कुल पेज दृश्य

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

दि तवासिन—(ओशो कि प्रिय पुस्‍तकें)

तवासिन—(कहे मंसूर मस्ताना)
     कभी-कभी इंसान की मौत इतनी जिंदा हो जाती है कि उसकी जिंदगी को भी अपनी रोशनी से पुनरुज्जीवित कर देती है। पर्शियन सूफी औलिया अल-हृल्लास मंसूर का नाम दो चीजों के लिए इन्‍सानियत के ज़ेहन में खुद गया है : एक उसकी रूबाइयात और दूसरा उसकी मौत। ‘’अनलहक़’’ का निडर ऐलान करने वाले कई औलिया होंगे लेकिन इस क्रूफ्र के लिए अपने जिस्‍म की बोटी-बोट कटवाने वाला एक ही था: ‘’मंसूर’’ इस खौफनाक, अमानुष मौत की वजह से उसका प्‍यारा वचन ‘’अनलहक़’’ भी दसों दिशाओं में अब तक गूंज रहा है। आदि शंकराचार्य ने भी ‘’अहं ब्रह्मास्‍मि’’  के महावाक्य का उद्घोष किया था लेकिन सहनशील, उदारमना हिंदू धर्म ने उन्‍हें इतनी कठोर सज़ा नहीं दी।

            मंसूर अल हल्लाज पर्शिया में मुसलमान मां-बाप से पैदा हुआ। वह सन था ईसवी 857। फारसी और तुर्की किताबों में उसका जिक्र पाया जाता है। वह अरेबिक भाषा में लिखता था। हल्लाज का मतलब है, ऊन निकालने वाला। मंसूर के पिता का यह पेशा था, और मंसूर ने भी यही पेशा अपनाया। जन्‍म से सुन्‍नी होने के नाते मंसूर बहुत पाक दिल था। वह रमज़ान में रोज़े रखता था और हज़ की यात्रा में वि पूरा मौन रहता था ताकि उसे अंदर से अल्‍लाह की आवाज़ सुनाई पड़े।
      मंसूर बसरा के शहर में बस गया जहां उसे सूफी चोगा ‘’खिरक़ा’’ मिला। लेकिन वहां से तस्‍तर शहर में आकर वह साधारण जनों और संदेह से भरे पंडितों के बीज अल्‍लाह का पैगाम फैलाना चाहता था। इसलिए उसने सूफी ‘’खिरक़ा’’ उतार फेंक दिया। उसके सुनने वालों में से कुछ बंदे उसके दोस्‍त बने तो कुछ दुश्‍मन।
      मंसूर तस्‍तर, बगदाद और बसरा में घूमता हुआ अपने बगावती ख्‍यालात फैलाता रहा। बगदाद वापिस आने पर उसने एक अजीबो-गरीब रवैया शुरू किया। वह बगदाद की सड़कों पर घूमता रहता और कहता, ‘’मैं हक़ की खातिर कानून के हाथों मरना चाहता हूं।‘’ इस अजीब कथन के लिए एक दफा उसे फतवा भी दिया गया लेकिन दूसरे वकीलों ने बात टाल दी यह कह कर कि ऐसी ऊटपटांग बातें करना औलियाओं का अंदाज होता है। लेकिन एक दिन अल-हल्‍लाज ‘’अनलहक़’’ कहते हुए घूमने लगा। तब वकीलों ने कहा ‘’कुफ्र’’ बगदाद के खलीफा ने हल्‍लाज पर मुकदमा दाया किया। लेकिन वहां के वजीर की मेहरबानी से मंसूर को राजमहल में सिर्फ नजरकैद किया गया। तकरीबन आठ साल और आठ महीनों तक वह महल में कैद रहा। बहरहाल, फिर एक बार दरबार में शिया वकीलों ने मुकदमे को खोला। इस बार मंसूर पर इल्‍जाम था कि वह काबा और मक्‍का का खात्‍मा करने की नसीहत देता है। यह सच है कि मंसूर ने अपने शागिर्द शाकिर को लिखा था: ‘’तुम्‍हारे काबा को खत्‍म कर दो।‘’ जिसका छुपा हुआ मतलब यह था कि ‘’इसलाम के लिए अपनी जिंदगी को कुर्बानी कर दो, जैसे मैंने की है।‘’ लेकिन काज़ी ने इन शब्‍दों को शब्दशः: लिया और मंसूर को 26 मार्च 922 के रोज ‘’मसलूब’’ करने का फत्‍बा दे दिया याने कि बोटी-बोटी काटकर उसे मारा गया।
      सुन्‍नी पंथ के लोग इस घटना को मंसूर की आध्‍यात्‍मिकता की मीराज़ अंतिम शिखर के रूप में देखते है। सूली पर चढ़े हुए मंसूर के मुंह से एक से एक दिव्‍य गीत निकले। मंसूर की शहादत के बाद उसकी शोहरत की खुशबू दूर-दूर तक फैली। सूफियों ने अपनी किताबों में मंसूर की कुर्बानी सूफीवाद की बुलंदी की मानिंद दर्ज की है।
      फिर भी सूफी विद्वान यह भी मानते है कि अपनी अंतिम अवस्‍था ‘’बका’’ को मंसूर छुपा नहीं सका। वह पूरी दीवानगी और जुनून के साथ खुदा के साथ अपनी तौहीद (तल्‍लीनता) को गाता रहा। अन्‍य पहुंचे हुए सूफी पीर—मसलन उसका अपना गुरु जुन्‍नैद अपनी मस्‍ती को दिल में छुपा कर अपनी रोशनी बांटने में सफल रहा। सूफी फकीर अपनी साधना के दौरान मन की एक से एक उच्‍चतर अवस्‍थाओं से गुजरते है जिन्‍हें ‘’औल’’ कहते है। लेकिन अपनी मस्‍ती को दुनिया की नापाक निगाहों से छिपाकर वे ‘’मजदूब’’ (मस्‍त फकीर) बाहर से साधारण होने का स्‍वांग रचते है ताकि वे सूफी गुरूओं के वचन एक खास माहौल में, एक खास मनोदशा में पढ़े जाते है। तो ही उनका सही आशय समझ में आता है। मंसूर के वचन भी इसी जात के है। ये वचन जिस किताब में इकट्ठे किये गये है उसे ‘’तवासिन’’ कहते है क्‍योंकि वे खुदा के साथ उसके मिलन की मदहोशी के, तौहीद, के अनुभव का प्रति फलन है। इस करके उन्‍हें सुनकर हैरत होती है। यह हैरत भी पढ़ने वाले को उस पार की झलक दे सकती है। ये वचन मूल फारसी में दर्ज है। उनके अंग्रेजी अनुवाद का हिंदी अनुवाद प्रस्‍तुत है।
      है तो यह शोरबे के शोरबे का शोरबा, लेकिन यह भी कम ज़ायकेदार नहीं है।
किताब की झलक: ‘’तवासिन’’
      1-परवाना सारी रात शमा के इर्दगिर्द घूमता रहता है। फिर वह सुबह अपने साथियों के पास अपनी रूहानी दशा बड़ी लफ्फाजी के साथ उन पर प्रगट करता है। उसके बाद, पूरे मिलन की चाह में वह शमा की लहराती हुई लपट में खो जाता है।
      2-शमा की रोशनी सच का इलहाम है। उसकी गर्मी सच की हकीकत है। और उसे साथ मिलन सचाई का सच है।
      3-वह उसकी रोशनी से खुश नहीं था, और न ही उसकी गर्मी से इसलिए वह उसमे पूरी तरह कूद पडा। इधर उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे कि वह लौटकर आयेगा और अपनी सीधा तजुर्बा उन्‍हें बातयेगा। क्‍योंकि वह सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने वालों में से नहीं था। लेकिन उस पल वह पूरी तरह झुलस रहा था। टुकड़-टुकड़े हो रहा था। और वह किसी भी शकल, सूरत या जिस्‍म में नहीं था। फिर वह अपने साथियों के पास किस कदर जाये। किस रूप में जाये?   जिसे खुद की नजर मिल गई वह अफ़वाहों पर ध्‍यान क्‍यों देगा? जिसे अपनी नजर की चीज का दीदा हुआ वह नजर की भी फिक्र क्‍यों करेगा?  
      4-ये अर्थ उस आदमी के मतलब के नहीं है जो असावधान है, चंचल है, गलत काम करता है, या सनकी है।
      5-तुम, जो डांवाडोल हो, ‘’मैं हूं’’ के ‘’मैं’’ को खुदा का ‘’मैं’’ मत समझ लेना—न अभी, न फिर कभी, न पहले कभी। अगरचे, ‘’मैं’ एक पका हुआ इल्‍मदां होता, या यह मेरा ‘’औल’’ होता, तब भी मेरे देखे ये आखिरी हद नहीं थी। माना कि मैं उसका हूं, लेकिन ये ‘’मैं’’ वह ‘’मैं’’ नहीं है।
      6-अगर तुमने इतना समझ लिया है तो फिर यह भी समझ लो कि ये मतलब मुहम्‍मद के अलावा और किसी के लिए सच नहीं है। और मुहम्‍मद तुममें से किसी भी आदमी के वालिद नहीं है, बल्‍कि अल्‍लाह के पैगंबर है। और मसीहों की मुहर है। उन्‍होंने खुद को इंसानों और जिन से जुदा कर लिया है। उन्‍होंने ‘’कहां?’’ के लिए अपनी आंखे बंद कर लीं, और तब, उनके दिल पर न कोई पर्दा बचा, न कोई झूठ।
ओशो का नज़रिया:
      एक बहुत खूबसूरत आदमी को मैंने देखा। मैंने उसका जि़क्र किया है लेकिन इन पचास किताबों की सूची में उसका नाम नहीं लिया। वह आदमी है, अल हल्लाज मंसूर। अल हल्लाज ने किताबें नहीं लिखीं लेकिन उसके कुछ वचन उपलब्‍ध है—या कहें उद्घोष। अल हल्लाज जैसे लोग सिर्फ उदधोष करते है। अहंकार से नहीं: उनका तो अहंकार होता ही नहीं। इसलिए वह कहता है : ‘’अनलहक़’’
      ‘’अनलहक़’’ उसका उदधोष है, और उसका मतलब है, ‘’मैं अल्‍लाह हूं’’ और दूसरा कोई खुदा नहीं है।    मुसलमान उसे माफ़ नहीं कर सके। उन्‍होंने उसे मार डाला। लेकिन क्‍या तुम अल हल्लाज को मार सकते हो? असंभव, जब वे उसे मार रहे थे तब भी वह हंस रहा था।
      लोगों ने पूछा: ‘’तुम सिर्फ हंस रहे हो?’’ वह बोला: ‘’ क्‍योंकि तुम मुझे नहीं मार रहे हो। तुम सिर्फ शरीर को नष्‍ट कर रहे हो। और मैंने बार-बार कहा है कि मैं शरीर नहीं हूं, मैं खुदा हूं।‘’
      अब ये लोग पृथ्‍वी के नमक है। अल हल्लाज मंसूर ने कोई किताब नहीं लिखी, लेकिन उसके कुछ वचनों को उसके दोस्‍तों और प्रेमियों ने इकट्ठा कर लिया है। मैं उन्‍हें शिष्‍य भी नहीं कहूंगा। क्‍योंकि मंसूर जैसे लोग शिष्‍यों को, नकलचियों को स्‍वीकार नहीं करते।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड