रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रेम का मार्ग अनूठा—छठवां
प्रवचन
प्रश्नसार:
ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय।
न मैं जानूं आरती-वंदन, न पूजा की रीत,
लिए री मैंने दो नयनों के दीपक लिए संजोय।
ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय!
आंसुओं के सिवाय कुछ नहीं है। मैं आपको क्या
चढ़ाऊं?
आपका युवकों के लिए क्या संदेश है?
शिशय और अनुयायी में क्या फर्क है?
क्या काव्य में भी उतना ही सत्तय नहीं होता है
जितना कि बुद्धपुरुषों के वचनों में?
आपने कहा था कि पूंछ भी जाएगी। आपके चरणों की
कृपा से वह भी गई। संतत्तव कब घटेगा, मेरे मालिक? अब देरी क्यों?
अप्रैल फूल के इस महान धार्मिक दिवस पर कुछ कहें।



