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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

दि डेस्‍टिनी ऑफ दि माइंड—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

—विलियम हास
      बीसवीं सदी के प्रारंभ में अनेक जर्मन तथा यूरोपियन विद्वान पूरब की प्रज्ञा की और आकर्षित हुए। यूरोप में बुद्धिवाद का उत्कर्ष चरम शिखर पर था लेकिन यह बुद्धिवाद तर्क पर आधारित था। वह बुद्धि की संतुष्‍टि तो कर सकता था लेकिन ह्रदय की प्‍यास बुझाने में असमर्थ था। इसीलिए विशेष रूप से जर्मन विद्घान भारत की वैदिक प्रज्ञा को समझने के लिए उत्‍सुक हुए।

      विलियम हास भी उनमें से एक था।
      जर्मनी के एक छोटे से शहर में पला, बड़ा हुआ हास भारतीय आध्‍यात्‍मिक ग्रंथों का थोड़ा-बहुत अध्‍यन कर रहा था। एक दिन अपने गांव के रमणीय निसर्ग के सान्‍निध्‍य में बने हुए मकान की छत पर बैठा हुआ हास एक भारतीय अतिथि के साथ दार्शनिक चर्चा कर रहा था। विषय था, तर्क पर खड़ी हुई बौद्धिक समझ की सीमाएं। अचानक उस भारतीय व्‍यक्‍ति ने सामने खिले हुए फूलों की और इशारा कर पूछा, ‘’इन फूलों को आप किस पृष्‍ठभूमि से देखते है?’’
      उन पौधों की पृष्‍ठभूमि में, हास न कहां।
      और उन पौधों को किस पृष्‍ठ भूमि में देखते है?
      उन वृक्ष की पृष्‍ठभूमि में।
      इस तरह पीछे हटते-हटते बादलों तक पहुंचे।
      और उन बादलों की पृष्‍ठभूमि क्‍या है?
      ‘’आकाश’’
      और आकाश की....... ?’’
अब हास निरूतर हुआ। लेकिन भारतीय व्‍यक्‍ति के पास इसका उत्‍तर था। उसने कहा, यह आकाश चेतना की पृष्‍ठभूमि में स्‍थित है।
      हास ने मन में बिजली सी कौंध गई, और इसी क्षण इस किताब का बीज बोया गया। पश्‍चिम और पूरब की मनीषा का फर्क साफ हो गया। और जर्मन प्राध्‍यापक विलियम हास ने अपनी जिंदगी पूरब की मनीषा का फर्क साफ हो गया। और जर्मन प्राध्‍यापक विलियम हास ने अपनी जिंदगी पूरब और पश्‍चिम के दर्शन      और मस्‍तिष्‍क को समझने में लगा दी। उसके गहरे अध्‍ययन का निष्‍कर्ष है: ‘’ दि डेस्टिनी ऑफ दि माइंड’’—मन की नियति। उपशीर्षक है: पूरब और पश्‍चिम।
      पूरब और पश्‍चिम में जो फर्क है वह सिर्फ उनकी भिन्‍न-भिन्‍न अभिव्‍यक्‍तियों का नहीं है। वरन उससे भी गहरा है। उनकी चेतना की संरचना में ही फर्क है। पूरब और पश्‍चिम की सभ्‍यताओं में जो प्रकट हुआ है वह तो है ही, लेकिन ये दो चेतनाएं भी अलग-अलग तत्‍वों से बनी है। अब तक इस किताब में जो लिखा गया है वह मूलत: इन दो चेतनाओं का वर्णन है।
      बहरहाल, किताब का समापन अधिक एकात्‍म तल पर होता है। हास कबूल करता है कि ‘’इस किताब में कथित धारणाएं इतिहास का दर्शन शास्‍त्र है। एक और पूरब और पश्‍चिम की भिन्‍नता को विभिन्‍न पहलुओं से दिखाया है, लेकिन दूसरी और इतिहास के दर्शन में उसकी संभावना है कि मनुष्‍य जाति का, नए आधारों पर नया प्रारंभ हो सके।
      ध्‍यान रहे, यह किताब पिछली सदी के पूर्वार्ध में लिखी गई अंत: विचारों के साथ उसकी भाषा शैली में भी उसी समय की झलक है। लंबी-लंबी वाक्‍य रचना, क्‍लिष्‍ट संरचना और पुराने पड़ गये विचार, हो सकता है आज के पाठक को हतोत्‍साहित करें। फिर भी यह जानने के लिए कि आज हम जिस गली के मोड़ पर खड़े है वह गली कहां-कहां से गुजरी है, इस किताब को पढ़ना उपयोगी होगा। शायद इसीलिए ओशो ने इसे अपनी मनपसंद किताबों में शामिल किया है।

ओशो का नजरिया:
      आज की पहली किताब है; ‘’दि डेस्‍टिनी ऑफ दि माइंड’’ यह किताब बहुत प्रसिद्ध नहीं है। क्‍योंकि यह बहुत गहरी है। मुझे लगता है यह आदमी हास जर्मन होना चाहिए। और फिर भी उसने अत्‍यंत अर्थपूर्ण किताब लिखी है। वह कवि नहीं है, वह गणितज्ञ की भांति लिखता है। यह वह व्‍यक्‍ति है जिसने मुझे शब्‍द ‘’फिलोसिया’’ दिया।
      अंग्रेजी शब्‍द फिलॉसॉफी का अर्थ है, ज्ञान का प्रेम। फिलो यान प्रेम, सोफिया याने ज्ञान। लेकिन हिंदी दर्शन पर यह लागू नहीं होता। वह पूर्ण को देखने का पूर्वीय ढंग है। फिलॉसॉफी कर्कश है।
      हास उसकी किताब ‘’दि डेस्‍टिनी ऑफ दि माइंड’’ में दर्शन के लिए ‘’फिलोसिया’’ शब्‍द का प्रयोग करता है। ‘’फिलो’’ का अर्थ वही है, प्रेम, लेकिन ओसिया याने सत्‍य, यर्थाथ, आत्‍यंतिक रूप से यर्थाथ। ज्ञान का प्रज्ञा का प्रेम नहीं बल्‍कि सत्‍य के प्रति प्रेम, फिर वह कड़वा हो या न हो, उससे फर्क नहीं पड़ता।
      यह उन किताबों में से है जिसने पूरब और पश्‍चिम को करीब लाया। लेकिन केवल करीब, किताबें इससे ज्‍यादा कुछ कर नहीं सकती। उनका मिलन होने के लिए किसी आदमी की जरूरत है, किताब की नहीं। और हास वह आदमी नहीं था। उसकी किताब सुंदर है लेकिन वि बिलकुल साधारण था। वास्‍तविक मिलन के लिए कोई बुद्ध चाहिए। और मैं नहीं सोचता कि इस आदमी ने कभी ध्‍यान किया हो। उसके एकाग्रता साधी होगी। जर्मन लोगों को एकाग्रता की जानकारी है। एकाग्रता जर्मन है, ध्‍यान नहीं। हां कभी-कभार जर्मनी में भी ध्‍यान पैदा हुआ है, लेकिन वह नियम नहीं है।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड