कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

अधूरा वाक्‍य भी काम आ सकता है: (कथा यात्रा)

महावीर के जीवन में एक कथा है। एक आदमी चोर था। बहुत ही नामी चोर, इतना शातिर की राजा लाख जतन के भी उसे पकड़ नहीं पाया था। जिस दिन वह चोर मरने लगा उसने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और कहां: मैं एक ही शिक्षा देना चाहता हूं, के ये जो महावीर नाम का आदमी है, तू इसके पास भी कभी मत जाना। अगर तू पास से भी जा रहा हो तो आपने कानों में उँगली डाल लेना पर इसका एक शब्‍द भी तू मत सुनना वरना ये हमारा बना सारा खेल खराब हो जायेगा। ये बहुत ही खतरनाक आदमी है।

      लेकिन उसके लड़ने ने अपने पिता से पूछा की इस आदमी से इतना डरने की क्‍या जरूरत है।
      चोर ने कहा: ‘’मैं तुमसे जो कहता हूं वह मानों, ऐसे आदमी ऐसे आदमी के पास भी गया तो अपना सारा धंधा खत्‍म हो जायेगा। सालों मेहनत कर के जो साख बनाई है सब खत्‍म हो जायेगी। फिर कोई हम से नहीं डरेगा। और भय से ही हम जीवित है।
      और चोर ने ये आखरी शब्‍द अपने बेटे को कहे और मर गया।
      उस चोर के लड़के ने वो बात अपनी गांठ बाँध ली। और जीवन भर बचता रहा महावीर से। असल तो जहां भी महावीर होते वो उस शहर में चोरी ही नहीं करता। फिर एक दिन बड़ी मजेदार घटना घटी। वह बचता रहा जिंदगी भर। भगता रहा। लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। एक दिन एक रास्‍ते से गुजर रहा था। रास्‍ता सून-सान था। आम्रवन के बाग़ में भगवान महावीर ठहरे थे। उसे इस बात का कुछ पता नहीं था। हजारों भिक्षु बैठे भगवान के वचन सुन रहे थे। वहां पर इतनी शांति थी, मानों यहां कोई है ही नहीं। वह पास से गुजरा....भगवान महावीर बोल रहे थे। एक आधा वाक्‍य उसको सुनाई दे गया। तब उसने अपने कान बंध कर लिए। क्‍योंकि पिता ने मना किया था। अब वह बड़ी मुश्‍किल में पड़ गया आधा वाक्‍य।
      सिपाही उसके पीछे पड़े थे। राजा भी चाहता था वह किसी तरह से हाथ आ जाये। पर वह पकड़ा ही नहीं जा रहा था। पर अचानक न जाने क्‍या हुआ एक रात वह पकड़ा गया। लेकिन वह चोर इतना कुशल था, पीढ़ी दर पीढ़ी उनके यहां यही धंधा होता आया था। राज्‍य के पास कोई प्रमाण नहीं था। की उस पर चोरी का मुकदमा चलाया जा सके। सब जानते थे थी सब चोरियों का करता वहीं है। सारी बड़ी चोरियां उसी ने की है। इसमें छिपा भी कुछ नहीं था, जाहिर रहस्‍य था। लेकिन फिर भी प्रमाण तो कुछ चाहिए। कोई गवाह चाहिए। वह कुशल इतना था की लोगों के घर खबर कर के चोरी कर लेता था। पर कोई प्रमाण नहीं था। अब रास्‍ता एक ही था की प्रमाण उसी से उगलावाये जाये। कि किस तरह से उसने चोरी की। और किस-किस के यहां चोरी उसने की, और कब-कब। 
      तो उसे गहरा नशा कराया गया। वह इतना बेहोश रखा तीन दिन। उसे बिलकुल भी होश नहीं आने दिया गया। दो-तीन दिन बाद उसे जब होश आय। उसने आंखे खोली, तो तीन दिन की बेहोशी के बाद भी उसे ख़ुमारी थी। देखा चारों और अप्सराएं खड़ी है।
      उसने आंखे खोली और पूछा कि मैं कहां हूं।
      तुम मर गये हो, तुम्‍हें स्‍वर्ग या नरक ले जानें की तैयारी की जा रही है। हम तुम्‍हें बस ले जाने वाले है। कि तुम होश में आ जाओं। हम बस इस की प्रतीक्षा कर रह थे। तो तुम से कुछ पूछ लें। अगर तुम ने जो-जो पाप किये है। वह तुम कहा दो। तो तुम स्‍वर्ग जा सकते हो। और अगर तुम ने नहीं कहे तो तुम्‍हें नरक ही जाना होगा। एक मोका तुम्‍हें दिया जा रहा है कि तुम अपने पापों का पश्चाताप कर लो। बस तुम सत्‍य बोल दो इतना ही पूण्‍य काफी है। क्‍योंकि आज भगवान की विशेष आदलत लगी है। जिसमे सब माफी दी जा रही है। और सुधारने का मोका दिया जा रहा है।
      चोर के मन में एक बार आया कि सब सत्‍य बता दे, स्‍वर्ग जाने का मौका न चूके। और जब मर ही गया तो अब क्‍या डर है। लेकिन तभी उसे महावीर भगवान का वह आधा वचन याद आया। जब वह गुजर रहा था, उस समय महावीर भगवान देवताओं के विषय में कुछ बोल रहे थे। कि मृत्‍यु के पार जो यम ले जाते है, उनके संबंध में बोल रहे थे। महावीर कह रहे थे....वे जो ले जाते है मृत्‍यु के पास उनके पैर उल्‍टे होते है। और देवताओं की परछाई नहीं होती।
      तब अचानक उसने उनके पैर देखे। और उनकी गिरती परछाई देखी। वह सजग हो गया। उस लगा की जरूर यह कोई चाल है। उसे फ़साने के लिए। उसे कुछ होश आ गया था। वह संभल चूका था। तब उसने कहां की क्‍या कहूं मैं अपने विषय में मैंने तो कोई पाप कभी किये ही नहीं। तब मैं अपने पाप आप को कैसे कहूं। लाख याद करने पर भी मुझे नहीं लगता की मैने कोई पाप किये हो, या अंजाने में भी किसी का दिल दु:खाया हो। बाकी अब तुम्‍हारी मर्जी। चाहे नरक में डालों या स्‍वर्ग में। मैं इस विषय में क्‍या कर सकता हूं।
      वह जो मंत्रि ने योजना बनाई थी। सब व्‍यर्थ हो गई। और उस चोर को छोड़ दिया गया। वह भागा वहां से और सीधा महावीर भगवान के पास पहुंचा। और जाकर उसके पैर पकड़ लिए। और कहां: आप पूरा वाक्‍य कहे....आपके आधे वाक्‍य में मुझे बचा लिया। अब तो मैं पूरा वाक्‍य ही सुनना चाहूंगा। उस दिन आपके अधूरे वचन मेरे कानों से टकरा गये थे। में तो भाग रहा था, बचना चाहता था, सुनना भी नहीं चाहता था। फिर भी मेरे कानों में पड़ गये। और उन्‍हें आधे वचनों ने मेरी जान बचा दी। नहीं तो आज मुझे फांसी लगी होती। अब में आ गया तुम्‍हारी शरण में। मुझे दीक्षा दो और अपनी शरण में ले लो। लग गई उस चोर को फांसी­­­­....अब मैं चोर बनकर मरना नहीं चाहता।
      और भगवान महावीर अक्‍सर कहा करते थे कि आधा वाक्‍य भागते हुए चोर के कान में जबरदस्‍ती पड़ गया, वह भी काम आ गया।
      तो मंदिर के पास से कभी भागता हुआ आदमी भी, ऐसे अकारण गुजरता हुआ आदमी भी, कभी उसके भीतर से उठती हुई ध्‍वनि को, कभी उसके अंदर से आती हुई सुगंध को ऐसे सुन ले, तो भी काम आ सकती है।
ओशो