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शुक्रवार, 23 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रेम का मार्ग अनूठाछठवां प्रवचन
दिनांक १ अप्रैल, १९८०; श्री रजनीश आश्रम पूना,
प्रश्नसार:

ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय।
न मैं जानूं आरती-वंदन, न पूजा की रीत,
लिए री मैंने दो नयनों के दीपक लिए संजोय।
ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय!
आंसुओं के सिवाय कुछ नहीं है। मैं आपको क्या चढ़ाऊं?

आपका युवकों के लिए क्या संदेश है?

शिशय और अनुयायी में क्या फर्क है?

क्या काव्य में भी उतना ही सत्तय नहीं होता है जितना कि बुद्धपुरुषों के वचनों में?

आपने कहा था कि पूंछ भी जाएगी। आपके चरणों की कृपा से वह भी गई। संतत्तव कब घटेगा, मेरे मालिक? अब देरी क्यों?

अप्रैल फूल के इस महान धार्मिक दिवस पर कुछ कहें।

बुधवार, 21 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रार्थना और प्रतीक्षापांचवां प्रवचन
दिनांक ३१ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—और कितनी प्रतीक्षा करूं? और कितनी देर है? प्रभु-मिलन के लिए आतुर हूं और अब और विरह नहीं सहा जाता है!

2—किन अज्ञात हाथों से पैरों में घुंघरू बांध दिए हैं कि अब मैं छम-छम नचंदी फिरां!

3—आपने कहा: कमा लिटिला नियर, सिप्पा कोल्डा बियर। मैं आपसे कहता हूं: आई एम हियर, व्हेयर इज़ दि बियर?

4—बंधी परंपराओं के विरुद्ध आपके विचार बहुत अच्छे व प्रेरणादायी लगते हैं, किंतु माला और भगवे कपड़े में बांधने के आपके प्रयास में हमें परंपरा की बू मालूम पड़ती है। हमें लगता है भगवान का संबोधन स्वीकार करने और माला तथा भगवे रंग के कपड़ों को देने के पीछे आपकी एक पीर-पैगंबर या अवतारी पुरुष होने की वासना छिपी हुई है। यह मेरा नितांत भ्रम भी हो सकता है। कृपा करके इसका निवारण करें।

मंगलवार, 20 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

श्रद्धा की अनिवार्य सीढ़ी: संदेहचौथा प्रवचन
दिनांक ३० मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—क सिवाय ध्यान के आपकी हर बात को मैंने सहजता से स्वीकार नहीं किया--संन्यास भी, कपड़े भी और माला भी। हर बात पर मैंने विरोध किया, विद्रोह किया और अवज्ञा भी। बार-बार भागने को चाहा, और हर बार और ज्यादा खिंचता चला आया। फिर भी मुझ अपात्र को आपने स्वीकार किया। आज आपके प्रेम में डूबा जा रहा हूं। भीतर न कोई विरोध है, न विद्रोह; सब शांत और मौन है। फिर भी एक अपराध-भाव सताता है। प्रभु, आप जीते, मैं हारा। मुझे माफ कर दें। आपकी असीम अनुकंपा के लिए अनुगृहीत हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें!

2—मैं संन्यास लेने के पहले आश्वस्त होना चाहता हूं कि मुझे निर्वाण पाने में सफलता मिलेगी या नहीं?

सोमवार, 19 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

रसो वै सः—तीसरा प्रवचन
दिनांक 29 मार्च, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—ईश्वर को खोजना है। कहां खोजें?

2—आप कहते हैं, संन्यासी को सृजनात्मक होना चाहिए। सो मैंने काव्य-सृजन शुरू कर दिया है। मगर कोई मेरी कविताएं सुनने को राजी नहीं है। आपका आशीष चाहिए।

3—आपकी "नारी के समान अधिकार' की बातें बहुत अच्छी लगीं। इसके अतिरिक्त जो आप इच्छाओं को न दबाने और उनसे न लड़ने की बात कहते हैं, वह भी हृदय को स्पर्श करती है। किन्तु इसके साथ-साथ जब आद्य शंकराचार्य, पतंजलि और तुलसी वगैरह की बातें याद आ जाती हैं तो द्वंद्व खड़ा होता है। शंकराचार्य ने नारी की निंदा किस दृशिट से की है? अद्वय ब्रह्म का अनुभवी क्या ऐसी निंदा कर सकता है? क्या वे भी केवल एक विद्वान मात्र थे, अनुभवी नहीं? पतंजलि समाधि के लिए यम-नियम पर विशेष जोर देते हैं, आप नहीं। इसका क्या कारण हैं?

4—जब भी मैं भारतीयों को आश्रम दिखाने ले जाता हूं तो विदेशी स्त्रियों को देख कर, संन्यासिनियों को देख कर वे एकदम ठगे खड़े रह जाते हैं, एकदम उनके मुंह से लार टपकने लगती है। ऐसा क्यों?

5—क्या सच ही मारवाड़ियों को शैतान भी धोखा नहीं दे सकता?

रविवार, 18 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

ध्यान ही मार्ग है-(दूसरा प्रवचन)
दिनांक 28 मार्च; 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:
1—यह संसार माया है। यहां सब झूठ है। मुझे इसमें डूबने से बचाएं!

2—मैं अज्ञान में बच्चे पैदा करता चला गया। दस बच्चे हैं मेरे, अब क्या करूं?

3—वह पांचवां क क्या है? बहुत सोचा लेकिन नहीं सोच पाया। किसी और से पूछूं, हो सकता था कोई बता देता। लेकिन फिर सोचा आप से ही क्यों न पूछूं?


पहला प्रश्न: यह संसार माया है। यहां सब झूठ है। मुझे इसमें डूबने से बचाएं।

राधिका प्रसाद! माया में कोई डूब कैसे सकता है? झूठ में डूबने का कोई उपाय है? जो नहीं है, उसमें डूब सकोगे? चाहोगे तो भी नहीं डूब सकोगे। ऐसी नदी में डूबो, जो है ही नहीं; ऐसे जाल में फंसो, जो है ही नहीं--यह कैसे संभव हो सकता है?

शनिवार, 17 जून 2017

रहिमन धागा प्रेम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

आंसू: चैतन्य के फूल—(पहला प्रवचन)
दिनांक २७ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रशनसार:
1--आपकी पहली मुलाकात आंसुओं से हुई थी। इतने साल बीत गए हैं, आंसू अभी मिटते नहीं, मिटने की संभावना लगती नहीं। चाहती हूं इसी तरह मिट जाऊं!
जीवन व्यर्थ लगता है। मैं क्या करूं?
2--आप हमेशा "लिवा लिटिल हॉट, सिप्पा गोल्ड स्पॉट' कहते हैं। आप इसके स्थान पर कभी ऐसा क्यों नहीं कहते--"लिव ए लिटिल हॉट, सिप ए कोल्ड बियर'? आखिर बियर में बहुत प्रोटीन रहता है।
3--कल एक सरदार जी आश्रम देखने आए। उन्होंने कहा: भगवान जी दे दर्शन सानूं अभी करा दो। हमने उत्तर दिया कि आपके दर्शन सुबह प्रवचन में ही होंगे, तो वे मानें ही न। वे बोले: दर्शन तो सानूं अभी ही करा दो। असी ऐनी दूर अमृतसर तो आए हां। साडी गड्डी अभी छूटण वाली है। वे मानें ही न। फिर मैंने अचानक घड़ी देखी, तो देखा बारह बजे हैं।
क्या बारह बजे का कोई विशेष रहस्य है?

शुक्रवार, 16 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-15

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—बारहवां  
दिनांक 10 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—परमात्मा मुझे कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता है। मैं क्या करूं?
2--मैं संन्यास के लिए तैयार हूं। लेकिन यह कैसे जानूं कि परमात्मा ने मुझे पुकारा ही है?
यह मेरा भ्रम भी तो हो सकता है!
3—कल आपने प्रवचन में नसरुद्दीन की कहानी कही--कड़ाही के बच्चे होने वाली।
मैंने संजय को तपेली दी थी। तपेली मर गई, और बाद में छोटी-मोटी तपेलियां भी मर गईं। और अब फिर दिख रहा है कि कड़ाहियों के बच्चे हो रहे हैं।
दो वर्ष पहले आपसे प्रश्न पूछा था, काफी दुख की छाया में था, आपने सूफी कहानी का संदेश दिया था--यह भी गुजर जाएगा। बिलकुल वैसा ही हुआ है।
आपके अमूल्य सूत्र--वर्तमान में होने का और होश को जीवन में उतारने का प्रयत्न करता रहता हूं। प्रश्न कुछ भी नहीं है, फिर भी आपसे कुछ सुनने की प्यास जरूर है!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-14

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौदहवां  
दिनांक 09 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—क्या मेरे सूखे हृदय में भी उस परम प्यारे की अभीप्सा का जन्म होगा?
2—आप वर्षों से बोल रहे हैं। फिर भी आप जो कहते हैं वह सदा नया लगता है।
इसका राज क्या है?
3—मैं संसार को रोशनी दिखाना चाहता हूं। मैं इस महत कार्य को प्रारंभ कैसे करूं?
सज्दों से अब तिश्नगी नहीं बुझती
4—जज्ब हो जाऊं रजनीश तेरे आस्ताने में।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-13

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तैरहवां  
दिनांक 08 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—यह भाव निरंतर उभर आता है कि हो न हो भगवान बुद्ध ने आप ही के रूप में पुनरावतार लिया है। आप बुद्धक्षेत्र निर्मित कर रहे हैं।
या कि आप लाओत्सु हैं, मैत्रेय भी नहीं?
2—मैं सुख को स्वीकार नहीं कर पाता हूं। ऐसा लगता है कि दुख मुझे भाता है। फिर भी चाहता हूं कि सुख मिले। सुख मिलता है तो लगता है कि सपना है। मेरी उलझन सुलझाएं!
3—मैं एक युवती के प्रेम में हूं। मैं आपके भी प्रेम में हूं। अब मैं क्या करूं? सब छोड़-छाड़ कर संन्यास में डूबूं? या फिर आप जैसा कहें! मेरी उम्र अभी केवल छब्बीस वर्ष ही है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-12

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—बारहवां  
दिनांक 07 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—संन्यास का जन्म इस देश में हुआ, उसे गौरीशंकर जैसी गरिमा मिली,
पर आज उसका सम्मान बस ऊपरी रह गया है।
संन्यास और संन्यासी की अर्थवत्ता क्यों कर खो गई, कृपा करके समझाएं!

2—मैं क्या करूं? मेरो मन बड़ो हरामी!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—ग्यारहवां  
दिनांक 06 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...
2—प्रेम पाप है?
3—आपका जीवन-दर्शन इतना सरल, सहज और सत्य है, फिर भी भीड़ आपको गालियां क्यों दिए जाती है?
पहला प्रश्न:
तड़प ये दिन-रात की,
कसक ये बिन बात की,
भला ये रोग है कैसा?
सजन, अब तो बता दे!
अब तो बता दे, अब तो बता दे!
तड़प ये दिन-रात की...

बुधवार, 7 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—दसवां
दिनांक 05 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार-

1—बिन मांगे सच्चे रत्नों से झोली भर दी
बिन चाहे मेरे जीवन में खुशियां भर दीं
ये कैसे क्या कुछ हुआ, इसे कह दो भगवन
अनहोनी थी जो बात, उसे होनी कर दी
2—प्रार्थना कैसे और कब जन्मती है?
3—मैं ध्यान में गहरा जाना चाहता हूं। पर फिर डर लगता है कि पत्नी-बच्चों का क्या होगा?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—नौवां  
दिनांक 04 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—मैं ध्यान करूं या भक्ति?
और चूंकि कुछ तय ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रारंभ भी करूं तो कैसे करूं?
2—आपने एक प्रवचन में कहा था कि पुरुष के लिए "मैं-भाव' और स्त्री के लिए "मेरा-भाव' अर्थात ममता बाधा है। क्या ममता प्रेम का ही दूसरा रूप नहीं है? क्या इतने प्रेमपूर्ण गुण को छोड़ना ही पड़ेगा रूखा-सूखा होकर रहना पड़ेगा?
3—जीवेषणा है क्या? जीवन में इतना दुख हम देखते हैं, कुछ-कुछ समझ में भी आता है,
फिर भी जीए जाने का मन क्यों होता है?
4—मैं आपको सुनता हूं तो चकित हो रह जाता हूं। अवाक होता हूं, आश्चर्यविमुग्ध होता हूं, लेकिन संन्यास में छलांग नहीं लगा पाता हूं। क्या करूं?

रविवार, 4 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—आट्ठवां  
दिनांक 03 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार

1—तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
कब तक बरसेगी ज्योति बार कर मुझको?
निकलेगा रथ किस रोज पार कर मुझको?
किस रोज लिए प्रज्वलित बाण आओगे?
खींचते हृदय पर रेख निकल जाओगे?
किस रोज तुम्हारी आग सीस पर लूंगा?
बाणों के आगे प्राण खोल धर दूंगा?
यह सोच विरह में अकुला कर,
ये गान बहुत रोए।
तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोए।
2—आपने कहीं कहा है कि मनुष्य की सुख की खोज ही बताती है कि मनुष्य दुखी है।
उसका यह बुनियादी दुख क्या है? और क्या इस दुख का निरसन भी है?
3—आप कुछ करें! आदमी रोज-रोज पापों की गर्त में डूबा जा रहा है।
आदमी ऐसा बुरा तो कभी न था, जैसा आज है। आदमी को आखिर हो क्या गया है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—सातवां  
दिनांक 02 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—संन्यास देकर आपने एक नया ही जीवन प्रदान किया है। सिर्फ एक ही कांटा चुभता है--इतनी सुविधा और सामीप्य होने पर भी मैं आपको पूरा का पूरा नहीं पी पा रहा हूं। अब दुई खलती है। अब मिटा ही डालें।
2—आश्रम में रह कर बहुत आनंदित हूं; पर कभी-कभी अचानक उदास हो जाती हूं।
यह उदासी क्या है, जो आती है और जाती है?
3—मैं मृत्यु से बहुत डरता हूं। क्या करूं?
4—आपने भीतर के सदगुरु की बात कही। उसका क्या अर्थ है?
वे सदगुरु कब और कैसे जाग्रत होते हैं?
5—आपका संदेश?

शनिवार, 3 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—छट्ठवां  
दिनांक 01 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—आपने वर्तमान प्रवचनमाला को नाम दिया: प्रेम-पंथ ऐसो कठिन!
आप तो कहते हैं कि प्रेम होता है, किया नहीं जाता। फिर प्रेम का मार्ग कैसे बन सकता है? और वह कठिन कैसे हो गया?
2—प्रेम अव्याख्य क्यों है?
3—आप भारत देश की महानता के संबंध में कभी भी कुछ नहीं कहते हैं। न ही इस देश के नेताओं की प्रशंसा में कुछ कहते हैं। क्यों?
4—फैलने को है विकल मेरे
हृदय का सिंधु भर कर
छोड़ कर तल आ गई है
आंख में आत्मा उमड़ कर
डोलती दुनिया सम्हालो
ज्वार आकुल फूटता है
शून्य का मैं व्यग्र
हाहाकार होना चाहता हूं
तुम मुझे अपने क्षितिज से
घेर कर बंदी बना लो
मैं तुम्हारे व्योम की
झंकार होना चाहता हूं।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—पांचवां
दिनांक 31 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—आपसे समाधि कैसे चुराएं?
2—मैं तो परमात्मा की याद बहुत करता हूं, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि परमात्मा भी कभी मेरी याद करता है या नहीं?
3—मैंने संसार के सब सुख-दुख को अनुभव कर देखा है। अभी आपके कहे "ग्रुप' करके मेरा हृदय बिलकुल आपके प्रति खुल गया है। दिल होता है आप में पूरा डूब जाऊं और आपके साथ आकाश में उडूं और बहारों में फूल और आनंद बरसाऊं। मुझे अपना लो!
आपकी अनुकंपा अपार है! बहुत धन्यवाद!

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—चौथा  
दिनांक 30 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार:

1—एक कौतुक मैंने देखा: मेरी खोपड़ी में खंजड़ी बज रे लोल!
क्या भक्त को अहंकार होता है? जहां ढूंढा, तो श्री हरि आपको ही पाया।
2—ध्यान की गहराई जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्राणों में जैसे अनेक गीत फूट पड़ने को मचल उठे हों। क्या करूं?
3—क्या संकोच अहंकार को पुष्ट करता है?
किसी के चरणों में गिर जाने की चाह होते हुए भी संकोचवश चरण स्पर्श नहीं करता। संकोच में सोचता हूं कि लोग क्या कहेंगे?
4—क्या आत्मोपलब्धि के लिए सांसारिक जीवन जीना आवश्यक है?

शुक्रवार, 2 जून 2017

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन—तीसरा  
दिनांक 29 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—भारतीय संसद में फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल, धर्म-स्वातंत्र्य विधेयक लाया जा रहा है। ईसाई उसका विरोध कर रहे हैं। मदर टेरेसा ने भी उसका विरोध किया है। आप अपना मंतव्य दें।

2—संन्यास का भाव उठ रहा है और फिर मन भाग रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं संन्यास लेने के योग्य नहीं हूं।

3—पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।
मेरे पिया तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो ज्यों मेहा सावन।
मैं तो चुप-चुप नहा रही।
पिया मेरे तुम अमर सुहागी,
तुम पाए मैं बहु बड़भागी,
मैं तो पल-पल ब्याह रही।
पिया मेरे मैं कुछ नहीं जानूं,
मैं तो चुप-चुप चाह रही।

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-दूसरा
दिनांक 28 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार:

1—परमात्मा शब्द ही मेरी समझ में नहीं आता है। परमात्मा यानी क्या?

2—वैसे गत पंद्रह वर्षों से आप निरंतर प्रेरणा के स्रोत रहे हैं, परंतु यहां आपके ऊर्जा-क्षेत्र में रहते हुए कुछ माह में ही कुछ-कुछ आश्चर्यचकित घटित होने लगा है। हमें इतने दिनों तक दूर क्यों रहना पड़ा, जब कि पहली ही पहचान में आपकी भगवत्ता स्पष्ट हो गई थी?

3—संत विरहावस्था की चर्चा बहुत करते हैं। यह विरह क्या बला है?

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-पहला
दिनांक 27 मार्च सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

प्रश्न-सार

1—साधु-संतों से सुना है कि भक्ति-मार्ग ही एकमात्र सरल और सुगम मार्ग है।
लेकिन रहीम का प्रसिद्ध वचन है:
रहिमन मैन तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोई निबहत नाहिं।।
इस विरोधाभास पर कुछ कहें।

2—क्या प्रभु के लिए अभीप्सा पर्याप्त है?

3—क्या भगवान भक्त के बिना हो सकता है?