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सोमवार, 29 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-13

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
धर्म और विज्ञान की भूमिकाएं-(तेरहवां प्रवचन)
दिनांक २३ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1--श्रेष्ठ मानव-शरीर पैदा करने का आयोजन विज्ञान कैसे कर सकता है, इसकी आपने चर्चा की। लेकिन केवल श्रेष्ठ आत्माएं विज्ञान कैसे चुन सकता है? और श्रेष्ठ आत्माओं को ही उत्कृष्ट शरीर में प्रवेश कैसे कराएगा? यह काम तो आप जैसे शुद्ध प्रबुद्ध आत्मा को ही करना पड़ेगा। विज्ञान कोई वैज्ञानिक या हिटलर पैदा कर सकेगा। लेकिन कोई कृष्ण, महावीर या बुद्ध पैदा कराने का आयोजन कैसे हो सकता है? इस बात पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
2—क्या संसार में कोई भी अपना नहीं है?
3—आपके आश्रम में तो बिना अंग्रेजी जाने जीना मुश्किल है। जितने विदेशी मैंने यहां देखे इतने एक स्थान पर तो एकत्रित कहीं न देखे थे। अब मैं क्या करूं? मैं तो आश्रम में ही रहने आई थी। क्या अब बुढ़ापे में अंग्रेजी सीखूं?
4—हमने प्रतिभावान व्यक्तियों की क्षमता का क्या उपयोग किया! आइंस्टीन ने खोज भौतिकी का गूढ़ रहस्य और हमने उससे हिरोशिमा व नागासाकी को जला कर राख कर दिया। कभी-कभी लगता है कि काश अगर न हुए होते जीसस और मोहम्मद तो इस पृथ्वी पर लाखों-करोड़ों लोगों का खून न बहा होता! धर्म तथा विज्ञान के जगत में मिले आज तक के सभी वरदान पंडितों, राजनीतिज्ञों के हाथों में पड़ कर मनुष्य-जाति के लिए अभिशाप सिद्ध हुए हैं। क्या भविष्य में इस दुर्भाग्य से बचने की संभावना है? कल आपने प्रतिभा को जन्माने की प्रक्रिया की चर्चा की, प्रतिभाओं का सम्यक उपयोग कैसे हो, इस संबंध में आपकी क्या दृष्टि है?
5—मैं कभी-कभी विश्वविद्यालय से स्नातक हुआ हूं। संसार को बदलने की बड़ी इच्छा है। इस महान कार्य के लिए शहीद भी होना पड़े तो मैं सहर्ष तैयार हूं। मार्गदर्शन दीजिए।


पहला प्रश्न: भगवान,
श्रेष्ठ मानव-शरीर पैदा करने का आयोजन विज्ञान कैसे कर सकता है, इसकी आपने चर्चा की। लेकिन केवल श्रेष्ठ शरीर मिलने से क्या होगा? श्रेष्ठ आत्माएं विज्ञान कैसे चुन सकता है? और श्रेष्ठ आत्माओं को ही उत्कृष्ट शरीर में प्रवेश कैसे कराएगा? यह काम तो आप जैसे शुद्ध प्रबुद्ध आत्मा को ही करना पड़ेगा। विज्ञान कोई वैज्ञानिक या हिटलर पैदा कर सकेगा, लेकिन कोई कृष्ण, महावीर या बुद्ध पैदा कराने का आयोजन कैसे हो सकता है? इस बात पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

आनंद वीतराग,
शरीर और आत्मा को जितना भिन्न हमने माना है, इतने वे भिन्न हैं नहीं। शरीर और आत्मा के बीच जितनी खाई हमने बना रखी है, उतनी खाई कल्पित है। शरीर प्रभावित करता है आत्मा को, आत्मा प्रभावित करती है शरीर को। यूं समझो कि आत्मा है शरीर का अंतरंग; शरीर है आत्मा का बहिरंग--एक ही अस्तित्व का बाहर और भीतर। दोनों संयुक्त हैं, जुड़े हैं। एक को बदलो, दूसरा रूपांतरित होता है।
योग क्या करता है? आखिर योग की सारी प्रक्रियाएं शरीर की ही प्रक्रियाएं हैं, लेकिन परिणाम आत्मा पर होने शुरू हो जाते हैं। अगर शरीर बिलकुल थिर हो, सिद्धासन में हो, तो चित्त भी थिर हो जाता है। और चित्त थिर हो तो शरीर भी थिर हो जाता है। तुम शराब पी लो, शराब कोई आत्मा में तो जाती नहीं, जाती तो देह में है, मिलती तो रक्त में है; लेकिन मूर्च्छित हो जाओगे। और मूर्च्छा तो भीतर की घटना है। शरीर क्यों मूर्च्छित होगा? शरीर तो मिट्टी है। और तुम बीमार पड़ते हो तो तुम देखते हो रुग्ण अवस्था में तुम्हारा चित्त भी रुग्ण हो जाता है, उदास हो जाता है, दीन हो जाता है, हीन हो जाता है। और जब तुम स्वस्थ होते हो, ऊर्जा से आपूरित होते हो, उमंग होती है, उत्साह होता है, तो तुम्हारे भीतर भी एक नृत्य होता है।
शरीर और आत्मा का द्वैत भी भ्रांति है। इसलिए मैं तुमसे यह कहना चाहूंगा, विज्ञान जो कर सकता है वह विज्ञान को करने दो। बुद्ध, महावीर और कृष्ण जो कर सकते हैं, वह वे करेंगे। विज्ञान को विज्ञान का काम पूरा करने दो। बुद्ध भी बीमार पड़ जाते थे तो चिकित्सक ही इलाज करता था। एक चिकित्सक बुद्ध के साथ चलता था। जीवक उस समय का सबसे बड़ा प्रसिद्ध चिकित्सक था, वह बुद्ध का निजी चिकित्सक था। वह वर्षों बुद्ध के साथ निरंतर चलता रहा--उनकी देह-सम्हाल के लिए।
बुद्ध की मृत्यु कैसे हुई? विषाक्त भोजन से। महावीर की मृत्यु कैसे हुई? पेचिश की बीमारी से। महावीर जैसी प्रबल आत्मा भी पेचिश की बीमारी पर विजय न पा सकी! महावीर जैसा पुरुष--जिसको हमने नाम महावीर दिया; जिसने क्रोध जीता, काम जीता, अहंकार जीता--पेचिश की बीमारी से हार गया! छह महीने तक महावीर पेचिश की बीमारी से परेशान रहे। बुद्ध तो दवा लेते थे। बुद्ध का इस दृष्टि से जीवन के प्रति जो रुख है, वह ज्यादा वैज्ञानिक है। महावीर तो दवा लेंगे नहीं। महावीर दवा ले सकते नहीं थे। तो छह महीने तक परेशान रहे, छह महीने तक शरीर क्षीण होता रहा, देह गलती रही, फिर मृत्यु हुई।
कृष्ण की मृत्यु जानते हो कैसे हुई? पैर में तीर लगने से। तीर आत्मा में तो नहीं लगा होगा। तीर आत्मा में लग सके, इसका कोई उपाय भी नहीं है। विश्राम करने लेटे थे एक वृक्ष के नीचे, और किसी शिकारी का भूल-चूक से तीर पैर में लग गया और मृत्यु हुई।
देह की चिंता तो विज्ञान को ही करने दो। देह की चिंता धर्म के हाथ में दी तो मुश्किल में पड़ोगे। और वही मुश्किल यह देश भोग रहा है। तुमने देह की चिंता भी धर्म के हाथ में दे दी है। पानी न गिरे तो तुम मूढ़ पंडितों से यज्ञ करवाते हो। अकाल पड़ जाए तो हवन करो! तुम पागल हो। वर्षा न होती तो विज्ञान वर्षा करा सकता है और अगर उपज न होती हो ठीक से तो विज्ञान उपज करा सकता है। लेकिन पंडित-पुरोहितों के हाथ में सब दे दिया है तुमने। भारत की गौ-माताएं, जिनको तुम माता कहते हो और पूजा करते हो और तुम्हारे संत-महात्मा जिनका गुणगान करते अघाते नहीं--दूध कितना देती हैं? भारत की गौओं को तो इतना दूध देना चाहिए कि दुनिया की कोई गौ न दे; क्योंकि ऐसा सम्मान, ऐसा सत्कार और कहां। ऐसी पूजा, ऐसी अर्चना गौ-माता को और कहां मिलेगी! शंकराचार्य से लेकर विनोबा भावे तक सब एक ही काम में संलग्न हैं--गौ-माता को बचाओ! गौ-वंश को बचाओ! और गौ-माता दूध कितना देती है! कोई पाव भर, कोई दो पाव, कोई सेर भर, कोई दो सेर। स्वीडन में या बेल्जियम में या स्विटजरलैंड में एक-एक गाय साठ-साठ किलो दूध देती है। विज्ञान के हाथ में बात है, पंडित-पुरोहितों के हाथ में नहीं। माता कहने का सवाल नहीं है; वैज्ञानिक सूझ-बूझ, वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का सवाल है।
छोटी सी बातों से अंतर पड़ते हैं। बहुत छोटी सी बातें से अंतर पड़ जाते हैं।
अब भारत में स्त्रियां कस कर बांधे हुए हैं साड़ियां। तुम वैज्ञानिक से पूछो कि गर्भवती स्त्री अगर इतना कस कर साड़ी बांधेगी तो बच्चे के मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? बच्चा जन्म से ही सरदार पैदा होगा! और पैदा होते ही से बारह बजे! गर्भवती स्त्री को ढीला-ढाला कपड़ा पहनना चाहिए। इतना कस कर कपड़ा बांधोगे तो बच्चे के मस्तिष्क के तंतु तो अभी बहुत नाजुक हैं, वे सब तन जाएंगे, खिंच जाएंगे, दब जाएंगे, उनको हानि पहुंच जाएगी। वह बुद्धिहीन बच्चा पैदा होगा।
मां को क्या भोजन मिलना चाहिए, यह पंडित-पुरोहितों से मत पूछो, यह वैज्ञानिकों से पूछो। क्योंकि बच्चा जब मां के पेट में है तो मां को खास तरह का भोजन चाहिए; जो बच्चे की जरूरत है, वह मां को मिलना चाहिए। बच्चा तैरता है पानी में मां के पेट में और उस पानी में ठीक वही रासायनिक तत्व होने चाहिए जो समुद्र के पानी में होते हैं। अगर उनमें जरा भी कमी रह गई, तो बच्चे के व्यक्तित्व में कमी रह जाएगी। उसमें उसी मात्रा में नमक होना चाहिए जिस मात्रा में सागर में होता है। इसीलिए गर्भवती स्त्रियां नमकीन चीजें पसंद करने लगती हैं। कुछ भी नमकीन, और उनको प्यारा लगता है! नमक के प्रति एकदम आकर्षण बढ़ जाता है। उसका कारण उनके भीतर नहीं है; वह बच्चे की जरूरत है, बच्चे की मांग है।
बच्चे की और भी मांगें हैं, जो हम पूरी नहीं कर पाते। पैदा हो जाने के बाद भी बच्चे की बहुत सी जरूरतें हैं जो हम पैदा नहीं कर पाते। इसलिए प्रतिभा पैदा नहीं होती। हमारे देश में करोड़ों लोग पैदा होते हैं, लेकिन प्रतिभाएं कितनी हैं? कितने व्यक्तियों को नोबल प्राइज मिलती है भारत में? कितने लोग जीवन की पराकाष्ठा को उपलब्ध होते हैं, मेधा को उपलब्ध होते हैं? यहां तो मेधा ही मेधा होनी चाहिए, क्योंकि यहां तो धार्मिक ही धार्मिक लोग हैं। कोई हनुमान-चालीसा पढ़ रहा है, कोई रामचंद्र जी का जाप कर रहा है, कोई माला फेर रहा है। मंदिर में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में लोग डटे हैं। मगर परिणाम क्या है? परिणाम है--दीनता, गरीबी, भुखमरी। और लोग इस तरह सोचते हैं जैसे जिम्मेवारी किसी और की है।
एक सज्जन ने लिखा है पत्र मुझे आज कि आप रॉल्स में चलते हैं, अगर इसको बेच दें और जरूरतमंदों को बांट दें, तो कितना अच्छा न हो! कितने जरूरतमंदों को कितना मिलेगा? सत्तर करोड़ जरूरतमंद हैं भारत में। अब तुम आ गए कम से कम, तुम अपना हिस्सा ले जाओ--एक पैसा भी नहीं पड़ेगा तुम्हारे हिस्से में। बाकी जो जरूरतमंद आएंगे, उनको हम देते जाएंगे। लेकिन मजा यह है कि जब मैं रॉल्स में नहीं चल रहा था, तब भी जरूरतमंद इतने ही थे, अब भी इतने ही हैं। मैं पैदल चलता था, तब भी इतने ही थे। लेकिन मूढ़तापूर्ण बात है। क्षुद्र बातों पर सारा मस्तिष्क अटका हुआ है।
और जिन सज्जन ने पूछा है उनसे मैं पूछता हूं, तुमने जरूरतमंदों के लिए क्या किया? तुम अपनी साइकिल बेचे? तुमने अपना मकान बेचा? तुमने अपनी दुकान बेची? तुमने जरूरतमंदों के लिए क्या किया? और कोई करे भी क्यों! आखिर जरूरतमंद खुद क्या कर रहे हैं? उनका काम एक ही है कि वे जरूरतें पैदा करते चले जाएं, वे बच्चों की कतार लगाएं, यह उनका काम है। जैसे कि वे कोई उपकार कर रहे हैं!
प्रश्न उन्होंने ऐसा ही पूछा है जैसे वे मुझे बड़ी सलाह देने आए हुए हैं! तुम यहां तक नाहक आए, इतना पैसा खराब हुआ, किसी जरूरतमंद को देते। तुम यहां पहुंच कैसे? बिना टिकिट? कपड़े-लत्ते पहनते हो कि नहीं? बांटो! दिगंबर मुनि हो जाओ, क्योंकि यह बात कहां रुकेगी!
मैं सस्ती से सस्ती गाड़ी में चलता था, स्टैंडर्ड हेराल्ड में। लोग मुझको तब भी पूछते थे कि आप जरूरतमंदों की फिक्र नहीं करते, इसको बेच कर जरूरतमंदों को...। मैंने उसको बेच कर फिएट खरीदी। चलो झंझट मिटाओ इसकी। लोग कहने लगे कि अरे आप फिएट में चलते हैं! जरूरतमंद!...मैंने उसको बेच कर इंपाला खरीद ली। लोग फिर कहने लगे कि जरूरतमंदों को...। मैंने इंपाला बेच कर बैंज खरीदी। लोग कहने लगे, आप क्या कर रहे हैं? चलो...रॉल्स ले आओ! अब तुम मेरे से यह प्रश्न मत पूछो, क्योंकि अब मेरे पास और उपाय नहीं है, अब और क्या खरीदो!
मेरे सोचने के अपने ढंग हैं। जरूरतमंद हो तो तुम जिम्मेवार हो, कोई मैं जिम्मेवार नहीं हूं। एक बच्चा भी मैंने पैदा किया नहीं। और आगे के लिए भी आश्वासन देता हूं कि नहीं पैदा करूंगा। और क्या चाहिए? किसी से एक पैसा मांगता नहीं हूं, किसी पर निर्भर नहीं हूं। तुम्हें परेशानी क्या होती है?
लेकिन इस देश में एक खयाल है, जैसे कि जो लोग जरूरतमंद हैं वे बड़ी कृपा कर रहे हैं और लोगों पर--जरूरतमंद रह कर! सेवा का अवसर दे रहे हैं! यही तो महान बात है, सेवा का अवसर देना। क्योंकि जो सेवा करेगा वह मेवा पाएगा। और जो सेवा करवाएंगे उनको क्या मिलेगा? यह तो मैंने सुना कि जो सेवा करेगा वह मेवा पाएगा; यहां पाएगा नहीं, अगले जनम में, मृत्यु के बाद। अब ऐसे मेवे का क्या भरोसा! और जो सेवा करवाएगा, उसका क्या होगा? वह नरक में सड़ेगा क्या? उसको नरक में सड़ना ही चाहिए।
मैं किसी को नरक में नहीं सड़ाना चाहता। मैं किसी की सेवा न करता हूं और न किसी से कहता हूं, किसी की सेवा करना, क्योंकि तुम तो मेवा लूटोगे और वह बेचारा! उसकी दुर्गति तो न करो। उसको भी मौका दो कि खुद अपने पैरों पर खड़ा हो।
शरीर और आत्मा का यह जो इतना बड़ा भेद खड़ा कर रखा है, यह गलत है। शरीर और आत्मा संयुक्त हैं, जैसे संसार और परमात्मा संयुक्त हैं। परमात्मा इस संसार की आत्मा है। यह संसार उसकी देह है।
तुम एक छोटे से विश्व हो। तुम्हारे भीतर परमात्मा के दोनों अंग प्रकट हुए हैं--शरीर और आत्मा। ये दो पंख हैं; इनमें से एक भी कट जाएगा तो मुश्किल हो जाएगी। ये दोनों ही स्वस्थ होने चाहिए।
और ध्यान रखना, पहली जरूरत शरीर की है, फिर आत्मा की। भूखे भजन न होहिं गोपाला! इसलिए विज्ञान पहली जरूरत है, धर्म नंबर दो की जरूरत है। धर्म ऊंची जरूरत है, इसलिए नंबर दो की जरूरत है। इसे तुम्हें समझने में थोड़ी कठिनाई होगी, क्योंकि तुम समझते हो कि ऊंची चीज नंबर एक होनी चाहिए। ऐसा नहीं है। अगर मंदिर बनाना हो, शिखर तो सबसे ऊपर चढ़ेगा, स्वर्ण-शिखर धूप में चमकेगा; लेकिन नींव के पत्थर पहले रखने होंगे। नींव के पत्थर किसी को दिखाई भी नहीं पड़ेंगे। लेकिन मंदिर उन्हीं पर टिकेगा। और नींव के पत्थर न हुए तो स्वर्ण-कलश चढ़ेंगे नहीं। धर्म तो स्वर्ण-कलश जैसा है। नींव के पत्थर नहीं हैं, और स्वर्ण-कलश लिए घूम रहे हो।
इस देश का दुर्भाग्य यह है कि यहां नींव के पत्थर नहीं हैं। नींव के पत्थर केवल विज्ञान रख सकता है। हमारे पास स्वर्ण-कलश की तो बड़ी योजनाएं हैं, मगर नींव के पत्थर न होने से सब योजनाएं कचरा हैं, उनका कोई मूल्य नहीं है। पश्चिम ने नींव के पत्थर तो भर लिए हैं, मगर उसके पास स्वर्ण-कलश की कोई योजनाएं नहीं हैं। अगर इन दोनों में चुनना हो तो मैं पश्चिम को चुनूंगा, क्योंकि कम से कम नींव तो तैयार है। जब नींव तैयार है तो आज नहीं कल स्वर्ण-कलश की योजना भी बन जाएगी। और अगर नींव ही तैयार नहीं है तो स्वर्ण-कलश की योजना बनाते रहो, तुम पागल हो, विक्षिप्त हो, तुम्हारी योजना का कोई मूल्य नहीं है।
पश्चिम ने मौलिक जरूरत पूरी कर ली है, इसलिए अब सूक्ष्म जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। जैसे कोई आदमी भूखा हो, उसको तुम क्या संगीत सिखाओगे? उसके हाथ कंप-कंप जाएंगे। क्या तुम उसको सितार बजाना सिखाओगे! तुम उसे बांसुरी पकड़ाओगे, वह रोएगा। उसकी आंखों से आंसू गिरेंगे। तुम उससे कहोगे कि नाचो, वह क्या नाचेगा! वह नर-कंकाल हो रहा है।
इसलिए मैं विज्ञान का अस्वीकार नहीं करता। विज्ञान की मेरी दृष्टि में बड़ी कीमत है, बहुत मूल्य है। और विज्ञान के अतिरिक्त मनुष्य कभी भी स्वस्थ नहीं हो पाएगा। यह जो तुम्हारा देश रुग्ण है, अस्वस्थ है और ये जो जरूरतमंदों की कतारें लगी हुई हैं, ये लगी ही रहेंगी, ये बढ़ती ही जाएंगी। तुम पृथ्वी के कलंक हो गए हो। होना चाहिए था पृथ्वी का सौभाग्य तुम्हें, क्योंकि तुम सबसे पुरानी जाति हो, पृथ्वी पर सबसे लंबे समय तक तुम अस्तित्व में रहे हो। और तुम्हें काफी सौभाग्य के अवसर मिले हैं, लेकिन एक चूक होती चली गई। विज्ञान न होने से धर्म की ऊंची से ऊंची बात भी हवा में खो गई। उसके लिए जमीन पर आधार न मिल सका। फूलों की तो हमने बातें की हैं, बीज हम बो न सके। आकाश तो हमने छूना चाहा, पंख हम उगा न सके।
मेरी दृष्टि विज्ञान और धर्म को भिन्न नहीं करती। विज्ञान को मैं धर्म की पहली सीढ़ी मानता हूं। अगर विज्ञान लोगों को स्वस्थ शरीर दे सके तो स्वस्थ आत्माएं अपने आप उनमें प्रवेश कर जाएंगी।
आनंद वीतराग, तुम पूछते हो कि श्रेष्ठ शरीर मिलने से क्या होगा? श्रेष्ठ शरीर अवसर है। ऐसा समझो कि कोई कहे, कोई माली कहे कि हमने अगर श्रेष्ठतम बीज भी बो दिए और सुंदरतम पौधे भी आ गए--हरियालियों से भरे हुए, स्वस्थ, ताजे, जिनमें से रस झर पड़ता है, जो लद-फद हो रहे हैं हरियाली से--तो भी क्या होगा? क्या होगा! इन्हीं में सुंदर फूल लगेंगे। तुमने अवसर पैदा कर दिया, अब सुंदर फूल अपने आप लगेंगे। इन्हीं में सुंदर फल लगेंगे। इनमें और भी सुंदर बीज लगेंगे। जिनसे और सुंदर फूल आते चले जाएंगे। जीवन एक विकास है।
विज्ञान मनुष्य को सुंदर शरीर दे सकता है, स्वस्थ शरीर दे सकता है। स्वस्थ शरीर और सुंदर शरीर हो तो अपने आप श्रेष्ठ आत्माएं प्रवेश करेंगी; किसी को प्रवेश करवाने की जरूरत नहीं है। तुमने कैसे इस शरीर में प्रवेश किया था आनंद वीतराग, कुछ कह सकते हो? इस शरीर में तुम कैसे प्रविष्ट हुए? अपने आप प्रविष्ट हो गए। यह सहज ही हो गया। जैसे पानी गङ्ढों की तरफ बहता है, ऐसे आत्माएं गर्भों की तरफ बहती हैं। गर्भ अगर सुंदर और स्वस्थ होंगे तो उनके भीतर आत्माओं को भी सुंदर और स्वस्थ होने की सुविधा मिलेगी, अवसर मिलेगा। और अवसर बड़ी बात है। अवसर हो तो विकास सुगम हो जाता है।
अभी तो हालत बड़ी अजीब है। मगर अभी भी अगर तुम और करोगे तो तुम यह पाओगे, जैनों के चौबीस तीर्थंकर ही राजपुत्र थे। क्यों? क्यों राजघरानों में जैनों के चौबीस तीर्थंकर पैदा हुए? वहां सुविधा थी तीर्थंकर के विकसित होने की। हिंदुओं के सब अवतार राजपुत्र हैं और बुद्ध भी राजपुत्र हैं। भारत में तीन धर्म पैदा हुए, तीनों धर्मों के अवतारी पुरुष राजपुत्र हैं। क्यों? ये भिखमंगों के घर क्यों पैदा न हुए? इन्होंने जरूरतमंदों को क्यों न चुना? ये किसी भूखी मरती स्त्री के गर्भ में क्यों न आए? कम से कम इनको तो दया करनी थी। महावीर जैसे अहिंसक को तो कम से कम सोचना था जन्म के पहले, कि महारानी को चुन रहा है, अरे किसी मेहतरानी को चुनता! बड़े हरिजन थे, तो मेहतरानी को चुनना था। मगर चुना महारानी को। महारानी की कोख में ही संभावना थी। स्वस्थ मिले शरीर, सुंदर मिले देह, तो भीतर भी सौंदर्य के उपाय बन सकते हैं।
क्या तुम यह कहोगे कि सुंदर वीणा होने से और स्वस्थ तार होने से वीणा के, संगीत का क्या लेना-देना? नहीं, यह तुम न कहोगे। क्योंकि अगर वीणा सुंदर हो, स्वस्थ हो, तार ठीक-ठीक बिठाए गए हों, सुमधुर हो, तो फिर संगीत की संभावना ज्यादा है। अब तुम पकड़ा दो किसी को टूटी-फूटी वीणा, हों वे महासंगीतज्ञ, तो भी क्या होगा? बैठे-बैठे टुन-टुन टुन-टुन करते रहेंगे। कुछ संगीत पैदा नहीं कर पाएंगे।
फिर मेरी दृष्टि में दोनों में कोई भेद नहीं है। मैं दोनों के बीच समन्वय को स्थापित हुआ देखना चाहता हूं। इसलिए मैं इस पक्ष में हूं कि विज्ञान को पूरा अवसर दिया जाए। शुरू से ही, प्रारंभ से ही, जहां से गर्भाधारण होता है, वहीं से अवसर दिया जाए, क्योंकि वहीं असली सवाल है। बीज बोते वक्त ही असली सवाल है। गर्भाधारण के समय से ही अगर विज्ञान को अवसर दिया जाए तो हम इस पृथ्वी को बड़े सुंदर और स्वस्थ लोगों से भर सकते हैं।
तुम जान कर चकित होओगे कि दूसरे महायुद्ध के बाद जापानियों की ऊंचाई दो इंच औसत बढ़ गई। यह कैसे हुआ? सदियों से जिनकी ऊंचाई नहीं बढ़ी थी, दूसरे महायुद्ध के बाद उनकी दो इंच ऊंचाई कैसे बढ़ गई? अमरीकी भोजन का परिणाम हुआ। अमरीकी सैनिकों के साथ आया अमरीकी भोजन। वह ज्यादा स्वस्थ था। नहीं तो जापानी बेचारा चावल खा रहा था और मछली। चावल और मछली...बस बंगाली बाबू पैदा करती है--फुसफुसा! तुम देखते हो, बंगाली को ही बाबू कहते हैं; पंजाबी को कोई बाबू कहे, जंचती ही नहीं बात। पंजाबी बाबू शब्द ही नहीं बनता। बंगाली बाबू बिलकुल जंचते हैं, उनकी ढीली-ढाली धोती, कि कांच उनकी खुली ही जा रही है। किसी तरह सम्हाल-सम्हूल कर अपने चल रहे हैं। वह फुसफुसापन बंगाली में ही होता है।
और जापानी तो और भी फुसफुसी हालत में थे। लेकिन दूसरे महायुद्ध ने क्रांति कर दी। अमेरिका के प्रवेश से भोजन में फर्क हो गया, दवाओं में फर्क हो गया।
मैंने सुना है, दो इजरायली शराबखाने में बैठे शराब पी रहे थे और गपशप भी कर रहे थे। एक इजरायली ने कहा कि मैं तो तुमसे कहता हूं कि इजरायल की समस्याएं तब तक हल न होंगी जब तक हम अमेरिका पर हमला न करें। दूसरे ने कहा, तुम होश में हो? अरे कितनी ही शराब मैं पी गया हूं, तुम्हारी बात सुन कर मेरा नशा उतर गया! इजरायल और अमेरिका पर हमला करे! क्या हम जीत सकते हैं? हार निश्चित है।
उस दूसरे ने कहा, यही तो मैं कह रहा हूं कि हार निश्चित है। और अमेरिका से जो भी हारा वही लाभ में रहा, क्योंकि पहले अमरीकी हराते हैं, फिर उसको बनाते हैं, व्यवस्था देते हैं। आज जर्मनी ज्यादा सुंदर और सुखद, स्वस्थ, समृद्ध है--जितना दूसरे महायुद्ध के पहले था। रूसी हिस्से को छोड़ दो। लेकिन अमेरिका के हाथ में जो हिस्सा पड़ गया था, उसमें चमक आ गई, रौनक आ गई।
जापान को तुम देखो, आज से बीस-पच्चीसत्तीस साल पहले, दूसरे महायुद्ध के पहले, किसी भी चीज को जापानी कह देने का मतलब गाली देना था। किसी आदमी को अगर नकली बताना हो तो हम कहते थे--जापानी है। जापानी मतलब थोथा, कुछ भी नहीं; ऊपर से दिखावा ठीक है, भीतर कुछ भी नहीं। जापानी घड़ी का मतलब यह कि बस दो-चार दिन चल जाए तो बहुत है। और अब! जापान अमेरिका को मात कर रहा है। जापान ने कुछ चीजों में अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, सबको मात कर दिया है। इलेक्ट्रानिक्स में, रेडियो में, टेलीविजन में, टेपरिकार्डरों में...और अब तो घड़ियों पर भी उतारू हो गया है! सारे जमीन के बाजार को उसने घड़ियों से भर दिया है। जो घड़ी स्विटजरलैंड की तीन हजार की हो, वह उतनी ही मजबूत घड़ी, उतनी ही सुव्यवस्थित जापान तीन सौ रुपये में देने को तैयार है। आज जापानी माल की प्रतिष्ठा है। क्या हो गया? जापान थोड़ा स्वस्थ हुआ है। जो तत्व मनुष्य के मस्तिष्क के लिए जरूरी हैं, वे जापान के भोजन में नहीं थे। वे तत्व जरूरी थे।
भारत को भोजन में बहुत से तत्वों की कमी है, इसलिए भारत में प्रतिभा पैदा नहीं होती। जब तक हम यह भोजन न बदलेंगे, तब तक भारत में प्रतिभा पैदा होगी भी नहीं। मस्तिष्क के लिए कुछ तत्व बिलकुल जरूरी हैं, कुछ विटामिन जरूरी हैं, जो हमारे भोजन में नहीं हैं। यह कैसे होगा? यह कोई राम-राम जपने से, माला फेरने से नहीं हो जाने वाला है। विज्ञान को अवसर देना होगा। और मत कहो कि विज्ञान को यह अवसर देना व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन लेना है। सच तो यह है, अभी व्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है? तुमने जो बच्चा पैदा किया है, तुम सोचते हो तुमने स्वतंत्रता से पैदा किया है? तुम्हारी क्या खाक स्वतंत्रता है! तुम चाहते थे लड़का पैदा हो, लड़की पैदा हो गई। इसको तुम स्वतंत्रता कहते हो? तुम चाहते थे दुनिया का सुंदरतम व्यक्ति पैदा हो जाए, और हो गए अष्टावक्र, आठ जगह से टेढ़े, कि ऊंट भी उनको देख ले तो झेंप जाए। तुम्हारी क्या खाक स्वतंत्रता है! तुम चाहते थे बच्चा ऐसा हो वैसा हो, कौन मां-बाप नहीं चाहते! मगर होता क्या है? यह कोई स्वतंत्रता है?
स्वतंत्रता विज्ञान तुम्हें देगा, क्योंकि तब तुम देख सकोगे। आज यह संभव है। तुम्हें इसका पता हो या न हो, आज यह संभव है। तुमने जैसा कि फूलों के कैटेलाग देखे, कि उसमें बीजों के साथ फूल भी होते हैं, चित्र बने होते हैं कि इन बीजों को खरीदने पर इस तरह के फूल पैदा होंगे! ठीक इस तरह के कैटेलाग आदमियों के संबंध में उपलब्ध हो सकते हैं कि अगर यह जीवाणु, अगर यह जीवकोष्ठ मां के गर्भ में डाला गया तो इस तरह का बच्चा पैदा होगा; उसकी इतनी ऊंचाई होगी, उसका इतना रंग होगा, इतने दिन जिंदा रहेगा, इतना स्वस्थ रहेगा, इतना उसके पास मस्तिष्क होगा, इतनी उसके पास बुद्धि होगी। इस सबकी व्यवस्था दी जा सकती है। ठीक तुम चित्र देख सकते हो, कैटेलाग में चुनाव कर सकते हो बैठ कर कि तुम्हें कौन से तरह का बच्चा चाहिए। मैं उसको स्वतंत्रता कहूंगा। क्योंकि तब तुम अपने निर्णय से अपने बच्चे को जन्म दे रहे हो। हालांकि इतनी भर अड़चन हो जाएगी कि वह ठीक तुम यह नहीं कह सकते कि मेरे ही अणुओं से पैदा हुआ है। तो इतना भी क्या आग्रह कि तुम्हारे ही अणुओं से पैदा हो? ये सारे अणु उसी परमात्मा के हैं। इसमें से श्रेष्ठतम को चुनो। यह क्या आग्रह है? ये ओछे आग्रह अहंकार से भरे हुए हैं, इनका स्वतंत्रता से कोई संबंध नहीं है।
और आत्माएं उत्सुक हैं, अनंत आत्माएं भटकती हैं हमेशा, तैयार हैं--गर्भों में प्रवेश पाने के लिए। और यह जान कर तुम हैरान होओगे कि साधारण आत्माएं तो तत्क्षण प्रविष्ट हो जाती हैं, क्योंकि साधारण गर्भ हमेशा उपलब्ध हैं, हजारों मूढ़जन संभोग करने में संलग्न हैं, चौबीस घंटे कहीं न कहीं...कहीं न कहीं रात है। और अब तो आधुनिक आदमी तो रात-दिन भी नहीं मानता; वह संभोग करने में लगा है, दिन हो कि रात हो, किसको फिक्र हैं! हर जगह गर्भ मौजूद है साधारण आदमी को पैदा होने के लिए। लेकिन असाधारण व्यक्तियों को पैदा होने के लिए बहुत वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, क्योंकि उतना असाधारण गर्भ उपलब्ध नहीं होता।
अगर हम असाधारण गर्भ उपलब्ध करा सकें तो हम पृथ्वी को बुद्धों से भर सकते हैं, महावीरों से भर सकते हैं। और निश्चित ही, अगर लोग स्वस्थ हों, संपन्न हों, बुद्धिमान हों, तो तुम जो कहते हो आनंद वीतराग कि यह काम तो आप जैसे शुद्ध-प्रबुद्ध आत्मा को ही करना पड़ेगा, तो मेरा काम सरल हो जाए। आत्मा को जगाने का काम बहुत सरल हो जाए। आत्मा को ध्यानस्थ करने का काम बहुत सरल हो जाए। आत्मा को समाधि की तरफ ले जाने की बात बहुत सरल हो जाए। अभी तो हिम्मत ही नहीं लोगों में। जरा सा साहस नहीं है अज्ञात की यात्रा पर जाने के लिए। एकदम डरपोक लोग हैं, भयभीत लोग हैं, कायर लोग हैं। छोटी सी बात से डरते हैं। गैरिक वस्त्र पहनने में ही घबड़ाहट लगती है, कि कोई क्या कहेगा! इस तरह के कमजोर लोग आत्मा को जान पाएंगे?...कि लोग हंसेंगे, कि लोग पागल समझेंगे--इतने कमजोर लोग, इतने भीरु लोग क्या परमात्मा को जान पाएंगे परमात्मा कायरों का है?
परमात्मा उनका है, जिनके भीतर अदम्य साहस है। यह सागर की बड़ी चुनौतीपूर्ण यात्रा है, अनंत की यात्रा है। तुममें बल चाहिए। यह कोई आकस्मिक बात नहीं है कि मेरे पास सारी दुनिया से संन्यासी आ रहे हैं और भारतीय बैठे सोचते ही रहते हैं कि लेना कि नहीं लेना, क्या ठीक क्या नहीं ठीक, परिणाम क्या होगा! तुममें छलांग लगाने की हिम्मत ही खो गई है। तुममें कोई भी नया प्रयोग करने की आकांक्षा ही मर गई है। बस पुरानी लकीर को पीटते रहो, घूमते रहो वर्तुल में। जो सिखा गए हैं मां-बाप, चाहे वह सार्थक हो या न हो, उसी को दोहराते रहो।
एक मारवाड़ी युवक ने एक नवयुवती से मंगनी कर ली। विवाह से पहले एक बार वह अपनी मंगेतर से मिलने उसके शहर चला। युवक के पिता ने, जो और भी ज्यादा मारवाड़ी था स्वाभाविक, उसे बुला कर कहा, बेटा, सौदा अच्छा करना। विवाह थोड़े ही है, सौदा है। विवाह के समय लड़की के बाप से तुम्हें अच्छी रकम मिलनी चाहिए। यदि वह भला है तो एक हजार रुपये लेने पर राजी हो जाना। अगर दिवालिया हो तो दो हजार से कम मत लेना।
मारवाड़ियों में यह हिसाब है कि जिसने जितने दिवाले डाले उसके पास उतना धन। असल में, इज्जत ही दिवालिये की है मारवाड़ियों में। जब किसी मारवाड़ी की प्रशंसा कोई करता है किसी से, तो कहता है, इसने तीन बार दिवाले डाले। इसने सात बार डाले। जितनी बार डाले, उसका मतलब है कि उतना पचा गया।
तो बाप ने कहा कि खयाल रखना अगर दिवालिया हुआ हो, तो दो हजार से कम मत लेना। यदि किसी अपराध के कारण जेल भी हो आया हो तो पांच हजार से कम मत लेना। क्योंकि मारवाड़ी जेल जाए, तो लाखों न पचा जाए तब तक नहीं जाएगा।
पहुंचने के अगले दिन युवक ने पिता को तार दिया, ससुर को छह साल पहले फांसी लगी थी, कितने पर सौदा तय करूं?
बस सिखाए पूत...कितने दूर तक जा सकते हैं! कितनी यात्रा कर सकते हैं! अपनी तो कोई बुद्धि ही नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन और उसका एक मारवाड़ी मित्र रेस्तरां में बैठे थे। रसगुल्लों का आर्डर दिया। जैसे ही बैरा प्लेट लेकर आया, मारवाड़ी ने झट से बड़ा वाला रसगुल्ला उठा कर अपने मुंह में दबोच लिया। मुल्ला ने झुंझला कर कहा, हमारे देश में शिष्टाचार की बड़ी चर्चा होती है, लेकिन कम ही लोग शिष्टाचार जानते हैं। मारवाड़ी के बच्चे, सच कहता हूं, यदि तेरी जगह मैं होता तो खुद छोटा वाला रसगुल्ला उठाता।
मारवाड़ी ने प्रेम से कहा, भाई नसरुद्दीन, तुम्हें छोटा वाला रसगुल्ला तो मिल गया न, अब रोते क्यों हो? यदि तुम मेरी जगह होते तब भी तुम्हें वही मिलता न आखिर? बेटा, अब मजा करो!
साहस खो गया है। साहस की जगह कायरता है। बेईमानी है, चालबाजी है। चालबाजी को हम चतुरता समझने लगे हैं। चालाकी को हम प्रतिभा समझने लगे हैं। इस सबको मिटाना जरूरी है।
इसलिए आनंद वीतराग, मैं पक्ष में हूं कि विज्ञान को पूरा अवसर दिया जाए, कि वह मनुष्य के भीतर जो कुछ भी शरीर और मन के तल पर हो सकता है, करके दिखा दे। फिर आत्मा के तल पर जो हो सकता है, वह निश्चित ही वे ही लोग कर सकेंगे जिन्होंने आत्मा को जाना है और पाया है। मगर उनके करने के लिए भूमिका मिल जाएगी। उनके करने के लिए ठीक-ठीक भूमि मिल जाएगी, ठीक-ठीक वातावरण मिल जाएगा, ठीक-ठीक लोग मिल जाएंगे। फिर तो दीये से दीये जलते जा सकते हैं। फिर तो दीवाली हो सकती है। अभी तो हालत दिवाले की है। इस देश को देखो चेहरों पर--दिवाला ही दिवाला है!
और किसी को यह नहीं है खयाल कि मैं कुछ करूं। कोई कुछ करे! हमने तो इतनी ही बड़ी कृपा कर दी है कि हम हैं और तैयार खड़े हैं, करो सेवा! पैर पसारे बैठे हैं कि दबाओ पैर! झोली फैलाए बैठे हैं कि भरो झोली! और नहीं भरते, बेईमान हो, चोर हो, शोषक हो। ये क्या ढंग हैं? यह कैसी हमने पद्धति सीखी?
और इस सबका जिम्मा हमारे तथाकथित महात्माओं पर है। वे हमें एक से एक मूढ़ताएं सिखा गए हैं। वे हम से कह गए हैं कि शरीर तो माया है, आत्मा सत्य है; संसार तो झूठ है, परमात्मा सत्य है।
मैं तुमसे कहता हूं कि अगर संसार झूठ है तो परमात्मा भी झूठ है। अगर संगीत झूठ है तो संगीतज्ञ भी झूठ है। अगर सृजन झूठ है तो स्रष्टा भी झूठ है। अगर वीणा झूठ है तो वीणा से उठे हुए स्वर कैसे सच हो सकते हैं?
मैं तुमसे कहता हूं, अगर शरीर असत्य है तो तुम्हारी आत्मा वगैरह भी सब बकवास है। मेरे हिसाब में शरीर उतना ही सत्य है जितनी आत्मा। वे एक ही सत्य के दो पहलू हैं, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। मैं उनमें जरा भी भेद नहीं करना चाहता।
मैं एक ऐसे धर्म को जन्म देना चाहता हूं, जिसकी बुनियाद विज्ञान हो और जिसका शिखर अध्यात्म हो। जहां विज्ञान और धर्म दोनों मिलेंगे, वहीं हम इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में समर्थ हो सकते हैं; अन्यथा हमने नरक बनाने में सफलता पा ली है।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
प्रेम-अनुरागी मीरा तथा स्वयं को जानने वाला सुकरात, दोनों विषपान किए। पीवत मीरा हांसी रे! लेकिन सुकरात का देहावसान हो गया। क्यों? बताने की अनुकंपा करें!

