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रविवार, 26 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-09



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 19 सितम्‍बर सन् 1975,                         
श्री ओशो आश्रम पूना।
नौवां –प्रवचन-(भीतर के मल धोई)

सूत्र:
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
झूठा सांचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सबके कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
सांचे का साहब धनी, समरथ सिरजनहार।
पाखंड की यह पिर्थवी, परपंच का संसार।।
पाखंड पीव न पाइए, जे अंतर सांच न होई।
ऊपर थैं क्यों ही रहौ, भीतर के मल धोई।।
जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।।


ए क शब्द है हमारे पास: नीति। उसे ठीक से समझ लेना जरूरी है।
नीति है ऐसा आचरण, जो हमारे भीतर से नहीं उपजता, जिसे हम दूसरे को दिखाने के लिए करते हैं; जिसकी जड़ें हमारे भीतर अंतरात्मा में नहीं होतीं, जिसे हम ऊपर से ओढ़ते हैं; जिससे हम भिन्न होते हैं। न केवल भिन्न, बल्कि विपरीत होते हैं। जिससे हमारा कोई तालमेल नहीं होता, लेकिन सम्मान के लिए, समादर के लिए, आस-पास की भीड़ को राजी करने के लिए, समूह के लिए उसे हम अपने ऊपर ओढ़ते हैं। नीति ओढ़ी गई घटना है।
एक तो फूल हैं, वृक्षों में लगते हैं। उन फूलों का संबंध जड़ों से होता है, भीतर भूमि से होता है, ऊपर आकाश के सूरज से होता है, चांदत्तारों से होता है। फिर ऐसे भी फूल हैं प्लास्टिक के कि तुम उन्हें वृक्षों पर लटका दो, शायद दूर से गुजरने वालों को धोखा भी दे दें, लेकिन वे फूल वृक्ष में नहीं लगे होते, ऊपर से चिपके होते हैं।
नीति प्लास्टिक के फूलों जैसी है। उससे तुम्हारे और समाज के बीच सुविधापूर्ण संबंध निर्मित हो जाएंगे, लेकिन तुम्हारे और परमात्मा के बीच सब संबंध टूट जाएंगे। जिसने समाज को बहुत ज्यादा ध्यान दिया वह आत्मा से वंचित हो जाएगा।
नीति अगर सड़ जाए तो राजनीति का जन्म होता है। नीति अपने आप में झूठ पाखंड है, लेकिन उसका भी सबसे सड़ा हुआ रूप, सबसे विकृत रूप राजनीति है। जैसे कि प्लास्टिक के फूल भी सड़ गए। राजनीति का अर्थ है, तुम्हें कुछ प्रयोजन ही नहीं है उससे, तुम जो कर रहे हो। तुम्हारे लक्ष्य कुछ और हैं। तुम करते कुछ और हो, तुम चाहते कुछ और हो। तुम्हारा सारा आचरण साधन की भांति है, साध्य नहीं। तुम मुस्कुराते हो, अगर तुम्हें वोट लेनी है। तुम उपेक्षा से भर जाते हो, अगर वोट मिल गई। तुम्हारी मुस्कुराहट भी झूठी है। तुम्हारी मुस्कुराहट भी सहज नहीं है, क्षण की घटना नहीं है, वास्तविक नहीं है। उसके पीछे भी लक्ष्य है, साधन है। तुम मुफ्त में मुस्कुराते भी नहीं। उसके पीछे भी लोभ है। तुम मुस्कुराते हो कुछ पाने को। तुम भला व्यवहार करते हो कुछ पाने को। तुम्हारा व्यवहार वेश्या की भांति है।
राजनीतिज्ञ वेश्या का पूरा का पूरा प्रतिबिंब है। वेश्या प्रेम नहीं करती, फिर भी प्रेम दिखलाती है। नजर उसकी जेब पर लगी है। अगर जेब खाली हो, उसकी मुस्कुराहट खो जाएगी। वह तुम्हारे लिए नहीं हंसती थी, तुम्हारी जेब के लिए हंसती थी। तुम्हारी जेब भरी है, वह पांव में बिछ जाएगी। तुम्हारी जेब खाली है, तुम बाहर निकाल दिए जाओगे। वह तुम्हें पहचानेगी भी नहीं। तुमसे उसका कोई संबंध नहीं बनता। तुम्हारी तिजोड़ी से भला उसका संबंध हो, तुम्हारे हृदय से कोई संबंध नहीं होता। इसलिए तो वेश्या को हमने सबसे ज्यादा पतित माना है। वह अपने व्यक्तित्व को बेचती है, अपनी मुस्कुराहट को, अपने हृदय को, अपने प्रेम को।
राजनीतिज्ञ वेश्या जैसा है। उससे भी बदतर है। उसका सारा जीवन ही व्यवसाय है। वह जो भी करता है, यही ध्यान में रख कर करता है कि इसका परिणाम क्या होगा? आखिरी अंततः पद की दौड़ में कितना लाभ इससे मुझे मिलेगा? मनुष्य उसे मनुष्यों जैसे नहीं दिखाई पड़ते--सीढ़ियां हैं, जिन पर चढ़ना है। और जिनको चढ़ कर भूल नहीं जाना, जिनको चढ़ कर मिटा भी देना है। क्योंकि जिस सीढ़ी से तुम चढ़े हो, उसी से तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी भी चढ़ सकते हैं। सीढ़ी पर चढ़ कर उसे मिटा देना है, गिरा देना है, ताकि वह सीढ़ी बची न रह जाए। अन्यथा पीछे से तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी भी उन्हीं सीढ़ियों से चढ़ कर तुम्हारे पास पहुंच जाएंगे।
तो राजनीतिज्ञ चढ़ता है सीढ़ियों से और खोदता चलता है। वह जिन नावों में सवार होता है, उन्हीं को डुबाता चलता है। क्योंकि खतरा है। वे नावें खतरनाक हैं। नावों को किससे क्या प्रयोजन है! तुम्हें ले आईं राजधानी तक, दूसरों को ले आएंगी।
उसका सारा आचरण अहंकार की पूजा के लिए समर्पित है। वह सिंहासनों पर होना चाहता है, समादर चाहता है।
लेकिन ध्यान रखना, नीति में भी वह बीज तो छिपा ही हुआ है।
तुम मनुष्यों को दो प्रकार में बांट सकते हो। एक, जो समाधि चाहते हैं, समाधान चाहते हैं। और दूसरे, जो सम्मान चाहते हैं, समादर चाहते हैं। जो समाधि चाहता है, उसे तो भीतर की यात्रा पर जाना होगा। जो सम्मान-समादर चाहता है, उसे दूसरों की आंखों के इशारों को समझना होगा। उसे दूसरों के इशारों पर नाचना होगा। क्योंकि दूसरे तभी तुम्हें आदर देंगे जब तुम उनकी धारणाओं के अनुकूल होओगे। वे तुम्हें तभी आदर देंगे जब तुम मरी हुई प्रतिमा की तरह होओगे--भला संगमरमर की सही! जब तुममें अपने जीवन की कोई झलक भी न होगी। जब तुमसे कोई भी खतरा न होगा तुम्हारे व्यक्तित्व के प्रकट होने का। जब तुम एक आदर्श मात्र होओगे, आत्मा न होगी तुम्हारे भीतर। तुम एक लाश की भांति होओगे--सजी-संवरी, आभूषणों से लदी, लेकिन तुम्हारी श्वास न चलती होगी। क्योंकि जब भी तुम्हारी श्वास चलेगी तभी खतरा है। जहां श्वास है वहां स्वतंत्रता है। जहां स्वतंत्रता है वहां तुम समाज के बाहर और समाज के विपरीत भी जा सकते हो।
इसलिए समाज मरे-मराए आदर्शों में भरोसा करता है। वह तुमसे चाहता है कि तुम आदर्श पूरे कर दो, तुम्हारा भी सम्मान है। ध्यान रखना, समाज को तुम्हारे सम्मान से मतलब नहीं, उसके अपने आदर से है। अगर तुम उनके अनुकूल बैठ जाओ, अगर तुम उनके तराजू पर तुल जाओ, अगर तुम उनकी कसौटी पर ठीक पड़ जाओ, तो तुम्हारा सम्मान है। समाज को तुमसे कुछ लेना-देना नहीं है। समाज की अपनी धारणाएं हैं, जो उसकी आंतरिक सुरक्षा के लिए नियत की गई हैं।
तुम्हें भी समाज से कुछ मतलब नहीं है। तुम्हें अपना सम्मान चाहिए। समाज के साथ व्यक्ति के सारे संबंध झूठे होते हैं। दोनों अपना-अपना लाभ देख रहे हैं। व्यवसाय का संबंध है।
नीति का अर्थ है, व्यक्ति की सारी आकांक्षा सम्मान की है। तुम अपने बच्चों को भी समझाते हो, तुम्हारे माता-पिता ने भी तुम्हें समझाया था--कि अगर सम्मान चाहते हो, ईमानदार बनना।
लेकिन सम्मान चाहने के लिए बनी गई ईमानदारी कितनी ईमानदारी हो सकती है! बात बीज से ही झूठ हो गई। अगर अपमान मिलता हो तब? तब ईमानदार होना या नहीं होना? तब जरा खतरा है।
सम्मान चाहते हो तो ईमानदार होना। लेकिन चाह सम्मान की है। सम्मान यानी अहंकार की पूजा और प्रतिष्ठा चाहते हो। अहंकार से ईमानदारी का क्या संबंध हो सकता है?
समाज ने सिखाया है कि अगर पूजा चाहते हो तो सच्चे होना। अगर पूजा चाहते हो तो आचरणवान होना।
लेकिन पूजा की चाह ही तो सबसे बड़ा दुराचरण है। तो तुम दुराचरण की सेवा में आचरण को संलग्न कर रहे हो। तुमने झुठला दिया व्यक्ति को प्रारंभ से ही।
तुमने अहंकार के आधार पर ही सारी व्यवस्था खड़ी की है। और जब भी व्यक्ति पाता है, अपमान मिल रहा है, तब अहंकार को चोट लगती है। तब वह फिर सम्मान को पाने की चेष्टा शुरू कर देता है। जितना ज्यादा सम्मान मिलता जाता है, उतना ही अहंकार पूजित होता चला जाता है। और अहंकार जितना भरता है, उतने स्वयं से संबंध टूट जाते हैं। अहंकार तुम्हारी तुमसे ही दूरी का नाम है। तुम कितने अपने घर से दूर निकल चुके हो, उस फासले का नाम ही अहंकार है।
एक दूसरे तरह का व्यक्ति है, जो समादर नहीं चाहता, समाधान चाहता है। जो चाहता है कि मेरे भीतर एक अपूर्व शांति हो। मेरे भीतर एक आनंद की वर्षा हो। जो चाहता है कि मैं जीवन की कृतकृत्यता को उपलब्ध हो जाऊं। कि मैं जान लूं जीवन क्या है। कि मेरा जीवन ऐसे ही न खो जाए। व्यर्थ के चांदी-सोने के ठीकरे इकट्ठे करने में मैं व्यतीत न हो जाऊं। मैं ऐसे ही समाप्त न हो जाऊं बिना कुछ जाने, बिना कुछ भीतर के रस को उपलब्ध हुए। भीतर की वीणा न बजे और कहीं जीवन का अवसर न चूक जाए। ऐसा व्यक्ति धार्मिक है।
नीति धर्म नहीं है; नीति धर्म का धोखा है। धोखा है और बड़ा कुशल धोखा है। क्योंकि जो व्यक्ति भीतरी समाधान चाहता है, वह भी सच्चा होता है; लेकिन उसकी सचाई का कारण सम्मान पाने की आकांक्षा नहीं होती, वह सम्मान पाने के लिए सच्चा नहीं होता। वह सच्चा होता है इसलिए सम्मान मिलता है, यह बात दूसरी। वह सच्चा ही रहेगा, चाहे अपमान मिले। वह सच्चा ही रहेगा, चाहे नरक में फेंक दिया जाए। क्योंकि उसने सच्चाई के स्वर्ग को अनुभव कर लिया। अब कोई और चीज उसकी सच्चाई को हटा नहीं सकती।
इस फर्क को फिर से मैं दोहरा दूं। भीतर का समाधान खोजने वाला आदमी भी नीति के गहनतम आदर्शों को पूरा करता है; लेकिन वे उसका लक्ष्य नहीं होते, वे छाया की तरह आते हैं। जैसे-जैसे भीतर की समाधि बढ़ती है और भीतर की अराजकता मिटती है और भीतर की समस्वरता पैदा होती है, भीतर का नाद जैसे-जैसे बजता है, वैसे-वैसे उस व्यक्ति के जीवन से अंधकार गिरने लगता है, उसका बाहर का व्यवहार भी बदलने लगता है। लेकिन बदलता है भीतर के कारण। बदलता है भीतर की क्रांति के कारण।
अंतस पहले बदलता है, आचरण पीछे आता है, तब तो फूल जड़ों से जुड़े हैं। अगर आचरण तुमने बदल लिया और अंतस बदला ही नहीं, तो फूल कागजी हैं। वे जड़ों से नहीं जुड़े हैं, झूठे हैं। झूठे फूलों को सम्मान भला मिल जाए, लेकिन झूठे फूलों से तुम्हारी संतुष्टि न होगी। आखिर में तुम पाओगे, व्यर्थ ही गंवा दिया सब।
नीति अनिवार्य रूप से धर्म नहीं है। धर्म अनिवार्य रूप से नीति है। धार्मिक व्यक्ति नैतिक है ही। उसे नैतिक होने के लिए कुछ भी करना नहीं होता। धार्मिक होने से उसकी नीति ऐसे ही निकलती है जैसे फूलों से गंध निकलती है, दीये से प्रकाश निकलता है, सुबह पक्षियों के कंठ से गीत निकलते हैं। कुछ उन्हें गाना नहीं पड़ता। किसी को उनकी खुशामद नहीं करनी पड़ती कि आप गाओ। किसी को फर्माइश नहीं करनी पड़ती कि आप गाओ। कोई सुनने वाला हो न हो, कंठ से गीत फूटता है। वह सुबह की सहज घटना है। सूरज के उगते ही भीतर भी कुछ उगता है। सारे जगत के जागते ही भीतर भी कुछ जागता है। फूल खिलने लगते हैं, पक्षी गीत गाने लगते हैं। कोई भी न हो सुनने वाला। सुनने वाले से कोई प्रयोजन ही नहीं है।
नीति ऐसा गीत है जो तुमने दूसरों के लिए गाया। भला तुम्हारे कंठ में उठता हो, न उठता हो। भला तुम्हारे हृदय से आया हो, न आया हो। भला तुम्हारे प्राण गाना चाहते थे कि नहीं गाना चाहते थे। तुम गौण हो। तुम हो ही नहीं। तुमने अपने को बाद दे दी है। दूसरों के लिए गाया, सम्मान के लिए गाया, तालियों के लिए गाया, पुरस्कारों के लिए गाया।
धर्म ऐसा गीत है जो तुमने अपने लिए गाया। किसी ने सुन लिया, बात और। और कोई आनंदित हुआ, धन्यभाग! कोई सुनने न आया, कुछ भेद नहीं पड़ता। क्योंकि मजा गाने में है, किसी के सुनने में नहीं। आनंद तो था गीत के फूटने में, अभिव्यक्ति में। वह किसी ने तालियां बजाईं या निर्जन एकांत ने उसे सुना, कोई भेद नहीं पड़ता। तुम्हारा आनंद पूरा है। तुम्हारे आनंद से ही तुम्हारा गीत जन्मा है। गीत के कारण तुम्हें आनंद मिलने वाला नहीं है; आनंद से ही गीत बहा है।
तो एक तो दरबारी गवैया है, एक सुबह के पक्षी हैं। दरबारी गवैया गाता है दरबार के लिए।
अकबर ने तानसेन से पूछा एक बार कि मैं सदा सोचता हूं--तुझसे श्रेष्ठ कोई गायक नहीं हो सकता।
तानसेन ने कहा, रुकें। मेरी खुद की ऐसा धारणा नहीं है।
अकबर ने कहा, तेरा मतलब?
तानसेन ने कहा, शायद आप समझ पाएं, न समझ पाएं, लेकिन मेरे गुरु अभी जीवित हैं। और मैंने उस व्यक्ति को देखा है। उसके सामने मैं पैरों की धूल भी नहीं हूं।
अकबर को बड़ी तीव्र आकांक्षा जगी। उसने कहा, तो फिर गुरु को निमंत्रण दो। जो भी शर्तें होंगी, पूरी कर देंगे। विशेष आयोजन किया जाए।
तानसेन ने कहा, इसीलिए मैंने कभी गुरु का नाम आपके सामने नहीं लिया। क्योंकि निमंत्रण पर वे नहीं गाते हैं। गाते हैं, तब कोई सुन ले, बात और। फर्माइशी नहीं हैं, दरबारी नहीं हैं। वे आएंगे नहीं। उन्हें लाने का कोई उपाय नहीं है। हम वर्षों उनके चरणों में रहे, लेकिन हमारी आकांक्षा रही हो कि वे गाएं, कभी उन्होंने गाया नहीं। चोरी-चोरी हमें सुनना पड़ा है। इसीलिए मैंने कभी नाम नहीं लिया, क्योंकि आप समझ ही न पाएंगे।
अकबर को थोड़ी चोट भी लगी। कहा, कौन है यह आदमी? नाम तो बताओ! बुला लेंगे। तुम फिक्र छोड़ो।
क्योंकि अकबर जैसे लोग जानते ही नहीं कि धन के पार भी कोई चीज है, पद-आकांक्षा के पार भी कोई चीज है। अकबर जैसे व्यक्तियों को ऐसे व्यक्तियों से मिलना करीब-करीब असंभव है, जिन्हें लोभित न किया जा सके, जिन्हें प्रलोभन न दिया जा सके। अकबर की तो समझ यही होगी कि हरेक व्यक्ति खरीदा जा सकता है। थोड़ा कम-ज्यादा मूल्य होगा। कोई दस हजार मांगता है, कोई दस लाख मांगेगा, बस! फर्क मात्रा का होगा, गुण का नहीं हो सकता।
उसने कहा, तू फिक्र छोड़, तानसेन। मुझे तू नाम बता।
नाम पूछा तो तानसेन को बताना पड़ा। कहा, हरिदास। फकीर हैं।
तानसेन की बात सुन कर अकबर हंसने लगा। कहा, फकीर हैं! बुला लेंगे, पकड़वा लेंगे। धन जो भी खर्च होगा, करवा देंगे। पूरी राजधानी सजाई जाएगी।
तानसेन की आंख से आंसू बहने लगे। उसने कहा, आप समझे ही नहीं बात। इसीलिए मैं चुप था और आपकी प्रशंसा भी सुन लेता था कि मुझसे बड़ा कोई गायक नहीं। मैं जानता हूं कि बड़ा अभी जीवित है। यह बात--मैंने अपने गुरु को देखा है--यह बात मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि मुझसे बड़ा कोई गायक नहीं है। लेकिन अगर आपका मुझ पर थोड़ा भी प्रेम है, तो भूल कर भी मेरे गुरु को परेशान न करें। अगर सुनना ही है, सच्ची आकांक्षा उठी है, तो फिर मैं इंतजाम करूंगा। चोरी-चोरी चलना होगा। वे यमुना के किनारे रहते हैं आगरा में। अक्सर वे तीन बजे रात मस्ती में नाचते हैं, गाते हैं। तो मैं पता लगा लूं। तो हम छुप जाएंगे झोपड़ी के बाहर और सुन लेंगे।
शायद ही किसी सम्राट ने किसी को इस तरह सुना हो। अकबर गया। वह आदमी बहुमूल्य था अकबर भी। उसको भी बात तो समझ में आई कि यह भी हो तो सकता ही है कि ऐसा कोई व्यक्ति हो जो पक्षियों की तरह गाता हो। देख लेना चाहिए। वह अगर तैमूरलंग और नेपोलियन और सिकंदर जैसा अगर होता तो उसकी समझ में न आता। वह बुरे लोगों की दुनिया में भला आदमी था। वह गया। रात दो बजे दोनों छिप गए झोपड़े के बाहर।
तीन बजे एक अपूर्व संगीत का जन्म हुआ। अकबर के आंसू थमते नहीं हैं। वह रोता ही रहा। बात ही कुछ हृदय के गहरे तक पहुंच गई। जैसे तीर चुभ गया। जैसे पहली दफा संगीत जाना। जैसे अब तक जो सुना था वे केवल झूठी छायाएं थीं। जैसे पहली दफा असली संगीत जाना। अब तक जो जाना था वे कार्बन-कापियां थीं। पहली दफा असली संगीत का अनुभव हुआ। अब तक जो जाना था वह दूर से सुनी गई ध्वनि थी। आज पहली दफा पास स्पर्श हुआ। सुनने वाला न रहा अकबर। खो गया। ताली बजाने की भी हिम्मत न आ सकी। क्योंकि उससे भी बाधा पड़ेगी। और ताली बेहूदी मालूम पड़ी। इतने बड़े संगीत के लिए ताली नहीं बजाई जा सकती। यह कोई राजनेता का व्याख्यान नहीं है कि ताली बजा दी। क्योंकि ताली बजाने वाला मूढ़ मालूम पड़ेगा। उससे पता चलेगा कि वह समझा ही नहीं; अन्यथा चुप होता, मौन होता।
चुपचाप, पैर की आवाज न हो जाए, वे भाग कर रथ में बैठ कर वापस लौट गए। रास्ते भर अकबर चुप रहा। तानसेन भी थोड़ा बेचैन हुआ कि वह कुछ बोला नहीं। एक शब्द नहीं कहा। कभी ऐसी घड़ी होती है कि शब्द बोलना नासमझी का सबूत होता है। कभी ऐसी घड़ी होती है, प्रशंसा छोटी मालूम पड़ती है। कभी यह कहना कि बहुत खूब, बहुत छोटी बुद्धि का सबूत होता है। कभी चुप रहना ही एकमात्र प्रशंसा होती है। जितनी बड़ी घटना हो उतनी ही शब्द में समाती नहीं।
पर आंसू बहते रहे। सीढ़ियों पर महल की, अंदर महल के जाते वक्त उसने इतना ही कहा, तानसेन! तुम सही हो। मैं सोचता था तुमसे बड़ा कोई गवैया नहीं। अब मैं सोचता हूं कि तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं गा सकते? तुम तो मीलों फासले पर हो, बहुत दूर हो। जल्दी करो, अन्यथा जीवन ऐसे ही बीत जाएगा। इतना ही मैं तुमसे पूछना चाहता हूं कि इतना फर्क क्यों है? और मैं जानता हूं कि तुम कुशल हो। और मैं जानता हूं कि तुम सब भांति योग्य हो। फिर इतना फासला क्यों?
तानसेन ने कहा, फासला बहुत साफ है। मैं गाता हूं ताकि कुछ पा सकूं, वे गाते हैं क्योंकि उन्होंने कुछ पा लिया है। मेरे गाने में आकांक्षा है पाने की--पुरस्कार, धन, संपदा, यश, प्रतिष्ठा, सफलता। अन्यथा क्यों आपके दरबार में होता? मैं दरबारी हूं। वे पक्षी हैं खुले आकाश के। मैं पिंजड़े में बंद तोता हूं। उनका गीत खुले आकाश का गीत है। मेरे गीत में मेरे पिंजड़े की छाया पड़ेगी ही। मैं बंधन में हूं। अभी वासना नहीं मिटी। इसलिए जो गाता हूं वह कंठ से ही आता है, हृदय से नहीं आता। उन्होंने किसी के लिए गाया नहीं है, गाने के लिए गाया है। मस्ती में गाया है। किसी से कोई प्रयोजन नहीं है। भीतर से आया है। उनकी गीत की घटना सामाजिक नहीं है, नितांत वैयक्तिक है। उनके एकांत का आविर्भाव है। मेरी घटना सामाजिक है। मैं तैयार करता हूं, फिक्र करता हूं। जब मैं गा रहा हूं तब भी चिंता मन में यही बनी रहती है कि प्रशंसा मिलेगी, नहीं मिलेगी? प्रतिस्पर्धा है,र् ईष्या है, जलन है, लोभ है, वासना है। इन सबके बीच कैसे उस महासंगीत का जन्म हो सकता है? वैसा संगीत तो केवल संतों के जीवन में ही होता है। आप ठीक कहते हैं। मीलों नहीं, कोसों की दूरी है। मुझसे ज्यादा भलीभांति कोई भी नहीं जानता कि दूरी कितनी बड़ी है। जब तक भीतर की वासना न गिर जाए वह दूरी मिट न सकेगी। दूरी मिटाने से न मिटेगी। दूरी तो मैं ही बदलूंगा तो ही मिटेगी। मैं ही मरूंगा तो ही मिटेगी। नये का आविर्भाव होगा तो मिटेगी। धर्म भीतर से पैदा हुआ संगीत है। स्वभावतः नीति उसके साथ बहती चली आती है। लेकिन नीति के साथ धर्म बहता हुआ नहीं चला आता।
ऐसा समझो कि तुम सुंदर हो तो तुम्हारा आचरण सुंदर स्वभावतः हो जाता है। तुम ज्योतिर्मय हो तो तुम्हारे कृत्यों में भी ज्योति झलकती है, दीये जलते हैं।
तुम ऊपर से सुंदर बनने की कोशिश कर रहे हो। तुमने खूब आभूषण पहन लिए हैं, खूब सुंदर वस्त्र पहन लिए हैं, खूब सजा-संवार लिया है। ज्यादा से ज्यादा तुम असौंदर्य को थोड़ा सा ढांक लोगे, सुंदर नहीं हो जाओगे। ढंकी कुरूपता सुंदर नहीं हो जाती। ढंकी कुरूपता और भी कुरूप हो जाती है। उघड़ा रूप शायद कभी सुंदर भी हो जाए। अगर तुम उघाड़ ही दो अपने को--कुरूप हो तो कुरूप सही; जैसे हो वैसे हो; परमात्मा ने ऐसा तुम्हें बनाया; जैसा रखता है वैसे रहोगे--तो शायद तुम्हारी इस सहजता से तुम्हारी कुरूपता भी बह जाए। सहज तुम्हारे स्वीकार से शायद सौंदर्य का आविर्भाव हो जाए।
लेकिन तुम ढांकते हो, छिपाते हो। उस छिपाने से घाव मिटते नहीं, बढ़ते हैं। घाव धीरे-धीरे नासूर हो जाते हैं, नासूर धीरे-धीरे कैंसर बन जाते हैं। पूरे प्राणों में महामारी फैल जाती है।
नीति चेष्टा है समादर की। नीति का विकृततम रूप राजनीति है। वह अत्यंत रुग्ण दशा है नीति की। तब व्यक्ति अपने को छोड़ ही दिया। अब कोई के लिए हंसता है, किसी के लिए रोता है। सारा व्यवहार बाहर हो गया।
एक यहूदी फकीर हुआ, रबी लिएव। वह बीस वर्षों तक अपने गुरु के पास रहा। लोगों ने उससे पूछा कि इतना लंबा समय तू गुरु के पास क्या देखता रहा?
तो लिएव ने कहा, मंदिर में उनका आचरण अदभुत था, लेकिन उसे मैं देखने न गया था। भीड़ में उनके सौंदर्य की क्या चर्चा करें! लेकिन उस पर मेरी आंख न थी। वे बोलते थे तो फूल झरते थे, लेकिन उसकी मुझे तलाश न थी। शास्त्रों की उनकी व्याख्याएं अनूठी हैं, अपूर्व हैं। पृथ्वी पर कभी-कभी ऐसे व्याख्याकार पैदा हुए। लेकिन नहीं, उनको भी मैं सुनने न गया था। मैं तो देखने गया था कि मेरा गुरु अपने एकांत में कैसा व्यवहार करता है। कैसे वह जब कोई भी देखने वाला नहीं होता तो अपने जूते के बंद खोलता है। और कैसे जब कोई भी देखने वाला नहीं होता तो अपने जूते के बंद बांधता है। मैं वह देखने गया था। निश्चित ही बीस वर्ष लग गए, लेकिन समय खोया नहीं। बहुत कुछ पाकर लौटा हूं। मैं गुरु को उसके एकांत में देखने गया था--शुद्धतम! जहां दूसरे की छाया भी नहीं पड़ती। जहां दूसरे के आधार पर आचरण करने का कोई प्रश्न भी नहीं उठता। मैं गुरु को उसकी नींद में सोता हुआ देखने गया था कि उसकी नींद में वह बड़बड़ाता तो नहीं। सपने तो नहीं सताते उसे। चौंक कर डर तो नहीं जाता कभी। मैं उसे ही देखने गया था। उसकी छायाएं-प्रतिबिंबों को नहीं, जो लोगों की आंख में बनते हैं। वे सुंदर थे रूप। कोई उनका मुकाबला नहीं। लेकिन वह मेरी खोज न थी, इसलिए मुझे देर लगी। अगर मंदिर में उसके रूप को देखना था, एक दिन में बात हो जाती। बाजार में उसके रूप को देखना था, दो दिन में बात हो जाती। उसके वचन सुनने थे, तीसरे दिन पूरा हो जाता। लेकिन मैं उसके शून्य को सुनने गया था, उसके अंतर्नाद को। जहां वह अकेला है; बिलकुल अकेला है। जहां किसी की भी कोई छाया नहीं पड़ती। जहां परमात्मा भी नहीं है।
क्योंकि मंदिर में जब तुम परमात्मा के सामने खड़े हो, तब परमात्मा और तुम्हारी मौजूदगी, दो की मौजूदगी है। तुम ऐसा व्यवहार करोगे जो प्रार्थना के योग्य है। लेकिन जहां तुम बिलकुल अकेले हो अपने स्नानगृह में, जहां तुम दर्पण के सामने खुद ही खड़े हो, कोई भी देखने वाला नहीं, वहां तुम्हारा सच्चा रूप प्रकट होता है।
नीति नहीं है लक्ष्य; धर्म है लक्ष्य। धर्म का अर्थ है: व्यक्ति का अपने एकांत में अपने से ही व्यवहार। इस व्याख्या को याद रखो। एकांत के साथ तुम जो व्यवहार करते हो वहीं तुम्हारे धर्म का पता चलता है कि तुम धार्मिक हो या नहीं।
निश्चित ही उसके पीछे नीति के सभी रथ अपने आप चले आते हैं; उन्हें लाना नहीं पड़ता। वे दौड़े चले आते हैं, वे अपने से ही भागे चले आते हैं। पर वे न भी आएं तो भी धार्मिक व्यक्ति को उनके कारण कोई चिंता नहीं होती। और अगर धर्म की गहनता बढ़ती जाए, तो जैसे नीति का विकृततम रूप राजनीति है, वैसे धर्म का प्रगाढ़तम, विकसिततम रूप निर्वाण है, मोक्ष है, मुक्ति है।
ये दो अलग यात्राएं हैं।
नीति को भूल कर धर्म मत समझना; अन्यथा तुम खोटे सिक्के पर राजी हो गए। उस सिक्के से इस संसार में बहुत कुछ मिलेगा, लेकिन उस सिक्के से नदी के उस पार न जा सकोगे। वह इसी पार चलता है। नदी में पार जाना तो दूर, नाव में भी न बैठ सकोगे। क्योंकि वह मांझी कहेगा, यह सिक्का उस तरफ चलता ही नहीं। यह इसी किनारे चलता है। तुम इसे यहीं चलाओ।
ये जो वचन आज हम दादू के समझने जा रहे हैं, वे इसी रहस्य के संबंध में हैं।
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
ऊपर से दिखावा सभी लोग करते हैं। ऊपर-ऊपर सभी लोग सजाते हैं। ऊपर-ऊपर सभी लोग सुंदर बनने की चेष्टा में संलग्न होते हैं।
ऊपरि आलम सब करै...
सारा संसार यही कर रहा है--ऊपर-ऊपर। क्योंकि दूसरों को तो तुम्हारी परिधि ही दिखाई पड़ती है। तुम्हारा केंद्र तो सिवाय तुम्हारे कौन देख सकेगा? वहां तो तुम्हारा ही एकांत प्रवेश है। किसी और को भी वहां प्रवेश का उपाय नहीं है। तुम्हारे आत्यंतिक हृदय के केंद्र पर तो तुम्हीं जा सकोगे। लेकिन तुम्हारी देह तो सभी को दिखाई पड़ेगी।
तुमने ध्यान किया या नहीं, यह किसी को दिखाई नहीं पड़ेगा। तुमने स्नान किया या नहीं, यह तो सभी को दिखाई पड़ जाएगा। तुमने भीतर के सौंदर्य को निखारा या नहीं, इसको देखने वाली आंखें तुम कहां खोज सकोगे! लेकिन तुमने स्नान किया है, सुगंधित होकर घर से निकले हो, ताजे कपड़े पहने हैं, यह तो अंधे को भी समझ में आ जाएगा। धीरे-धीरे तुम यह भूल ही जाते हो कि एक तुम्हारा ऐसा रूप भी है जिसे तुम ही जानोगे। और एक तुम्हारा रूप है जो बाहर से दिखाई पड़ता है। अगर तुम बाहर के ही रूप को संवारने में लगे रहे, तो तुमने दूसरों की आंखों को भला तृप्ति दी हो, तुम अपनी जीवन की खोज से वंचित हो जाओगे। तुम दूसरों को ही समझाते रहे कि मैं सुंदर हूं। और तुम सुंदर न हो पाओगे। क्योंकि यह सवाल किसी को समझाने का नहीं है। तुम सुंदर हो तो तुम सुंदर हो, किसी को समझाने की बात नहीं है। कोई समझ ले, उसका सौभाग्य; न समझे, उसका दुर्भाग्य। समझ ले तो वह भी यात्रा पर निकल जाएगा। न समझे तो जहां पड़ा है वहीं पड़ा रहेगा और सड़ जाएगा। लेकिन तुम्हें दूसरे को समझाने की आकांक्षा नहीं है।
लेकिन साधारणतः हमारी अपने संबंध में कोई दृष्टि ही नहीं होती। हम अपने संबंध में भी दूसरों की दृष्टि को ही जुटाते हैं। अगर लोग तुम्हें अच्छा कहते हैं तो तुम अपने को अच्छा मानते हो। अगर लोग बुरा कहते हैं तो तुम अपने को बुरा मानते हो। जैसे कि तुम्हारी अपने से सीधी कोई पहचान ही नहीं है। जो लोग कहते हैं वही तुम अपने को मानते हो।
यही तो तकलीफ है। इसीलिए तो तुम इतने भयभीत हो लोगों से कि कहीं लोगों का मन न बदल जाए। कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें चुनाव में मत न दें। कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हारे संबंध में कुछ और सोचने लगें। तुम पूरे वक्त शंकित, चिंतित, व्यथित, उनकी आंख में तुम्हारी प्रतिमा सुंदर बनी रहे इसके लिए बेचैन हो।
और दूसरों की आंखों में बनी तुम्हारी प्रतिमाएं पानी पर बने प्रतिबिंब से ज्यादा मूल्यवान नहीं हैं। आंख भी बस पानी है। उस पर बने प्रतिबिंब हैं। जरा में डगमगा जाते हैं। कुछ भरोसा है? आज किसी का मन ठीक था, उसने तुम्हें कहा, सुंदर हो। कल उसका मन ठीक नहीं है और उसने कहा कि तुमसे ज्यादा कुरूप कोई व्यक्ति नहीं। हट जाओ! तुम्हें देख कर भी मुझे घृणा पैदा होती है।
तुम जानते हो, रोज यह घटता है। किसी दिन तुम किसी को कहते हो, मैं प्रेम करता हूं। तेरे बिना न जी सकूंगा। और एक दिन ऐसा आता है, तुम कहते हो कि मेरी इतनी घृणा है तुझसे कि तेरे साथ न जी सकूंगा। अब अलग ही जीने का उपाय है।
लोगों के मन तो धुएं की तरह बदलते रहते हैं। आकाश में बादलों के बने हुए आकार जैसे हैं लोगों के मन। तुम पूरी तरह देख भी नहीं पाए कि बदलाहट शुरू हो गई। नदी की धाराओं की तरह हैं लोगों के मन। बह रहे हैं; कुछ भी थिर नहीं है। उसमें तुम अपना प्रतिबिंब झांक रहे हो। एक मछली उछल जाती है, प्रतिबिंब डांवाडोल हो जाता है। दूसरे के मन में एक विचार उछल जाता है, प्रतिबिंब डांवाडोल हो जाता है।
झील शांत हो, चांद दिखाई पड़ता है। जरा सी लहर आ जाए हवा की, टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं चांद के। अगर चांद भी झील पर ही भरोसा करता हो, तो रोता-रोता मरेगा कि यह मेरी क्या गति हो गई! हजार टुकड़े हो गया! अभी तो सब ठीक था। यह झील ने मन क्यों बदल लिया?
कोई झील चांद के लिए मन को नहीं बदल रही है। झील की अपनी मुसीबतें हैं। झील को चांद से क्या लेना-देना है? शायद झील को पता भी न हो कि चांद का प्रतिबिंब बन रहा है।
तुम जिन आंखों के लिए बड़ा भरोसा किए हो, उन आंखों को शायद तुम्हारी कोई खबर भी न हो; शायद चिंता भी न हो। लेकिन तुम्हारी चिंता यही है कि सभी आंखों में मेरा प्रतिबिंब अच्छा बना रहे। एक प्रतिमा हो आदर्श की। लोग सम्मान दें, आदर दें।
जीवन बहुत छोटा है। लोगों के मन बड़े प्रवाहमान हैं। इस भांति तो तुम खो जाओगे। झील में देखते-देखते तुम्हारा चांद ही नष्ट हो जाएगा। अपने को देखो। झील से क्या प्रयोजन है? भीतर की अखंडता को खोजो। फिर झीलें कुछ भी कहें। कम से कम तुम्हें तो व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम तो जानते हो, मैं अखंड हूं। झील के कहने से क्या फर्क पड़ता है?
लेकिन जरा सी झील के मन में शंका आती है और तुम शंकित हो जाते हो। बात जाहिर है। तुम स्वयं से अपरिचित हो। आत्म-अज्ञानी व्यक्ति दूसरों की आंख में अपनी पहचान खोजता है कि मैं कौन हूं? वह अपना तादात्म्य खोज रहा है कि मैं अपने को क्या समझूं?
अमरीका की बहुत प्रसिद्ध अभिनेत्री हुई, ग्रेटा गार्बो। उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मुझे पता ही न था कि मैं सुंदर हूं। वह एक छोटे से गांव में एक नाईबाड़े पर लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम करती थी। दो पैसा प्रति दाढ़ी उसे मिल जाता था। दिन भर वह अपना साबुन लगाती रहती थी। न कभी किसी ने उस पर ध्यान दिया था, न कभी उसने सोचा था कि मैं सुंदर हूं। गरीब लड़की थी। एक अमरीकी फिल्म डायरेक्टर गांव में आया हुआ था। कुछ शूटिंग के लिए जगह देखने आया होगा। वह भी अपनी दाढ़ी बनवाने गया। और जब ग्रेटा गार्बो ने उसकी दाढ़ी पर साबुन लगाया तो उसने ऐसे ही सहज कहा, जैसी कि अमरीकियों की आदत होती है--उसको कोई बहुत ज्यादा मूल्य मत देना कि अमरीकी क्या कहते हैं। वह औपचारिक था। उसने ऐसे ही दर्पण में देख कर कहा, हाऊ ब्यूटीफुल! कितनी सुंदर!
यह सिर्फ उपचार था। लेकिन ग्रेटा गार्बो का जीवन बदल गया। उसे पहली दफा अपने सौंदर्य का बोध आया।
झील में देख कर चांद को पता चला। मगर यह बड़ा खतरनाक सौदा है। क्योंकि और भी झीलें हैं। किसी और झील में देख कर शक हो जाएगा कि सुंदर नहीं हूं।
तुम कभी विचार करना कि तुम अपने संबंध में जो भी जानते हो वह सब दूसरों की आंखों में देखे गए प्रतिबिंबों की कतरन को जोड़ कर बनाया गया प्रतिरूप है, या तुम अपने संबंध में सीधा कुछ जानते हो? कौन क्या कहता है तुम्हारे संबंध में, उस पर तुम निर्भर हो। छोटे-छोटे बच्चों पर निर्भर होते हो। छोटा बच्चा है, मां उस पर निर्भर होती है कि वह कहे कि तुझसे अच्छी मां कोई भी नहीं। छोटा सा बच्चा! उससे भी राजनीति का खेल शुरू हो जाता है। और बच्चा अगर कह दे, तू कुछ भी नहीं है--किसी नाराजगी के क्षण में--तू हमारी मां भी नहीं है! तो मां का भी दिल टूट जाता है। आंसू आ जाते हैं कि अपना ही बेटा ऐसा कह रहा है। तो उस पर भी निर्भर हैं। आदमियों को तो छोड़ दें, कुत्ता पाल रखा है। वह आप आते हैं दफ्तर से तो पूंछ हिलाता है, चित्त प्रसन्न होता है। कुत्ते की पूंछ में प्रतिबिंब देखते हैं अपना! कोई कुत्ता, आप पूंछ हिलाते रहो, फिक्र नहीं करता। मगर आप फिक्र करते हो। कुत्ते समझ गए राजनीति। समझ गए आदमी की मूढ़ता कि यह गरीब आदमी है, इसका कोई हिसाब नहीं। जरा पूंछ हिला दो, यह राजी हो जाता है। यह बड़ा प्रसन्न हो जाता है। इसे लगता है जैसे सम्राट हो गए।
कुत्ते पालने का यही तो सुख है। कुत्ता भरोसेऱ्योग्य है। कभी भी आओ, डांटो-डपटो, नाराज होओ, भगा दो उसे, फिर वापस खड़ा है, फिर पूंछ हिला रहा है। वह तुम्हें फुसला ही लेगा। वह तुम्हें बता ही देगा कि तुम सिकंदर हो। तुम बड़े महान हो। कुत्ते राजनीति समझ गए; आदमी की मूढ़ता समझ गए।
जितना ही आत्म-अज्ञान होगा, उतना ही हम आत्मज्ञान की खोज करते हैं दूसरों के विचारों में--कौन मेरे संबंध में क्या कह रहा है। अगर लोग अच्छा कह रहे हैं, तो मैं अच्छा हूं इसीलिए अच्छा कह रहे हैं। अगर लोग बुरा कह रहे हैं, तब? तब स्वभावतः भीतर शक होता है, मैं बुरा होऊंगा। तो किस तरह लोगों को राजी करूं कि वे सदा मुझे अच्छा कहते रहें!
