कुल पेज दृश्य

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

दि फीनिक्स—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

दि फीनिक्स—डी. एच. लॉरेन्स
      लॉरेन्स इंग्‍लैण्‍ड में 1885 में पैदा हुआ। दुर्भाग्‍य से इस प्रतिभाशाली लेखक को बड़ी छोटी सी जिंदगी मिली। केवल पैंतालीस वर्ष—लेकिन उम्र के इस छोटे से सफर में उसकी सर्जनशीलता जलप्रपात की तरह धुंआधार बहती रही। उसने चालीस से अधिक किताबें लिखी। वह पूर्णतया नैसर्गिक जीवन के हक में था। कारख़ानों और मशीनों के आक्रमण से विकृत हुई इंग्‍लैण्‍ड की संस्‍कृति से वह बेहद दुःखी था। वह स्‍वस्‍थ जीवन, प्रेम और मानवीयता का आलम चाहता था। उसका लेखन अत्‍यंत संवेदनशील, सौंदर्य पूर्ण और नजाकत से भरा हुआ था। सेक्‍स और प्रेम के विषय में उसकी कोई कुंठाएं नहीं थी।
वह स्‍त्री-पुरूष प्रेम संबंध पर बेझिझक और बेबाक लिखता था। इसीलिए संभ्रांत समाज उससे डरता था। 1930 में फ्रांस के एक रुग्णालय में उसकी बीमार हालत में मृत्‍यु हुई। उसकी असमय मृत्‍यु के जिम्‍मेदार कौन थे? उसकी अविश्‍वसनीय गरीबी, उसकी देह और जर्जर बनाने वाला टी. बी. या वे सारे प्रकाशक जो उसकी सत्‍यवादिता से भयभीत थे?
      लॉरेन्‍स का मस्‍तिष्‍क एक बेहद उर्वरा भूमि था। वह जो भी अनुभव करता था वह बीज बनकर उसकी मनो भूमि में पडा रहता था। और ऋतु आने पर अंकुरित हो कर फूल बन कर कागज पर उतर जाता था। यों भी लॉरेन्‍स कहता था कि स्‍मृतियां फूल के मानिंद है। कोई भी अनुभव जब स्‍मृति बनता है तो मन ही मन महकता रहता है।
      उपन्‍यासों के अलावा लॉरेन्‍स ने सैकड़ों लेख लिखे जिनमें से कुछ पत्रिकाओं में छपे और कुछ उसके मित्रों के पास, कुछ निजी संग्रह में बिखरे पड़े थे। उन सबको संकलित कर एडवर्ड मैक डॉनल्ड ने संपादित किये और इस किताब के रूप में 1936 में प्रकाशित किये। इस किताब का नाम फीनिक्‍स बड़ा सटीक है। ग्रीक मिथक में फीनिक्‍स नाम का पक्षी वर्णित है, जो जलकर मरता है। और फिर अपनी ही राख से पुन: नया शरीर धारण कर लेता है।
      इस किताब के द्वारा डी. एच. लॉरेन्‍स भी अपनी ही राख से फिर एक बार उठा है ओर उड़ने के लिए पंख फड़फड़ा रहा है।
      लॉरेन्‍स के शब्‍द अर्थ वाही और लेखन शैली रमणीय पर्वत शिखरों और सघन वृक्षों के बीच कलकल करती हुई नदी जैसी है—प्रसन्‍न, शीतल, ह्रदयस्‍पर्शी। उसकी संवेदना असाधारण रूप से पैनी और सूक्ष्‍म थी। पांचों इंद्रियों का उपयोग और उपभोग वह इस समग्रता से करता था कि उसकी अभिव्यक्ति पढ़कर लगता है उसकी इंद्रियों में कुछ अतिरिक्‍त शक्‍ति बसी हुई थी। सौंदर्य को पीने और पिलाने की लॉरेन्‍स की क्षमता अद्भुत थी।
      किसी भी अनुभूति के लिए सही शब्‍द ढूंढ़ना उसके लिए इतना ही सरल था जैसे फूलों से लदे वृक्ष से फूल तोड़ना। वह नफासत लॉरेन्‍स को जन्‍म से भेंट मिली थी। उसकी प्रशंसा में, विख्‍यात अमरीकी लेखक अल्‍डुअस हक्‍सले लॉरेन्‍स के इस गुण की, ‘’Superior otherness कहता था। भावना की हर छोटी मोटी तरंग को पकड़कर उसे व्‍यक्‍त करना लॉरेन्‍स की खूबी थी।
      ‘’दि फीनिक्‍स’’ इन अर्थों में अनूठी है कि इसमे भिन्‍न-भिन्‍न विषयों पर लिखें गये लॉरेन्‍स के लेख एक ही किताब में मिल जाते है। विषयों के अनुसार ये लेख मैकडानल्‍ड ने सात हिस्‍सों में बांटे है।
1—प्राकृतिक और काव्‍यात्‍म लेखन
2—लोग, देश और जातियां
3—प्रेम, सेक्‍स, पुरूष और स्‍त्रियां
4—साहित्‍य और कला
5—शिक्षा
6—नीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान, दर्शन
7—व्‍यक्‍तित्‍व और अन्‍य लेख
      सन 1919 के दौरान हताश लॉरेन्‍स इंग्‍लैण्‍ड छोड़कर इटली जा बसा। वह जान गया कि उसकी जन्‍म भूमि में उसकी कद्र होने वाली नहीं है। इसके बाद उसका विश्‍व भ्रमण शुरू हुआ। पूरे योरोप की यात्रा करने के बाद वह अमेरिका और न्‍यू मेक्‍सिको गया। ये यात्राएं उसके अनुभव जगत को समृद्ध कर रही थी।
      लेकिन स्‍वास्‍थ के लिए ठीक नहीं थी। उसकी यात्राओं का विश्‍लेषण हक्‍सले ने इस प्रकार किया है: ‘’मुझे लगता है। लॉरेन्‍स की अंतहीन यात्राएं इसलिए  हो रही थी। क्‍योंकि वह अपने परिवेश से, जीवन से कट गया था। उसकी यात्राएं पलायन और खोज दोनों ही थी। खोज उस समाज की जिसके साथ वह कोई रिश्‍ता बना सकें; और उस जगत की जिसमे ज्ञान ने जीवन को भ्रष्‍ट नहीं किया था। पलायन उसे समाज की पीड़ाओं और अशुभ से जिसमें वह जन्‍मा था। और एक कलाकार के जन्‍मजात अलगाव के बावजूद वह इस सबके लिए गहरे में खूद को जिम्‍मेदार मानता था।‘’
      ने केवल हक्‍सले बल्‍कि लॉरेन्‍स के सभी समीक्षक यही मानते थे। कि इंग्‍लैण्‍ड छोड़कर उसके विपदाओं को ही न्‍योता दिया। लॉरेन्‍स क्‍या खोज रहा था, और अंतत: वह उसे मिला कि नहीं यह तो वह खुद ही जानता है, लेकिन उसके रंगबिरंगे अनुभवों से मनुष्‍य जाति को जो मिला है वह अकूत है। वरना इतने मौलिक विचार इतनी सुगंधित भाषा में हमें कहां से मिलते? यहां लॉरेन्‍स के सभी लेखों की झलक देना नामुमकिन है, फिर भी कुछ लेखों के अंश पेश है—ज़ायक़े की खातिर।
फूलों भरा टस्‍कनी
(टस्‍कनी इटली का एक प्रांत है जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है)