उमाशंकर भारती,
इससे सिर्फ इतना ही सिद्ध होता है कि मीरा के समय में भी चीजें शुद्ध नहीं मिलती थीं। जहर में मिलावट रही, तभी तो पीवत मीरा हांसी रे!
और यूनान, जहां सुकरात को जहर दिया, वह जहर ही था। सुकरात नहीं हंसे। वह कोई भारत थोड़े ही था। यहां तो हर चीज में मिलावट है।
मुल्ला नसरुद्दीन मरना चाहता था, जहर खरीद लाया। पीकर सो गया। सोच रहा है कि अब मर गए, अब मर गए...। आंख खोल-खोल कर देखता है, मगर वही कमरा, वही बगल में पत्नी घर्राटे भर रही है। मामला क्या है? ग्यारह बज गए, बारह बज गए, एक बज गया, दो बज गए। अपने को चिकोटी काट कर भी देखी कि जिंदा हूं कि मर गया! चिकोटी भी काटी तो पता चलता कि जिंदा हूं। बड़ी हैरानी मालूम होने लगी। तभी पेशाब भी लगी। उसने कहा कि हद हो गई, मर भी चुके और पेशाब भी लग रही है! हम तो सोचते थे: मर गए तो फिर ये सब झंझट से छुटकारा हो जाएगा।
थोड़ी देर तो पड़ा रहा सम्हाले, मगर नहीं सम्हला तो फिर बाथरूम गया। आईने में भी चेहरा देखा, सब वही का वही। सुबह भी हो गई, लड़के बच्चे स्कूल जाने लगे। पत्नी बोली कि उठो, अब कब तक पड़े रहोगे? दफ्तर नहीं जाना? हद हो गई, मरने के बाद भी सब वही का वही है! कोई फर्क ही नहीं हो रहा! दफ्तर भी जाना पड़ेगा तो मरे ही काहे के लिए! सीधा गया जहर की दुकान पर और पकड़ ली गरदन उस आदमी की, दुकानदार की, कि बेईमान कहीं के!
उसने कहा कि इसमें मेरी क्या बेईमानी है? कौन सी चीज शुद्ध मिल रही है? अरे दूध नहीं मिलता शुद्ध तो जहर मिलेगा? हर चीज में मिलावट है, मैं क्या करूं? जो उपलब्ध है सो बेच रहा हूं। अब नहीं मरे तो मैं क्या कर सकता हूं?
इसीलिए मीरा हंसी होगी।
तुम मुझसे ऐसे प्रश्न पूछ कर दिक्कतों में मत पड़ा करो। मीरा एकदम हंसी होगी कि ले आए भारतीय जहर, आ जाओ! अब दिखाती हूं चमत्कार! पीवत मीरा हांसी रे! मगर सुकरात बेचारे ने चुपचाप पी लिया; यूनानी जहर था, इसमें कुछ हेर-फेर होने वाला नहीं था, मौत निश्चित थी। पीकर एकदम लेट गया। शिष्य इकट्ठे थे, वे पूछने लगे कि क्या हो रहा है, कैसा लग रहा है? उसने कहा कि पैर ठंडे हो गए। अब घुटनों के ऊपर भी सब ठंडा हो गया। अब हाथ भी ठंडे हुए जा रहे हैं। अब धड़कन भी बहुत दूर सुनाई पड़ती है। सांसें भी धीमी पड़ती जा रही हैं।
यह असली जहर था। लेकिन तुम समझे कि यह चमत्कार हो गया। चमत्कार वगैरह कुछ भी नहीं होते। संसार नियम से चलता है। नियम किसी के लिए नहीं तोड़े जाते--न मीरा के लिए टूटते हैं, न महावीर के लिए टूटते हैं। सीधी-सीधी बात है। इसमें कुछ राज नहीं है।
तुम पूछते हो: क्यों? तुम्हारा खयाल होगा शायद कि मीरा ने सुकरात को हरा दिया, कि सुकरात रहे ज्ञानी, मगर भक्त ज्ञानी से आगे निकल गया! मीरा थी प्रेम-अनुरागी, कि देखो भक्त की विजय ज्ञान के ऊपर।
नहीं भैया, भक्त और ज्ञानी का कोई संबंध नहीं। यह भारतीय और यूनानी जहर का फर्क है।

तीसरा प्रश्न: भगवान,
क्या संसार में कोई भी अपना नहीं?
राधारमण,
ऐसे तो अपने ही अपने हैं। कोई पिता है कोई मां है, कोई भाई है कोई बहन है, कोई पत्नी है कोई पति है। ऐसे तो सब अपने ही अपने हैं। मगर सब नाटक के अपने हैं, वक्त पर काम न पड़ेंगे। तुम मर जाओ तो कोई साथ न जाएगा। मरघट तक पहुंचा आएं, यही बहुत। इधर तुम मरे कि जल्दी से लोग अरथी तैयार करने लगेंगे--वही लोग, जो क्षण भर पहले पैर दबा रहे थे, बड़ी प्रशंसा कर रहे थे। एकदम जल्दी में लग जाएंगे कि खतम हो गया, अब चलो, जल्दी निपटारा करो, जितनी जल्दी निपटारा हो अच्छा! उस अर्थ में कोई अपना नहीं है।
मगर इसका दुरुपयोग किया तुम्हारे महात्माओं ने। इस विचार का भी दुरुपयोग किया। यह समझाया तुम्हें कि कोई अपना नहीं है, इसलिए छोड़-छाड़ कर भाग जाओ। छोड़-छाड़ कर भाग जाने का अर्थ क्या? जब अपना कोई है ही नहीं, तो किसको छोड़ कर भाग जाओ? इसलिए मैं कहता हूं: कहीं छोड?ो मत, कहीं भागो मत। कोई अपना है ही नहीं। छोड़ना किसको? अपना हो तो छोड़ते।
तुमने कभी रामलीला में देखा कि रामचंद्रजी ने बीच में ही संन्यास ले लिया? कि अरे यहां कौन अपना, कि चलो अच्छा हुआ रावण सीता को चुरा ले गया! कौन किसका है! हम चले, हम संन्यासी हो जाते हैं! तो मैनेजर धक्के देकर बाहर ले आएगा कि क्या कर रहे हो, ऐसे नहीं चलेगा, नाटक पूरा करो! अरे जब फीस पूरी ली है तो नाटक भी पूरा करना पड़ेगा। वह विनोद हमारे सामने बैठे हैं। उनसे पूछो। किसी डायरेक्टर से ले ली फीस, फिर तो बीच में तुम कहने लगो कि अब हम संन्यासी हो गए, तो भी वह कहेगा: तुम्हारा संन्यास तुम जानो, मगर अभिनय पूरा करना पड़ेगा।
अब विनोद भागना चाहते हैं, मगर दो साल तक अटके रहना पड़ेगा, क्योंकि जब तक वे फिल्में पूरी न हो जाएं। फिल्मों में थोड़े ही संन्यास ले सकते हो! फिल्मों से कैसे संन्यास लोगे?
यह सारा जगत ही एक बड़ा अभिनय है, एक बड़ी मंच है। इस मंच में कहां भागना, किसको छोड़ना? छोड़ने का तो अर्थ हुआ कि तुमने अपना मान ही लिया। वहीं भूल हो जाती है। एक भूल है अपना मानना और एक भूल है कि अपना कोई नहीं है, इसलिए चले! कहां जा रहे हो? जहां जाओगे वहां भी कोई अपना नहीं है। पहले सोचते थे पति अपना है, पत्नी अपनी है, बेटा अपना है, फिर चले गए जंगल, फिर सोचने लगे, शिष्य अपना है, चेला-चांटी इकट्ठे हो गए, ये अपने हैं। वे भी अपने नहीं हैं। वे भी तुम खतम हो जाओगे तो वही करेंगे जो तुम्हारे लड़कों ने किया होता। जैसे तुम्हारे लड़के राह देख रहे थे कि अब पिताजी सरको, कि अब हम बहुत थक गए, आखिर हमको भी थोड़ा मौका दो! गद्दी पर तुम्हीं बैठे रहोगे? अब हम भी बैठें थोड़ा! वैसे ही तुम्हारे शिष्य भी कोशिश में रहेंगे कि अब उठो गुरुदेव!
मैं एक धर्म-सम्मेलन में निमंत्रित था। एक शंकराचार्य ने धर्म-सम्मेलन बुलाया हुआ था। पता नहीं किस भूल-चूक में मुझे बुला बैठे। अब उन्होंने भूल की तो मैंने कहा, अब तुम भूल कर रहे हो तो मैं भी क्यों चूकूं! मैं चला गया। उन्होंने अपने सब शिष्यों का परिचय मुझे कराया। उनका तख्त ऊपर लगा हुआ था, उस तख्त के नीचे एक छोटा तख्त लगा हुआ था, उस तख्त पर एक सज्जन बैठे हुए थे। संन्यासी--बिलकुल घुट्टमघुट्ट! सबसे पहले उन्होंने उनका परिचय कराया, कहा कि ये इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे, बड़े विनम्र हैं! कितना ही इनसे कहूं कि आ जाओ मेरे तख्त पर बैठो, कभी नहीं बैठते। देखो, नीचे तख्त पर बैठे हैं!
मैंने कहा, यह तो बात जंच रही है, साफ दिखाई पड़ रहा है। मगर और लोग जमीन पर बैठे हैं, ये जमीन पर नहीं बैठते? इनको तो असल में, जहां भी बैठें वहां गङ्ढा खोद कर बैठना चाहिए। अगर सच्चे विनम्र हैं, तो कुदाली साथ लेकर चलना चाहिए, कि जहां बैठे जल्दी से गङ्ढा खोदा, बैठ गए, ताकि कोई इनके नीचे न पड़ जाए। अब इसमें कई लोग तो नीचे बैठे हैं और ये बीच में बैठे हैं। आप ऊपर बैठे हैं।
और मैंने कहा कि यह न्यायाधीश रहे हैं, पहले वकील रहे होंगे। उन्होंने कहा, हां, वकील तो रहे पहले। तो मैंने कहा, ये हिसाब लगा रहे हैं। तुम खिसको, तो ये बिलकुल बगल में ही बैठे हैं, एकदम चढ़ कर ऊपर बैठ जाएंगे, देख लेना।
वे बोले, आप भी कैसी बातें करते हैं! मैंने कहा, मैं सच्ची बातें कर रहा हूं। जैसी बात करनी चाहिए वही कर रहा हूं। अब सांसारिक क्या बातें करनी, संन्यासियों से तो शुद्ध बातें करनी चाहिए। यह आदमी चालबाज है।
वे आंखें बंद किए बैठे थे, उन्होंने एकदम आंखें खोल लीं। मैंने कहा, यह बहुत उस्ताद आदमी मालूम होता है। अभी तक आंखें बंद किए था, अब एकदम आंखें खोल लीं इसने। यह बना-ठना बैठा है। यह सिर्फ राह देख रहा है। यह भीतर ही भीतर कह रहा होगा कि उठो, खिसको गुरुदेव, बहुत दिन बैठ लिए, अब मुझे शंकराचार्य होने दो। यह तुम्हारे मरने की राह देख रहा है। नहीं तो यह बीच के तख्त पर क्यों बैठा हुआ है? या तो सबके साथ नीचे बैठे। सबके साथ नीचे नहीं बैठ सकता है, क्योंकि यह न्यायाधीश रहा है। और तुम्हारे साथ ऊपर बैठ नहीं सकता, तुम्हारे सामने विनम्रता का प्रभाव पैदा करना है, क्योंकि तुम विनम्रता को ही सम्मान दोगे। और तुम अभी तक नहीं भूले और यह भी नहीं भूला कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। अब जो बात हो गई हो गई। जो भूल हो गई हो गई, उसको बार-बार क्या दोहराना! और किसी के घाव बार-बार क्यों छूना! अब इसके पाप की कथा आप बार-बार क्यों सभी को बताते हैं कि यह पहले यह था, पहले वह था? लेकिन यह पाप की कथा नहीं है; आप असल में, इसके माध्यम से अपने अहंकार की तृप्ति कर रहे हैं, कि मेरे शिष्य कोई साधारण नहीं हैं। यह देखो चीफ जस्टिस हाईकोर्ट का था! यह मेरा शिष्य है! और कितना विनम्र है कि देखो बेचारा, मेरे साथ नहीं बैठता, थोड़ा नीचे बैठा हुआ है! तुम इसकी प्रशंसा कर रहे हो। तुम इसके अहंकार की पूर्ति कर रहे हो। और तुम भी अपने अहंकार की पूर्ति कर रहे हो इसके माध्यम से कि मैं कोई साधारण शंकराचार्य नहीं हूं। बड़े-बड़े लोग मेरे शिष्य हैं!
घर-द्वार छोड़ दोगे, पत्नी-बच्चे छोड़ दोगे, तो जाकर कहीं दूसरे उपद्रव में पड़ जाओगे। कोई अपना नहीं है, यह बोध पर्याप्त है। फिर छोड़ना क्या, फिर पकड़ना क्या?

हमारे शहर में एक जादूगर आया
आते ही उसने, ढिंढोरा पिटवाया--
मैं आंख की पुतली को दांतों से मिला दूंगा
जो नहीं हो सकता उसे करके दिखा दूंगा।
एक आदमी नशे में बोला--बेवकूफ बनाता है
पुतली को दांतों से मिलाता है
हम पांच सौ रुपये की शर्त लगाता है।

जादूगर ने आदमी को जड़ से हिला दिया
बाएं आंख की नकली पुतली निकाली
और उसे दांत से मिला दिया।

आदमी बोला--दूसरी पुतली भी मिलाओ।
जादूगर बोला--पांच सौ और दिलवाओ।
इस बार उसने कमाल किया
नकली दांत निकाला और उसे पुतली से मिला दिया।
कुछ लोग नाचने लगे, कुछ गाने लगे
बचे-खुचे तालियां बजाने लगे।

जादूगर बोला--खामोश,
यह तो कुछ भी नहीं
परसों शाम को कंपनी बाग में कमाल दिखाऊंगा
जो लोग इस शहर में एक हफ्ता पहले मरे हैं
उन सबको जिंदा करके दिखाऊंगा।
इससे पहले यह प्रयोग कई शहरों में कर चुका हूं
तीन मुर्दों को झुमरी तलैया में जिंदा कर चुका हूं।

उसी रात जादूगर के पास एक नौजवान आया
और बोला--
गुरु, यह क्या कर रहे हो
मुर्दों को जिंदा कर रहे हो
मेरा बाप बीस लाख छोड़ कर मरा है
उसे जिंदा कराओगे
तो क्या मुझे मरवाओगे?

उसके बाद एक महिला आई
उसने भी अपनी दास्तान सुनाई--
मेरा पति चार रोज पहले मरा है
अपने पूर्व प्रेमी से मैंने विवाह करा है
उसे जिंदा कराओगे
तो क्या मुझे दो-दो की पत्नी बनाओगे?

अंत में
नगरपालिका का चेयरमैन आया
उसने अपना दुखड़ा इस प्रकार सुनाया--
पिछला चेयरमैन अभी परसों ही मरा है
बड़ी मुश्किल से तो मुझे चार्ज मिला है
गुरु, यह दस हजार ले लो
और यह जिंदे-मुर्दे का खेल कहीं और दिखाओ।

जादूगर सोचने लगा--
इतने बड़े शहर में कोई यह कहने नहीं आया
कि मेरी मां या बहन को जिला दो
या मेरे बिछुड़े हुए भाई से मुझे मिला दो
हाय रे ये स्वार्थ की दुनिया
यहां कोई अपना नहीं सब दिखावा है
जीते जी तो ये सब लोग
कठपुतली की तरह नाचते हुए चाबी के खिलौने हैं
पद और प्रतिष्ठा में बहुत बड़े हैं
पर भावना के मामले में बौने हैं
जीते जी तो ये लोग
नाटक के पात्रों की तरह झूठा प्यार दिखाते हैं
और मरने के बाद लोग सबको भूल जाते हैं।

राधारमण, इस अर्थों में कोई अपना नहीं है, क्योंकि मृत्यु सबसे तोड़ देगी। इस सत्य को जान कर जीवन को अभिनय की तरह जीओ। गंभीरता से मत लो। बस नाटक के पात्र होओ। मैं इसी को संन्यास कहता हूं--भागने को नहीं, जागने को!

चौथा प्रश्न: भगवान,
आपके आश्रम में तो बिना अंग्रेजी जाने जीना मुश्किल है। जितने विदेशी मैंने यहां देखे इतने एक स्थान पर तो एकत्रित कहीं न देखे थे। अब मैं क्या करूं? मैं तो आश्रम में ही रहने आई थी, क्या अब बुढ़ापे में अंग्रेजी सीखूं?

सीता मैया, अब बुढ़ापे में यह कहां का उपद्रव करोगी! बिना अंग्रेजी सीखे चलेगा। कोई बाधा न पड़ेगी। यहां इतने विदेशी हैं, उनमें से बहुत से अंग्रेजी नहीं जानते। कोई सिर्फ जापानी समझता है, कोई सिर्फ स्पेनिश समझता है, कोई सिर्फ इटेलियन समझता है, कोई सिर्फ जर्मन समझता है, कोई सिर्फ फ्रेंच समझता है, कोई सिर्फ डच समझता है। अब तुम कौन-कौन सी भाषा सिखाओगे? हिंदी समझने से बिलकुल चलेगा, कोई अड़चन नहीं है।
यह तो विश्व-परिवार है। इससे घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है। और बुढ़ापे में अंग्रेजी सीखने बैठोगी, उलटा-सीधा कुछ हो जाए! कुछ का कुछ हो जाए!
चंदूलाल कल ही मुझसे कह रहे थे--

एक दिन हमारी श्रीमती को
बैठे बिठाए अंग्रेजी सीखने का
शौक चर्राया
उन्होंने हमें बुलाया--
हमें भी एक मास्टरनी लगवा दो
हमें भी अंग्रेजी में गिटपिट करना सिखा दो।
थोड़े दिनों के बाद
एक खूबसूरत मिस--
उनको पढ़ाने लगी
उनसे ज्यादा हमें भाने लगी
अंग्रेजी सीखने के पहले ही दिन
हमसे बोली--
सुनते हो
शर्मा जी का ट्रांसफार्मर हो गया
विदाई दे आओ।
हमने कहा--
गलत अंग्रेजी बोलकर
हमरा दिमाग मत खाओ।
दूसरे दिन बोली--
क्रिकेट की डाकूमंत्री को सुना
यह इंडिया वाले
एक इवनिंग से हारेंगे।
तीसरे दिन उनकी मिस ने पूछा--
अंग्रेजी के सेंटेंस लिख लिए?
पत्नी बोली--वह तो सुबह ही लिख लिए थे
अब आप करेप्शन कर दीजिए।
चौथे दिन
उनकी सहेली का टेलीफोन आया
हमारी श्रीमती ने उठाया
सहेली ने पूछा--
सुना है तुम्हारे पड़ोस में
गुप्ता जी गुजर गए।
पत्नी बोली--
अजी ससपेंस हो गया
सुबह तक तो सेंस में थे
शाम को नानसेंस हो गया।

सीता मैया, कहां की झंझट में पड़ना! पुरानी सीता मैया की याद करो। लंका में रह आईं बिना अंग्रेजी सीखे। अब वहां कोई हिंदी बोलता था लंका में! अशोक-वाटिका में कोई हिंदी बोलता था तुम सोचती हो? रावण हिंदीभाषी था तुम सोचती हो? लंका में कहां हिंदीभाषी! अगर बहुत ही बहुत खींचो तो तमिलभाषी रहा होगा। बहुत खींचो अगर।
कोई झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं, अगर यहां आने का मन है, यहां रहने का मन है। बस इतना काफी है। सबका काम चल रहा है। विश्व-परिवार की तो यह बात होनी ही चाहिए। इशारों से भी काम चल जाता है। काम की बात के लिए रास्ता निकल आता है। इसलिए इसका भय न लो, इससे परेशान न होओ।
और इतने जो तुम्हें भिन्न-भिन्न देशों के लोग दिखाई पड़ रहे हैं, इनको विदेशी मत समझो। कौन देशी कौन विदेशी! सब एक ही परमात्मा की उपज हैं। सब एक ही पृथ्वी पर खिले हुए फूल हैं। ये धारणाएं छोड़ो। यह देशी-विदेशी का भेद-भाव छोड़ो। यहां तो घुलमिल जाओ। और तुम्हें कभी अड़चन न होगी, कोई अड़चन न होगी।
भाषा थोड़े ही मिलाती है, भाव मिलाता है। भाषा तो शायद तुड़वा दे, झगड़ा करवा दे, विवाद करवा दे। भाव--न विवाद, न झगड़ा, न उपद्रव।
मेरे एक जर्मन संन्यासी हैं--हरिदास। वह जापानी नहीं समझते और उनका प्रेम हो गया एक जापानी लड़की से, वह जर्मन नहीं समझे। खूब चली दोनों की! और बड़े मजे से चली! झगड़ा-झांसे का सवाल ही नहीं। उनकी प्रेयसी गीता, उसे गुस्सा आए तो जापानी में आए, तो आता रहे! हरिदास समझें कि पता नहीं गीत गा रही है कि भजन कर रही है कि क्या कर रही है! हरिदास गरमा जाएं तो जर्मन में। तो गीता हंसती ही रहे; उसको क्या पता कि क्या बक रहे हैं! तो मुझे तो बहुत अच्छा लगा कि यह तो काम अच्छा हुआ। ऐसा होने लगे तो पति-पत्नी के बहुत झगड़े कम हो जाएं।
कहते हैं कि सबसे सौभाग्यशाली जोड़ा वह है जिसमें पत्नी हो अंधी और पति हो बहरा। क्योंकि पत्नी कितना ही बके पति को कुछ सुनाई न पड़े। और पति कैसी ही हरकतें करे, मुहल्ले भर में किसी के पीछे दौड़े, भागे, पत्नी को दिखाई न पड़े। बस--इसको कहते हैं राम मिलाई जोड़ी!

पांचवां प्रश्न: भगवान,
हमने प्रतिभावान व्यक्तियों की क्षमता का क्या उपयोग किया? आइंस्टीन ने खोजा भौतिकी का गूढ़ रहस्य और हमने उससे हिरोशिमा व नागासाकी को जला कर राख कर दिया। कभी-कभी लगता है कि काश अगर न हुए होते जीसस और मोहम्मद तो इस पृथ्वी पर लाखों-करोड़ों लोगों का खून कम बहा होता! धर्म तथा विज्ञान के जगत में मिले आज तक के सभी वरदान पंडितों और राजनीतिज्ञों के हाथों में पड़ कर मनुष्य-जाति के लिए अभिशाप सिद्ध हुए हैं। क्या भविष्य में इस दुर्भाग्य से बचने की संभावना है? कल आपने प्रतिभा को जन्माने की प्रक्रिया की चर्चा की। प्रतिभाओं का सम्यक उपयोग कैसे हो, इस संबंध में आपकी क्या दृष्टि है?

शैलेंद्र,
यह सच है कि हम मनुष्य-जाति में अब तक जो जन्मी प्रतिभाएं थीं, उनका सदुपयोग तो नहीं कर पाए, दुरुपयोग ही किया। मगर इसका कारण था। इसका कारण यह था कि प्रतिभाएं कम थीं और प्रतिभाहीन लोगों की भीड़ है। आइंस्टीन रहस्य खोजता है भौतिकशास्त्र के, अणुबम का राज खोजता है, अणुबम बना देता है। लेकिन अणुबम का उपयोग कौन करेगा? अणुबम का उपयोग करेंगे वे लोग जिनके पास कोई प्रतिभा नहीं है। आइंस्टीन का कसूर नहीं है अणुबम का खोज लेना। कसूर यह है कि अणुबम उनके हाथों में पड़ेगा जिनके पास कोई प्रतिभा नहीं है। वे भी क्या करें!
अब बंदर के हाथ में तलवार दे दोगे तो बंदर क्या करेगा? कुछ न कुछ उपद्रव होगा। या तो किसी को मारेगा या खुद को लहूलुहान कर लेगा। इस बात की आशा करनी तो मुश्किल है कि बंदर तलवार का कोई भी ठीक उपयोग कर पाएगा। असंभव! वह बंदर की क्षमता नहीं है।
इसलिए मैं कहता हूं कि हमें ज्यादा प्रतिभाएं चाहिए, ताकि छोटी-मोटी प्रतिभाएं अब तक जो हमसे पैदा हुईं, उन्होंने जो-जो हमें दिया उसका सदुपयोग हो सके, उसका सम्यक उपयोग हो सके! काश हमारे पास सभी क्षेत्रों में प्रतिभाएं होतीं आइंस्टीन की हैसियत की, तो अणुबम की खोज इतनी महान खोज थी कि पृथ्वी से सारा दीन-दारिद्रय मिट जाता! प्रतिभा की ऐसी बाढ़ आती कि कोई दुख, कोई बीमारी बच न पाती; सब बाढ़ में कचरा बह जाता। मगर प्रतिभाओं की कमी है, इसलिए हानि हुई।
बुद्ध और महावीर ने जो कहा, जीसस और मोहम्मद ने जो कहा, वह पंडित-पुरोहितों के हाथ में पड़ गया, क्योंकि और प्रतिभाशाली लोग नहीं थे जो उसे अपने हाथ में ले सकते। इसलिए तो मैं कहता हूं: हमें ज्यादा प्रतिभाओं की जरूरत है। पृथ्वी पर इतनी प्रतिभाएं होनी चाहिए कि अब पंडित-पुरोहितों और राजनीतिज्ञों का चलन बंद ही हो जाए। जाता ही कौन है इनके पास? इनको नमस्कार कौन करता है? इनसे भी दीनऱ्हीन लोग। ये खुद ही दीनऱ्हीन हैं, इनसे दीनऱ्हीन लोग इनको नमस्कार करते हैं।
तुम्हारे पंडित की हैसियत कितनी है, जिससे तुम पूजा करवाते हो? उसकी समझ कितनी है, उसका बोध कितना है? वह बुद्धू तुम्हारा मालिक बना बैठा है। वह तुमको मार्गदर्शन दे रहा है, जिसके खुद के जीवन में अंधकार ही अंधकार है।
राजनीतिज्ञों के हाथ में अणुबम पड़ गया, तो खतरा हुआ, होना ही था। आश्चर्य तो यह है कि बहुत ज्यादा नहीं हुआ, थोड़ा ही हुआ, दो ही नगर मिटे। सारी पृथ्वी मिट सकती है। लेकिन दूसरा पहलू भी देखो। अल्बर्ट आइंस्टीन, रदरफोर्ड और जिन लोगों की मेहनत से अणुबम का जन्म हुआ, उसका सिर्फ एक ही पहलू देखा गया कि नागासाकी और हिरोशिमा, दो लाख की बस्ती के नगर बरबाद हो गए। मगर दूसरा पहलू जो बहुत महत्वपूर्ण है, वह किसी ने देखा नहीं। वह पहलू यह है कि अणुबम और उदजनबम के कारण ही तीसरा महायुद्ध नहीं हो रहा है, क्योंकि अब बुद्धू से बुद्धू राजनीतिज्ञों को भी यह बात समझ में आ गई कि अगर तीसरा महायुद्ध होता है तो कोई जीतेगा नहीं, सब मरेंगे। और जीत का तो मजा तभी है जब हम बचें। अगर रूस भी मिट जाए और अमेरिका भी मिट जाए, तो युद्ध का फायदा क्या? युद्ध का अर्थ क्या? इतना ही ज्यादा से ज्यादा फर्क पड़ेगा कि दस मिनट का फर्क पड़ेगा; एक दस मिनट पहले मरेगा, दूसरा दस मिनट बाद, बस इतना ही फर्क पड़ेगा, इससे ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है। पूरी पृथ्वी को नष्ट होने में ज्यादा से ज्यादा दस मिनट लगेंगे। मगर इससे क्या फायदा? कौन दस मिनट पहले मरा और कौन दस मिनट बाद, इससे कुछ बहुत फर्क पड़ने वाला है? और कौन पीछे हिसाब रखने को रहेगा कि कौन दस मिनट पहले मरा और कौन दस मिनट बाद? कोई बचेगा नहीं।
तो अणुबम की खोज ने एक महत्वपूर्ण काम किया, वह यह कि तीसरा महायुद्ध नहीं हो सकता है अब। अब तक जितने युद्ध हो सके वे इसीलिए हो सके कि कोई जीतता था, कोई हारता था। अब युद्ध हो गया चरम अवस्था पर। यह युद्ध समग्र है; इसमें कोई जीतेगा नहीं कोई हारेगा नहीं, सब मरेंगे। कोई मरना नहीं चाहता। हां, किसी को मारने का मजा अगर हो तो आदमी मरने को भी तैयार होता है। मगर इसमें तो मारने का मजा ही नहीं है। यह तो सीधी आत्महत्या है। नागासाकी, हिरोशिमा ने चौंका दिया। बुद्धुओं को भी थोड़ी सी बुद्धि आई। यह दूसरा पहलू है।
मेरे देखे तीसरा महायुद्ध हो नहीं सकता। भूल-चूक से हो जाए तो बात अलग। भूल-चूक का मतलब ऐसा कि कोई कंप्यूटर भूल कर दे, क्योंकि अब कंप्यूटर के हाथ में सारी चाबियां हैं। कंप्यूटर झूठी खबर दे दे। कंप्यूटरों का क्या भरोसा! अभी-अभी कोई महीने भर पहले अमेरिका के एक कंप्यूटर ने गलती कर दी। अगर दो मिनट और लग जाते और गलती नहीं पकड़ी जाती तो युद्ध हो गया होता। एक कंप्यूटर ने खबर दे दी कि रूस हमला कर रहा है। कंप्यूटर का क्या भरोसा! मशीनें मशीनें हैं! अरे आदमी का भरोसा नहीं किया जा सकता, मशीनों का क्या! आ गई होगी जोश-खरोश में। ज्यादा डंड-बैठक लगा गई होगी। भंग इत्यादि पी गईं, कुछ भी हो गया होगा। और कंप्यूटर तो बहुत ही नाजुक मशीनें हैं, जरा सी बिजली की भूल-चूक हो गई होगी और उसने खबर दे दी, सिग्नल दे दिया कि युद्ध होने के करीब है, अमेरिका हमले की तैयारी कर ले।
मगर युद्ध इतना भयंकर है कि जिस जनरल को यह सूचना मिली, उसने भी पहले जांच-पड़ताल कर लेनी चाही कि कंप्यूटर कोई गलती तो नहीं कर रहा है। आखिर कंप्यूटर कंप्यूटर है! कहावत है कि आदमी से गलतियां होती हैं, मगर असली गलतियां करवानी हों तो कंप्यूटर चाहिए। आदमी से छोटी-मोटी गलतियां होती हैं; बड़ी गलतियों के लिए कंप्यूटर चाहिए। पता चला कि कंप्यूटर ने गलत खबर दे दी। अमेरिका के राष्ट्रपति को खबर मिलने से पहले पता चल गया, नहीं तो बस खबर पहुंचने वाली थी। और एक दफा खबर पहुंच गई होती अमेरिका के राष्ट्रपति को, तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्र छोड़ दिए होते सुरक्षा लिए। और कोई उपाय नहीं था।
हां, ऐसी कोई भूल हो जाए और युद्ध हो जाए तो बात अलग है। अन्यथा अब बुद्धू से बुद्धू राजनीतिज्ञ भी समझ रहे हैं कि युद्ध का कोई अर्थ नहीं रह गया है, युद्ध व्यर्थ हो गया है। युद्ध अतीत की बात हो गया है। भविष्य में कोई युद्ध की संभावना नहीं है। छोटी-मोटी लड़ाइयां चल सकती हैं, मगर बड़े युद्धों का कोई अर्थ नहीं है। अब बड़ा युद्ध नहीं हो सकता। यह लाभ हुआ।
तुम कहते हो कि इस पृथ्वी पर करोड़ों-लाखों लोगों का खून बहा होगा। अगर बुद्ध, महावीर, कृष्ण, क्राइस्ट, मोहम्मद, मूसा न हुए होते तो यह खून बच जाता। नहीं बचता। अरबों का बहा होता। इस सत्य को भी अभी तक नहीं देखा गया है। महावीर-बुद्ध के रहते हुए भी लाखों का बहा, तो तुम सोचते हो महावीर-बुद्ध अगर न हुए होते तो कम का बहा होता? तो कई गुना ज्यादा का बहा होता। जब उनके बावजूद बहा तो उनके बिना तो क्या कहना था! उनके बिना तुम अभी भी लंगूरों की तरह वृक्षों पर लटक रहे होते; तुम आदमी ही न होते उनके बिना। उनके कारण ही तुम आदमी हो। और उनके कारण ही तुम्हारे मन में यह दया-भाव उठता है, यह करुणा उठती है कि करोड़ों लोगों की हत्या हुई। उनके कारण! अन्यथा किसके कारण? और आदमी तो ऐसे भी मरता है, वैसे भी मरता है। कोई आदमी बच तो नहीं जाते, मरते ही। कुछ देर-अबेर मरते।
और तुम एक बात खयाल रखो कि आदमियों को लड़ना हैं तो वे कोई भी बहाने से लड़ते हैं। फुटबाल का मैच हो रहा है, उसमें झगड़ा हो जाता है। अब वहां तो कोई धर्म का सवाल नहीं है, कोई मोहम्मद और जीसस का सवाल नहीं है, कि एक पार्टी जीसस की, एक मोहम्मद की। एक इस मुहल्ले की, एक उस मुहल्ले की, दूसरे मुहल्ले की और दंगा-फसाद हो जाता है और मारपीट हो जाती है, खून हो जाता है, गोली चल जाती है, लकड़ी चल जाती है। आदमी को लड़ना है।
अब फुटबाल के खेल में तुम देखते हो, होता क्या है? सिवाय बुद्धुओं के और कौन खेलता होगा! मैं तो कभी किसी खेल में सम्मिलित हुआ नहीं, क्योंकि मुझे बचपन से ही दिखाई पड़ने लगा कि यह भी क्या बुद्धूपन है--गेंद को इधर से उधर फेंको, उधर से इधर फेंको! अरे ऐसे ही ज्यादा शौक है तो एक गेंद तुम रख लो, एक हम रख लेते हैं? झंझट खतम करो। इधर-उधर फेंकना और परेशान होना और भागा-दौड़ी करनी, क्या सार है? अपनी-अपनी गेंद रखो, अपने-अपने घर जाओ। लेकिन लोग लगे हैं, जी-जान से लगे हुए हैं। फुटबाल, वालीबाल, क्रिकेट--और कैसा जोश-खरोश चलता है! अब क्रिकेट कोई धर्म तो नहीं है, मगर कुछ लोगों के लिए धर्म है बिलकुल। उनकी अगर टीम हार जाए तो देखो उनकी हालत।
मेरे एक मित्र हैं, वे दीवाने हैं क्रिकेट के! उनकी पार्टी हार गई, रेडियो पर बैठे कमेंटरी सुन रहे थे, रेडियो उठा कर पटक दिया। इतने गुस्से में आ गए, रेडियो तोड़ दिया। फिर पीछे पछताए कि यह तो अपना ही नुकसान हुआ। मगर अब पछताने से क्या होगा? अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत! मैंने उनसे कहा कि कुछ जरा अकल लाओ। इससे तुम्हारी बुद्धि का पता चलता है।
लेकिन लोग इसी तरह हैं। कोई लाल कुर्ती वाली पार्टी है, कोई हरी कुर्ती वाली पार्टी। हरी कुर्ती वाली जीतना चाहिए! लाल कुर्ती वालों को हरा कर रहेंगे! पार्टियां बन जाती हैं। दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं और पार्टियां बनी हुई हैं--कौन जीता है, कौन हारता है? लाखों लोग देखने इकट्ठे होते हैं। इन पागलों को तुम सोचते हो कोई मोहम्मद की और महावीर की जरूरत है झगड़ा करवाने के लिए? अरे कोई भी करवा देगा। ये झगड़े को तैयार हैं। ये बिना झगड़े के रह नहीं सकते। ये तो बैल को देख कर कहते हैं: आ बैल, सींग मार! ये तो तलाश में घूमते हैं सुबह से कि हो जाए किसी से। ये तो डंड-बैठक लगाते हैं, हनुमान-चालीसा पढ़ते हैं। ये तो लंगोटी बांधे घूम रहे हैं कि है कोई जवां मर्द तो आ जाए। इनको चैन नहीं है, जब तक ये किसी की छाती पर न चढ़ जाएं। ये नई-नई तरकीबें निकालते हैं। ये कोई न कोई बहाने लड़ेंगे। इनको तुम लड़ाई से बचा नहीं सकते। मुर्गे लड़ाते हैं! अब मुर्गों का क्या कसूर? और मुर्गे लड़ाने लोग इकट्ठे हो जाते हैं और हजारों लोग देखते हैं मुर्गों की लड़ाई। तीतर लड़ाते हैं। आदमी की अकल तो देखो! इनसे तुम आशा करते हो कि बुद्ध-महावीर न हुए होते तो ये बिना लड़े रह जाते। सांड लड़ाते हैं। सांडों से आदमियों को लड़ाते हैं। और यह सदियों से चल रहा है।
यूनान में जो सबसे पहले स्टेडियम बने, वे इसलिए बने थे, जिनमें लाखों लोग बैठ सकें। वहां एक काम होता था। आदमियों को जंगली जानवरों के साथ छोड़ देते थे--शेर, चीते, सिंह, उनके साथ छोड़ देते थे। खासकर ईसाइयों को। अभी जीसस को मरे ज्यादा दिन नहीं हुए थे। उनके नये-नये संन्यासी थे, जैसे मेरे संन्यासी हैं। वह तो जमाना अच्छा है अब कि तुम्हारे पीछे कोई सिंह वगैरह नहीं छोड़ता, बहुत से बहुत किसी ने लगा दिया कुत्ता वगैरह--लग-छू! वह बात अलग। और कुत्तों को लगाने की जरूरत नहीं, कुत्ते कुछ अजीब ही हैं। वे पहले ही से वर्दी के खिलाफ हैं। पुलिसवाले के पीछे लग जाएं, क्योंकि वर्दी। सैनिक के पीछे लग जाएं, संन्यासी हैं। पुलिसवाले के पीछे लग जाएं, क्योंकि वर्दी। सैनिक के पीछे लग जाएं, संन्यासी के पीछे लग जाएं। कुत्ते जानी दुश्मन हैं वर्दी के। कोई भी एक रंग के कपड़े पहने दिखा कि उनको गुस्सा आया।
मगर यूनान में, रोम में, बड़े-बड़े स्टेडियम बने। एक ईसाई फकीर को पकड़ा गया। एक लाख आदमी देखने इकट्ठे हुए। ईसाई फकीर खड़ा हो गया। सिंह छोड़ दिया गया उसके ऊपर। कुछ हुआ। जैसे मीरा के साथ हुआ। पता नहीं सिंह नकली था या क्या मामला था, क्योंकि कभी-कभी नकली सिंह भी होते हैं। अरे जब नकली आदमी होते हैं...! सिंह आया और रुक कर खड़ा हो गया, हमला न किया उसने। शोरगुल मच गया कि मारो इस फकीर को, यह कोई जादू-मंतर कर रहा है। तो उस फकीर की पहले पिटाई की गई कि तू जादू-मंतर बंद कर। अरे न्याययुक्त ढंग से लड़। लड़ा रहे हैं सिंह से--मगर न्याययुक्त ढंग से लड़! सिंह कोई जादू-मंतर तो जानता नहीं। तो तू जादू-मंतर कर रहा है?
दूसरा सिंह लाया गया कि यह सिंह तो दिखता है कुछ गड़बड़ है। वह दूसरा सिंह झपटा। लेकिन किसी के ऊपर भी झपटोगे--फकीर माना कि फकीर था--जब सिंह झपटा तो वह जरा एक तरफ बच गया। सिंह निकल गया तेजी में एक किनारे से। लोगों ने कहा कि बेईमान है, इसको जमीन में गाड़ दो। उसको जमीन में गाड़ दिया गया, सिर्फ गर्दन ऊपर छोड़ी; हाथ-पैर सब गाड़ दिए, सिर्फ गर्दन ऊपर। और फिर से छोड़ा सिंह को। सिंह फिर आया तेजी में और उस फकीर ने फिर गर्दन बचा ली और सिंह फिर निकल गया। लोग एकदम चिल्लाने लगे--लाखों लोग--कि यह आदमी बेईमान है, इसे लड़ने का ढंग नहीं आता, कोई तौरत्तरीका नहीं। अब देख रहे हो उसको गड़ा दिया, उसने तौरत्तरीके की आशा कर रहे हैं। सिर्फ सिर ऊपर छोड़ा है! इसकी गर्दन काटो।
उसकी गर्दन काट दी गई। लाखों लोग देखने इकट्ठे होते थे--ये गर्दन काटी जाएं, सिंह चीर डालें, चीथ डालें लोगों को, खा जाएं कच्चा मांस चबा जाएं। और लोग तालियां पीट रहे हैं!
और अभी भी स्पेन में आदमियों को लड़ाते हैं सांडों से और हजारों-लाखों लोग इकट्ठे होते हैं, दूर-दूर देशों से लोग देखने आते हैं। स्पेन प्रसिद्ध है उसी के लिए।
तुम क्या सोचते हो कि मोहम्मद और जीसस न होते तो आदमी न लड़ता। हां, धर्म के नाम पर न लड़ता, किसी और नाम पर लड़ता। इधर कभी हमारे देश में यह घटना घटी है, इसलिए हमको अनुभव है। सैंतालीस के पहले, आजादी आने के पहले, हिंदू-मुसलमान लड़ते थे। धर्म की वजह से लड़ते थे। तो धर्म झगड़े का कारण था; ऐसा लोग समझते थे। मैं नहीं मानता कि धर्म कोई झगड़े का कारण था। लोग झगड़ना चाहते हैं, धर्म तो खूंटी है। जैसे तुमको कोट टांगना है, खूंटी मिल गई तो खूंटी पर टांग दिया; नहीं मिली तो खीली लगी हुई है तो उस पर टांग दिया; नहीं मिली खीली तो खिड़की पर ही टांग दिया। कहीं न कहीं तो टांगोगे! सवाल कोट टांगने का है, खूंटियों का नहीं है। हिंदू-मुसलमान तो सिर्फ खूंटी थी।
फिर हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंट गया, तो सोचा कि चलो झंझट मिटी, अब कोई झगड़ा नहीं होगा। मेरा ऐसा खयाल नहीं था कि झगड़ा नहीं होगा। अब झगड़े नये नाम से होंगे। अब तुमने देखा, पाकिस्तान दो हिस्सों में टूट गया; दोनों तरफ मुसलमान थे, मगर बंगाली मुसलमान और पंजाबी मुसलमान! अब यहां धर्म का कोई झगड़ा न था। अब एक नया झगड़ा--बंगाली और पंजाबी। सैकड़ों बंगाली काट डाले गए सैकड़ों पंजाबी काट डाले गए। मुसलमान कट कर मर गए। अभी भी पाकिस्तान में एक और विभाजन हो सकता है, क्योंकि सिंधी मुसलमान और पंजाबी मुसलमान अभी उसके बीच कलह चलती है। अभी झगड़े का वहां डर है, किसी भी पाकिस्तान और भी दो टुकड़ों में टूट सकता है।
और हिंदुस्तान की क्या गति है! यहां हिंदू-मुसलमान का झगड़ा क्षीण हुआ, खतम तो नहीं हुआ, क्योंकि सारे मुसलमान पाकिस्तान गए नहीं, बहुत बड़ा हिस्सा रह गया। मगर यहां नये झगड़े शुरू हो गए। हिंदू हिंदुओं को जला रहे हैं। सवर्ण अछूत को जला रहे हैं। अब इन दोनों का धर्म एक है; कोई हिंदू-मुसलमान नहीं हैं ये, दोनों हिंदू हैं। रोज उपद्रव होते हैं। और गुजराती-मराठी में छुरेबाजी हो जाती है कि बंबई गुजरात में रहे कि महाराष्ट्र में। अब क्या मतलब है? बंबई कहीं भी रहे, बंबई जहां है वहीं रहेगी। कोई बंबई चल कर महाराष्ट्र में आएगी, कि गुजरात में जाएगी? मगर छुरेबाजी हो जाएगी। एक जिले पर अटकी है बात कि वह कर्नाटक में जाए कि महाराष्ट्र में रहे; इस पर काफी छुरेबाजी हो चुकी है, दंगे-फसाद हो चुके हैं।
आदमी को लड़ना है, तो बहाने तुम देखते हो! अब हिंदी और गैर-हिंदी का झगड़ा है। उत्तर और दक्षिण का झगड़ा है। हिंदुस्तान कभी भी टूट सकता है उत्तर और दक्षिण में। जैसा पाकिस्तान टूटा, वही गति हिंदुस्तान की हो सकती है। झगड़ना है तो नये-नये रास्ते झगड़े के तुम खोजते चले जाओगे।
इसलिए मैं ऐसा नहीं मानता कि कोई जीसस और कृष्ण की वजह से झगड़े हुए। हां, इतना जरूर मानता हूं, उन्होंने झगड़ों को कम से कम थोड़ा सा शिष्टाचार दिया, झगड़ों को थोड़ी सभ्यता दी, झगड़ों को थोड़ा सिद्धांत दिया। कम से कम झगड़ों को थोड़ा सौंदर्य दिया। झगड़े तो हुए, मगर थोड़ा सौंदर्य दिया। झगड़ों को भी थोड़ी महानता दी। कम से कम झगड़ों को भी ऊंचे मूल्य दिए। कम से कम नीची खूंटियों से हटाया, ऊंची खूंटियां बनाईं। मगर परिणाम जो हुए, वे जीसस और मोहम्मद के कारण नहीं हुए।
मनुष्य में प्रतिभा की कमी है। तो इन प्रतिभाशाली लोगों ने जो दिया, उसको झेलने वाली प्रतिभाएं नहीं थीं। हमें चाहिए अनंत प्रतिभाएं, ताकि जब एक प्रतिभा कुछ दे तो अनंत प्रतिभाएं उसे लेकर अनंत गुना कर दें। और फैलती जाए वह संपदा। तो इस पृथ्वी से झगड़े मिट सकते हैं--धर्म के भी, राजनीति के भी। और ये छोटे-मोटे व्यर्थ के...सब झगड़े व्यर्थ हैं।

