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सोमवार, 19 दिसंबर 2011

सरमद : भारत का यहूदी संत—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

( सरमद का कत्‍ल कर दिया गया मुगल बादशाह औरंगज़ेब के हुक्‍म से। उसने मुल्‍लाओं के साथ साजिश की थी। लेकिन सरमद हंसता रहा। उसने कहा, मरने के बाद भी मैं यहीं कहूंगा। दिल्‍ली की विशाल जामा मस्‍जिद, जहां सरमद का कत्‍ल हुआ, इस महान व्‍यक्‍ति की समृति लिये खड़ी है। बड़ी बेरहमी से, अमानवीय तरीके से उसका कत्‍ल हुआ। उसका कटा हुआ सर मस्‍जिद की सीढ़ियों पर लुढकता हुआ चिल्‍ला रहा था: ‘’ला इलाही इल अल्‍लाह।‘’ वहां खड़े हजारों लोग इस वाकये को देख रहे थे।
      दिल्‍ली की मशहूर जामा मस्‍जिद से कुछ ही दूर, बल्‍कि बहुत करीब, एक मज़ार है जिस पर हजारों मुरीद फूल चढ़ाते, चादर उढ़ाने आते है। इत्र की बोतलों और लोबान की खुशबू से महक उठता है उसका परिवेश। वह मज़ार है हज़रत सईद सरमद की।

      आज वे हज़रत कहलाते है लेकिन जब तक जिस्‍म ओढ़े थे तब तक वह एक नंगा फकीर था। सच पुछें तो मुगल बादशाह औरंगज़ेब की निगाहों में फकीर कम, काफ़िर ज्‍यादा। सरमद एक यहूदी सौदागर था, जो सत्रहवीं सदी में पैदा हुआ—शायद पैलेस्‍टाइन में। वह आर्मेनिया, पर्शिया और हिन्‍दुस्‍तान के बीच बगीचों और मेवों का व्‍यापार करता था। हिंदुस्‍तान में सोने-चाँदी के बर्तन, पीतल और तांबे की चीजों की खरीद-फरोख्‍त करता था। उस वक्‍त हिंदुस्‍तान की हर तरह की कारीगरी में बड़ी साख थी। व्‍यापार के सिलसिले में सरमद हिंदुस्‍तान आया और घूमते-घूमते बिहार पहुंचा। वहां उसे एक पहुंचे हुए पीर का दीदार हुआ। उसके नूर से सरमद इतना चुंधिया गया कि उसके होश और हवास खो गये। उसने सोचा, अगर खुदा की बनायी हुई मिट्टी में ऐसा नूर है तो वह खुदा कैसा नूरानी होगा।
      एक आग सी लगी सरमद के तन-बदन में, और वह बदहवास सा, खुदा की खोज में पूरे मुल्‍क के कोने-कोने में घूमने लगा। न जाने कितनी गुफाओं और मठो, साधु संतो, तीर्थ, कितने वेद उपनिषद छान मारे। सभी धर्मों और पंथों के दर पर गया। हवाओं और पेड़-पौधों में, झरनों और पहाड़ों में उसकी खुशबु सूंधने कौशिश की लेकिन उसकी रूह की तल्‍खी कम न हुई। आखिर उत्‍तर प्रदेश के गाज़ीपुर शहर में उसे संत भीखा मिले। भीखा क्‍या मिले, प्‍यासे को पानी मिल गया। उसे पानी आकंठ पी गया सरमद और उसकी सारी खोज को अंजाम दे दिया।
      संत भीखा, गुलाल साहब के शिष्‍य थे और गृहस्‍थ जीवन जीते थे। सिर से पैर तक भीगा हुआ सरमद भीखा पर कुरबान हो गया। सारा आना-जाना समाप्‍त हुआ। इससे पहले ऐयाशी की जिंदगी जी रहे सरमद ने अब फकिराना गिरेबान पहन लिया। अब उसे भीखा के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं था। ऐसा क्‍या जादू किया भीखा ने?
      भीखा ने एक ही करिश्मा किया: सरमद का रूख बाहर से भीतर की और मोड़ दिया। बहुत घूम लिये बाजारों और जंगलों में, अब भीतर ठहर जाओं। अपने जिस्‍म में ही काबा और काशी है, उसे ढूंढो। और सरमद ने वाकई उसे ढूंढ लिया।
      दिल्‍ली में दो मुगल बादशाहों की सल्‍तनत के दौरों से सरमद गुजरा: शाहजहां और उसका बेटा औरंगज़ेब। शाहजहां ने उसे बहुत इज्‍जत बख्शी और औरंगज़ेब ने मौत। शाहजहां सरमद के औलियापन और उसकी गहरी समझ का बड़ा कायल था। उसने अपने बेटे दारा शिकोह को सरमद के पास तालीम लेने के लिए भेजा। सरमद ने गीता और उपनिषाद की गहराइयों मैं दारा को डुबो दिया। दारा सरमद से इतना अभिभूत था कि उसके दिन और रातें भी सरमद के पास गुजरने लगीं। सरमद दारा से इतना खुश था कि उसने कहा, ‘’तुझे एक दिन जन्‍नत में बड़ा सिंहासन मिलेगा।‘’ शाहजहां के दरबार में सरमद का आना-जाना रहता था। और किस्‍मत से अचानक करवट ली। शाहजहां के तीसरे बेटे औरंगज़ेब ने उसे कैद कर दिया। उसने एक के बाद एक अपने भाईयों और भतीजों का कत्‍ल करना शुरू कर दिया। उनमें दारा का नंबर सबसे पहला था क्‍योंकि वह सबसे बड़ा बेटा था। इसलिए तख्‍त पर बैठने का हक रखता था।
      पूरी सियासत के तेवर बदल गये, और उसके साथ सरमद के भी। औरंगज़ेब सरमद को अपने रास्‍ते का कांटा मानता था। उस वक्‍त सरमद के मुरीद बहुत बढ़ गये थे। वह सदा लोगों की भीड़ से धीरा रहता। वह लोगों को समझाता, झकझोरता। वह बात तो साधारण आदमी से करता और मुल्‍ला-मौलवियों की मस्‍जिद के गुंबद कांप उठते। वह कहता, ‘’मत जाओ काबा काशी। वहां अंधकार है। और कुछ भी नहीं। मेरे गुलशन में आओं, तब तुम्‍हें रोशनी को देख पाओंगे। अच्‍छी तरह से देखो। आशिको, फूल और कांटा एक ही है।‘’  
      पहले तो लोग सरमद को पागल समझते थे। इतना पढ़ा-लिखा, अकलमंद आदमी और इस कदर बेहाल रहता है। लोग समझ नहीं पाते। लेकिन  सरमद को इलहाम हुआ और पूरी बात ही बदल गई। वह खुद को सम्राटों को सम्राट करने लगा।
      मुसलमान उसे बुतपरस्‍त कहते क्‍योंकि वह गुरु की तस्वीर के आगे झुकता था। सरमद बेहद बेबाक था। वह मौलवी से कहता।
’’तुम्‍हारे जैसा लंबा चोगा नहीं ओढ़ा है ऐ मुलला,
क्‍योंकि मेरी रूह तुम्‍हारे जैसी नंगी नहीं है दोस्‍त
मैं शहनशाहों का शहनशाह हूं,
सारे जज्‍ब़ात, आरमान कलाओं की कद्र,
खयालों के तूफान—मेरे है
लेकिन मैं उनमें परेशां नहीं हूं
मैं बुतपरस्‍त हूं, बेशक
काफिर, ईमानदार झुंड में से नहीं
लेकिन मैं एक ही बुत को मानता हूं--
मेरे मुर्शिद के.....     
    दिल्‍ली के मौलवी सरमद से किसी तरह छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन उन दिनों सरमद का जादू दिल्‍ली के लोगों पर तारी था। उसे कुछ हो जाता तो बवाल खड़ा हो सकता था। लोगों में यक अफवाह जड़ जमा चुकी थी कि सरमद दारा को एक सिंहासन देना चाहता था। औरंगज़ेब ने सरमद को बुलवा कर इस बारे में  सफाई पेश करने के लिए कहा।
      सरमद ने बताया कि वह किसी मिट्टी के सिंहसन की बात नहीं कर रहा था, वह तो स्‍वर्ग के सिंहासन की और इशारा कर रहा था। जब औरंगज़ेब को भरोसा न हुआ तो सरमद ने उसे कहा, ‘’आंखे बंद करो और खुद देख लो।‘’
       औरंगज़ेब ने आंखे बंद कीं तो उसे यह नज़ारा दिखाई दिया कि दारा स्‍वर्ग में एक सिंहासन पर बैठा है। और औरंगज़ेब उसके सामने एक भिखारी की तरह खड़ा है। यह देखकर औरंगज़ेब आगबबूला हुआ। और तबसे सरमद उसकी आंखो की किरकिरी हो गया। उसे दहशत पैदा हुई कि यह नज़ारा सरमद कहीं और लोगों को न दिखाये
      दिल्‍ली के मुल्‍ला और मौलवी बुरी तरह सरमद को खत्‍म करना चाहते थे। वे आये दिन औरंगज़ेब के पास उसकी शिकायते लेकर जाते। लेकिन एक भी शिकायत औरंगज़ेब को सरमद को मारने के लायक न लगी। जामा मस्‍जिद में सरमद अक्‍सर बैठा रहता था। या कभी उसकी लंबी-चौड़ी सीढ़ियों पर नंगा पडा रहता। औरंगज़ेब जुम्‍मे के जुम्‍मे
      (हर शुक्रवार) मस्‍जिद में नमाज पढ़ने जाता था। एक दिन मुल्‍लाओं ने साजिश कर मस्‍जिद की उस बाजू में बादशाह का रथ रूकवाया जहां सिढ़ियों पर सरमद नंगा पडा हुआ था।
      सीढ़ियां चढ़ते हुए बादशाह रूका और उसने पूछा, ‘’सरमद तुम इतने विद्वान और समझदार हो, इतने सारे लोग तुम्‍हारे पीछे दीवाने है, तुम नंगे क्‍यों रहते हो? कम से कम तुम्‍हारे पैरों तले पडा हुआ कंबल ही ओढ़ लेते। तुम ठीक से कपड़े क्‍यों नहीं पहनते?
      सरमद ने कहा, ‘’अगर आपको इतनी ही फ्रिक है तो आप ही कंबल क्‍यों नहीं उढ़ा देते?’’
      जैसे ही औरंगज़ेब ने कंबल उठाया, उसे कंबल में उसके भाइयों और भतीजों के खून से लथपथ सिर दिखाई दिये। सरमद ने औरंगज़ेब से पूछा, ‘’बादशाह सलामत, ये कंबल में अपने बदन के नंगेपन को ढ़ांकने के लिए इस्‍तेमाल करूं या आपकी नीयत और ईमान के नंगेपन को छुपाने के लिए?
      औरंगज़ेब सर से पेर तक कांप गयो। सरमद की रूबाइयों में यक वाक्‍यां दर्ज किया गया है।
जिसने ताज का मुर्दा वज़न और सियासत
की फिक्र तुम्‍हारे नापाक सिर रखी
उसी ने मुझे गरीबी की अमीरी दी
मैंने खुद चुनी है दौलत की सारी
परेशानियों से महरूम
नापाक बंदों से उसने कहा, ’’अपनी शर्म
को कपड़ों की कई पर्तीं में छुपाओं।‘’
लेकिन जो पाक रूह है उन्‍हें उसने बच्‍चों
की खूबसूरत पोशाक बख्शी
मासूमियत और नंगापन
     सरमद के सभी  मुरीदों और दार्शनिकों के लिए यह पहेली थी कि वह नंगा क्‍यों रहा। सरमद का एक ही जवाब था, ‘’मेरे गुरु का हुक्‍म है।‘’ दिल्‍ली के लाल किले में उस दिन लोगों का समुंदर लहरा रहा था। सरमद, जो कि हजारों लाखों के लिए अल्‍लाह का पैगंबर था उसे काफिर करार दे दिया गया था। और उसका कुफ्र क्‍या था?
     दिल्‍ली के प्रधान काजी के मुताबिक सरमद का कुफ्र था: दिल्‍ली की सड़कों पर ‘’अनलहक, अनलहक...चिल्‍लाते हुए गुजरना। यह कुरान की बेइज्‍जती थी क्‍योंकि कुरान में लिखा है कि बस एक ही अल्‍लाह है। और इस नंगे फकीर की जुर्रत कि अपने आपको सरेआम अल्‍लाह कहता फिरे?
      तख़्तनशीन औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा, ‘’तुम्‍हें अपने बचाव में कुछ कहना है?’’
      सरमद ने कहा, ‘’कुछ नहीं, यह सच है।‘’
      फौरन औरंगज़ेब ने हुक्‍म दिया कि सरमद का सिर कलम कर दिया जाये। बाहर खड़ी भीड़ पर तो जैसे गाज गिर गई। सरमद उनका सब कुछ था, मां-बाप, गुरु, दोस्‍त, तारनहार। उनकी आंखों के आगे अँधेरा छा गया। धीरे-धीरे उनका दुःख गुस्‍से में और बगावत में बदल गया। लोग बेकाबू हो रहे थे। और बगावत करने को बेताब थे। औरंगज़ेब ने दिल्‍ली की सड़कों पर सेना को बुलाया और दिल्‍ली के गली-कूचों में फैला दिया ताकि लोगों में दहशत फैल जाये। और दूसरे दिन जामा मस्‍जिद के पास सरमद के सिर कलम करने की तैयारियाँ कीं।
      लेकिन सरमद की मस्‍ती उन आखिरी घड़ियों में भी उतनी ही थी। अपना सर काटने के लिए करीब आते हुए जल्‍लाद को देखकर वह बोल उठा, ‘’या खुदा, आज तू मेरे पास इस शक्‍ल में आया है।‘’
      जब उसका सर काटा गया तो उसके खून का कतरा-कतरा बोल उठा, ‘’अनलहक़, अनलहक़...।‘’
      उसके बाद जो हुआ वह चमत्‍कार था। सरमद के धड़ ने अपने टूटे हुए सिर उठाया और ‘’अनलहक़’’ पुकारता हुआ जामा मस्‍जिद की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ चला गया। लोग एक बरगी स्‍तब्‍ध रह गये और फिर चीखने-चिल्लाने जयकार करने लगे। तब सरमद का गुरु सूक्ष्‍म शरीर में प्रगट हुआ और उसने कहा, ‘’इस शरीर में तुझे जो करना था वह तूने कर लिया, अब कुदरत को अपना काम करने दे।‘’
      तत्‍क्षण सरमद का शरीर गिर पडा।
      सरमद का सिर क्‍यों कलम किया गया इस पर उसकी जीवनी लिखने वालों में मतभेद है। एक मत के अनुसार सरमद गति कलमा पढ़ता था इसलिए उसे सज़ा-ए-मौत दी गई। ‘’ला इलाह इल तल्‍लाह’’ की जगह वह सिर्फ ‘’ला इलाह’’ कहता था, जिसका मतलब होता है कोई खुदा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि सरमद मुसलमान नहीं था, यहूदी था। फिर उस पर कुरान की तौहीन करने का इल्‍जाम कैसे लगाया जा सकता है? इसका जवाब कोई नहीं दे सकता।
      औरंगज़ेब 1658 में तख़्तनशीन हुआ और उसने 1659 में सरमद का कांटा हटा दिया। सरमद को मारकर उसे तसल्‍ली नहीं हुई। उसने सरमद की सारी रूबाइयात जला दी। किसी तरह 321 रूबाइयां औरंगज़ेब के चंगुल से बच गई।
      सरमद को किसी तरह अपनी मौत का अंदेशा हो गया था। उसने लिखा है:
एक अरसा हो गया
मंसूर को दुनिया को अपना पैग़ाम दिये हुए
और उसका पाक असर मद्धिम हो रहा है
और तेरी मदद से उसे फिर से बुलंद करना है--
जल्‍लाद की कसी हुई रस्‍सी और लकड़ी के खंभे--
अल्लाह के बंदों को मौत ज्‍यादा बड़ी जिंदगी देती है।
      सरमद का यह अंदेशा हकीकत में बदल गया। कहते है कि सरमद की कत्‍ल से पूरी दिल्‍ली इस कदर थर्रा गई कि औरंगज़ेब को शहर में फैली हुई सेना को हटाने में महीनों लग गए।
सरमद की रूबाइयां:
सरमद जैसे मस्‍तो की रूबाइयां महज कविता नहीं होती। शब्‍दों को सरमद ‘’शराब’’ कहता है। और गुरु है साकी। आदमी के मस्‍तिष्‍क में जो गहरे केंद्र है वह है मैख़ाना। सरमद की रूबाइयां पढ़ते वक्‍त ये प्रतीक ख्‍याल में रखने जरूरी है।
1--   बड़ा अजीब वाकया है यह
      जो शराब पीता है वह शराब ही हो जाता है
      दसवें द्वार में, तीसरे लोक में,
      अमृत की झील है
      उस लाल रंग की झील से लाल शराब
      ले लो
      और तुम्‍हारे बुढ़ापे में खुशी से पीओ
      उस वक्‍त यही अकेली चीज है
      जो तुम्‍हें सुकून देगी
      कब तक यहां कैदी बने रहोगे?
      अल्‍लाह का करम पी लो
      और सदा क लिए आजाद हो जाओ
2—    जिंदगी के रंगबिरंगे तजुबों में मैंने देखा है
      तेरी रहमत मेरे काले और बदसूरत गुनाहों से
      बहुत बड़ी है।
      हैरान हूं, मेरे गुनाह जो कि सज़ा पाने के हकदार थे
      तेरी बेइंतहा रहमत के बहाने बन गए।

3--   ऐ सरमद, तेरी जिंदगी इतनी बदलती हुई
      कभी सुख का फूल, कभी बुलंदी का पहाड़
      और कभी गरीबी का रेगिस्‍तान
      कभी मुर्शिद की रोशनी या कभी वह फूल
      जो अपनी खुशबू से औरों को खुश करे
      कभी तू अज़ीम हस्‍तियों के बीच बैठता है
      तो कभी गुलशन में, या कूड़े के वीरान ढेर पर
      जिंदगी के इन बदलते हुए तेवरों को सीख
      कुछ भी थिर नहीं है,
      कुछ भी कायम नहीं है।
4--   ऐ सरमद, संगठित मज़हबों पर चोट कर
      तूने कहर ढ़ा दिया।
      तूने अपने मज़हब को
      उस आदमी पर क़ुरबान किया जिसकी आंखे
      नशे में लाल है
      तेरी सारी दौलत तूने मुर्शिद के कदमों में लुटा दी
      जो कि बुत परस्‍त है।
5--   ऐ आदमी, तू एक पहेली है
      तू सिर्फ उसे जानता है
      जो कि दिखाई देता है
      लेकिन तेरी हकीकत ढंकी हुई है
      तू जिस्‍म नहीं, जान है
      जैसे सियाह कांच के पीछे छिपी हुई लौ
      तेरी रोशनी छिपी है
      लेकिन कांच के पीछे तेरी बेपर्दा हकीकत है
6--   मेरे महबूब, इस ग़मगीन दूनिया में
      तू ही मेरा चैन और सुकून है
      दोस्‍त और रिश्‍तेदार,
      मैंने तराजू में तौल लिए
      उनका पलड़ा हल्‍का है
      मेरी बेबसी के दौर में तू ही
      मेरे साथ खड़ा पाता है।     
(सरमद की रूबाइयां मूल फारसी भाषा में लिखी गई है। उन्‍हें लखनऊ के मुन्‍शी सैयद नवाब अली ने उर्दू में अनुवादित किया। यहूदी लेखक आई. ए. इज़िकेल जो कि एक साधक थे, उन्‍होंने अपने अन्‍य सत्‍संगी मित्रों की मदद से इन रबाइयों का अंग्रेजी अनुवाद किया। अंग्रेजी से उठा कर अधकचरी हिंदी का जामा पहिनाने की गुस्‍ताखी ......)
ओशो का नजरिया:
      आज जिसका बात करने जा रहा हूं वह उन अनोखे लोगों में से है जो इस पृथ्‍वी पर चले है। उसका नाम है सरमद। वह सूफी था और एक मुसलमान राजा के हुक्‍म से मस्‍जिद में उसका कत्‍ल किया गया।
      वह इसलिए मारा गया क्‍योंकि एक मुस्‍लिम कलमा है: अल्‍लाह ही एक मात्र परमात्‍मा है। और वह उसके लिए काफी नहीं है। वह  कुछ और चाहते है। वे दुनिया में घोषित करना चाहते है कि सिर्फ मोहम्‍मद ही अल्‍लाह के पैगंबर है। ईश्‍वर ही ईश्‍वर है। और मोहम्‍मद अकेले पैगंबर है।
      सूफी इस कलमा के दूसरे हिस्‍से को कबूल नहीं करते। सरमद का कुफ्र यही था। स्‍वभावत: कोई भी अकेला पैगंबर नहीं हो सकता। कोई भी आदमी—फिर से जीसस हो या मोहम्‍मद या मोज़ेज या बुद्ध, एकमात्र नहीं हो सकता।
      सरमद का कत्‍ल कर दिया गया मुगल बादशाह के हुक्‍म से। उसने मुल्लाओं के साथ साजिश की थी। लेकिन सरमद हंसता रहा। उसने कहा, मरने के बाद भी मैं यही कहूंगा।
      दिल्‍ली की विशाल जामा मस्‍जिद, जहां सरमद का कत्‍ल किया गया। इस महान व्‍यक्‍ति की स्‍मृति लिये खड़ी है। बड़ी बेरहमी से, अमानवीय तरीके से उसका कत्‍ल हुआ। उसका कटा हुआ सिर मस्‍जिद की सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ चिल्‍ला रहा था: ‘’ला इल्‍लाही इल अल्‍लाहा।‘’ वहां खड़े हजारों लोग इस वाक्‍य को देख रहे थे।
      मुझे पता नहीं यह कहानी सत्‍य है कि नहीं, लेकिन होनी चाहिए। सत्‍य को भी सरमद जैसे व्‍यक्‍ति के साथ समझौता करना पड़ेगा। मैं सरमद से प्रेम करता हूं। उसने कोई किताब नहीं लिखी लेकिन उसके वचन है: ‘’अल्‍लाह ही अकेला अल्‍लाह है, और कोई पैगंबर नहीं है। तुम्‍हारे और अल्‍लाह के बीच कोई मध्‍यस्‍थ नहीं है। अल्‍लाह सीधा उपलब्‍ध है।‘’ बस, जरूरत है तो थोड़ी सी दीवानगी की और बहुत से ध्‍यान की।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड