पर पहला विचार होगा क्‍योंकि तुम्‍हारी नींद के दौरान यह अंतर-प्रवह के रूप में जारी रहता है।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

प्रश्‍न–एक पुरूष और एक स्‍त्री के बीच किस प्रकार का प्रेम संबंध की संभावना है, जो की सेडोमेसोकिज्‍म (पर-आत्‍मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो?

 प्रश्‍न–एक पुरूष और एक स्‍त्री के बीच किस प्रकार का प्रेम संबंध की संभावना है, जो की सेडोमेसोकिज्‍म (पर-आत्‍मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो?

ओशो—यह एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है। धर्मों ने इसे असंभव कर दिया है। स्‍त्री और पुरूष के बीच कोई भी सुंदर संबंध—इसे नष्‍ट कर दिया है। इसे नष्‍ट करने के पीछे कारण था।
      यदि व्‍यक्‍ति का प्रेम जीवन परिपूर्ण है। तुम पुजा स्‍थलों पर बहुत से लोगों को प्रार्थना करते हुए नहीं पाओगे। वे प्रेम क्रीड़ा कर रहे होंगे। कोई चिंता करता है उन मूर्खों की जो धर्मस्‍थलों पर भाषण दे रहे है। यदि लोगों को प्रेम जीवन पूर्णतया संतुष्‍ट और सुंदर हो वे इसकी चिंता नहीं करेंगे कि परमात्‍मा है या नहीं। धर्म ग्रंथ में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा सत्‍य है या नहीं। वे स्‍वयं से पूरी  तरह संतुष्‍ट होंगे। धर्मों ने तुम्‍हारे प्रेम को विवाह बना कर नष्‍ट कर दिया है।