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
सिर्फ साधु भीतर की यात्रा पर निकलता है। वह भीतर के घट मांहि--वहां खोजता है कि मैं कौन हूं। वह वहां मनन, चिंतन और ध्यान करता है कि मेरी प्रतिमा क्या है? मैं हूं कौन? वह अपने से पूछता है, किसी और से नहीं कि मैं कौन हूं। वह तुम्हारे घर के सामने भीख मांगता हुआ खड़ा नहीं होता कि थोड़ा मुझे आत्मज्ञान की भीख दे दो! कि थोड़ा मुझे बता दो कि मैं कौन हूं! जरा कह दो!
कितने लोग मिमियाते हैं एक-दूसरे के सामने कि जरा कह दो कि तुमसे ज्यादा ईमानदार और कोई भी नहीं। हृदय के कमल खिल जाएंगे। कि जरा कह दो कि तुम्हारी जैसी कोकिल कंठ आवाज कहीं नहीं सुनी। प्राण-प्राण पुलकित हो जाएंगे। कि जरा कह दो कि तुम्हारी आंखों में झीलों की शांति है; कि तुम्हारी आंखों में हिमालय का सौंदर्य है। और श्वास-श्वास सुगंधित हो जाएगी।
हर आदमी एक-दूसरे के सामने भीख मांगता खड़ा है कि कह दो। और बदले में वह कहने को तैयार है कि नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं। आपके सामने क्या हूं? पैर की धूल हूं! एक लेन-देन है। एक पारस्परिक समझौता है। हम एक-दूसरे को सहारा दे रहे हैं। हम एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं। जिसकी तुम पीठ थपथपा रहे हो, वह तुम्हारी थपथपा रहा है। वह भी तभी तक थपथपाएगा जब तक तुम थपथपा रहे हो। ऐसे हम एक-दूसरे को धोखा देने में साझीदार हैं।
इस धोखे का नाम माया है, प्रपंच है। इस धोखे का नाम संसार है।
संसार का अर्थ तुम यह मत समझना कि वृक्ष, आकाश के तारे, समुद्र, पहाड़। इनसे संसार का कोई लेना-देना नहीं। ये तो परमात्मा के हिस्से हैं। संसार तो उस धोखे का नाम है जो आदमी-आदमी ने अपने बीच निर्मित किया है। उसका परमात्मा से कोई संबंध नहीं है। परमात्मा ने सृष्टि तो बनाई है, संसार नहीं बनाया।
इस भेद को तुम्हें शायद थोड़ी कठिनाई हो, क्योंकि तुम सदा दोनों को एक ही मानते रहे हो। संसार आदमी ने बनाया है। उसका स्रष्टा आदमी है। सृष्टि परमात्मा की है, लेकिन संसार आदमी का है। संसार उस प्रपंच का नाम है जो आदमी अपने बीच में खेल रहे हैं। उस खेल का नाम है जो आदमी-आदमी आपस में खेल रहे हैं।
तुम जरा गौर करना अपने ही संबंध में, तो तुम पाओगे कि चौबीस घंटे जाने-अनजाने तुम यही कर रहे हो। एक खेल खेल रहे हो। रास्ते पर कोई आदमी है, तुम झुक कर नमस्कार करते हो। नमस्कार के लिए नहीं, तुम देखते हो कि वह नमस्कार करता है कि नहीं। अगर न करे नमस्कार, बड़ी पीड़ा हो जाती है।
सूफी फकीर हसन एक गांव से गुजर रहा था अपने शिष्यों के साथ। एक आदमी रास्ते में मिला, उसने झुक कर नमस्कार किया, जैसी कि हसन की आदत थी। जाने-माने को, अनजाने को, अपरिचित को, सभी को झुक कर नमस्कार करता था। क्योंकि सभी के भीतर वह तो छिपा ही है जो नमस्कार के योग्य है। ऊपर की पहचान का क्या फर्क पड़ता है? वे तो लेबल हैं। भीतर तो वही एक है। उसने झुक कर नमस्कार किया। लेकिन वह आदमी अकड़ा हुआ था। वह कोई छोटा-मोटा आदमी नहीं था, गांव का जमींदार था, धनपति था। ऐसे हर किसी को नमस्कार करने लगे! वह अपना चला गया बिना देखे। उसने ध्यान भी न दिया।
हसन के शिष्यों को चोट लगी। एक शिष्य ने कहा कि यह तो जरा ज्यादती की बात हो गई। इस आदमी को रास्ते पर लगाना चाहिए। इसने अपने को समझा क्या है!
हसन ने कहा, उसे देख कर तो मुझे दया आई; तुझे भी देख कर दया आती है। वह आदमी तो रुग्ण है।
हसन ने कहा, पागलो! अगर कोई आदमी लंगड़ा कर चलता है तो तुम्हें दया आती है, क्योंकि उसका पैर टूटा हुआ है। इस आदमी की पूरी आत्मा टूटी हुई है और तुमको दया नहीं आती, क्रोध आता है? यह बिलकुल लंगड़ा है भीतर से। यह कितना दुख नहीं पा रहा होगा! अब और तुम्हें दुख देने की जरूरत है इसको? यह ऐसे ही बहुत दुख पा रहा होगा। जो नमस्कार तक करने में असमर्थ हो गया है, उसकी पीड़ा का कोई अंत है! यह तभी हो सकता है जब कोई भीतर के परमात्मा को बिलकुल भूल गया हो। क्योंकि जब भीतर का परमात्मा याद आता है तो दूसरे का परमात्मा तत्क्षण दिखाई पड़ता है। उस पर नाराज होने की जरूरत नहीं है, पागलो, उसके लिए प्रार्थना करना आज। और तुझ पर भी मुझे दया आती है। नमस्कार इसलिए थोड़े ही की जाती है कि कोई लौटाए! और जहां लौटाने का भाव हो वहां तो नमस्कार भी सौदा हो गया। नमस्कार तो हमने की, यह हमारा निवेदन है कि खूब सुंदर हो। कि परमात्मा किस ढंग में जा रहा है। हमने तो परमात्मा को नमस्कार की। परमात्मा किसी ढंग में हो, हम उसे पहचान ही लेंगे। रुग्ण हो, स्वस्थ हो, जागा हो, सोया हो, हम पहचान ही लेंगे। हमने तो अपनी पहचान जतलाने के लिए नमस्कार की कि पहचान गए। उसने नहीं लौटाई, यह उसकी बात है, यह उसकी पीड़ा है। तुम क्यों नाराज हो? निश्चित ही तेरे मन में आकांक्षा होगी: नमस्कार की जाए तो लौटाई जाए।
नमस्कार जैसा पवित्र कृत्य भी बाजार में बिक गया है। वह भी पारस्परिक व्यवसाय का हिस्सा हो गया है। हम उन्हीं को नमस्कार करते हैं जिनसे हम आश्वस्त हैं कि वे लौटाएंगे उत्तर। नहीं तो हम भी बच कर निकल जाते हैं। क्योंकि यह बात बड़ी बेचैनी की मालूम पड़ती है कि हम झुके और तुम न झुके!
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
साधु भीतर की साधता है। वह अपनी खोज पर निकलता है, लेकिन दूसरों के माध्यम से नहीं। वह सीधा ही खोज पर जाता है। यह भी क्या पागलपन है कि मैं अपना कान पूरा सिर घुमा कर पकडूं! नाहक हाथ को कष्ट देना है। जो कान सीधा ही पकड़ा जा सकता है उसके लिए पूरे सिर का चक्कर हाथ को लगवाने की क्या जरूरत है? मैं अपने को जानूं तुम्हारे द्वारा, यह बात ही फिजूल है। मैं सीधा ही अपने को जान सकता हूं। मैं अपने भीतर विराजमान ही हूं। आंख बंद करनी है और अपने को देखना है। आंख बंद करनी है और अपने से पूछना है कि मैं कौन हूं। तुमसे क्यों पूछूं? और बड़ा मजा यह है कि तुम्हें खुद अपना पता नहीं, तुम्हें मेरा क्या पता होगा! तुम मुझे कैसे पहचानोगे? तुम अभी अपने को ही नहीं पहचान पाए। यह तो ऐसा हुआ, दो भिखमंगे एक-दूसरे के सामने हाथ फैलाए खड़े हों भीख की आशा में। और दोनों भिखमंगे हैं। दोनों मांग सकते हैं, दे नहीं सकते हैं।
दो अज्ञानी जब एक-दूसरे को ज्ञान का भरोसा दिलाने लगते हैं तो संसार पैदा होता है। न मुझे पता है मैं कौन हूं, न तुम्हें पता है तुम कौन हो। मैं तुम्हें समझाता हूं कि तुम कौन हो, तुम मुझे समझाते हो कि मैं कौन हूं।
मैंने सुना है, एक शिकारी तीन दिन तक जंगल में भटका रहा। थक मरा, लहूलुहान हो गया सब शरीर, कांटे ही कांटे छिद गए। भूखा-प्यासा; रास्ता न मिले; बौखला गया। करीब-करीब विक्षिप्त हालत में हो गया। चौथे दिन सुबह सूरज के उगते ही उसने देखा कि अरे...! एक आदमी दिखाई पड़ा उसे एक वृक्ष के नीचे खड़ा हुआ। वह भागा खुशी से कि अंत हुआ इस झंझट का। जाकर उस आदमी को गले लगा लिया।
लेकिन वह आदमी वैसा ही खड़ा रहा, जैसे ठूंठ हो। यह जरा बेचैन हुआ। उस आदमी ने कहा, ज्यादा खुश मत होओ, मैं सात दिन से भटका हुआ हूं। तुम प्रसन्न हो रहे हो कि रास्ता मिल गया? इसलिए नाच रहे हो, कूद रहे हो? हम खुद ही भटके हैं। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा, हम दोनों साथ-साथ भटकेंगे अब। और कोई ज्यादा लाभ नहीं हो सकता।
लेकिन तुमने कभी खयाल किया, अकेले भटकने से साथ-साथ भटकना अच्छा लगता है। कम से कम कोई साथ तो है। कोई सहारा तो है। किसी से बात तो कर लेंगे। अपनी पीड़ा तो रो लेंगे, दुख तो रो लेंगे। इसीलिए तो लोग दुख रोते हैं। मिला नहीं कोई कि उन्होंने दुख रोना शुरू नहीं किया। वह दूसरा भी सुनता है कि तुम रुकोगे तो हम शुरू करेंगे।
दुख ही दुख है। अज्ञान ही अज्ञान है। लेकिन भीड़-भाड़ हो जाती है तो भरोसा आ जाता है। इसीलिए तो आदमी के मन में भीड़ के साथ संबंधित होने की बड़ी आकांक्षा होती है।
तुम थोड़ा सोचो, तुम हिंदू हो तो तुम बीसत्तीस करोड़ लोगों की भीड़ के हिस्से हो। अकेले होते तो बहुत डर लगता। अकेले होते तो कांटा चुभता। लेकिन तुम हिंदू हो। तीस करोड़ लोग थोड़े ही भूल में हो सकते हैं! तुम अकेले शायद भूल में होते। बाकी तीस करोड़ भी यही सोच रहे हैं।
तुम मुसलमान हो; अस्सी करोड़ आदमी थोड़े ही भूल में हो सकते हैं सारी दुनिया में। या तुम ईसाई हो; पूरे एक अरब आदमी ईसाई हैं। हां, तुम अकेले भूल में हो सकते हो, लेकिन एक अरब आदमी! और बाकी एक अरब भी यही सोच रहे हैं कि मैं भूल में भला होऊं, लेकिन शेष एक अरब आदमी थोड़े ही भूल में हो सकते हैं। कोई ऐसी नासमझी थोड़े ही दुनिया में होती है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के मन में भीड़ से संबंधित होने की बड़ी गहरी आकांक्षा है। वह अपने अज्ञान को छिपाने के लिए रास्ता है। इसलिए लोग हजार उपाय खोजते हैं: हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं। उनसे तृप्ति नहीं होती तो रोटेरियन हो गए, लायंस क्लब के सदस्य हो गए। और भी कई तरह की मूढ़ताएं हैं। कुछ न कुछ हो गए। मगर उसमें सम्मिलित हो जाने से बड़ा अच्छा लगता है।
मेरे एक परिचित ने बंबई में अभी एक नया क्लब खड़ा कर लिया: जायंट्स इंटरनेशनल। छोटे-छोटे आदमी! वे खुद भी छोटे आदमी हैं। जायंट्स इंटरनेशनल! अब उसमें लोग सम्मिलित हो रहे हैं। क्योंकि जब जायंट्स के साथ सम्मिलित हो गए तो तुम भी जायंट हो गए। और कोई छोटी-मोटी संस्था नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय! अब उसकी शाखाएं खुल रही हैं। पूना में भी खुल गई है।
सभी जगह छोटे कद के आदमी मिल जाएंगे जिनको जायंट होने की इच्छा है। अकेले तो नहीं कह सकते कि हम जायंट हैं, लेकिन इंटरनेशनल, अंतर्राष्ट्रीय संघ के साथ हैं, जरूर हैं। अकेले नहीं हो सकते तो एक-दूसरे के कंधे पर खड़े हो जाएंगे। लंबी कतार बनाएंगे। स्वर्ग तक पहुंच जाएंगे। अकेले का हाथ न पहुंचता होगा, सब के हाथों के साथ तो पहुंच जाएगा।
ये आदमी की रुग्ण चित्त की दशाएं हैं। कहीं भी समूह खोजता है--बिलांगिंग। ऐसा कुछ हो जिससे पता चले कि मैं किसी के साथ हूं, अकेला नहीं हूं। नारे खोजता है। सड़कों पर भीड़ें निकलती हैं, प्रोसेशन निकलते हैं, जुलूस निकलते हैं सारी दुनिया में। कौन उनमें सम्मिलित होता है? किसलिए उनमें सम्मिलित होता है? कोई बहुत गहरा सुख होगा।
वह सुख यही है: भीड़ के साथ तुम अकेले नहीं रह जाते। और जब भीड़ जोर से नारा लगाती है, तो जोर की आवाज तुम्हारे भी भय और शंकाओं को गिरा देती है। और तुम्हें भी लगता है कि ठीक ही होंगे ये लोग। जब इतने जोर से कह रहे हैं तो गलत बात कोई कहीं इतने जोर से कहता है! तुम भी जोर से आवाज देते हो। अकेले तो तुम कभी जोर से आवाज न दे सके थे, डरते थे कि गलती न हो जाए। अब दस हजार आदमी साथ हैं।
तुमने कभी खयाल किया कि दस हजार लोग नारा लगाते जाते हों, तुम्हारे पैर में भी थिरकन होने लगती है, हृदय में जोश आ जाता है--
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।।
बड़ा जोश भरता है। सारे दुनिया की राजनीति और सारे दुनिया की मूढ़ताएं तुम्हारी भीड़ की तलाश के कारण चलती हैं। अन्यथा कौन पागल होगा!
मैंने--एक नगर में मैं बहुत वर्ष तक रहा, तो मैंने बहुत गौर से अध्ययन किया तो मैं बड़ा हैरान हुआ, करीब-करीब वे ही लोग हरेक के जुलूस में जाते हैं। पहले तो मैं सोचता था कि अलग-अलग लोग जाते होंगे। मेरे खुद एक परिचित, वे सभी राजनैतिक पार्टियों के सदस्य हैं। मैंने उनसे पूछा, तुम यह क्या करते हो?
उन्होंने कहा, अपने को इससे क्या मतलब! मजा आता है।
जनसंघ में भी जाते हैं, कांग्रेस में भी जाते हैं, कम्युनिस्टों से भी उन्हें एतराज नहीं। सर्वधर्म समभावी हैं। सब में सम्मिलित हैं। और हर जुलूस में हाजिर हैं वे। तुम उनको सदा झंडे के पास पाओगे! और नारा कोई भी हो, वे लगाने को राजी हैं।
नारे से मतलब नहीं है। वह जो लगाने का मजा है, वह जो बल मालूम पड़ता है कि दस हजार आदमी मेरे साथ नारा लगा रहे हैं, उसका मजा है। आदमी पागल है। तुम्हारी राजधानियां पागलों से भरी हैं। तुम्हारे नेता तुमसे ज्यादा रुग्ण हैं। तुम्हें तो कभी-कभी संदेह भी पकड़ता है, उन्हें संदेह भी नहीं पकड़ता। वे मान कर ही चलते हैं कि उनके द्वारा जगत का उद्धार होना है। तुम्हें  तो थोड़ा संदेह भी पकड़ता है कि होगा जगत का उद्धार कि नहीं। क्योंकि अपना ही उद्धार तो हो नहीं पा रहा है। तो जिसको खयाल है कि जगत का उद्धार मेरे द्वारा होगा, वह बिलकुल ही पागल है। उसने बिलकुल होश ही खो दिया है। अब वह नशे में  है।
भीड़ बड़ा नशा देती है। भीड़ से बड़ी कोई शराब नहीं। इसलिए भीड़ ने जितने बड़े पाप किए हैं, इक्के-दुक्के व्यक्तियों ने नहीं किए। मुसलमानों की भीड़ मंदिर को जला देती है, हिंदुओं के घरों में आग लगा देती है। हिंदुओं की भीड़ मुसलमानों को नष्ट कर देती है, मस्जिद को गिरा देती है।
तुम एक-एक मुसलमान से पूछो, जिसने मंदिर को जलाया। वह भी कहेगा कि नहीं। उससे पूछो, अकेले तुम कर सकते थे, अगर भीड़ न होती? तो वह भी सोचता है। हजार प्रश्न उठते हैं कि इसको क्या फायदा है मंदिर को जलाने से? और मंदिर में भी तो आखिर परमात्मा ही है, अल्लाह ही है।
तुम हिंदू से पूछो अकेले में कि तुमने यह जो मुसलमानों की हत्या कर दी, आग लगा दी, यह तुम अकेले लगा सकते थे? तुम्हें खयाल न आता कि छोटा बच्चा इसमें जलेगा, औरत इसमें जलेगी, बीमार बूढ़ा घर में पड़ा है वह जलेगा? तुम्हें खयाल न आता? तुम इन सब बातों को भूल जाते, आग लगा देते? वह भी कहेगा कि नहीं, जरा मुश्किल होता। केरोसिन इतनी आसानी से नहीं फेंक पाता। वह तो भीड़ थी। मैं कुछ था ही नहीं।
भीड़ में तुम्हारा दायित्व समाप्त हो जाता है। तब तुम्हारी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। तुम भीड़ के एक हिस्से हो। ध्यान रखना, भीड़ से सावधान रहना, अन्यथा तुम्हारे जीवन में साधुत्व का दीया कभी भी न जल सकेगा।
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
चलो भीतर की तरफ, एकांत की तरफ, अकेले की तरफ। क्योंकि वहीं सत्य है और वहीं से द्वार परमात्मा का है। तुम्हारे ही घट में बसा है वह, जिसे तुम न मालूम घट-घट में खोज रहे हो।
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
यह वचन बड़ा अदभुत है!
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
साधु में और असाधु में, सांसारिक में इतना ही अंतर है। इसलिए बनती नहीं दोनों में।
साधु की समाज से कभी नहीं बनती। और अगर तुम कहीं ऐसा साधु पाओ जिसकी समाज से बनती है, तो समझना कि वह साधु न होगा। साधु की समाज से बन कैसे सकती है! असंभव है। क्योंकि साधु की यात्रा ही उलटी है। वह भीड़ को छोड़ कर चलता है।
कबीर ने कहा है: सिंहों के नहीं लेहड़े, साधु की नहीं जमात।
सिंह कोई भीड़ और जुलूस और प्रोसेशन तो निकालते नहीं। साधु की क्या कोई जमात है! उसने तो जान लिया, अकेला आया हूं, अकेला जाना है, अकेला हूं। ये दो अकेलेपन के बीच में साथ झूठ है, प्रपंच है। आया अकेला, जाऊंगा अकेला, बीच में साथ कैसे हो जाएगा? अकेला होना मेरा स्वभाव है। जन्मा अकेला, मरूंगा अकेला, तो साथ होना धोखा है।
इस साथ होने का नाम संसार है। वह संसार आदमी की ईजाद है। वह तुमने-हमने बनाया है। वह हमत्तुम ने मिल कर बनाया है। वह एक सपना है--साथ होने का सपना! पति है, पत्नी है, बेटा है, मां है, भाई है, मित्र हैं, सहधर्मी हैं, गुरुभाई हैं--हजार रास्ते हैं आदमी के। साथ हूं, अकेला नहीं हूं। जन्मे तुम अकेले थे, मरते वक्त अकेले हो जाओगे, बीच की दो घड़ी को तुमने साथ का संसार बसाया।
नहीं, साधु उसमें भरोसा नहीं करता। साधु कहता है, जैसा आया था, जैसा जाऊंगा, वैसा ही रहूंगा। अकेला हूं। अकेला होना मेरा स्वभाव है। अपने को साधूंगा। उस साधने से जो भी जीवन बन जाएगा, स्वीकार करूंगा। दूसरों की आंखों में न झांकूंगा। सम्मान और समादर मेरे लिए मूल्यवान नहीं है। क्योंकि मौत सब छीन लेगी।
तो समाज जिस चीज को मूल्य देता है, साधु मूल्य नहीं देता। साधु जिस चीज को मूल्य देता है, समाज की समझ के बाहर है।
दादू ऐतां अंतरा...
इतना अंतर है दोनों में। छोटा ही अंतर है ऐसे तो। एक अपनी तरफ चल पड़ा, दूसरा दूसरों की तरफ चल रहा है। चल दोनों रहे हैं, दिशा का जरा सा भेद है। जरा तुम भी करवट ले लो तो साधु की तरफ चल पड़ोगे।
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
इसलिए साधु सदा विद्रोही है, बगावती है। साधु सरकारी नहीं हो सकता। और हो जाए तो सावधान हो जाना। जब साधु सरकारी होता है तो वह एजेंट होता है। तब उसका काम कुल इतना होता है कि वह राज्य की सेवा करे, लोगों को सांत्वना दे, लोगों को समझाए। लोगों को भड़का न दे। वह राज्य और लोगों के बीच मलहम-पट्टी बन जाए। वह सदा लोगों को समझाता रहे, ताकि क्रांति की कोई संभावना जगने न पाए। इसीलिए तो कार्ल माक्र्स ने धर्म को अफीम का नशा कहा। उसे सच्चे साधुओं का पता नहीं था। उसने सरकारी साधुओं को ही साधु होना समझ लिया। तो उसने धर्म को अफीम का नशा कहा कि यह लोगों को बेहोश करने की तरकीब है।
तुम गरीब हो, तो सरकारी साधु तुमसे कहेगा, भाग्य के कारण गरीब हो। तुम कर ही क्या सकते हो? अगर बुरे कर्म किए तो आगे भी गरीब रहोगे। अब अच्छे कर्म कर लो ताकि आगे अमीर हो जाओ। अगर तुम दुखी हो, पीड़ित हो, तो साधु सांत्वना देगा। वह कहेगा कि धीरज रखो, भरोसा रखो, गड़बड़ मत करो। क्योंकि गड़बड़ से तो और गड़बड़ी हो जाएगी।
ध्यान रखना, असली साधु संतोष की संभावना बनाएगा। झूठा साधु, सरकारी साधु सांत्वना देगा। सांत्वना और संतोष में जमीन-आसमान का भेद है। संतोष तो वैसी दशा का नाम है, जहां तुम इतने आह्लादित हो गए कि बाहर के दुख दुख न रहे। छोटी-मोटी पीड़ाएं गिर गईं। उनका कोई मूल्य न रहा। तुम्हारे पास कपड़े फटे-पुराने हैं या हीरे-जवाहरातों से जड़े हैं, बहुत फर्क न रहा। तुम भीतर ऐसे हीरे-जवाहरातों से जड़ गए कि अब बाहर तो सब कूड़ा-करकट हो गया। संतोष तो आनंद-अनुभव का फल है। सांत्वना, केवल अपने को समझाना है ताकि कुछ गड़बड़ न हो, तुम घिसते-पिसते समाज के साथ चलते रहो। जैसा है, ठीक है।
साधु और समाज की बन नहीं पाती। महावीर और समाज की नहीं बनी। बुद्ध और समाज की नहीं बनी। जीसस और समाज की नहीं बनी। लेकिन अब अच्छी तरह बन रही है। मरे हुए जीसस की ईसाइयों से ठीक से बन रही है। जिंदा जीसस की नहीं बनी थी। जिंदा महावीर की न बनी थी। मरे महावीर की जैनियों के साथ खूब मौज से छन रही है। कोई अड़चन नहीं है।
क्योंकि जब साधु मुर्दा हो जाता है तब तुम्हें तो बदल ही नहीं सकता। तुम ही उसको बदल डालते हो। तुम उसकी ऐसी व्याख्या कर लेते हो जो तुम्हारे अनुकूल है। जब साधु जिंदा होता है तब तो तुम व्याख्या न कर सकोगे उसकी। तब तो वह जीवित है। वह तुम्हें बिगाड़ने न देगा। वह तुम्हें अपने मतलब न निकालने देगा। वह तुम्हें अपनी भ्रांति में डूबने न देगा। वह तुम्हें सोने न देगा, वह जगाता ही रहेगा। वह तुम्हें चौंकाता ही रहेगा। तुम कितने ही नाराज होओ। वह तुम्हें हिलाता रहेगा कि जागो, तुम फिर सो गए। लेकिन जब साधु मर गया, तुम मजे से सो जाते हो। नींद में तुम सपना देखते हो कि तुम जागे हुए हो। अब कोई डर न रहा। अब सब निश्चिंत है। साधु मरा हुआ है, तुम सोए हुए हो। साधु जिंदा है, तुम्हें सोने नहीं देता। जगा कर रहेगा।
इसीलिए मरे गुरुओं की पूजा हजारों साल तक चलती है। जिंदा गुरुओं को पत्थर। जिंदा गुरुओं को गालियां। जिंदा गुरु को अपमान, मरे हुए गुरु को सम्मान। यह तुम्हारा गणित है।
अगर महावीर वापस लौट आएं तो जैनी सबसे पहले उनको इनकार करेंगे। किसी को अड़चन न होगी। शायद दूसरों में कुछ लोग मिल भी जाएं, जो कहें कि हो सकता है ठीक आदमी हो; लेकिन जैनी सबसे पहले इनकार करेंगे। क्योंकि उनकी तो नींद बिलकुल खराब कर देगा यह आदमी।
दोस्तोवस्की ने जीसस को अपनी एक कहानी में वापस लौटाया है। दोस्तोवस्की का एक उपन्यास है: ब्रदर्स कर्माझोव। बड़ा बहुमूल्य है। अठारह सौ साल बीत गए हैं। और जीसस ने सोचा कि अब तो आधी दुनिया ईसाई हो गई, अब मैं वापस जाऊं। अब मेरा स्वागत हो सकेगा। मैं जरा समय के पहले पहुंच गया था। लोग तैयार ही न थे। अब तो गांव-गांव मेरे चर्च हैं। घर-घर बाइबिल है। कंठ-कंठ में मेरा क्रास लटका है। लाखों मेरे पंडित-पुरोहित हैं। अरबों की संख्या हो गई है मेरे मानने वालों की। अब वक्त आया ठीक। मौसम अब है। अब मुझे जाना चाहिए।
तो वे उतरे बेथलहम के छोटे से गांव में, जहां उनका पहले जन्म हुआ था। उन्होंने रविवार का दिन चुना। क्योंकि बाकी दिन तो ईसाई ईसाई होते नहीं, रविवार के दिन ही होते हैं। छह दिन तो कोई ईसाई होता नहीं। बाजार में कौन ईसाई है, कौन हिंदू है, कौन मुसलमान है! सब चोर हैं, सब शोषक हैं। छठवें दिन काम-धंधा बंद करके, साफ-सुथरे कपड़े पहन कर लोग चर्च पहुंच जाते हैं, ईसाई हो जाते हैं, परमात्मा का गीत गाते हैं।
जीसस रविवार के दिन बेथलहम के बाजार में एक वृक्ष के नीचे आकर खड़े हो गए चर्च के सामने ही। सोचा था, अब तो लोग पहचान लेंगे। पहले तो जब मैं आया था, मुझे चिल्ला-चिल्ला कर कहना पड़ा कि मैं परमात्मा का संदेशवाहक हूं। फिर भी लोगों ने माना नहीं। अब तो लोग खुद ही पहचान लेंगे। अब तो किसी को बताना नहीं है। वे चुपचाप खड़े रहे।
भीड़ इकट्ठी हो गई बाजार में। आवारा लड़के पत्थर फेंकने लगे, लोग हंसने लगे। किसी आदमी ने खिलखिला कर कहा कि रूप तो बिलकुल जीसस जैसा ही बनाया है। मगर जल्दी करो, भाग जाओ यहां से। अगर पुलिस को पता चल गया, मुसीबत में पड़ोगे। और फिर जल्दी ही पुरोहित आने वाला है। चर्च की प्रार्थना पूरी होने के करीब है। अगर पुरोहित को पता चल गया तो झंझट में पड़ोगे। हथकड़ी पड़ जाएंगी। क्योंकि ऐसा नाटक नहीं चलेगा।
जीसस ने कहा, मैं नाटक नहीं कर रहा हूं। मैं जीसस हूं!
लोगों ने कहा, वाह खूब रही! नाटक भी खूब कर रहे हो और दिमाग भी खराब मालूम होता है। भाग जाओ समय रहते!
जीसस थोड़े डरे भी, चिंतित भी हुए कि यह मामला क्या है! लेकिन सोचा कि शायद ये लोग ईसाई नहीं हैं। ईसाई तो चर्च गए हुए हैं।
चर्च से भीड़ आई तो भीड़ ने तो फौरन जीसस को बहुत डांटा-डपटा। वहां पूजा करके आ रहे थे। वहां जीसस सूली पर लटके हैं मुर्दा! यहां जिंदा आदमी खड़ा है। बहुत डांटा-डपटा कि यह ठीक नहीं है। यह अपमान है हमारे भगवान का। उतरो नीचे वृक्ष के और ये कपड़े बदलो।
पर जीसस ने इधर-उधर देखा कि शायद पुरोहित तो पहचान लेगा। वर्षों अध्ययन किया है, आंखें फोड़ी हैं बाइबिल पर। मेरे ही गुणगान किए हैं। वह तो कम से कम पहचान लेगा। ये लोग तो श्रावक हैं। ये शायद न पहचान पाएं।
तब पुरोहित आया। लोगों ने जल्दी रास्ता दे दिया, झुक-झुक कर नमस्कार किया। ईसा को बड़ी हैरानी हुई। कोई मुझे झुक कर नमस्कार नहीं कर रहा है। मेरे पुरोहित को, जिसके गले में मेरा क्रास लटका है, उसको लोग झुक-झुक कर नमस्कार किए।
पुरोहित नीचे आया और उसने कहा कि नीचे उतर! यह शरारत यहां न चलेगी।
तब तो जीसस को बड़ा धक्का लगा कि यह तो मुझे पहचानता नहीं। मेरा ही नौकर, मेरा ही पुजारी! वे नीचे उतर गए। लोगों ने उन्हें घेर लिया और चर्च की तरफ ले गए। चर्च में अंदर जाकर जीसस को एक कोठरी में बंद कर दिया। आधी रात...जीसस सोचते रहे कि यह क्या फिर से फांसी लगेगी? यह तो सब मामला वैसा ही का वैसा है। कुछ भी बदला नहीं।
इस दुनिया में कभी कुछ बदलता नहीं। सब वैसा ही का वैसा है। महावीर आते हैं, बुद्ध आते हैं, जीसस आते हैं, चले जाते हैं। लोगों के अज्ञान पर लकीर भी नहीं खिंचती। वे फिर अपनी नींद में लीन हो जाते हैं। थोड़ी देर डगमगा गए थे, थोड़ी गड़बड़ की इन लोगों ने। वे कहते हैं, अब चलो सब शांति है। फिर से सो जाओ।
आधी रात जीसस जागे हैं, अंधेरे में बैठे हैं, सोचते हैं कि यह तो व्यर्थ हुआ। और तब तो मैं सोचता था कि यहूदी हैं जिन्होंने मुझे सूली दी। अब तो ये ईसाई हैं। अपने ही लोग अब मुझे मारेंगे? यह तो और भी बेहूदी बात हो गई। तब तो कुछ समझ में भी आता था कि विपरीत थे, दूसरे धर्मीय थे। अब तो अपने धर्म के लोग हैं।
तब आधी रात द्वार खुला, पुरोहित भीतर आया दीया लेकर, दीया उसने रखा, गिर पड़ा जीसस के चरणों में। जीसस ने कहा, यह तुम क्या कर रहे हो? सुबह तो तुमने ऐसा दर्ुव्यवहार किया!
उसने कहा, आपसे साफ बात कह दूं। मैं पहचान गया। आंखें ऐसे ही व्यर्थ खराब नहीं की हैं। जीवन भर तुम्हारे ही गीत गाने में बिताया, तुम्हें न पहचानूंगा? लेकिन बाजार में पहचानने की बात मत करो। भीड़-भाड़ में नहीं पहचान सकता हूं। और तुमसे हमारी इतनी ही प्रार्थना है कि आपकी कोई भी जरूरत नहीं है। काम सब ठीक चल रहा है। हम अच्छी तरह चला रहे हैं। तुम्हारे आने से फिर उपद्रव होगा। क्योंकि तुम सदा के उपद्रवी हो। बगावत तुम्हारे खून में है।
उस पुरोहित ने जरूर बड़ी महत्वपूर्ण बातें कहीं।
तुम न आओ। नहीं तो तुम्हें फिर फांसी लगेगी। और हमें पीड़ा होगी तुम्हें फांसी देने में, लेकिन देनी पड़ेगी। क्योंकि या तो तुम बचोगे या चर्च बचेगा। दोनों साथ नहीं बच सकते। अगर तुम बचे तो चर्च नष्ट हो जाएगा। यह हमने जो अठारह सौ साल में इतना फैलाव किया है, यह जो इतना बड़ा हमने विस्तार किया है, सब मिट्टी में मिला दोगे तुम। तुम्हारी शिक्षाएं ठीक हैं प्रवचन देने के लिए; मानने के लिए बड़ी खतरनाक हैं। और हमने इतना धन, इतनी संपदा, इतने चर्च सब खड़े किए हैं। यह कोई तुम्हारी शिक्षा मान कर नहीं चल सकता था कि जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे उसके सामने तुम दूसरा गाल कर दो। अगर ऐसा हम करते तो यह सब लुट जाए। इसके लिए ताकत चाहिए। तुम्हारी शिक्षा बड़ी सुंदर है, लेकिन संसार के लिए नहीं है। वह साधुपुरुषों के लिए है। हमने तुम्हें पहचान लिया था सुबह भी, लेकिन मजबूरी है। हमें मजबूर मत करो। तुम्हारी कृपा होगी, तुम यहीं से विदा हो जाओ। यह बात आगे न बढ़े। अन्यथा अपने ही लोगों के हाथ तुम्हें सूली झेलने की तैयारी हो तो तुम्हारी मर्जी।
यही होगा। यह कहानी बिलकुल सही है। महावीर आएं, जैनी पहली दफा उनको सबसे पहले पुलिसथाने में खबर करेंगे कि यह आदमी गड़बड़ है। यह हमारे महावीर की नकल कर रहा है। बिलकुल नग्न खड़ा है। और नग्न खड़ा होना तो बिलकुल अशोभन है। इसको बंद करो।
अगर कृष्ण कहीं बांसुरी बजाने लगें खड़े होकर, तो तुम क्या करोगे? मोर-मुकुट लगाए हुए! बड़ी हंसी-मजाक हो जाएगी। पुलिस कहेगी, इस शक्ल-सूरत में रास्ते पर नहीं खड़े हो सकते। ट्रैफिक को बाधा पड़ती है। तुम्हें देख कर भीड़ इकट्ठी होती है। यह सड़क है, कोई नाटक-गृह नहीं। यह नौटंकी यहां मत करो। और अगर गोपियां नाचने लगें, तो पुलिस कहेगी, यह नाच गणपति में नहीं चलेगा। यह यहां नहीं हो सकता। यहां सज्जन लोग रहते हैं, सुसंस्कृत लोग रहते हैं।
जीवित गुरु के साथ तुमने सदा दर्ुव्यवहार किया है। तुम्हारी मजबूरी है। जीवित गुरु का स्वभाव वैसा है।
दादू ऐतां अंतरा...
क्योंकि तुम अलग जा रहे हो बाहर की तरफ, वह भीतर की तरफ जा रहा है। तुम पूरब जाते हो, वह पश्चिम जाता है। तुम्हारी पीठ एक-दूसरे की तरफ है। तुम्हारा मेल नहीं हो पाता। और तुम्हें उसके भीतर की तरफ जाने से बड़ी पीड़ा होती है कि अगर यह आदमी सही है तो हम गलत हैं। तो अपने को बचाने के लिए तुम उस आदमी को गलत सिद्ध करने की सब चेष्टाएं करते हो। वह तुम्हारी आत्मरक्षा का उपाय है।
...ताथैं बनती नाहिं।
इसलिए बनती नहीं है साधु में और समाज में। और जब बन जाए, तब या तो साधु मुर्दा होगा, मर चुका होगा या साधु ही न होगा।
झूठा सांचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दादू कहते हैं, सब करके देख लिया। ऐसा नहीं है कि बिना कुछ किए भीतर की तरफ मुड़ गए। कौन मुड़ा है? बाहर का अनुभव करना ही पड़ेगा।
झूठा सांचा कर लिया...
सब झूठ-सांच, सब कर लिया।
...विष अमृत जाना।
विष को भी अमृत मान कर पी लिया। वह भी सब करके देख लिया है।
दुख को सुख सबके कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
और पागलों की भीड़ ने हमसे भी कहा कि दुख ही सुख है। हमने भी उसको सुख माना।
दुख को सुख सबके कहै...
सबके कहने से हमने भी मान लिया कि ठीक है। क्योंकि और तो कोई जानना भी न था। दूसरों का ही मानना था। बच्चा पैदा होता है, उसे कुछ पता भी नहीं है। जिसको मां सुख कहती है, बाप सुख कहता है, उसी को सुख वह भी कहता है। न मां-बाप को पता है कि सुख क्या है। उनके मां-बाप ने जो कहा था उसी को वे दोहराए चले जाते हैं।
यह बच्चा बड़ा होगा, स्कूल जाएगा, पढ़ेगा, गुरुओं से मिलेगा। वे जिसको सुख-दुख कहेंगे उन्हीं को यह भी मानेगा। वे सब कह रहे हैं--सफलता में सुख है। कोई भी नहीं कहता कि सुख में सफलता है। सारा समाज कहे चला जाता है--सफलता में सुख है। तो सफलता का दीवानापन पैदा होता है। दौड़ो, सफल होओ। सफल नहीं हुए तो दुखी हो जाओगे। और कोई देखता भी नहीं कि जो सफल हो गए हैं वे सुखी हैं? बड़े पदों पर पहुंच गए हैं, बड़े धन के ढेर लगा लिए हैं, वे सुखी हैं?
इतनी फुरसत कहां है देखने की! क्योंकि इतनी देर भी तुम रुक कर देखो तो दूसरे निकल जाएंगे। दौड़ भारी है। संघर्ष कीमती है। प्रतिस्पर्धा प्रतिपल है। सोते-जागते भागना है। रुकना नहीं है। रुके तो तुम हारे। दूसरे थोड़े ही रुके रहेंगे! ऐसा तुम सोच-विचार करने लगो रुक कर तो उतने में तुम पिछड़ ही जाओगे। फिर दिल्ली तुम कभी न पहुंच पाओगे। भागो! यह सोचना वगैरह पीछे कर लेना। जब राष्ट्रपति होकर बैठ जाओ, तब सोच लेना कि सफलता में सुख है या नहीं।
लेकिन तब तक बहुत देर हो गई होती है। तब तक तुम्हारी वही हालत हो जाती है जैसी कहानी है--कि एक बंदर की पूंछ कट गई थी। तब तुम्हारी पूंछ कट गई। अब तुम किसी से यह कहो कि पूंछ कटने में सुख नहीं है, तो तुम मूढ़। अब तो तुमको यही समझाना पड़ता है कि पूंछ कटने में बड़ा आनंद आता है। ऐसा आनंद, जिसका कोई हिसाब ही नहीं। ताकि दूसरे भी कटाएं। अब तुम्हारी तो कट ही गई। अब इस बात को कहने से सार क्या है? कोई सार नहीं है। अब तो चुपचाप इसको झेल लेना ही उचित है। जिंदगी भी गई, और अब लोगों के मन में से यह भाव भी चला जाए कि तुम असफल हुए जिंदगी भर दौड़ कर।
सभी सफल लोगों की तकलीफ यही है कि उनकी पूंछ कट गई है। दुखी वे बहुत हैं। मैं उन्हें निकट से जानता हूं। उनके दुख का कोई अंत नहीं। तुमसे ज्यादा दुखी हैं। लेकिन इस बात की घोषणा नहीं की जा सकती। जब बाहर निकलते हैं तो चेहरे पर मुस्कुराहट लेकर, प्रसन्नता की गंध फैलाते हुए निकलते हैं, ताकि लोगों को दिखाई पड़े कि वे सफल हो गए और सुखी हो गए। और पुरानी भ्रांति को बल मिलता है।
दादू कहते हैं: दुख को सुख सबके कहै...
दुख ही दुख था। सुख कुछ था नहीं, लेकिन सबने कहा इसलिए उसको भी माना। अब समझ में आया कि जगत भी कैसा दीवाना! कि लोग कैसे पागल!
लेकिन किसी का कोई कसूर नहीं है। क्योंकि हर आदमी यहां आता है, जगत पहले से तैयार पाता है। तुम आए तब तीन अरब आदमी जमीन पर संसार बना कर खड़े ही थे। उनका जाल तैयार था। तुम उसी जाल में गिरते हो। तुम अकेले, तीन अरब लोगों का जाल--तुम लड़ भी क्या सकते हो! छोटा बच्चा लड़ेगा भी कैसे! वह उसी जाल में दीक्षित होता है, शिक्षित होता है। स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय उसी जाल के द्वारा चलाए जा रहे हैं। शास्त्र, शास्त्रों की व्याख्याएं, साहित्य उसी जाल के द्वारा रचे जा रहे हैं। स्वभावतः छोटा बच्चा कुछ भी न जानते हुए अपनी कोरी स्लेट पर वही लिख लेता है जो उपलब्ध है। बहुत मुश्किल से कभी-कभी इतने हिम्मतवर लोग होते हैं जो लौट कर देखते हैं और पहचानते हैं कि--
झूठा सांचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सबके कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
और तब इतनी हिम्मत रखते हैं कि अब इतने आगे बढ़ आए इस पागलपन में, इसे कैसे छोड़ें, डर लगता है। यही तो सहारा है। यह गया तो बिलकुल खाली हो गए। इतनी हिम्मत समझने की, फिर इतनी हिम्मत इसके बाहर हो जाने की।
इसलिए धर्म दुस्साहस है। उससे बड़ा कोई साहस नहीं। चांद पर जाने में कोई बड़ा साहस नहीं। प्रशिक्षण की जरूरत है। हिमालय चढ़ जाने में कोई बड़ा साहस नहीं। लेकिन धार्मिक होना बड़े से बड़ा दुस्साहस है। क्योंकि उसका अर्थ है इस बात की स्वीकृति कि विष को अभी तक अमृत जाना था, दुख को सुख जाना था, झूठ को सच माना था। इस बात को मानने के साहस का अर्थ है कि मैं अब तक मूर्ख था, मूढ़ था, अज्ञानी था। यही तो पीड़ा है। तुम पचास साल के हो गए, साठ साल के हो गए, साठ साल की जिंदगी तुमने मूढ़ता में बिताई? तो तुम्हारा अहंकार कहां टिकेगा?
अहंकार कहता है, अब जो हो गया, हो गया। अब किसी को कहो मत। अब चुप ही रहो। ऐसे तो लुट ही गए। अब कहने से भी क्या सार है? अब और लोगों को पता चल जाए कि मूढ़ थे तुम, और लोग हंसेंगे। कुछ ऐसा नहीं कि वे समझ लेंगे कि तुम ज्ञानी हो गए। वे कहेंगे, अब तुम पक्के मूढ़ हो। साठ साल क्या बेकार गंवाते रहे? पहले क्यों न जागे अगर बड़े समझदार थे?
तो जब आदमी को पता चलता है कि जीवन व्यर्थ गया, तब भी वह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जो ऐसी हिम्मत जुटाता है उसी को मैं संन्यासी कहता हूं। संन्यास इसी बात की घोषणा है कि अब मैं कहता हूं घोषणापूर्वक कि अब तक जो मैंने सुख जाना था वह दुख था। अब तक मैंने जो अमृत जाना था वह विष था। अब तक जिसको मैंने बुद्धिमत्ता कहा था वह मूढ़ता थी। और जिन पर मैंने भरोसा किया था वे दीवाने थे, पागल थे। और मैं पागलों का एक हिस्सा था। अब मैं उससे उठता हूं, अलग होता हूं। इसका जो भी परिणाम हो।
सांचे का साहब धनी, समरथ सिरजनहार।
पाखंड की यह पिर्थवी, परपंच का संसार।।
अगर तुम इतना भी सत्य अहसास कर लो कि तुम अब तक भटकते रहे, तो मंजिल करीब आ गई। क्योंकि जिसको यह समझ में आ गया कि मैं अब तक भटकता रहा, उसे मंजिल की झलक मिल गई। अन्यथा समझ में आ ही नहीं सकता। जिसे यह दिखाई पड़ गया कि झूठ झूठ है, उसे सत्य की पहली प्रतीति हो गई। अन्यथा तुम तौलोगे कैसे कि झूठ झूठ है? जिसको समझ में आया कि यह विष है, अमृत नहीं, उसको अमृत की भनक पड़ गई। उसके कानों में खबर आ गई। उसके रोओं ने अनुभव कर लिया। उसके भीतर कोई जाग गया, जिसने कहा कि यह सब व्यर्थ है।
व्यर्थ का बोध सार्थक की शुरुआत है। असत्य की प्रतीति सत्य की तरफ पहला कदम है। अज्ञानी होने का अहसास ज्ञान की क्रांति की शुरुआत है।
सांचे का साहब धनी...
और जिसने सच की तरफ यात्रा शुरू कर दी, परमात्मा उसका मालिक है।
...समरथ सिरजनहार।
और जिसने सब बनाया, जिसका सब है, उसके ही तुम हो। वह समर्थ है। तुमने अब अपनी नाव उसी के हाथ में छोड़ दी। अब तुम कहते हो--जहां तू ले जाए। अब तक तो हमने ले जाने की कोशिश की, सिर्फ भटके। किनारे से पास तो न आए, उलटे दूर गए। अब तक हम अपनी नाव को खुद ही खे रहे थे। रामकृष्ण ने कहा है, नाव को खेने के दो ढंग हैं। एक तो है, खुद खेना पतवार से, अपनी ताकत से। और एक है, पाल को खुला छोड़ देना और उसकी हवाओं के सहारे।
अब तक तुम अपनी ही पतवार से खे रहे हो। अपने पर बड़ा भरोसा है कि मैं ठीक हूं, मैं जानता हूं। सच क्या है, मुझे पता है। सुख क्या है, मुझे पता है। ऐसे तुम अपनी पतवार से नाव खे रहे हो। पहुंचे तुम कहीं नहीं। किनारे से दूर होते गए हो। जितने सफल हुए हो, उतने असफल हुए हो। और जितना तुमने सोचा कि सुख करीब आया, उतना तुमने दुख के महागर्त में अपने को पाया। तुम समझे कि पहाड़ चढ़े, जब आंख खुली तो पाया कि गङ्ढे में पड़े हो। सपनों में पहाड़ चढ़े हो भला, यथार्थ में गङ्ढों में गिरते गए हो। तुम्हारे जीवन की निष्पत्ति नरक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
सांचे का साहब धनी, समरथ सिरजनहार।
पाखंड की यह पिर्थवी, परपंच का संसार।।
यह जो आदमियों ने बना रखा है संसार, यह तो सब झूठ का है। ये तो झूठे खेल इसमें चल रहे हैं। पारस्परिक असत्य के संबंध चल रहे हैं। जो नहीं है वैसा मान कर हम चल रहे हैं।
एक स्त्री को तुम विवाह कर लाए, सात चक्कर लगा लिए अग्नि के। वह तुम्हारी हो गई सात चक्कर लगाने से? कल तक कोई भी न थी, आज सब कुछ हो गई सात चक्कर लगाने से! सत्तर लगाओ तो भी क्या होगा? चक्कर लगाने से किसी का अपना होने से क्या संबंध है? लेकिन एक भ्रांति पैदा हो गई कि मेरी है। सहारा मिला। उसको भी सहारा मिला कि तुम उसके हो। अब तुम एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हो। एक-दूसरे के कंधे पर हाथ का सहारा ले सकते हो। अब तुम सोच सकते हो कि कोई तुम्हारा है।
यह परपंच है। कोई किसी का नहीं है। तुम अपने ही हो जाओ तो काफी है।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम पत्नियों को छोड़ कर भाग जाओ। उनका कोई कसूर नहीं है। मैं यह कह रहा हूं, तुम जहां हो वहीं जागो। पत्नी को छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। सिर्फ मेरा भाव छूट जाए कि यह मेरी; कि मैं इसका। तो तुम दोनों परमात्मा के हो। अभी तुम पत्नी के हो, पत्नी तुम्हारी है। तुमने एक अलग दुनिया बना ली परमात्मा के जगत से। तुमने अपना एक घर-संसार बना लिया। तुम्हारे बच्चे हैं, तुम्हारी धन-दौलत, तुम्हारी तिजोड़ी, बैंक-बैलेंस। तुमने अलग ही तोड़ लिया अपने को। तुम अब समष्टि के हिस्से नहीं हो।
भागने से कुछ भी न होगा, जागने से होगा। जागने का मतलब यह है कि तुम अचानक जाग कर देखते हो, यह भी कैसा सपना देख रहा हूं! कौन मेरा है! अकेला आया, अकेला जाऊंगा, अकेला हूं। पत्नी कितने ही पास हो, तो भी फासला अनंत है। कोई भागने का सवाल नहीं है। खुद जागो, उसे भी जगाओ कि हम दोनों परमात्मा के हैं। यह जो बीच में हमने एक अपनी दुनिया बना ली थी, एक निजी संसार बना लिया था, वह झूठ है, वह प्रपंच है।
पाखंड की यह पिर्थवी...
पाखंड को पृथ्वी कह रहे हैं दादू, पृथ्वी को पाखंड नहीं कह रहे हैं। इसको समझ लेना।
पाखंड की यह पिर्थवी...
वे इस पृथ्वी को पाखंड नहीं कह रहे हैं। पृथ्वी तो बड़ी सच्ची है, उसको तो पाखंड का कोई भी पता नहीं। लेकिन जिस पृथ्वी पर तुम रह रहे हो, वह पाखंड की है। तुमने एक जमीन का टुकड़ा घेर लिया, बागुड़ लगा दी, कहते हो, मेरी। यह जो "मेरी' पृथ्वी है, यह पाखंड हो गई। सब उसका है। तुम्हारा क्या है? तुम यहां नहीं थे, तब भी पृथ्वी थी। तुम नहीं रहोगे, तब भी पृथ्वी रहेगी। आदमियत न थी, तब भी थी पूरी; आदमियत खो जाएगी किसी दिन, तब भी रहेगी। पक्षी ऐसे ही गीत गाएंगे, वृक्ष ऐसे ही हरे होंगे, हवाएं ऐसी ही चलेंगी। किसी को तुम्हारे न होने का पता भी न चलेगा। तुम थे कि तुम नहीं थे, कोई अंतर न आएगा। यह जगत की कथा ऐसी ही चलती रहेगी। नहीं, यह पृथ्वी तुम्हारी नहीं है। लेकिन तुमने एक और पृथ्वी बना ली है--भारत! यह पाखंड। पाकिस्तान! यह पाखंड। पृथ्वी उसकी है, खंड तुम कैसे करते हो? कहां तुम रेखा खींचते हो पाकिस्तान की? किस आधार पर खींचते हो? तुम्हारी रेखा तुम्हारे पागलपन की खबर देती है, लेकिन पृथ्वी के बंटने की कोई खबर नहीं देती। पृथ्वी को पता ही नहीं कहां पाकिस्तान शुरू होता है, कहां हिंदुस्तान शुरू होता है।
मैंने सुना है, जब भारत और पाकिस्तान बंटा, तो एक पागलखाना था। राजनेता बंटवारे में लगे थे, उनको किसी को खयाल ही न रहा कि पागलखाना कहां जाए। वह बिलकुल सीमा पर था। आधा इस तरफ, आधा उस तरफ। पागलखाने की फिक्र भी किसको थी! कौन उत्सुक था उसको लेने के लिए! कोई भी ले ले। इसलिए किसी ने ज्यादा चिंता न की। सब बंटवारा हो गया तब पता चला उसका तय नहीं हुआ पागलखाने का। उसको कहां जाना, क्या करना। तो जैसा बड़े पागलखाने में हुआ था कि हिंदुओं से पूछ लो, मुसलमानों से पूछ लो; ऐसा ही लोगों ने कहा, उस छोटे पागलखाने में भी यही नियम का उपयोग करो, पागलों से पूछ लो--कहां जाना?
अब पागलों को यही पता होता कहां जाना तो पागल क्यों होते! पागलों से पूछा तो पागलों ने कहा, हमें तो कहीं नहीं जाना। हमें तो यहीं रहना है।
उनको बहुत समझाया कि तुम समझो।
मगर पागल सीधे-सादे थे, जैसे कि पागल सीधे-सादे होते हैं। वे तुम्हारे राजनीतिज्ञों जैसे तिरछे नहीं थे। उनकी समझ में ही न आए। वे बड़े सोच-विचार में पड़े। उन्होंने बड़ा विचार किया, रात सोएं न, एक-दूसरे से समझाएं कि मामला क्या है! अधिकारी कहते हैं कि जाना कहीं भी नहीं है, रहोगे तुम यहीं; फिर भी कहां जाना है? पाकिस्तान में जाना है कि हिंदुस्तान में जाना है?
उनको बात बेबूझ हो गई। यह तो बड़ी पहेली हो गई। कहते हैं कि जाना कहीं भी नहीं है, रहोगे यहीं, और फिर भी पूछते हैं--कहां जाना है? जब जाना ही नहीं कहीं तो पूछना क्या! अगर पूछना ही है तो झूठा आश्वासन क्यों देते हैं कि यहीं रहोगे। इसमें जरूर कोई जालसाजी है।
आखिर कोई निर्णय न हो सका तो अधिकारियों ने कहा, अब वही करो जो बड़े पागलखाने में किया--बीच से एक दीवाल खींच दो, ठीक बीच से। इस तरफ हिंदुस्तान हो जाएगा, उस तरफ पाकिस्तान हो जाएगा।
बीच में दीवाल खींच दी। जिन पागलों की कोठरियां उस तरफ पड़ गईं, वे पाकिस्तान में हो गए। जिन पागलों की कोठरियां इस तरफ पड़ गईं, वे हिंदुस्तान में हो गए।
मैंने सुना है कि अभी भी पागल भरोसा नहीं कर पाए कि हुआ क्या! क्योंकि वे हैं तो वहीं। वे कभी-कभी दीवाल पर चढ़ जाते हैं और एक-दूसरे से बात करते हैं कि मामला क्या है? हम हैं वहीं। तुम भी वहीं, हम भी वहीं। बीच में एक दीवाल खींच दी, तुम पाकिस्तानी हो गए, हम हिंदुस्तानी हो गए। तुम हमारे दुश्मन हो गए, हम तुम्हारे दुश्मन हो गए। अधिकारी आ जाते हैं तो दीवालों से उतर कर अपनी कोठरियों में छिप जाते हैं। क्योंकि अधिकारी यह बरदाश्त नहीं करते कि पाकिस्तान- हिंदुस्तान की सीधी कोई वार्ता हो; कि पाकिस्तानी-हिंदुस्तानी मिलें। नहीं; उन्होंने पुलिस के आदमी खड़े कर रखे हैं।
आदमी की बुद्धि बंटी है; जमीन तो बंटी नहीं है। जिस पृथ्वी को दादू कह रहे हैं पाखंड, वह तुम्हारी बुद्धि की बंटी हुई पृथ्वी है। वह तुम्हारे खयालों की पृथ्वी है। वास्तविक पृथ्वी, जिस पर तुम खड़े हो, वह तो अनबंटी परमात्मा की है।
और...परपंच का संसार।
संसार प्रपंच नहीं है, प्रपंच संसार है। वे तुमने जो खेल बना रखे हैं प्रपंच के--पति के, पत्नी के, भाई के, बहन के, दोस्त के, दुश्मन के। हजार तरह के खेल तुमने खेल रखे हैं। ग्राहक, दुकानदार, मालिक, नौकर--न मालूम कितने खेल हैं जो आदमी खेल रहा है। तुम कभी चौबीस घंटे निरीक्षण करो--तुम कितने खेल खेलते हो।
तुम कमरे में बैठे अखबार पढ़ रहे हो, नौकर आता है, तुम ऐसे अखबार पढ़ते रहते हो जैसे कोई मनुष्य प्रविष्ट नहीं हुआ। क्योंकि यह कोई मनुष्य थोड़े ही है, नौकर है। इसका आना-जाना, ध्यान नहीं देना पड़ता। तुम अखबार से आंख भी नहीं उठाते। तुम ऐसा मान कर चलते हो जैसे कुत्ता-बिल्ली गई हो। कुत्ता-बिल्ली भी जाए तो आदमी थोड़ा चौंक कर देखता है। नौकर है!
नौकर कोई आदमी थोड़े ही है। यह किसी का पति थोड़े ही है, किसी का बाप थोड़े ही है। इसके हृदय में थोड़े ही हृदय धड़कता है। इसकी श्वास में थोड़े ही श्वास चलती है। यह नौकर है! एक लेबल है। तुम लेबल के इस तरफ खड़े हो। उस तरफ के आदमी को तुम देखते भी नहीं।
क्योंकि देखने में खतरा है। अगर तुम देखो खेल के बाहर झांक कर, तो हो सकता है इसकी पत्नी बीमार हो, और जो तनख्वाह तुम दे रहे हो, यह मरने के लिए काफी हो, जीने के लिए काफी न हो। इसका बच्चा भूखा हो। अगर तुम आदमी देखो तो तुम झंझट में पड़ोगे। आदमी देखना ही नहीं है। बड़ा लेबल लगा दिया--कि नौकर। उस तरफ छिपा दिया आदमी को। अब हमारा नौकर से लेना-देना है। सौ रुपये महीना देना है वह ले लो। काम करना है वह काम कर दो। काम का तुम्हारा संबंध, पैसे हमें तुम्हें दे देने हैं, इससे ज्यादा कोई नाता नहीं। इससे ज्यादा न हम तुममें देखेंगे, न तुम हममें देखने की कोशिश करना।
फिर तुम्हारा मालिक आता है, जिसके तुम नौकर हो। उछल कर खड़े हो जाते हो। यह मालिक है। पूंछ हिलाने लगते हो। कुर्सी पर बिठाते हो, आगत-स्वागत करते हो। यह भी वैसा ही आदमी है। लेकिन लेबल इस पर दूसरा है। वह जो आदमी था, नौकर था। अब तुम नौकर हो। यह तुम्हारे साथ वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा तुमने अपने नौकर के साथ व्यवहार किया था।
यह खेल है। यह नाटक चल रहा है। तुम्हारी पत्नी है, तुम्हारा बेटा है। अगर तुम्हारा बेटा बीमार है तो परेशान हो। पड़ोसी का बीमार है तो कोई अंतर नहीं पड़ता। यह सिर्फ खेल है। तुम्हें पक्का पता है कि तुम्हारा बेटा तुम्हारा बेटा है? हो सकता है पड़ोसी का हो। किसको क्या पता है? लेकिन लेबल बांध लिए तो हिसाब सीधा हो गया।
फिर खेल की सीमा बना ली है। नियम हैं खेल के, उस हिसाब से चलते हैं। जैसे रास्ते पर चलने का नियम है, बाएं चलो। अमरीका में नियम है, दाएं चलो। वह भी काम देता है, यह भी काम देता है। दोनों खेल के नियम हैं। जरूरी हैं। क्योंकि इतना भीड़-भड़क्का है, अगर सभी लोग सीधे रास्ते पर चलने लगें, जहां जिनको जाना हो, तो चलने में मुश्किल होगी, अड़चन होगी। टहलने वालों को तो कोई अड़चन न होगी, जिनको कहीं पहुंचना है उनको बड़ी मुसीबत हो जाएगी। तो नियम बना लिए हैं, खेल बना लिए हैं।
प्रपंच का अर्थ है, जीवन की वास्तविकता के ऊपर आदमी ने जो अपने नियम थोप दिए हैं। और जिनके आस-पास वह जीता है और जिनके आर-पार कभी नहीं देखता।
रास्ते पर तुम जा रहे हो...गोगोल की एक छोटी कहानी है कि दो पुलिस के आदमी रास्ते से गुजर रहे हैं। एक आवारा कुत्ते को एक आदमी टांग पकड़े खड़ा है। भीड़ इकट्ठी हो गई है। भीड़ तो सदा ऐसी चीजें देखने को बिलकुल आतुर है। कुछ खास नहीं घट रहा है वहां, लेकिन बड़ा चमत्कार हो रहा है जैसे! वह एक आवारा कुत्ते को पकड़े है। वह आदमी भी आवारा। वह कुत्ते को मार डालने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि कुत्ते ने उसे काट खाया है। दो पुलिसवाले भी भीड़ में आकर खड़े हो गए।
पुलिसवाले तो जानते ही हैं कि कुत्ते उनके जानी दुश्मन हैं। कुत्तों का कुछ नाता है। वे कुछ यूनिफार्म के खिलाफ हैं। पुलिसवाला, पोस्टमैन, संन्यासी--वे बड़े खिलाफ हैं। यूनिफार्म जहां दिखी कि कुत्ता एकदम चौंकता है। वह बगावती है, यूनिफार्म का दुश्मन है। तो कुत्ते पुलिसवालों को रात चलने तो नहीं देते आसानी से।
तो एक पुलिसवाले ने कहा, मार ही डाल इस कुत्ते को। शैतान है यह कुत्ता। रात हमको भी तकलीफ देता है। इसकी झंझट खतम करो।
दूसरे पुलिसवाले ने थोड़ी देर गौर से देखा और पहले के कान में कहा कि यह पुलिस कमिश्नर का कुत्ता है। यह कोई साधारण कुत्ता नहीं है, पागल। हम भी फंसेंगे।
वह दूसरा, जो कह रहा था मार ही डाल, एकदम लपका और गर्दन पकड़ ली उस आदमी की और कहा, आवारे आदमी! किसके कुत्ते को मार रहा है? उस कुत्ते को उठा लिया कंधे में, पुचकारा। और उस आदमी को हथकड़ी डाल दी और कहा, इसको ले चलो।
पर दूसरे आदमी ने, दूसरे पुलिसवाले ने फिर से कहा कि नहीं भाई, भूल हो गई। लगता पुलिस कमिश्नर जैसा है, लेकिन है नहीं। यह तो कोई आवारा कुत्ता है।
फौरन उसने कुत्ते को नीचे पटका--कि गंदे कर दिए सब कपड़े! नहाना पड़ेगा! और उस आदमी को छोड़ा और कहा, पकड़ इस कुत्ते को। मार डाल इसको यहीं, इसी वक्त।
लेकिन वह पुलिसवाले ने फिर कहा कि भाई, मुझे संदेह होता है। झंझट है लेना। हो न हो, कहीं पुलिस कमिश्नर का ही न हो।
फिर बात बदल गई। यह प्रपंच है! फिर पकड़ ली गई गर्दन उस आदमी की और कहा कि आवारा! आवारा कुत्ता तू है असल में। चल थाने! तू किस कुत्ते को मार रहा है? वह कुत्ता कंधे पर उठा लिया गया। फिर पुलिसवाला उसको पुचकार रहा है।
कुत्ते से किसी को मतलब नहीं है, उस आदमी से किसी को मतलब नहीं है। वह कुत्ता पुलिस कमिश्नर का है तो सब बदल जाता है।
तुम भी खयाल करो; अपनी जिंदगी में तुम रोज ऐसी घटनाएं पाओगे। पुलिस कमिश्नर का कुत्ता--बात ही और है। मिनिस्टर साहब का साला--बात ही और है। अब इससे क्या लेना-देना है किसी का! कुत्ता हो कि साला हो, इससे क्या लेना-देना है! नहीं लेकिन, फौरन बदल जाती है बात। अभी यह आदमी बिलकुल आवारा दिख रहा था, लेकिन तत्क्षण पता चला कि मिनिस्टर साहब का साला है, तो तुम झुक गए। लेकिन तभी किसी ने कान में कहा कि यह भूतपूर्व मिनिस्टर का है। बात खतम हो गई। मरने दो, जाने दो। लेना-देना क्या है भूतपूर्व मिनिस्टर से!
हिंदुस्तान में और नहीं तो कम से कम एक हजार भूत-प्रेत की तरह भूतपूर्व मिनिस्टर हैं। अब उनके कितने--एक हजार भूतपूर्व मिनिस्टरों के कितने साले! उनमें कई तो ऐसे हैं कि जब वे मिनिस्टर हुए तभी उन्होंने दावा किया था कि हम तुम्हारे साले हैं। और जब वे मिनिस्टर नहीं रहे, उन्होंने भी दावे छोड़ दिए। अब वे किसी दूसरे के साले हैं। ऐसे कुछ लोगों को मैं जानता हूं कि जो मिनिस्टर ताकत में होता है उसके वे रिश्तेदार होते हैं।
यह स्वाभाविक है। यह प्रपंच है। यहां न आदमियों से किसी को मतलब है, न सत्य से किसी को मतलब है। यहां एक खेल है, एक सपना है। तुम्हारा लोभ, तुम्हारा लाभ, तुम्हारा अहंकार जिससे तृप्त हो।
दादू पाखंड पीव न पाइए...
अगर इस तरह के पाखंड में जीए, धोखेधड़ी में जीए, तो उस प्यारे को न पा सकोगे।
दादू पाखंड पीव न पाइए, जे अंतर सांच न होई।
अगर भीतर का सत्य न पाया हो, तो इस बाहर के प्रपंच से तुम उसे न पा सकोगे।
ऊपर थैं क्यों ही रहौ, भीतर के मल धोई।।
ऊपर से कैसे ही रहो, परमात्मा तुम्हारे भीतर के मलों के संबंध में पूछेगा। तुमने दिन में पांच बार स्नान किया था या नहीं, तिलक-चंदन-वंदन लगाया था या नहीं, चोटी धरी थी या नहीं, जनेऊ पहना था या नहीं...परमात्मा पागल नहीं है, वह तुम्हारी इन चीजों की शिनाख्त न करेगा--कि जनेऊ कहां है? चोटी कितनी लंबी है? गांठ लगी है कि नहीं? तिलक कौन सा लगाते हो?
परमात्मा तुम्हारे भीतर की पूछेगा--कि भीतर के मल धोए? भीतर जागे, मूर्च्छा मिटाई? अहंकार हटाया, होश साधा?
ऊपर थैं क्यों ही रहौ, भीतर के मल धोई।।
तो बाहर से जैसे रहना हो, रहो। संसार में रहना हो, संसार में रहो, मैं कहता हूं। भीतर से संन्यासी रहो। दुकान पर बैठना हो, दुकान पर बैठो; भीतर से मंदिर मत छोड़ो। बाजार में
जीना हो, बाजार में जीओ; लेकिन भीतर के ध्यान का धागा हाथ में सधा रहे।
जे पहुंचे ते कहि गए...
जो भी पहुंचे उन्होंने यही कहा है।
...तिनकी एकै बात।
उनकी एक ही बात है।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।।
जो भी सयाने हुए, जो जागे, जिन्होंने जीवन को जाना, उनका एक ही मत है, उनकी एक ही जाति है। महावीर, बुद्ध, कृष्ण और क्राइस्ट की एक ही जाति है। तुम्हारी जाति हजार हैं। बुद्ध, महावीर, कृष्ण, क्राइस्ट, लाओत्से की बात एक है। तुम्हारे पंडितों की बातें अनेक हैं।
जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।
वह बात यही है: भीतर का मल धो डालो। भीतर समर्पण को उपलब्ध होओ। अहंकार को छोड़ो। भीतर सचाई को पाओ। दूसरों को दिखाने के लिए आचरण को बदलने की चिंता मत करो, अंतस को रूपांतरित करो। वह आचरण तो अपने आप बदल जाएगा। आचरण अंतस की छाया है, परिणाम है।
सबै सयाने एकमत...
एक ही उनका मत है। छोटी सी उनकी बात है।
...उनकी एकै जात।।
उनकी जाति एक है।
पृथ्वी में दो तरह के लोग हैं: सयाने, प्रौढ़, जागे हुए; और सोए हुए, अप्रौढ़, बचकाने। सयाने और बचकाने, ऐसी दो जातियां हैं दुनिया में।
बचकानों की हजारों जातियां हैं--पंथ, संप्रदाय, मत, शास्त्र। सयानों का एक ही मत है, एक ही जाति है। क्योंकि एक ही वक्तव्य है उनका--कि तुम मिटो तो परमात्मा हो जाए। तुम्हारा होना--प्रपंच, पाखंड। तुम्हारा मिटना--परमात्मा के आगमन के लिए द्वार। तुम खोओ ताकि परमात्मा मिल जाए। बूंद जब सागर में डूब जाती है तो सागर हो जाती है।

आज इतना ही।