कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 16 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-13

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तैरहवां  
दिनांक 08 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—यह भाव निरंतर उभर आता है कि हो न हो भगवान बुद्ध ने आप ही के रूप में पुनरावतार लिया है। आप बुद्धक्षेत्र निर्मित कर रहे हैं।
या कि आप लाओत्सु हैं, मैत्रेय भी नहीं?
2—मैं सुख को स्वीकार नहीं कर पाता हूं। ऐसा लगता है कि दुख मुझे भाता है। फिर भी चाहता हूं कि सुख मिले। सुख मिलता है तो लगता है कि सपना है। मेरी उलझन सुलझाएं!
3—मैं एक युवती के प्रेम में हूं। मैं आपके भी प्रेम में हूं। अब मैं क्या करूं? सब छोड़-छाड़ कर संन्यास में डूबूं? या फिर आप जैसा कहें! मेरी उम्र अभी केवल छब्बीस वर्ष ही है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-12

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—बारहवां  
दिनांक 07 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—संन्यास का जन्म इस देश में हुआ, उसे गौरीशंकर जैसी गरिमा मिली,
पर आज उसका सम्मान बस ऊपरी रह गया है।
संन्यास और संन्यासी की अर्थवत्ता क्यों कर खो गई, कृपा करके समझाएं!

2—मैं क्या करूं? मेरो मन बड़ो हरामी!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—ग्यारहवां  
दिनांक 06 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...
2—प्रेम पाप है?
3—आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?
पहला प्रश्न:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...

बुधवार, 7 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—दसवां
दिनांक 05 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार-

1—बिन मांगे सच्चे रत्नों से झोली भर दी
बिन चाहे मेरे जीवन में खुशियां भर दीं
ये कैसे क्या कुछ हुआ, इसे कह दो भगवन
अनहोनी थी जो बात, उसे होनी कर दी
2—प्रार्थना कैसे और कब जन्मती है?
3—मैं ध्यान में गहरा जाना चाहता हूं। पर फिर डर लगता है कि पत्नी-बच्चों का क्या होगा?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—नौवां  
दिनांक 04 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—मैं ध्यान करूं या भक्ति?
और चूंकि कुछ तय ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रारंभ भी करूं तो कैसे करूं?
2—आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए "मैं-भाव' और स्त्री के लिए "मेरा-भाव' अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है? क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को छोड़ना ही पड़ेगा रूखा-सूखा होकर रहना पड़ेगा?
3—जीवेषणा है क्या? जीवन में इतना दुख हम देखते हैं, कुछ-कुछ समझ में भी आता है,
फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?
4—मैं आपको सुनता हूं तो चकित हो रह जाता हूं। अवाक होता हूं, आश्चर्यविमुग्ध होता हूं, लेकिन संन्यास में छलांग नहीं लगा पाता हूं। क्या करूं?

रविवार, 4 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—आट्ठवां  
दिनांक 03 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
कब तक बरसेगी ज्योति बार कर मुझको?
निकलेगा रथ किस रोज पार कर मुझको?
किस रोज लिए प्रज्वलित बाण आओगे?
खींचते हृदय पर रेख निकल जाओगे?
किस रोज तुम्हारी आग सीस पर लूंगा?
बाणों के आगे प्राण खोल धर दूंगा?
यह सोच विरह में अकुला कर,
ये गान बहुत रोए।
तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
2—आपने कहीं कहा है कि मनुष्य की सुख की खोज ही बताती है कि मनुष्य दुखी है।
उसका यह बुनियादी दुख क्या है? और क्या इस दुख का निरसन भी है?
3—आप कुछ करें! आदमी रोज-रोज पापों की गर्त में डूबा जा रहा है।
आदमी ऐसा बुरा तो कभी न था, जैसा आज है। आदमी को आखिर हो क्या गया है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—सातवां  
दिनांक 02 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—संन्यास देकर आपने एक नया ही जीवन प्रदान किया है। सिर्फ एक ही कांटा चुभता है--इतनी सुविधा और सामीप्य होने पर भी मैं आपको पूरा का पूरा नहीं पी पा रहा हूं। अब दुई खलती है। अब मिटा ही डालें।
2—आश्रम में रह कर बहुत आनंदित हूं; पर कभी-कभी अचानक उदास हो जाती हूं।
यह उदासी क्या है, जो आती है और जाती है?
3—मैं मृत्यु से बहुत डरता हूं। क्या करूं?
4—आपने भीतर के सदगुरु की बात कही। उसका क्या अर्थ है?
वे सदगुरु कब और कैसे जाग्रत होते हैं?
5—आपका संदेश?

शनिवार, 3 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—छट्ठवां  
दिनांक 01 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—आपने वर्तमान प्रवचनमाला को नाम दिया: प्रेम-पंथ ऐसो कठिन!
आप तो कहते हैं कि प्रेम होता है, किया नहीं जाता। फिर प्रेम का मार्ग कैसे बन सकता है? और वह कठिन कैसे हो गया?
2—प्रेम अव्याख्य क्यों है?
3—आप भारत देश की महानता के संबंध में कभी भी कुछ नहीं कहते हैं। न ही इस देश के नेताओं की प्रशंसा में कुछ कहते हैं। क्यों?
4—फैलने को है विकल मेरे
हृदय का सिंधु भर कर
छोड़ कर तल आ गई है
आंख में आत्मा उमड़ कर
डोलती दुनिया सम्हालो
ज्वार आकुल फूटता है
शून्य का मैं व्यग्र
हाहाकार होना चाहता हूं
तुम मुझे अपने क्षितिज से
घेर कर बंदी बना लो
मैं तुम्हारे व्योम की
झंकार होना चाहता हूं।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—पांचवां
दिनांक 31 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—आपसे समाधि कैसे चुराएं?
2—मैं तो परमात्मा की याद बहुत करता हूं, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि परमात्मा भी कभी मेरी याद करता है या नहीं?
3—मैंने संसार के सब सुख-दुख को अनुभव कर देखा है। अभी आपके कहे "ग्रुप' करके मेरा हृदय बिलकुल आपके प्रति खुल गया है। दिल होता है आप में पूरा डूब जाऊं और आपके साथ आकाश में उडूं और बहारों में फूल और आनंद बरसाऊं। मुझे अपना लो!
आपकी अनुकंपा अपार है! बहुत धन्यवाद!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौथा  
दिनांक 30 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—एक कौतुक मैंने देखा: मेरी खोपड़ी में खंजड़ी बज रे लोल!
क्या भक्त को अहंकार होता है? जहां ढूंढा, तो श्री हरि आपको ही पाया।
2—ध्यान की गहराई जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्राणों में जैसे अनेक गीत फूट पड़ने को मचल उठे हों। क्या करूं?
3—क्या संकोच अहंकार को पुष्ट करता है?
किसी के चरणों में गिर जाने की चाह होते हुए भी संकोचवश चरण स्पर्श नहीं करता। संकोच में सोचता हूं कि लोग क्या कहेंगे?
4—क्या आत्मोपलब्धि के लिए सांसारिक जीवन जीना आवश्यक है?

शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तीसरा  
दिनांक 29 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—भारतीय संसद में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल, धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक लाया जा रहा है। ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मदर टेरेसा ने भी उसका विरोध किया है। आप अपना मंतव्य दें।

2—संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।

3—पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी,
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-दूसरा
दिनांक 28 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—परमात्मा शब्द ही मेरी समझ में नहीं आता है। परमात्मा यानी क्या?

2—वैसे गत पंद्रह वर्षों से आप निरंतर प्रेरणा के स्रोत रहे हैं, परंतु यहां आपके ऊर्जा-क्षेत्र में रहते हुए कुछ माह में ही कुछ-कुछ आश्चर्यचकित घटित होने लगा है। हमें इतने दिनों तक दूर क्यों रहना पड़ा, जब कि पहली ही पहचान में आपकी भगवत्ता स्पष्ट हो गई थी?

3—संत विरहावस्था की चर्चा बहुत करते हैं। यह विरह क्या बला है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-पहला
दिनांक 27 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—साधु-संतों से सुना है कि भक्ति-मार्ग ही एकमात्र सरल और सुगम मार्ग है।
लेकिन रहीम का प्रसिद्ध वचन है:
रहिमन मैन तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोई निबहत नाहिं।।
इस विरोधाभास पर कुछ कहें।

2—क्या प्रभु के लिए अभीप्सा पर्याप्त है?

3—क्या भगवान भक्त के बिना हो सकता है?

बुधवार, 31 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-16

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

हंसो, जी भर कर हंसो—(सोलहवां प्रवचन)
दिनांक २६ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—अजीब लत लगी है रोज सुबह आपके साथ बैठ कर हंसने की!
2—कल किसी प्रश्न के उत्तर में आपने बताया कि क्यों साधारण व्यक्ति की समझ में आपकी बात आती नहीं। मुझे याद आया, आप पहली बार उन्नीस सौ चौंसठ में पूना आए थे, दो दिन आपके प्रवचन सुने थे, आप को स्टेशन पर छोड़ने आया था। तब मैंने आपको पूछा था: आपकी बात साधारण आदमी की समझ में आना मुश्किल लगता है। तब आपने कहा था: माणिक बाबू, कौन व्यक्ति खुद को साधारण समझता है? क्या ज्यादातर व्यक्ति इसी भ्रांति में होते हैं? यह व्यक्ति की असाधारणता की कल्पना नष्ट करने के लिए नव संन्यास उपयुक्त है। असाधारण को साधारण बनाने की आपकी कीमिया अदभुत है! इस पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें।
3—ईश्वर को देखे बिना मैं पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं? समझाने की अनुकंपा करें!

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-15

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

एक नई मनुष्य-जाति की आधारशिला—(पंद्रहवां प्रवचन)
पंद्रहवां प्रवचन; दिनांक २५ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—आप सरल, निर्दोष चित्त की सदा प्रशंसा करते हैं। यह सरलता, यह निर्दोष चित्त क्या है?
2—क्या आप अंग्रेजी भाषा के विरोध में हैं? आप कुछ भी कहें, मैं तो अंग्रेजी सीखूंगी।
3—पूरब-पश्चिम, विज्ञान-धर्म और बाहर-भीतर का संतुलन जो आप करने का प्रयास कर रहे हैं, यह साधारण जन की समझ में क्यों नहीं आता है?

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-14

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

तथाता और विद्रोह—(चौदहवां प्रवचन)
दिनांक २४ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—आप कहते हैं कि धर्म स्वीकार है, तथाता है और आप यह भी कहते हैं कि धर्म विद्रोह है। धर्म एक साथ तथाता और विद्रोह दोनों कैसे है?
2—मीरा के इस वचन पीवत मीरा हांसी रे से कई गुना अदभुत वचन तो यह है कि म्हारो देश मारवाड़ जिसके कारण मेरे हृदय में अन्य जाग्रत व्यक्तियों की अपेक्षा मीरा का अधिक सम्मान है। आप क्या कहते हैं?
3—आज तक जाने गए बुद्धपुरुषों को किसी पशु ने मारा हो ऐसा उल्लेख नहीं है और शास्त्रों में कई ऐसे भी उल्लेख हैं कि नाग या शेर या सिंह जैसे पशु भी बुद्धपुरुषों के पास आकर बैठते थे। भगवान, इसका राज क्या है?
4आपने मुझे नाम दिया है: योगानंद। इसका रहस्य समझाएं?
5—जब भी मैं आपकी बातें सुनता हूं तो मेरा शादी करने का पक्का इरादा चकनाचूर हो जाता है। लेकिन जब भी मैं अपनी ओर से सोचता हूं तो मुश्किल में पड़ जाता हूं कि शादी करूं या न करूं। आपने पिछले दो दिन में बताया कि समझदार आदमी को शादी करनी ही नहीं चाहिए। अब बताएं भगवान, मैं क्या करूं? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता। कृपया मुझे मार्ग दिखावें!

सोमवार, 29 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-13

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
धर्म और विज्ञान की भूमिकाएं-(तेरहवां प्रवचन)
दिनांक २३ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1--श्रेष्ठ मानव-शरीर पैदा करने का आयोजन विज्ञान कैसे कर सकता है, इसकी आपने चर्चा की। लेकिन केवल श्रेष्ठ आत्माएं विज्ञान कैसे चुन सकता है? और श्रेष्ठ आत्माओं को ही उत्कृष्ट शरीर में प्रवेश कैसे कराएगा? यह काम तो आप जैसे शुद्ध प्रबुद्ध आत्मा को ही करना पड़ेगा। विज्ञान कोई वैज्ञानिक या हिटलर पैदा कर सकेगा। लेकिन कोई कृष्ण, महावीर या बुद्ध पैदा कराने का आयोजन कैसे हो सकता है? इस बात पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
2—क्या संसार में कोई भी अपना नहीं है?
3—आपके आश्रम में तो बिना अंग्रेजी जाने जीना मुश्किल है। जितने विदेशी मैंने यहां देखे इतने एक स्थान पर तो एकत्रित कहीं न देखे थे। अब मैं क्या करूं? मैं तो आश्रम में ही रहने आई थी। क्या अब बुढ़ापे में अंग्रेजी सीखूं?
4—हमने प्रतिभावान व्यक्तियों की क्षमता का क्या उपयोग किया! आइंस्टीन ने खोज भौतिकी का गूढ़ रहस्य और हमने उससे हिरोशिमा व नागासाकी को जला कर राख कर दिया। कभी-कभी लगता है कि काश अगर न हुए होते जीसस और मोहम्मद तो इस पृथ्वी पर लाखों-करोड़ों लोगों का खून न बहा होता! धर्म तथा विज्ञान के जगत में मिले आज तक के सभी वरदान पंडितों, राजनीतिज्ञों के हाथों में पड़ कर मनुष्य-जाति के लिए अभिशाप सिद्ध हुए हैं। क्या भविष्य में इस दुर्भाग्य से बचने की संभावना है? कल आपने प्रतिभा को जन्माने की प्रक्रिया की चर्चा की, प्रतिभाओं का सम्यक उपयोग कैसे हो, इस संबंध में आपकी क्या दृष्टि है?
5—मैं कभी-कभी विश्वविद्यालय से स्नातक हुआ हूं। संसार को बदलने की बड़ी इच्छा है। इस महान कार्य के लिए शहीद भी होना पड़े तो मैं सहर्ष तैयार हूं। मार्गदर्शन दीजिए।

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-12

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
नियोजित संतानोत्पत्ति—(बारहवां प्रवचन)

दिनांक २२ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—आपने योजनापूर्ण ढंग से संतानोत्पत्ति की बात कही और उदाहरण देते हुए कहा कि महावीर, आइंस्टीन, बुद्ध जैसी प्रतिभाएं समाज को मिल सकेंगी। मेरा प्रश्न है कि ये नाम जो उदाहरण के नाते आपने दिए, स्वयं योजित संतानोत्पत्ति अथवा कम्यून आधारित समाज की उपज नहीं थे। इसलिए केवल कम्यून से प्रतिभाशाली संतानोत्पत्ति की बात अथवा संतान का विकास समाज की जिम्मेवारी वाली बात पूरी सही नहीं प्रतीत होती।
2—क्या जीवन-मूल्य समयानुसार रूपांतरित होते हैं?
3—आप कहते हैं: न आवश्यकता है काबा जाने की, न काशी जाने की। क्या आपकी दृष्टि में स्थान का कोई भी महत्व नहीं है?
4—कल आपने एक कवि के प्रश्न के संबंध में जो कुछ कहा उससे मेरे मन में भी चिंता पैदा होनी शुरू हुई है। मैं हास्य-कवि हूं। इस संबंध में आपका क्या कहना है?
5—मेरी विनम्र लघु आशा है
बनूं चरण की दासी
स्वीकृत करो कि न करो
पर हूं मैं एक बूंद की प्यासी।

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-11

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मेरा संदेश है: ध्यान में डूबो-(ग्यारहवां प्रवचन)
दिनांक २१ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—संबोधि क्या है? और संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?
2—जैसा आपने कहा कि जब हम सब जाग जाएंगे उस दिन आप हंसेंगे। क्या इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि हम आपको कभी हंसते नहीं देख सकेंगे?
3—जब भी कोई लड़की वाला मुझसे वर के रूप में देखने आता है तो मैं फौरन अपने कमरे में देववाणी ध्यान या सक्रिय ध्यान शुरू कर देता हूं। परिवार वाले इससे नाराज हैं। क्या और भी कोई सरल उपाय है?
4—राजनीति की मूल कला क्या है?
5—मैं एक कवि हूं पर कोई मेरी कविताएं पसंद नहीं करता है--न परिवार वाले, न मित्र, न परिचित। कविताएं मेरी प्रकाशित भी नहीं होतीं। लेकिन मैं तो अपना जीवन कविता को ही समर्पित कर चुका हूं। अब आपकी शरण आया हूं। आपका क्या आदेश है?

रविवार, 28 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रार्थना की कला—(दसवां प्रवचन)
दिनांक २० मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—हे अनंत! अपने में ले ले,
तुम में मिल जाऊंगा अनजान
मिलकर तेरे साथ हृदय का,
पूरा कर लूंगा अरमान।
प्रभु, यही प्रार्थना है!
2—मैं युवा था तो कभी मृत्यु का विचार भी नहीं करता था और अब जब वृद्ध हो गया हूं तो मृत्यु सदा ही भयभीत करती है। मैं क्या करूं? क्या मृत्यु से छुटकारा संभव है?
3—मैं शांति चाहता हूं, पर घर में रह कर शांति कहां, और आप कहते हैं कि घर में रह कर ही सच्ची शांति पानी है। मेरी कुछ समझ में नहीं आता। सात बच्चे हैं, एक से एक बढ़ कर उपद्रवी, कर्कशा पत्नी है, सास अक्सर सिर पर सवार रहती है। ऐसे में क्या शांत होना संभव है?
4—पिछले दिनों जैन मुनि विद्यानंद मेरे गांव पधारे थे, चूंकि वे विश्व धर्म की जय बोलते हैं, मैंने निम्नलिखित प्रश्न उन्हें भेजे:
पहला--कल आपने कृष्ण को नारायण संबोधन दिया, पर जैन शास्त्रों के अनुसार वे सातवें नरक में है।
दूसरा--यहां कुछ लोग रजनीश के विधि-प्रयोग से ध्यान करते हैं पर संप्रदाय विशेष में जन्मे होने के कारण उस संप्रदाय के लोग विरोध करते हैं। कुछ कहें।
मेरा छोटा सा पर्चा पढ़ कर उत्तर देना तो दूर, उन्होंने कागज को ऐसे फेंका जैसे अंगारा उनके हाथ में आ गया हो और क्रोधित हो गए। बाद में प्रश्नकर्ता के बारे में उन्होंने पूछताछ की।
5आप हमें इतना हंसाते हैं मगर स्वयं कभी क्यों नहीं हंसते?