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मंगलवार, 28 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06



असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 रात्रि   
(अति-प्राचिन प्रवचन)
प्रवचन-छटवां-(मौन का स्वर)


एक मित्र ने आज सुबह सलाह दी है कि मैं सभी प्रश्नों के उत्तर न दूं। उन्होंने कहा है कि बहुत से प्रश्न तो फिजूल होते हैं, उनको आप छोड़ दें।

मुझे उनकी बात सुनकर एक घटना स्मरण हो आई।
एक धर्मगुरु पहली बार ही चर्च में भाषण देने गया था। उसे डर था कि लोग कहीं कोई प्रश्न न पूछें। तो अपने एक मित्र को उसने दो प्रश्न सिखा रखे थे। इसके पहले कि लोग पूछें, तुम मुझसे यह प्रश्न पूछ लेना, उत्तर मेरे तैयार हैं।
जैसे ही उसका बोलना समाप्त हुआ, उसका मित्र खड़ा हुआ। उसने पहला प्रश्न पूछा--वह वही प्रश्न था, जो कि बोलने वाले ने उसे सिखाया हुआ था। बोलने वाले के पास उत्तर भी तैयार था। उसने उत्तर दिया। वह इतना अदभुत उत्तर मालूम पड़ा कि उस चर्च में इकट्ठे लोग अत्याधिक प्रभावित हुए। फिर उसी व्यक्ति ने खड़े होकर दूसरा प्रश्न पूछा। वह भी सिखाया हुआ था। उसका उत्तर और भी प्रभावपूर्ण था, चर्च तालियों से गूंज उठा और तभी वह मित्र तीसरी बार खड़ा हुआ और उसने कहा कि महानुभाव! आपने जो तीसरा प्रश्न पूछने को मुझे बताया था, वह मैं भूल गया हूं।

कोई यहां बंधे हुए प्रश्नों के...न तो बंधे हुए प्रश्न हैं, न कोई बंधे हुए उत्तर हैं। फिर एक व्यक्ति जिस प्रश्न को पूछने योग्य समझता है, वह प्रश्न चाहे कितना ही व्यर्थ क्यों न हो, मेरे मन में उस प्रश्न का आदर है। एक मनुष्य ने भी उसे पूछने योग्य समझा, इस कारण मेरे लिए तो उस प्रश्न में आदर हो जाता है। एक भी मनुष्य पृथ्वी पर उसे पूछने योग्य मानता है, यही बात काफी है कि मैं उस प्रश्न को आदर दूं।
फिर प्रश्न महत्वपूर्ण होते हों या न होते हों--प्रश्न को पूछने वाला चित्त जब किसी प्रश्न को पूछता है तो उस चित्त की सूचना मिलती है। उस प्रश्न में चाहे कुछ भी न हो, लेकिन वह प्रश्न उस चित्त के तरफ इशारा करता है जिसने पूछा। हो सकता है पूछने वाला ठीक से पूछ भी न पाया हो कि क्या पूछना चाहता था। लेकिन अगर हम समझपूर्वक उसके प्रश्न को समझें, तो उसकी उलझन को समझने में आसानी मिल सकती है।
और फिर यह भी मुझे दिखाई पड़ता है कि जो एक मनुष्य पूछ रहा है, वह किसी न किसी रूप में हर दूसरे मनुष्य का भी प्रश्न होता है। आदमी का मन इतना समान है, आदमी का चित्त इतना समान है; आदमी की बीमारी, परेशानी, उलझन, इतनी समान है कि अगर आप थोड़ी धीरज से उसे समझने को कोशिश करेंगे तो हर एक मनुष्य की समस्या में आपको अपनी समस्या का भी दर्शन हो सकता है।
लेकिन हम बहुत अधैर्य से काम लेते हैं। और अक्सर तो यह है कि हम इतने नासमझी से काम लेते हैं कि हमें अपना ही प्रश्न केवल महत्वपूर्ण मालूम पड़ता है, इसलिए नहीं कि वह महत्वपूर्ण है--बल्कि अपना है।
सभी प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। असल में प्रश्न पूछने की चित्त की दशा महत्वपूर्ण है। सोच-विचार से भरी हुई है। व्यक्ति सोच रहा है, विचार कर रहा है। उसके सोच-विचार में हमें सहयोगी होना है, इसलिए मैं उत्तर दे रहा हूं। इसलिए नहीं कि मेरे उत्तर आप स्वीकार कर लें। मैं केवल साथी होना चाहता हूं आपके चिंतन में। आपने एक प्रश्न पूछा है तो इसलिए उत्तर नहीं दे रहा हूं कि मेरा उत्तर ही आपका उत्तर हो जाना चाहिए। बल्कि केवल इसलिए कि मैं भी आपके चिंतन की प्रक्रिया में साथी और मित्र हो सकूं। आप सोच रहे हैं--मैं भी साथ दे सकूं। हो सकता है, वह प्रश्न महत्वपूर्ण न भी हो। लेकिन सोचने की प्रक्रिया शुरू हो जाए तो वह आपको महत्वपूर्ण प्रश्नों और महत्वपूर्ण उत्तरों पर ले जा सकती है।
इसलिए प्रार्थना करूंगा, आपका प्रश्न हो या न हो, किसी का भी हो, उसे सहानुभूति से समझने की कोशिश करनी चाहिए।

एक मित्र ने पूछा है। उन्होंने कहा है कि वे मुझे प्रेम से भरा हुआ व्यक्ति समझते हैं। लेकिन मैं किन्हीं बातों के विरोध में इतनी कड़वी, इतनी तीखी भाषा का उपयोग कर देता हूं, इससे उन्हें चोट पहुंच जाती है, दुख हो जाता है। तो उन्होंने चाहा है कि मैं ऐसी भाषा का उपयोग करूं, जो किसी को चोट न पहुंचाए। थोड़ी कम कठोर भाषा में सत्यों के संबंध में कहूं।

उनकी बात तो ठीक है। लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है, इतनी कठोर भाषा में कहे जाने पर भी मुश्किल से ही किसी के मन तक वह पहुंचती हो। और मधुर भाषा में कहे जाने पर शायद वह आपकी नींद में सुनाई भी न पड़े।
जिसे किसी की नींद तोड़नी हो, उसे जोर से झकझोरना पड़ता है, झकझोरने की इच्छा नहीं होती, क्योंकि झकझोरने में क्या रस है? लेकिन नींद तोड़ना बिना झकझोरे संभव नहीं होता। और कई बार तो हमारे चित्त की जड़ता इतनी गहरी हो जाती है कि बिना चोट पहुंचाए, वहां कोई खबर ही नहीं पहुंचती।
वे ठीक कहते हैं, मेरे हृदय में चोट पहुंचाने का किसी को भी कोई कारण नहीं है, कोई प्रयोजन भी नहीं है। लेकिन मेरा प्रेम ही मुझसे कहता है कि ऐसी जरूरतें हैं कि चोट पहुंचाई जाए।
यूरोप के एक बहुत बड़े चिकित्सक, केनिथ वाकर ने एक छोटी सी किताब लिखी है। और उस किताब को जार्ज गुरजिएफ को समर्पित किया है। और डेडीकेशन में, समर्पण में लिखा है--टु दि डिस्टर्बर आफ माइ स्लीप। जार्ज गुरजिएफ को समर्पित किया है, लिखा है--मेरी नींद को तोड़ देने वाले जार्ज गुरजिएफ को।
किसी ने वाकर को पूछा कि नींद जब किसी ने तोड़ी होगी तो बड़ी चोट पहुंची होगी। तो उसने कहा, गुरजिएफ पर जितना क्रोध मुझे जीवन में आया था पहली बार, उतना किसी और पर नहीं आया। लेकिन वही आदमी मेरी नींद को तोड़ने वाला भी बन गया। और तब मैंने पीछे जाना कि उसने जो शाक, उसने जो धक्का मुझे दिया था, वह कितना प्रेमपूर्ण था। अगर वह, वह धक्का न देता तो शायद मैं जागता भी नहीं। यह उसकी दया थी कि उसने धक्का दिया और अब मैं अत्यंत आदर से स्मरण करता हूं उसका कि उसने मेरी नींद तोड़ दी।
कोई भी नींद तोड़ने वाले को कभी पसंद नहीं करता है। आप सो रहे हों गहरी नींद में और सुबह चार बजे कोई आपको जगाने लगे, तो मन को बड़ा गुस्सा आता है। मन शायद नींद पसंद करता है। तो आप अगर उस जगाने वाले को कहें कि इस तरह जगाएं कि मुझे धक्का न लगे। मेरी नींद खराब न हो, इस तरह जगाएं। तो वह कहेगा, फिर जगाना भी नहीं हो सकता है।
तो आप ठीक कहते हैं, मेरे शब्द कुछ कठोर हो सकते हैं। लेकिन मेरी समझ में अभी वे इतने कठोर नहीं हैं, जितने होने चाहिए। वे थोड़े और कठोर होने चाहिए। क्योंकि आदमी की नींद बहुत गहरी है, हजारों वर्ष की है। अगर चोट पहुंचे तो चिंतन शुरू होता है, विचार शुरू होता है। हम फिर से पुनर्विचार करने को तैयार होते हैं।
इस देश में हजारों वर्ष से हमने चोट पहुंचानी ही बंद कर दी मस्तिष्क को, उसकी वजह से हम एक सोई हुई कौम हो गए हैं। हमारा कोई भला आदमी कठोर शब्दों का उपयोग नहीं करता। मीठे-मीठे शब्दों का उपयोग करता है। वे मीठे शब्द नींद में लोरियां बन जाते हैं और सोने में सहयोगी हो जाते हैं।
इस देश को, इस देश की सोई हुई चेतना को तो अब उन लोगों की जरूरत है, जो बहुत बेरहमी से आपरेशन करने को तैयार हों--बहुत बेदर्दी से, बहुत सख्ती से। इस मुल्क के कुछ घावों को, कुछ पीड़ाओं को, कुछ बीमारियों को दूर करने के लिए तैयार होना जरूरी है। अगर आपमें से किसी को भी थोड़ी चोट पहुंच जाती हो तो मैं बहुत खुश हूं। आप कृपा करके...और थोड़ी ज्यादा चोट मैं पहुंचा सकूं, ऐसी परमात्मा से आपको प्रार्थना करनी चाहिए।
प्रेम चोट पहुंचाने से नहीं डरता है। बल्कि प्रेम ही अकेला है, जो चोट पहुंचाने की हिम्मत करता है। प्रेम यह देखता जरूर है कि चोट फायदा करेगी या नुकसान। चोट पहुंचाने से प्रेम कभी नहीं डरता है। लेकिन प्रेम यह जरूर देखता है कि चोट फायदा करेगी या नुकसान। अगर चोट न पहुंचाने से हानि होती हो तो प्रेम जरूर चोट पहुंचाता है। और उनका प्रेम कच्चा होगा, जो चोट पहुंचाने से डर जाते हों।
मुझे तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि इस जमीन पर जिन थोड़े से लोगों ने मनुष्य जाति के चिंतन को, चित्त को चोटें पहुंचाई हैं, झकझोर दिया है, हिला दिया है, वे ही थोड़े से लोग मनुष्य को आगे गतिमान करने में सहयोगी और साथी हुए।
धर्म कोई सांत्वना की बात नहीं है, धर्म एक क्रांति है। धर्म एक कंसोलेशन नहीं है, एक रेव्यूल्यूशन है। और हम सारे लोग तो धर्म-मंदिरों में, संन्यासियों और साधुओं के पास, सत्संग में सांत्वना पाने के लिए जाते हैं। वहां तो हम जाते हैं कि हमारी नींद और अच्छी तरह से आए, इसकी वे कोई दवा दे दें। हम संतोष से भर जाएं, इसकी कोशिश करें। लेकिन आपको पता नहीं है; सांत्वना, संतोष और कंसोलेशन जीवन की गति में सबसे बड़ी बाधाएं हैं।
जीवन में चाहिए एक क्रांति, चाहिए एक परिवर्तन। और परिवर्तन अनेक अवसरों पर कष्टपूर्ण होता है। प्रसव की पीड़ा झेलनी पड़ती है। बच्चा पैदा होता है तो पीड़ा झेलनी पड़ती है। जीवन बदलता है तो बहुत सी पीड़ा झेलनी पड़ती हैं। उसकी तैयारी होनी चाहिए। आपकी तैयारी जितनी बढ़ती जाएगी, मैं उतनी ज्यादा चोट पहुंचाने के लिए हमेशा उत्सुक रहूंगा। शायद धीरे-धीरे आपको यह दिखाई पड़े कि चोटों ने आपको फायदा किया, आपको जगाया, आपको होश से भरा।
एक फकीर था हुई-हाई। एक युवक उसके पास आया। और उसने कहा; मैं सत्य को खोजने निकला हूं और साथ में वह शास्त्रों की एक पोटली रखे हुए था। हुई-हाई ने उसकी पोटली छीनकर आग में फेंक दी। वह युवक तो बहुत घबड़ा गया। उसने कहा, आप यह क्या करते हैं! मुझे बहुत चोट पहुंचाते हैं? उसने कहा, सत्य को खोजना हो तो शास्त्रों को आग में झोंक देना जरूरी होता है। और मैं जितनी देर करूंगा, उतनी ही देर सत्य तक पहुंचने में बाधा पड़ जाएगी। तो मैंने जल्दी की है। और अगर शास्त्र को फेंकने से चोट लगती हैं, दिल डरता है तो फिर सत्य की खोज छोड़ दो। शास्त्र को सिर पर रखकर घूमते रहो।
वह युवक डर गया था। चोट खा गया था। उसके आदृत शास्त्र को इस भांति फेंका जाना, बहुत चोट की बात थी। उसने कहा, शास्त्र तो फेंकते हैं ठीक, लेकिन कम से कम मैं भगवान बुद्ध का स्मरण तो कर सकता हूं? उस हुई-हाई ने कहा, जब भी भगवान बुद्ध का नाम मुंह से आ जाए कुल्ला कर लेना, मुंह साफ कर लेना, मुंह गंदा हो जाता है।
वह तो बहुत हैरान हो गया। मुंह साफ कर लेना! उसने कहा, मुंह गंदा हो जाता है! जब भी नाम आ जाए तो पहले मुंह साफ करना, फिर दूसरा काम करना।
पीछे, वर्षों बाद जब उस युवक को सत्य की अनुभूति हुई तो उसने कहा, धन्य था हुई-हाई, जिसने मुझे बुद्ध से बचाया। नहीं तो मैं बुद्ध का नाम ही रटता हुआ समाप्त हो जाता। और आज मैं कह सकता हूं कि मैंने वह जान लिया, जो मैं बुद्ध का नाम रट कर जानना चाहता था, लेकिन नहीं जान सकता था। आज मैं कह सकता हूं कि बुद्ध के प्रति मेरे मन में जो प्रेम और आदर उमड़ा है, वह उस नाम जपने में कहीं भी नहीं था।
लेकिन मैं भी अगर किसी को सलाह दूंगा, तो अब यही दूंगा कि बुद्ध से बचने की कोशिश करना। क्योंकि बुद्ध का नाम, राम का नाम, कृष्ण का नाम परमात्मा तक पहुंचने में बाधा बन जाता है। लेकिन इतना ही ड्रास्टिक, इतना ही सख्त और तीखा हुई-हाई ने उस पर प्रयोग किया था, जिसके लिए पीछे वह धन्यवाद से भरा हुआ रहा।
एक फकीर था। एक रात एक मंदिर में ठहरा हुआ था। सर्द रात थी। मंदिर में वह भीतर गया और बुद्ध की एक प्रतिमा लाकर--लकड़ी की प्रतिमा थी, उसने आग लगा ली और तापने लगा। पुजारी को आग जली दिखी, आधी रात को। वह भागा हुआ अंदर आया कि क्या हुआ। वहां देखकर तो उसके होश खो गए। जिसको साधु समझकर मंदिर में ठहरा लिया था, भूल हो गई--वह आदमी बुद्ध की प्रतिमा जलाकर आंच ताप रहा था। उस पुजारी ने कहा, पागल हो! यह क्या करते हो? भगवान की मूर्ति जला रहे हो!
वह फकीर बोला, भगवान! एक पास पड़ी लकड़ी उठाकर, वह जल गई मूर्ति की राख में टटोलने लगा। उस पुजारी ने पूछा, क्या खोजते हो? उसने कहा, भगवान की अस्थियां खोज रहा हूं। वह पुजारी बोला, निरे पागल हो! लकड़ी की मूर्ति में कहां अस्थियां? उस फकीर ने कहा, फिर रात अभी बहुत बाकी है, और सर्द भी बहुत है, एक मूर्ति और उठा लाओ, अंदर तीन मूर्तियां अभी और रखी हैं, सुबह तक तीन मूर्तियां काम दे देंगी।
वह जो पुजारी था घबड़ाया। लेकिन एक सत्य का उसे पहली दफा दर्शन हुआ। अगर लकड़ी की मूर्ति में अस्थियां नहीं होतीं--यह पागलपन है तो लकड़ी की मूर्ति में भगवान कहां हो सकते हैं--वह भी पागलपन है। लेकिन इसे दिखाने को चोट बड़ी भारी करनी पड़ी।
जो कौमें भयभीत हो जाती हैं चोट करने से भी--चिंतन के लिए भी चोट करने से--वे कौमें मर जाती हैं। जो आदमी चिंतन के लिए भी भयभीत हो जाता है और नपीत्तुली बातें करने लगता है--घेरे के भीतर, मर्यादा में, उसके भीतर प्राणों की ऊर्जा ऊपर उठनी बंद हो जाती है। जिन्हें मार्ग तय करना है, उन्हें तो बहुत सी चोटों के लिए तैयार होना चाहिए। यह मन बहुत कमजोर है जो छोटी-छोटी चोटों से इतना घबड़ा जाए। और हम छोटी-छोटी बातों से इतने भयभीत हो जाते हैं, जिसका कोई भी हिसाब नहीं। और पीछे छिपे प्रेम के भी दर्शन हमें नहीं हो पाते।
क्या कोई यह कह सकता है कि जिसने यह मूर्ति जला दी भगवान बुद्ध की--यह आदमी कठोर था, यह आदमी प्रेमपूर्ण नहीं था? जो जानते हैं, वे कहेंगे इस पुजारी के प्रति इससे बड़े प्रेम की और कोई, और कोई अभिव्यक्ति नहीं हो सकती थी। इस पुजारी को जगाना जरूरी था कि तू जिसे पूज रहा है, वह लकड़ी से ज्यादा नहीं है। अगर खोजना ही है उसे, जो जीवन...जो जीवन है, जो जीवंत-चेतना का केंद्र है तो मूर्तियों में उसे नहीं खोजा जा सकता। और जो उसे एक मूर्ति में खोजने बैठ जाता है, वह उसके चारों तरफ जो अनेक रूपों में अभिव्यक्ति हो रही है, उससे वंचित हो जाता है।
नानक जाकर मक्का में पैर करके सो गए थे--पवित्र मंदिर के पत्थर की तरफ। बड़े कठोर रहे होंगे। प्रेम मन में जरा भी नहीं रहा होगा, नहीं तो क्या जरूरत थी, पैर और कहीं भी तो किए जा सकते थे। पवित्र पत्थर की तरफ पैर करके सोने की क्या जरूरत थी? पुजारी भागे हुए आए थे और उन्होंने कहा था, नासमझ! पैर किए हुए है पवित्र मंदिर की तरफ! हटाओ पैर यहां से। नानक ने कहा, तुम्हीं मेरे पैर उस तरफ कर दो, जहां परमात्मा न हो। बड़ी चोट थी।
उन थोड़े से लोगों ने, जिन्होंने आदमी को चोट पहुंचाने का प्रेम दिखलाया है, उन्होंने आदमी को विकसित किया है। जिनने थोड़ी चोट पहुंचाने का प्रेम दिखलाया, उन्होंने ही मनुष्य की चेतना को आगे बढ़ाया है। जिस दिन ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा से ज्यादा होगी, जो चोट पहुंचा सकते हैं, जिनका प्रेम यह साहस कर सकता है, उस दिन मनुष्य के जीवन में बड़ी क्रांतियां संभावी हैं।
तो मैं तो प्रार्थना करूंगा मधुर शब्दों को मत खोजें। मधुर शब्द होने से ही प्रेम नहीं हो जाता। शब्दों की पीछे क्या आकांक्षा है उसे खोजें।
उन्होंने कहा है कि आप संन्यासियों के संबंध में जो कहते हैं, उससे संन्यासी आपके दुश्मन हो रहे हैं। अगर वे दुश्मन हो जाएंगे, तो मैं जो कह रहा हूं, वह सिद्ध हो जाएगा कि सही था।
एक मित्र ने आज सुबह खबर दी कि एक संन्यासी यहां आए हुए थे, वे बहुत नाराज हो गए। और वे कल रात यहां आकर दस-पांच मित्रों को लेकर कुछ रामधुन करने वाले थे, ताकि यहां मीटिंग न हो सके। मैंने कहा, उनसे कहो कि बड़ी गलती हो गई। आज वे आ जाएं, भजन करते हैं, उसकी जगह रामधुन हो जाएगी। उसमें हर्जा क्या है? इसमें मीटिंग में बाधा क्या पड़ेगी? और थोड़ा आनंद आ जाएगा। और वे नाराज हो गए हैं, तो फिर जिन मुनि शांतिनाथ की मैं बात कर रहा था--हमें खयाल भी नहीं था कि वे यहां हो सकते हैं। नाराज होने की क्या बात है। और अगर वे यहीं खड़े होकर नाराजगी जाहिर कर देते तो मेरा तो बड़ा हित हो जाता। हमें तो प्रमाण मिल जाता, जो मैं कह रहा था, वह बात बिना प्रमाण के न रह जाती, प्रूफ सामने खड़ा हो जाता।
अगर कोई संन्यासी शत्रु हो सकता है मेरी बातें सुनकर तो वह समझ ले कि वह मेरी बातें सिद्ध कर रहा है। संन्यासी और शत्रुता का क्या संबंध? संन्यासी के मन में और शत्रुता का क्या सवाल? और संन्यासी के मन में भी शत्रुता हो तो ऐसे संन्यासी पर दया नहीं की जा सकती। ऐसे संन्यासी को जमीन से विदा करना ही होगा। तो ही हम उस संन्यासी को जन्म दे सकेंगे, जिसके हृदय में शत्रुता नहीं होती, प्रेम होता है।
अगर चोट लगती हो, इसमें मेरी भूल नहीं है। इसमें आपका चोट खाने को तैयार मन ही भूल कर रहा है। इसमें मैं क्या करूं? अगर समझ हो तो वह आदमी देख लेगा इस तथ्य को कि जो मैंने कहा, वह उसके भीतर घटित हो रहा है। और तब उसे यह सच्चाई दिखाई पड़ जाएगी कि संन्यास वस्त्र बदल लेने का नाम नहीं है। और तब हो सकता है एक रिविलेशन, एक उसके भीतर एक आलोक हो जाए। फेंक दे वह वस्त्र और पहली दफे संन्यासी हो जाए।
लेकिन अगर वह क्रोध से भर जाता है और गुस्से से और शत्रुता की बातें करने लगता है। और फिर भी इतने जोर से मैं कह रहा हूं और उसे दिखाई नहीं पड़ता कि यह क्या हो रहा है, तो फिर अब इसमें, इसमें तो फिर मुझे और कठोर होना पड़ेगा और क्या रास्ता हो सकता है? और क्या रास्ता हो सकता है? मुझे और कठोर शब्दों के उपयोग करने पड़ेंगे। कठोर शब्दों से मुझे आनंद नहीं आता है। पीड़ा ही होती है यह देखकर कि कठोर शब्दों का उपयोग करना पड़ता है। लेकिन कोई और रास्ता नहीं है। कोई और उपाय नहीं है। और हम तो धीरे-धीरे कठोर शब्दों के भी फिर आदी हो जाते हैं। फिर उनसे भी हम पर चोट नहीं होती।
तो मैं तो चाहता हूं, संन्यासी क्रुद्ध हो जाएं तो उन्हें अपने संन्यास की व्यर्थता दिखाई पड़ जाए। उन्हें खयाल में आ जाए।
अभी एक सभा में मैं बोल रहा था। मैंने कहा कि पंडित के पास ज्ञान नहीं होता। एक पंडित क्रोध में आ गए। मुझे पता भी नहीं था कि वहां पंडित भी मौजूद है। वे इतने क्रोध में आ गए और इतनी ऊल-जलूल बातें कहने लगे--तो मैंने कहा कि देखिए जो मैं कहता था, वह यह पंडित जी सिद्ध करने लगे। यही तो मैं कह रहा था कि पंडित के पास ज्ञान नहीं होता, उसके पास ज्ञान की आंखें नहीं होतीं। अगर ज्ञान होता तो ऐसी बात तो नहीं हो सकती थी। यह इतने जल्दी, इतना क्रोध, इतना असंतुलन तो नहीं हो सकता था। थोड़ी समझ होती तो यह खयाल ही नहीं हो सकता था कि मैं पंडित हूं। ज्ञान होता तो यह खयाल हो सकता था कि मैं पंडित हूं? यह अहंकार हो सकता था कि मैं जानने वाला हूं? जिन लोगों ने भी जाना है, वे तो इतने विनम्र थे कि उन्होंने कहा, हमसे ज्यादा अज्ञानी और कोई भी नहीं है।
सुकरात ने मरने के पहले कहा, मैं तो परम अज्ञानी हूं। उसने कहा कि जब मैं युवा था, तब मुझे भ्रम था कि मैं जानता हूं। फिर जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी और अनुभव बढ़ा, जैसे-जैसे मेरा ज्ञान बढ़ा तो मुझे दिखाई पड़ा कि ज्ञान कहां है मेरे पास। सब तो अज्ञान है, कुछ भी तो नहीं जानता, सब तो अननोन है। और अब जब मैं बूढ़ा हो गया हूं, तो मैं कह सकता हूं कि मुझ जैसा अज्ञानी और कोई भी नहीं है।
सुकरात अंतिम क्षणों में अगर यह कह सके कि मैं परम अज्ञानी हूं--तो फिर हमें सोचना पड़ेगा कि जिनको यह भ्रम होता हो कि मैं ज्ञानी हूं, वे क्या होते होंगे? वे क्या होते होंगे, जिनको यह खयाल होता है कि मैं ज्ञानी हूं? वे अज्ञानी होते होंगे। क्योंकि ज्ञानियों को तो अज्ञान का बोध होता है कि हम कुछ भी नहीं जानते।
क्या जानते हैं? राह पर पड़े हुए पत्थर को भी नहीं जानते और आकाश में बैठे परमात्मा को जानने का दावा करते हैं! सामने घर के लगे वृक्ष के पत्ते और फूल को नहीं जानते, और वह जो सब तरफ अदृश्य है, उसको जानने का दावा अहंकार और पागलपन के सिवाय और क्या होगा?
तो मैंने उनसे निवेदन किया आपको यह खयाल है कि आप पंडित हैं? यहीं भूल हो गई। और इसी पंडित के लिए मैं कह रहा हूं कि इसके पास ज्ञान नहीं होता। क्योंकि जिसके पास ज्ञान होता है, उसको पंडित होने का खयाल नहीं होता। उसके तो सारे खयाल गिर जाते हैं, वह तो इतना विनम्र हो जाता है कि उसे दिखाई पड़ता है, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं।
एक साध्वी महिला ने, और साध्वी जब कह रहा हूं तो बहुत खयाल से। क्योंकि न तो उसके पास साधुओं के वस्त्र हैं, न उसके पास साधुओं का सारा ढोंग है। लेकिन कुछ उसने जाना है जीवन में। बहुत से लोग उसे प्रेम करते हैं। उन बहुत से लोगों ने उससे प्रार्थना की कि तुम अपना अनुभव लिख दो। मैं भी उसके गांव से निकलता था। उसने मुझसे कहा कि मैं अपना अनुभव लिखूं, ये सारे लोग मेरे पीछे पड़े हैं। लेकिन एक शर्त पर लिखूंगी कि मैं जो किताब लिखूं, आप आकर उसका उदघाटन कर देना। मैं राजी हो गया। फिर एक वर्ष बाद मिलना हुआ।
वह किताब लिखी जा चुकी थी। उस महिला के भक्त, एक सुंदर पेटी में उस किताब को रखकर मेरे पास लाए। मैंने खोला, एक छोटी सी आठ पन्नों की किताब निकली। पन्ने सफेद नहीं थे, बिलकुल काले थे और उनमें कुछ भी नहीं लिखा हुआ था।
उस महिला ने कहा कि मैंने इतना ज्यादा लिखा है इसमें कि लिखते-लिखते पूरी किताब काली हो गई। कुछ लोग थोड़ा सा लिखते हैं तो थोड़ा काला होता है। मैंने इतना लिखा, इतना लिखा कि सब काला हो गया। और अब, अब मैं समझती हूं, यह किताब तैयार हो गई। मेरा अनुभव इसमें है।
उसके भक्त तो हैरान हो गए। उन्होंने कहा, हम कुछ समझे नहीं कि यह क्या हुआ। तो उस साध्वी ने कहा, जिस दिन तुम्हारा मन इतना ही कोरा हो जाएगा, जिसमें कुछ न लिखा हो, उस दिन तुम उसको जान लोगे, जो है। मैं तो खाली होकर भर गई। मैंने तो सब जानना छोड़ दिया और मैं जान गई। मैंने तो सब ज्ञान भुला दिया और मैं ज्ञान को उपलब्ध हो गई। लेकिन जो मैंने जाना है, उसे शब्दों में कहना अब संभव नहीं है। शब्दों से उसे जाना भी नहीं है। निःशब्द में, मौन में उसे जाना है। यह किताब शायद तुम्हें खबर दे--मौन हो जाने को, शब्द से छूट जाने को।
पता नहीं, वे अपने मन में हंसे होंगे या क्या किया होगा? क्योंकि शायद ही यहां किताबों के स्टाल पर अगर एक ऐसी किताब मैं भी बिकवाऊं, जिसमें कुछ न लिखा हो तो आपमें से शायद ही कोई उसे खरीदे। लेकिन अगर कोई उसे भी खरीद ले तो समझना कि उसकी जिंदगी में समझ की शुरुआत हो गई।
मन जिस दिन कोरा हो जाता है, उस दिन कहां है पांडित्य, कहां है जानना, कहां है यह भ्रम कि मैं जानता हूं और तुम नहीं जानते हो?
इन्हीं भ्रम वाले लोगों ने कि मैं जानता हूं और तुम नहीं जानते हो--सारे गुरु-शिष्य के उपद्रव खड़े कर दिए हैं। जिसको भ्रम है, मैं जानता हूं, वह गुरु बन जाता है। एक कुर्सी पर चढ़कर। और जिसको वह समझता है कि नहीं जानता, उसको बिठा लेता है अपने पैरों में। वह हो जाता है गुरु, यह हो जाता है शिष्य। और यह खेल अत्यंत मूर्खतापूर्ण है, हजारों वर्ष से चल रहा है। जो जानता है, उसे खयाल भी नहीं होता कि मैं जानता हूं--वह गुरु क्या बनेगा किसी का? गुरु बनने के पागलपन का उसे खयाल भी नहीं आ सकता।
तो मैं इधर कहना शुरू किया हूं, आध्यात्मिक जीवन में सीखने वाले लोग तो होते हैं, लेकिन सिखाने वाले लोग नहीं होते। शिष्य तो होते हैं, लेकिन गुरु नहीं होते। क्योंकि गुरुओं को कोई खयाल नहीं रह जाता, कि मैं सिखाऊं, कि मैं सिखा सकता हूं, कि मैं किसी का गुरु हो सकता हूं। यह खयाल, यह भ्रम हमारे अहंकार से ज्यादा नहीं है। और अहंकार को चोट लगती है। जब अहंकार को गिराने का कोई उपाय चलता है तो चोट लगती है।
मैं तो सारी जो बातें कर रहा हूं, इसी खयाल में कि किसी भांति यह अहंकार हमारा टूट जाए। यह खयाल हमारा टूट जाए कि हम जानते हैं। यह खयाल हमारा टूट जाए कि मैं संन्यासी हूं, यह खयाल हमारा टूट जाए कि मैं कुछ हूं, तो शायद, शायद हम उसे जान लें, जो कि हम हैं। शायद उसे पहचान लें, जो कि सबमें हैं। लेकिन जब तक हमें यह कुछ होने का खयाल है, यह समबडी होने का और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कुछ होने का खयाल किस कारण है।
एक आदमी एक बड़ी कुर्सी पर बैठ जाता है तो उसे खयाल होता है, मैं कुछ हूं! एक आदमी गैरिक वस्त्र पहन लेता है, गेरुए वस्त्र तो वह सोचता है, मैं कुछ हूं! एक आदमी दिल्ली पहुंच जाता है, वह सोचता है, मैं कुछ हूं! एक आदमी धन कमा लेता है और सोचता है, मैं कुछ हूं! एक आदमी धन छोड़ देता है और सोचता है कि मैं कुछ हूं! ये सारे एक ही बीमारी के बहुत-बहुत रूप हैं। इसमें कोई फर्क नहीं है।
जब तक आदमी सोचता है, मैं कुछ हूं--चाहे वह सोचता हो, मैं संन्यासी हूं; चाहे वह सोचता हो, मैं नेता हूं; चाहे वह सोचता हो, मैं गुरु हूं; चाहे वह सोचता हो, मैं त्यागी हूं, व्रती हूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये एक ही बीमारी की अलग-अलग शक्लें हैं। बीमारी यह है कि मैं कुछ हूं। और जहां यह खयाल है कि मैं कुछ हूं, वहां चोट पहुंचती है। क्योंकि जैसे ही कोई दिखाने की कोशिश करेगा कि नहीं, आप तो कुछ भी नहीं हैं, तो चोट पहुंचती है, तो घबड़ाहट होती है।
एक फकीर था इब्राहीम। जब फकीर नहीं हुआ था तो एक नगर का राजा था। एक रात अपने बिस्तर पर सोया था। ऐसा लगा कि छप्पर पर कोई चलता है ऊपर। तो उसने चिल्लाकर पूछा, कौन है ऊपर? ऊपर से आवाज आई, मेरा ऊंट खो गया है, उसे मैं खोजता हूं। अजीब पागल आदमी था कोई। उस राजा ने कहा, पागल हो गए हो! छप्परों पर ऊंट खोया करते हैं! यहां ऊंट खोजने का क्या मतलब? छप्परों पर कहीं ऊंट खोते हैं?
तो उस आदमी ने कहा, अगर छप्परों पर ऊंट खोजने से नहीं मिलेंगे तो सिंहासनों पर भी आनंद खोजने से नहीं मिलेगा। सिंहासनों पर आनंद भी नहीं खोया है। राजा उठा और दौड़ा कि उसे पकड़वा लें, कौन आदमी है। लेकिन वह नहीं मिल सका।
दूसरे दिन राजा रातभर सोचता रहा कि बात उसने क्या कही है। रातभर उसे खयाल रहा छप्परों पर--छप्परों पर नहीं मिल सकता है ऊंट, सिंहासनों पर सत्य नहीं मिल सकता। सिंहासन भी छप्पर ही हैं। चाहे वे सिंहासन किसी तरह के हों--संन्यास के, शंकराचार्य होने के, फलां होने के, ढिकां होने के, राजनीतिज्ञों के या किसी तरह के सिंहासन हों, उन पर सत्य मिल सकेगा?
वह भी सोचता रहा। लेकिन सुबह जब वह दरबार में गया--उदास और चिंतित था। बैठा ही था जाकर कि एक, एक अक्खड़ आदमी अंदर घुसता चला आया। पहरेदार ने बहुत रोकने की कोशिश की कि रुको। उसने कहा, तुम रोकने वाले मुझे कौन हो? इस घर का मालिक कोई हो तो मुझे रोक सकता है। हर किसी से मैं रुकने वाला नहीं। कौन है मालिक?
नौकर भी डर गए उससे। ले गए राजा के पास कि यह है मालिक। उस आदमी ने कहा, मैं इसको मालिक नहीं मान सकता। और राजा से पूछा कि मैं इस सराय में रुकना चाहता हूं--दो-चार दिन ठहर सकता हूं? उस राजा ने कहा, तुम पागल मालूम होते हो। यह सराय है? यह मेरा निवास है, मैं मालिक हूं यहां का।
वह आदमी हंसने लगा और उसने कहा, मैं कुछ वर्ष पहले आया था, लेकिन तब दूसरा आदमी यही कहता था कि मैं मालिक हूं यहां का। उस राजा ने कहा, वे मेरे पिता थे। उसने कहा, और भी मैं कुछ साल पहले आया था, तब एक तीसरा ही आदमी यह कहता था कि मैं मालिक हूं यहां का। वे मेरे पिता के पिता थे।
उस संन्यासी ने कहा, मैं कुछ वर्षों बाद फिर आऊंगा, तुम मुझे मिलोगे यहां कहने को कि मैं मालिक हूं? जब हमेशा मालिक बदल जाते हैं तो उसका मतलब--यह सराय है--मैं ठहर सकता हूं, इस सराय में? अगर यह तुम्हारा निवास है तो फिर लोग कहां गए, जिनका पहले यह निवास था? वे कहां हैं?
उस राजा ने कहा कि शायद बात तुम्हारी ठीक है। हम कुछ दिन ठहरते हैं और चले जाते हैं। उसने द्वार बंद करवा दिए और कहा, कहीं ऐसा तो नहीं कि रात जो छप्पर पर ऊंट खोजता था, वह तुम्हीं हो? उस आदमी ने कहा, मैं ही हूं। छप्पर पर ऊंट खोजने आया था, ताकि तुम्हें कह सकूं कि सिंहासनों पर सत्य नहीं मिल सकता। और आज तुम्हारी सराय में मेहमान होने आया हूं, ताकि तुम्हें कह सकूं कि यह तुम्हारा घर नहीं है।
लेकिन ऐसा आदमी चोट बहुत पहुंचाता है। उस राजा के प्राण कंप गए। बात तो सच थी। जिसको उसने अपना घर समझा था तो यह उसका घर था नहीं। लेकिन बड़ी चोट पहुंची। अपने घर में बैठे-बैठे अचानक पता चल जाए कि आप धर्मशाला में बैठे हैं--चोट नहीं पहुंचेगी? अपनी तख्ती-वख्ती लगाए बैठे थे घर के सामने, अचानक पता चला यह धर्मशाला है--चोट नहीं पहुंचेगी?
लेकिन अगर वह धर्मशाला ही है तो मैं क्या करूं? मुझे कहना ही पड़ेगा कि यह धर्मशाला है। आपको चाहे चोट पहुंचे और चाहे न पहुंचे। मेरी मजबूरी। अब अगर आप छप्पर पर ऊंट खोज रहे होंगे और मुझे कहना पड़े कि क्षमा करिए छप्परों पर ऊंट नहीं खोया करते तो आप नाराज हो जाएंगे, कि कठोर वचन बोलते हैं आप। कुछ ऐसी बात कहिए कि चोट न लगे। तो मैं क्या कहूं? क्या मैं यह कहूं कि खोजते रहिए, मैं भी साथ देता हूं, ऊंट मिल जाएगा?
मेरी भी मजबूरी है। आपकी भी मजबूरी मैं समझता हूं। लेकिन क्या करूं? आपकी मजबूरी को मान लूं या आप मेरी मजबूरी को मानते हैं? मुझे कहना ही पड़ेगा, छप्परों पर ऊंट नहीं मिलते। सिंहासनों पर भी सत्य नहीं मिलता है। क्योंकि जो आदमी जितने ऊंचे सिंहासन पर बैठता चला जाता है, उतना ही छोटा आदमी होता चला जाता है। जितना ऊंचा सिंहासन, उतना छोटा आदमी।
असल में छोटे आदमी के सिवाय ऊंचे सिंहासन पर कोई चढ़ना ही नहीं चाहता। वह छोटा आदमी ऊंची चीज पर खड़े होकर यह भ्रम पैदा करना चाहता है कि मैं छोटा नहीं हूं। छोटे-छोटे बच्चे भी यही करते हैं घरों में। कुर्सी पर खड़े हो जाएंगे ऊपर, कहेंगे हम आपसे बड़े हैं। तो दिल्ली में जो बैठ जाते हैं और कहते हैं हम आपसे बड़े हैं, वे इन बच्चों से भिन्न हैं? क्योंकि आपकी बड़ी कुर्सी है--आप बड़े हो गए?
बचकाना, चाइल्डिश माइंड है, अप्रौढ़--वह ऊंची चीज पर खड़े होकर यह घोषणा करना चाहता है, मैं बड़ा हूं! लेकिन उसे पता ही नहीं है कि यह छोटा आदमी ही घोषणा करना चाहता है कि मैं बड़ा हूं। बड़े आदमी को पता ही नहीं होता, बड़े और छोटे का। छोटे आदमी का, वह जो इनफीरिअरिटि कांप्लेक्स है, वह जो भीतर हीनता का भाव है, वह निरंतर कोशिश करता है दिखलाने की कि मैं हीन नहीं हूं, मैं कुछ हूं। और कुछ होने की दौड़ जीवनभर चलती रहती है--हजार-हजार रास्तों से।
हजार-हजार रास्तों से आदमी कोशिश कर रहा है, दिखला दे कि मैं कुछ हूं! लेकिन उसे पता नहीं कि जब तक वह दिखलाने की कोशिश कर रहा है कि मैं कुछ हूं, तब तक--तब तक उसके भीतर एक हीनता चल रही है। और उस हीनता से वह पीड़ित है। उस हीनता को भुलाने के लिए पहाड़ चढ़ रहा है। उस हीनता को भुलाने के लिए यात्राएं कर रहा है। छप्परों पर चढ़ रहा है, ताकि सारा गांव देख ले कि सबसे ऊंचा मैं हूं।
और अगर इसको हम कह दें कि तुम पागल हो--जितने ऊंचे तुम चढ़ते हो, उतने ही छोटे होने की तुम सूचना करते हो तो यह नाराज हो जाएगा। अब इसको नाराज करें कि इसको चढ़ने दें? इसको जाने दें, यह जहां भी जाए? एवरेस्ट की चोटी पर चढ़े, चढ़ने दें या कि इसको कहें कि पागल मत हो जाओ?
हीनता भीतर है तो उसे तुम पहाड़ों पर चढ़कर न मिटा पाओगे। हीनता भीतर है तो भीतर ही घुसना होगा। और हीनता वहां है तो उसे मिटाने के रास्ते हैं। लेकिन ऊपर चढ़ने से हीनता नहीं मिट जाती है। ऊपर चढ़ने से हीनता नहीं मिटती, भीतर घुसने से हीनता मिट जाती है। हीनता इसीलिए है कि हम स्वयं को नहीं जानते हैं। आत्म-अज्ञान के कारण हीनता है। नहीं तो आपको पता चलेगा आप क्या हो? और आपको पता चलेगा और सब कौन हैं? दिखाई पड़ेगा एक ही प्राण, एक ही जीवन, एक ही महिमा सबमें व्याप्त है, एक ही आलोक। फिर आप किससे ऊपर होना चाहोगे? आपके अतिरिक्त फिर कोई बचता नहीं, या आप भी नहीं बचते हैं? जो बच रहता है, उसमें न आप होते हैं, न दूसरा होता है--न मैं होता है, न तू होता है। किससे ऊपर चढ़ेंगे, किससे नीचे उतरेंगे?
उस क्षण सब हीनता मिट जाती है, और सब सुपिरिआरिटि भी, श्रेष्ठता भी। उस दिन न आप हीन होते हैं, न श्रेष्ठ, उस दिन आप बस होते हैं। फिर कोई कंपेरिजन नहीं होता, क्योंकि कंपेअर करने को कोई नहीं होता। कोई तुलना नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को तो मैं धार्मिक कहूंगा।
लेकिन ऐसे व्यक्ति को धार्मिक नहीं कह सकता, जो अभी कह रहा है कि तुम गृहस्थ हो, मैं संन्यासी हूं; तुम पापी हो, मैं पुण्यात्मा हूं; तुम हीनात्मा हो, मैं महात्मा हूं। यह जो आदमी है, क्या कर रहा है? और इसने जो तरकीब निकाल ली है, वह ज्यादा गहरी है उस आदमी से, जो कह रहा है मैं धनवान हूं, तुम गरीब हो। उससे ज्यादा गहरी है। धनवान को भी दिखाई पड़ता है, धन छिन सकता है, चोरी जा सकता है; कल वह भी गरीब हो सकता है। लेकिन यह त्याग और संन्यास ऐसी चीजें हैं कि न चोरी जा सकते, न खो सकते, न इनको कोई छीन सकता। ये ज्यादा स्थाई संपत्तियां हैं।
इसलिए जो लोग बहुत लोभी हैं, वे तिजोड़ी छोड़ देते हैं और स्थाई तिजोड़ी की खोज में निकल जाते हैं। संन्यासी हो जाएं, परमात्मा को पकड़ लें--क्या करें, क्या न करें। वे ऐसी संपत्ति खोजते हैं, जिसे कोई छीन न सके। यह बहुत गहरी ग्रीड, यह बहुत गहरे लोभ से पैदा होने वाली वृत्ति है, इसको हम कहें या न कहें?
एक गांव में मैं था। मुझसे पहले एक संन्यासी बोले और उन्होंने कहा, अगर आप लोभ छोड़ देंगे तो स्वर्ग उपलब्ध होगा। मैं उनके पीछे बोलता था। मैंने पूछा कि बड़ी अजीब बात आपने कही है, कि अगर आप लोभ छोड़ दें तो स्वर्ग उपलब्ध होगा। और स्वर्ग उपलब्ध करने की जो कामना है, वह लोभ नहीं है?
तो यहां इन सुनने वालों में जितने लोभी होंगे--बहुत ज्यादा, जो कम लोभी होंगे, वे सोचेंगे छोड़ो स्वर्ग को, अपना लोभ ही ठीक है। जो जरा ज्यादा लोभी होंगे, वे कहेंगे छोड़ो धन-संपत्ति को, स्वर्ग को पा लेना ज्यादा उचित है। तो ऊपर से दिखाई पड़ेगा वे लोभ छोड़ रहे हैं--लोभ छोड़ नहीं रहे, वे लोभ के कारण ही, लोभ की वजह से ही धन-संपत्ति छोड़ रहे हैं कि स्वर्ग उपलब्ध हो जाए। यह स्वर्ग का कामी, लोभी चित्त है। मोक्ष का कामी भी लोभी चित्त है। परमात्मा को पाने की कोशिश में लगा हुआ भी लोभी चित्त है। इसको कहें या न कहें?
आप कहेंगे, फिर मैं क्या कह रहा हूं आपसे? मैं आपसे यह कह रहा हूं जिस दिन चित्त में कोई लोभ नहीं होता, उस दिन जो आप जानते हैं, वह मोक्ष है। लेकिन मोक्ष की कोई कामना नहीं की जा सकती। मोक्ष को पाने के इरादे, योजनाएं, प्लानिंग नहीं बनाई जा सकतीं। जिस दिन आपका चित्त लोभ के बाहर होता है, उस दिन जिसे आप जानते हैं, वह परमात्मा है।
लेकिन परमात्मा को पाने का लोभ नहीं किया जा सकता। परमात्मा को पाने के लिए हिसाब-किताब नहीं लगाया जा सकता। और हिसाब-किताब लगाए जा रहे हैं! कोई आदमी कह रहा है, मैंने सौ उपवास किए! कोई कह रहा है, मैंने पचास किए! कोई कह रहा है, मैंने चालीस किए! कितना परमात्मा मिलेगा--एक सेर, दो सेर, तीन सेर, कितना परमात्मा मिलेगा? मैंने सौ उपवास किए हैं तो मुझे कितना मिलेगा! मैं तीस साल से संन्यास लिया हुआ हूं, मुझे कितना मिलेगा!
क्राइस्ट को जिस रात पकड़ा गया। पकड़ने के पहले खबर मिल गई थी कि शायद वे पकड़ लिए जाएंगे। तो क्राइस्ट ने अपने मित्रों से कहा कि तुम्हें कुछ पूछना हो तो पूछ लो। तो उनके मित्रों ने पूछा कि अब आप जा ही रहे हैं, तो एक बात बता दें। आपका स्थान तो तय है कि आप परमात्मा के बगल में बैठेंगे स्वर्ग में। हम लोग कहां बैठेंगे? हमारा स्थान क्या होगा? हमारी कुर्सियां कहां लगाई जाएंगी? हमने अपना सब घर-द्वार छोड़ा, आपके पीछे दीवाने हुए, हमारी उपलब्धि क्या होगी, किंगडम आफ गाड जो है, वहां? हम कहां होंगे? हमारी पोजीशंस क्या होंगी, वे सब स्पष्ट कर दें।
अब ये लोग लोभी नहीं हैं? क्या हैं ये लोग? इनके चित्त में निर्लोभ का जन्म हुआ है? अगर यह कहें तो चोट पहुंचेगी कि हमारा सब संन्यास, हमारी पूजा-प्रार्थना, हमारा मंदिर, हमारा दान-दक्षिणा, सब हमारे लोभ के रूपांतर हैं। और जब तक हम इस बात को नहीं देखेंगे, तब तक हम लोभ से मुक्त नहीं हो सकते। क्योंकि हम इनको लोभ समझेंगे ही नहीं तो मुक्त होने का कोई सवाल नहीं है।
हमारे तीर्थ-यात्रा, हमारा संन्यास, हमारा रिननसिएशंस, सब हमारे लोभ के ही रूप हैं। हमारी ग्रीड के ही अलग-अलग रास्ते हैं, जो अपने को प्रगट करती है। इनसे धर्म का कोई संबंध नहीं है। इस बात को तो जितनी स्पष्टता से कहा जा सके, उतना उचित है और उतना जरूरी है।
तो हो सकता है मेरी बात में कुछ बात कठोर लगती हो। है कठोर, लगनी चाहिए। लेकिन मैं मजबूर हूं। आप मुझे छप्पर पर ऊंट खोजते दिखाई पड़ते हैं तो मुझे कहना पड़ेगा कि वहां ऊंट नहीं है, और आपका घर आपका निवास नहीं है, धर्मशाला है। कितनी ही बुरी लगे यह बात, मुझे कहना पड़ेगा कि आप भूल से जिसे निवास समझे हुए हैं, वह निवास नहीं है, वह केवल सराय है। और जितने जल्दी आपको दिखाई पड़ जाए, उतना उचित है।
एक और अंतिम प्रश्न और फिर हम विदा होंगे। फिर जो प्रश्न होंगे, वह रात हम बात करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि श्रद्धा, आदर्श हम सभी छोड़ दें, तो फिर हम कहां जाएंगे? फिर क्या होगा?

श्रद्धा होते हुए, आदर्श होते हुए, आप कहां चले गए हैं? क्या हो गया है? श्रद्धा भी है, आदर्श भी हैं। आप कहां चले गए हैं? क्या हो गया है?
भटक रहे हैं और तो कहीं नहीं चले गए हैं।
मैं कोई विश्वास नहीं दिलाता कि आप कहां चले जाएंगे। हालांकि आपका लोभ चाहेगा कि पक्का आश्वासन होना चाहिए कि अगर हम श्रद्धा और आदर्श सब अलग कर दें तो हम कहां पहुंचेंगे इसकी पक्की गारंटी होनी चाहिए। और नहीं तो हम छोड़ दें और पक्की गारंटी न हो तो हम हानि में पड़ जाएं।
इतना ही मैं निवेदन करता हूं कि अगर आदर्श और श्रद्धा इन सबसे आपका छुटकारा हो जाए तो जो आप हैं, उसे जानने में आप समर्थ हो जाएंगे। चाहे आपके भीतर नरक हो तो उस नरक को देखने में समर्थ हो जाएंगे। और जिस दिन आदमी जो है, जैसा है, वह जो फैक्चुअलिटी है, वह जो हमारी तथ्य-स्थिति है, उसको जानने में जिस दिन समर्थ हो जाता है, उसी दिन उसके जीवन में एक नई यात्रा शुरू हो जाती है।
क्यों? क्योंकि वहां कुछ ऐसे तथ्य हैं, जिनको बदलना ही पड़ता है। और बदलना पड़ता है, यह कहना शायद ठीक नहीं है, जिनको देखते से ही बदलाहट शुरू हो जाती है। फिर आप एक नए आदमी होना शुरू हो जाते हैं, एक बिलकुल नए आदमी।
हालत ऐसी है कि आपके सामने सड़क पर सांप लेटा हुआ है, लेकिन आप अपने सामने देख ही नहीं रहे। आप दस मील दूर आकाश की तरफ देख रहे हैं, एक आदर्श की तरफ और चले जा रहे हैं। आदर्श की तरफ देख रहे हैं और चले जा रहे हैं! और सांप नीचे पड़ा है, जो आपकी जिंदगी को खा जाएगा, उसे आपके आदर्शों का कोई पता नहीं है।
मैं आपसे कह रहा हूं, दस मील दूर आकाश की तरफ न देखें। कदमों में, नीचे, सामने देखें, जो आप हैं, जहां आप हैं। तो अगर सांप आपको दिखाई पड़ जाएगा--यह तथ्य है तो आप कुछ करेंगे। और वह हो जाएगा आपके भीतर--आप शायद छलांग लगाकर सांप से अलग हो जाएंगे। लेकिन आप दस मील दूर देख रहे हैं, गङ्ढे पैर के पास हैं!
एक ज्योतिषी था यूनान में, जो आकाश के तारों के संबंध में खोजबीन किया करता था। वह एक सांझ आकाश के तारे देखते हुए चला जा रहा था और एक गङ्ढे में गिर पड़ा। एक बूढ़ी औरत, जिसने उसे निकाला, उसने कहा, बेटा! मैंने सुना है, तुम तारों के संबंध में बहुत जानते हो? लेकिन मैं तुमसे एक प्रार्थना करती हूं, तारों के संबंध में तुम क्या जानते होगे, जब रास्तों के गङ्ढों के संबंध में नहीं जानते। तो मेरी एक प्रार्थना है, तारे फिर जान लेना, रास्ते के गङ्ढे पहले जानना जरूरी है। आकाश के तारों की जानकारी तुम्हें होगी भी कैसे, जब पैर के नीचे के गङ्ढे भी तुम्हें दिखाई नहीं पड़ते! तुम्हारा ज्योतिष सब बकवास होगा। पहले रास्ते के गङ्ढे तो जान लो।
हम सब भी आकाश के तारे देखकर चल रहे हैं। आदर्श--वहां पहुंचना है, वहां पहुंचना है! बिना इस बात को जाने हुए कि हम कहां खड़े हुए हैं, हम कहां चल रहे हैं! आदर्श कल्पना में हैं। जिंदगी, तथ्य सामने है। उस तथ्य को देखना जरूरी है। और आदर्शों के कारण हम उसे देखने से बचते हैं। इसलिए सारे आदर्शों से चित्त मुक्त हो जाना चाहिए।
घबड़ाहट क्यों लगती है?
घबड़ाहट इसलिए लगती है कि आदर्श से मुक्त होते ही हमें भलीभांति पता है कि हम क्या हैं? और जैसे ही हम उसको जानेंगे, हमारे भीतर घबड़ाहट होती है कि हम तो कुछ भी नहीं हैं। आदर्श में तो हम मान लेते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि, मैं ईश्वर हूं, फलां हूं, ढिकां हूं। यह बड़े मजेदार बातें हैं। मैं ब्रह्म हूं, मैं आत्मा हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं, मैं अविनाशी तत्व हूं; अजर-अमर, ये सब हम आदर्श में मान लेते हैं।
नीचे लौटकर देखेंगे तो घबड़ाहट होगी कि मौत पास आ रही है। यह अजर-अमर आदर्शमय हैं, लेकिन इधर मौत पास सरकती आ रही है, रोज। मौत तथ्य है। यह अमरता बातचीत है। अमरता की बातचीत में मौत को कब तक झुठलाइएगा। और मौत को जितने दिन झुठला रहे हैं आप, उतने दिन आप धोखे में हैं।
तो मैं यह कहता हूं: अमरता की बातचीत छोड़िए, मौत को देखिए। और मेरा निवेदन यह है कि जिस दिन आप मौत को पूरी तरह देखेंगे, उसी दिन जो अमर है आपके भीतर, उसका दर्शन हो जाएगा। मौत के परिपूर्ण दर्शन से अमृत का अनुभव होता है। लेकिन जो मौत को ही देखने से डरता है--और मौत को देखने से डरने के कारण अमरता की बातचीत करता रहता है, वह मौत को ही नहीं देख पाता, अमृत को कैसे देख पाएगा?
मौत को देखने के साहस से ही--मौत का आमना-सामना, एनकाउंटर करने से ही, जो आपके भीतर अमृत है, उसकी झलक मिलनी शुरू होती है।
क्यों? क्यों ऐसा होगा?
ऐसा इसलिए होगा कि देखते हैं छोटे-छोटे बच्चे भी जानते हैं, स्कूल के ब्लैक-बोर्ड पर सफेद चाक से जब लिखते हैं तो दिखाई पड़ता है, और सफेद दीवाल पर सफेद चाक से लिखें तो दिखाई नहीं पड़ता। स्कूल के शिक्षक भी ज्यादा समझदार हैं, आत्मा के खोजियों से। उनको पता है कि सफेद दीवाल पर लिखेंगे, कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। काले ब्लैक-बोर्ड पर लिखने से दिखाई पड़ता है।
क्यों? कंट्रास्ट। जब तक आप मौत में नहीं झांकेंगे, आपको अमृत दिखाई नहीं पड़ता। दिखाई पड़ नहीं सकता। मौत काले बोर्ड की तरह खड़ी हो जाती है। और अगर उस काले बोर्ड में फिर एक भी सफेद रेखा आपको दिखाई पड़ गई तो आप जानते हैं कि काला बोर्ड ही सब कुछ नहीं है, एक सफेद रेखा भी है। जो काले के बाहर है और अलग है।
तो जो मौत में नहीं झांकेगा, वह अमृत को कभी नहीं देख सकता। जो काले से डरेगा, वह सफेद को नहीं देख सकता। तो जीवन के तथ्यों में झांकना जरूरी है। जीवन के तथ्यों को झुठलाने वाले आदर्शों में समय खोना उचित नहीं है।
लेकिन हम सब मौत से डरते हैं। सो हम अमरता के आदर्श बना लेते हैं, अमरता के सिद्धांत बना लेते हैं। जो आदमी जितना मौत से डरता है, उतनी ही आत्मा की अमरता की बातें करता है।
देख लें आप, जमीन पर जो कौम जितनी ज्यादा मौत से डरती है, वह उतनी ही आत्मा को मानने वाली कौम है।
क्यों मानती है? भय है भीतर मौत का। तो हम मान लेते हैं कि आत्मा अमर है। इसको मानने में बड़ा रस और आनंद आता है। इस रस और आनंद में धोखा है।
तथ्यों को देखना जरूरी है, क्योंकि तथ्यों के भीतर ही सत्य छिपे हुए हैं।
इस संबंध में हम और कुछ प्रश्न हैं, उनकी बात रात करेंगे।
दोपहर की यह बैठक समाप्त हुई।

आज इतना ही।

साधना-शिविर माथेरान, दिनांक २०-१०-६७, दोपहर