कुल पेज दृश्य

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--3)--प्रवचन--42

आचरण नहीं, बोध मुक्‍तिदायी है—(प्रवचन—बयालीसवां)

प्रश्‍नसार:

1—क्‍या अनैतिक जीवन ध्‍यान में बाधा नहीं पैदा कराता है?
2—यदि कोई नैतिक ढंग से जीता है तो क्‍या तंत्र को कोई आपत्‍ति है?
3—यदि कुछ भी अशुद्ध नहीं है तो दूसरों की देशनाएं अशुद्ध कैसे हो सकती है?
4—क्‍या किसी भावना या इच्‍छा की अभिव्‍यक्‍ति न करने से उसकी ऊर्जा स्‍त्रोत
      पर लौटकर व्‍यक्‍ति को ऊर्जावान कर जाती है?
5—दमन या भोग से बचने का प्रयास भी क्‍या दमन नहीं है?



पहला प्रश्न :

क्या यह सच नहीं है कि अनैतिक जीवन ध्यान में बाधा पहुंचाता है?

ध्‍यान क्या है? ध्यान तुम्हारा चरित्र नहीं है; वह तुम्हारा आचरण नहीं है। तुम जो करते हो वह ध्यान नहीं है। ध्यान तो वह है जो तुम हो। ध्यान आचरण नहीं है; ध्यान वह चेतना है जिससे तुम अपने आचरण को देखते हो, अपने कृत्य के साक्षी होते हो। कृत्य गौण है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम उसे होशपूर्वक कर रहे हो या बेहोशी में। कृत्य चाहे नैतिक हो या अनैतिक, तुम अगर उसके प्रति सजग हो, होशपूर्ण हो, तो तुम ध्यान में हो। और अगर तुम उसके प्रति सजग नहीं हो तो तुम सोए हो, गैर— ध्यान में हो।
तुम खूब सोए—सोए भी नैतिक हो सकते हो, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। गहरी नींद में होने के लिए नैतिक होना बेहतर है, क्योंकि तब समाज तुम्हें कोई बाधा नहीं देगा; तब कोई भी तुम्हारे विरोध में नहीं होगा। तुम आराम से सो सकते हो; समाज उसमें तुम्हें सहयोग भी देगा।
तुम ध्यानी हुए बिना भी नैतिक हो सकते हो; लेकिन उस नैतिकता के ठीक पीछे अनैतिकता खड़ी रहेगी। अनैतिकता तुम्हारी छाया की तरह तुम्हारे पीछे—पीछे चलेगी। और तुम्हारी यह नैतिकता सतही होगी, क्योंकि यह नैतिकता तुम पर नींद में ही बाहर से लादी जा सकती है। वह नैतिकता नकली होगी, झूठी होगी, पाखंड होगी। वह तुम्हारा कभी प्राण नहीं बनेगी। बाहर—बाहर तुम नैतिक रहोगे, लेकिन भीतर— भीतर तुम अनैतिक बने रहोगे। और तुम बाहर—बाहर जितने नैतिक होगे, भीतर— भीतर उतने ही अनैतिक होगे। अनुपात सदा समान होगा। कारण यह है कि तुम्हारी नैतिकता एक गहन दमन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती है। नींद में तुम और कुछ नहीं कर सकते, सिर्फ दमन कर सकते हो।
और इस नैतिकता के चलते तुम झूठे हो जाओगे, पाखंडी हो जाओगे। तुम एक व्यक्ति नहीं रहोगे, बस एक मुखौटा, एक ढोंग बन जाओगे। और उसका परिणाम दुख होगा, संताप होगा। और तुम सदा एक ज्वालामुखी पर बैठे होगे, जो किसी भी समय फूट सकता है। जो कुछ भी तुमने अपने भीतर दबा रखा है, उसका विस्फोट अनिवार्य है; वह सदा फूटने को
तत्पर ही है। और यदि तुम सोए—सोए ईमानदारी से नैतिक होने की चेष्टा करोगे तो तुम सकता। पाखंड
का वही मतलब है। पाखंडी सिर्फ नैतिक होने का दिखावा करता है, नैतिक होता नहीं। और वह अनैतिक होने के परोक्ष उपाय खोज लेता है, ऊपर—ऊपर वह सदा नैतिक बना रहता है या नैतिक होने का ढोंग करता है। केवल तभी तुम पागल होने से बच सकते हो, अन्यथा पागलपन तुम्हारी नियति है।
यह जो तथाकथित नैतिकता है इसमें दो ही विकल्प होते हैं विक्षिप्तता या पाखंड। अगर तुम ईमानदार हो तो पागल हो जाओगे। और अगर तुम बेईमान हो तो तुम पाखंडी हो जाओगे। जो लोग चतुर—चालाक हैं, वे पाखंडी हो जाते हैं। और जो सरल और निष्ठावान हैं, जो ऐसी शिक्षाओं के शिकार हो जाते हैं, वे पागल हो जाते हैं।
नींद में, मूर्च्छा में, सच्ची नैतिकता संभव नहीं है। सच्ची नैतिकता का क्या अर्थ है? सच्ची नैतिकता ऊपर से लादी या ओढी नहीं जाती है, वह तुम्हारे प्राणों की सहज और स्वाभाविक खिलावट होती है। और सच्ची नैतिकता अनैतिकता के विरोध में नहीं होती; सच्ची नैतिकता अनैतिकता की अनुपस्थिति भर होती है। वह विरोध में नहीं होती है।
उदाहरण के लिए, तुम्हें सिखाया जा सकता है कि अपने पड़ोसी को प्रेम करो, कि सबको प्रेम करो, कि प्रेमपूर्ण बनो। यह शिक्षा तुम्हें एक तरह की नैतिकता दे सकती है, लेकिन भीतर घृणा कायम रहेगी। तुम अपने को जबरदस्ती प्रेमपूर्ण बनाने की कोशिश कर सकते हो, लेकिन जबरदस्ती लाया हुआ प्रेम सच्चा नहीं हो सकता, प्रामाणिक नहीं हो सकता। इस प्रेम से न तुम परितृप्त होंगे और न वह परितृप्त होगा जिसे तुम प्रेम देते हो। झूठे प्रेम से कोई भी परितृप्त नहीं होने वाला है।
यह प्रेम झूठे पानी जैसा है; झूठे पानी से किसी की प्यास शात नहीं हो सकती। घृणा मौजूद है, और घृणा सतत प्रकट होने को आतुर है। और झूठा प्रेम इस घृणा को रोकने में असमर्थ है। बल्कि घृणा तुम्हारे झूठे प्रेम में प्रविष्ट होकर उसे भी विषाक्त कर देगी; तुम्हारा प्रेम एक तरह की घृणा बनकर रह जाएगा। यह पूरा मामला चालबाजी से भरा है।
सच्ची नैतिकता तो उसी आदमी को घटित होती है जो अपने भीतर की गहराई में उतरता है। और तुम जितने गहरे उतरते हो उतने ही प्रेमपूर्ण होते जाते हो। यह प्रेम घृणा के विपरीत आरोपण नहीं है; यह प्रेम घृणा के विरोध में नहीं है। इसका घृणा से कुछ लेना—देना नहीं है, घृणा से इस प्रेम का कोई संबंध ही नहीं है। तुम अपने में जितने गहरे जाते हो, उतना ही ज्यादा प्रेम तुमसे प्रवाहित होता है। और जिस क्षण तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाते हो, तुम किसी नैतिक धारणा के बिना ही प्रेमपूर्ण हो जाते हो। तब तुम्हें इसकी खबर भी न होगी कि मैं प्रेमपूर्ण हूं। तुम्हें इसकी खबर कैसे होगी? यह प्रेम इतना सहज और स्वाभाविक होगा; यह प्रेम बस श्वास लेने जैसा होगा; यह प्रेम तुम्हारे पीछे चलने वाली छाया की भांति होगा।
तंत्र अंतर्यात्रा सिखाता है। नैतिकता घटित होगी; लेकिन वह प्रयास नहीं, परिणाम होगी। इस भेद को ठीक से समझ लो। तंत्र कहता है कि नैतिक और अनैतिक धारणाओं के चक्कर में मत पड़ो; वे बाहरी बातें हैं। अंतर्यात्रा करो। और ये अंतर्यात्रा की विधियां हैं। नैतिक—अनैतिक, शुद्ध—अशुद्ध की फिक्र मत करो, भेद मत खड़े करो। भीतर की यात्रा करो; बाहर की दुनिया को, समाज को, समाज की सारी शिक्षाओं को भूल जाओ। समाज जो भी सिखाता है वह द्वैत मूलक होगा ही। इसलिए उससे द्वंद्व और दमन का पैदा होना अनिवार्य है। और यदि द्वंद्व है तो तुम अंतर्यात्रा नहीं कर सकते।
द्वंद्व को भूल जाओ, और उस सबको भी भूल जाओ जो द्वंद्व पैदा करता है। सिर्फ भीतर चलो। तुम जितने ज्यादा भीतर जाओगे उतने ही ज्यादा नैतिक होंगे। लेकिन यह नैतिकता समाज की नैतिकता नहीं होगी। तुम नैतिक हुए बिना नैतिक होंगे; तुम्हें अपने नैतिक होने का बोध भी नहीं होगा। क्योंकि तुम्हारे भीतर इस नैतिकता के विपरीत कुछ नहीं होगा। तुम बस प्रेमपूर्ण होगे, क्योंकि जब तुम प्रेम में होते हो तो तुम आनंद में होते हो। यह प्रेम स्वयं अपने आप में आनंद है। इसका कोई लक्ष्य भी नहीं है। यह प्रेम किसी फल की आकांक्षा नहीं करता है। ऐसा नहीं है कि यदि प्रेम करोगे तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। यह सौदा नहीं है।
जो नैतिकता समाज सिखाता है, जो नैतिकता तथाकथित धर्म सिखाते हैं, वह सौदेबाजी ही है। वे कहते हैं कि यह करोगे तो वह मिलेगा और यह नहीं करोगे तो वह नहीं मिलेगा। वे सजा की धमकी भी देते हैं। यह सौदेबाजी है।
तंत्र की नैतिकता सौदेबाजी नहीं है, वह एक घटना है। तुम जैसे—जैसे भीतर उतरते हो, वैसे—वैसे तुम क्षण में, वर्तमान में जीने लगते हो। तब तुम समझते हो कि प्रेम करना आनंद है। प्रेम किसी का साधन नहीं है, वह अपने आप में साध्य है। प्रेम पर्याप्त है। तुम प्रेम करते हो, क्योंकि प्रेम तुम्हें आनंद से भर देता है। तुम किसी पर उपकार नहीं कर रहे हो, तुम किसी पड़ोसी के लिए यह नहीं कर रहे हो, प्रेम करने में तुम्हें स्वयं ही सुख होता है। प्रेम तुम्हें अभी और यहीं शुभ से भर देता है। भविष्य में कोई स्वर्ग या नर्क नहीं मिलनेवाला है; अभी ही यह प्रेम स्वर्ग निर्मित कर देता है, और परमात्मा का राज्य तुममें प्रवेश कर जाता है। और यही बात सभी शुभ गुणों के लिए सही है; वे सहज ही तुममें खिलते हैं।
अब हम इस प्रश्न को देखें. 'क्या यह सच नहीं है कि अनैतिक जीवन ध्यान में बाधा पहुंचाता है?'
असल में सचाई ठीक इसके विपरीत है, ध्यानपूर्ण जीवन अनैतिक जीवन में बाधा पहुंचाता है। अनैतिक जीवन क्या बाधा पहुंचा सकता है? अनैतिक जीवन का अर्थ है कि तुम ध्यानपूर्ण नहीं हो; उसका कोई और अर्थ नहीं है। तुम गहरी नींद में हो। और यही कारण है कि तुम अपने को नुकसान पहुंचा रहे हो।
तंत्र के लिए बुनियादी बात ध्यान है, सजगता है, बोध है। इससे ज्यादा और कोई चीज बुनियादी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति अनैतिक है तो इससे इतना ही प्रकट होता है कि वह सजग नहीं है, सावचेत नहीं है। यह एक लक्षण मात्र है; अनैतिक होना इस बात का लक्षण है कि व्यक्ति सचेत नहीं है। ऐसी स्थिति में साधारणत: तुम्हें क्या शिक्षा दी जाती है?
साधारण शिक्षक इस सोए व्यक्ति को, जो कि अनैतिक है, कहेंगे कि तुम नैतिक बनो। और वह अनैतिक से नैतिक बन भी जा सकता है; लेकिन उसकी नींद जारी रहेगी। और इस तरह सारा श्रम व्यर्थ चला जाता है, क्योंकि असली बीमारी अनैतिकता नहीं थी, अनैतिकता तो लक्षण मात्र थी। असली बीमारी थी नींद, मूर्च्छा। मूर्च्छित होने के कारण वह अनैतिक था। तुम उसे नैतिक नहीं बना सकते हो। तुम उसे भयभीत कर सकते हो; लेकिन तुम मूर्च्छित आदमी को ही भयभीत कर सकते हो। सजग व्यक्ति को तुम भयभीत नहीं कर सकते। तुम नर्क का भय पैदा कर सकते हो तो स्‍वर्ग का लोभ पैदा कर सकते हो। लेकिन भय और लोभ नींद में ही काम करते हैं, जाग्रत व्यक्ति को न भयभीत किया जा सकता है और न प्रलोभित ही किया जा सकता है। ये दोनों चीजें मूर्च्‍छित चित्त के लिए ही अर्थ रखती हैं।
दंड का भय दो, और अनैतिक आदमी नैतिक होने लगेगा। लेकिन वह भय के कारण नैतिक होगा। वैसे ही उसे कोई लोभ दो, और वह नैतिक होने लगेगा। लेकिन यह बदलाहट लोभ के लिए, लाभ के लिए की जाएगी। लोभ और भय नींद के ही हिस्से हैं; आदमी की नींद जारी रहती है। उनसे कभी कोई बुनियादी बदलाहट नहीं होती है।
यह सही है कि ऐसा आदमी समाज के लिए उपयोगी हो जाता है। समाज के लिए अनैतिक आदमी समस्या है, नैतिक आदमी नहीं। भय या लोभ से पैदा हुई नैतिकता से समाज की समस्या तो हल हो जाती है, लेकिन व्यक्ति की समस्या जहां की तहां रहती है; वह सोया ही रहता है। वह अब समाज के लिए सुविधाजनक हो जाता है, पहले वह समाज के लिए उपद्रव खड़ा करता था।
इस तथ्य पर गौर करो। एक अनैतिक आदमी समाज के लिए उपद्रव है, लेकिन वह स्वयं के लिए सुविधाजनक है। और एक नैतिक आदमी समाज के लिए तो सुविधाजनक हो जाता है, लेकिन वह स्वयं के लिए उपद्रव हो जाता है। इससे इतना ही होता है कि सिक्के को उलटा कर लिया गया।
यही कारण है कि अनैतिक आदमी प्रसन्न और प्रफुल्लित दिखता है, और नैतिक आदमी गंभीर, उदास और बोझिल नजर आता है। अनैतिक आदमी समाज से लड़ रहा है, और नैतिक आदमी स्वयं से लड़ रहा है। अनैतिक आदमी भी थोड़ा चिंतित है, क्योंकि उसे पकड़े जाने का डर है। उसे डर तो है, लेकिन वह सुख भी भोग रहा है। अगर वह पकड़ा न जाए, अगर उसे पकड़े जाने का डर न हो, तो वह मजे में है। लेकिन नैतिक आदमी स्वयं के साथ संघर्ष कर रहा है; उसका अपना कुछ भी ठीक नहीं है। ही, समाज के साथ उसका सब ठीक—ठाक चलता है।
नैतिकता समाज के लिए तेल का काम करती है; समाज की गाड़ी चलती रहती है। इससे दूसरों के साथ तुम्हारा जीवन आराम से चलता है। लेकिन तब तुम्हें स्वयं के साथ बेचैनी अनुभव होने लगती है। बेचैनी बनी ही रहती है—चाहे यह बेचैनी समाज के साथ हो या स्वयं के साथ। बेचैनी तो तभी जा सकती है जब तुम जाग जाते हो, प्रबुद्ध हो जाते हो।
तंत्र बुनियादी बीमारी की फिक्र करता है, लक्षणों की नहीं। नैतिकता लक्षणों को हटाने में लगती है। तंत्र कहता है. 'नैतिक या अनैतिक धारणाओं की चिंता मत लो।इसका यह अर्थ नहीं है कि तंत्र तुम्हें अनैतिक होने को कहता है। तंत्र तुम्हें अनैतिक होने को कैसे कह सकता है जब कि वह तुम्हें नैतिक होने को भी नहीं कहता है!
तंत्र यह कहता है कि नैतिक—अनैतिक की पूरी बहस बेकार है; उसे छोड़ो और समस्या की जड़ को पकड़ो। नैतिक—अनैतिक होना मात्र लक्षण है, उसे छोड़ो और जड़ को देखो। और जड़ यह है कि तुम नींद में हो, गहरी नींद में हो।
इस नींद के ढांचे को कैसे तोड़ा जाए? कैसे सावचेत हुआ जाए? और कैसे फिर—फिर
नींद में गिरने से बचा जाए? तंत्र इसकी चिंता लेता है; तुम्हारी नींद को तोड़ने और तुम्हारे बोध को जगाने की चिंता लेता है। और जैसे ही तुम बोधपूर्ण होगे, तुम्हारा चरित्र रूपांतरित हो जाएगा। लेकिन वह परिणाम होगा। तंत्र कहता है कि तुम्‍हें परिणाम की भी फिक्र नहीं लेनी है। वह परिणाम है; वह अनिवार्यत: आता है। तुम्हें उसके लिए न चिंता लेनी है और न ही कुछ करना है। बोध के आते ही चरित्र की बदलाहट अपने आप ही घटित होती है। तुम जितने सावचेत होगे उतने ही नैतिक होते जाओगे। लेकिन यह नैतिकता आरोपित नहीं है; यह तुम्हारे प्रयास से नहीं आती है। तुम सिर्फ सावचेत होते हो, और यह स्वत: स्फूर्त आती है।
एक सजग आदमी हिंसक कैसे हो सकता है? एक बोधपूर्ण व्यक्ति घृणा और क्रोध कैसे कर सकता है? यह बात विरोधाभासी मालूम पड़ती है, लेकिन यह सही है। जो व्यक्ति सोया हुआ है वह घृणा के बिना नहीं हो सकता। यह असंभव है। वह ढोंग कर सकता है कि मुझमें क्रोध नहीं है, कि मुझमें घृणा नहीं है। वह यह दावा भी कर सकता है कि मुझमें प्रेम और दया और करुणा का निवास है। ये सब उसके पाखंड के ही खेल होंगे।
लेकिन जब कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है तो ठीक उलटी बात घटित होती है। अगर उसे क्रोध करने की जरूरत पड़े तो वह क्रोध का सिर्फ अभिनय कर सकता है, वह सचमुच क्रोध नहीं कर सकता। वह सिर्फ क्रोध का दिखावा कर सकता है। अगर उसे कभी क्रोध करने की जरूरत पड जाए—और कभी जरूरत पड़ सकती है—तो वह क्रोध करने का नाटक करेगा। वह दुखी नहीं हो सकता, लेकिन कभी जरूरत पड़ने पर वह दुखी होने का अभिनय कर सकता है। उसके लिए ये चीजें असंभव होंगी। जैसे पहले उसके लिए घृणा स्वाभाविक थी, वैसे ही अब प्रेम स्वाभाविक होगा। और जैसे पहले उसका प्रेम महज अभिनय था, वैसे ही अब उसकी घृणा एक अभिनय होगी।
यहूदियों के बड़े मंदिर में जीसस की सूदखोरों के साथ लड़ाई एक नाटक ही थी। वे क्रोध नहीं कर सकते थे, लेकिन उन्होंने क्रोध करने का नाटक किया। वे सचमुच में क्रोधित नहीं हो सकते, लेकिन वे क्रोध का उपयोग कर सकते हैं। यह वैसा ही है जैसे तुम प्रेमपूर्ण हुए बिना प्रेम का उपयोग करते हो।
तुम प्रेम का उपयोग किसी प्रयोजन से करते हो। तुम्हारा प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं है; तुम उसका उपयोग कुछ पाने के लिए करते हो। तुम प्रेम से धन पाने की कोशिश कर सकते हो, कामवासना की तृप्ति की कोशिश कर सकते हो। तुम अहंकार की तृप्ति के लिए प्रेम कर सकते हो; तुम किसी पर कब्जा जमाने के लिए भी प्रेम कर सकते हो। लेकिन वह प्रेम प्रेम नहीं है।
कोई बुद्धपुरुष भी कभी क्रोध कर सकता है, अगर उसे लगे कि उससे किसी का हित होगा। प्रेम के कारण कभी बुद्धपुरुष को भी क्रोध करना पड़ सकता है। लेकिन यह क्रोध अभिनय मात्र होगा, और मूढ़ ही उसके धोखे में पड़ सकते हैं। जो जानते हैं वे सिर्फ हंसेंगे।
तंत्र का कहना है कि जैसे—जैसे ध्यान गहराता है, तुममें बदलाहट होने लगती है। और जो सहज घटित हो वही बदलाहट सुंदर है। जो बदलाहट तुम चेष्टा से लाओगे, कुछ करके लाओगे, वह बदलाहट कभी गहरी नहीं हो सकती है। कृत्य मात्र सतह पर है। इसलिए तंत्र कहता है कि बदलाहट को अपने प्राणों में घटित होने दो, स्वयं के केंद्र पर घटित होने दो। इसे केंद्र से परिधि की ओर बहने दो, परिधि से केंद्र पर लादने की चेष्टा मत करो। यह असंभव चेष्‍टा है।
तंत्र नैतिक—अनैतिक की बात ही नहीं उठाता है। बात सिर्फ इतनी है कि अगर तुम सोए हो तो अपनी नींद को तोड्ने की चेष्टा करो। तुम जहां भी हो वहीं ज्यादा से ज्यादा सजग होओ, बोधपूर्ण बनो। अगर तुम अनैतिक हो तो तंत्र कहेगा, ठीक है, हमें तुम्हारी अनैतिकता से मतलब नहीं है, हमें तुम्हारी नींद से मतलब है, और हमें यह फिक्र है कि कैसे तुम्हारी नींद को जागरण में बदला जाए। तंत्र चाहता है कि तुम अपनी अनैतिकता से मत लड़ो; बस अपनी नींद को तोड्ने की कोशिश करो। और अगर तुम नैतिक हो तो ठीक है; तब तंत्र यह नहीं कहेगा कि पहले अनैतिक होओ और फिर सजग होने की चेष्टा करो। ध्यान में उतरने के लिए न अनैतिक व्यक्ति को नैतिक होने की जरूरत है और न नैतिक व्यक्ति को अनैतिक होने की जरूरत है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि वह अपनी चेतना की गुणवत्ता में बदलाहट करे।
तो तुम जहां हो—चाहे पापी हो, चाहे संत—तंत्र के लिए कोई भेद नहीं पड़ता है। अगर तुम सोए हो, मूर्च्छित हो, तो सजगता की विधियों का प्रयोग करो। और लक्षणों को बदलने की कोशिश मत करो। पापी भी बीमार है और तथाकथित महात्मा भी बीमार है, क्योंकि दोनों नींद में हैं, दोनों मूर्च्छित हैं। और नींद बीमारी है, चरित्र नहीं; चरित्र तो एक उप—उत्पत्ति मात्र है। और नींद में पड़े—पड़े तुम जो भी करोगे उससे कोई बुनियादी बदलाहट नहीं होगी। एक ही चीज तुम्हें बदल सकती है, एक ही चीज तुममें रूपांतरण ला सकती है; और वह है जागरण, वह है बोध। एक ही प्रश्न है कि कैसे अधिक से अधिक सजग हुआ जाए, सावचेत हुआ जाए।
तो तुम जो कुछ भी करो, उसे अपनी सजगता का, होश का विषय बना लो। अगर तुम कोई अनैतिक काम करते हो तो उसे भी ध्यानपूर्वक करो। ज्यादा देर नहीं लगेगी जब कृत्य अपने आप ही विलीन हो जाएगा, विदा हो जाएगा। तुम उसे न कर सकोगे। और इसलिए नहीं कि तुमने जबरदस्ती अपने को रोका हुआ है, बल्कि इसलिए कि अब तुम ज्यादा होशपूर्ण हो। और तुम होश में वह काम कैसे कर सकते हो जिसे करने के लिए नींद अनिवार्य है? तुम वह काम नहीं कर सकते हो।
तंत्र और अन्य साधनाओं के इस बुनियादी भेद को भलीभांति समझ लो। तंत्र ज्यादा वैज्ञानिक है; वह समस्या के जड़—मूल में जाता है। तंत्र तुम्हारे चरित्र के बाहरी खोल में, तुम्हारी नैतिकता और अनैतिकता में, तुम्हारे कृत्यों में बदलाहट लाने की चेष्टा नहीं करता; वह तुम्हें जड़—मूल से रूपांतरित करता है। तुम जो करते हो वह परिधि पर है; लेकिन तुम जो हो वह कभी परिधि पर नहीं है। तंत्र के लिए कृत्य नहीं, कृत्य की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।
उदाहरण के लिए मैं एक कहानी कहता हूं। एक कसाई नान—इन के पास पहुंचा। वह कसाई था, और नान—इन अहिंसा में विश्वास करने वाला बौद्ध भिक्षु था। और कसाई का पूरा धंधा हत्या करना था; सारा दिन वह जानवरों को काटता रहता था। तो जब वह नान—इन के पास आया तो उसने पूछा : 'मैं क्या करूं? मेरा धंधा ही हिंसा का है। तो क्या मुझे पहले अपना धंधा छोड़ना होगा? क्या यह धंधा छोड़कर ही मैं नया मनुष्य हो सकता हूं? या मेरे लिए कोई दूसरा उपाय भी है?'
नान—इन ने कहा. 'तुम क्या करते हो इससे हमें कुछ लेना—देना नहीं है। हमें तो सिर्फ इससे मतलब है कि तुम क्या हो। इसलिए तुम जो कुछ करते हो वह किए जाओ, लेकिन ज्यादा सजग रहो। जानवरों को मारते समय सजग रहो, ध्यानपूर्ण रहो, और अपना धंधा जारी रखो। हमें तुम्हारे धंधे से कुछ लेना—देना नही है।'
नान—इन के शिष्य तो इस बात से बहुत चिंतित हो उठे कि एक बुद्ध का अनुयायी, अहिंसा को मानने वाला, एक कसाई को अपना धंधा जारी रखने की छूट दे रहा है! एक शिष्य ने कहा : 'यह उचित नहीं है। और हमें कभी यह अपेक्षा नहीं थी कि आप जैसा व्यक्ति एक कसाई को कसाई बने रहने की इजाजत देगा। और जब वह खुद ही पूछ रहा था तो आपको यह धंधा छोड़ने के लिए कह देना चाहिए था। वह खुद ही धंधा छोड़ने की पूछ रहा था।
नान—इन ने कहा : 'तुम कसाई के धंधे को आसानी से बदलवा सकते हो; वह खुद इसके लिए राजी था। लेकिन इससे तुम उसकी चेतना की गुणवत्ता 'को नहीं बदल सकते हो; वह कसाई का कसाई रहेगा। वह संत भी बन जा सकता है, लेकिन उसके चित्त का गुण वही रहेगा जो कसाई के चित्त का गुण है। वह संतत्व दूसरों के लिए, और उसके लिए भी, एक धोखा भर होगा।
जाओ और अपने तथाकथित साधु—महात्माओं को देखो। उनमें से अनेक कसाई ही रह जाते हैं। उनके रंग—ढंग में, उनके व्यवहार में, तुम्हारी ओर वे जिस नजर से देखते हैं उसमें, सब में निंदा भरी होती है, हिंसा भरी होती है। उनकी आंख तुम्हें कहती है कि तुम पापी हो और मैं पुण्यात्मा हूं। उनके देखने के ढंग में ही तुम्हारे लिए निंदा भरी रहती है, उनकी नजर तुम्हें सीधे नरक में डाल देती है।
नान—इन ने कहा. 'उसके बाहरी जीवन को बदलने से कोई लाभ नहीं है। उसके चित्त की गुणवत्ता बदलनी जरूरी है। और अच्छा है कि उसे कसाई ही रहने दिया जाए, क्योंकि वह अपने कसाईपन और हिंसा से बेचैन हो रहा है। अगर वह संत बन जाएगा तो वह रहेगा कसाई ही, लेकिन तब वह बेचैन नहीं होगा। उसका अहंकार और भी मजबूत हो जाएगा। तो अच्छा है कि वह कसाई ही रहे। वह अपनी हिंसा से बेचैन तो है, और उसे कम से कम यह बोध तो हो रहा है कि यह अच्छा नहीं है। वह बदलने के लिए तैयार है। लेकिन बदलने की तैयारी से ही काम नहीं चलेगा। चित्त की एक नई गुणवत्ता विकसित करनी होगी। उसे ध्यान करने दो।
एक वर्ष बीतने पर वह आदमी फिर नान—इन के पास आया, वह अब बिलकुल दूसरा ही आदमी था। वह अभी भी कसाई था, लेकिन कृत्य वही रहने पर भी आदमी बदल गया था। नान—इन के पास आकर उसने कहा. 'अब मैं दूसरा ही आदमी हूं। मैंने ध्यान किया, ध्यान किया, ध्यान किया, और मेरा पूरा जीवन ही ध्यान बन गया है। आपने कहा था कि तुम जो कुछ करो, उसे ही ध्यान से करो। मैं जानवरों को काटता हूं लेकिन पूरे दिन ध्यान में डूबा रहता हूं। अब आप मुझे क्या करने को कहते हैं?'
नान—इन ने कहा. 'अब मेरे पास मत आओ; अपने बोध से ही चलो। तुम्हें अब मेरे पास आने की जरूरत नहीं है।
तो उस कसाई ने कहा : 'अब अगर आप कहेंगे कि इस धंधे को जारी रखो तो मैं उसे जारी रखने का अभिनय करूंगा; लेकिन —जहां तक मेरा संबंध है मैं अब उसमें नहीं हूं। तो अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं वापस जाने वाला नहीं हूं। लेकिन यदि आप जाने को कहेंगे तो वह भी ठीक है। तो मैं अभिनय जारी रखूंगा।
इस तरह जब तुम्हारी गुणवत्ता बदलती है, जब तुम्हारी चेतना में रूपांतरण होता है, तो तुम सर्वथा दूसरे ही व्यक्ति हो जाते हो। और तंत्र को तुमसे मतलब है, तुम्हारे कृत्यों से नहीं।

 दूसरा प्रश्न:

यदि कोई आदमी जीवन के कुछ नियमों का पालन करे और उसे नैतिक नाम दे तो क्या तंत्र को इस पर कोई आपत्ति है?

 तंत्र को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यह आपत्ति का न होना समस्या नहीं है। तंत्र को किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं है। तंत्र में कुछ निंदित नहीं है, वह तुम्हें कभी नहीं कहता है कि यह करो और वह न करो। अगर तुम्हें किन्हीं नियमों का पालन करना अच्छा लगता है तो मजे से करो। लेकिन ध्यान रहे, नियमों का पालन करने से तुम्हें सुख नहीं मिलने वाला है, क्योंकि सिद्धांतों से और उनके पालन से तुम कभी रूपांतरित नहीं हो सकते; तुम वही के वही रहते हो।
सिद्धांत सदा उधार होते हैं; आदर्श सदा उधार होते हैं। वे सदा तुम्हें दूसरों से मिलते हैं। वे तुम्हारे नहीं हैं, वे तुम्हारे अपने अनुभव से नहीं आए हैं। ऐसे सिद्धांतों और आदर्शों की अपनी जड़ें नहीं होती हैं। वे तुम्हें तुम्हारे समाज ने दिए हैं, उन धर्मों ने दिए हैं जिनमें तुम पैदा हुए हो, उन शिक्षकों ने दिए हैं जिनके तुम निकट रहे हो। तुम उनका अनुगमन कर सकते हो, तुम उन्हें अपने ऊपर लाद सकते हो; लेकिन तब तुम जीवंत नहीं होगे, तुम मुर्दा हो जाओगे। तुम अपने चारों तरफ एक तरह की शांति भी निर्मित कर ले सकते हो, लेकिन वह शांति मरघट की शाति होगी, मुर्दा शाति होगी। सिद्धांतों के कारण तुम्हें जीवन के उपद्रव कम प्रभावित करेंगे; लेकिन तब तुम कम संवेदनशील होगे, कम जीवित होंगे।
तो तथाकथित सिद्धांतवादी लोग सदा मुर्दा होते हैं। उन्हें देखो! वे शांत, मौन, स्थिर मालूम पड़ते हैं; लेकिन उनके चारों ओर सदा एक मुर्दनी छाई रहती है। मृत्यु की काली छाया उन्हें सदा घेरे रहती है। उनके आस—पास तुम्हें जीवन का उत्सव नहीं मिल सकता है, जीवन का नृत्य नहीं मिल सकता है। तुम्हें उनके आस—पास जीवन की उत्फुल्लता नहीं मिल सकती है। उन्होंने अपने चारों ओर एक कवच निर्मित कर लिया है, एक सुरक्षा—कवच खड़ा कर लिया है। कुछ भी उनके भीतर नहीं प्रवेश कर सकता है, उनके चरित्र की दीवार, उनके सिद्धांतों की दीवार सबको बाहर ही रोक देती है।
लेकिन वे एक तरह के कारागृह में हैं, कैदी हैं। और वे अपने ही हाथों कैदी बने हुए हैं। अगर तुम अपने लिए ऐसा जीवन चुनते हो तो तंत्र को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। तुम ऐसा जीवन चुनने को स्वतंत्र हो जो कि जीवन ही नहीं है।
एक बार मुल्ला नसरुद्दीन कब्रिस्तान देखने गया। वहां उसने देखा कि एक संगमरमर का बना अत्यंत सुंदर मकबरा है, और उसके ऊपर रथचाइल्ड का नाम खुदा है। उसे देखते ही मुल्ला बोल उठा : 'अहा, इसे मैं जीवन कहता हूं! इसे ही मैं जीवन कहता हूं। सुंदर संगमरमर का मकबरा।
लेकिन कितना ही सुंदर हो, यह जीवन नहीं है। संगमरमर है, सुंदर और कीमती है; पर जीवन नहीं है। सिद्धांतों के द्वारा, आदर्शों के द्वारा, आरोपणों के द्वारा तुम अपने जीवन को मकबरा बना सकते हो, लेकिन तब तुम मरे —मरे हो जाओगे। ही, तब तुम ज्यादा सुरक्षित होगे, क्योंकि मृत्यु खुलापन नहीं है। मृत्यु सुरक्षा है; जीवन सदा असुरक्षित है। जीवित व्यक्ति को कुछ भी हो सकता है, लेकिन मृत व्यक्ति को कुछ भी नहीं हो सकता। मुर्दा सुरक्षित है। उसके लिए भविष्य ही न रहा; किसी परिवर्तन की संभावना न रही। उसे वह चीज घटित हो गई जो अंतिम है, मृत्यु घटित हो गई, अब और कुछ घटित होने को नहीं है।
सिद्धांतों में दबा व्यक्तित्व मरा हुआ व्यक्तित्व है। तंत्र को उसमें कोई उत्सुकता नहीं है। लेकिन तंत्र को एतराज भी नहीं है। अगर तुम्हें मुर्दा होना अच्छा लगता है तो यह तुम्हारा चुनाव है। तुम आत्मघात कर सकते हो। यह आत्मघात ही है। लेकिन तंत्र उनके लिए है जो ज्यादा जीवित हैं। और सत्य या परम तत्व मृत्यु नहीं है। वह जीवन है। स्मरण रहे, परम तत्व मृत्यु नहीं है; वह जीवन है, अतिरेक में जीवन है।
जीसस ने कहा है. 'अतिशय जीवन, अनंत जीवन।
मुर्दा होकर तुम सत्य को, परम को नहीं उपलब्ध हो सकते हो। वह तो जीवन है, अनंत जीवन है, मुर्दा होकर तुम कभी उससे संपर्क नहीं कर सकते हो। ज्यादा जीवंत, ज्यादा खुले, ज्यादा संवेदनशील, कम सिद्धांतग्रस्त और ज्यादा बोधपूर्ण होकर ही तुम अनंत जीवन को उपलब्ध हो सकते हो।
और तुम सिद्धांतों की खोज क्यों करते हो? तुमने गौर से नहीं देखा होगा कि तुम क्यों सिद्धांतों को पकड़ते हो। कारण यह है कि सिद्धांतों को पकड़ने से तुम्हें सजग रहने की जरूरत नहीं रह जाती, सिद्धांतों से जीने पर तुम्हें सावचेत रहने की जरूरत नहीं होती।
समझो कि मैं अहिंसा को अपना सिद्धांत बना लेता हूं और उसका पालन करता हूं या सत्य बोलने को अपना सिद्धांत बना लेता हूं और उसका पालन करता हूं। तब यह मेरी आदत बन जाती है, मैं सत्य बोलने को, सदा सत्य बोलने को अपनी आदत बना लेता हूं। यह मेरे लिए एक यांत्रिक आदत बन जाती है; अब मुझे सजग रहने की जरूरत न रही। मैं अब झूठ नहीं बोल सकता, क्योंकि एक सिद्धांत, एक आदत सदा बाधा देगी, रोकेगी।
समाज सिद्धांतों पर निर्भर है। इसलिए समाज बच्चों को सिद्धांतों की शिक्षा देता है, बच्चों में सिद्धांतों के संस्कार डालता है। और तब बच्चे सच ही उन सिद्धांतों के विरोध में जाने में असमर्थ हो जाते हैं।
लेकिन जब कोई व्यक्ति असमर्थ हो जाता है तो मुर्दा हो जाता है। तुम्हारा सत्य तभी जीवंत है जब वह सजगता से आता है, सिद्धांत से नहीं। सच होने के लिए तुम्हें क्षण— क्षण सावचेत रहना होगा। सत्य कोई सिद्धांत नहीं है, सत्य तुम्हारे बोध से जन्मता है। अहिंसा कोई सिद्धांत नहीं है; अगर तुम सजग हो तो तुम हिंसा नहीं कर सकते।
लेकिन सजग होना कठिन है, दुष्कर है; उसके लिए तुम्हें अपने को समग्रत: रूपांतरित करना होगा। सिद्धांतों और नियम—निषेधों के अनुसार जीना बहुत आसान है। तब तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं रहती है। तब तुम्हें सजग और सावचेत रहने की फिक्र नहीं करनी पड़ती है। तब सिद्धांतों से काम चल जाता है। तब तुम्हारा जीवन पटरियों पर चलने वाली रेलगाड़ी की भांति हो जाता है; तुम्‍हारे सिद्धांत पटरियों का काम दे देते है। और तब तुम्हें मार्ग से भटकने का भय भी नहीं रहता है। सच तो यह है कि तुम्हारा कोई मार्ग ही नहीं है; बस यांत्रिक पटरियां हैं जिन पर तुम्हारी गाड़ी चलती रहती है। और तुम अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाओगे; तुम्हें डरने की जरूरत न रही। तुम सोए रहोगे तो भी गाड़ी पहुंच जाएगी। वह मुर्दा रास्तों पर चल रही है; वे रास्ते जीवंत नहीं हैं।
लेकिन तंत्र का कहना है कि जिंदगी रेल की भांति नहीं, नदी की भांति है। जिंदगी लोहे की बनी पटरियों पर नहीं चलती है, वह नदी की भांति है, जिसका कोई बना बनाया मार्ग नहीं है। जैसे—जैसे नदी बहती है, उसका मार्ग बनता जाता है। जैसे—जैसे नदी बहती है, अपना मार्ग स्वयं बनाती चलती है। और नदी सागर तक पहुंच जाती है।
जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए—अगर तुम तंत्र को समझते हो। जीवन नदी की भांति है। उसके बने बनाए मार्ग नहीं हैं, उसके कोई नक्‍शे नहीं हैं जिनका अनुगमन करना है। बस बोधपूर्ण और सजग रहो। और फिर जीवन तुम्हें जहां भी ले जाए, श्रद्धा से उसके साथ जाओ। तंत्र श्रद्धा है—जीवन—ऊर्जा में श्रद्धा। तुम उसके हाथों में अपने को सौंप दो। उसके साथ जबरदस्ती मत करो, अपने को उसके हाथों में छोड़ दो, समर्पित हो जाओ, और उसे तुम्हें सागर की ओर ले चलने दो। तुम बस सावचेत रहो, इतना पर्याप्त है। जब जीवन तुम्हें सागर की ओर ले चले तो तुम सावचेत रहो, ताकि कुछ भी चूके नहीं।
यह स्मरण रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि तंत्र न केवल साध्य की चिंता लेता है, वह साधन की भी उतनी ही चिंता लेता है। वह मंजिल की ही नहीं, मार्ग की भी उतनी ही फिक्र करता है। अगर तुम सावचेत हो तो यह जीवन भी आनंदपूर्ण हो जाएगा। नदी की यात्रा ही अपने आप में आनंद है। उसका घाटियों और चट्टानों से होकर गुजरना, पहाड़ियों से छलांगें लेना, अज्ञात की ओर बहना, सब अपने आप में आनंद है। तो यात्रा में भी सजग रहो, क्योंकि सागर या परम सिर्फ अंत में घटित होने वाली घटना नहीं हो सकती, असंभव है। यह एक विकास है, नदी सागर होने की दिशा में बढ़ रही है। नदी सागर से मिलने ही नहीं जा रही है, वह स्वयं सागर होने की दिशा में बढ़ रही है। और यह केवल अनुभवों से, सजग अनुभवों से, गति से और श्रद्धा से ही संभव है।
खोज के प्रति, मनुष्य की खोज के प्रति तंत्र की यही दृष्टि है। निश्चित ही यह खतरनाक है। यदि नदियों के लिए पूर्व—निर्धारित मार्ग होते तो खतरा कम होता, भूलें भी कम होतीं; लेकिन तब जीवंत होने का सारा सौंदर्य नष्ट हो जाता। तो सिद्धांतों की लकीर के फकीर मत बनो, ज्यादा से ज्यादा जागरूकता को बढ़ाओ। और तब वे सिद्धांत भी तुम्हें स्वत: आविर्भूत होंगे, लेकिन तब तुम उनके कैदी न होगे।

 तीसरा प्रश्न :

कल का दूसरा सूत्र कहता है : 'अन्य देशनाओं की शुद्धता हमारे लिए अशुद्धता ही है। वस्‍तुत: किसी को भी शुद्ध या अशुद्ध की तरह मत मानों। अगर कुछ भी अशुद्ध नहीं है। तो दूसरों की देशनाएं अशुद्ध कैसे हो सकती है?
स्तुत: कुछ भी अशुद्ध नहीं है, लेकिन जो देशना कहती है कि कुछ शुद्ध है और कुछ अशुद्ध, उसे छोड़ना जरूरी है। उसी अर्थ में सूत्र कहता है 'अन्य देशनाओं के लिए जो शुद्धता है वह हमारे लिए अशुद्धता ही है।'
कुछ भी शुद्ध—अशुद्ध नहीं है; लेकिन अगर कोई सिखाता है कि कुछ शुद्ध है और कुछ अशुद्ध है तो तंत्र कहता है कि इस शिक्षा को छोड़ना होगा। उसी अर्थ में सूत्र कहता है कि 'अन्य देशनाओं की शुद्धता हमारे लिए अशुद्धता ही है।यह बस भेदभाव से बचने की बात है। इसका एक ही मतलब है कि कोई भेद मत करो, निर्दोष रहो।
लेकिन जीवन की जटिलता को तो देखो! यदि मैं कहूं कि निर्दोष रहो और तुम निर्दोष रहने की चेष्टा करो हो तो वह निर्दोषिता नहीं होगी। कैसे हो सकती है? यदि तुम चेष्टा करते हो तो वह निर्दोषिता नहीं, हिसाब—किताब है। निर्दोषिता प्रयास से नहीं आ सकती। तो फिर किया क्या जाए? सिर्फ उन चीजों को छोड़ना है जो चालाकी पैदा करती हैं। निर्दोषिता पैदा करने की चेष्टा मत करो, वह तुम नहीं कर सकते। तुम्हें सिर्फ उन चीजों से बचना है जो तुम्हारे चित्त में चालबाजी पैदा करती हैं। यह परोक्ष है; जब तुम चालाकी के, धूर्तता के मूल कारणों को छोड़ दोगे, तो निर्दोषिता अपने आप आ जाएगी।
कुछ भी न शुद्ध है न अशुद्ध। लेकिन तब करना क्या है? तुम्हारे मन में तो भेदभाव भरा है : यह शुद्ध है और वह अशुद्ध है। तंत्र कहता है : यही हमारे लिए एकमात्र अशुद्धि है, शुद्धि और अशुद्धि की धारणाओं से भरा चित्त ही एकमात्र अशुद्धि है। और तुम अगर यह भेदभाव छोड़ सको तो तुम शुद्ध हो।
यह सूत्र एक दूसरे अर्थ में भी अर्थपूर्ण है। ऐसे शास्त्र हैं जो बहुत जड़ नियमों से भरे हैं। उदाहरण के लिए, कैथोलिक ईसाई और जैन शास्त्र कामवासना के विरोध में हैं। वे कहते हैं कि काम अशुद्ध है, कुरूप है, पाप है। और तंत्र कहता है कि कुछ अशुद्ध नहीं है, कुछ कुरूप नहीं है, कुछ पाप नहीं है। काम भी मार्ग बन सकता है—काम भी मोक्ष का मार्ग बन सकता है। यह तुम पर निर्भर है। कामवासना निर्दोष है, तुम उसे गुणवत्ता प्रदान करते हो। प्रार्थना भी पाप बन सकती है, और कामवासना भी पुण्य बन सकती है। यह तुम पर निर्भर है। मूल्य विषय में नहीं है; मूल्य उसे तुम देते हो।
इस बात को, इस घटना को एक दूसरे ढंग से देखो। तंत्र कहता है कि काम भी मोक्ष बन सकता है। लेकिन तब तुम काम के पास शुद्ध—अशुद्ध, शुभ—अशुभ, नीति— अनीति की किसी धारणा के बिना आओ; इसे सिर्फ ऊर्जा, शुद्ध ऊर्जा समझकर इसके पास आओ। इस ऊर्जा में ऐसे प्रवेश करो जैसे तुम अज्ञात में प्रवेश कर रहे हो। और सो मत जाओ, सजग रहो। जब कामवासना तुम्हें तुम्हारे अस्तित्व के केंद्र तक ले जाए तो सावचेत रहो, मार्ग में सो मत जाओ। सावचेत रहो और सब कुछ अनुभव करो। मार्ग में जो भी घटित हो—विश्राम आए, तनाव आए, शिखर आए, घाटी आए—सबको भोगो।
क्षण भर के लिए तुम्हारा अहंकार विलीन हो जाता है; तुम अपनी प्रेमिका या प्रेमी के साथ एक हो जाते हो। क्षण भर के लिए वहां दो नहीं रहते; शरीर ही दो रहते हैं, लेकिन गहरे में एक गहन मिलन घटित होता है। वे एक हो जाते हैं। होशपूर्ण बने रहो, इस क्षण को नींद में मत गंवा दो। सजग रहो और देखते रहो जो भी घटित होता है।
यह मिलन, यह एकता काम के भीतर छिपी थी, काम तो बाहरी खोल भर था। उसका केंद्रीय बिंदु, उसका सारसूत्र यही था। और यही एकता थी उसकी तुम्‍हें चाह थी, जिसकी तुम्‍हें खोज थी। सारी खोज इसकी ही थी, इसी एकता की, अहंकार—विसर्जन की, एकात्मता के अनुभव की, तनावरहितता की, विश्राम की, इसी समाधि की खोज थी। इसी अर्थ को, इसी मंजिल को तुम इस—उस स्त्री के माध्यम से, इस—उस पुरुष के माध्यम से खोज रहे थे। यही तुम खोज रहे थे, निरंतर खोज रहे थे, लेकिन कोई स्त्री यह समाधि नहीं दे सकती है, कोई पुरुष नहीं दे सकता है। सिर्फ गहन तांत्रिक बोध के द्वारा ही काम—कृत्य खो जाता है और एक गहरी समाधि प्रकट होती है।
तो तंत्र तुम्हारे कृत्यों में नहीं, तुममें उत्सुक है। और अगर तुम अपने प्रेम को ध्यानपूर्ण बना सको, अपने काम को ध्यानपूर्ण बना सको, तो काम रूपांतरित हो जाता है। यही कारण है कि तंत्र किसी को शुद्ध या अशुद्ध नहीं कहता है। और अगर तुम शुद्धता—अशुद्धता की पुरानी शब्दावली का उपयोग करना चाहते हो तो मैं कहूंगा कि तंत्र के लिए नींद अशुद्धता है और जागरण शुद्धता है, बाकी सब चीजें व्यर्थ हैं, बेकार हैं।

 चौथा प्रश्न :

यदि कोई इच्‍छा या भावना हमारे लिए आनंदपूर्ण है और अगर हम उसका बाह्म अभिव्‍यक्‍ति न दें तो क्‍या वह ऊर्जा अनिवार्य रूप से अपने स्‍त्रोत को लौट जाती है और हमें ताजा और ऊर्जावान कर जाती है?

 निवार्य रूप से नहीं। लेकिन अगर तुम होशपूर्ण हो तो ऐसा होता है, अनिवार्य रूप से होता है। ऊर्जा को, किसी भी ऊर्जा को गति करने के लिए मार्ग चाहिए। और कोई ऊर्जा नष्ट नहीं की जा सकती, ऊर्जा अविनाशी है। ऊर्जा रूप बदल सकती है, भिन्न—भिन्न रूप ले सकती है, लेकिन वह कभी विनष्ट नहीं हो सकती, समाप्त नहीं हो सकती। तुम जब किसी ऊर्जा का दमन करना चाहते हो तो तुम अपने साथ महान मूढ़ता कर रहे हो। ऊर्जा का कभी दमन नहीं हो सकता, उसका सिर्फ रूपांतरण हो सकता है। दमित ऊर्जा तो कैंसर बन जाती है, घातक घाव बन जाती है।
जब तुम्हें क्रोध आता है तो उस क्रोध के लिए सामान्यत: दो मार्ग उपलब्ध हैं। तुम उसे प्रकट कर देते हो या दबा देते हो। अगर तुम उसे प्रकट करते हो तो उससे एक श्रृंखला निर्मित होती है। क्योंकि तब तुम दूसरे व्यक्ति में क्रोध पैदा करते हो; अब वह भी क्रोध करेगा। और इस श्रृंखला का कहीं कोई अंत नहीं है। तब तुम फिर क्रोध करोगे, और यह सिलसिला वर्षों चल सकता है। यह चलता रहता है। इसी भांति प्रत्येक व्यक्ति जी रहा है; यह सिलसिला जारी रहता है।
जो और गहरे देखते हैं वे कहते हैं कि यह सिलसिला कई जन्मों तक, जन्मों—जन्मों तक चलता रहता है। तुमने अपने पिछले जीवन में किसी आदमी पर क्रोध किया था, और इस जीवन में फिर उसी व्यक्ति के साथ तुम उसी सिलसिले को दोहराए चले जाते हो। तुम्हें इसका बोध नहीं है; तुम बहुत मजे से इसे भूल गए हो। यह अच्छा है कि तुम सोचते हो कि कुछ नया घटित हो रहा है। लेकिन सौ में निन्यानबे मौकों पर कुछ नया नहीं होता है, पुराने सिलसिले ही बार—बार दोहरते रहते हैं।
कभी किसी अजनबी को देखकर तुम्हें अचानक क्रोध आ जाता है। उसने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा है; तुम उससे पहली बार मिल रहे हो। लेकिन उसे देख कर ही तुम उदास या क्रोधित या हिंसक अनुभव करते हो या तुम उस व्यक्ति से बच निकलना चाहते हो। तुम्हें बहुत बुरा लगता है। क्यों? कोई पुरानी श्रृंखला चालू है। ऊर्जा कभी मरती नहीं, वह जारी रहती है। तो अगर तुम उसे प्रकट करते हो, तो तुम एक अंतहीन श्रृंखला में बंध रहे हो। कभी न कभी तुम्हें इससे बाहर आना होगा। क्योंकि पूरी चीज इतनी व्यर्थ है, यह अपव्यय है। अत: कोई श्रृंखला मत शुरू करो।
तब दूसरा सामान्य विकल्प दमन है। और जब तुम किसी वृत्ति का दमन करते हो तो तुम अपने भीतर घाव पैदा करते हो। उससे दुख होगा, उससे समस्याएं पैदा होंगी। क्रोध दमित होता जाएगा, और तुम क्रोध के ज्वालामुखी बन जाओगे।
यह हो सकता है कि तुम अब अपने क्रोध को व्यक्त न करो, लेकिन अब तुम्हारा समूचा व्यक्तित्व ही क्रोध हो जाएगा। हो सकता है कि अब क्रोध का विस्फोट न हो, कोई तुम्हें किसी को मारते हुए, किसी पर हिंसा करते हुए न देखे, लेकिन अब तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व ही क्रोधपूर्ण होगा। क्योंकि भीतर इतना इकट्ठा क्रोध तुम्हें विषाक्त कर देगा। अब तुम जो कुछ भी करते हो उसमें तुम्हारा क्रोधी अंश मौजूद रहता है। यदि तुम किसी को प्रेम भी करते हो तो वहा भी तुम्हारा क्रोधी हिस्सा मौजूद है; जब तुम भोजन करते हो तब भी वह वहां होगा। तुम अपने भोजन के प्रति हिंसात्मक होगे, प्रेमपूर्ण नहीं। यदि तुम दरवाजा भी खोलोगे तो वह क्रोध उसमें मौजूद होगा, तुम गुस्से से दरवाजा खोलोगे।
एक दिन सुबह—सुबह मुल्ला नसरुद्दीन एक रास्ते से जा रहा था और कसमें खा रहा था और क्रोध में बक रहा था : 'शैतान तुम्हारी आत्मा पर काबू करे और तुम्हारे पेट में चुकंदर उपजे।इसी तरह वह बड़बड़ाता चला जा रहा था कि एक आदमी ने उसे देखा और पूछा. 'मुल्ला, इतनी सुबह—सुबह किसको बद्दुआ दे रहे हो?' मुल्ला ने कहा. 'किसे दे रहा हूं यह मुझे पता नहीं; लेकिन चिंता मत करो, देर—अबेर कोई न कोई मिल ही जाएगा।
अगर तुम क्रोध से भरे हो तो ऐसा होगा। तुम इंतजार में ही बैठे हो, और देर— अबेर कोई आ ही जाएगा। तुम्हारे भीतर आग धधक रही है जो किसी बहाने की, किसी माध्यम की प्रतीक्षा कर रही है, जो तुम्हें अपनी भड़ास निकालने में सहयोगी हो सके।
दमन से तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व क्रोधी हो गया है, हिंसक हो गया है, या कामुक हो गया है। तुम कामवासना का दमन करते हो और तब यह दमित काम तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व पर छा जाता है। तब तुम जो भी देखोगे उसमें काम दिखाई पड़ेगा, जो भी छुओगे उसमें काम दिखाई देगा, जो भी करोगे वह काम—कृत्य होगा। तुम कामवासना का दमन कर सकते हो, वह कठिन नहीं है; लेकिन तब कामवासना तुम्हारे पूरे जीवन पर फैल जाएगी; तुम्हारा रोआं—रोआं कामुक हो जाएगा।
ब्रह्मचारियों को देखो। उनका पूरा चित्त कामुक हो जाता है; वे कामवासना से ही लड़ते रहते हैं; वे कामवासना के ही सपने देखते रहते हैं। वे सतत कामवासना के ही हवाई किले बनाते रहते हैं। वे काम से ग्रस्त हो जाते हैं। जो वृत्ति सहज थी वही विकृत हो गई है।
अगर तुम किसी वृति को अभिव्‍यक्‍ति देते हो तो उसकी श्रृंखला निर्मित होती है और यदि दमन करते हो तो घाव बन जाता है। और दोनों ही ठीक नहीं हैं।
इसलिए तंत्र कहता है कि तुम जो कुछ भी करो—उदाहरण के लिए तुम्हें जब क्रोध आए, जब तुम्हें लगे कि क्रोध आ रहा है—तो सतत सजग रहो। न उसका दमन करो, न उसको अभिव्यक्ति ही दो। एक तीसरा ही काम करो, तीसरा ही विकल्प चुनो—अचानक सजग हो जाओ कि क्रोध आ रहा है।
यह सजगता, यह बोध क्रोध में बहने वाली ऊर्जा को रूपांतरित कर देता है; जो ऊर्जा क्रोध बनती है वही करुणा बन जाती है। बोध से रूपांतरण घटित होता है। जो ऊर्जा कामवासना के नाम से जानी जाती है वही बोध के द्वारा ब्रह्मचर्य बन जाती है। बोध कीमिया है, उससे सब कुछ बदल जाता है।
इसका प्रयोग करो और तब तुम जानोगे। जब तुम किसी वृत्ति के साथ, किसी भाव के साथ, किसी ऊर्जा के साथ बोध को जोड़ देते हो तो बोध से उसका गुणधर्म बदल जाता है। तब वह ऊर्जा वही नहीं रहती है जो वह थी। उसके लिए एक नया मार्ग खुल जाता है। यह ऊर्जा अब लौट कर वहीं नहीं जाने वाली है जहां से यह आई थी; अब यह बहिर्यात्रा नहीं करने वाली है। अब ऊर्जा की क्षैतिज यात्रा समाप्त हो गई, और उसकी एक नई यात्रा, ऊर्ध्व यात्रा शुरू हुई। सजगता के जुड़ते ही ऊर्जा ऊपर की ओर गति करने लगती है। वह एक भिन्न ही आयाम है। बैलगाड़ी क्षैतिज चलती है, हवाई जहाज ऊर्ध्वाकार चलता है, ऊपर उठता है।
मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं। एक सूफी संत अक्सर कहा करता था कि एक आदमी को उसके मित्र ने, जो कि सम्राट था, एक छोटा सा हवाई जहाज भेंट किया। वह आदमी बहुत गरीब था; उसने हवाई जहाज के बारे में सुना ही था, कभी देखा नहीं था। उसने सिर्फ बैलगाड़ी देखी थी, सो उसने सोचा कि यह एक नए ढंग की बैलगाड़ी है। वह अपने दो बैलों को जोतकर हवाई जहाज को घर ले आया, और तब से वह उससे बैलगाड़ी का काम लेता रहा। और वह बहुत प्रसन्न था। इस तरह वह छोटा हवाई जहाज बैलगाड़ी का काम करने लगा।
लेकिन धीरे— धीरे, महज कुतूहलवश वह आदमी इस नई गाड़ी का अध्ययन भी करता रहा। फिर उसे समझ आया कि बैलों की जरूरत नहीं है, इसके भीतर एक मोटर लगी है और यह अपने आप चल सकती है। उसने उसमें तेल डाला, और वह उसे मोटरगाड़ी की भांति चलाने लगा। फिर धीरे— धीरे उसे डैनों का बोध हुआ, और वह विचार करने लगा कि ये किसलिए हैं! उसे लगा कि जिस आदमी ने भी यह गाड़ी बनाई है, वह बहुत ही प्रतिभाशाली आदमी होगा; उसने नाहक ही ये डैने नहीं लगाए होंगे। उन डैनों से उसने अनुमान लगाया कि यह यंत्र उड़ सकता है। फिर उसने कुछ प्रयोग किए और वह हवाई जहाज हवाई जहाज हो गया, वह ऊर्ध्वगमन करने लगा, ऊपर उड़ने लगा।
तुम भी अपने मन का उपयोग बैलगाड़ी की भांति कर रहे हो। यही मन मोटरगाड़ी बन सकता है; तब उसमें बैल जोतने की जरूरत न रहेगी। लेकिन तब भी यह जमीन पर ही चलेगा। यद्यपि इसी मन में डैने भी लगे हैं। तुमने निरीक्षण नहीं किया है, इसीलिए तुम्हें पता म् नहीं है कि इसमें डैने भी हैं। यह मन उड़ सकता है, यह ऊर्ध्वाकार उठ सकता है। और एक बार यह ऊपर की ओर गति करने लगे, एक बार तुम्हारी ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो जाए, तो तुम्हार लिए यह सारा जगत दूसरा हो जाएगा। तब तुम्हारे सभी पुराने प्रश्न गिर जाएंगे, तुम्हारी सभी समस्याएं विदा हो जाएंगी। क्योंकि तुम ऊपर उठने लगे।
वे समस्याएं तभी तक थीं जब तक तुम जमीन पर, सपाट चल रहे थे। बैलगाड़ी की

 समस्याएं हवाई जहाज के लिए समस्याएं नहीं हैं। सड़क ठीक नहीं थी, इससे समस्या थी। सड़क अवरुद्ध थी, इससे समस्या थी। अब ये समस्याएं न रहीं, क्योंकि सड़क की जरूरत ही न रही। सड़क अवरुद्ध है या ठीक नहीं है, इससे कोई मतलब ही नहीं है।
नैतिक शिक्षा बैलगाड़ी जैसी शिक्षा है, तंत्र की शिक्षा ऊर्ध्वाकार है। यही कारण है कि वे सब समस्याएं तंत्र के लिए असंगत हैं। जिस ऊर्जा को तुम काम, क्रोध, लोभ या अन्य रूपों में जानते थे वह क्षैतिज चलती थी। जब तुमने उस ऊर्जा को जागरूकता से जोड़ दिया, तुमने एक नया आयाम खोल दिया। सिर्फ जागरूक होने से तुम ऊपर उठने लगते हो। क्यों? किसी तथ्य को देखो। जब तुम जागरूक होते हो तो तुम सदा तथ्य से ऊपर होते हो। किसी भी चीज के प्रति सावचेत होते ही तुम तथ्य के ऊपर हो जाते हो। तथ्य कहीं नीचे है, दूर घाटी में है, और तुम ऊपर से, शिखर से उसे देख रहे हो। जब भी तुम किसी चीज के साक्षी होते हो, तुम ऊपर उठ जाते हो, और वह चीज नीचे रह जाती है।
अगर यह साक्षीभाव प्रामाणिक हो और तुम सतत सजग रह सको, तो जो ऊर्जा काम—क्रोध के रूप में क्षैतिज गति करती थी, वह इस नए आयाम में गति कर जाएगी। वह तुम्हारे पास, साक्षी के पास पहुंच जाएगी। और तब तुम आकाश में उड़ने लगे।
और तुम जन्मों—जन्मों से इस यंत्र का उपयोग बैलगाड़ी की तरह कर रहे थे जो कि उड़ सकता था। और इस तरह नाहक समस्याएं पैदा कर रहे थे, क्योंकि तुम्हें पता ही नहीं था कि तुम्हारी संभावना क्या है।

 पांचवां प्रश्न :

आपने कहा की व्‍यक्‍ति को क्रोध का न भोग करना चाहिए न दमन, उसे कुछ न करते हुए सजग और ध्यानपूर्ण रहना चाहिए। स्वभावत: दमन या भोग से बचने के लिए एक प्रकार के आंतरिक प्रयास की जरूरत होगी; लेकिन तब क्‍या वह भी एक प्रकार का दमन नहीं होगा?

 हीं, यह प्रयास तो है, लेकिन दमन नहीं है। प्रत्येक प्रयास दमन नहीं है। प्रयास तीन तरह के हैं। एक प्रयास वह है जिससे अभिव्यक्ति होती है; जब तुम अपने क्रोध को प्रकट करते हो तो वह एक प्रयास है। दूसरी तरह का प्रयास वह है जिससे तुम दमन करते हो।
जब तुम क्रोध प्रकट करते हो तो तुम क्या करते हो? तुम अपनी ऊर्जा को बाहर फेंक रहे हो, किसी व्यक्ति पर, किसी विषय पर उसे फेंक रहे हो। तुम अपनी ऊर्जा बाहर फेंक रहे हो, जिसका लक्ष्य दूसरा है। ऊर्जा दूसरे की ओर गति करती है; यह प्रयास है। और जब तुम दमन करते हो तो तुम ऊर्जा को उसके मूल स्रोत की ओर वापस लौटाते हो, अपने हृदय की और वापस लाते हो। तब तुम ऊर्जा को पीछे ढकेलते हो। यह भी प्रयास है। लेकिन इसकी दिशा भिन्न है। अभिव्यक्ति में ऊर्जा तुम से दूर गति करती है; दमन में वह तुम्हारे पास गति करती है।
तीसरी चीज है सजगता, निष्‍क्रिय सजगता। वह भी प्रयास है। लेकिन इसका आयाम भिन्न है; इसमें ऊर्जा ऊर्ध्वगमन करती है। आरंभ में यह भी प्रयास है। जब मैं तुम्हें कहता हूं कि निष्किय रूप से सजग रहो, तो आरंभ में यह निष्किय सजगता भी तुम्हारे लिए प्रयास ही होगी। धीरे— धीरे जैसे—जैसे तुम इससे परिचित होते जाते हो, यह प्रयास नहीं रहती है। और जब यह प्रयास नहीं रहती है तब सजगता और भी निष्‍क्रिय हो जाती है। और यह जितनी निष्‍क्रिय होती है उतनी ही चुंबकीय हो जाती है; ऊर्जा को ऊपर की ओर खींचने लगती है।
लेकिन आरंभ में सब कुछ प्रयास होगा। शब्दों के चक्कर में मत पड़ो; उससे समस्याएं खड़ी होती हैं। संतों ने सदा ही अप्रयास की बात की है; वे कहते हैं कि कोई प्रयास मत करो। लेकिन आरंभ में यह भी एक प्रयास ही होगा। जब हम प्रयासरहित होने को कहते हैं तो उसका इतना ही मतलब है कि जबरदस्ती मत करो, बोध के द्वारा घटित होने दो। अगर तुम जबरदस्ती करोगे तो तनावग्रस्त हो जाओगे। और तुम्हारे तनावग्रस्त होने पर क्रोध ऊपर की ओर गति नहीं कर सकता; तनाव की गति क्षैतिज है। सिर्फ तनावमुक्त चित्त ही ऊपर उठ सकता है, बादलों की तरह आकाश में तिर सकता है।
आकाश में अनायास तिरते बादलों को देखो। अपने साक्षी— भाव को भी तिरते बादलों की भांति भीतर आने दो। आरंभ में यह भी प्रयास ही होगा; लेकिन इतना स्मरण रहे कि इसे प्रयासशून्य होना है। तो तुम प्रयास भी करोगे और साथ ही साथ उसे ज्यादा से ज्यादा स्वत: भी घटित होने दोगे।
यह कठिन है, क्योंकि कठिनाई भाषा के कारण पैदा होती है। अगर मैं तुम्हें शिथिल होने को, विश्राम में होने को कहता हूं तो तुम क्या करते हो? तुम एक तरह का प्रयास ही करते हो। लेकिन फिर मैं कहता हूं कि प्रयास मत करो, क्योंकि प्रयास से तनाव पैदा होता है और तुम विश्राम में नहीं हो सकते। तो मैं तुम्हें कहता हूं कि बस विश्राम करो। इससे तुम हैरान होते हो और अनिवार्यत: पूछते हो : 'क्या मतलब है आप का? अगर मुझे कोई प्रयास नहीं करना है तो मैं क्या करूं?'
तुम्हें कुछ भी नहीं करना है, लेकिन आरंभ में वह नहीं करना करने जैसा मालूम पड़ेगा। तो मैं कहूंगा कि ठीक है, थोड़ा—सा प्रयास करो, लेकिन स्मरण रहे कि उस प्रयास को पीछे छोड़ देना है। आरंभ करने के लिए थोड़ा सा प्रयास करो। तुम न करने की भाषा नहीं समझ सकते हो, तुम सिर्फ करने की भाषा ही समझ सकते हो, इसलिए करने की भाषा का उपयोग करना पड़ता है। लेकिन केवल आरंभ करने के लिए प्रयास का उपयोग करो, और याद रखो कि तुम जितनी जल्दी प्रयास को छोड़ दोगे उतना अच्छा होगा।
मैंने सुना है कि जब मुल्ला नसरुद्दीन बहुत का हो गया तो उसे अनिद्रा का रोग पकड़ गया। उसे नींद ही नहीं आती थी। सब तरह का उपचार किया गया, गर्म स्नान, गोलियां, ट्रैंक्येलाइजर्स, अर्क—आसव सब दिए गए, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। कोई चीज कारगर नहीं सिद्ध हुई। और सब बच्चे परेशान हो गए, क्योंकि मुल्ला न खुद सोता था और न औरों को ही सोने देता था। पूरे परिवार के लिए रात काटना मुश्किल हो गया था। परिवार के लोग बुरी तरह किसी दवा, किसी उपाय की खोज में थे, जिससे मुल्ला को नींद आ सके, क्योंकि पूरा परिवार पागल हो रहा था।
अंत में एक सम्मोहनविद को बुलाया गया। बच्चे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने जाकर बूढ़े मुल्ला को कहा : 'पापा, अब आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह आदमी तो अदभुत है; क्षणों में नींद ला देता है। उसे नींद का जादू पता है; आप फिक्र न करें। अब कोई डर नहीं है, आप सो सकेंगे।
सम्मोहनविद ने मुल्ला को जंजीर से लटकी एक घड़ी दिखाई और कहा : ' थोड़ी सी श्रद्धा से चमत्कार हो जाता है। आप मुझमें थोड़ा भरोसा करें, थोड़ी श्रद्धा करें, और आप छोटे बच्चे की भांति नींद में चले जाएंगे। आप इस घड़ी की ओर देखें।यह कहकर सम्मोहनविद घड़ी को बाएं—दाएं घुमाने लगा। नसरुद्दीन घड़ी को देखने लगा और उस सम्मोहनविद ने कहा : 'बाएं—दाएं, बाएं—दाएं! आपकी आंखें थक रही हैं, थक रही हैं; आप नींद में उतर रहे हैं नींद में उतर रहे हैं, नींद में उतर रहे हैं, नींद में उतर रहे हैं।
सब लोग खुश थे। मुल्ला की आंखें बंद हो गईं। उसका माथा नीचे झुक गया, और वह छोटे बच्चे की तरह गहरी नींद में उतरता मालूम पड़ा। उसकी श्वास लयबद्ध होकर चलने लगी। सम्मोहनविद ने अपनी फीस ली, होंठों पर अंगुली रखकर बच्चों को इशारे से कहा कि अब कोई उसकी नींद में बाधा न दे। और वह चुपचाप चला गया।
ज्यों ही सम्मोहनविद बाहर गया कि मुल्ला ने एक आंख खोली और कहा. 'पागल! क्या वह चला गया?'
मुल्ला शिथिल होने का प्रयास कर रहा था! वह बच्चे की तरह शिथिल हो गया। उसने आंखें बंद कर लीं और लयबद्ध ढंग से श्वास लेने लगा। लेकिन यह सब प्रयास था। वह सम्मोहनविद को सहयोग दे रहा था, वह समझा कि मैं सहयोग दे रहा हूं; लेकिन उसके लिए यह सब चेष्टित था, इसलिए कुछ न हुआ। कुछ हो भी नहीं सकता था। वह जागा ही रहा। अगर मुल्ला सिर्फ निष्‍क्रिय रहा होता, अगर उसने वह सुना होता जो उससे कहा जा रहा था, वह देखा होता जो दिखाया जा रहा था, तो नींद जरूर आ गई होती। उसे कोई प्रयास करने की जरूरत न थी; एक निष्‍क्रिय स्वीकृति काफी थी।
तुम्हें भी अपने मन को निष्‍क्रिय स्वीकृति के लिए राजी करने के लिए शुरू में प्रयास की जरूरत होगी। तो प्रयास से मत डरो; प्रयास से शुरू करो। लेकिन स्मरण रहे कि प्रयास को भी पीछे छोड़ देना है, प्रयास के भी पार जाना है। और जब तुम पार चले जाओगे तो ही तुम निष्‍क्रिय हो सकोगे। और यह निष्‍क्रिय बोध ही चमत्कार लाता है। निष्‍क्रिय बोध में मन नहीं रहता है, और पहली बार तुम्हारे अस्तित्व का आंतरिक केंद्र प्रकट होता है। और इसका कारण है।
संसार में कुछ भी करने के लिए प्रयास जरूरी है। अगर तुम संसार में कुछ करना चाहते हो, कुछ भी करना चाहते हो, तो प्रयास जरूरी है। लेकिन अगर तुम अपने अंतरस्थ में कुछ करना चाहते हो तो प्रयास जरूरी नहीं है। वहां केवल विश्राम जरूरी है। वहां अकर्म ही कला है—ठीक वैसे ही जैसे, बाहरी संसार में कर्म कला है।
यह निष्कि्रय जागरूकता कुंजी है।
लेकिन भाषा के कारण परेशान होने कीं जरूरत नहीं है, प्रयास से शुरू करो। सिर्फ इतना ध्यान रखना है कि प्रयास को छोड़ना है, छोड़ते जाना है। यह छोड़ना भी पहले प्रयास ही होगा। लेकिन एक क्षण आता जब सब कुछ चला जाता। तब तुम, मात्र हो; कुछ करते नहीं हो, बस होते हो।
और यह होना ही समाधि है। और जो भी जानने योग्य है, जो भी होने योग्य है, जो भी पाने योग्य है, इस अवस्था में तुम्हें उपलब्ध हो जाता है।

आज इतना ही।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें