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रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-045)

प्रवचन—पैंतालिसवां    
सुख या दुख तुम्हारा ही निर्णय

         पहला प्रश्‍न:

क्‍या मेरी नियति में सिर्फ विषाद की, फ्रस्ट्रेशन की एक लंबी श्रंखला लिखी है?


तुम्‍हारे हाथ में है। लिखते जाओगे, तो लिखी रहेगी। विषाद कोई और तुम्हें नहीं दे रहा है, तुम्हारा चुनाव है। तुमने चुना है। आनंद भी कोई और नहीं देगा। तुम चुनोगे, तो मिलेगा। तुम जो खोज लेते हो, वही तुम्हारा भाग्य है।
भाग्य की पुरानी धारणा कहती है, लिखा हुआ है; और किसी और ने लिखा है, तुमने नहीं। मैं तुमसे कहना चाहता हूं? भाग्य लिखा हुआ नहीं है, रोज—रोज लिखना पड़ता है। और किसी और के द्वारा नहीं, तुम्हारे ही हाथों से लिखा जाता है। यह हो सकता है कि तुम इतनी बेहोशी में लिखते हो कि अपने ही हाथ पराए मालूम होते हैं। यह हो सकता है, तुम इतनी अचेतन अवस्था में लिखते हो कि लिख जाते हो तभी पता चलता है कि कुछ लिख गया। तुम अपने को रंगे हाथ नहीं पकड़ पाते। तुम्हारे होश की कमी है। लेकिन कोई और तुम्हारा भाग्य नहीं लिखता है।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-044)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-चव्वाालिसवाां    

ऊर्जा का क्षण-क्षण उपयोग: धर्म

सारसूत्र:

अभित्थरेथ कल्याणे पापा चित्तं निवारये।
दन्धं हि करोतो पुग्भ् पापस्मिं रमते मनो।।१०२।।

पापग्चे पुरिसो कयिरा न तं कयिरा पुनप्पुनं।
न तम्हि छन्दं कयिराथ दुक्खो पापस्स उच्चयो।।१०३।।

पुग्भ्ग्चे पुरिसो कयिरा कयिराथेन पुनप्पुनं।
तम्हि छन्दं कयिराथ सुखो पुग्भ्स्स उच्चयो।।१०४।।

पापोपि पस्सति भद्रं याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति।।१०५।।

भद्रोपि पस्सति पापं याव भद्रं न पच्चति।
यदा च पच्चति भद्रं अथ भद्रो भद्रानि पस्सति।।१०६।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-043)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-043  

परमात्मा अपनी ओर आने का ही ढंग--प्ररवचन-तीरलिसवां


पहला प्रश्न:

कल तक आप हमें परमात्मा की ओर जाने को कह रहे थे, आज हमें अपनी ही ओर जाने पर जोर दे रहे हैं। आपको तो दोनों ओर, दोनों अतियों में बहना सरल है, खेल है, पर हम कैसे इतनी सरलता से दोनों ओर बहें, आपके साथ-साथ बहें? कृपा कर समझाएं।

जीवन को अतियों में तोड़कर देखना ही गलत है। जीवन को दो में तोड़कर देखने में ही भ्रांति है। तुम अगर कभी एक को भी चुनते हो, तो दो के खिलाफ चुनते हो। तुम्हारे एक में भी दो का भाव बना ही रहता है। तुम एक किनारे को चुनते हो, तो दूसरे किनारे को छोड़कर चुनते हो। छोड़ने से दूसरा किनारा मिटता नहीं। तुम्हारे छोड़ने से दूसरे किनारे के मिटने का क्या संबंध है!
वस्तुतः तुम्हारे इस किनारे को पकड़ने में दूसरा किनारा बना ही रहता है। तुम उसके विपरीत ही इसे पकड़े हो। अगर दूसरा किनारा खो जाए, तो यह किनारा भी कैसे बचेगा? जाते हैं दोनों साथ जाते हैं, रहते हैं दोनों साथ रहते हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-042)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-042  (झुकने से उपलब्धि)

अभिवादनसीलिस्स निच्चं पद्धापचायिनो।
चत्वारो धम्मा बङ्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं।।९६।।

यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो।
एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झयिनो।।९७।।

यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवीरियो।
एकाहं जीवितं सेय्यो विरियमारभतं दल्हं।।९८।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं उदयब्बयं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो उदयब्बयं।।९९।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो अमतं पदं।।१००।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं धम्ममुत्तमं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं।।१०१।।

एस धम्मों संनतनो-(भाग-05) ओशो

एस धम्‍मो संनतनो-(भाग-05)—ओशो


जो बुद्ध के पास था, ठीक उतना ही लेकर तुम भी पैदा हुए हो। तुम्‍हारी वाणी में और बुद्ध की वाणी में रत्‍ती भर का फासला नहीं है। भला तुम्‍हारे तार ढीले हों, थोड़े कसने पड़े। या तुम्‍हारे तार थोड़े कसे हों, थोड़े ढीले करने पड़ें। या तुम्‍हारे तार वीणा से अलग पड़े हो और उन्‍हें वीणा पर बिठाना पड़े लेकिन तुम्‍हारे पास ठीक उतना ही सामान है, उतना ही साज है जितना बुद्ध के पास। अगर बुद्ध के जीवन में संगीत पैदा हो सका, तुम्‍हारे जीवन में भी हो सकेगा। इसी बात का नाम आस्‍था है।


ओशो

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-041)

शब्द: शून्य के पंछी—प्रवचन—इक्तालिसवां


सूत्र:
 

सहस्‍समपि चे वाचा अनत्‍थपदसंहिता।
एकं अत्‍थपदं सेय्यो यं सुत्‍वा उपसम्‍मति ।।91।।

यो सहस्‍सं सहस्‍सेन संगामे मानुसे जिने।
एकं च जेयमत्‍तानं से वे संगामजुत्‍तमो ।।92।।

अत्‍ता हवे जितं सेय्यो या चायं इतरा पज्ञा।
अत्‍तदन्‍तस्‍य पोसस्‍स निच्‍चं सज्‍जतचारिनो ।।93।।

नेव देवो न गन्‍धब्‍बो न मारो सह ब्रह्मुना।
जितं अपजितं कयिरा तथारूपस्‍स जन्‍तुना ।।94।।

मासे-मासे सहस्‍सेन यो यजेथ सतं समं।
एकं च भवितत्‍तानं मुहूत्‍तमपि पूजये।
सा येव पूजना सेय्या यं चे पस्‍ससतं हुतं ।।95।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-040)

चरैवेति-चरैवेति—प्रवचन—चालिसवां 

पहला प्रश्न:

     आप कैसे समझेंगे कि मैं प्रेम में हूं और मैं कैसे समझ कि आपने मेरा प्रेम स्वीकारा?

प्रेम हो तो छिपाए भी नहीं छिपता; और प्रेम न हो तो कितना ही बताओ, बताया नहीं जा सकता।
प्रेम के होने में ही उसकी अभिव्यक्ति है। जैसे सूरज निकलता है, तब सूरज के होने का और क्या प्रमाण चाहिए? सूरज का होना ही काफी प्रमाण है।
प्रेम की रोशनी सूरज से भी ज्यादा है; तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती, क्योंकि सूरज को देखने के लिए तो तुम्हारे पास आंख है, प्रेम को देखने के लिए तुम्हारे पास आंख नहीं। प्रेम हो तो छिपाए नहीं छिपता। प्रेम का होना इस जगत में सबसे सघनीभूत घटना है; उससे ज्यादा सूक्ष्म कुछ भी नहीं है, उससे ज्यादा विराट भी कुछ नहीं है। प्रेम यानी परमात्मा की झलक।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-037)

उपशांत इंद्रियां और कुशल सारथी—प्रवचन—सैंतिसवां



सूत्र:

यस्‍सिन्‍द्रियानि समथं गतानि अस्‍सा यथा यथा सारथिना सुदंता।


पहीनमानस्‍स अनासवस्‍स देवापि तस्‍स पिहृयंति तादिनो ।।85।।


पठवीसमो नौ विरूज्‍झतिइंदरवीलूपमो तादि सुब्‍बतो।
रहदो व अपेत—कद्दमो संसारान भंवति तादिनो ।।86।।

संतं अस्‍स मनं होति संता वाचा न कस्‍स च।
सम्‍मदज्‍जा विमुत्‍तस्‍स अपसंतस्‍स तादिनो।।87।।



      संसार तो एक बाजार है; स्वयं को छोड़कर  सभी कुछ वहां मिलता है। जो पाने योग्य है, उसे छोड़कर  सभी कुछ वहां पाया जा सकता है। जिसे पाकर और पाने की सब चाह चली जाती है, बस उसी को तुम वहां न पा सकोगे। बहुत कुछ वहां मिलता है, सभी कुछ वहां मिलता है, लेकिन जो भी वहां मिलता है, उससे और पाने की चाह बढ़ती चली जाती है। जल कुछ ऐसा मिलता है कि प्यास घटती नहीं, जलन बुझती नहीं, तृप्ति आती नहीं; जैसे जल नहीं, प्यास की आग में संसार घी बनकर पड़ता चला जाता है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-10

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दसवां-(ध्यान: प्यास का अनुसरण)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।

एक मित्र ने पूछा है कि जिस प्रभु का हमें पता नहीं, उसका नाम लेकर संकल्प कैसे करें?

प्रभु का तो पता नहीं है। लेकिन सच ही प्रभु का पता नहीं है? क्योंकि जब भी हम प्रभु से कोई प्रतिमा--कोई राम, कोई कृष्ण, कोई बुद्ध का खयाल ले लेते हैं, तभी कठिनाई हो जाती है। मेरे लिए प्रभु का अर्थ समग्र अस्तित्व है, टोटल एक्झिस्टेंस है।
ये हवाएं बहती हैं, इनका पता नहीं है? यह आकाश है, इसका पता नहीं है? यह जमीन है, इसका पता नहीं है? आप हैं, इसका पता नहीं है? होने का पता नहीं है? यह जो होने की समग्रता है, यह जो बड़ा सागर है अस्तित्व का, इस पूरे सागर का नाम परमात्मा है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-09

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-नौवां-(ध्यान: परम स्वास्थ्य का द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान से स्वास्थ्य का क्या संबंध है?

बहुत संबंध है। क्योंकि बीमारी का बहुत बड़ा हिस्सा मन से मिलता है। गहरे में तो बीमारी का नब्बे प्रतिशत हिस्सा मन से ही आता है। ध्यान मन को स्वस्थ करता है। इसलिए बीमारी की बहुत बुनियादी वजह गिर जाती है।
यह जो ध्यान की प्रक्रिया है, इससे शरीर पर सीधा भी प्रभाव होता है। क्योंकि दस मिनट की तीव्र श्वास, आपकी जीवन ऊर्जा को, वाइटल एनर्जी को बढ़ाती है। सारा जीवन श्वास का खेल है। जीवन का सारा अस्तित्व श्वास पर निर्भर है। श्वास है तो जीवन है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-08

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(ध्यान: भीतर की यात्रा)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल ले लें, फिर हम ध्यान के प्रयोग के लिए बैठें।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि का प्रयोग क्या रात्रि के लिए ही है और सुबह का प्रयोग सुबह के लिए ही?

ऐसा कुछ नहीं है। दोनों प्रयोगों में से जो आपको ज्यादा गहराई में ले जाता हो, उसे आप कभी भी कर सकते हैं। अगर आपको दोनों प्रयोग एक-दूसरे के लिए परिपूरक बनते हों, तो आप दोनों प्रयोगों को सुबह और सांझ, जब जैसी सुविधा हो वैसा कर सकते हैं। अगर दो में से कोई एक प्रयोग आपके लिए अर्थ न रखता हो, तो उसे छोड़ दे सकते हैं। एक प्रयोग से भी वही परिणाम हो जाएगा। दोनों प्रयोगों से भी इकट्ठा होकर परिणाम वही होगा। एक-एक व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि उसे जैसी सुविधा हो वैसा चुनाव कर ले।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-07

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-सातवां-(ध्यान: समाधि की भूमिका)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल।

रखना ही होगा। यहां हम सिर्फ सीख रहे हैं। यहां सिर्फ आपको समझ में आ जाए पद्धति, इतना ही। फिर उस प्रयोग को घर जारी रखें तो उसमें गहराई बढ़ती जाएगी।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि यदि घर पर इसे हम जारी रखेंगे, तो आस-पास के लोग पागल समझने लगेंगे। चिल्लाएं या नाचें या हंसें।
                                               
आस-पास के लोग अभी भी पागल ही समझते हैं एक-दूसरे को। कहते न होंगे, यह दूसरी बात है। यह पूरी जमीन करीब-करीब मैड हाउस है, पागलखाना है। अपने को छोड़ कर बाकी सभी लोगों को लोग पागल समझते ही हैं। लेकिन अगर आपने हिम्मत दिखाई और इस प्रयोग को किया, तो आपके पागल होने की संभावना रोज-रोज कम होती चली जाएगी।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-06

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-छठवां-(ध्यान: सीधी छलांग)


मेरे प्रिय आत्मन्!
थोड़े से सवाल हैं। उन सवालों को छोड़ दूंगा, जो मात्र सैद्धांतिक हैं, थ्योरेटिकल हैं। यह बैठक सुबह और सांझ की मात्र साधकों के लिए है, सिद्धांतवादियों के लिए नहीं। सिद्धांतवादियों के लिए उनतीस तारीख से जो बैठक होगी, उसमें उन्हें जो पूछना हो पूछें। यहां तो उनसे ही बात कर रहा हूं जो करना चाहते हैं। और अक्सर ऐसा होता है, जो सोचना चाहते हैं वे करने का निर्णय कभी भी नहीं ले पाते। वे सोचते ही सोचते समाप्त हो जाते हैं। बहुत बार, सौ में निन्यानबे मौके पर, सोचना सिर्फ करने से बचने की तरकीब होती है। क्योंकि सोचने में कल तक के लिए टाला जा सकता है। जब तक निर्णय न हो, जब तक सिद्ध न हो, जब तक सिद्धांत स्पष्ट न हो, तब तक हम कुछ करेंगे नहीं।
लेकिन एक बड़े मजे की बात है कि न करना भी एक निर्णय है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(संन्यास: एक संकल्प)


मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं, उस संबंध में थोड़ी बात समझ लें।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान के प्रयोग से शरीर थक जाता है, तो प्रयोग जारी रखें या न रखें?
ऐसा ही किसी दूसरे मित्र ने भी पूछा है कि ध्यान में हाथ की गति बहुत होती है और हाथ दुख जाता है, तो प्रयोग जारी रखना या नहीं?

आप में से भी बहुतों को शरीर के किसी अंग के थक जाने का खयाल आएगा। स्वाभाविक है। जब शरीर का कोई भी अंग इतनी गति करेगा, इतना व्यायाम हो जाएगा, तो थकेगा। लेकिन दो-चार-छह दिन। जैसा कोई भी नया व्यायाम करते वक्त थकान मालूम होगी, वैसी ही। दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। और जब ठीक होगा, तो आपको पहली दफे पता चलेगा कि जो अंग आपका इस बीच मूवमेंट किया, गति किया, वह रुग्ण था। लेकिन जब तक स्वस्थ न हो जाए वह अंग तब तक पता भी नहीं चल सकता है। जैसे किसी आदमी के सिर में दर्द हो बचपन से ही, चौबीस घंटे दर्द हो, तो वह जानेगा कि यह दर्द ही उसका सिर है। एक बार दर्द छूटे तो ही उसे पता चलेगा कि दर्द सिर नहीं था।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-04

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-चौथा-(ध्यान: आध्यात्मिक विज्ञान)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में थोड़े से सवाल हैं, उन्हें समझ लें, और फिर हम प्रयोग के लिए बैठेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि रात्रि के ध्यान में चश्मे वाले क्या करें? स्पष्ट करें कि आपको देखना है या आपकी ओर देखना है?

दोनों ही काम करने हैं। क्योंकि बिना मेरी ओर देखे तो मुझे नहीं देख सकते। मेरी ओर तो देखना ही है। लेकिन सिर्फ 'ओर' ही नहीं देखना है। क्योंकि 'ओर' बहुत बड़ी बात है, उसमें और भी बहुत कुछ आता है। मेरी ओर देखना है, लेकिन मुझे ही देखना है। चश्मा लगाए ही रखें। रात के प्रयोग में आपको चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है। कम से कम जो बैठे हैं उन्हें तो बिलकुल जरूरत नहीं है। जो खड़े हैं वे चश्मा निकाल लेंगे। तो जिनको देखने की तकलीफ हो, दूर से न देख सकते हों, तो वे मेरे पास मंच के पास ही खड़े होंगे। बैठे हुए लोगों को चश्मा निकालने की कोई जरूरत नहीं है।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-03

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-तीसरा-(ध्यान: गुह्य आयामों में प्रवेश)


मेरे प्रिय आत्मन्!
कल प्रयोग हमने समझा है। आज उसकी गहराई बढ़नी चाहिए। संकल्प की कमी पड़ जाए, तो ही ध्यान में बाधा पड़ती है। और संकल्प की कमी कभी-कभी बहुत छोटी-छोटी बातों से पड़ जाती है।
जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े अवरोध नहीं हैं, बहुत छोटे-छोटे अवरोध हैं। कभी आंख में एक छोटा सा तिनका पड़ जाता है, तो हिमालय भी दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। जरा सा तिनका आंख में हो तो हिमालय भी दिखाई नहीं पड़ता। कोई अगर विचार करे और तर्क करे और गणित लगाए, तो जरूर सोचेगा कि जिस तिनके ने हिमालय को ओट में ले लिया, वह तिनका हिमालय से बड़ा होना चाहिए।
वह तिनका हिमालय से बड़ा नहीं है, तिनका तिनका ही है। लेकिन छोटा सा तिनका भी आंख को बंद कर देता है। हिमालय ढंक जाता है। ठीक ऐसे ही छोटे-छोटे तिनकों से हमारे ध्यान की सामर्थ्य, ध्यान की आंख ढंकी रह जाती है। वह जो तीसरी आंख है, वह जो थर्ड आई है, वह बहुत छोटे-छोटे तिनकों से ढंकी है। कोई बहुत बड़े पहाड़ उसके ऊपर नहीं हैं। लेकिन छोटे-छोटे तिनकों को हम सम्हाले चले जाते हैं।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-02

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-दूसरा-(ध्यान: स्वयं में डुबकी)


मेरे प्रिय आत्मन्!
ध्यान के संबंध में दोत्तीन प्रश्न पूछे गए हैं, उनकी मैं आपसे बात कर लूं, फिर रात के प्रयोग को समझाऊंगा और हम करेंगे।

एक मित्र ने पूछा है कि श्वास गहरी लेनी है या तीव्र? डीप या फास्ट?

तीव्रता का खयाल रखें, गहरी अपने से हो जाए तो बात अलग। आप गहरे का, डीप का खयाल न करें। आप सिर्फ तीव्रता का, फास्टनेस का खयाल रखें--जितने जोर से! जितनी तेजी से! तेजी इसलिए ताकि चोट हो सके। वह जो भीतर सोई हुई शक्ति है, उसे उठाया और जगाया जा सके। हैमरिंग के लिए, हथौड़े की तरह चोट हो सके कुंडलिनी पर, इसलिए तेज का खयाल रखें।

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-01

 ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)

ओशो
प्रवचन-पहला-(ध्यान: नया जन्म)

मेरे प्रिय आत्मन्!
जीवन में दो आयाम हैं, दो प्रकार के तथ्य हैं। एक तो ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें जान लिया जाए तो ही किया जा सकता है। जानना जिनमें प्रथम है और करना द्वितीय है। जानना पहले है और करना पीछे है। दूसरे ऐसे तथ्य भी हैं जिन्हें पहले कर लिया जाए तो ही जाना जा सकता है। उनमें करना पहले है और जानना पीछे है।
विज्ञान पहले तरह का आयाम है, धर्म दूसरे तरह का।
विज्ञान में पहले जानना जरूरी है, तो ही पीछे किया जा सकता है। धर्म में पहले करना जरूरी है, तो ही पीछे जाना जा सकता है। विज्ञान में ज्ञान प्रथम और कर्म पीछे है, धर्म में कर्म प्रथम और ज्ञान पीछे है। विज्ञान बहिर्यात्रा है, बाहर के जगत के संबंध में है। धर्म अंतर्यात्रा है, भीतर के जगत के संबंध में है।

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

असंभव क्रांति-(प्रवचन-10)

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 21-10-67 रात्रि   
(अति-प्राचिन प्रवचन)

प्रवचन-दसवां-(बस एक कदम)


शिविर की इस अंतिम रात्रि में थोड़े से प्रश्नों पर और हम विचार कर सकेंगे। कुछ प्रश्न तो ऐसे हैं, जो मेरे शब्दों को, विचारों को ठीक से न सुन पाने, न समझ पाने की वजह से पैदा हो गए हैं। एक शब्द भी यहां से वहां कर लें तो बहुत अंतर पैदा हो जाता है।

उन प्रश्नों के तो उत्तर मैं नहीं दे पाऊंगा। निवेदन करूंगा कि जो मैंने कहा है, उसे फिर एक बार सोचें। उसे समझने की कोशिश करें। जरा सा भेद आप कर लेते हैं, कुछ अपनी तरफ से जोड़ लेते हैं या कुछ मैंने जो कहा उसे छोड़ देते हैं, तो बहुत सी भ्रांतियां, दूसरे अर्थ पैदा हो जाते हैं। और जरा से फर्क से बहुत बड़ा फर्क पैदा हो जाता है।
एक राजधानी में उस देश के धर्मगुरुओं की एक सभा हो रही थी। सैकड़ों धर्मगुरु देश के कोने-कोने से इकट्ठे हुए थे। उस नगर ने उनके स्वागत का सब इंतजाम किया। सभा का जब उदघाटन होने को था तो मंच पर से परदा उठाया गया।

असंभव क्रांति-(प्रवचन-09)

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 दोपहर

(अति-प्राचीन प्रवचन)

प्रवचन-नौवां-(काम का रूपांतरण)

सुबह मैंने उर्वशी की कथा कही। उससे दोपहर उन्हें अत्यंत कामोत्तेजक स्वप्न आया। तो उन्होंने चाहा है कि मैं ऐसी बातें न कहूं जिनसे कामवासना भड़क उठे। मैं तो सिर्फ सत्य जानने का रास्ता बताऊं।

मेरी कथा से उनकी कामवासना जाग्रत हुई है, या कि कामवासना उनमें दबी हुई पड़ी थी, मेरी कथा उसे बाहर निकाल लाई है।
एक कुएं में हम बाल्टी डालते हैं, बाल्टी में पानी भरकर बाहर आ जाता है, क्योंकि कुएं में पानी है। अगर कुआं खाली हो तो बाल्टी हम कितनी ही डालें, और कितनी ही बड़ी, और कितनी ही अच्छी, कुएं से पानी नहीं आ सकेगा। बाल्टी पानी केवल बाहर लाती है, होता कुएं में पानी है। लेकिन अगर हम बाल्टी को दोष दें कि इसकी वजह से ही यह पानी आ गया तो गलती हो जाएगी। बाल्टी केवल खबर ले आती है कि भीतर पानी है। और हम न भी बाल्टी डालें तो पानी विलीन नहीं हो जाता, वह मौजूद है।