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सोमवार, 27 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(साधना-शिवििर)-प्रवचन-03



असंभव क्रांति-(ओशो)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 19-10-67 रात्रि
(अति-प्राचिन प्रवचन)


प्रवचन-तीसरा-(जीवन का आविर्भाव)

सुबह हमने चित्त की स्वतंत्रता के संबंध में थोड़ी सी बातें कीं।

एक मित्र ने पूछा है कि चित्त स्वतंत्र होगा, तो स्वच्छंद तो नहीं हो जाएगा?

हमें स्वतंत्रता का कोई भी पता नहीं है। हम केवल चित्त की दो ही स्थितियां जानते हैं। एक तो परतंत्रता की, और एक स्वच्छंदता की। या तो हम गुलाम होना जानते हैं, और या फिर उच्छृंखल होना जानते हैं। स्वतंत्रता का हमें कोई अनुभव नहीं है। स्वतंत्रता, स्वच्छंदता से उतनी ही भिन्न बात है, जितनी परतंत्रता से।
सच्चाई तो यह है कि स्वतंत्रता का स्वच्छंदता से कोई संबंध नहीं। स्वच्छंदता का परतंत्रता से जरूर संबंध है। परतंत्र चित्त की जो प्रतिक्रिया है, वही स्वच्छंदता है। परतंत्र चित्त का जो विद्रोह है, वही स्वच्छंदता है। परतंत्र चित्त का जो विरोध है, वही स्वच्छंदता है। लेकिन स्वतंत्रता तो बहुत ही अनूठी दिशा है। उसका इन दोनों बातों से कोई भी संबंध नहीं। न तो स्वतंत्र व्यक्ति परतंत्र होता है, और न स्वच्छंद होता है।

तो पहले हम परतंत्रता के संबंध में थोड़ा समझ लें तो शायद स्वच्छंदता के संबंध में भी हमें समझ में आ जाए। और उन दोनों से भिन्न ही स्वतंत्रता की अवस्था है।
परतंत्रता का अर्थ है: चित्त के ऊपर लोगों के द्वारा थोपा गया तंत्र, समाज के द्वारा, वह जो कलेक्टिव माइंड है, वह जो समूह चित्त है, उसके द्वारा व्यक्ति को जहां-जहां बांधा गया है। यह जो बंधन है, निश्चित ही यह बंधन किसी को भी प्रीतिकर नहीं है। बंधन कभी भी प्रीतिकर नहीं हो सकते हैं। उन बंधनों के प्रति सहज ही भीतर एक विरोध है। उन बंधनों को तोड़ देने की भीतर एक तीव्र बलवती आकांक्षा है। और जब भी व्यक्ति मौका पाता है, उन बंधनों को तोड़ता है। ऐसे परतंत्रता को तोड़ने से--परतंत्रता के विरोध में, वह जो विद्रोही चित्त है, उससे स्वच्छंदता पैदा होती है।
आज तक जमीन पर आदमी का मन परतंत्र रहा है। अब उसके विद्रोह में एक रिबेलियन, उसके विरोध में एक प्रतिक्रिया सारे जगत में पैदा हो रही है। नया युवक उस प्रतिक्रिया का फल है, वह स्वच्छंद है। आप जो-जो कहते हैं, वह उसे केवल इसीलिए करने को तैयार नहीं है, क्योंकि आप कहते हैं। कल तक का आदमी तैयार था, क्योंकि आप कहते थे। आज का युवक तैयार नहीं है, क्योंकि आप कहते हैं। लेकिन दोनों ही आपके कहने से बंधे हुए हैं। दोनों ही स्वतंत्र नहीं हैं। एक आपके पक्ष में बंधा हुआ था, एक आपके विपक्ष में बंध गया है।
लेकिन विपक्ष में जो बंध जाता है--वह भी बंधा हुआ है।
अगर एक व्यक्ति मंदिर जाता है, इसलिए कि लोग कहते हैं, और एक व्यक्ति मंदिर नहीं जाता है, केवल इसलिए ही क्योंकि लोग कहते हैं जाओ--ये दोनों ही मंदिर से बंधे हुए हैं। इन दोनों का चित्त एक ही परतंत्रता के दो पहलू हैं। स्वयं का इन दोनों के भीतर कुछ भी नहीं है।
स्वतंत्रता "पर' से मुक्ति है। पक्ष में भी, विपक्ष में भी। "पर' के ऊपर ध्यान न रह जाए, स्वयं पर ध्यान हो। लेकिन मुश्किल से ही हमारा ध्यान स्वयं पर होता है।
दस भिक्षु सत्य की खोज में एक बार निकले थे। उन्होंने बहुत पर्वतों-पहाड़ों, आश्रमों की यात्रा की। लेकिन उन्हें कोई सत्य का अनुभव न हो सका। क्योंकि सारी यात्रा बाहर हो रही थी। किन्हीं पहाड़ों पर, किन्हीं आश्रमों में, किन्हीं गुरुओं के पास खोज चल रही थी। जब तक खोज किसी और की तरफ चलती है, तब तक उसे पाया भी कैसे जा सकता है, जो स्वयं में है।
आखिर में थक गए और अपने गांव वापस लौटने लगे। वर्षा के दिन थे, नदी बहुत पूर पर थी। उन्होंने नदी पार की। पार करने के बाद सोचा कि गिन लें, कोई खो तो नहीं गया। गिनती की, एक आदमी प्रतीत हुआ खो गया है, एक भिक्षु डूब गया था। गिनती नौ होती थी। दस थे वे। दस ने नदी पार की थी। लौटकर बाहर आकर गिना, तो नौ मालूम होते थे। प्रत्येक व्यक्ति अपने को गिनना छोड़ जाता था, शेष सबको गिन लेता था। वे रोने बैठ गए। सत्य की खोज का एक साथी खो गया था।
एक यात्री उस राह से निकलता था, दूसरे गांव तक जाने को। उसने उनकी पीड़ा पूछी, उनके गिरते आंसू देखे। उसने पूछा, क्या कठिनाई है? उन्होंने कहा, हम दस नदी में उतरे थे, एक साथी खो गया, उसके लिए हम रोते हैं। कैसे खोजें? उसने देखा वे दस ही थे। वह हंसा और उसने कहा, तुम दस ही हो, व्यर्थ की खोज मत करो और अपने रास्ते चला गया।
उन्होंने फिर से गिनती की कि हो सकता है, उनकी गिनती में भूल हो। लेकिन उस यात्री को पता भी न था। उनकी गिनती में भूल न थी, वे गिनती तो ठीक ही जानते थे। भूल यहां थी कि कोई भी अपनी गिनती नहीं करता था। उन्होंने बहुत बार गिना, फिर भी वे नौ ही थे।
और तब उनमें से एक भिक्षु नदी के किनारे गया। उसने नदी में झांककर देखा। एक चट्टान के पास पानी थिर था। उसे अपनी ही परछाईं नीचे पानी में दिखाई पड़ी। वह चिल्लाया, उसने अपने मित्रों को कहा; आओ, जिसे हम खोजते थे, वह मौजूद है। दसवां साथी मिल गया है। लेकिन पानी बहुत गहरा है और उसे हम शायद निकाल न सकेंगे। लेकिन उसका अंतिम दर्शन तो कर लें। एक-एक व्यक्ति ने उस चट्टान के पास झांककर देखा, नीचे एक भिक्षु मौजूद था। सबकी परछाईं नीचे बनती उन्हें दिखाई पड़ी। तब इतना तो तय हो गया, इतने डूबे पानी में वह मर गया है।
वे उसका अंतिम संस्कार कर रहे थे। तब वह यात्री फिर वापस लौटा, उसने पूछा कि यह चिता किसके लिए जलाई हुई है? यह क्या कर रहे हो? उन नौ ही रोते भिक्षुओं ने कहा, मित्र हमारा मर गया है। देख लिया हमने गहरे पानी में डूबी है उसकी लाश। निकालना तो संभव नहीं है। फिर वह मर भी गया होगा, हम उसका अंतिम दाह-संस्कार कर रहे हैं।
उस यात्री ने फिर से गिनती की और उनसे कहा, पागलो! एक अर्थ में तुम सबने अपना ही दाह-संस्कार कर लिया है। तुमने जिसे देखा है पानी में, वह तुम्हीं हो। लेकिन पानी में देख सके तुम, लेकिन स्वयं में न देख सके! प्रतिबिंब को पकड़ सके जल में, लेकिन खुद पर तुम्हारी दृष्टि न जा सकी! तुमने अपना ही दाह-संस्कार कर लिया। और दसों ने मिलकर उस दसवें को दफना दिया है, जो खोया ही नहीं था।
उसकी इस बात के कहते ही उन्हें स्मरण आया कि दसवां तो मैं ही हूं। हर आदमी को खयाल आया कि वह दसवां आदमी तो मैं ही हूं। और जिस सत्य की खोज वे पहाड़ों पर नहीं कर सकते थे, अपने ही गांव लौटकर वह खोज पूरी हो गई। वे दसों ही जाग्रत होकर, जान कर, गांव वापस लौट आए थे।
उन दस भिक्षुओं की कथा ही हम सभी की कथा है। एक को भर हम छोड़ जाते हैं--स्वयं को। और सब तरफ हमारी दृष्टि जाती है--शास्त्रों में खोजते हैं, शब्दों में खोजते हैं; शास्ताओं के वचनों में खोजते हैं; पहाड़ों पर, पर्वतों पर खोजते हैं; सेवा में, समाज सेवा में; प्रार्थना में, पूजा में खोजते हैं। सिर्फ एक व्यक्ति भर इस खोज से वंचित रह जाता है--वह दसवां आदमी वंचित रह जाता है, जो कि हम स्वयं हैं।
स्वतंत्रता का अर्थ है--इस स्वयं को जानने से जो जीवन उपलब्ध होता है, उसका नाम स्वतंत्रता है। स्वतंत्र होना इस जगत में सबसे दुर्लभ बात है। स्वतंत्र वही हो सकता है, जो स्वयं को जानता हो। जो स्वयं को नहीं जानता, वह परतंत्र हो सकता है या स्वच्छंद हो सकता है, लेकिन स्वतंत्र नहीं।
तो जिस स्वतंत्रता की सुबह मैंने बात की है, वह स्वयं को जाने बिना पूरी तरह फलित नहीं हो सकती। लेकिन उस तरफ चलने के लिए परतंत्रता को तोड़ देना जरूरी है। और स्मरण रखें, जिसके चित्त से परतंत्रता पूरी तरह विलीन हो जाती है, उसके चित्त से स्वच्छंदता भी अपने आप विलीन हो जाती है। क्योंकि स्वच्छंदता परतंत्रता की छाया, शेडो से ज्यादा नहीं है।
यह सारे जगत में जो स्वच्छंदता दिखाई पड़ रही है, यह हजारों वर्षों की परतंत्रता का फल है। आपके तथाकथित ऋषियों-मुनियों, साधु-संतों, महात्माओं का इसमें हाथ है। जिनने भी मनुष्य के चित्त को परतंत्र बनाया है, उनने ही मनुष्य को अब मजबूर कर दिया स्वच्छंद होने को। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और मनुष्य को आज तक स्वतंत्र बनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। तो भय हमारे मन में होता है कि अगर हम स्वतंत्र हुए तो कहीं स्वच्छंद न हो जाएं।
स्वतंत्र मनुष्य कभी स्वच्छंद हुआ ही नहीं है। आज तक जमीन पर यह घटना घटी ही नहीं है कि स्वतंत्र चित्त व्यक्ति कभी स्वच्छंद हुआ हो। स्वच्छंद होता है परतंत्र चित्त ही। परतंत्र चित्त जब क्रोध से भर जाता है तो स्वच्छंद हो जाता है।
हमारे, सभी नई पीढ़ियों के युवक आज क्रोध से भरे हैं। और इसलिए स्वच्छंद होते जा रहे हैं। इसमें आपका हाथ है--उनकी स्वच्छंदता में। यह हजारों वर्ष की मनुष्य के मन पर लादी गई दासता का हाथ है उसमें। जब तक हम इस सत्य को न समझेंगे, तब तक न तो हम मनुष्य को परतंत्रता से बचा सकते हैं और न स्वच्छंदता से। एक ह्विशियस सर्किल शुरू होता है।
परतंत्र चित्त स्वच्छंद होना चाहता है। स्वच्छंद चित्त को देखकर हम घबड़ाते हैं और परतंत्रता को थोपने की कोशिश करते हैं। जितनी हम परतंत्रता थोपते हैं, उतनी स्वच्छंदता प्रतिक्रिया में पैदा होती है। जितनी स्वच्छंदता पैदा होती है, उतने हम भयभीत हो जाते हैं और परतंत्रता के नए आयोजन करते हैं। ऐसा एक दुष्ट-चक्र हजारों वर्ष से मनुष्य के ऊपर चल रहा है। अब यह शायद अंतिम घड़ी में पहुंच गया है। शायद परतंत्रता इतनी गहरी हो गई है कि उसके परिणाम में आदमी अब सब भांति स्वच्छंद हो जाना चाहता है।
चित्त को हम जितना दबाते हैं, उतनी उसकी प्रतिक्रियाएं, उसके रिएक्शंस होने शुरू होते हैं।
एक फकीर था नसरुद्दीन। एक सांझ अपने घर से निकलता था। किन्हीं दोत्तीन मित्रों के घर उसे मिलने जाना था। निकला ही था घर से कि उसका एक मित्र जलाल, दूर गांव से द्वार पर आकर उपस्थित हो गया। नसरुद्दीन ने कहा, तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दोत्तीन मित्रों को मिलने जाता हूं, लौटकर फिर तुम्हारी सेवा-सत्कार कर सकूंगा। और तुम चाहो, थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो।
जलाल ने कहा, मेरे कपड़े सब धूल-धूसरित हो गए रास्ते में। पसीने से मैं लथपथ हूं। अगर तुम कपड़े मुझे दूसरे दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलूं। यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? अच्छा होगा, तुम्हारे मित्रों से मिलना हो सकेगा।
नसरुद्दीन ने अपने बहुमूल्य, जो कपड़े उसके पास श्रेष्ठतम थे, उसे दिए और वे दोनों मित्र गए। पहले घर में पहुंचे। नसरुद्दीन ने वहां कहा, ये हैं मेरे मित्र जलाल, इनसे आपका परिचय करा दूं। रहे कपड़े, कपड़े मेरे हैं। मित्र बहुत हैरान हुआ। इस सत्य को कहने की कोई भी जरूरत न थी। और यह क्या बेहूदी बात थी कि उसने कहा कि ये हैं मेरे मित्र जलाल और रहे कपड़े, कपड़े मेरे हैं। बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, पागल तो नहीं हो तुम? कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना।
दूसरे घर में वे पहुंचे। नसरुद्दीन ने कहा, इनसे परिचय करा दूं। ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल, रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं। जलाल हैरान हुआ। बाहर निकलकर उसने कहा, तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई भी जरूरत नहीं थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, इसके उठाने की जरूरत क्या थी?
नसरुद्दीन ने कहा, मैं मुश्किल में पड़ गया। वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसका रिएक्शन हो गया, उसकी प्रतिक्रिया हो गई। सोचा कि गलती हो गई--मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं। उसके मित्र ने कहा, अब इसकी बात ही न उठे। यह बात खतम हो जानी चाहिए।
वे तीसरे मित्र के घर में पहुंचे। नसरुद्दीन ने कहा, ये हैं मेरे मित्र जलाल। रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है। अपने मित्र से पूछा ठीक है न, कपड़ों की बात उठानी बिलकुल उचित नहीं है। कपड़े किसी के भी हों--क्या लेना-देना--मेरे हों कि इनके हों। कपड़ों की बात उठानी उचित ही नहीं है। बाहर निकलकर उसके मित्र ने कहा, अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा। मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है!
उस नसरुद्दीन ने कहा, मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं। मेरे भीतर--जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं। मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल हो गईं, कि मैंने अपना कहा और तुम्हारा कहा। तो फिर मैंने कहा कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था। लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की चर्चा उठानी बिलकुल उचित नहीं है। और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना।
यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है। एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है। और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है। जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है।
स्वच्छंदता के भय से परतंत्रता थोपते हैं। परतंत्रता की प्रतिक्रिया में स्वच्छंदता पैदा होती है। फिर और थोपते हैं, फिर और पैदा होती है। और एक जाल पैदा हो गया है, जिसे अगर हम तोड़ेंगे नहीं तो मनुष्य जाति इस अपने ही हाथ से बनाए जाल में नष्ट हो सकती है। करीब-करीब नष्ट हो ही गई है। और मनुष्य जाति नष्ट हुई हो या न हुई हो, एक-एक मनुष्य तो जीवित नहीं रह गया है, इस जाल में करीब-करीब मृत हो गया है।
स्वच्छंदता और परतंत्रता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर यह समझ में आ जाए बात तो खयाल में आ सकता है कि स्वतंत्रता बात ही और है।
स्वतंत्रता विद्रोह नहीं है। स्वतंत्रता रिबेलियन नहीं है--स्वतंत्रता एक रिवल्यूशन है, एक क्रांति है। विद्रोह किसी के खिलाफ होता है। और जिसके खिलाफ हम खड़े होते हैं, हम उससे बंध जाते हैं। क्योंकि उसका विरोध करना होता है। उसके विरोध के कारण हमारा उससे एक संबंध हो जाता है, एक रिलेशनशिप हो जाती है। और उस विरोधी को देखकर हम निरंतर कदम उठाते हैं।
हिंदुस्तान में मुसलमान आए और उन्होंने मंदिर तोड़ने शुरू कर दिए। मंदिर तोड़ने की वजह से वे मंदिरों से बंध गए--उतने ही जितने कि मंदिरों को बनाने वाले बंधे हुए थे। वे मंदिरों से मुक्त न रह सके। मंदिर उनके प्राण लेने लगे, सपनों में उन्हें सताने लगे। उनका चित्त मंदिरों पर घूम-घूमकर पहुंचने लगा--उतना ही जितना कि उनका पहुंचता होगा जो कि मंदिरों को बनाते हैं, शायद उनसे ज्यादा।
मूर्ति को बनाने वाला, मूर्ति को तोड़ने वाला--दोनों मूर्ति के भक्त होते हैं। एक मित्र-भक्त होता है, एक शत्रु-भक्त होता है। लेकिन दोनों का चित्त वहीं घूमता रहता है। जिससे हम विरोध करते हैं, हम उससे बंध जाते हैं। और बंधने के कारण हम उस विरोधी के ही एक रूपांतर होते हैं, एक माडी फिकेशन होते हैं।
स्वतंत्रता विद्रोह नहीं है, क्रांति है।
क्रांति की बात ही अलग है। क्रांति का अर्थ है: दूसरे से कोई प्रयोजन नहीं है। हम किसी के विरोध में स्वतंत्र नहीं हो रहे हैं। क्योंकि विरोध में हम स्वतंत्र होंगे, तो वह स्वच्छंता हो जाएगी। हम दूसरे से मुक्त हो रहे हैं--न उससे हमें विरोध है, न हमें उसका अनुगमन है। न हम उसके शत्रु हैं, न हम उसके मित्र हैं--हम उससे मुक्त हो रहे हैं। और यह मुक्ति, पर से मुक्ति, जिस ऊर्जा को जन्म देती है, जिस डायमेंशन को, जिस दिशा को खोल देती है, उसका नाम स्वतंत्रता है।
उस पर हम इधर तीन दिनों में और अनेक-अनेक कोणों से उसे समझने की कोशिश करेंगे।
लेकिन एक बात खयाल में ले लें, स्वतंत्रता किसी का विरोध नहीं है। स्वतंत्रता अपनी उपलब्धि है, किसी का विरोध नहीं है। स्वतंत्रता कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई रिएक्शन नहीं है, बल्कि स्वयं के जीवन का आविर्भाव है।
आप मुझसे कहें कि मैं एक गीत गाऊं और मैं गीत गाऊं, तो मैं आपसे बंधा हूं। आप मुझसे कहें एक गीत गाएं, इसलिए मैं न गाऊं तो भी मैं आपसे बंधा हूं। लेकिन गीत आपकी बिना फिक्र किए--आपके कहने की या न कहने की--मेरे प्राणों से निकले और गूंज उठे तो मैं स्वतंत्र हूं।
स्वतंत्रता मेरे भीतर से आने वाला तत्व है, आप से आने वाला नहीं। और स्वतंत्रता में ही हम आत्मा को जानने में समर्थ हो पाते हैं। क्योंकि स्वतंत्रता सब बाहर के आरोपण, बाहर के आवरण, बाहर की जबर्दस्तियां, बाहर की प्रतिक्रियाएं--इन सबके गिर जाने पर उपलब्ध होती है। और उस स्वतंत्रता की भूमि में ही स्वयं का, निज का, क्रमशः दर्शन उपलब्ध होता है।
स्वतंत्रता के लिए इसलिए मैंने सुबह आप से बात की है।

उसी संबंध में एक मित्र ने और पूछा है।
मैंने कहा कि हम सभी शास्त्रों से स्वतंत्र हो जाएं?

तो शायद उन्हें लगा होगा कि मैं शास्त्रों का विरोधी हूं। शास्त्र तो इतने व्यर्थ हैं कि उनके विरोध करने की भी कोई जरूरत नहीं। विरोध करने से भी उनको बल मिलता है। विरोध भी हम उसका करते हैं, जिसमें कोई जीवन हो, जान हो। छायाओं का कौन विरोध करेगा? प्रतिध्वनियों का कौन विरोध करेगा?
शास्त्रों का मैं विरोधी नहीं हूं, क्योंकि अगर मैं विरोधी हो जाऊं तो मैं शास्त्रों का किसी न किसी रूप में प्रचारक हो गया। क्योंकि विरोध भी प्रचार है। और सच्चाई तो यह है कि आज तक दुनिया में हमेशा विरोध ही प्रचार सिद्ध हुआ है।
क्राइस्ट को अगर कुछ नासमझ यहूदियों ने न मारा होता, तो शायद क्रिश्चिनिटि कहीं भी न होती। वह विरोध प्रचार बन जाता है।
मैं कोई शास्त्र का विरोधी नहीं हूं। शास्त्र इतनी व्यर्थ चीजें हैं कि उनका विरोध मैं क्यों करूंगा। विरोध ही करना होगा, तो और किसी चीज का कर सकता हूं। शास्त्र--बेजान, मुर्दा उनसे क्या विरोध करना है।
जो मैंने कहा, वह इसलिए नहीं कि मैं शास्त्र विरोधी हूं, बल्कि इसलिए कि मैं सत्य का प्रेमी हूं। और सत्य, शब्दों से न कभी मिला है और न मिल सकता है। वे शब्द चाहे वेद के हों, चाहे गीता के, चाहे बाइबिल के, चाहे मेरे, चाहे किसी और के--शब्दों से कभी कोई सत्य उपलब्ध नहीं हो सकता है। सत्य तो वहां उपलब्ध होता है, जहां चित्त निःशब्द हो जाता है। जहां चित्त में कोई शब्द नहीं रह जाते।
तो सभी शास्त्र शब्द हैं। और शब्दों को अगर हम आग्रह से पकड़ेंगे तो हम निःशब्द कभी भी न हो सकेंगे, हम मौन कभी भी न हो सकेंगे। हमारे भीतर से सारे शब्दों की गूंज, अनुगूंज कभी समाप्त न हो सकेगी। गीता गूंजती ही रहेगी, वेद गूंजते ही रहेंगे, उपनिषद गूंजते ही रहेंगे। और ये जो प्रतिध्वनियां हैं हमारे चित्त में, ये कभी हमें उस शून्य को उपलब्ध न होने देंगी, जहां सत्य का साक्षात हो सकता है।
शास्त्रों को पकड़ लेने वाला चित्त फोटोग्राफ की तरह है। कोई कैमरे से आपका चित्र उतार लेता है, तो भीतर जो फिल्म है वह पकड़ लेती है उस चित्र को। पकड़ते से ही व्यर्थ हो जाती है, फिर उसका कोई और उपयोग नहीं रह जाता।
दर्पण पर भी आपका चित्र बनता है, लेकिन दर्पण पकड़ता नहीं है। इसलिए आप हट जाते हैं, दर्पण फिर खाली और मौन हो जाता है। इसलिए दर्पण निरंतर उपयोगी बना रहता है। दर्पण निरंतर जीवित बना रहता है।
फोटोग्राफ एक दफे में खतम हो जाता है। और अगर एक ही फोटोग्राफ पर हम कई चित्र ले लें, तब तो फिर समझना ही मुश्किल हो जाता है कि वहां क्या है।
हमारे चित्त ने बहुत से शास्त्रों को फोटोग्राफ की तरह पकड? लिया है, इसलिए समझना मुश्किल हो गया है कि भीतर क्या है। सब पकड़ लिए गए हैं। और उनकी गूंज की वजह से भीतर जो छिपा है, उसका कोई अनुभव, उसकी कोई प्रतीति नहीं हो पाती है।
मैंने यह नहीं कहा कि आप शास्त्र न पढ़ें। मैंने यह नहीं कहा कि आप शास्त्र न समझें। मैंने यह कहा कि आप दर्पण की तरह हों। उनकी कोई रेखा, उनके कोई शब्द, उनकी कोई गूंज आपके ऊपर न छूट जाए। आप दर्पण की तरह, मिरर की तरह हमेशा खाली हो जाएं तो जीवन को जानने की क्षमता आपकी निरंतर कायम रहेगी। अन्यथा आप शब्दों में जकड़ जाएंगे और जीवन को जानने से वंचित रह जाएंगे।
शब्द छाया से ज्यादा नहीं हैं। अगर मैं रास्ते पर चल रहा हूं, और अगर आप मेरी छाया में ही उलझ जाएं तो निश्चित है कि आप फिर मुझे नहीं देख सकेंगे। मेरी छाया पर ही आपकी आंख होगी तो मुझ पर कैसे आंख हो सकती है? मेरी छाया को आप छोड़ेंगे, तो शायद मुझे आप देख सकें। और मुझे देख सकेंगे, उस दिन आप पाएंगे छाया तो थी ही नहीं, मैं था। छाया तो छाया ही थी, शेडो ही थी, उसमें कोई सबस्टेंस न था।
सभी शास्त्र, जिन लोगों को सत्य अनुभव हुआ, उनकी छाया से ज्यादा नहीं है। उन छायाओं को पकड़ लेंगे आप तो वंचित रह जाएंगे सबस्टेंस से। वंचित रह जाएंगे उससे, जिसकी शास्त्र छाया बने हैं। सत्य के अनुभव की छाया की गूंज शब्दों में रह जाती है। हम उन्हीं को पकड़कर बैठ जाते हैं। जो शास्त्र को पकड़ लेता है, वह सत्य का शत्रु हो जाता है। इसलिए मैंने कहा, शास्त्र से मुक्त हो जाएं, छाया से मुक्त हो जाएं।
कृष्ण ने जो जाना होगा, गीता शायद उसकी छाया है, शेडो है। वही तो नहीं है जो कृष्ण ने जाना था। उसे तो प्राणों से निकालकर बाहर लाने का कोई उपाय नहीं है। जो जाना था, शब्दों में छाया की तरह गूंज गया। और फिर हजारों वर्षों में यह छाया भी खूब विकृत होती चली गई। क्योंकि इन हजारों वर्षों में, हजारों टीकाकार इस छाया के उपलब्ध हो गए।
टीकाकार शास्त्रों की हत्या करने में ऐसे कुशल लोग रहे हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं है। छाया पर, और टीकाकारों की छायाएं सम्मिलित हो गईं। टीकाकारों पर, और भी उनके टीकाकार पैदा हुए। एक-एक ग्रंथ पर टीका पर टीका, और टीका पर टीका होती चली गई। अब हमारे हाथ में--एक छायाओं का स्वप्नजाल हाथ में रह गया। उसी को पकड़कर जो रुक जाएगा, वह सत्य तक नहीं पहुंच सकता।
छाया छोड़नी पड़ेगी और उस दिशा में खोज करनी पड़ेगी, जहां से छाया आती है, जहां से छाया बनती है। अगर हम छाया को छोड़ते चले जाएं उस दिशा में, जहां से छाया का जन्म होता है--तो शायद हम सत्य पर पहुंच जाएं। शास्त्र को पकड़कर कोई सत्य पर नहीं पहुंचेगा। शास्त्र को जितना छोड़ेगा, उतना शास्त्र के पीछे हटेगा। शब्द को छोड़ेगा, निःशब्द की तरफ बढ़ेगा--किसी दिन उसे सत्य उपलब्ध हो सकता है।
शास्त्रों से ज्यादा सत्य के मार्ग में और कोई बाधा नहीं है। लेकिन हमें बड़ी चोट पहुंचती है।
सुबह एक मित्र ने आकर कहा, वेद आप कहते हैं सत्य नहीं हैं?
उन्हें पीड़ा पहुंची होगी। इसलिए नहीं कि वेद सत्य नहीं हैं। बल्कि इसलिए कि वेद उनका शास्त्र है।
एक मुसलमान को कोई चोट न पहुंचेगी इस बात से कि वेद में कुछ भी नहीं है। क्योंकि वेद उसका शास्त्र नहीं है। एक हिंदू को कोई चोट न पहुंचेगी, कह दिया जाए कुरान में कोई सत्य नहीं है। वह प्रसन्न होगा बल्कि कि बहुत अच्छा हुआ कि कुरान में कोई सत्य नहीं, यह तो हम पहले से ही कहते थे। यह तो प्रसन्नता की बात है। लेकिन एक मुसलमान को चोट पहुंचेगी। क्यों? क्या इसलिए कि कुरान में सत्य नहीं है? बल्कि इसलिए कि कुरान उसका शास्त्र है।
शास्त्रों के साथ हमारे अहंकार जुड़ गए हैं, हमारे इगो जुड़ गए हैं। मेरा शास्त्र! शास्त्र की कोई फिक्र नहीं है, मेरे को चोट पहुंचती है।
और बड़ा मजा यह है कि वेद आपका शास्त्र कैसे हो गया? क्योंकि आप एक समूह में पैदा हुए, जहां बचपन से एक प्रपोगेंडा चल रहा है कि वेद आपका शास्त्र है। अगर आप दूसरे समूह में पैदा होते, और वहां प्रपोगेंडा चलता होता कि कुरान आपका शास्त्र है, तो आप कुरान को शास्त्र मान लेते। आप किसी तरह के प्रचार के शिकार हैं।
हम सभी किसी तरह के प्रचार के शिकार हैं। अगर हिंदू घर में पैदा हुए हैं, तो एक तरह के प्रपोगेंडिस्ट हवा में हमको बनाया गया है। जैन घर में पैदा हुए, दूसरी तरह की; ईसाई घर में तीसरी तरह की--रूस में पैदा हो जाएं, तो एक चौथे तरह की हवा में आपका निर्माण होगा। और आप यही समझेंगे कि यह जो प्रचार ने आपको सिखा दिया, यह आपका है।
जब तक आप यह समझते रहेंगे कि प्रचार जो सिखाता है वह आपका है, तब तक आप शास्त्रों से मुक्त नहीं हो सकते। और जो आदमी प्रपोगेंडा और प्रचार से मुक्त नहीं होता, वह कभी सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकता है। और प्रचार के सूत्र एक जैसे हैं--चाहे लक्स टायलेट साबुन बेचनी हो, चाहे कुरान--दोनों में कोई फर्क नहीं है। एडवरटाइजमेंट का रास्ता एक ही है, प्रपोगेंडा का रास्ता और सूत्र एक ही है।
धर्मगुरु बहुत चालाक लोग थे, उन्हें ये सूत्र पहले पता चल गए, व्यापारियों को बहुत बाद में पता चले। रेडियो पर रोज दोहराया जाता है कि सुंदर चेहरा बनाना हो तो फलां-फलां अभिनेत्री लक्स टायलेट का उपयोग करती है। अभिनेत्री के चेहरे में और लक्स टायलेट में एक संबंध जोड़ने की कोशिश की जाती है।
अगर सत्य को पाना हो, तो फलां-फलां ऋषि रामायण को पढ़कर सत्य पा गए। ऋषि में और रामायण में सत्य जोड़ने की कोशिश की जाती है। यह वही कोशिश है, जो अभिनेत्री और लक्स टायलेट में की जाती है। अगर सुंदर होना हो तो, लक्स टायलेट खरीद लीजिए। और अगर सत्य पाना हो, तो फलां-फलां ऋषि ने, फलां-फलां किताब से पाया--आप भी उस किताब को खरीद लीजिए! उसके भक्त हो जाइए!
फिर रोज-रोज दोहराने से--आदमी का चित्त इतना कमजोर है कि रिपिटीशन को वह भूल जाता है कि यह क्या हो रहा है, रोज-रोज दोहराया जाता है। आपको पता भी नहीं है। रास्ते पर निकलते हैं, लक्स टायलेट सबसे अच्छा साबुन है, दरवाजे पर लिखा हुआ है। अखबार खोलते हैं, लक्स टायलेट सबसे अच्छा साबुन है। रेडियो चलाते हैं, लक्स टायलेट सबसे अच्छा साबुन है। रोज-रोज सुनते, जब एक दिन आप बाजार में जाते हैं दुकान पर साबुन खरीदने को, आप कहते हैं मुझे लक्स टायलेट साबुन चाहिए। और आपको पता नहीं कि यह आप नहीं कह रहे हैं, आप से कहलवाया जा रहा है। आपको लक्स टायलेट का पता भी नहीं था।
एक प्रपोगेंडा आपके चारों तरफ हो रहा है और आपके मुंह से, आपके कान में आवाज डाली जा रही है बार-बार, जो कि एक दिन आपके मुंह से निकलनी शुरू हो जाएगी, और आप इस भ्रम में होंगे कि मैंने लक्स टायलेट साबुन खरीदा। आपसे खरीदवा लिया गया है।
और जो लक्स टायलेट के संबंध में सही है; वही कुरान, बाइबिल, वेद, उपनिषद के संबंध में भी सही है। हम अदभुत रूप से प्रचार के शिकार हैं। सारी मनुष्य जाति शिकार है। और इस प्रचार में जितना आदमी बंध जाता है, उतना परतंत्र हो जाता है।
तो मैं शास्त्रों का विरोधी नहीं हूं, लेकिन यह आपको कह देना चाहता हूं कि आपको भी शास्त्रों से कोई मतलब नहीं है। आप सिर्फ प्रचार के शिकार हो गए हैं, और कुछ भी नहीं है।
आपके घर में, हिंदू घर में एक बच्चा पैदा हो, उसको मुसलमान के घर में रख दीजिए। वह बड़े होने पर वेद को ईश्वरीय वाणी नहीं कहेगा, हालांकि हिंदू घर में पैदा हुआ था, खून हिंदू था। सच तो यह है कि पागलपन की बातें हैं। खून भी कहीं हिंदू होता है? कि हड्डियां हिंदू होती हैं, मुसलमान होती हैं? हिंदू होना भी एक प्रचार है। वह मुसलमान घर में रखा गया, मुसलमान हो जाएगा। ईसाई घर में रखा गया, ईसाई हो जाएगा।
इसीलिए सभी धर्मगुरु बच्चों में बहुत उत्सुक होते हैं। स्कूल खोलते हैं, धर्म-स्कूल खोलते हैं, क्योंकि बच्चे मौका हैं, जहां प्रचार को दिमाग में डाला जा सकता है, और जीवनभर के लिए उन्हें गुलाम बनाया जा सकता है। जब तक जमीन पर एक भी ऐसा स्कूल है, जो धर्म की शिक्षा देता है, तब तक जमीन पर बहुत बड़े पाप चलते रहेंगे; क्योंकि बच्चों को जकड़ने की, गुलाम बनाने की वहां सारी योजना की जा रही है।
तो मैंने जो कहा, इसलिए नहीं कहा कि किन्हीं किताबों से मुझे कोई दुश्मनी है, मुझे किताबों से क्या लेना-देना। लेकिन सच्चाइयां तो समझ लेनी जरूरी हैं।

उन्हीं मित्र ने, एक और मित्र ने पूछा है, कि हमारे संत-महात्मा, ऋषि-मुनि जो कहते हैं, क्या वह सब गलत है?

मैंने तो नहीं कहा कि वह सब गलत है। मैंने तो इतना ही कहा कि आप उसे पकड़ लें, तो यह पकड़ लेना गलत है। ऋषि-मुनियों से मुझे कोई वास्ता नहीं। क्योंकि ऋषि-मुनि बड़े खतरनाक होते हैं, उनसे वास्ता रखना खतरनाक है। अभी हिंदुस्तान के ऋषि-मुनि और शंकराचार्य हाइकोर्टों में मुकदमा लड़ते हैं। उनसे दोस्ती रखना, उनकी बात ही करना खतरनाक है।
लेकिन आप किसको ऋषि कहने लगते हैं, किसको मुनि कहने लगते हैं, और कैसे? और कैसे आप पता लगा लेते हैं? आपके पास जांच क्या है? मापदंड क्या है? आपके पास कसौटी क्या है कि फलां आदमी ऋषि है और मुनि है? सिवाय प्रपोगेंडा के और तो कोई कसौटी नहीं मालूम पड़ती।
रामकृष्ण को हिंदू तो कहेंगे कि परमहंस हैं। लेकिन किसी जैन से पूछें? वे कहेंगे, कैसे परमहंस? मछली खाते हैं! उसकी कसौटी में बिलकुल न उतरेंगे। वे कहेंगे, इनसे तो एक साधारण जैनी अच्छा, कम से कम मछली तो नहीं खाता, मांसाहार तो नहीं करता। ये कैसे संत! ये किस प्रकार के संत हैं?
अगर एक दिगंबर जैन से पूछो कि क्राइस्ट ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं। वे कहेंगे, कैसे उपलब्ध हो गए हैं? महावीर तो नग्न खड़े हुए हैं, यह आदमी तो कपड़े पहने हुए है! तो कपड़े पहने हुए आदमी भी कहीं ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है! झूठी है यह बात। यह नहीं हो सकता।
कसौटियां भी हमारे हजारों साल के प्रचार से निर्मित हो गई हैं। और जिसको बचपन से जो कसौटी पकड़ गई है, वह उसी पर तौल रहा है कि कौन ऋषि है, कौन मुनि है! अपना हमें पता नहीं कि हम क्या हैं! और हम यह भी तय कर लेते हैं कि कौन ऋषि है, कौन मुनि है, कौन परमहंस है, कौन ज्ञानी है! और झगड़ते भी हैं इस बात पर कि फलां आदमी तीर्थंकर है, और फलां आदमी भगवान का अवतार है, फलां आदमी ईश्वर का पुत्र है। और अगर कोई इनकार कर दे तो यह झगड़े की बात है! कैसे आप पता लगा लेते हैं, किसने आपको बताया?
मेरे एक मित्र थे। एक छोटे-मोटे महात्मा थे वे भी। ऐसे महात्मा हमारे यहां होते ही हैं। वे एक गांव में चंदा मांगने गए थे। मैं भी उस गांव में था। उन्होंने चंदा दिनभर मांगा, वे कोई पंद्रह-बीस रुपए मुश्किल से इकट्ठा कर पाए। वे मुझसे बोले कि इससे ज्यादा तो कुछ होता नहीं। मैंने कहा, आप बिलकुल गलत ढंग से चंदा वसूल करते हैं--आपको कौन चंदा देगा? पहले ऋषि-मुनि हो जाइए, फिर चंदा मिल सकता है।
मैंने उनसे कहा, दस-पंद्रह लोगों को पहले कहिए कि एक महात्मा जी आए हुए हैं। सारे गांव में खबर करिए कि महात्मा जी आए हैं। फिर दस-पच्चीस लोग आपके साथ जाएं कि महात्मा जी आए हैं, फिर चंदा हो सकता है।
उनको बात समझ में आ गई। उनके दस-पंद्रह लोगों ने गांव में प्रचार किया कि एक बहुत बड़े महात्मा आए हुए हैं। जिन दुकानों पर उनको चार आने बामुश्किल से दुकानदार ने दिए थे, इसलिए ताकि ये यहां से हटें, उसी दुकान पर उनको बहुत रुपए भी मिले, उसने पैर भी छुए, उनके गले में माला भी डाली! वे तो...उन्होंने दो-चार-आठ दिन में वहां सैकड़ों रुपए इकट्ठे किए।
तो मैंने उनसे कहा, आदमी को रुपए नहीं मिलते, ऋषि-मुनि को मिलते हैं। और ऋषि-मुनि प्रपोगेंडा के बिना तैयार नहीं होता, उसको तैयार करना पड़ता है। उसकी हवा फैलानी पड़ती है, उसका प्रचार करना पड़ता है, उसको बताना पड़ता है कि ये महात्मा हैं, परम-ज्ञानी हैं; यह है, वह है। और जैसे लक्स टायलेट को बनाना पड़ता है, वैसे उसको बनाना पड़ता है।
प्रचार के इस खेल को, इस जाल को--समझदार आदमी को अपने चित्त से तोड़ देना चाहिए।
मार्क ट्वेन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं एक बहुत बड़े नगर में बोलने गया। कुछ मित्रों से गपशप करने में सांझ हो गई, बोलने का वक्त करीब आ गया और मैं उस दिन भूल ही गया दाढ़ी बनाना तो मैं एक नाईबाड़े में गया। नाई दुकान बंद ही कर रहा था। मैंने उससे कहा कि भाई एक दो क्षण रुक जाओ, मेरी दाढ़ी बना दो। उसने कहा, क्षमा करिए, मैं मार्क ट्वेन का भाषण सुनने जा रहा हूं। और मेरे मन में इतना आदर है उस व्यक्ति के लिए कि अब मैं एक क्षण भी यहां नहीं रुक सकता। अगर वहां देर से पहुंचा तो शायद हाल के बाहर ही खड़ा रहना पड़े, या भीतर भी घुस जाऊं तो खड़ा रहना पड़े। मैं जल्दी ही जाना चाहता हूं। आप क्षमा करें, आप कहीं और बाल बनवा लें।
मार्क ट्वेन ने कहा, ठीक ही कहते हो, यह मार्क ट्वेन का बच्चा जहां भी भाषण करता है, वहां जो लोग देर से पहुंचते हैं, उनको तो खड़ा रहना ही पड़ता है, लेकिन मुझे हमेशा ही खड़ा रहना पड़ता है। उसने कहा, मार्क ट्वेन का बच्चा! मार्क ट्वेन ने कहा, तो उस नाई को गुस्सा आ गया। उसने कालर पकड़ लिया। और उसने कहा, सम्हलकर बोलो। मार्क ट्वेन का मैं बहुत आदर करता हूं, इस तरह नहीं बोल सकते हो।
मार्क ट्वेन ने लिखा है--कि मैं खुद ही मार्क ट्वेन हूं, वह मेरा गला पकड़ लिया। लेकिन मार्क ट्वेन और ही बात है उसके मन में। वह एक प्रपोगेंडा और है, उससे इस आदमी का क्या संबंध?
जिन ऋषि-मुनियों की आप रोज पूजा करते हैं--आरती, वे अगर सड़क पर मिल जाएं, तो दो पैसा भी शायद ही आप उनको दें। बल्कि हो सकता है, पुलिस में रिपोर्ट करवा दें कि यह आदमी धोखा दे रहा है। जिसकी हम पूजा करते हैं, वह आदमी कहीं सड़क पर भीख मांग सकता है! यह धोखेबाज है कोई। एक प्रपोगेंडा होता है, एक हवा होती है।
चर्चिल ने लिखा है कि मैं एक दफा रेडियो से बोलने को था। एक स्टेशन पर उतरा। एक टैक्सी-ड्राइवर को कहा कि जल्दी मुझे रेडियो स्टेशन पहुंचा दो। उसने कहा, माफ करिए, मेरा प्यारा नेता चर्चिल आज रेडियो से बोलने को है। मैं अपने घर जा रहा हूं, रेडियो पर उसका भाषण सुनूंगा, आप कहीं और कोई टैक्सी कर लें।
चर्चिल बहुत खुश हुआ। इतना आदर एक टैक्सी-ड्राइवर भी उसका करता है। उसने खीसे में हाथ डाला, पांच पौंड के नोट निकालकर टैक्सी-ड्राइवर के हाथ में दिए--इनाम के तौर कि यह मेरा इतना आदर करता है। टैक्सी-ड्राइवर ने कहा, भाड़ में जाए चर्चिल! मालिक तुम पीछे बैठो, और जहां चलना हो चलो।
चर्चिल को खयाल भी नहीं था कि यह पांच पौंड देने का यह फल होगा। चर्चिल से क्या लेना-देना है? चर्चिल का एक इमेज बना हुआ है, वह अलग ही है। इस आदमी से क्या मतलब?
प्रचार प्रतिमाएं खड़ी कर देते हैं, और फिर हम उनको हजारों साल तक पूजते रहते हैं। और जितना प्रचार लंबा होता जाता है, उतनी ही वे प्रतिमाएं दुर्गम होती जाती हैं, आकाश उठने लगती हैं। फिर वह आदमी नहीं रह जाते, धीरे-धीरे परमात्मा हो जाते हैं; भगवान, अवतार हो जाते हैं; और न मालूम क्या। और उनके इतने पागल भक्त पीछे होते हैं कि कोई शक करे तो जिंदगी खतरे में डाले। तो कौन कहे?
लेकिन बड़ी हैरानी है कि कभी हम सोचते भी नहीं कि हम निर्णायक कैसे हो जाते हैं कि कौन संत, कौन साधु? और फिर एक सरकुलर रीजनिंग शुरू होती है। मैं कुछ कहूंगा, तो आप कहेंगे, यह तो हमारे साधुओं ने नहीं कहा तो यह ठीक नहीं हो सकता। और अगर मैं पूछूं कि इनको आप साधु क्यों कहते हैं? तो आप कहेंगे, जो उन्होंने कहा, वह बिलकुल ठीक है, इसलिए हम उनको साधु कहते हैं।
साधु उनको इसलिए कहते हैं कि जो उन्होंने कहा, वह बिलकुल ठीक है? और जो उन्होंने कहा, वह बिलकुल ठीक होना ही चाहिए, क्योंकि वे साधु हैं? इस सारे चक्कर में आदमी का मन अत्यंत मूढ़तापूर्ण हो गया है।
तो मैंने जो सुबह आपसे कहा, वह इसलिए कहा कि चित्त की इस पूरी स्थिति पर सोचिए, विचार करिए कि हमारा चित्त क्या कर रहा है। हम कहीं प्रचार के शिकार तो नहीं हैं? हजारों वर्ष से चलने वाली, बार-बार दोहराई जाने वाली बातों के हम केवल गुलाम तो नहीं हैं? हमने भी कभी कुछ सोचा है, खोजा है, विचारा है--कोई कण भी हमारे अपने चिंतन का फल है, या कि हम केवल दोहराने वाले लोग हैं?
जब तक हम इस भांति दोहराने वाले लोग रहेंगे, तब तक कुछ कनिंग माइंडस, कुछ चालाक लोग हमारा शोषण करते ही रहेंगे। उन्होंने तरकीब पा ली है--वे दोहराने का उपाय जानते हैं। वे दोहराते हैं तरकीब से, प्रचार करते हैं और हम उसमें जकड़ जाते हैं।
आदमी को इस चुकता प्रचार के बाहर हो जाना चाहिए, तो ही वह आदमी धार्मिक हो सकता है। क्योंकि धार्मिक आदमी चिंतन करता है, सोचता है, अनुभव करता है--अंधे होकर मान नहीं लेता है। और हम सब अंधे हैं। हमने अंधे होकर सब बातें मान ली हैं।
इस निरंतर मानने का यह फल हुआ है कि हमारे भीतर जानने की, जिज्ञासा की हत्या हो गई। क्योंकि जानना तो तभी शुरू हो सकता है, जब हम मानने पर थोड़ा शक करें, संदेह करें, मानने को इनकार करें। कह दें अपने मन से कि हम नहीं मानेंगे--हम जानना चाहते हैं, हम खोजना चाहते हैं। अगर इतना बल और हिम्मत दिखाएं, तो शायद किसी दिन आप भी जान सकें, अन्यथा नहीं जान सकते।
और एक आदमी इस जाल में होता, तो कोई कठिनाई भी न थी। पूरे मनुष्य का मन इस जाल में ग्रसित है और यह जाल हटता नहीं, क्योंकि जाल के ठेकेदार और दावेदार बड़े फायदे में हैं इस जाल की वजह से। उनका बड़ा हित है, बड?ी उन्हें सुविधा है और उन्होंने हजारों वर्ष की जो दुकान लगा ली, उसकी बड़ी क्रेडिट है, उसका--उसका वे पूरा फायदा ले रहे हैं। तो कौन इसे तोड़ेगा?
और नहीं यह टूटेगा तो आदमी जैसा अब तक जीया है गुलाम, आगे भी उसे गुलाम ही जीना पड़ेगा। अब तक बहुत खतरा न था इस गुलामी से। अब खतरे बहुत बढ़ गए हैं, क्योंकि व्यापारियों को भी पता चल गया, राजनीतिज्ञों को भी पता चल गया कि आदमी को फंसाने के बड़े आसान रास्ते हैं। अब वे सब यही उपयोग कर रहे हैं।
हिटलर ने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट ही लिखा है कि मैंने बहुत दिनों के अनुभव से यह जाना कि सत्य और असत्य में एक ही फर्क है। जो असत्य बहुत बार जनता के सामने दोहराया जाता है, वह सत्य हो जाता है। बस बार-बार दोहराने का सवाल है। फिक्र न करो, दोहराए चले जाओ, दोहराए चले जाओ। धीरे-धीरे वह मन भूल जाएगा कि यह बात सच थी। बार-बार सुनने से, परिचित होने से, खुद ही भूल जाएगा। यहां तक होता है कि जो आदमी खुद प्रचार करता है, जब बात बहुत प्रचारित हो जाती है, तो वह खुद शक में आ जाता है कि कहीं यह सच तो नहीं है।
ऐसा मैंने सुना है, एक दफे ऐसी घटना हो गई।
एक आदमी जो कि एक बहुत बड़ा विज्ञापन सलाहकार था, एक्सपर्ट था एडवरटाइजमेंट का, वह मरा। वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंचा। ईसाइयों का स्वर्ग रहा होगा। सेंट पीटर वहां दरवाजे पर होते हैं। तो सेंट पीटर ने कहा, महाशय तुम हो कौन? उसने कहा, मैं एक विज्ञापन का विशेषज्ञ हूं। सेंट पीटर ने कहा, विज्ञापन वाले लोगों का कोटा स्वर्ग का पूरा हो गया, पच्चीस आदमियों से ज्यादा हम नहीं लेते। तो आपको दूसरी जगह जाना पड़ेगा। और दूसरी जगह यानी नरक। पच्चीस हो गए।
उस विज्ञापनदाता ने कहा कि सेंट पीटर, तुम्हारे हम अखबारों में फोटो छपवा देंगे, कोई रास्ता नहीं हो सकता, कोई उपाय नहीं हो सकता कि मैं इसी जगह आ जाऊं? सेंट पीटर ने कहा, फोटो बड़े छपवाने पड़ेंगे, ठीक से। रास्ता बन सकता है। चौबीस घंटे का मैं तुम्हें मौका देता हूं। तुम पच्चीस विज्ञापनदाताओं में से किसी एक को राजी कर लो कि तुम्हारी जगह वहां चला जाए, तुम यहां आ जाओ।
उसने कहा, चौबीस घंटे! चौबीस घंटे बहुत हैं। वह आदमी भीतर गया। उसने जाकर पूरे स्वर्ग में अफवाह उड़ानी शुरू की कि नरक में एक बहुत नया अखबार निकल रहा है, उसके लिए बहुत अच्छे विज्ञापन एक्सपर्टस की जरूरत है। शैतान ने एक बहुत ही बड़ी एजेंसी खोली हुई है, विज्ञापन की। सब जगह उसने अफवाह उड?ा दी। दूसरे दिन चौबीस घंटे पूरे होने पर वह सेंट पीटर के पास गया। उसने कहा कि भाई कुछ हुआ? उसने कहा, क्या आश्चर्य कर दिया! तुमने तो हैरानी कर दी। पच्चीस ही चले गए।
वह आदमी बोला, पच्चीस ही चले गए! उसने कहा, माफ करो, मैं भी जाता हूं। अफवाहों का कोई भरोसा नहीं, सच भी हो सकती है बात। जब पच्चीस चले गए तो मैं भी अब जाता हूं, मैं भी यहां नहीं रह सकता हूं।
कमजोर है हमारा मन। बार-बार दोहराने से--खुद भी आदमी झूठ को बार-बार दोहराए, कुछ दिनों में वह खुद ही भूल जाता है कि मैंने इसकी यात्रा झूठ की तरह शुरू की थी। वह सच हो जाता है। मनुष्य के सामने हजारों सत्य इसी भांति खड़े हुए हैं, जो असत्य हैं और प्रचार ने जिन्हें सत्य की गरिमा दे दी है।
सच तो यह है, सत्य का कोई प्रचार ही नहीं हो सकता है। प्रचार मात्र असत्य का हो सकता है। सत्य का तो अनुभव करना होता है। प्रचार का कहां उपाय है? सत्य को तो एक-एक व्यक्ति को स्वयं ही जानना होता है, दूसरे के प्रचार से कोई सत्य को कभी नहीं जान सकता।

एक मित्र ने पूछा है कि अगर यह बात सच है, तो फिर मैं क्यों बोल रहा हूं, क्यों बोलता हूं?

मैं सत्य का प्रचार नहीं कर रहा हूं। केवल असत्य का प्रचार है, इस बात की आपको खबर दे रहा हूं। एक कांटा लग जाता है, दूसरे कांटे से उसे निकाल देते हैं। दूसरा कांटा खतरनाक तब होता है, जब पहले घाव में उस दूसरे को हम रख लें तब खतरनाक होता है, नहीं तो खतरनाक नहीं है। एक कांटा निकाला, दूसरा जिसने निकाला, वह भी निकालते ही से बेकार हो गया। उसको भी फेंक देंगे। ऐसा थोड़े ही करेंगे कि यह बड़ा परोपकारी कांटा है, इसने एक कांटा निकाला तो इसको पैर में लगा लें।
तो, मेरी बात एक असत्य को निकालने की चेष्टा से ज्यादा नहीं है--वह एक कांटा भर है। दूसरा भी कांटा है, यह भी कांटा है। उस कांटे को निकालने के साथ ही यह कांटा भी बेकार हो जाता है। अगर इसको ले जाकर मंदिर बना लें...इस कांटे का, तो आप पागल हैं। उसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। उस कांटे के निकलते ही यह कांटा भी बेकार हो जाता है। फिर जो स्थिति आपको उपलब्ध होगी, वह मुझसे उपलब्ध नहीं हो रही, न किसी और से। वह तो समस्त प्रपोगेंडा, परतंत्रता से मुक्त हो जाने पर चित्त अपनी सहज गति करता है सत्य की ओर।
असत्य से मुक्त हो जाएं--सत्य तो आपका स्वरूप है। असत्य से मुक्त हो जाएं--सत्य तो आपका निज घर है। असत्य से मुक्त हो जाएं। असत्य को देख लें असत्य की भांति, फिर सत्य तक पहुंचने में कोई भी कठिनाई नहीं है। आप पहुंचे ही हुए हैं। असत्य को, जो फाल्स है, उसको फाल्स की तरह देख लेना, असत्य की तरह देख लेना, सत्य के खोजी के लिए बड़ी अनिवार्य भूमिका है। इसलिए मैंने सुबह ये बातें आपसे कहीं।
और भी कुछ प्रश्न पूछे हैं, उनकी रात आपसे चर्चा करूंगा। एक छोटे से प्रश्न का उत्तर, और शाम की यह चर्चा पूरी होगी।

एक मित्र ने पूछा है कि आपने जो ध्यान की विधि कही, उसमें और एकाग्रता के हमेशा से चलने वाले मार्ग में क्या फर्क है?

बहुत फर्क है। जितना फर्क हो सकता है, उतना फर्क है।
एकाग्रता चित्त का श्रम है। एकाग्रता का मतलब है, कंसनट्रेशन का--किसी एक चीज पर चित्त को जबर्दस्ती रोकना, शेष सारी चीजों पर चित्त को बंद करना, केवल एक चीज पर खोलना। चाहे नाम पर, चाहे मूर्ति पर, चाहे शब्द पर, चाहे किसी और प्रतीक पर, कोई सिंबल पर। एक पर मन को रोकना और शेष सबके प्रति मन को बंद करना।
यह मन के स्वभाव के प्रतिकूल है। यह जबर्दस्ती है। इस जबर्दस्ती में चित्त पर तनाव पैदा होगा, श्रम होगा, स्ट्रैन होगा, परेशानी होगी। और परेशानी के दो फल हो सकते हैं। अगर चित्त बहुत परेशान हो जाएगा तो बचने के दो उपाय हैं। या तो चित्त सो जाए तो परेशानी से छुटकारा हो जाता है। और या चित्त पागल हो जाए तो भी परेशानी से छुटकारा हो जाता है।
कंसनट्रेशन या तो नींद में ले जा सकता है, या पागलपन में। और कहीं भी नहीं ले जा सकता। जो अनेक साधु पागल होते देखे जाते हैं, उसका कोई और कारण नहीं है। लेकिन हम तो अजीब ही लोग हैं। हम कहते हैं ईश्वर का उन्माद चढ़ गया है, ईश्वर के आनंद में मस्त हो गए हैं! हो गए हैं पागल। और या चित्त सो जाता है। क्योंकि चित्त को ज्यादा हम परेशान करें तो फिर चित्त परेशानी से ऊब जाता है और नींद में चला जाता है, वह उसकी एस्केप है।
तो, अनेक लोग जो माला-वाला जपते रहते हैं, अक्सर गहरी नींद में सोए रहते हैं। राम-राम जपते रहते हैं, उससे नींद अच्छी आती है। उतनी देर नींद अगर आ जाती है तो उन्हें अच्छा लगता है। क्योंकि उतनी देर सब भूल जाता है। जहां सब भूल जाता है, वहां दुख, चिंताएं भी भूल जाती हैं। दुख, चिंताओं का भूल जाना--परमात्मा को, आनंद को, या सत्य को पा लेना नहीं है। वह तो शराब पीने वाला भी यही कर रहा है; दुख, चिंताओं को भूल रहा है।
तो कंसनट्रेशन, एकाग्रता, चित्त की जबर्दस्ती से, चित्त को या तो निद्रा में और या असंतुलन में ले जाने का उपाय है। इस पर हम कल सुबह जब ध्यान के लिए बात करेंगे, तो और विचार कर सकेंगे।
लेकिन जिसे मैं ध्यान कह रहा हूं, वह कंसनट्रेशन नहीं है, वह एकाग्रता नहीं है। वह केवल सहज जागरूकता है। जागरूकता का अर्थ एक चीज के प्रति नहीं, समस्त के प्रति केवल जागे हुए होना है। और जागरूकता का कोई भी उपाय नींद में ले जाने वाला नहीं हो सकता है। क्योंकि जागरूकता नींद से बिलकुल विपरीत दिशा है। और चूंकि जागरूकता में कोई तनाव, कोई टेंशन का कोई कारण नहीं है। क्योंकि तनाव तब पैदा होता है, जब हम चुनाव करते हैं। जब हम चुनाव ही नहीं करते और सब चीजों के प्रति सरलता से जागते हैं; कोई दबाव नहीं डालते मन पर, तो मन के विक्षिप्त होने का भी कोई कारण नहीं है।
मन स्वस्थ होता है जागरूकता से। और जो जागरूकता को उपलब्ध हो जाता है, उसके चित्त में न तो चंचलता रह जाती है। और चंचलता न रह जाने के कारण एकाग्र करने की कोई जरूरत भी नहीं रह जाती। उसका चित्त तो सहज ही किसी भी चीज पर पूरे रूप से जाग जाता है।
एकाग्रता की जरूरत ही इसीलिए पड़ती है कि हमारा चित्त एक चीज पर जाग नहीं पाता, इसलिए हम सब तरफ से सुलाकर एक तरफ जगाने की कोशिश करते हैं।
इस पर हम कल सुबह और विचार कर सकेंगे। आपके और जो प्रश्न हों, वे आप पहुंचा देंगे, रात हम उनकी बात करेंगे। और रात्रि उस चर्चा के बाद, हम रात्रि के ध्यान के लिए बैठेंगे।
दोपहर की यह बैठक समाप्त हुई।

आज इतना ही।
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक १९-१०-६७ दोपहर