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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--40)

सावधिक संन्यास की धारणा—(प्रवचन—चालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':
से संकलित प्रवचनांश
साधना—शिविर, लोनावाला (महाराष्‍ट्र)
दिनांक 24 दिसम्‍बर 1976

 मेरे मन में इधर बहुत दिन से एक बात निरंत्तर खयाल में आती है और वह यह है कि सारी दुनियां से आनेवाले दिनों में संन्यासी के समाप्त हो जाने की संभावना है। संन्यासी आनेवाले पचास वर्षों के बाद पृथ्वी पर नहीं बच सकेगा, वह संस्था विलीन हो जाएगी। उस संस्था की नीचे की ईंटें तो खिसका दी गयी हैं और अब उसका मकान भी गिर जाएगा। लेकिन संन्यास इतनी बहुमूल्य चीज है कि जिस दिन दुनियां से विलीन हो जाएगा उस दिन दुनियां का बहुत अहित हो जाएगा।

मेरे देखे पुराना संन्यासी तो चला जाना चाहिए पर संन्यास बच जाना चाहिए और इसके लिए सावधिक संन्यास का, पीरियाडिकल रिनन्सिएशन का मेरे मन में खयाल है। ऐसा कोई आदमी नहीं होना चाहिए जो वर्ष में एक महीने के लिए संन्यासी न हो।

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--172

अव्‍यभिचारी भक्‍ति—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—14
सूत्र—

            मां च योऽव्‍यभिचारैण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतींत्‍यैतान्‍ब्रह्मभयाय कल्पते।। 26।।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। 27।।

और जो पुरुष अव्यभिचरीं भक्तिरूप योग के द्वारा मेरे को निरंतर भजता है, वह इन तीनों गुणों को अच्‍छी प्रकार उल्लंघन करके सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।
तथा हे अर्जुन, उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखंड एकरस आनंद का मैं ही आश्रय हूं।

पहले कुछ प्रश्न।

पहला प्रश्न : ऐसा लगता है कि चेतना या बोध का विस्तार समस्त धर्म—साधना का मूल है, तब क्या ज्ञान व भक्ति, योग व तंत्र, कर्म व अकर्म आदि अनेकानेक मार्गों से इसी बुनियादी तत्व की खोज की जाती है? और यदि इसी सुई को खोजना है, तो उसके इर्द—गिर्द सिद्धांतों का इतना भारी जंगल क्यों खड़ा किया जाता है?

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--171

आत्‍म—भाव और समत्‍व—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—14
सूत्र—

समदुःखसुखः स्वस्थ: समलोष्टाश्स्फाञ्जन:
तुल्‍याप्रियाप्रियो धीरस्‍तुल्‍यनिन्‍दात्‍मसंस्‍तुति:।। 24।।
मानापमानयोस्‍तुल्‍यस्‍तुल्‍यो मिप्रारियक्षयो:।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते।। 25।।

और जो निरंतर आत्म— भाव में स्थित हुआ, दुख— सुख को समान सोचने वाला है तथा मिट्टी पत्थर और सुवर्ण में समान भाव वाला और धैर्यवान है; तथा जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है और अपनी निंदा— स्तुति में भी समान भाव वाला है।
तथा जो मान और अपमान में सम है एवं मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है, वह संपूर्ण आरंभों में कर्तापन के अभिमान से रहित हुआ पुरुष गुणातीत कहा जाता है।

मन ही पूजा मन ही धूप--प्रवचन--07

भगती ऐसी सुनहु रे भाई—(प्रवचन—सातवां)

सूत्र:

      भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आई भगति तब गई बड़ाई।।
      कहा भयो नाचे अरू गाए, कहा भयो तप कीन्‍हें।।
      कहा भयो जे चरन पखारे, जौ लौ तत्‍व न चीन्‍हें।।
      कहा भयो जे मूंड मुंडायो, कहा तीर्थ ब्रत कीन्‍हें।।
      स्‍वामी दास भगत अरू सेवक, परमतत्‍व नहीं चीन्‍हें।।
      कहि रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बडे सो पावै।।
      तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक ह्वै चुनि खावै।।
      अब हम खूब वतन घर पाया। ऊँचा खेर सदा मेरे भाया।।
बेगमपुर सहर का नाम। फिकर अंदेस नहीं तेहि ग्राम।।
नहीं जहं सांसत लानत मार। हैफ न खता न तरस जवाल।।
आव न जान रहम औजूद। जहां गनी आप बसै माबूद।।
जोई सैलि करै सोई भावै। महरम महल में को अटकावै।।
कहि रैदास खलास चमारा। जा उस सहर सो मीत हमारा।।

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--170

संन्‍यास गुणातीत है—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—14
सूत्र—

अर्जन उवाच:
कैर्लिङ्गैस्त्रीनुाणानेतानतझीए भवति प्रभो।
किमाचार: कथं चैतांस्प्रीनुाणानतिवर्तते।। 21।।

श्रभिगवानवाच:

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।। 22।।
उदासीनवदासीनो गुणैयों न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्‍येव योऽवतिष्ठीत नेङ्ग्ले।। 23।।

अर्जुन ने पूछा कि हे पुरुषोत्तम, इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरूष किन— किन लक्षणों से युक्त होता है? और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है? तथा हे प्रभो? मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?

मन ही पूजा मन ही धूप--प्रवचन--06

आस्‍तिकता के स्‍वर—(प्रवचन—छठवां)


प्रश्‍न—सार:

      1—ओशो, नास्‍तिक का क्या अर्थ है?

2—ओशो, शास्‍त्र — विदों का कहना है कि स्‍त्री–जाति के लिए वेदपाठ, गायत्री मंत्र श्रवण और ओम शब्‍द का उच्‍चारण वर्जित है। प्रभु, मेरे मुख से अनायास ही ओम का उच्‍चारण हो जाया करता है, खास कर नादब्रह्म ध्‍यान करते समय तो उच्‍चारण करना ही पड़ता है। तो मन में डर सा लगता है कि ऐसा क्‍यों कहा गया है। क्‍या स्‍त्री–जाति को ओम का उच्‍चार नहीं करना चाहिए? कृपा कर समझाने की दया करें।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--39)

संन्यास का एक नया अभियान—(प्रवचन—उन्‍नतालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':
गीता—सत्र से संदर्भ प्रवचनांश
बम्बई प्रथम सप्ताह जनवरी 1971  
एवं ला प्रथम सप्ताह फरवरी 1971

जो भी मैं कह रहा हूं संन्यास के संबंध में ही कह रहा हूं। यह सारी गीता संन्यास का ही विवरण है। और जिस सन्यास की मैं बात कर रहा हूं वह वही संन्यास है जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं—करते
हुए अकर्त्ता हो जाना, करते हुए भी ऐसे हो जाना जैसे मैं करने वाला नहीं हूं। बस संन्यास का यही लक्षण है।
गृहस्थ का क्या लक्षण है? गृहस्थ का लक्षण है, हर चीज में कर्त्ता हो जाना। संन्यासी का लक्षण है, हर चीज में अकर्त्ता हो जाना। संन्यास जीवन को देखने का और ही ढंग है।

गीता दर्शन--(भाग--7) --(प्रवचन--169)

असंग साक्षी—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—14
सूत्र—

नान्यं गुणेभ्‍य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यीत।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्‍छति।। 19।।
गुणानेतानतीत्‍य त्रीन्‍देही देहसमुद्भवान्।
जन्मस्त्युऋजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।। 20।।

और हे अर्जुन, जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात गुण ही गुणों में बर्तते है, ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंदधनस्वरूप मुझ परमात्‍मा को तत्‍व से जानता है, उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
तथा यह पुरूष इन  स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्‍था और सब प्रकार के दुखों से मुक्‍त हुआ परमानंद को प्राप्त होता है।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--38)

आनंद व अहोभाव में डूबा हुआ नव—संन्‍यास—(प्रवचन—अडतीसवां)

नव—संन्‍यास क्‍या? :
चर्चा व प्रश्‍नोत्‍तर
अहमदाबाद, दिनांक 6 दिसम्‍बर 1970

अभी—अभी साधना मंदिर में जो भजन चल रहा था। उसे देखकर मुझे एक बात खयाल में आती है। वहां सब इतना मुर्दा, इतना मरा हुआ था जैसे जीवन कि कोई लहर नहीं है, सब औपचारिक था—करना है, इसलिए कर लिया। तुम्‍हारा भजन, तुम्हारा नृत्य, तुम्‍हारा जीवन भी औपचारिक न हो, फॉरमल न हो। उदासी के लिए तो नव—संन्यास 'में जरा भी जगह न हो। क्‍योंकि संन्यास अगर मरा तो उदास लोगों के हाथ में पड़कर मरा।

'हंसता हुआ संन्यास', पहला सूत्र तुम्हारे खयाल में होना चाहिए। अगर हंस न सको तो समझना कि संन्यासी नहीं हो। पूरी जिंदगी एक हंसी हो जानी चाहिए। संन्यासी ही हंस सकता है। उदासी एवं गंभीरता संन्यासी के लिए एक रोग जैसा है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--168

रूपांतरण का सूत्र: साक्षी—भाव—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—14
सूत्र:  

कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्‍विक निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमस: फलम्।। 16।।
सत्‍वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ श्व च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।। 17।।
ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठीन्त राजसाः।
जधन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्‍छन्ति तामसा:।। 18।।

सात्‍विक कर्म का तो सात्‍विक अर्थात सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है। और राजस कर्म का फल दुख, एवं तामस कर्म का फल स्नान कहा है।
तथा सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्‍न होता है और रजोगुण से निःसंदेह लोभ उत्पन्न होता है, तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्‍न होते हैं और अज्ञान भी होता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मन ही पूजा मन ही धूप--(प्रवचन--05)

गाइ—गाइ अब का कहि गाऊं—(प्रवचन—पाँचवाँ)

सूत्र:

गाइ—गाइ अब का कहि गाऊं।
गावनहर को निकट बताऊं।।
जब लगि है इहि तन की आसा, तब लगि करै पुकारा।।
जब मन मिल्‍यौ आस नहीं तन की, तब को गावनहारा।।
जब लगि नदी न समुंद समावै, तब लगि बढै हंकारा।।
जब मन मिल्‍यौ रामसागर सौ, तब यह मिटी पुकारा।।
जब लगि भगति मुकति की आसा, परमत्‍व सुनि गावै।।
जहं—जहं आस घरत है इहि मन, तहं—तहं कछू न पावै।।
छांडै आस निरास परमपद, तब सुख सति कर होई।।
कहि रैदास जासौ और करत है, परमतत्‍व अब सोई।।

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--37)

संन्‍यास के फूल: संसार की भूमि में—(प्रवचन—सैंतीसवां)   

'नव—संन्यास क्या?':
चर्चा व प्रश्रोत्तर
जबलपुर प्रथम सप्ताह नवम्बर 1970

भगवान श्री आपने कहा है कि बाहर से व्यक्तित्व व चेहरे आरोपित कर लेने में सूक्ष्म चोरी है तथा इससे पाखष्ड और अधर्म का जन्म होता है। लेकिन देखा जा रहा है कि आजकल आपके आसपास अनेक नये—नये संन्यासी इकट्ठे हो रहे हैं और बिना किसी विशेष तैयारी और परिपक्‍कता के आप उनके संन्यास को मान्यता दे रहे हैं। क्या इससे आप धर्म को भारी हानि नहीं पहुंचा रहे हैं? कृपया इसे समझाएं?
पहली बात, अगर कोई व्यक्ति मेरे जैसा होने की कोशिश करे तो मैं उसे रोकूंगा। उसे मैं कहूंगा, कि मेरे जैसा होने की कोशिश आत्मघात है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--167

संबोधि और त्रिगुणात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति—(प्रवचन—पाँचवाँ)

अध्‍याय—14
सूत्र: 

            अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।। 13।।
यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमीवदां लोकानमलान्मीतयद्यते ।। 14।।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्ममङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयीनिषु जायते।। 15।।

है अर्जुन, तमोगुण के बढने पर अंतःकरण और इंद्रियों में अप्रकाश एवं कर्तव्य— क्रमों में अप्रवृति और प्रमाद और निद्रादि अंतःकरण की मोहिनी वृत्तियां, ये सब ही उत्पन्‍न होते हैं।
और हे अर्जुन, जब यह जीवात्मा सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के मलरीहत अर्थात दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। और रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर क्रमों की आसक्‍ति वाले मनुष्यों में उत्पन्‍न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ पुरूष मूढ़ योनियों में उत्पन्‍न होता है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--36)

संन्यास और संसार—(प्रवचन—छत्‍तिसवां)

'नव— संन्यास क्या?':
चर्चा एवं प्रश्रोत्तर 
दिनांक 20 अक्टूबर 1970

संसार को छोड़कर भागने का कोई उपाय ही नहीं है, कारण हम जहां भी जाएंगे वह होगा ही, शक्लें बदल सकती हैं। इस तरह के त्याग को मैं संन्यास नहीं कहता। संन्यास मैं उसे कहूंगा कि हम जहां भी हों वहा होते हुए भी संसार हमारे मन में न हो। अगर तुम परिवार में भी हो तो परिवार तुम्हारे भीतर बहुत प्रवेश नहीं करेगा। परिवार में रहकर भी तुम अकेले हो सकते हो और ठेठ भीड़ में खडे होकर भी अकेले हो सकते हो।
इससे उल्टा भी हो सकता है कि एक आदमी अकेला जंगल में बैठा हो लेकिन मन में पूरी भीड़ घिरी हो और ठेठ बाजार में बैठकर भी एक आदमी अकेला हो सकता है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--166

होश: सत्‍व का द्वार—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—14
सूत्र:

रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत।
रज: सत्वं तमश्चैव तम: सत्व रजस्तथा ।। 10।।
सर्वद्वरेषु देहेऽस्मिप्रकाश उयजाक्ते।
ज्ञानं यदा तदा विद्यद्ववृद्धं सत्‍वमित्‍युत।। 11।।
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा।
रजस्यैतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ।। 12।।

और हे अर्जुन, रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्वगुण होता है अर्थात बढता है तथा रजोगुण और सत्‍वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है; वैसे ही तमोगुण और सत्‍वगुण की दबाकर रजोगुण बढ़ता है।
इसलिए जिस काल में इस देह में तथा अंतःकरण और इंद्रियों में चेतनता और बोध—शक्‍ति उत्पन्‍न होती है, उस कल्प में ऐसा जानना चाहिए कि सत्वगुण बड़ा है। और हे अर्जुन, रजोगुण के बढने पर लोभ और प्रवृत्ति अर्थात सांसारिक चेष्टा तथा सब कार के क्रमों का स्वार्थ— बुद्धि से आरंभ एवं अशांति अर्थात मन की चंचलता और विषय— भोगों की लालसा, ये सब उत्पन्‍न होते है

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--35)

संन्यास : नयी दिशा, नया बोध—(प्रवचन—पैंतीसवां)

'नव—संन्यास क्या?’
से संकलित एक प्रवचन साधना—शिविर मनाली (हिमाचल प्रदेश),
दिनांक 28 सितम्बर 197० रात्रि

 आपको अपने संन्यास का स्मरण रखकर ही जीना है ताकि आप अगर क्रोध भी करेंगे तो न केवल आपको अखरेगा, दूसरा भी आप से कहेगा कि आप कैसे संन्यासी हैं। साथ ही साथ उनका नाम भी बदल दिया जाएगा। ताकि अन्य पुराने नाम से उनकी जो आइडेन्टिटी, उनका जो तादात्थ था वह टूट जाए। अब तक उन्होंने अपने व्यक्तित्व को जिससे बनाया था उसका केन्द्र उनका नाम है। उसके आस—पास उन्होंने एक दुनियां रचायी, उसको बिखेर देना है ताकि उनका पुनर्जन्म हो जाए। इस नये नाम से वे शुरू करेंगे यात्रा और इस नये नाम के आस—पास अब वे संन्यासी की भांति कुछ इकट्ठा करेंगे। अब तक उन्होंने जिस नाम के आस—पास सब इकट्ठा किया था वह गृहस्थ की तरह इकट्ठा किया था।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--165

हे निष्‍पाप अर्जुन—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—14
सूत्र: 

रजो रागत्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्‍न्‍िबघ्‍नति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।। 7।।
तमस्थ्यानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्‍निबध्‍नाति भारत।। 8।।
सत्यं सुखे संजयीत रज: कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्‍य तु तम: प्रमादे संजयन्वत।। 9।।

हे अर्जुन, रागरूय रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्‍न हुआ जान। वह हम जीवात्मा को कर्मों की और उनके फल की आसक्ति से बांधता है।
और हे अर्जुन, सर्व देहाभिमानियों के मोहने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह हस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है।