असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक
20-10-67 रात्रि
(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-छटवां-(मौन का स्वर)
एक मित्र ने आज सुबह सलाह दी है कि मैं सभी प्रश्नों के उत्तर न
दूं। उन्होंने कहा है कि बहुत से प्रश्न तो फिजूल होते हैं, उनको आप
छोड़ दें।
मुझे
उनकी बात सुनकर एक घटना स्मरण हो आई।
एक
धर्मगुरु पहली बार ही चर्च में भाषण देने गया था। उसे डर था कि लोग कहीं कोई
प्रश्न न पूछें। तो अपने एक मित्र को उसने दो प्रश्न सिखा रखे थे। इसके पहले कि
लोग पूछें, तुम मुझसे यह प्रश्न पूछ लेना, उत्तर मेरे तैयार
हैं।
जैसे
ही उसका बोलना समाप्त हुआ,
उसका मित्र खड़ा हुआ। उसने पहला प्रश्न पूछा--वह वही प्रश्न था,
जो कि बोलने वाले ने उसे सिखाया हुआ था। बोलने वाले के पास उत्तर भी
तैयार था। उसने उत्तर दिया। वह इतना अदभुत उत्तर मालूम पड़ा कि उस चर्च में इकट्ठे
लोग अत्याधिक प्रभावित हुए। फिर उसी व्यक्ति ने खड़े होकर दूसरा प्रश्न पूछा। वह भी
सिखाया हुआ था। उसका उत्तर और भी प्रभावपूर्ण था, चर्च
तालियों से गूंज उठा और तभी वह मित्र तीसरी बार खड़ा हुआ और उसने कहा कि महानुभाव!
आपने जो तीसरा प्रश्न पूछने को मुझे बताया था, वह मैं भूल
गया हूं।







