प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
प्रार्थना की कला—(दसवां प्रवचन)
दिनांक २० मार्च, १९८०; श्री
रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—हे अनंत! अपने में ले ले,
तुम में मिल जाऊंगा अनजान
मिलकर तेरे साथ हृदय का,
पूरा कर लूंगा अरमान।
प्रभु, यही प्रार्थना है!
2—मैं युवा था तो कभी मृत्यु का विचार भी नहीं करता था और अब जब वृद्ध हो
गया हूं तो मृत्यु सदा ही भयभीत करती है। मैं क्या करूं? क्या
मृत्यु से छुटकारा संभव है?
3—मैं शांति चाहता हूं, पर घर में रह कर शांति कहां,
और आप कहते हैं कि घर में रह कर ही सच्ची शांति पानी है। मेरी कुछ
समझ में नहीं आता। सात बच्चे हैं, एक से एक बढ़ कर उपद्रवी,
कर्कशा पत्नी है, सास अक्सर सिर पर सवार रहती
है। ऐसे में क्या शांत होना संभव है?
4—पिछले दिनों जैन मुनि विद्यानंद मेरे गांव पधारे थे, चूंकि वे
विश्व धर्म की जय बोलते हैं, मैंने निम्नलिखित प्रश्न उन्हें
भेजे:
पहला--कल आपने कृष्ण को नारायण संबोधन दिया, पर जैन
शास्त्रों के अनुसार वे सातवें नरक में है।
दूसरा--यहां कुछ लोग रजनीश के विधि-प्रयोग से ध्यान करते हैं पर
संप्रदाय विशेष में जन्मे होने के कारण उस संप्रदाय के लोग विरोध करते हैं। कुछ
कहें।
मेरा छोटा सा पर्चा पढ़ कर उत्तर देना तो दूर, उन्होंने
कागज को ऐसे फेंका जैसे अंगारा उनके हाथ में आ गया हो और क्रोधित हो गए। बाद में
प्रश्नकर्ता के बारे में उन्होंने पूछताछ की।
5—आप हमें इतना हंसाते हैं मगर स्वयं कभी क्यों
नहीं हंसते?