आखिरी सवाल: भगवान,
मैं अभी-अभी विश्वविद्यालय से स्नातक हुआ हूं। संसार को बदलने की बड़ी इच्छा है। इस महान कार्य के लिए शहीद भी होना पड़े तो मैं सहर्ष तैयार हूं। मार्ग-दर्शन दीजिए।

राकेश,
एक उम्र में इस तरह के फितूर चढ़ते हैं। जैसे एक उम्र में मुंहासे निकलते हैं न, ऐसे एक उम्र में क्रांति पैदा होती है। और कुछ लोगों को बुढ़ापे तक मुंहासे निकलते हैं, तो कुछ लोग बुढ़ापे तक क्रांतिकारी रहते हैं--जैसे जय प्रकाश नारायण इत्यादि। वे बुढ़ापे तक क्रांतिकारी रहते हैं। जवानी में ऐसा लगता है कि अरे बदल देंगे, सारी दुनिया को बदल देंगे! जैसे बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, ऐसे जवानी क्रांतियों से खेलती है।
अभी-अभी स्नातक हुए हो, जरा ठहरो, इतनी जल्दी संसार को न बदलो। थोड़ा संसार में उतरो। थोड़ा शादी-विवाह रचाओ। थोड़े बाल-बच्चे आने दो। फिर सिर पीटोगे कि यह तो संसार ने मुझी को बदल दिया। और मैं तो संसार बदलने निकला था!
असल में, संसार को बदलने की इच्छा भी अहंकार की एक यात्रा है। क्यों? जब संसार को नहीं बदलना तो तुम क्यों बदलोगे? अगर संसार को बदलना होगा, बदल जाएगा। तुम्हारे लिए रुका है, तुम सोच रहे हो? तुमसे पहले जवान नहीं हुए? तुमसे पहले भी बहुत पागल हो चुके हैं। सदियों से पागल होते रहे हैं। क्यों पीछे पड़े हो संसार के? संसार को नहीं बदलना तो कोई जबर्दस्ती है, कि बदल कर ही रहेंगे, कि तुम मानो या न मानो!
हां, कुछ ऐसे लोग होते हैं। मैं जब यात्राएं करता था तो बहुत मुश्किल में पड़ जाता था। आधी रात ट्रेन में लोग चढ़ जाएं। मैं उनसे कह रहा हूं, भाई मुझे सोना है। वे कह रहे हैं: आप सोएं, मगर हमें आपकी सेवा करनी है। वे पैर दबा रहे हैं। मैं उनसे कहता हूं कि तुम पैर दबाओगे तो मैं सोऊंगा कैसे? वे कहते: वह आप जानो, मगर हम तो सेवा करेंगे! और ऐसा गैर पढ़े-लिखे लोग नहीं, नासमझ लोग ही नहीं, गांव के ग्रामीण नहीं...।
उदयपुर में मैं दोपहर को एक सर्किट हाऊस में सोया। दिन भर का थका हुआ, रात भर यात्रा करके आया। लगा कि कोई खपड़ों पर चढ़ रहा है ऊपर। थोड़ी देर तो मैं टालता रहा कि नींद न टूटे तो अच्छा है। लेकिन फिर ऐसा लगा कि रोशनी भी आनी शुरू हो गई है ऊपर से। तो मैंने आंख खोल कर देखी, तो खपड़ा उठा कर एक सज्जन झांक रहे हैं--जिनको मैं भलीभांति जानता था। वकील थे। पढ़े-लिखे आदमी। हाईकोर्ट के वकील। मैंने पूछा कि महाराज, आप यहां क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा, आपके दर्शन कर रहा हूं। वे संयोजक लोग आपसे मिलने ही नहीं देते। और मुझे तो मिलना है। तो मैं तो दर्शन करूंगा। अब रोके मुझे कौन रोकता है!
मैंने कहा, यह बात जरूर सही है। अब संयोजकों को पता ही नहीं है कि कोई खपड़े पर चढ़ा हुआ है। मगर मुझे सोने दो।
वे बोले कि आप सोओ, मगर मैं तो दर्शन करूंगा। अब कोई छाती पर बैठा हो, गिर पड़े, खपड़ा छूट जाए इसके हाथ से और मैं उसके ठीक नीचे सो रहा हूं, वह कह रहा है: आप तो सोओ, हम दर्शन कर रहे हैं!
ऐसे लोगों से दुनिया भरी है।
तुम क्यों संसार की फिक्र में पड़े हो? पहले अपने को तो बदल लो! अपने को बदल लिया तो बहुत है। और संसार को बदलने का वही एकमात्र रास्ता है: अपने को बदल लो। अपने से शुरू करो बदलाहट। दूसरे को बदलने में न तो तुम सहल हो सकते, क्योंकि दूसरा राजी क्यों होगा तुमसे बदले जाने को? कोई राजी नहीं होता, क्योंकि यह अपमानजनक है कि तुम और किसी को बदलो! तुम हो कौन? बड़े महात्मा! संत पुरुष! बदलने चले आए! जिसको भी बदलोगे, वही डंडा लेकर खड़ा हो जाएगा कि मुझे और तुम बदलोगे, अरे मैं ही तुम्हें बदल दूंगा! देखें कौन किसको बदलता है! पहले हो जाए हाथापाई। जो हार जाए वह बदला जाए और जो जीत जाए वह बदले।
बदलने का मजा क्या है? बदलने का मजा दूसरे को नीचा दिखाना है। यह एक तरकीब है दूसरे को दीन करने की, हीन करने की, कि हम बदलेंगे तुम्हें। तुम अनैतिक हो, हम तुम्हें नैतिक बनाएंगे। तुम चरित्रहीन हो, हम तुम्हें चरित्रवान बनाएंगे। यही तो तुम्हारे महात्मागण कर रहे हैं। यही तो मजा वे ले रहे हैं कि बदलेंगे दुनिया को, धर्म देंगे! जैसे किसी ने ठेका लिया हुआ है किसी और का!
तुम अपने को बदलो राकेश। इतना ही कर पाओ तो बहुत है। और तुम अगर अपने को बदल लो तो शायद कुछ लोग तुमसे पूछने लगें कि कैसे तुमने अपने को बदला! तुम्हारा दीया जले तो शायद कुछ बुझे हुए लोग अपना दीया जलाने तुम्हारे पास आ जाएं। फिर बात और है। कोई मांगे सलाह तुमसे तो दे देना। मगर अभी सलाह भी क्या दोगे? अभी अपने को बदलने की कला भी नहीं सीखे, तुम दूसरों को समझाओगे क्या, बताओगे क्या, कैसे उनको बदलोगे? खुद बुझे दीये हो, किसी का दीया जलाओगे क्या?

बेटा है तू शरीफ का, मत मुस्कुरा के चल,
टांगें हैं तेरी बेंत-सी, इनको टिका के चल।
सड़कों की भीड़-भाड़ में, कोहनी बचा के चल,
कालिज के कार्टून, तू नजरें झुका के चल।
लड़की मिले जो राह में, उसको न छेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

लाला को अपनी ऊंची हवेली से प्यार है,
माली को अपनी शोख चमेली से प्यार है।
कुढ़ता है क्यों, गुरु को जो चेली से प्यार है,
तुझको भी तो बहन की सहेली से प्यार है।
जो तेरे मन में चोर है, उसको खदेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

ओढ़े था तन पे शाल सुदामा, फटा हुआ,
पहले है कोट कल्लू का मामा फटा हुआ।
मत हंस किसी का देख के जामा फटा हुआ।
तेरा भी तो है, देख, पजामा फटा हुआ।
मत दूसरों के सूट की बखिया उधेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

रहता है हर घड़ी जो हसीनों की ताक में,
करता है हायऱ्हाय, जो उनकी फिराक में।
कहता है लड़कियों को जो लैला, मजाक में,
जिसकी वजह से दम है मोहल्ले का नाक में।
अपने तो उस सपूत की चमड़ी उधेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

तुकबंदियों पे, यार, न इतना तू नाज कर,
घर में इकट्ठे आज ही म्यूजिक के साज कर।
बुद्धू पड़ोसियों का न बिलकुल लिहाज कर,
छत पर तमाम रात तू डट के रियाज कर।
तबला बजाए बीबी तो सारंगी छेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

ढल जाए क्या गरज तुझे बीबी के रूप से,
मतलब है सिर्फ तुझको तो बच्चों की ट्रूप से।
कब तक इन्हें रिझाएगा कद्दू के सूप से,
कैसे इन्हें बचाएगा कड़की की धूप से।
मत भूल, है खजूर का बेसाया पेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

बीबी से और तलाक! मत ऐसा गुनाह कर,
फेरे लिए हैं सात, मत इनको तबाह कर।
कम्मो से तू न खेल, न बिम्मो की चाह कर,
धन्नो यही है तेरी, तू इससे निबाह कर।
अनपढ़ समझ के इसको न घर से खदेड़ तू,
तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू।

तुम्हें अभी से परायों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अभी ताजे हो विश्वविद्यालय से। जैसे विश्वविद्यालय से कोई निकलता है, बड़ी-बड़ी आकांक्षाएं-अभीप्साएं लेकर निकलता है--ऐसे ही जैसे मैंने सुना है, एक लोमड़ी सुबह-सुबह उठी, चली। सूरज उग रहा था। उगते सूरज के कारण उसकी बड़ी छाया बनी, दूर तक छाया बनी। उसने सोचा: अरे! फूल कर कुप्पा हो गई कि मैं भी कोई छोटी नहीं हूं, इतनी बड़ी हूं! जिसकी छाया इतनी बड़ी उसका मूल कितना बड़ा न होगा! आज तो मुझे कम से कम नाश्ते के लिए एक ऊंट मिलना ही चाहिए। हाथी नहीं तो ऊंट तो चाहिए ही चाहिए। नहीं तो मेरा पेट कैसे भरेगा!
भटकती रही हाथी-ऊंट की तलाश में। दोपहर हो गई, न कोई ऊंट मिला, न कोई हाथी मिला। भूख भी बहुत लग गई थी, नाश्ता भी नहीं हुआ था। भोजन की तो बात ही दूर थी। झुक कर फिर एक बार देखा छाया को। सूरज ऊपर आ गया था, छाया सिकुड़ कर बिलकुल नीचे हो गई थी। लोमड़ी ने कहा: अरे! अब तो एक चींटी भी मिल जाए तो काम चल जाएगा।
जैसे समझ थोड़ी बढ़ेगी और सूरज जब ऊपर आएगा, तब तुम खयाल कर पाओगे कि जवानी में बड़ी लंबी छाया बनती है और बड़ी आकांक्षाएं उठती हैं, बड़े खयाल उठते हैं--ऐसा करूं, वैसा करूं! अब तुम कह रहे हो कि संसार को बदलने की बड़ी इच्छा है। ऐसी झंझटों में न पड़ो। तुझको परायी क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू!
तुम अपने को बदल लो। समय रहते अपने को बदल लो। अभी यह जो शक्ति बन रही है संसार को बदलने की आकांक्षा, इसको अपने पर लौटा लो।
तुम कहते हो: "इस महान कार्य के लिए शहीद भी होना पड़े तो मैं तैयार हूं, सहर्ष तैयार हूं। मार्गदर्शन दीजिए।'
एक बात तुमसे साफ कह दूं, राकेश, शहीदों वगैरह में मेरी कोई उत्सुकता नहीं है। मैं तो शहीद होने की जो आकांक्षा है, उसको आत्महत्या की ही आकांक्षा कहता हूं। वह तो आत्महत्या करने का ही जरा सुंदर ढंग है--जरा शैली से, जरा होशियारी से। मगर वह आत्महत्या का ही ढंग है। कुछ लोग यूं ही आत्महत्या कर लेते हैं और कुछ लोग जरा तरकीब से करते हैं, आड़ लेकर करते हैं। आड़ लेकर आत्महत्या करने वाले शहीद हो जाते हैं।
लेकिन तुम्हारे मन में शहीद होने की इच्छा क्यों पैदा हो रही है? अभी जीए भी नहीं। अभी जीवन जाना भी नहीं। अभी जीवन से परिचित भी नहीं हुए और मरने की इच्छा! शायद तुमने सुना होगा कि शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, मरने वालों का यही बाकी निशां होगा! अहंकार खुश हो रहा होगा कि अरे मजा आ जाएगा, हजारों के मेले जुड़ेंगे! कहीं जुड़ते करते नहीं हैं। वह भ्रांति में मत पड़ो। कौन पूछता है शहीदों को? भगतसिंह की चिता पर कितने मेले जुड़ रहे हैं? चंद्रशेखर की चिता पर कितने मेले जुड़ रहे हैं? कितने शहीद हुए! अगर सब शहीदों की चिताओं पर मेले जुड़ें तो साल भर मेले ही जुड़ते रहें, फिर और कोई काम ही नहीं हो सकता।
मेले जुड़ते हैं नेताओं के इर्द-गिर्द, कुर्सियों के इर्द-गिर्द। मेले जुड़ते हैं दिल्ली में। कहां तुम शहीद होने के चक्कर में पड़े हो? ऐसी बातें में मत फंस जाना। यही नेतागण लोगों को समझाते रहते हैं। नेतागण लोगों को समझाते हैं: सेवा करो। सेवा करो, मतलब उनकी सेवा करो। स्वयं सेवक बनो। स्वयं सेवक बनो, मतलब नेताजी भाषण करें तो तुम फट्टी इत्यादि बिछाओ और उठाओ। और नेताजी कहते हैं कि शहीद हो जाओ, क्योंकि शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले! अब मरने के बाद तुम तो लौटोगे नहीं, मेला-वेला कुछ जुड़ेगा नहीं, फिर कर भी क्या लोगे? कोई मुकदमा थोड़े ही चलाने आओगे। मगर यह अहंकार मन में पलता है।
मौत की आकांक्षा कोई शुभ आकांक्षा नहीं है, चाहे वह किसी बहाने से हो। ये भ्रांतियां छोड़ो। शहीद वगैरह होना हो तो कहीं और। मैं तो यहां जीना सिखाता हूं। और जो जीना जानता है वही मरना जानता है। जीने की कला और मरने की कला में भेद नहीं है, वे एक ही कला के दो पहलू हैं।

कंधे पर लदे बैताल ने
विक्रमादित्य से कहा--राजन!
मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो
अन्यथा तुम्हारा सर धड़ से अलग हो जाएगा
तुम्हारा अस्तित्व हमेशा के लिए खो जाएगा।
आज मैंने अखबार में पढ़ा
एक महिला, जिसका पति
देवता होकर आदमी की तरह जीया
इसकी अपराध पर
किसी ने उसे सम्मान नहीं दिया,
गले में सदाचार का ताबीज लटकता रहा
इसीलिए मास्टर बनकर दर-ब-दर भटकता रहा,
हर साल करता रहा गायत्री का जाप
हर साल बनता रहा लड़कियों का बाप
इस साल बजरंग का पांव छुआ
तो उसकी पत्नी को पत्थर का टुकड़ा हुआ,
इसका क्या कारण है?

विक्रमादित्य चौंका,
बीड़ी का जोरदार कश लिया
और उसके प्रश्न का उत्तर यों दिया--
सुन बैताल!
उस औरत के पूर्वजन्म का हाल,
वो औरत एक शहीद की मां थी
देश-भक्ति की परंपरा उसके यहां थी
जीवन भर सैनिकों की वर्दियां सीती रही
बेटे को शहीद देखने की कामना में जीती रही;
खून को देती रही पसीने का कर्ज
बढ़ता रहा देश-भक्ति का मर्ज
मेघदूत युद्ध का संदेश लाया
संगीनों ने आषाढ़ गाया
बेटा सरहदों पर सर बो गया
इतिहास की गुमनाम वादियों में हमेशा के लिए खो गया।
मां अपने सौभाग्य पर मुस्कुराती रही
बेटे की तस्वीर को फौजी लिबास पहनाती रही,
रोज पढ़ती रही अखबार
ढूंढती रही बेटे के शहीद होने का समाचार,
नेताओं की आदमकद तस्वीरें हंसती रहीं
इतिहास में शासक को जगह मिलती है
शहीदों को नहीं!

जो इतिहास के पन्ने सीते हैं
वो इतिहास पर नहीं सुई की नोक पर जीते हैं,
भूगोल होता है जिनके रक्त से रंगीन
उनके बच्चों को मयस्सर नहीं
दो गज जमीन,
शहादत कहां तक अपना लहू पीती रही
केवल शहीद को जन्म देने के लिए
जीती रही,
स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया उनका नाम
जो बेचते रहे शहीदों का खून
बढ़ाते रहे चीजों के दाम,
इत्र में नहाते रहे
शहीदों के खून की खुशबू छुपाते रहे,
कुर्सी-पुत्रों ने बड़े कष्ट झेले
शहीदों की लाशें सरहदों पर पड़ी रही नंगी
और इनके बंगलों पर लगे रहे मेले,
वो उधर कफन को तरसते रहे
इन पर गुलाबों के फूल बरसते रहे,
पूरे दो मिनट तक खड़े रहे मौन
पी.ए.से पूछते रहे आखिर मर गया कौन?
पी.ए.बोला--मुझसे पूछते हैं आप
इसी दिन तो मरे थे आपके बाप।
हम तो उन्हीं का मातम मना रहे हैं
लगे हाथ शहीदों को भी निपटा रहे हैं।
आप भी आंसुओं का रिजर्व स्टाक निकालिए
एक शहीद स्मारक की घोषणा कर डालिए
आपकी बिल्डिंग अधूरी पड़ी है
जनता चंदा लेकर खड़ी है
क्या इरादा है आपका
शहीद मरने के बाद भी होता है सवा लाख का,
सिर्फ कहने को समाधि में सोता है
वरना शताब्दियों तक हमारा बोझ ढोता है
आज्ञा दीजिए
किस शहीद को जगाऊं
या अपनी फाइलों से एक नया शहीद बनाऊं?
जिसका बलिदान हमारे लिए चंदा उगाए
और हर चुनाव में स्टेच्यु बनकर खड़ा हो जाए।

तो सुन बैताल!
आगे का हाल
शहीद स्मारक के लिए किए गए चंदे
मगर ये आसमान से उतरे हुए
ईश्वर के बंदे
चंदे की थैलियां भी ले गए
शिलान्यास का खाली पत्थर दे गए
मां जिसे छाती से लगाकर सो गई
खुद शहीद का स्मारक हो गई
ममता ने उसी का बदला लिया है
सीमा पर लड़ने के लिए शहीद नहीं
शिलान्यास का पत्थर दिया है।

छोड़ो पागलपन। शहीद वगैरह होने का कोई न तो कारण है, न कोई जरूरत है। जीओ, जीने की कला सीखो! भरपूर जीओ! ईश्वर को जीओ! प्रेम को जीओ! आनंद को जीओ! ऐसे जीओ कि तुम्हारे जीने की लपट औरों के जीवन में भी रोशनी बन जाए।
मगर संसार को बदलने की आकांक्षा अच्छी आकांक्षा नहीं। इसको मैं दुष्ट आकांक्षा मानता हूं। यह शैतानी आकांक्षा है। हां, संसार बदल जाए तुम्हारे जीने के ढंग से, तुम्हारी हवा में बह जाए, वह बात और है; गौण है। परोक्ष में हो, प्रत्यक्ष नहीं। किसी की न सेवा करनी है, न किसी को बदलना है, न किसी को आचरण देना है। जीना है स्वयं! फिर उस जीने से अगर सुगंध उठे और लोगों के नासापुट उस सुगंध से भर जाएं--शुभ है।

आज इतना ही।