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मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--3)--प्रवचन--43

परिवर्तन से परिवर्तन को विसर्जित करो—(प्रवचन—तीरालीसवां)

सार सूत्र:
66—मित्र और अजनबी के प्रति, मान और अपमान में,
      असमता के बीच समभाव रखो।
67—यह जगत परिवर्तन का है, परिवर्तन ही परिवर्तन
      का है। परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।
नारथ्रोप ने कहीं कहा है कि पश्चिमी चित्त अस्तित्व के सैद्धांतिक पक्ष की खोज में लगा रहा है; वह कार्य—कारण की कड़ी ढूंढता रहा है। वह खोजता रहा है कि कैसे चीजें घटित होती हैं, उसका कारण क्या है, कारण को नियंत्रित कैसे किया जाए और कैसे मनुष्य प्रकृति को अपने मनोनुकूल व्यवस्थित कर अपने काम में लाए।
और नारथोप ने कहा है कि पूर्वीय चित्त एक दूसरे ही अभियान में संलग्न रहा है, वह सत्य के सौंदर्य पक्ष की खोज करता रहा है; सैद्धांतिक नहीं, सौंदर्य पक्ष की खोज में लगा रहा है।
पूर्वीय चित्त ने इस बात की ज्यादा फिक्र नहीं की है कि कैसे वह प्रकृति को अपने अनुकूल चला सके, उसका शोषण कर सके। लेकिन वह इस बात में जरूर उत्सुक रहा है कि कैसे प्रकृति के साथ एक हुआ जाए। वह उसे जीतने में उत्सुक नहीं रहा है, उससे गहन मैत्री बनाने में, उसका घनिष्ठ भागीदार बनने में उत्सुक रहा है। पश्चिमी चित्त प्रकृति के साथ द्वंद्व में, संघर्ष में उलझा रहा है; पूर्वीय चित्त उसकी रहस्यमयता में उतरने और उसके साथ प्रेम—संबंध में डूबने में संलग्न रहा है।
मैं नहीं जानता कि नारथ्रोप मेरे साथ सहमत होगा या नहीं; लेकिन मेरा खयाल है कि विज्ञान प्रकृति के साथ एक घृणा का संबंध बनाए है, इसलिए वह संघर्ष, युद्ध और विजय की भाषा में बात करता है। धर्म तो प्रकृति के साथ प्रेम—संबंध है; उसमें द्वंद्व कहां? संघर्ष कहा?
दूसरे ढंग से देखा जाए तो विज्ञान पुरुष की दृष्टि है और धर्म स्त्री की दृष्टि है। विज्ञान आक्रामक है, धर्म अनाक्रामक है। पूर्वीय चित्त धार्मिक है। या अगर तुम मुझे इजाजत दो तो मैं कहूंगा कि जहां भी धार्मिक चित्त है, वह पूर्वीय है; वैज्ञानिक चित्त पश्चिमी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई आदमी पूरब में पैदा हुआ है या पश्चिम में।
मैं पूरब और पश्चिम का उपयोग दो दृष्टियों की भांति, दो रुझानों की भांति करता हूं; वे मेरे लिए कोई भौगोलिक स्थान नहीं हैं। पश्चिम में पैदा होकर भी तुम पश्चिम के न होकर पूरे के पूरे पूर्वीय हो सकते हो। और पूरब में जन्म लेकर भी तुम्हारा रुझान वैज्ञानिक हो सकता है, तुम चीजों को गणित और बुद्धि की दृष्टि से देख सकते हो।
तंत्र बिलकुल पूर्वाय है। तंत्र सत्य में भागीदार होने का एक ढंग है। तंत्र सत्य के साथ एक होने की, सीमाएं गिरा देने की, अभेद के जगत में गति करने की कीमिया है। मन भेद करता है, सीमाएं बनाता है; मन परिभाषा करता है, क्योंकि मन परिभाषा के बिना, सीमा के बिना नहीं रह सकता। सीमाएं जितनी सुस्पष्ट होंगी, मन के लिए काम करना उतना ही आसान होगा। मन सब कुछ को तोड़ता है, बांटता है, टुकड़े—टुकड़े करता है।
धर्म सीमाओं को विलीन करता है, ताकि उस अभेद में प्रवेश हो सके जहां कोई परिभाषा नहीं है, जहां किसी चीज की कोई सीमा नहीं है, जहां हर एक चीज दूसरी चीज में प्रवेश कर जाती है, जहां हर एक चीज साथ—साथ दूसरी चीज भी है। तुम काट नहीं सकते, अस्तित्व की काट—पीट नहीं हो सकती।
यह अनिवार्य है कि विज्ञान और धर्म के देखने के जो अलग—अलग ढंग हैं, उनके परिणाम भी अलग हों। वैज्ञानिक ढंग से, काट—पीट के रास्ते से तुम मृत अणु—परमाणुओं पर पहुंच जाओगे, क्योंकि जीवन कुछ ऐसा है कि उसे खंडों में नहीं तोड़ा जा सकता। और जैसे ही तुम तोड़ते हो, जीवन विदा हो जाता है। यह ऐसा ही है जैसे कोई संगीत को समझने के लिए एक—एक स्वर को अलग—अलग समझने की चेष्टा करे। अकेला स्वर भी संगीत का अंग है, लेकिन वह संगीत नहीं है। अनेक स्वरों के एक—दूसरे में घुलने से संगीत पैदा होता है। तुम स्वरों को समझकर संगीत नहीं समझ सकते हो। मैं तुम्हें तुम्हारे अंगों के अध्ययन के द्वारा नहीं समझ सकता। क्योंकि तुम अंगों का जोड़ भर नहीं हो, तुम उस जोड़ से बहुत ज्यादा हो। जब तुम बांटते हो, तोड़ते हो, तो जीवन विदा हो जाता है, सिर्फ मुर्दा अंग बचते हैं।
यही कारण है कि विज्ञान कभी जीवन को जानने में समर्थ नहीं होगा। और विज्ञान के द्वारा जो भी जाना जाएगा, वह मृत्यु के संबंध में होगा, पदार्थ के संबंध में होगा; वह ज्ञान जीवन का ज्ञान कभी नहीं हो सकता। विज्ञान जीवन के अंगों को, मृत अंगों को जान सकता है; वह किसी ढंग से जीवन को व्यवस्थित कर उसका उपयोग भी कर सकता है; लेकिन उसके बावजूद जीवन अनजाना रह जाएगा; अछूता रह जाएगा। विज्ञान के लिए जीवन अज्ञेय रह जाता है, उसकी पद्धति उसका ढंग ही ऐसा है कि वह जीवन को नहीं जान सकेगा। और यही कारण है कि विज्ञान पदार्थ के अतिरिक्त सब कुछ को इनकार करता है। उसकी दृष्टि ही ऐसी है, उसका ढंग ही ऐसा है कि जीवन के संपर्क से वह वंचित रह जाता है।
और धर्म में ठीक विपरीत घटित होता है। अगर तुम धर्म में गहरे उतरोगे तो पदार्थ को इनकार करने लगोगे। शंकर कहते हैं कि पदार्थ मिथ्या है, भांति है। वह है नहीं, सिर्फ भासता है। पूरब की पूरी दृष्टि संसार को, पदार्थ को इनकार करती है। क्यों? विज्ञान जीवन को, भगवत्ता को, चैतन्य को अस्वीकार करता है। गहन धार्मिक अनुभव पदार्थ को अस्वीकार करता है। क्यों?
अपनी—अपनी दृष्टि के कारण वे ऐसा करते हैं। अगर तुम जीवन को अभेद की दृष्टि से देखते हो तो पदार्थ खो जाता है। विभाजित जीवन, भेद की दृष्टि से देखा गया जीवन पदार्थ है। पदार्थ का अर्थ है वह जीवन जिसकी परिभाषा हो गई, जिसका खंड—खंड विश्लेषण हो गया। अगर तुम सच ही जीवन को अभेद की दृष्टि से देखते हो, उसके हिस्से हो जाते हो,
उसमें घनिष्ठ भागीदार होते हो, उसके साथ ऐसे एक हो जाते हो जैसे दो प्रेमी एक हो जाते हैं, तो पदार्थ विलीन हो जाता है।
इसीलिए शंकर कहते हैं कि पदार्थ माया है। अगर तुम अस्तित्व के अंग बनते हो तो शंकर की बात सच है। लेकिन मार्क्स कहता है कि चेतना केवल बाइ—प्रॉडक्ट है; वह वास्तविक नहीं है, पदार्थ की ही उप—उत्पत्ति है। जब तुम जीवन को विभाजित करते हो तो चेतना खो जाती है, भ्रांति हो जाती है, तब पदार्थ ही बचता है।
मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि अस्तित्व एक है। अगर तुम विश्लेषण की राह से उसके पास पहुंचते हो तो वह पदार्थ मालूम पड़ता है; मृत मालूम पड़ता है; और अगर तुम मित्रता के भाव से उसके पास पहुंचते हो तो वह जीवन मालूम पड़ता है, दिव्य और चैतन्य मालूम पड़ता है। अगर तुम विज्ञान के द्वारा अस्तित्व के पास पहुंचते हो तो तुम्हारे लिए किसी गहन आनंद की संभावना नहीं है। मृत पदार्थ के साथ आनंद असंभव है, पदार्थ से ज्यादा से ज्यादा आनंद की भ्रांति मिल सकती है। सिर्फ गहन मित्रता से, प्रेम से आनंद संभव है।
तंत्र प्रेम की विधि है; यह तुम्हें अस्तित्व के साथ जोड्ने का एक प्रयत्न है। इसलिए इसमें प्रवेश करने के पहले तुम्हें बहुत कुछ छोड़ना होगा। तुम्हें अपनी विश्लेषण करने की आदत को छोड़ना होगा; तुम्हें अपनी लड़ने की प्रवृत्ति को, जीत की भाषा में सोचने की आदत को छोड़ना होगा।
जब हिलेरी हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर, एवरेस्ट पर पहुंचा तो पूरे पश्चिम में इस घटना को विजय की, एवरेस्ट पर विजय की संज्ञा दी गई। सिर्फ जापान के एक झेन मंदिर के दीवार—पत्र पर यह लिखा गया कि 'एवरेस्ट के साथ मैत्री हुई।उसने इसे विजय नहीं कहा। यही फर्क है। अब एवरेस्ट के साथ मनुष्यता की मैत्री सध गई; एवरेस्ट ने हिलेरी को अपने पास आने दिया। इसमें कोई जीतने की बात नहीं थी।जीत' शब्द ही गंदा है, हिंसक है। जीत की भाषा में सोचना आक्रामकता का लक्षण है। एवरेस्ट ने हिलेरी का स्वागत किया! अब उससे मनुष्यता की मैत्री सध गई; अब कोई फासला न रहा, दुराव न रहा। अब हम अजनबी न रहे; हममें से एक को एवरेस्ट ने पास बुला लिया, अब एवरेस्ट मनुष्य की चेतना का भाग बन गया।
यह सेतु बनाना है। तब पूरी बात बिलकुल भिन्न हो जाती है। यह तुम पर निर्भर है कि तुम इसे किस दृष्टि से देखते हो। विधियों में प्रवेश के पूर्व यह स्मरण रखना बहुत जरूरी है। स्मरण रहे, तंत्र अस्तित्व के प्रति एक प्रेमपूर्ण प्रयास है। यही वजह है कि तंत्र में काम—शक्ति का इतना अधिक उपयोग किया गया है। तंत्र एक प्रेम—विधि है। और यह स्त्री—पुरुष का ही प्रेम नहीं है, यह तुम्हारे और अस्तित्व के बीच प्रेम है। पहली दफा अस्तित्व एक नारी के माध्यम से तुम्हारे लिए अर्थपूर्ण हो जाता है। अगर तुम स्त्री हो तो पहली दफा अस्तित्व तुम्हारे लिए एक पुरुष के माध्यम से अर्थपूर्ण हो जाता है। इसीलिए तंत्र में काम की इतनी चर्चा की गई है, उसका इतना उपयोग किया गया है।
कल्पना करो कि तुम सर्वथा काम—रहित हो; कल्पना करो कि जन्म के दिन ही तुमसे तुम्हारी सब कामवासना हटा ली गई। जरा सोचो कि जिस दिन तुम पैदा हुए, तुमसे तुम्हारी सब कामवासना छीन ली गई।
तुम प्रेम करने में असमर्थ हो जाओगे; तुम किसी के प्रति कोई लगाव, कोई घनिष्ठता, कोई आकर्षण नहीं अनुभव करोगे। तुम्हारे लिए अपने से बाहर निकलना ही मुश्किल होगा। तुम अपने भीतर ही बंद रहोगे। तुम किसी के पास भी नहीं जाओगे, किसी से मिलोगे भी नहीं। अस्तित्व में तुम सब तरफ से बंद बस एक मुर्दा बने रहोगे।
काम—ऊर्जा के जरिए तुम दूसरे से जुड़ते हो। तुम अपने से बाहर जाते हो; कोई दूसरा तुम्हारा केंद्र बनता है। तुम अपने अहंकार को पीछे छोड़ देते हो; तुम किसी से मिलने के लिए अपने अहंकार से अलग होते हो। अगर तुम सच ही किसी से मिलना चाहते हो तो तुम्हें समर्पण करना होगा, वैसे ही अगर दूसरा भी तुमसे मिलना चाहता है तो उसे भी अपने से बाहर आना होगा। प्रेम का चमत्कार तो देखो! देखो कि प्रेम में क्या अदभुत घटता है। वह तुम तक आता है और तुम उस तक जाते हो। तुम उसमें उतर जाते हो और वह तुम में समा जाता है। तुमने अपनी—अपनी जगह बदल ली; अब वह तुम्हारी आत्मा बन जाता है और तुम उसकी आत्मा बन जाते हो। यही साहचर्य है, यही मिलन है। अब तुम दोनों एक वर्तुल बन गए।
यह पहला मिलन है जहां तुम अपने अहंकार में बंद नहीं हो। और यह मिलन ब्रह्मांड के साथ, अस्तित्व के साथ, सत्य के साथ वृहत मिलन का द्वार बन सकता है।
तंत्र बुद्धि पर नहीं, हृदय पर आधारित है। यह कोई बौद्धिक प्रयत्न नहीं है, यह भावुक प्रयत्न है। इसे स्मरण रखो, क्योंकि इससे विधियों को समझने में मदद मिलेगी। अब हम विधियों में प्रवेश करेंगे।

 पहली विधि:

मित्र और अजनबी के प्रति मान और अपमान में असमता के बीच समभाव रखो।

असमता के बीच समभाव रखो', यह आधार है। तुम्हारे भीतर क्या घटित हो रहा है? दो चीजें घटित हो रही हैं। तुम्हारे भीतर कोई चीज निरंतर वैसी ही रहती है; वह कभी नहीं बदलती। शायद तुमने इसका निरीक्षण न किया हो; शायद तुमने अभी इसका साक्षात्कार न किया हो। लेकिन अगर निरीक्षण करोगे तो जानोगे कि तुम्हारे भीतर कुछ है जो निरंतर वही का वही रहता है। उसी के कारण तुम्हारा एक व्यक्तित्व होता है। उसी के कारण तुम अपने को केंद्रित अनुभव करते हो; अन्यथा तुम एक अराजकता हो जाओगे।
तुम कहते हो : 'मेरा बचपन।अब इस बचपन का क्या बच रहा है? यह कौन है जो कहता है. 'मेरा बचपन'। यह 'मेरा', 'मुझे', 'मैं' कौन है! तुम्हारे बचपन का तो कुछ भी शेष नहीं बचा है। यदि तुम्हारे बचपन के चित्र तुम्हें पहली दफा दिखाए जाएं तो तुम उन्हें पहचान भी नहीं सकोगे। सब कुछ इतना बदल गया है। तुम्हारा शरीर अब वही नहीं है; उसकी एक कोशिका भी वही नहीं है।
शरीर—शास्त्री कहते हैं कि शरीर एक प्रवाह है—सरित—प्रवाह। प्रत्येक क्षण अनेक पुरानी कोशिकाएं मर रही हैं और अनेक नई कोशिकाएं बन रही हैं। सात वर्षों के भीतर तुम्हारा शरीर बिलकुल बदल जाता है। अगर तुम सत्तर साल जीने वाले हो तो इस बीच तुम्हारा शरीर दस बार बदल जाएगा, पूरा का पूरा बदल जाएगा। प्रत्येक क्षण तुम्हारा शरीर बदल रहा है। और तुम्हारा मन भी बदल रहा है। जैसे तुम अपने बचपन के शरीर का चित्र नहीं
पहचान सकते हो वैसे ही यदि तुम्हारे बचपन के मन का चित्र बनाना संभव हो तो तुम उसे भी नहीं पहचान पाओगे। तुम्हारा मन तो तुम्हारे शरीर से भी ज्यादा प्रवाहमान है। हर एक क्षण हर एक चीज बदल जाती है। एक क्षण के लिए भी कुछ स्थाई नहीं है, ठहरा हुआ नहीं है। मन के तल पर सुबह तुम कुछ थे; शाम तुम बिलकुल ही भिन्न व्यक्ति हो जाते हो।
 जब भी कोई व्यक्ति बुद्ध से मिलने आता था तो उसके विदा होते समय बुद्ध उससे कहते थे 'स्मरण रहे, जो आदमी मुझसे मिलने आया था वही आदमी वापस नहीं जा रहा है। तुम अब बिलकुल भिन्न आदमी हो। तुम्हारा मन बदल गया है।
बुद्ध जैसे व्यक्ति से मिलकर तुम्हारा मन वही नहीं रह सकता, उसकी बदलाहट अनिवार्य है—वह बदलाहट चाहे भले के लिए हो या बुरे के लिए। तुम एक मन लेकर वहा गए थे; तुम भिन्न ही मन लेकर वहां से वापस आओगे। कुछ बदल गया है। कुछ नया उसमें जुड़ गया है, कुछ पुराना उससे अलग हो गया है।
और अगर तुम किसी से नहीं भी मिलते हो, बस अपने साथ अकेले रहते हो, तो भी तुम वही नहीं रह सकते। पल—पल नदी बह रही है। हेराक्लाइटस ने कहा है कि तुम एक ही नदी में दो बार नहीं प्रवेश कर सकते हो। यही बात मनुष्य के संबंध में कही जा सकती है. तुम एक ही मनुष्य से दो बार नहीं मिल सकते। असंभव है यह। और इसी तथ्य के कारण—और इसके प्रति हमारे अज्ञान के कारण—हमारा जीवन संताप बन जाता है। क्योंकि तुम्हारी अपेक्षा रहती है कि दूसरा सदा वही रहेगा।
तुम किसी लड़की से विवाह करते हो और अपेक्षा करते हो कि वह सदा वही रहेगी। वह वही नहीं रह सकती; अविवाहित थी तो एक बात थी; विवाहित होने पर बात बिलकुल दूसरी हो गई। प्रेमी और चीज है; पति उससे बिलकुल भिन्न चीज है। तुम पति में प्रेमी को नहीं पा सकते; यह असंभव है। प्रेमी प्रेमी है, पति पति है। प्रेमी जिस क्षण पति बनता है, सब कुछ बदल जाता है। लेकिन तुम अपेक्षा किए जाते हो। उससे ही दुख पैदा होता है, अनावश्यक दुख पैदा होता है।
अगर हम इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि मन सतत गतिमान है और बदलता रहता है तो हम अनायास बहुत से दुखों में पड़ने से बच जाएंगे। तुम्हें बस इस बोध की जरूरत है कि मन परिवर्तनशील है। अगर आज कोई तुम्हें प्रेम देता है तो तुम्हें अपेक्षा रहती है कि वह सदा तुम्हें प्रेम करेगा। लेकिन अगले क्षण वह तुम्हें घृणा करता है, और तुम बेचैन हो जाते हो। यह बेचैनी घृणा के कारण नहीं पैदा हुई है, यह पैदा हुई है तुम्हारी प्रेम की अपेक्षा के कारण। वह आदमी बदल गया। और अगर वह जीवित है तो बदलाहट अनिवार्य है।
लेकिन अगर तुम यथार्थ को वैसा ही देखो जैसा वह है तो बेचैनी का कोई कारण नहीं है। जो व्यक्ति एक क्षण पहले प्रेम करता था वह अगले क्षण घृणा भी कर सकता है। लेकिन जरा रुको; अगले क्षण वह फिर प्रेम कर सकता है। जल्दबाजी मत करो, धैर्य रखो। और अगर दूसरा व्यक्ति भी इस परिवर्तन की प्रक्रिया को देख सके तो वह भी बदलाहट से लड़ना छोड़ देगा। बदलाहट होती है, यह स्वाभाविक है।
तुम अपने शरीर को देखो, वह बदल रहा है। तुम अपने मन को समझो, वह भी बदल रहा है। कुछ भी वही का वही नहीं रहता है। यहां तक कि लगातार दो क्षणों के लिए भी कुछ एक सा नहीं रहता है। तुम्हारा व्यक्तित्व धारा की भांति गतिमान है। अगर यही सब कुछ है, और कुछ भी ठहरा हुआ, नित्य और शाश्वत नहीं है, तो कौन स्मरण रखेगा कि यह मेरा बचपन था? बचपन गया, शरीर बदल गया, मन भी बदल गया। तब किसे स्मरण रहता है? कौन है जो बचपन, जवानी और बुढ़ापे को याद रखता है? यह कौन है जो जानता है?
इस जानने वाले को सदा वही रहना चाहिए; इस साक्षी को सदा वही रहना चाहिए। केवल तभी साक्षी को एक परिप्रेक्ष्य हो सकता है; तो ही साक्षी कह सकता है कि यह मेरा बचपन था, यह जवानी थी, यह बुढ़ापा था। तो ही वह कह सकता है कि इस घड़ी में मैं प्रेमपूर्ण था और अगले क्षण मेरा प्रेम घृणा में बदल गया। यह साक्षी चैतन्य, यह जानने वाला सदा वही रहता है।
तो तुममें दो तत्व या दो आयाम साथ—साथ हैं। तुम दोनों हों—परिवर्तनशील भी जो सदा बदलता रहता है, और अपरिवर्तनशील भी जो कभी नहीं बदलता है। और अगर तुम इन दोनों आयामों के प्रति बोधपूर्ण हो जाओ तो यह विधि उपयोगी हो जाएगी।
'असमता के बीच समभाव रखो।
इसे स्मरण रखो, बदलाहट के बीच कुछ वही का वही रहता है तुम परिधि पर वही नहीं रह सकते, लेकिन केंद्र पर वही रहते हो। तो उसे स्मरण रखो जो कभी नहीं बदलता है। स्मरण रखना ही पर्याप्त है, तुम्हें और कुछ करने की जरूरत नहीं है। वह सनातन है, शाश्वत है। तुम उसे बदल नहीं सकते, लेकिन उसे भूल सकते हो। तुम अपने चारों ओर के जगत में इतने तल्लीन हो सकते हो, शरीर और मन में इतने ग्रस्त हो सकते हो, कि केंद्र को बिलकुल भूल ही जाओ। यह केंद्र बदलाहट के बादलों से इस तरह आच्छादित है—और निश्चित ही उसे याद रखना कठिन है जो सदा वही रहता है, क्योंकि उससे तो कोई समस्या होती नहीं; समस्याएं तो बदलाहट से ही पैदा होती हैं।
उदाहरण के लिए, अगर तुम्हारे आस—पास सतत कोई आवाज होती रहे तो तुम उसके प्रति सजग नहीं रहोगे। दीवार घड़ी दिन भर टिक—टिक करती रहती है, और तुम्हें कभी उसका बोध नहीं होता। लेकिन अगर वह अचानक बंद हो जाए तो तुरंत तुम्हारा ध्यान उधर जाता है। जब कोई चीज सदा एक जैसी ही रहती है तो उसकी खबर लेने की जरूरत नहीं रहती, बदलाहट की हालत में मन खबर लेता है। बदलाहट से अंतराल पैदा होता है; सातत्य टूटता है। तुम उसे सदा से सुन रहे थे, इसलिए अलग से सुनने की जरूरत नहीं थी; वह आवाज परिवेश का हिस्सा बन गई थी। लेकिन अब अगर वह घड़ी बंद हो जाए तो तुम्हें उसका बोध होगा; अचानक चेतना अंतराल पर जाएगी।
यह ऐसा ही है जैसे जब तुम्हारा कोई दात टूट जाता है तो जीभ निरंतर उसी टूटे दात के रिक्त स्थान पर जाती है। जब तक दात था, जीभ ने कभी उसकी खबर नहीं ली। अब दात नहीं है; उसकी खाली जगह भर है। और अब सारा दिन तुम्हारे रोकने के बावजूद जीभ उसी खाली जगह पर जाती है। क्यों? क्योंकि कोई चीज अब नहीं है जो वहा थी; कुछ बदल गया, कुछ नया प्रवेश कर गया।
जब भी कुछ नया प्रवेश करता है, तुम सजग हो जाते हो। उसके कई कारण हैं। यह एक सुरक्षा—व्यवस्था है, यह तुम्हारे जीवन के लिए, जीवित रहने के लिए जरूरी है। जब कोई चीज बदलती है तो तुम्हें उसके प्रति सजग हो जाना पड़ता है। क्योंकि बदलाहट खतरनाक हो सकती है; तुम्हें उसकी फिक्र करनी होगी। और तुम्हें नई स्थिति के साथ फिर समायोजन करना पड़ेगा।
लेकिन अगर कोई चीज वैसी ही रहे जैसी थी तो उसके प्रति सजग होने की जरूरत नहीं पडती। और यह नित्य तत्व, जिसे हिंदू आत्मा कहते हैं, आरंभ से ही—अगर कोई आरंभ है—तुम्हारे साथ है। और यह आत्मा अंत तक साथ रहने वाली है—अगर कोई अंत कभी होगा। वह सदा से, सनातन से अपरिवर्तित है; इसलिए तुम उसके प्रति सजग कैसे हो सकते हो? चूंकि यह नित्य है, शाश्वत है, सदा सर्वदा वही है, इसीलिए तुम उसे चूक रहे हो।
तुम शरीर की खबर लेते हो, तुम मन की खबर लेते हो, क्योंकि वे बदलते रहते हैं। और क्योंकि तुम उन पर ध्यान देते हो, इसलिए तुम सोचने लगते हो कि मैं शरीर हूं कि मैं मन हूं। तुम उन्हें ही जानते हो, इसलिए उनके साथ तादात्म्य कर लेते हो।
समस्त आध्यात्मिक साधना अनित्य के बीच नित्य की खोज है, परिवर्तन के बीच शाश्वत की खोज है, उसकी खोज है जो सदा—सर्वदा वही रहता है। वही तुम्हारा केंद्र है। और अगर तुम उस केंद्र को स्मरण रख सको तो यह विधि बहुत आसान है। या अगर तुम इस विधि को साध सको तो उसका स्मरण आसान हो जाएगा। दोनों छोरों से यात्रा हो सकती है।
इस विधि का प्रयोग करो। यह विधि कहती है : 'मित्र और अजनबी के प्रति, असमता के बीच समभाव रखो।
मित्र और शत्रु या अजनबी के प्रति असमानता में भी समभाव रखो। क्या अर्थ है इसका? यह विरोधाभासी मालूम पड़ता है। एक तरह से तो तुम्हें बदलना होगा, क्योंकि अगर तुम्हारा मित्र मिलने आता है तो उससे भिन्न ढंग से मिलना होगा, और अगर शत्रु मिलने आता है तो भिन्न ढंग से मिलना होगा। किसी अजनबी से तुम इस तरह कैसे मिल सकते हो जैसे कि तुम उसे जानते हो! ऐसा तुम नहीं कर सकते; फर्क तो रहेगा। लेकिन गहरे में समान बने रहो, समभाव रखो। व्यवहार में असमानता होगी, लेकिन भाव समान रहना चाहिए।
तुम किसी अनजान व्यक्ति से इस तरह नहीं मिल सकते जैसे कि तुम उसे पहले से जानते हो। तुम ज्यादा से ज्यादा दिखावा कर सकते हो, लेकिन दिखावे से काम नहीं चलेगा। फर्क तो रहेगा। मित्र के साथ दिखावा जरूरी नहीं है कि वह मित्र है। और अजनबी के साथ अगर तुम दिखावा भी करते हो कि वह मित्र है तो भी वह दिखावा ही होगा। कुछ नया ही होगा। तुम समान नहीं रह सकते, कुछ असमानता जरूरी रहेगी।
जहां तक आचरण का, व्यवहार का संबंध है, तुम भिन्न होगे; लेकिन जहां तक चेतना का संबंध है, तुम वही बने रह सकते हो, तुम मित्र और अजनबी को समभाव से देख सकते हो। तुम मित्र को वैसे ही देख सकते हो जैसे अजनबी को, अपरिचित को देखते हो।
यह कठिन है। तुमने सुना होगा कि अजनबी को वैसे ही देखो जैसे कि वह मित्र हो। लेकिन वह संभव नहीं है, अगर मैं जो कह रहा हूं वह संभव नहीं है। पहले अपने मित्र को अजनबी की भांति देखो, तो ही तुम अजनबी को मित्र की भांति देख सकते हो। दोनों एक—दूसरे से जुड़े हैं।
क्या तुमने कभी अपने मित्र को इस भांति देखा है जैसे कि वह अजनबी हो? अगर
तुमने अपने मित्र को अजनबी की भांति नहीं देखा है तो तुमने देखा ही नहीं है। अपनी पत्नी को देखो, क्या तुम सच ही उसको जानते हो? हो सकता तुम उसके साथ बीस वर्षो से, या उससे भी ज्यादा समय से रह रहे हो, लेकिन वह अजनबी ही रहती है। तुम जितना ज्यादा उसके साथ रहते हो उतनी ही संभावना है कि तुम भूल जाओ कि वह अजनबी है; लेकिन वह अपरिचित ही रहती है। तुम उसे कितना ही प्रेम करो, उससे फर्क नहीं पड़ता।
सच तो यह है कि तुम उसे जितना ज्यादा प्रेम करोगे वह उतनी ही रहस्यमय मालूम पड़ेगी। कारण यह है कि तुम उसे जितना ज्यादा प्रेम करोगे, तुम उतने ही अधिक गहरे उसमें प्रवेश करोगे और तुम्हें मालूम पड़ेगा कि वह कितनी नदी जैसी प्रवाहमान है, परिवर्तनशील है, जीवंत है और प्रतिपल नई और भिन्न है।
अगर तुम गहरे नहीं देखते हो, अगर तुम इसी तल से बंधे हो कि वह तुम्हारी पत्नी है, कि उसका यह नाम है, तो तुमने एक हिस्से को पकड़ लिया है, और उस हिस्से को तुम अपनी पत्नी की भांति देखते रहते हो। और तब जब भी तुम्हारी पत्नी में कुछ बदलाहट होगी, वह उस बदलाहट को तुमसे छिपाएगी। जब वह प्रेमपूर्ण नहीं होगी तब भी तुमसे प्रेम का अभिनय करेगी, क्योंकि तुम्हें उससे प्रेम की अपेक्षा है। और तब सब कुछ नकली और झूठ हो जाता है। क्योंकि उसे बदलने की इजाजत नहीं है; उसे स्वयं होने की इजाजत नहीं है। कुछ ऊपर से लादा जा रहा है। और तब सारा संबंध मुर्दा हो जाता है।
तुम जितना ही प्रेम करोगे, उतना ही परिवर्तन का पहलू दिखाई देगा। तब तुम प्रत्येक क्षण अजनबी हो; तब तुम भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि तुम्हारा पति कल सुबह कैसा व्यवहार करेगा। भविष्यवाणी तो तभी हो सकती है यदि तुम्हारा पति मुर्दा हो; तब तुम भविष्यवाणी कर सकती हो। केवल वस्तुओं के संबंध में भविष्यवाणी हो सकती है; व्यक्तियों के संबंध में भविष्यवाणी नहीं हो सकती। अगर किसी व्यक्ति के संबंध में भविष्यवाणी की जा सके तो जान लो कि वह मुर्दा है, वह मर चुका है। उसका जीवित होना झूठ है, इसीलिए उसके बारे में भविष्यवाणी हो सकती है। व्यक्तियों के संबंध में कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती, क्योंकि बदलाहट संभव है।
अपने मित्र को अजनबी की भांति देखो, वह अजनबी ही है। और डरो मत। हम अजनबी से डरते हैं, इसलिए हम भूल जाते हैं कि मित्र भी अजनबी है। अगर तुम अपने मित्र में भी अजनबी को देख सको तो तुम्हें कभी निराशा नहीं होगी, क्योंकि अजनबी से तुम्हें अपेक्षा नहीं होती है। मित्र के संबंध में तुम सदा निश्चित होते हो कि तुम उससे जो कुछ चाहोगे वह पूरा करेगा; इससे ही अपेक्षा पैदा होती है और निराशा हाथ लगती है। क्योंकि कोई व्यक्ति तुम्हारी अपेक्षाओं को नहीं पूरा कर सकता है; कोई यहां तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं है। सब यहां अपनी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए हैं, कोई तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करने के लिए नहीं है। लेकिन तुम्हें अपेक्षा है कि दूसरे तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करें, और दूसरों को अपेक्षा है कि तुम उनकी अपेक्षाएं पूरी करो। और तब कलह है, संघर्ष है, हिंसा है और दुख है।
अजनबी को सदा स्मरण रखो। मत भूलो कि तुम्हारा घनिष्ठतम मित्र भी अजनबी है; दूर से भी दूर है। अगर यह भाव, यह ज्ञान घटित हो जाए तो फिर तुम अजनबी में भी मित्र को देख सकते हो। यदि मित्र अजनबी हो सकता है तो अजनबी भी मित्र हो सकता है।
किसी अजनबी को देखो; उसे तुम्हारी भाषा नहीं आती है, वह तुम्हारे देश का नहीं है, तुम्हारे धर्म का नहीं है, तुम्हारे रंग का नहीं है। तुम गोरे हो और वह काला है। या तुम काले हो और वह गोरा है। भाषा के जरिए तुम्हारे और उसके बीच कोई संवाद संभव नहीं है। तुम्‍हारे और उसके पूजा—स्थल भी एक नहीं हैं। राष्ट्र, धर्म, जाति, वर्ण, रंग—कहीं भी कोई समान भूमि नहीं है, वह बिलकुल अजनबी है। लेकिन उसकी आंखों में झांको, वहां एक ही मनुष्यता मिलेगी; वह समान भूमि है। उसके भीतर वही जीवन है जो तुममें है, वह समान भूमि है। और अस्तित्व भी वही है, वह तुम दोनों के मित्र होने का आधार है। तुम उसकी भाषा भले ही न समझो, लेकिन उसको तो समझ सकते हो। मौन से भी संवाद घटित होता है। उसकी आंखों में गहरे झांकने भर से मित्र प्रकट हो सकता है।
और अगर तुम गहरे देखना जान लो तो शत्रु भी तुम्हें धोखा नहीं दे सकता; तुम उसके भीतर मित्र को देख लोगे। वह यह नहीं सिद्ध कर सकता कि वह तुम्हारा मित्र नहीं है। वह तुमसे कितना ही दूर हो, तुम्हारे पास ही है; क्योंकि तुम उसी अस्तित्व की धारा में हो, उसी नदी में हो, जिसमें वह है। तुम दोनों अस्तित्व के तल पर एक ही जमीन पर खड़े हो।
और अगर यह भाव प्रगाढ़ हो तो एक वृक्ष भी तुमसे बहुत दूर नहीं है, तब एक पत्थर भी बहुत अलग नहीं है। एक पत्थर कितना अजनबी है! उसके साथ तुम्हारा कोई तालमेल नहीं है; उसके साथ संवाद की कोई संभावना नहीं है। लेकिन वहा भी वही अस्तित्व है; पत्थर का भी अस्तित्व है, वह भी अस्तित्व का अंश है। वह भी होने के जगत में भागीदार है। वह है। उसमें भी जीवन है। वह भी स्थान घेरता है; वह भी समय में जीता है। सूरज उसके लिए भी उगता है, जैसे तुम्हारे लिए उगता है। एक दिन वह नहीं था, जैसे तुम नहीं थे। और एक दिन जैसे तुम मर जाओगे, वह भी मर जाएगा; पत्थर भी एक दिन विदा हो जाएगा।
अस्तित्व में हम मिलते हैं; यह मिलन ही मित्रता है। व्यक्तित्व में हम भिन्न हैं, अभिव्यक्ति में हम भिन्न हैं; लेकिन तत्वत: हम एक ही हैं। अभिव्यक्ति में, रूप में हम अजनबी हैं; उस तल पर हम एक—दूसरे के कितने ही करीब आएं, लेकिन दूर ही रहेंगे। तुम पास—पास बैठ सकते हो, एक—दूसरे को आलिंगन में ले सकते हो; लेकिन इससे ज्यादा निकट आने की संभावना नहीं है। जहां तक तुम्हारे बदलते व्यक्तित्व का संबंध है, तुम एक नहीं हो सकते हो। तुम कभी समान नहीं हो सकते हो, तुम सदा भिन्न हो, अजनबी हो। उस तल पर तुम नहीं मिल सकते, क्योंकि मिलने के पहले ही तुम बदल जाते हो। मिलन की कोई संभावना नहीं है। जहां तक शरीर का संबंध है, मन का संबंध है, मिलन संभव नहीं है। क्योंकि इसके पहले कि तुम मिलो तुम वही नहीं रहते।
क्या तुमने कभी खयाल किया है कि तुम्हें किसी के प्रति प्रेम उमगता है, गहन प्रेम, तुम उस प्रेम से भर जाते हो; लेकिन जैसे ही तुम जाते हो और कहते हो कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूं वह प्रेम विलीन हो जाता है! क्या तुमने निरीक्षण किया है कि वह प्रेम अब नहीं रहा, उसकी स्मृति भर शेष है! अभी वह था और अभी वह नहीं है। तुमने उसे अभिव्यक्त किया, उसे प्रकट किया; यही तथ्य उसे परिवर्तन के जगत में ले आया। जब उसकी प्रतीति हुई थी, हो सकता वह प्रेम तुम्हारे प्राणों का हिस्सा रहा हो; लेकिन जब तुम उसे अभिव्यक्त करते हो तो तुम उसे समय और परिवर्तन के जगत में ले आते हो, अब वह सरित—प्रवाह में प्रविष्ट हो रहा है। जब तुम कहते हो कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूं तब तक शायद वह बिलकुल ही गायब हो चुका। यह बहुत कठिन है; लेकिन अगर तुम निरीक्षण करोगे तो यह तथ्य बन जाएगा।
तब तुम देख सकते हो कि मित्र में अजनबी है और अजनबी में मित्र है। और तब तुम 'असमता के बीच समभाव' रख सकते हो। परिधि पर तुम बदलते रहते हो, लेकिन केंद्र पर, प्राणों में वही बने रहते हो।
'मान और अपमान में......।
कौन सम्मानित होता है और कौन अपमानित होता है? तुम? कभी नहीं। जो सतत बदल रहा है और जो तुम नहीं हो, सिर्फ वही मान—अपमान अनुभव करता है। कोई तुम्हारा सम्मान करता है। और अगर तुमने समझा कि यह व्यक्ति मेरा सम्मान कर रहा है, तो तुम कठिनाई में पड़ोगे। वह तुम्हें नहीं, तुम्हारी किसी खास अभिव्यक्ति को, किसी रूप विशेष को सम्मानित कर रहा है। वह तुम्हें कैसे जान सकता है? तुम स्वयं अपने को नहीं जानते हो। वह तुम्हारे सतत बदलते व्यक्तित्व के किसी रूप विशेष का सम्मान कर रहा है; वह तुम्हारी किसी अभिव्यक्ति का सम्मान कर रहा है। तुम दयावान हो, प्रेमपूर्ण हो; वह उसका सम्मान कर रहा है। लेकिन यह दया, यह प्रेम परिधि पर है; अगले क्षण तुम प्रेमपूर्ण नहीं रहोगे, अगले क्षण तुम घृणा से भर सकते हो। हो सकता है फूल न रहें; काटे ही कांटे हों। तुम इतने प्रसन्न न रहो, उदास और दुखी होओ। तुम कठोर हो सकते हो, क्रोध में हो सकते हो। तब वह तुम्हारा अपमान करेगा। और हो सकता है कि फिर तुम्हारा प्रेमपूर्ण रूप प्रकट हो जाए। दूसरे लोग तुम्हारे संपर्क में नहीं, तुम्हारे विभिन्न रूपों के संपर्क में आते हैं।
स्मरण रहे, लोग तुमको मान और अपमान नहीं देते हैं। वे यह कैसे कर सकते हैं जब कि वे तुम्हें जानते ही नहीं हैं? जब तुम खुद भी अपने को नहीं जानते हो तो वे कैसे जानेंगे? उनके अपने नियम हैं, उनके अपने सिद्धांत हैं, उनके अपने मापदंड और मानक हैं। उनकी अपनी कसौटियां हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई आदमी ऐसा होगा तो हम उसे सम्मान देंगे और अगर वैसा होगा तो अपमान देंगे। वे अपनी कसौटियों के मुताबिक चलते हैं। और तुम उनकी कसौटियों में कभी नहीं जांचे जा सकते, केवल तुम्हारी अभिव्यक्तियां जांची जा सकती हैं। तो वे एक दिन तुम्हें पापी कह सकते हैं और दूसरे दिन साधु कह सकते हैं। आज वे तुम्हें महात्मा कह सकते हैं, और कल वे तुम्हारे खिलाफ हो सकते हैं, तुम्हें पत्थर मार सकते हैं। यह क्या है? वे तुम्हारी परिधि से परिचित होते हैं, वे कभी तुमसे परिचित नहीं होते। यह स्मरण रहे कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं, वह तुम्हारे संबंध में नहीं है। तुम बाहर छूट जाते हो; तुम परे रह जाते हो। उनकी निंदा, उनकी प्रशंसा, वे जो भी करते हैं, उसका तुम्हारे साथ कोई भी संबंध नहीं है।
मैं तुम्हें एक झेन कथा कहता हूं। एक युवा भिक्षु क्योटो नगर के पास रहता था। वह सुंदर था, युवा था, और सारा नगर उससे प्रसन्न था। सब लोग उसका सम्मान करते थे। वे उसे महान संत मानते थे। लेकिन एक दिन सब उलट—पलट हो गया।
गांव में एक लड़की गर्भवती हो गई। उसने अपने मां—बाप से कहा कि उसके गर्भ के लिए यह साधु ही जिम्मेवार है। और सारा गाव उसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ। लोग आए और उन्होंने उसके झोपड़े में आग लगा दी। सुबह का समय था, और बड़ी सर्द सुबह थी—जाडे की सुबह। उन्होंने नवजात शिशु को उस भिक्षु के ऊपर फेंक दिया। और लड़की के पिता ने भिक्षु से कहा : 'यह तुम्हारा बच्चा है, इसे सम्हालो।भिक्षु ने इतना ही कहा : 'ऐसा है क्या?' और तभी बच्चा रोने लगा। तो भिक्षु भीड़ को भूलकर बच्चे को सम्हालने में लग गया।
भिक्षु के पास दूध खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। तो वह नगर में बच्चे के लिए भीख मांगने गया। लेकिन अब उसे कौन भीख देता? कुछ क्षण पहले जो व्यक्ति महात्मा था, वही अब महापापी हो गया था। उसे भीख कौन देता? वह जहां भी गया, लोगों ने अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिए। सब जगह उसे निंदा और गालियां ही मिलीं।
आखिर में भिक्षु उसी घर के सामने पहुंचा जो उस बच्चे की मा का घर था। वह लड़की बहुत संताप में थी, तभी उसने बच्चे के रोने की आवाज सुनी। द्वार पर खड़ा भिक्षु कह रहा था : 'मुझे कुछ मत दो, मैं पापी हूं। लेकिन यह बच्चा तो पापी नहीं है, इसके लिए थोड़ा दूध दे दो।तब उस लड़की से नहीं रहा गया, उसने कबूल किया कि बच्चे के असली पिता को छिपाने के लिए उसने इस भिक्षु का नाम ले दिया था। वह बिलकुल बेकसूर है।
अब पूरा नगर फिर साधु के पास जमा हो गया। लोग उसके पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगे। और लड़की के पिता ने आकर भिक्षु से बच्चे को वापस ले लिया और आंसुओ से भरी आंखों से कहा : 'आपने पहले ही क्यों नहीं कहा? आपने सुबह ही इनकार क्यों नहीं किया? यह बच्चा आपका नहीं है।भिक्षु ने फिर इतना ही कहा. 'ऐसा है क्या?'
सुबह भी भिक्षु ने यही कहा था : 'ऐसा है क्या? यह बच्चा मेरा है?' और दोपहर भी उसने यही कहा : 'ऐसा है क्या? यह बच्चा मेरा नहीं है?'
इसी तरह तुम्हें इस सूत्र को जीवन में लागू करना है। मान और अपमान में तुम्हें असमता के बीच समभाव रखना है। परिधि पर कुछ भी घटे, लेकिन अंतरस्थ केंद्र को वही का वही रहना चाहिए। परिधि तो बदलेगी ही, लेकिन तुम्हें नहीं बदलना चाहिए। और क्योंकि तुम दोनों हो—परिधि और केंद्र—इसीलिए कहा गया है कि असमता में समभाव रखो।
और तुम इस विधि का प्रयोग सभी विरोधी तत्वों में कर सकते हो : प्रेम—घृणा में, गरीबी—अमीरी में, सुविधा—असुविधा में समभाव रखो। इतना ही जानो कि सब बदलाहट परिधि पर है; तुम्हारे केंद्र पर कोई बदलाहट नहीं हो सकती। इसलिए तुम अनासक्त रह सकते हो। और यह अनासक्ति आरोपित नहीं है। तुम जानते हो कि ऐसा ही है। यह अनासक्ति बाहर से नहीं लादी गई है; तुमने अनासक्त रहने की चेष्टा नहीं की है।
अगर तुम अनासक्त रहने का प्रयत्न करते हो तो तुम परिधि पर ही हो; तुम्हें अभी केंद्र का कुछ पता नहीं है। केंद्र अनासक्त है; वह सदा अनासक्त है। वह पार है; वह सदा अस्पर्शित है। नीचे कुछ भी घटे, यह केंद्र सदा अछूता रहता है, सदा कुंवारा रहता है।
तो परस्पर विरोधी स्थितियों में इस विधि का प्रयोग करो; और अपने भीतर उसे अनुभव करते चलो जो सदा समान है। जब कोई तुम्हारा अपमान करे तो अपने ध्यान को उस बिंदु पर ले जाओ जहां तुम सिर्फ उस आदमी को सुन रहे हो, बिना किसी प्रतिक्रिया के बस सुन रहे हो। यह अपमान की स्थिति है। फिर कोई तुम्हारा सम्मान कर रहा। उसे भी', सिर्फ सुनो। निंदा—प्रशंसा, मान—अपमान, सब में सिर्फ सुनो। तुम्हारी परिधि बेचैन होगी, उसे भी देखो। केवल देखो, बदलने की कोशिश मत करो। उसे देखो, और स्वयं केंद्र से जुड़े रहो। तब तुम्हें वह अनासक्ति उपलब्ध होगी जो आरोपित नहीं है, जो सहज है, स्वाभाविक है।
और एक बार तुम्हें इस सहज अनासक्ति की प्रतीति हो जाए तो फिर कुछ भी तुम्हें बेचैन नहीं कर सकेगा। तुम शात बने रहोगे। संसार में कुछ भी होगा, तुम अकंप रहोगे। तब अगर कोई तुम्हारी हत्या भी करेगा तो सिर्फ शरीर स्पर्शित होगा, तुम अस्पर्शित रहोगे। तुम सबके पार रहोगे। और यह पार रहना ही तुम्हें अस्तित्व में प्रवेश देगा, यह पार रहना ही तुम्हें आर्नद में, शाश्वत में, सत्य में प्रतिष्ठित करेगा—जो सदा है, जो अमृत है, जो नित्य जीवन है। तुम उसे परमात्मा कह सकते हो, या जो भी नाम देना चाहो। तुम उसे निर्वाण कह सकते हो, या और कुछ। लेकिन जब तक तुम परिधि से केंद्र पर नहीं गति करते और जब तक तुम्हें अपने भीतर के शाश्वत का बोध नहीं होता, तब तक तुमने धर्म को नहीं जाना है, तब तक तुमने जीवन को नहीं जाना है। तब तक तुम चूक रहे हो, सब कुछ चूक रहे हो। और यह —संभव है, जीवन के परम आनंद को चूकना संभव है।
शंकर कहते हैं कि मैं उस व्यक्ति को संन्यासी कहता हूं जो जानता है कि क्या अनित्य .है और क्या नित्य है, क्या चलायमान है और क्या अचल है। भारतीय दर्शन इसे ही विवेक कहता है। परिवर्तन और सनातन की पहचान ही विवेक है, बोध है।
तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसमें इस सूत्र का प्रयोग बड़ी गहराई के साथ और बड़ी सरलता के साथ किया जा सकता है। तुम्हें भूख लगी है; इसमें दोनों स्थितियों को स्मरण रखो। भूख की प्रतीति परिधि को होती है, क्योंकि परिधि को ही भोजन की जरूरत है, ईंधन की जरूरत है। तुम्हें भोजन की कोई जरूरत नहीं है; तुम्हें ईंधन की कोई जरूरत नहीं है। यह शरीर की जरूरत है।
स्मरण रहे, जब भी भूख लगती है, शरीर को लगती है, तुम बस उसके जानने वाले हो। अगर तुम नहीं होते तो भूख नहीं जानी जा सकती थी। और अगर शरीर नहीं होता तो भूख ही नहीं लगती। तुम्हारी अनुपस्थिति से भूख का ज्ञान नहीं हो सकता है, क्योंकि शरीर को ज्ञान नहीं होता है। शरीर को भूख तो लग सकती है, लेकिन उसे उसका ज्ञान नहीं हो सकता है। और तुम जानते तो हो, लेकिन तुम्हें भूख नहीं लगती है।
तो कभी मत कहो कि मुझे भूख लगी है; सदा यही कहो कि मैं जानता हूं कि मेरा शरीर भूखा है। अपने जानने पर जोर दो। यह विवेक है। तुम के हो रहे हो। कभी मत कहो कि मैं का हो रहा हूं इतना ही कहो कि यह शरीर का हो रहा है। और तब मृत्यु के क्षण में भी तुम जानोगे कि मैं नहीं मर रहा हूं मेरा शरीर मर रहा है; मैं शरीर बदल रहा हूं घर बदल रहा हूं। और अगर यह विवेक प्रगाढ़ हो तो किसी दिन अचानक बुद्धत्व घटित हो जाएगा।

 दूसरा सूत्र:

यह जगत परिवर्तन का है परिवर्तन ही परिवर्तन का परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।
पहली बात तो यह समझने की है कि तुम जो भी जानते हो वह परिवर्तन है; तुम्हारे अतिरिक्त, जानने वाले के अतिरिक्त सब कुछ परिवर्तन है। क्या तुमने कोई ऐसी चीज देखी है जो परिवर्तन न हो, जो परिवर्तन के अधीन न हो। यह सारा संसार परिवर्तन की घटना है।
हिमालय भी बदल रहा है। हिमालय का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि हिमालय बढ़ रहा है, बड़ा हो रहा है। हिमालय संसार का सबसे कम उम्र का पर्वत है; वह अभी बच्चा ही है और बढ़ रहा है। वह अभी प्रौढ़ नहीं हुआ है, वह अभी उस अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ है जहां पहुंचकर हास या गिरावट शुरू होती है। हिमालय अभी बढ़ रहा है। अगर तुम उसकी तुलना विंध्याचल से करोगे तो उसके सामने हिमालय बच्चे जैसा है। विंध्याचल संसार के सबसे पुराने पर्वतों में है, कुछ तो उसे दुनिया का सबसे पुराना पर्वत मानते हैं। सदियों से वह अपने बुढ़ापे के कारण क्षीण हो रहा है, मर रहा है।
तो इतना स्थिर और अडिग और दृढ़ मालूम पड़ने वाला हिमालय भी बदल रहा है। वह बस पत्थरों की नदी जैसा है। पत्थर होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है, पत्थर भी प्रवाहमान है, बह रहा है। तुलनात्मक दृष्टि से सब कुछ बदल रहा है। कुछ चीजें ज्यादा बदलती मालूम पड़ती हैं और कुछ चीजें कम बदलती मालूम पड़ती हैं, लेकिन ऐसा सापेक्षत: है।
कोई भी चीज, जिसे तुम जान सकते हो, बदलाहट के बिना नहीं है। मेरी बात खयाल में रहे : जिसे तुम जान सकते हो ऐसी कोई भी वस्तु नित्य नहीं है। जानने वाले के अतिरिक्त कुछ भी नित्य नहीं है, शाश्वत नहीं है। लेकिन जानने वाला सदा पीछे है। वह सदा जानता है; वह कभी जाना नहीं जाता। वह कभी आब्जेक्ट नहीं बन सकता, वह सदा सब्जेक्ट ही रहता है। तुम जो कुछ भी करते हो या जानते हो, जानने वाला सदा उससे पीछे है। तुम उसे नहीं जान सकते हो।
और जब मैं कहता हूं कि तुम जानने वाले को नहीं जान सकते, तो इससे परेशान मत होओ। जब मैं कहता हूं कि तुम उसे नहीं जान सकते हो तो उसका इतना ही मतलब है कि तुम उसे विषय की तरह नहीं जान सकते। मैं तुम्हें देखता हूं लेकिन मैं उसी तरह अपने को कैसे देख सकता हूं? यह असंभव है। क्योंकि ज्ञान के लिए दो चीजें जरूरी हैं—ज्ञाता और ज्ञेय। तो जब मैं तुम्हें देखता हूं तो तुम ज्ञेय हो और मैं ज्ञाता हूं और दोनों के बीच ज्ञान सेतु की तरह है। लेकिन ज्ञान का यह सेतु कहां बनेगा जब मैं अपने को ही देखता हूं जब मैं अपने को ही जानने की कोशिश करता हूं? वहां तो केवल मैं ही हूं पूरी तरह अकेला मैं हूं। दूसरा किनारा बिलकुल अनुपस्थित है। फिर सेतु कहा निर्मित किया जाए? स्वयं को जाना कैसे जाए?
तो आत्मज्ञान एक नेति—नेति प्रक्रिया है। तुम अपने को सीधे—सीधे नहीं जान सकते; तुम सिर्फ ज्ञान के विषयों को हटाते जा सकते हो। ज्ञान के विषयों को एक—एक करके छोड़ते चले जाओ। और जब ज्ञान का कोई विषय न रह जाए, जब जानने को कुछ भी न रह जाए, सिर्फ एक शून्य, एक खालीपन रह जाए—और यही ध्यान है, ज्ञान के विषयों को छोड़ते जाना—तब एक क्षण आता है जब चेतना तो है लेकिन जानने के लिए कुछ नहीं है; जानना तो है, लेकिन जानने को कुछ नहीं है। तब जानने की सहज—शुद्ध ऊर्जा रहती है, लेकिन जानने को कुछ भी नहीं बचता है। कोई विषय नहीं रहता है। उस अवस्था में, जब जानने को कुछ नहीं रहता, तुम एक अर्थों में स्वयं को जानते हो, अपने को जानते हो।
लेकिन यह ज्ञान अन्य सब ज्ञान से सर्वथा भिन्न है। दोनों के लिए एक ही शब्द का उपयोग करना भ्रामक है। इसीलिए अनेक रहस्यवादियों ने कहा है कि आत्मज्ञान शब्द विरोधाभासी है। ज्ञान सदा दूसरे का होता है, अत: आत्मज्ञान संभव नहीं है। जब दूसरा नहीं होता है तो कुछ होता है, तुम उसे आत्मज्ञान कह सकते हो, लेकिन यह शब्द भ्रामक है।
तो तुम जो भी जानते हो वह परिवर्तन है। ये जो दीवारें हैं, ये भी निरंतर बदल रही हैं। और भौतिकशास्त्र भी इसका समर्थन करता है। जो दीवार स्थाई मालूम पड़ती है, ठहरी हुई लगती है, वह भी प्रतिपल बदल रही है। सब एक महाप्रवाह है। एक—एक अणु बह रहा है, एक—एक परमाणु बह रहा है। प्रत्येक चीज बह रही है। लेकिन उसकी गति इतनी तीव्र है कि उसका पता नहीं चलता। यही कारण है कि दीवार ठहरी हुई मालूम पड़ती है। सुबह वह ऐसी ही लगती थी, दोपहर भी वह ऐसी ही लगती थी, और शाम में भी ऐसी ही लगती थी। कल भी वह ऐसी ही थी, और आने वाले कल भी वह ऐसी ही होगी। लेकिन यह बात सच नहीं है। तुम्हारी आंखें उसकी गति को पकड़ने में समर्थ नहीं हैं।
यह पंखा है। यदि पंखा बहुत तेजी से चल रहा हो तो बीच की खाली जगह तुम्हें नहीं दिखाई पड़ेगी; एक वर्तुल जैसा दिखाई पड़ेगा। खाली जगह इसलिए नहीं दिखाई देती, क्योंकि पंखे की गति तीव्र है। और अगर गति बहुत तेज हो जाए तो तुम्हें यह भी नहीं दिखाई देगा कि पंखा चल रहा है। तुम्हें कोई गति नहीं पता चलेगी, पंखा ठहरा हुआ मालूम पड़ेगा; यहां तक कि तुम उसे छू भी सकते हो। वह ठहरा मालूम होगा, और तुम खाली जगह में हाथ भी नहीं ले जा सकते। क्योंकि तुम्हारा हाथ उस गति से नहीं चल सकता कि खाली जगह में जा सके। तुम्हारा हाथ खाली जगह में जाए, इसके पहले ही दूसरा डैना आ पहुंचेगा, और तुम्हें सदा डैना ही छूने को मिलता रहेगा। और उसकी गति इतनी तेज होगी कि पंखा ठहरा हुआ मालूम पड़ेगा। तो जो चीजें ठहरी हुई हैं वे दरअसल बहुत तेज गति कर रही हैं। यही कारण है कि ऐसा आभास होता है कि वे ठहरी हुई हैं।
यह सूत्र कहता है कि सभी चीजें बदल रही हैं : 'यह जगत परिवर्तन का है......।
इस सूत्र पर ही बुद्ध का समस्त दर्शन खड़ा है। बुद्ध कहते हैं कि प्रत्येक चीज बहाव है, बदल रही है, क्षणभंगुर है। और यह बात प्रत्येक व्यक्ति को जान लेनी चाहिए। बुद्ध का सारा जोर इसी एक बात पर है; उनकी पूरी दृष्टि इसी बात पर आधारित है। वे कहते हैं कि यह सतत स्मरण रहे कि सब परिवर्तन ही परिवर्तन है। और जब सब परिवर्तन है तो तुम उससे आसक्त कैसे हो सकते हो?
तुम्हें एक चेहरा दिखाई देता है, बहुत सुंदर है। और जब तुम उस सुंदर रूप को देखते हो तो भाव होता है कि यह रूप सदा ही ऐसा रहेगा। इस बात को ठीक से समझ लो। ऐसी अपेक्षा कभी मत करो कि यह सौंदर्य हमेशा रहेगा। और अगर तुम जानते हो कि यह रूप तेजी से बदल रहा है, कि यह इस क्षण सुंदर है और अगले क्षण कुरूप हो जा सकता है, तो फिर आसक्ति कैसे पैदा होगी? असंभव है। एक शरीर को देखो, वह जीवित है; अगले क्षण वह मृत हो सकता है। अगर तुम परिवर्तन को समझो तो सब व्यर्थ है।
बुद्ध ने अपना राजमहल छोड़ दिया, परिवार छोड़ दिया, सुंदर पत्नी छोड़ दी, प्यारा पुत्र छोड़ दिया। और जब किसी ने पूछा कि क्यों छोड़ रहे हैं तो उन्होंने कहा. 'जहां कुछ भी स्थाई नहीं है वहा रहने का क्या प्रयोजन? बच्चा एक न एक दिन मर जाएगा।' बच्चे का जन्‍म उसी रात हुआ था जिस रात बुद्ध ने महल छोड़ा। उसके जन्म के कुछ घंटे ही हुए थे।
बुद्ध उसे अंतिम बार देखने के लिए अपनी पत्नी के कमरे में गए। पत्नी की पीठ दरवाजे की तरफ थी और वह बच्चे को अपनी बांहों में लेकर सोई थी। बुद्ध ने अलविदा कहना चाहा, लेकिन वे झिझके। उन्होंने कहा. 'क्या प्रयोजन है?' एक क्षण उनके मन में यह विचार कौंधा कहा : 'क्या प्रयोजन हैँ? सब तो बदल रहा है। आज बच्चा पैदा हुआ है, कल वह मरेगा। एक दिन पहले वह नहीं था, अभी वह है, और एक दिन फिर नहीं हो जाएगा। तो क्या प्रयोजन है? सब कुछ तो बदल रहा है।वे मुड़े और विदा हो गए।
जब किसी ने पूछा कि आपने क्यों सब कुछ छोड़ दिया? बुद्ध ने कहा : 'मैं उसकी खोज में हूं जो कभी नहीं बदलता, जो शाश्वत है। यदि मैं परिवर्तनशील के साथ अटका रहूंगा तो निराशा ही हाथ आएगी। क्षणभंगुर से आसक्त होना मूढ़ता है; वह कभी ठहरने वाला नहीं है। मैं मूढ़ बनूंगा और हताशा हाथ लगेगी। मैं तो उसकी खोज कर रहा हूं जो कभी नहीं बदलता, जो नित्य है। अगर कुछ शाश्वत है तो ही जीवन में अर्थ है, जीवन में मूल्य है। अन्यथा सब व्यर्थ है।बुद्ध की समस्त देशना का आधार परिवर्तन था।
यह सूत्र सुंदर है। यह सूत्र कहता है : 'परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।बुद्ध कभी दूसरा हिस्सा नहीं कहेंगे; यह दूसरा हिस्सा बुनियादी रूप से तंत्र से आया है। बुद्ध इतना ही कहेंगे कि सब कुछ परिवर्तनशील है, इसे अनुभव करो और तब तुम्हें आसक्ति नहीं होगी। और जब आसक्ति नहीं रहेगी तो धीरे—धीरे अनित्य को छोड़ते—छोड़ते तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाओगे, उस केंद्र पर आ जाओगे जो नित्य है, शाश्वत है। परिवर्तन को छोड़ते जाओ और तुम अपरिवर्तन पर, केंद्र पर, चक्र के केंद्र पर पहुंच जाओगे।
इसीलिए बुद्ध ने चक्र को अपने धर्म का प्रतीक बनाया, क्योंकि चक्र चलता रहता है, लेकिन उसकी धुरी, जिसके सहारे चक्र चलता है, ठहरी रहती है, स्थाई है। तो संसार चक्र की भांति चलता रहता है, तुम्हारा व्यक्तित्व चक्र की भांति बदलता रहता है, और तुम्हारा अंतरस्थ तत्व अचल धुरी बना रहता है जिसके सहारे चक्र गति करता है। धुरी अचल रहती है।
बुद्ध कहेंगे कि जीवन परिवर्तन है; वे सूत्र के पहले हिस्से से सहमत होंगे। लेकिन दूसरा हिस्सा तंत्र से आया है : 'परिवर्तन से परिवर्तन को विसर्जित करो।
तंत्र कहता है कि जो परिवर्तनशील है उसे छोड़ो मत, उसमें उतरो, उसमें जाओ। उससे आसक्त मत होओ, लेकिन उसमें जाओ, उसे जीओ। डरना क्या है? उसमें उतरी; उसे जी लो। उसे घटित होने दो, और तुम उसमें गति कर जाओ। उसे उसके द्वारा ही विसर्जित करो। डरो मत; भागो मत। भागकर कहां जाओगे? इससे बचोगे कैसे? सब जगह तो परिवर्तन है। तंत्र कहता है, बदलाहट सब जगह है। तुम भागकर कहां जाओगे? कहां जा सकते हो? जहां भी जाओगे वहा बदलाहट ही मिलेगी। सब भागना व्यर्थ है; भागने की कोशिश ही मत करो। तब करना क्या है?
आसक्ति मत निर्मित करो। जीवन परिवर्तन है; तुम परिवर्तन हो जाओ। उसके साथ कोई संघर्ष मत खड़ा करो। उसके साथ बहो। नदी बह रही है, उसके साथ बहो। तैसे भी मत; नदी को ही तुम्हें ले जाने दो। उसके साथ लड़ो मत; उससे लड़ने में अपनी शक्ति मत गवाओ। विश्राम में रहो, और जो होता है उसे होने दो। नदी के साथ बहो।
इससे क्या होगा? अगर तुम नदी के साथ बिना संघर्ष किए बह सके, बिना किसी शर्त के बह सके, अगर नदी की दिशा ही तुम्‍हारी दिशा हो जाए तो तुम्‍हें अचानक यह बोध होगा कि मैं नदी नहीं हूं। तुम्हें यह बोध होगा कि मैं नदी नहीं हूं! इसे अनुभव करो; किसी दिन नदी में उतरकर इसका प्रयोग करो। नदी में उतरो, विश्रामपूर्ण रहो और अपने को नदी के हाथों में छोड़ दो; उसे तुम्हें बहा ले जाने दो। लड़ो मत; नदी के साथ एक हो जाओ। तब अचानक तुम्हें अनुभव होगा कि चारों तरफ नदी है, लेकिन मैं नदी नहीं हूं।
यदि नदी से लड़ोगे तो तुम यह बात भूल जा सकते हो। इसीलिए तंत्र कहता है : 'परिवर्तन से परिवर्तन को विसर्जित करो।लड़ी नहीं; लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि परिवर्तन तुममें नहीं प्रवेश कर सकता है। डरो नहीं; संसार में रहो। डरो मत, क्योंकि संसार तुममें प्रवेश नहीं कर सकता। उसे जीओ। कोई चुनाव मत करो।
दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो परिवर्तन के जगत से चिपके रहते हैं और एक वे हैं जो उससे भाग जाते हैं। लेकिन तंत्र कहता है कि जगत परिवर्तन है, इसलिए उससे चिपकना और उससे भागना दोनों व्यर्थ हैं। क्या प्रयोजन है? बुद्ध कहते हैं, 'इस परिवर्तनशील में रहने से क्या प्रयोजन है?' और तंत्र कहता है 'इससे भागने का क्या प्रयोजन है?' दोनों व्यर्थ हैं। उसे बदलते रहने दों; तुम्हें उससे कुछ लेना—देना नहीं है। वह बदल ही रहा है; उसके लिए तुम्हारी जरूरत भी नहीं है। तुम नहीं थे और संसार बदल रहा था; तुम नहीं रहोगे और संसार बदलता रहेगा। फिर इसके लिए शोरगुल क्या करना?
'परिवर्तन को परिवर्तन से विसर्जित करो।
यह एक बहुत गहन संदेश है। क्रोध को क्रोध से विसर्जित करो; काम को काम से विसर्जित करो, लोभ को लोभ से विसर्जित करो; संसार को संसार से विसर्जित करो। उससे संघर्ष मत करो, विश्रामपूर्ण रहो। क्योंकि संघर्ष से तनाव पैदा होता है; तनाव से चिंता और संताप पैदा होता है। और तुम नाहक उपद्रव में पड़ोगे। संसार जैसा है उसे वैसा ही रहने दो। दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो संसार को वैसा ही नहीं रहने देना चाहते जैसा वह है। वे क्रांतिकारी कहलाते हैं। वे उसे बदलेंगे ही; वे उसे बदलने के लिए जद्दोजहद करेंगे। वे उसे बदलने में अपना सारा जीवन नष्ट कर देंगे। और यह जगत अपने आप बदल रहा है; उनकी कोई जरूरत नहीं है। वे अपने को ही नष्ट करेंगे; दुनिया को बदलने में वे खुद खतम होंगे। और संसार बदल ही रहा है; उसके लिए किसी क्रांति की जरूरत नहीं है। संसार स्वयं एक क्रांति है; वह बदल ही रहा है।
तुम्हें आश्चर्य होता होगा कि भारत में महान क्रांतिकारी क्यों नहीं पैदा हुए। यह इसी अंतर्दृष्टि का परिणाम है कि सब अपने आप ही बदल रहा है। तुम उसे बदलने के लिए क्यों परेशान हो? तुम न उसे बदल सकते हो और न बदलाहट को रोक ही सकते हो। वह बदल ही रहा है। क्यों अपने को नष्ट कर रहे हो?
एक तरह का व्यक्तित्व सदा संसार को बदलने की चेष्टा करता है। धर्म की दृष्टि में वह मानसिक तल पर रुग्ण है। सच तो यह है कि अपने साथ रहने में उसे भय लगता है, इसलिए वह भागता फिरता है और संसार में उलझा रहता है। राज्य को बदलना है, सरकार को बदलना है; समाज, व्यवस्था, अर्थनीति, सब कुछ को बदलना है। और इसी सब में वह मर जाएगा। और उसे उस आनंद का, उस समाधि का एक कण भी नहीं उपलब्ध होगा, जिसमें वह जान सकता था कि मैं कौन हूं। और संसार चलता रहेगा; संसार—चक्र घूमता रहेगा। संसार—चक्र ने अनेक क्रांतिकारी देखे हैं, और वह घूमता ही जाता है। तुम न तो इसे रोक सकते हो, और न तुम उसकी बदलाहट को तेज ही कर सकते हो।
रहस्यवादियों की, बुद्धों की यह दृष्टि है। वे कहते हैं कि संसार को बदलने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन बुद्धों की भी दो कोटियां हैं। कोई कह सकता है कि संसार को बदलने की जरूरत नहीं है; लेकिन अपने को बदलने की जरूरत तो है। वह भी परिवर्तन में विश्वास करता है; वह जगत को बदलने में नहीं, लेकिन अपने को बदलने में विश्वास करता है।
लेकिन तंत्र कहता है कि किसी को भी बदलने की जरूरत नहीं है—न संसार को और न अपने को। रहस्य का, अध्यात्म का यह गहनतम तल है, यह उसका अंतरतम केंद्र है। तुम्हें किसी को भी बदलने की जरूरत नहीं है—न संसार को और न अपने को। तुम्हें इतना ही जानना है कि सब कुछ बदल रहा है, और तुम्हें उस बदलाहट के साथ बहना है, उसे स्वीकार करना है।
और जब बदलने का कोई प्रयत्न नहीं है तो ही तुम समग्रत: विश्रामपूर्ण हो सकते हो। जब तक प्रयत्न है, तुम विश्रामपूर्ण नहीं हो सकते। तब तक तनाव बना रहेगा, क्योंकि तुम्हें अपेक्षा है कि भविष्य में कुछ होने वाला है, जगत बदलने वाला है। संसार में साम्यवाद आने वाला है, या पृथ्वी पर स्वर्ग उतरने वाला है, या भविष्य में कोई ऊटोपिया आने वाला है, या तुम प्रभु के राज्य में या मोक्ष में प्रवेश करने वाले हो, स्वर्ग में देवदूत तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार खड़े हैं—जो भी हो, तुम भविष्य में कहीं अटके हो। इस अपेक्षा के साथ तुम तनावग्रस्त रहोगे ही।
तंत्र कहता है, इन बातों को भूल जाओ। संसार बदल ही रहा है और तुम भी निरंतर बदल रहे हो। बदलाहट ही अस्तित्व है, इसलिए बदलाहट की चिंता मत लो। तुम्हारे बिना ही बदलाहट हो रही है; तुम्हारी जरूरत नहीं है। तुम भविष्य की कोई चिंता किए बिना उसमें बहो। और तब अचानक तुम्हें अपने भीतर के उस केंद्र का बोध होगा जो कभी नहीं बदलता है, जो सदा वही का वही रहता है।
ऐसा क्यों होता है? क्योंकि जब तुम विश्रामपूर्ण होते हो तो बदलाहट की पृष्ठभूमि में विपरीत दिखाई पड़ता है, परिवर्तन की पृष्ठभूमि में तुम्हें सनातन का, शाश्वत का बोध होता है। अगर तुम संसार को या अपने को बदलने के प्रयत्न में लगे हो तो तुम अपने भीतर उस छोटे से अकंप, स्थिर, ठहरे हुए केंद्र को नहीं देख पाओगे। तुम बदलाहट से इतने घिरे हो कि तुम उसे नहीं देख पाते हो जो है।
सब तरफ परिवर्तन है। यह परिवर्तन पृष्ठभूमि बन जाता है, कंट्रास्ट बन जाता है। और तुम शिथिल होते हो, विश्राम में होते हो, इसलिए तुम्हारे मन में भविष्य नहीं होता, भविष्य के विचार नहीं होते। तुम यहां और अभी होते हो, यह क्षण ही सब कुछ होता है। सब कुछ बदल रहा है—और अचानक तुम्हें अपने भीतर उस बिंदु का बोध होता है जो कभी नहीं बदला है।
'परिवर्तन से परिवर्तन को विसर्जित करो।
इसका यही अर्थ है। लड़ो मत। मृत्यु के द्वारा अमृत को जान लो; मृत्यु के द्वारा मृत्यु को मर जाने दो। उससे लड़ाई मत करो।
तंत्र की दृष्टि को समझना कठिन है। कारण यह है कि हमारा मन कुछ करना चाहता है, और तंत्र है कुछ न करना। तंत्र कर्म नहीं, पूर्ण विश्राम है। लेकिन यह एक सर्वाधिक गुह्य रहस्य है। और अगर तुम इसे समझ सको, अगर तुम्हें इसकी प्रतीति हो जाए, तो तुम्हें किसी अन्य चीज की चिंता लेने की जरूरत न रही। यह अकेली विधि तुम्हें सब कुछ दे सकती है।
तब तुम्हें कुछ करने की जरूरत न रही, क्योंकि तुमने इस रहस्य को जान लिया कि परिवर्तन से परिवर्तन का अतिक्रमण हो सकता है, मृत्यु से मृत्यु का अतिक्रमण हो सकता है, काम से काम का अतिक्रमण हो सकता है, क्रोध से क्रोध का अतिक्रमण हो सकता है। अब तुम्हें यह कुंजी मिल गई कि जहर से जहर का अतिक्रमण हो सकता है।
आज इतना ही।