      टस्‍कनी विशेष रूप से फूलों भरा है। क्‍योंकि वह सिसिली से अधिक भीगा हुआ और रोमन पहाड़ियों से अधिक आत्‍मीय है। टस्‍कनी इस कदर दूर बना रह सका। वह अपनी कई आस्‍तीनों के बीच मुस्‍कराता रहता है। इतनी सारी पहाड़ियां सर उठाती रहती है लेकिन वे एक-दूसरे की और ध्‍यान नहीं देती। यहां इतनी सारी गहरी घाटियाँ है ओर उन पर इठलाते हुए झरने जो अपनी ही मस्‍ती में बहे हुए जाते है। बिना नदी और समुंदर की फ्रिक किये बगैर। यहां हजारों-लाखों कंदराएं है। जबकि इन हजारों सालों से इस जमीन पर खेती की जा रही है। झरने छुपी हुई खाई खड्डों पर और उन्‍मत्‍त चट्टानों पर नाचते, दौड़ते जाते है। और कांटों की झाड़ियों के बीच से बुदबुदाते हुए गुजरते है। वहां पर सभी नाइटिंगेल पक्षी एक साथ बेझिझक, बेखटके गाते है।
      आश्‍चर्य है कि टस्‍कनी जैसा कृषि प्रधान देश, जहां पर पाँच एकड़ जमीन पर होने वाली आधी पैदाइश आदमी के दस पेट भरता है। जंगली फूलों और नाइटिंगेल को भी जगह देता है। जब नन्‍हीं-नन्‍हीं पहाडियाँ सीना तान कर खड़ी होती है। अपने पड़ोसियों से आजाद, तो इंसान को उसका बग़ीचा, बेलों की क्‍यारियां बनाकर उस परिवेश को तराशना पड़ता है। बैबिलोन झूलते हुए बग़ीचों के लिए मशहूर था। लेकिन पूरा इटली एक झूलता हुआ बग़ीचा है। इटली की हजारों वर्ग मील जमीन मानव के हाथों द्वारा ऊपर उठाई गई है। उसके ढेर बनाकर फिर उसे सपाट बनाया गया है। यह अनेक-अनेक सदियों का काम है। पूरी भूमि को संवेदनशीलता से, नजाकत से शिल्‍पित किया गया है। और यह इटालियन सौंदर्य की उपलब्‍धि है जो कि परम नैसर्गिक है। यहां मनुष्‍य ने धरती की सुफलता की कद्र करते हुए मृदुता से जमीन को अपनी जरूरतों के अनुकूल ढाला है। लेकिन उसका निरादर नहीं क्या।
      इसका मतलब है ऐसा किया जा सकता है। मनुष्‍य धरती पर, धरती के ज़रिये, उसे बदसूरत किये बगैर रह सकता है।

लोगों की शिक्षा
      शिक्षा किसी चिड़िया का नाम है? उसका परिणाम क्‍या है? क्‍या कोई जानता है? अमीर लोगों के लिए इससे खास फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए सामाजिक संबंध अपने आप में पर्याप्‍त है। एक मधुर क्रीड़ा, जिसके लिए उन्‍हें कुछ उपलब्‍धियां, कुछ शिष्‍टाचार, थोड़ा बहुत सामाजिक अदब कायदा जानना काफी है। मान लें कि वे जीवन को गंभीरता से लेते है, तो अधिक से अधिक वे राष्‍ट्र की सेवा में जीवन बिताना चाहते है।
      और राष्‍ट्र क्‍या है? बहुत आदर्शवादी परिभाषा न करें तो राष्‍ट्र याने जनता। और जनता कौन? निश्‍चित ही मजदूर और कौन? आज के लोकतांत्रिक आदर्शों के मुताबिक उच्‍चवर्णीय लोग जनकल्‍याण करने में जीवन बिताते है। ऐसा कोई आदर्शवादी नहीं होगा जो हमारे पोप की तरह हाथ में एक तौलिया और पानी की बालटी लेकर गरीबों के पैर धोने की नहीं सोच रहा होगा।
      जब हम लोगों को शिक्षित करने के बारे में सोचते है तो पहले जान लें कि ये लोग कौन है? ये लोग, सर्वहारा मजदूर, हमारे कारख़ानों और उद्योगों के पुर्ज़े है। पोप इनके पैर इसलिए नहीं धो रहे है कि वे पैर बोरिया ढोते हुए धूल से गंदे हो गए है। वह इसलिए पैर धो रहा है ताकि अदने से अदने आदमी के भीतर की दिव्‍यता का स्‍मरण हो। वह मजदूर यूनियन को नेताओं के पेर नहीं धोएगा....।
      तो जनता को शिक्षित करने का पहला कदम है: अपनी रोजी-रोटी न कमा सकने के भय से उन्‍हें मुक्‍त करना। यह आसान नहीं होगा। इस भयभीत युग में यक भय बहुत गहरे पैठ गया है। पुरूष युद्ध की सारी यातनाऔ से गुजरेंगे और उसके बाद अपनी रोजी रोटी ने कमा पाने के डर से आविष्‍ट रहेंगे। न जाने कैसा रहस्‍य है। वे बंदूकें और बम आराम से झेल सकते है। लेकिन अपनी रोजी न काम पाने को नहीं झेल सकते। आखिर वह मौत है, कोई जिंदगी नहीं। जिंदगी से डरना चाहिए। पूरी मनुष्‍य जाति की इस समस्या को सुलझाने के लिए उसे भीतर से इस भय से मुक्‍त करना जरूरी है। और हमारी नई शिक्षा का यह फर्ज है। अभी तो ऊपर से नीचे तक सभी इस भय से ग्रसित है।
      ...हर शिक्षक जानता है कि पचास प्रतिशत विद्यार्थी ऐसे है जिन्‍हें शिक्षित करना बेकार है। बेकार ही नहीं खतरनाक है। उसका नतीजा क्‍या होता है? ऐसे लड़के को शिक्षा की समूची प्रक्रिया से गूजरें जिसमें सीखने समझने की क्षमता ही न हो, तो अंतत: आप उससे क्‍या पैदा करते है? शिक्षा ( और सारे शिक्षित लोगों) के प्रति गहरा तिरस्‍कार। उसके लिए वह खीज और नफ़रत के आलावा कुछ नहीं है। और पूरे देश को हम इस स्‍थिति में ला रहे है। हर कोई शिक्षित है, और शिक्षा क्‍या है? अमानवीयता। जनता के ह्रदय और उपहास में गहरे झांक कर देखें, वहां आप एक व्‍यंग और उपहास से भरी राय पायेंगे। कि हर शिक्षित आदमी अमानवीय  होता है बनिस्‍बत अशिक्षित आदमी है।

हमें एक दूसरें की जरूरत है:
      हमें स्‍वीकारना पड़ेगा कि स्‍त्री और पुरूष को एक दूसरे की जरूरत है। हम अपने पौरुष पर कितना ही गर्व करें, विद्रोह करें और उदास हों, लेकिन हमें गरिमा के साथ समर्पण करना चाहिए। हम सब व्‍यक्‍ति वादी है, अहंकारी है। हम तीव्रता से स्‍वतंत्रता चाहते है—स्‍वयं की तो निश्‍चित ही। हम सभी आत्‍म निर्भर होना चाहते है। इसलिए हमारे आत्‍म सम्‍मान पर यह गहरी चोट है कि हमें दूसरे व्‍यक्‍ति की जरूरत पड़ती है। मौज-मस्‍ती  में स्‍त्री या पुरूष के साथ खिलवाड़ करने में हमें कोई एतराज नहीं होता, लेकिन जब नग्‍न सत्‍य स्‍वीकार करने की नौबत आती है, ‘’हे भगवान, मैं मेरी उस कर्कश स्‍त्री के बिना नहीं रह सकता।‘’ वब हमारे सुगठित एकाकी अहम् को बड़ी चोट लगती है।
      और जब मैं कहता हूं, मेरी उस स्‍त्री के बिना तो मेरा मतलब रखैल से नहीं है, मैं फ्रैंच लोगों की तरह कामुक अर्थ में नहीं कह रहा हूं। मेरा मतलब है स्‍त्री—स्‍त्री मात्र से मेरा रिश्‍ता। ऐसा शायद ही कोई पुरूष होगा जो किसी खास स्‍त्री के साथ रिश्‍ता बनाये बगैर खुशी से जी सकता है, अगर वह किसी पुरूष को ही स्‍त्री की भूमिका निभाने को नहीं कहता। और यही बात स्‍त्री पर भी लागू होती है।
      तो बात ऐसी है। और तीन हजार साल तक स्‍त्री और पुरूष इस हकीकत के खिलाफ लड़ रहे थे।
      ...जब तुम पुरूष को सबसे तोड़कर उसे अपनी ही विशुद्ध निजता में अकेला छोड़ देते हो तब मनुष्‍य बचता ही नहीं; तब तुम्‍हें उसका एक रूखा सा आखिरी टुकडा, मिलता है। नेपोलियन को अलग कर दो, और वह कुछ भी नहीं है। मैन्युअल कांट को अलग कर दो, और उसकी बुलंद धारणाएं तब भी उसके मस्‍तिष्‍क में टिक-टॉक, टिक-टॉक करती रहेंगी। जब तक वह उन्‍हें लिखकर दूसरों के साथ बाँटता नहीं तब तक वे उसकी घड़ी में मुर्दा पड़ी रहेंगी। या बुद्ध को ही लें—अगर उसे कहीं दूर ले जाकर किसी बोधि वृक्ष के नीचे पद्मासन में बिठाया जाता, और उसे न कोई देखता, न उसके निर्वाण के प्रवचनों को सुनता, तो वह एक अजीब शख्‍स बना रहता।
      ...तो सब कुछ, निजता भी, संबंध पर निर्भर करती है। स्‍त्री-पुरूष के साथ भी ऐसा ही है। एक-दूसरे के साथ के रिश्‍ते में ही उनकी सही निजता, और उनका स्‍पष्‍ट अंतरतम है—संबंध में, संबंध के बगैर नहीं। चाहें तो इसे ही सेक्‍स कहें। लेकिन यह उतना ही सेक्‍स है जितनी की घास पर चमकती हुई धूप। यह एक जीवंत संपर्क है, लेन-देन; स्‍त्रियों और पुरूषों के बीच का और एक स्‍त्री और एक पुरूष के बीच की संबंध। इसमें, और इससे एक पुरूष के बीच का संबंध। इसमें और इससे, हम वास्‍तविक व्‍यक्‍ति बनते है। उसके बगैर, वास्‍तविक संपर्क के बगैर, वास्‍तविक संपर्क के बगैर हम ना कुछ हो जाते है।
      निश्‍चित ही इस संपर्क को जीवंत और बेहतर बनाना जरूरी है। यह ऐसी बात नहीं है। कि स्‍त्री से विवाह कर लो और बात खतम हो गई। वह तो संपर्क से बचने का, उसे मार डालने का नुस्‍खा है। वास्‍तविक संपर्क से बचने के कई लोकप्रिय तरीके है। जैसे स्‍त्री को सिंहासन पर बिठा दो, या उससे उल्‍टा, उसकी पूरी तरह उपेक्षा करो। या उसे आदर्श गृहिणी, आदर्श माता या सहयोगी बना दो। सारे उससे संपर्क बनाने से बचने के तरीके। स्‍त्री कोई ‘’आदर्श’’ चीज नहीं है। वह एक स्‍पष्‍ट सुनिश्‍चित व्‍यक्‍तित्‍व भी नहीं है।
      स्‍त्री एक जीवंत फव्‍वारा है जिसकी फुहार उस पर पड़ती है जो भी उसके करीब आता है। स्‍त्री, हवा में उठने वाली एक अनोखी कोमल तरंग है अज्ञात, अंजान बहती हुई। यह फिर स्‍त्री एक कर्कश, दुखद, बेसुरी तरंग है जो बहते-बहते उसके पास आनेवाले हर किसी को चोट पहुँचती है। पुरूष जीता है, काम करता है तब वह जीवन का फव्‍वारा होता है; उसमें एक थिरकन है जो किसी की और बहती है। ऐसा कुछ जो अपना प्रवाह प्रतिसंवेदित करेगा। ताकि एक सर्किट पूरा हो और एक तरह की शांति छायी रहे। अन्‍यथा वह झुंझलाहट, बेसुरापन और पीड़ा का स्‍त्रोत बनता है और अपने आसपास के हर व्‍यक्‍ति को चोट पहुँचाता है।
सम्‍यक अध्‍ययन:
      अगर कोई भी आदमी सदा नहीं रहता, तो कोई सिद्धांत भी सदा नहीं रहता। और जिस तरह थकी हुई नदी समुंदर में सुरक्षित विलीन हो जाती है उसी तरह थका हुआ ज्ञान भी। और वहां जाकर वह खो जाता है।
      ज्ञान का झरना भी अब बहुत थक गया है। वह प्रसन्‍न धार की भांति चला था और अब इस कदर कीचड़ भरी सूखी रेखा बन गया है। उसे हजम करने के लिए समूचा सागर चाहिए।
      ‘’स्‍वयं को जानों’’—ठीक है, पूरी कोशिश करूंगा। ईमानदारी से, स्‍वयं को जानने की कोशिश करूंगा। चूंकि लंबे समय से वह चेतना का आदर्श का आदर्श रहा है, मर्दों की तरह हमें उसका पालन करना चाहिए।
      ‘’स्‍वयं को जानो’’—मतलब है, स्‍वयं के अंजान हिस्सों को जानो। जिसे जानते ही हो उसे जानना ठीक नहीं है न, हम दो एक उपन्‍यास लिखते है और हमें कामुक या मुर्ख या उबाऊ कहा जाता है। क्‍या फर्क पड़ता है? हम अपने रास्‍ते जा ही रहे है।
      ...हर प्रकार के ज्ञान के बारे में यही सच है। तुम पानी की एक बूंद की रासायनिक बनावट जानना शुरू करते हो, और इससे पहले कि तुम्‍हें पता चले कि तुम कहां हो, तुम्‍हारे ज्ञान की नदी असंतुष्‍ट रूप से किसी अदृश्‍य सागर में खो जाती है। जिसे ईथर कहते है, तुम विद्युत को जानना शुरू करते हो और तुम उस बला को किसी सूत्र में बिठाते हो और कोई ऊर्जा स्‍त्रोत खड़ा हो कर तुम्‍हारे मुंह पर थप्‍पड़ मारता है। और तुम्‍हारे हाथ में विद्युत नाम का मुर्दा शब्‍द रह जाता है।
      अब सभी विज्ञान हर्षोल्‍लास के साथ ‘’मैं नहीं जानता’’ के द्वीप से शुरू होता है। वह खुशी से कहता है, मैं नहीं जानता लेकिन मैं जान जाऊँगा। ठीक ऐसे ही जैसे छोटी सी नदिया यह ठान कर उछलती-कूदती है कि पूरे विश्‍व को अपनी लहरों में समा लुंगी। विज्ञान इस छोटी नदिया जैसा, हैरान होकर अंतत: ‘’मैं नहीं जानता’’ के समुंदर में खो जाता है।
ओशो का नज़रिया:
      ‘’फीनिक्‍स....अदभुत किताब है यह; ऐसी जो कभी-कभार लिखी जाती है। कई दशकों में या सदियों में भी। डी. एच. लॉरेन्‍स सचमुच क्रांतिकारी था, विद्रोही था। वह फ्रायड से ज्‍यादा क्रांतिकारी था। सिगमंड फ्रायड तो मध्‍यवर्गीय था। ‘’मध्‍यवर्गीय’’ कहकर मैंने वह सब कुछ कह दिया जो सामान्‍य है। मध्‍यवर्गीय याने मध्‍य में। सिगमंड फ्रायड सही अर्थों में विद्रोही नहीं है; लॉरेन्‍स  है।‘’
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड