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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

दि बुक—ऐलन वॉटस (ओशो कि प्रिय पुस्‍तकें)

ऑन दि टैबू अगेंस्‍ट नोइग हू यू आर
     किताब में प्रवेश करने से पहले खुद ऐलन वॉटस संक्षेप में इसे लिखने की वजह बताता है।
      ‘’यह किताब मनुष्‍य के उस निषिद्ध लेकिन अनचीन्‍हें टैबू के संबंध में है जो एक तरह से हमारी साजिश है हमारे ही प्रति कि हम स्‍वयं को जानना नहीं चाहते। चमड़े के थैले में बंद हम जो एक अलग-थलग हस्‍ती बनकर जीते है वह एक भ्रांति है। यही वह भ्रांति है जिसकी वजह से मनुष्‍य ने टैकनॉलॉजी का उपयोग अपने पर्यावरण पर विजय पाने के लिए और फलत: खुद के अंतिम विनाश के लिए किया।

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक—ओशो (भाग दो)

हास्‍य और सेक्‍स के बीच क्‍या संबंध है--
     इनमें निश्‍चित संबंध है; संबंध बहुत सामान्‍य है। सेक्‍स का चरमोत्कर्ष और हंसी एक ही ढंग से होता है; उनकी प्रक्रिया एक जैसी है। सेक्‍स के चरमोत्कर्ष में भी तुम तनाव के शिखर तक जाते हो। तुम विस्‍फोट के करीब और करीब आ रहे हो। और तब शिखर पर अचानक चरम सुख घटता है। तनाव के पास शिखर पर अचानक सब कुछ शिथिल हो जाता है। तनाव के शिखर और शिथिलता के बीच इतना बड़ा विरोध है कि तुम्‍हें ऐसा लगता है कि तुम शांत, स्‍थिर सागर में गिर गये—गहन विश्रांति, सधन समर्पण।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक: ओशो (भाग-1)

सेक्‍स से संबंधित किसी नैतिकता का कोई भविष्‍य नहीं है। सच तो यह है कि सेक्‍स और नैतिकता के संयोजन ने नैतिकता के सारे अतीत को विषैला कर दिया है। नैतिकता इतनी सेक्‍स केंद्रित हो गई कि उसके दूसरे सभी आयाम खो गये—जो अधिक महत्‍वपूर्ण है। असल में सेक्‍स नैतिकता से इतना संबंधित नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

दि गॉस्पल—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

एकॉर्डिंग टू थॉमस--
     वह दिसंबर का एक भाग्‍य शाली दिन था। सन था 1951 उत्‍तर ईजिप्‍त में एक शहर है नाग हम्‍मदि। उसके आसपास बियाबान में एक अरब किसान अपने खेत के लिए खुदाई कर रहा था। अचानक उसे एक मिट्टी का बड़ा सा लाल रंग का पुराना बर्तन मिला। वह उत्‍तेजना से भर गया, उसे लगा की कोई गड़ा हुआ धन मिल गया। पहले तो उसे डर लगा कि कोई जिन प्रेत है; उसने जल्‍दी से फावड़ा मार कर बर्तन को नीचे गिराया, अंदर उसे न तो जिन मिला और न धन। कुछ कागजी किताबें जरूर मिलीं। लगभग एक दर्जन किताबें सुनहरे भूरे रंग के चमड़े में बंधी हुई। उसे क्‍या पता था कि उसे एक ऐसा असाधारण दस्‍तावेज मिला है जो तकरीबन 1500 साल पहले निकटवर्ती मठ के भिक्षुओं ने पुरातनपंथी चर्च के विध्‍वंसक चंगुल से बचाने की खातिर भूमि के नीचे दफ़ना रखा था। चर्च उस समय जो-जो भी विद्रोही मत रखते थे उन सबको नष्‍ट कर रहा था। चर्च का क्रोध जायज भी है कि क्‍योंकि जीसस के ये मूल सूत्र प्रकाशित होते तो चर्च का काम तमाम हो जाता।

एक आदमी पर्वत जैसा: (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

दि ज़ेन टीचिंग ऑफ हु आंग पो ऑन दि ट्रांसमिशन ऑफ माईड--
अंग्रेजी अनुवाद: जॉन ब्‍लोफेल्‍ड
    
हु आंग पो एक मनुष्‍य का नाम था और पर्वत का भी क्‍योंकि हु आंग पो इसी नाम के पर्वत पर रहता था। यह एक उतंग ज़ेन सदगुरू था जिसे पर्वत शिखर का नाम मिला क्‍योंकि वह खुद भी एक उत्तुंग शिखर था।
      यह किताब उसके शिष्‍य और विद्वान पंडित पेई सियु द्वारा किया गया संकलन है। चांग साम्राज्‍य में ईसवीं सदी 850 में यह संकलन चीनी भाषा में किया गया था।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

रिसरेक्‍शन—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

लियो टॉलस्‍टॉय
     ‘’रिसरेक्शन’’ टॉलस्‍टॉय का आखिरी उपन्‍यास है। इससे पहले ‘’वार एंड पीस’’ और ऐना कैरेनिना’’ जैसे श्रेष्‍ठ और महाकाय उपन्‍यास लिखकर टॉलस्‍टॉय ने विश्‍व भर में ख्‍याति अर्जित कर ली थी। ऐना कैरेनिना के बारे में उसने खुद कहा कि मैंने अपने आपको पूरा उंडेल दिया है। इस उपन्‍यास के बाद टॉलस्‍टॉय की कल्‍पनाशीलता वाकई चुक गई थी क्‍योंकि इसके बाद वह दार्शनिक किताबें लिखने लगा था। अपने आपको एक संत या ऋषि की तरह प्रक्षेपित करने लगा था। उस भाव दशा में ‘’रिसरेक्शन’’ जैसा उपन्‍यास लिखने की प्रेरणा टॉलस्‍टॉय के पुनर्जन्‍म जैसी ही थी। रिसरेक्‍शन अर्थात पुनरुज्जीवन।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

ब्रदर्स कार्मोझोव—( ओशो की प्रिय पुस्‍तकें )

फ्योदोर दोस्तोव्सकी
      विश्‍व विख्‍यात रशियन उपन्‍यासकार फ्योदोर दोस्तोव्सकी की श्रेष्‍ठ रचना ब्रदर्स कार्मोझोव ओशो की दृष्‍टि में सर्वश्रेष्‍ठ तीन किताबों में से एक है। यह कहानी है बेइंतहा प्‍यार की, कत्‍ल की और आध्‍यात्‍मिक खोज की। यह कहानी वस्‍तुत: लेखक की अपनी खोज की कहानी है। उसकी खोज यह है कि सत्‍य क्‍या है। मनुष्‍य क्‍या चीज है, जीवन क्‍या है, ईश्‍वर क्‍या है, है या नहीं। इस उपन्‍यास के सशक्‍त चरित्र दोस्तोव्सकी की गहरी निगाह के प्रतीक है जो मनुष्‍य के अवचेतन की झाड़ियों में गहरी पैठती है। इस किताब के विषय में वह खुद कहता है कि ‘’अगर मैंने इस उपन्‍यास को पूरा कर लिया तो मैं प्रसन्‍नतापूर्वक विदा लुंगा। इसके द्वारा मैंने अपने आपको पूरी तरह अभिव्‍यक्‍त कर लिया है।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

‘शत्रुघ्न सिन्‍हा:

ओशो: काले वातावरण में चमकता हुआ प्रकाश पुंज--
     ओशो साधारण व्‍यक्‍तियों के बीच एक असाधारण व्‍यक्‍तित्‍व है। असाधारण इसलिए कि उन्‍होंने अपनी शक्‍ति को न केवल पहचाना है बल्‍कि उसका विकास भी किया है। इस साधारण हाड़-मांस के शरीर को अपनी बुद्धि, तपस्‍या, ज्ञान, गुण, परिपक्‍वता, साधना, संयम, साहस इन सारी बातों के बल पर अपने आपको बिलकुल भिन्‍न कर दिया है। असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित कर दिया है। साथ-साथ उन्‍होंने यह भी रास्‍ता दिखा दिया है कि मनुष्‍य अगर अपनी क्षमता को पहचाने, और रियाज़ करे तो अपनी शक्‍ति को पूर्ण विकसित कर सकता है। लोगों के संग रहते हुए भिन्‍न हो सकता है। ओशो ने जो पाया वह मनुष्‍य के लिए मुश्‍किल तो है; नामुमकिन नहीं।

दि विल टु पावर: (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

फ्रेडरिक नीत्‍से
     कुछ व्‍यक्‍तियों का वजूद इतना बड़ा होता है कि उनके देश का नाम उनके नाम सक जुड़ जाता है। जैसे ग्रीस सुकरात और प्लेटों की याद दिलाता है। चीन लाओत्से का देश बन गया। वैसे ही जर्मनी फ्रेडरिक नीत्‍शे का पर्यायवाची हुआ। नीत्‍शे—जिस महान दार्शनिक को ओशो ‘’जायंट’’ या विराट पुरूष कहते है। नीत्‍शे की प्रतिभा को ओशो ने बहुत सम्‍मान दिया है। नीत्‍शे के महाकाव्‍य ‘’दसस्‍पेक जुरतुस्त्र’’ पर प्रवचन माला कर ओशो ने नीत्‍शे को अपनी साहित्‍य संपदा में अमर कर दिया है। उसी नीत्‍शे की अंतिम किताब ‘’दि विल टु पावर’’ ओशो की मनपसंद किताबों में  शामिल है।
      यह किताब कई अर्थों में अनूठी है। एक—यह किताब प्रकाशित करने के लिए लिखी ही नहीं गई थी। नीत्‍शे का निधन 1900 में हुआ। 1884-1888 के बीच उसने जो टिप्‍पणियां अर्थात नोटस लिखे थे उन्हें एकत्रित कर उसकी बहन फ्रॉ एलिज़ाबेथ फ्रॉस्‍टर नीत्‍शे ने 1901 में प्रकाशित किया।

रविवार, 25 दिसंबर 2011

जीसस के अज्ञात जीवन का रहस्‍य : (ओशो)

ओशो कहते है कि जीसस पूर्णत: संबुद्ध थे किंतु वे ऐसे लोगों में रहते थे जो संबोधि या समाधि के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए जीसस को ऐसी भाषा का प्रयोग करना पडा जिससे यह गलतफहमी हो जाती है कि वे संबुद्ध नहीं थे। प्रबुद्ध नहीं थे। वे दूसरी किसी भाषा का प्रयोग कर भी नहीं  सकते। बुद्ध की भाषा इनसे बिलकुल भिन्‍न है। बुद्ध ऐसे शब्‍दों का प्रयोग कभी नहीं कर सकत कि ‘’मैं परमात्‍मा का पुत्र हूं।’’ वे ‘’पिता’’ और ‘’पुत्र’’ जैस शब्‍दों का प्रयोग नहीं करते क्‍योंकि ये शब्‍द व्‍यर्थ है। परंतु जीसस करते भी क्‍या। जहां वे बोल रहे थ वहां के लोग इसी प्रकार की भाषा को समझते थ। बुद्ध की भाषा अलग है क्‍योंकि वे बिलकुल अलग प्रकार के लोगों से बात कर रहे थे।

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

दि हिस्‍ट्री ऑफ वेस्‍टर्न फिलॉसॉफी—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

बर्ट्रेंड रसेल--   

     इंग्‍लैंड के विश्‍व विख्‍यात दार्शनिक, लेखक बर्ट्रेंड रसेल ने अपरिसीम श्रम करके विचार के विकास की कहानी लिखी है। यह कहानी उसके एक महाकाव्‍य पुस्‍तक में उंडेली है। जिसका नाम है: ‘’दि हिस्‍ट्री ऑफ वेस्‍टर्न फिलॉसॉफी’’ पाश्‍चात्‍य दर्शन का इतिहास अर्थात मनुष्‍य के विचारों का इतिहास। इस पुस्‍तक में रसेल ने 2500 वर्षों के काल-खंड को समेटा है। लगभग 585 ईसा पूर्व से लेकिर 1859 के जॉन डूयुए तक सैकड़ों दार्शनिकों के चिंतन, दार्शनिक सिद्धांत और मनुष्‍य जाति पर हुए उनके परिणामों का संकलन तथा सशक्‍त विश्‍लेषण इस विशाल ग्रंथ में ग्रंथित है।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

प्रार्थना ध्‍यान—ओशो

अच्‍छा हो कि यह प्रार्थना ध्‍यान आप रात में करो। कमरे में अंधकार कर ले। और ध्‍यान खत्‍म होने के तुरंत बाद सो जाओ। या सुबह भी इसे किया जा सकता है, परंतु उसके बाद पंद्रह मिनट का विश्राम जरूर करना चाहिए। वह विश्राम अनिवार्य है, अन्‍यथा तुम्‍हें लगेगा कि तुम नशे में हो, तंद्रा में हो।

सायकोसिंथेसिस—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

ए मैन्‍युअल ऑफ प्रिंसिपल्‍स एंड टेकनिक्स—असोजियोली एम. डी.
(यद्यपि असोजियोली  बुद्ध पुरूष नहीं है, और वह चेतना की परम स्‍थिति का वर्णन नहीं करता, तथापि अंतर् याता की समूची प्रक्रिया को वह अत्‍यंत विधायक दृष्‍टिकोण से और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्‍तुत करता है। लगता है कहीं उसका तार ओशो चेतना द्वारा होने वाली आगामी आध्‍यात्‍मिक क्रांति से मिला हुआ है। अंत: आश्‍चर्य नहीं कि ओशो कहते है, मैं चाहूंगा कि मेरे सभी संन्‍यासी असोजियोली को पढ़े।)

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

ओस कण और सागर: (ओशो--ध्‍यान विधि)

(यह विधि इस बात का बोध कराने का एक उपाय है कि हम किस प्रकार स्‍वयं को दूसरों से पृथक करते है। और होश पूर्वक उस पृथकता को विलीन करते है।)

कब:
      प्रात: स्‍नान के पश्‍चात और रात्रि सोने से पूर्व अविधि; तीस मिनट
निर्देश:
      फर्श पर या कुर्सी पर बैठ जाएं, अपने शरीर को बिना किसी प्रयत्‍न या तनाव के यथासंभव सीधा रखें ताकि आपकी रीढ़ की हड्डी 90 डिग्री के कोण पर हो। आँखों को जोर से बंद न करे, लेकिन सहज स्फुरणा से दोनों पलकों को आराम से बंद होने दे।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

सुरक्षा प्रभा मंडल ध्‍यान: (काया कल्‍प करने के लिए)

क्‍या आप जानते है कि सप्ताहांत में आप इतना थक जाते है कि खड़े भी नहीं हो पाते। एक विधि प्रस्‍तुत है—कायाकल्‍प करने के लिए नहीं, अपितु आपकी क्‍लांति को यथासंभव कम करने के लिए। हमारी थकावट के कई कारण हो सकते है—चारों और का शोर, हलचल, गंध दूसरों की भावनाएं, उनके विचार—सभी आपको प्रभावित कर सकते है। हम निरंतर एक दूसरे को भला बुरा कहते रहते है। एक दूसरे को डाँटते-फटकारते रहते है। निरंतर अपने नकारात्‍मक भाव व विचार क्रोध-आक्रोश भय चिंता, विवशता आदि-आदि दूसरों को संप्रेषित करते रहते है। यदि हम स्‍वयं को इनके आक्रमणों से बचाना नहीं जानते तो यह बात समझ में आती है कि हम क्‍यों थक जाते है।

दीवान-ए-गालिब—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें

 असदल्‍ला खां ग़ालिब:
कल हमने दिल्‍ली के ही एक सूफी फकीर सरमद की बात की थी आज भी दिल्‍ली की गलियों में जमा मस्जिद से थोड़ा अंदर की तरफ़ कुच करेंगें बल्‍लिमारन। जहां, महान सूफी शायद मिर्जा गालिब के मुशायरे में चंद देर रूकेंगे। बल्लिमारन के मोहल्‍ले की वो पेचीदा दरीरों की सी गलियाँ...सामने टाल के नुक्‍कड पर बटेरों के क़सीदे...गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद, वो वाह, वाह....चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कूद टाट के परदे...एक बकरी के मिमियाने की आवाज....ओर धुँधलाती हुई शाम के बेनूर अंधेर ऐसे दीवारों से मुंह जोड़कर चलते है यहां, चूड़ी वाला के कटरे की बड़ी बी जैसे अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाजे टटोलते। आज जो गली इतनी बेनुर लग रही है। जब मैं पहली बार उस घर में पहुंचा तो कुछ क्षण तो उसे अटक निहारता ही रह गया।

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

सरमद : भारत का यहूदी संत—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

( सरमद का कत्‍ल कर दिया गया मुगल बादशाह औरंगज़ेब के हुक्‍म से। उसने मुल्‍लाओं के साथ साजिश की थी। लेकिन सरमद हंसता रहा। उसने कहा, मरने के बाद भी मैं यहीं कहूंगा। दिल्‍ली की विशाल जामा मस्‍जिद, जहां सरमद का कत्‍ल हुआ, इस महान व्‍यक्‍ति की समृति लिये खड़ी है। बड़ी बेरहमी से, अमानवीय तरीके से उसका कत्‍ल हुआ। उसका कटा हुआ सर मस्‍जिद की सीढ़ियों पर लुढकता हुआ चिल्‍ला रहा था: ‘’ला इलाही इल अल्‍लाह।‘’ वहां खड़े हजारों लोग इस वाकये को देख रहे थे।
      दिल्‍ली की मशहूर जामा मस्‍जिद से कुछ ही दूर, बल्‍कि बहुत करीब, एक मज़ार है जिस पर हजारों मुरीद फूल चढ़ाते, चादर उढ़ाने आते है। इत्र की बोतलों और लोबान की खुशबू से महक उठता है उसका परिवेश। वह मज़ार है हज़रत सईद सरमद की।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

लल्‍लवाख—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

लल्‍ला की वाणी:
     योग मार्ग स्‍त्री-पुरूष, दोनों के लिए समान रूप से उपल्‍बध है। लेकिन न जाने क्‍यों स्‍त्रियां उस मार्ग पर बहुत कम चलीं। और जो चलीं भी, उनमें पहुंचने वाली अत्‍यंत कम है। कश्‍मीरी रहस्‍यदर्शी स्‍त्री लल्‍ला ऐसी अद्वितीय स्‍त्रियों में से एक है। वह योगिनी थी इसलिए उसे नाम मिला, लल्‍ला योगेश्‍वरी।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

सायकोएनेलिसिस एंड दि अनकांशस –ओशो की प्रिय पुस्‍तकें

लेखक—डी. एच. लॉरेन्स
     बीसवीं सदी के आरंभ में सिगमंड फ्रायड और उसके शिष्‍योत्‍तम युग ने पहली बार मनुष्‍य के मन की गहराई में दबे हुए अवचेतन या अनकांशस का उॅहापोह किया। ओशो स्‍पष्‍ट कहते है कि लॉरेन्‍स एक स्‍थापित मनोवैज्ञानिक न होते हुए भी वह मन की गहराइयों में अधिक कुशलता से पहुंचा है। और उसने बड़ी सुंदरता से अवचेतन की बारीकियां को शब्‍दांकित किया है।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

मदर : ओशो की प्रिय पुस्‍तकें

मदर—मैक्‍सिम गोर्की
 (विख्‍यात रशियन लेखक मैक्‍सिम गोर्की उपन्‍यास मदर पहली रशियन क्रांति के पहले लिखा गया था जब ज़ार शाही के खिलाफ मजदूरों को उत्‍थान शुरू हुआ। रशिया में नया-नया औधोगिकीकरण हुआ था। शहरों में कारखाने खड़े हुए और उनमें काम करने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ने लगी। कारख़ानों के मालिक मजदूरों का शोषण ठीक उसी तरह करने लगे जैसे ज़ार किसानों का करते थे। मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।)

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

दि डेस्‍टिनी ऑफ दि माइंड—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

—विलियम हास
      बीसवीं सदी के प्रारंभ में अनेक जर्मन तथा यूरोपियन विद्वान पूरब की प्रज्ञा की और आकर्षित हुए। यूरोप में बुद्धिवाद का उत्कर्ष चरम शिखर पर था लेकिन यह बुद्धिवाद तर्क पर आधारित था। वह बुद्धि की संतुष्‍टि तो कर सकता था लेकिन ह्रदय की प्‍यास बुझाने में असमर्थ था। इसीलिए विशेष रूप से जर्मन विद्घान भारत की वैदिक प्रज्ञा को समझने के लिए उत्‍सुक हुए।

ओशो--( चक्रा साउंड ध्‍यान)

चक्रा साउंड ध्‍यान:
     इस ध्‍यान में चक्रों को लयवद्ध करने व उसके प्रति एक चेतना जाग्रत करने के लिए ध्‍वनियों का उपयोग किया जाता है। स्‍वयं घ्वनियां पैदा करते हुए अथवा केवल संगीत को सुन कर अपने भीतर ध्‍वनियों को महसूस करते हुए, इस ध्‍यान में आप एक गहरे शांत अंतर मौन में उतर सकते है। यह ध्‍यान किसी भी समय किया जा सकता है। पृष्‍टभूमि का संगीत आपको ऊर्जा गत रूप से इस ध्‍यान में सहयोगी होता है। व हर चरण के प्रारंभ का संकेत देता है।
पहला चरण: (45 मिनट)

दांतों में छिपे रहस्‍य: ओशो

एक समबुद्ध का निजि अनुभव:

इन पिछले कुछ दिनों से मेरे दांतों में भयानक दर्द है। मैं बिलकुल भी सो नहीं पाया। घंटों लेटे रहते हुए मैंने अपने जीवन में पहली बार दांतों के बारे में सोचा। साधारणतया डेंटिस्ट, दंत चिकित्‍सक को छोड़कर दांतों के बारे में कौन सोचता है।

लेडी गागा—ये क्‍या कहते है

ओशो भारत से मेरा पहला परिचय है: लेडी गागा
     लेडी गागा वर्तमान समय में संगीत के अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍टेज पर सबसे बड़ा नाम है। कुछ ही वर्षो के अल्‍प समय में उसकी ख्‍याति माइकल जैकसन की ख्याति को भी पार कर गई। विश्‍व भर में करोड़ों युवा और युवा ह्रदय लोग उनके संगीत के दीवाने ही नहीं, इंटरनेट पर ट्विटर के ज़रिये उनके विचारों की भी प्रतीक्षा करते है।

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

दि फीनिक्स—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

दि फीनिक्स—डी. एच. लॉरेन्स
      लॉरेन्स इंग्‍लैण्‍ड में 1885 में पैदा हुआ। दुर्भाग्‍य से इस प्रतिभाशाली लेखक को बड़ी छोटी सी जिंदगी मिली। केवल पैंतालीस वर्ष—लेकिन उम्र के इस छोटे से सफर में उसकी सर्जनशीलता जलप्रपात की तरह धुंआधार बहती रही। उसने चालीस से अधिक किताबें लिखी। वह पूर्णतया नैसर्गिक जीवन के हक में था। कारख़ानों और मशीनों के आक्रमण से विकृत हुई इंग्‍लैण्‍ड की संस्‍कृति से वह बेहद दुःखी था। वह स्‍वस्‍थ जीवन, प्रेम और मानवीयता का आलम चाहता था। उसका लेखन अत्‍यंत संवेदनशील, सौंदर्य पूर्ण और नजाकत से भरा हुआ था। सेक्‍स और प्रेम के विषय में उसकी कोई कुंठाएं नहीं थी।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

मैक्‍ज़िम्‍स फॉर रिवोल्‍युशनिस्‍ट—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ--
     जॉर्ज बर्नार्ड शॉ इस सदी का अद्भुत मेधावी और मजाकिया लेखक था। उसका व्‍यक्‍तित्‍व उतना ही रंगबिरंगा था जितनी कि उसकी साहित्‍य-संपदा। उसकी रोजी रोटी कमाने का मूल व्‍यवसाय था। ‘’नाटकों को लेखन।’’ बर्नार्ड शॉ एक साथ कई चीजें था। उसको किसी एक श्रेणी में रखना संभव नहीं था। उसको किसी एक श्रेणी में रखना संभव नहीं था। वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। वह परिष्‍कृत कलाओं का—साहित्‍य, संगीत, चित्र, नाटक—समीक्षक था। वह अर्थशास्‍त्री और जैविकीतज्ञ था। वह अपना धर्म ‘’क्रिएटिव इवोल्‍युशनिस्‍ट, सृजनात्‍मक, विकासवादी बताता था।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

श्री भाष्‍य–-रामानुज (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

रामानुज आचार्य  
      रामानुज लिखित श्री भाष्‍य उस युग का प्रतिनिधित्‍व करता है जिस युग में भारत चित पर पांडित्‍य राज करता था। बुद्धत्‍व की अनुभूति तो बहुत तो बहुत संक्षिप्‍त सुत्रों में लिखी जाती है। ठीक वैसे जैसे विज्ञान के सूत्र होते है। तीन या चार सुगठित शब्‍दों में समुंदर जैसा अनुभव भर देना प्रबुद्ध पुरूषों की प्रिय क्रीड़ा थी। लेकिन इन आणविक सूत्रों पर लंबी-लंबी दार्शनिक टीकाएं लिखना पंडितों का मनपसंद खेल था। इन टीकाओं का जंगल इतना घना होता कि उसमें से रास्‍ता खोजते हुए मूल सूत्रों तक पहुंचना माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ने से कम दूभर नहीं था। पढ़ने वाले भी दार्शनिकों के वाग वैभव का खूब आनंद लेते थे।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

यारी मेरी यार की (ओशो)--(सुख राज) भाग--3

सुखराज ओशो के बाल सखा

कहानी
     कहानी अब नर्मदा के पात्र की तरह गहरी हो चली थी: इसके बाद फौरन पैंतरा बदलकर ओशो कहते है मैं जाता हूं। तू भी मेरे साथ चल। मैंने कहा, आपकी छोटी गाड़ी है, पहले ही इतने सारे लोग बैठे है, आप निकलो, मैं पीछे-पीछे आ रहा हूं। तो वे बोले, अच्‍छा एक काम कर, तेरे बेटे शेखर को मेरे साथ भेज दे। लेकिन मैं नहीं माना। मेरी यही रट कि मैं आपके पीछे आ रहा हूं।

टशियन ऑर्गेनम—(ओशो कि प्रिय पुस्‍तकें)


टर्शियम ऑगेंनम—डी.पी. ऑस्‍पेन्‍सकी
     इस पूस्‍तक का लेखक पी.डी ऑस्‍पेन्‍सकी गणितज्ञ ओर तर्कशास्‍त्री, दोनों था। ओर इन दोनों विषयों में उसकी जो पैठ थी उसका इत्र निचोड़कर उसने एक दर्शन खड़ा किया जिसका लोकप्रिय नाम था: चौथा आयाम। उसकेआधार पर उसने पश्‍चिमी तर्कसरणी तथा रहस्‍यवाद के बीच सेतू बनाया।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

यारी मेरी यार की (ओशो)--(सुख राज) भाग-- 2


सुखराज भारती की यादें..
       एक बार रजनीश बोले, ‘’यार सुखराज, अपन तो ऊब गये है यहां रहते-रहते। अपन तो चलें कहीं और। ये कहां की झंझट में पड़े है, रोज खाना खाओ, पानी पीओ, यह करो, वह करो।‘’ सुखराज जी की आंखों में एक चित्र उभर आया।
      ‘’मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया कि कहां चलने की बात कर रहे है। मैंने पूछा, क्‍या कह रहे हो यार? कहां चले अपन?’’

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

दि सॉंग्‍ज ऑफ मारपा—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

महामुद्रा का उत्‍सव—
     तिब्‍बत में काग्‍यु गुरूओं की एक लंबी परंपरा थी। जो सदियों-सदियों से चली आ रही थी: रहस्‍यदर्शी गुरु अपनी गहरी आध्‍यात्‍मिक अनुभूति को अभिव्‍यक्‍त करने के हेतु सहजस्‍फूर्त गीत रचते थे। तिब्‍बती साहित्‍य में इन बौद्ध शिक्षकों को गीत बहुत प्रसिद्ध है। इन गीतों में सत्‍य की अभीप्‍सा, ह्रार्दिक भक्‍ति और विनोद बुद्धि भी झलकती है।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

सात-सात साल का वर्तुल—(ओशो)

एक से सात साल तक--
     बच्‍चा बहुत मासूम होता है, बिलकुल संत जैसा। वह अपनी जननेंद्रियों से खेलता है लेकिन उसे पता नहीं होता कि वह गलत है। वह नैसर्गिक ढ़ंग से जीता है।

यारी मेरी यार की —ओशो ( सुखराज)

(सुख राज का बाल सखा)
      ओशो कम्‍यून के बुद्ध कक्ष में हजारों लोग बैठे है, उस भरी सभा में ओशो कह रहे है, ‘’मेरा बचपन का दोस्‍त सुख राज यहां बैठा हुआ है। हमारी दोस्‍ती इतनी पुरानी है कि उस समय की स्मृति भी अब धुँधली हो गई है। और वह मेरा एकमात्र दोस्‍त है.....मेरे और भी कई दोस्‍त थे लेकिन वे आये और चले गये। लेकिन वह आज भी मेरे साथ है। अविचल क्‍योंकि यह किसी वैचारिक सहमति का सवाल नहीं था। प्रेम का सवाल था। इससे कोई लेना देना ही नहीं था कि मैं क्‍या कहता हूं, क्‍या करता हूं, वह क्‍या करता है, क्‍या कहता है। यह बात ही असंगत है।...सुख राज बड़ा प्‍यारा आदमी है।

दि सांग ऑफ सांगस्--(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

सोलोमन का गीत—(विच इज़ सोलोमनस् )
     गीतों का गीत जो कि सोलोमन का है।
      यहूदियों के धर्मग्रंथ ‘’दि ओल्‍ड टैस्टामैंट’’ या बाइबिल के कुछ विवादास्‍पद पन्‍ने ‘’सोलोमन का गीत’’ बनकर आज भी यहूदी आरे ईसाई धर्म गुरूओं के लिए शर्म और संकोच की वजह बने हुए है।
      गुरु गंभीर धार्मिक संहिता के बीच अचानक लगभग छह गीत ऐसे उभरे है जैसे मजबूत पुराने किले की दीवारों में कहीं लिली का नाजुक गुलाबी ह्रदय खिल उठा हो।

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

दि तवासिन—(ओशो कि प्रिय पुस्‍तकें)

तवासिन—(कहे मंसूर मस्ताना)
     कभी-कभी इंसान की मौत इतनी जिंदा हो जाती है कि उसकी जिंदगी को भी अपनी रोशनी से पुनरुज्जीवित कर देती है। पर्शियन सूफी औलिया अल-हृल्लास मंसूर का नाम दो चीजों के लिए इन्‍सानियत के ज़ेहन में खुद गया है : एक उसकी रूबाइयात और दूसरा उसकी मौत। ‘’अनलहक़’’ का निडर ऐलान करने वाले कई औलिया होंगे लेकिन इस क्रूफ्र के लिए अपने जिस्‍म की बोटी-बोट कटवाने वाला एक ही था: ‘’मंसूर’’ इस खौफनाक, अमानुष मौत की वजह से उसका प्‍यारा वचन ‘’अनलहक़’’ भी दसों दिशाओं में अब तक गूंज रहा है। आदि शंकराचार्य ने भी ‘’अहं ब्रह्मास्‍मि’’  के महावाक्य का उद्घोष किया था लेकिन सहनशील, उदारमना हिंदू धर्म ने उन्‍हें इतनी कठोर सज़ा नहीं दी।

ताओ तेह किंग—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

ताओ तेह किंग—लाओत्‍से

     लाओत्‍से ने जो कहा : वह पच्‍चीस सौ साल पुराना जरूर है। लेकिन, एक अर्थ में यह इतना ही नया है। जितनी सुबह की ओस की बुंदे नयी होती है। नया इसलिए है कि उस पर अब तक प्रयोग नहीं हुआ। नया इसलिए है कि मनुष्‍य की आत्‍मा उस रास्‍ते पर एक कदम भी नहीं चली। रास्‍ता बिलकुल अछूता और कुंआरा है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

दि गार्डन ऑफ दि प्रॉफेट—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

दि गार्डन ऑफ दि प्रॉफेट(खलिल जिब्रान)
      यह छोटी सी खूबसूरत किताब अधिकत: गद्य में लिखी गई है। लेकिन इसके ह्रदय में कविता बह रही है। खलिल जिब्रान का अंतस् उस सौंदर्य लोक में प्रविष्‍ट हुआ है। जहां गद्य और पद्य में बहुत फर्क नहीं होता और विचार भी एक तरह का संगीत हो जाता है।
      यह किताब भी जिब्रान ने उसी अंदाज में लिखी है जैसे उसकी अन्‍य किताबें। अल मुस्‍तफा, एक प्रबुद्ध रहस्‍यदर्शी बहुत यात्राएं कर उसके अपने द्वीप में वापस लौटता है जहां उसका अपना बग़ीचा है। उस बग़ीचे में उसके मां-बाप दफनाये गये है। इसी बग़ीचे में वह पला, बड़ा हुआ।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

अधूरा वाक्‍य भी काम आ सकता है: (कथा यात्रा)

महावीर के जीवन में एक कथा है। एक आदमी चोर था। बहुत ही नामी चोर, इतना शातिर की राजा लाख जतन के भी उसे पकड़ नहीं पाया था। जिस दिन वह चोर मरने लगा उसने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और कहां: मैं एक ही शिक्षा देना चाहता हूं, के ये जो महावीर नाम का आदमी है, तू इसके पास भी कभी मत जाना। अगर तू पास से भी जा रहा हो तो आपने कानों में उँगली डाल लेना पर इसका एक शब्‍द भी तू मत सुनना वरना ये हमारा बना सारा खेल खराब हो जायेगा। ये बहुत ही खतरनाक आदमी है।

विमल कीर्ति निर्देश सूत्र—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

विमल कीर्ति निर्देश सूत्र—(सार बॉयन)

     विमल कीर्ति बुद्ध के वरिष्‍ठ शिष्‍य थे और स्‍वयं बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो चूके थे। उनके द्वारा कथित निर्देश सूत्र महायान बौद्धो के साहित्‍य के कोहिनूर हे। लेकिन इन बहुमूल्‍य सूत्रों की मूल संहिता कहीं भी उपलब्‍ध नहीं है। विमल कीर्ति बुद्ध के समय थे (500-600 ईसा पूर्व) लेकिन लगभग पाँच सौ वर्षों तक उनके सूत्रों का कोई अता-पता नहीं था। वह तो नागार्जुन ने ईसा पूर्व पहली सदी या पहली शताब्‍दी ईसवी के बीच महायान परंपरा के ग्रंथ खोज निकाले। उन्‍हीं में से एक थे विमल कीर्ति निर्देश सूत्र। ये सूत्र सात बार चीनी भाषा में अनुवादित हुए, फिर तिब्‍बती भाषा में अनुवादित हुए लेकिन मूल संस्‍कृत सूत्र खो गये। हमारे हाथों में उनका सिर्फ अनुवाद आया है।