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रविवार, 2 अप्रैल 2017

ध्यान दर्शन-(साधना-शिविर)-प्रवचन-05

ध्यान दर्शन-(साधन-शिविर)
ओशो
प्रवचन-पांचवां-(संन्यास: एक संकल्प)


मेरे प्रिय आत्मन्!
दोत्तीन सवाल हैं, उस संबंध में थोड़ी बात समझ लें।

एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान के प्रयोग से शरीर थक जाता है, तो प्रयोग जारी रखें या न रखें?
ऐसा ही किसी दूसरे मित्र ने भी पूछा है कि ध्यान में हाथ की गति बहुत होती है और हाथ दुख जाता है, तो प्रयोग जारी रखना या नहीं?

आप में से भी बहुतों को शरीर के किसी अंग के थक जाने का खयाल आएगा। स्वाभाविक है। जब शरीर का कोई भी अंग इतनी गति करेगा, इतना व्यायाम हो जाएगा, तो थकेगा। लेकिन दो-चार-छह दिन। जैसा कोई भी नया व्यायाम करते वक्त थकान मालूम होगी, वैसी ही। दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। और जब ठीक होगा, तो आपको पहली दफे पता चलेगा कि जो अंग आपका इस बीच मूवमेंट किया, गति किया, वह रुग्ण था। लेकिन जब तक स्वस्थ न हो जाए वह अंग तब तक पता भी नहीं चल सकता है। जैसे किसी आदमी के सिर में दर्द हो बचपन से ही, चौबीस घंटे दर्द हो, तो वह जानेगा कि यह दर्द ही उसका सिर है। एक बार दर्द छूटे तो ही उसे पता चलेगा कि दर्द सिर नहीं था।

जो अंग आपका मूवमेंट कर रहा है ज्यादा, वह इस बात का सबूत है कि वह अंग किसी तनाव से पीड़ित है। अकारण नहीं कर रहा है। वह तनाव उस अंग से निकलने की कोशिश कर रहा है। उस कोशिश में वह अंग थकेगा। उसे थकने दें, उसकी फिक्र न करें। वह दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। थकान भी चली जाएगी और वह अंग स्वस्थ भी हो जाएगा।
हमारे मन में जो भी वेग हम दबाते हैं, उनसे ठीक एसोसिएटेड, उनसे जुड़े हुए पैरेलल हमारे शरीर के अंग होते हैं। हमारे शरीर और मन में प्रत्येक चीज समानांतर है। कुछ भी मन में घटित होता है, तो शरीर में घटित होता है। कुछ भी शरीर में घटित होता है, तो मन तक प्रतिध्वनित होता है। इसलिए मन के प्रत्येक वेग का शरीर में भी कोई हिस्सा है। और उस हिस्से का कंपन, उस हिस्से की गति, मूवमेंट, मन के किसी वेग की निर्जरा है। उसे रोकें मत। दो-चार-आठ दिन में उसकी थकान तो अपने आप चली जाएगी।
और जब थकान जाएगी, तब आप पहली दफे समझेंगे कि आपका कोई अंग जो सदा से बीमार था, स्वस्थ हो गया है। पूरा शरीर भी थक जाए तो भय न करें। दो-चार-आठ दिन में वह भी ठीक हो जाता है। और जब ठीक होगा तो शरीर के स्वास्थ्य का एक नया ही अर्थ मालूम पड़ेगा।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि साधक यदि संन्यास ले, तो क्या ध्यान में उसे सहायता मिलेगी?

संन्यास एक संकल्प है। संकल्प इस बात का कि मेरी खोज संसार की नहीं, सत्य की होगी। संकल्प इस बात का कि पदार्थ तक मैं नहीं रुकूंगा, परमात्मा तक पहुंचूंगा। निश्चय ही, ध्यान के साथ ऐसा प्रगाढ़ संकल्प हो तो गति बहुत बढ़ जाती है। बढ़ ही जाएगी। और मन का एक नियम है, जिस दिशा से मन संकल्प छोड़ देता है, वह दिशा ही मिट जाती है। और जिस दिशा में मन संकल्प कर लेता है, वही दिशा शेष रह जाती है।
आपके घर में आग लगी है। आप रास्ते से भागे चले जा रहे हैं। लोग मिलते हैं, नमस्कार करते हैं, रास्ते पर लोग गुजर रहे हैं। आपको कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। वह रास्ता मिट गया। दूसरे दिन कोई आदमी मिलेगा और कहेगा कि कल मैंने आपको नमस्कार किया, आपने उत्तर नहीं दिया! तो आप कहेंगे कि मुझे कुछ पता नहीं कि आप मिले भी। मेरे घर में आग लगी थी और मेरा मन रास्ते पर नहीं था। रास्ता मिट गया। क्योंकि सारा संकल्प, मकान में आग लगी है, उस तरफ दौड़ गया। रास्ता नहीं है, करीब-करीब नहीं है। आपके लिए तो नहीं ही है।
मन जिस तरफ संकल्प कर लेता है, जगत की नई यात्रा, सारा जगत का अस्तित्व नया हो जाता है। आप क्या खोजने निकले हैं इस पृथ्वी पर, वही आपके लिए सत्य हो जाता है। शेष सारी बातें फीकी होकर धीरे-धीरे परिधि पर खो जाती हैं, सर्कमफरेंस पर खो जाती हैं। उनका जीवन के केंद्र से कोई संबंध नहीं रह जाता।
संन्यास एक संकल्प है। संकल्प इस बात का कि इस पृथ्वी पर, इस जीवन में, मुझे उसे जान लेना है जो दिखाई नहीं पड़ता है, जो अदृश्य है; उसे जान लेना है जो जीवन का मूल है; उसे जान लेना है जिसकी कोई मृत्यु नहीं है। यह संकल्प जैसे ही एक बार आपके मन में प्रगाढ़ होकर घोषित हो जाता है, वैसे ही आपके ध्यान में करोड़ गुना गति हो जाएगी। सारी बात संकल्प की है। हमारा जो जगत है, जिसे हम अपनी दुनिया कहते हैं...हम यहां इतने लोग बैठे हैं, लेकिन हम सारे लोग एक ही दुनिया में नहीं बैठे हैं। हम सब अलग-अलग दुनिया में बैठे हैं। प्रत्येक का संकल्प ही उसकी दुनिया है।
एक कवि है, वह रात निकल रहा है, तो उसे चांदत्तारे ही सब कुछ हैं। एक चोर है, वह भी रात निकला है, उसे चांदत्तारों का कोई पता ही नहीं है। उसकी दुनिया में चांदत्तारे उगे ही नहीं हैं। उसे ताले दिखाई पड़ेंगे, मकान दिखाई पड़ेंगे, तिजोरियां दिखाई पड़ेंगी, पुलिसवाले दिखाई पड़ेंगे, कुत्ते भौंकते हुए दिखाई पड़ेंगे, लेकिन चांदत्तारे नहीं दिखाई पड़ेंगे। चांदत्तारे उसकी दुनिया का हिस्सा नहीं। वह उसके संकल्प के बाहर है।
हमारा जगत सिलेक्टेड है, हम इस बड़े जगत में से चुन लेते हैं वही जो हमारा संकल्प चाहता है। इसलिए हम सब अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। एक दुनिया में मालूम पड़ते हैं; रहते बहुत अलग-अलग दुनिया में हैं। और एक आदमी भी पूरी जिंदगी एक ही दुनिया में नहीं रहता। एक आदमी भी जिंदगी में हजार दुनियाएं बदल लेता है।
जब आप छोटे बच्चे थे तो आप दूसरी दुनिया में थे। अगर आप नदी के किनारे गए होते, सौ रुपये का नोट पड़ा होता तो आपने फिक्र छोड़ दी होती, आप शंख बीन लाए होते, रंगीन पत्थर उठा लाए होते। वह सौ रुपये का नोट आपकी दुनिया नहीं था। वह रंगीन पत्थर, सीप, जिसकी कोई कीमत नहीं; छोटा सा शंख, जिसका कोई मूल्य नहीं, आपने हीरे की तरह उठा लिया होता। आपकी अलग दुनिया थी। बड़े हंसे होते। उन्होंने कहा होता, क्या पागल है तू! फेंक इसको, सौ रुपये के नोट को उठा ले! लेकिन बड़ों को पता नहीं कि सौ रुपये का नोट बच्चे की दुनिया का हिस्सा नहीं है।
आज आप जाएंगे नदी के किनारे तो शंख-सीप दिखाई ही नहीं पड़ेंगे, सौ रुपये का नोट एकदम मन को पकड़ लेगा। नदी खो जाएगी, रेत खो जाएगी, शंख-सीप खो जाएंगे, वह सौ रुपये का नोट ही सब कुछ हो जाएगा। आज आपकी दूसरी दुनिया है। वह नोटों की दुनिया है। अब वह शंख-सीपों की, रंगों की, पत्थरों की दुनिया नहीं है।
हम प्रतिपल अपनी दुनिया को भी बदलते रहते हैं। संन्यास, इस दिखाई पड़ने वाले जगत से भिन्न, न दिखाई पड़ने वाले जगत की खोज का संकल्प है। उस डिसीजन के साथ, उस निर्णय के साथ ही सब बदल जाता है। और ध्यान की गहराई अनंत गुनी हो जाती है।
फिर मैं ऐसा भी नहीं मानता कि संन्यास लेकर कोई जंगल भाग जाए। दुनिया तो बदलनी है, जगह नहीं बदलनी। चित्त तो बदलना है, परिस्थिति के बदलने से कुछ नहीं होता। परिस्थिति तो तत्काल बदल जाती है, जिस वक्त चित्त बदलता है उसी वक्त परिस्थिति बदल जाती है। जैसे ही मन बदला कि बाहर की दुनिया दूसरी हो जाती है।
संन्यासी दूसरी दुनिया में प्रवेश कर जाता है, इसी दुनिया में रहते हुए। दुकान पर बैठे हुए भी संन्यासी का चित्त दुकान में नहीं रह जाता। और दुकानदार मंदिर में भी बैठ जाए, तो मंदिर में नहीं पहुंच पाता, दुकान में ही बैठा रहता है। इसलिए सवाल परिस्थिति बदलने का नहीं है, सवाल मनःस्थिति बदलने का है। और मनःस्थिति संकल्प से तत्काल बदल जाती है। एक निर्णय, और सब बदलाहट हो जाती है।
तो मैं नहीं कहता कि संन्यास लेकर कहीं कोई भाग जाए। संन्यास लेने का मतलब ही, इसी दुनिया के बीच, तत्काल दूसरी दुनिया का दरवाजा खोल लेना है। उस निर्णय से ध्यान की गति तो बहुत बढ़ने ही वाली है, ध्यान समाधि तक पहुंच सकता है।
कुछ थोड़ी सी बातें ध्यान के संबंध में आपको कह दूं। फिर हम ध्यान के प्रयोग के लिए बैठें।

आज तीसरा दिन है, गति और आगे जानी चाहिए। हर सुबह का सूरज अगर हमें वहीं पाए जहां कल सांझ डूबते समय छोड़ गया था, तो इस बीच हम जिंदा नहीं रहे। जिंदा रहने का एक ही मतलब है कि हम आगे गए हों। कल सांझ के सूरज ने जहां आपको छोड़ा था, अगर आज सुबह का सूरज भी आपको वहीं पाए, तो रात व्यर्थ चली गई। आज सुबह का उगता सूरज भी अगर सांझ डूबते वक्त वहीं पाए, तो दिन व्यर्थ चला गया। और समय का एक क्षण भी वापस नहीं लौटाया जा सकता।
जब हम आ ही गए हैं, जरूर कोई आकांक्षा ध्यान की मन के किसी कोने में है, परमात्मा की खोज की कोई प्यास, थोड़ी या ज्यादा, कहीं न कहीं मन के किसी कोने में सरकती है। जब आ ही गए हैं, तो पूरी शक्ति लगा कर उस दिशा में मेहनत कर लेनी जरूरी है। आज तीसरा दिन है, तो हम सब आशा रखें कि हम और तीव्रता से, और शक्ति से, और संकल्प से जुट जाएंगे। आपके संकल्प के अतिरिक्त और कोई बात निर्णायक नहीं है। आपका संकल्प ही साधना है। और आपका जितना संकल्प है, उतना परिणाम तत्काल उपलब्ध होता है, उसे जगत की कोई शक्ति रोक नहीं सकती। और अगर परिणाम उपलब्ध न हो, तो सिर्फ एक ही बात जानना कि पीछे संकल्प कम पड़ गया। आपने पूरी शक्ति नहीं लगाई। तो ध्यान रखना ध्यान करते वक्त कि मैं अपने को पूरा लगा रहा हूं या नहीं लगा रहा हूं? जरा भी बचाना मत। जरा भी जो बचाएगा, वह डूब नहीं पाएगा। करीब-करीब हालत ऐसी है, जैसे एक आदमी नदी में डूबना चाहे गहरे में, और किनारे पर एक हाथ से भी पकड़े रहे, सिर्फ एक हाथ से, पूरा शरीर पानी में कर ले, सिर्फ एक हाथ से जरा सा किनारे पर एक जड़ पकड़े रहे वृक्ष की और वह कहे कि पूरा तो डूबा ही हुआ हूं, जरा सा हाथ से पकड़े हुए हूं, तो इतने से क्या बाधा पड़ेगी! निन्यानबे परसेंट तो पानी में हूं, एक ही परसेंट तो बाहर पकड़े हुए हूं, इतने-से से क्या बाधा पड़ेगी! मुझे डूब ही जाना चाहिए।
नहीं डूब पाएगा, वह एक परसेंट जो बाहर पकड़े हुए है, उतना ही रोकने वाला बन जाएगा। नहीं, छोड़ ही देना पड़ेगा। पूरा ही छोड़ देना पड़ेगा। पूरा ही छोड़ते तत्काल डूबना हो जाता है। और डूबे बिना कोई पा नहीं सकता। पूरा, टोटल इनवाल्वमेंट चाहिए। जरा इंच भर आप बाहर रह गए कि बेकार हो जाता है। ध्यान का मतलब है, पूरा डूब जाना।
तो आज हम फिर कोशिश करें। कल कोई सत्तर प्रतिशत मित्र बहुत गहराई में गए हैं। आज मैं आशा रखूं कि हम और आगे बढ़ेंगे। जो जितने गहराई में गए हैं, वे और आगे जाएंगे। जो पीछे रह गए हैं, वे और श्रम लेंगे। इन पांच दिनों में, जो भी यहां आया है, वह बिना कुछ अनुभव लिए जाए, दुखद होगा, दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अनुभव की एक किरण तो कम से कम फूट ही जानी चाहिए। और एक किरण जिसे मिल जाए, वह फिर सूरज तक की यात्रा कर सकता है। क्योंकि किरण के रास्ते से ही फिर सूरज तक पहुंचा जा सकता है। वही मार्ग बन जाता है। कम से कम एक किरण आपकी जिंदगी में फूट ही जानी चाहिए। तो अपनी तरफ खयाल कर लेंगे आप कि पूरी शक्ति लगा रहे हैं या नहीं?
पहले दस मिनट में तीव्र श्वास लेनी है, तब पूरी ताकत श्वास पर लगा देनी है। इतनी लगा देनी है कि श्वास के अतिरिक्त कुछ शेष ही न रह जाए। भूल ही जाएं कि कुछ और है। सिर्फ श्वास ही बचे। ऐसा लगे कि आप सिर्फ श्वास लेने वाले एक यंत्र रह गए हैं। आप बचें ही न, सिर्फ श्वास ही रह जाए।
फिर दूसरे चरण में नाचना, कूदना, रोना, चिल्लाना, जो भी हो वही बचे, आप बिलकुल खो जाएं।
फिर तीसरे चरण में प्रश्न ही बचे कि मैं कौन हूं?
और चौथे चरण में वह भी न बचे। चौथे चरण में बिलकुल ही मिट जाएं, कुछ करना ही न बचे। उसी चौथे चरण में घटना घटनी शुरू होती है।
अब हम प्रयोग के लिए खड़े हो जाएं। थोड़े फासले पर फैल जाएं। जो लोग देखने चले आए हों, वे बाहर निकल जाएं, वे पीछे खड़े हो जाएं। पीछे, ठीक कंपाउंड के बाहर खड़े हो जाएं। देखने वाला कोई व्यक्ति भीतर न रहे। और देखने वाला कोई व्यक्ति तीन तरफ न रहे, सिर्फ आगे, मेरे सामने, पीछे चले जाएं सारे लोगों के।
खयाल कर लें, थोड़ा-थोड़ा फैल कर आप खड़े होंगे, ताकि जब कोई नाचे-कूदे, और आज तो बहुत गति आएगी, इसलिए थोड़ी जगह बना कर खड़े हों। तीसरा दिन है, इसलिए गति तीन गुनी हो जाने वाली है।
तो मैं मान लूं कि आप खड़े हो गए। बाहर निकल जाएं, जिन मित्रों को ज्यादा जगह चाहिए हो, जिनको ज्यादा कूदने का खयाल हो, वे थोड़े बाहर निकल जाएंगे। किसी का धक्का लग जाए तो फिक्र न रखें, आप अपनी फिक्र करें। आप कूदते ही रहें।
आंख बंद कर लें। जो लोग देखने आ गए हों, वे कृपा करके बात नहीं करेंगे, चुपचाप खड़े होकर दूर देखते रहेंगे, भीतर नहीं आएंगे। आंख बंद कर लें। दोनों हाथ जोड़ कर सिर झुका कर संकल्प कर लें परमात्मा के समक्ष: मैं प्रभु को साक्षी रख कर संकल्प करता हूं कि ध्यान में अपनी पूरी शक्ति लगा दूंगा। मैं प्रभु को साक्षी रख कर संकल्प करता हूं कि ध्यान में अपनी पूरी शक्ति लगा दूंगा। मैं प्रभु को साक्षी रख कर संकल्प करता हूं कि ध्यान में अपनी पूरी शक्ति लगा दूंगा। पूरी! स्मरण रखें, पूरी! जरा भी बचानी नहीं है, सौ प्रतिशत!
पहला चरण शुरू करें। दस मिनट तक श्वास ही श्वास रह जाए। श्वास ही श्वास। आप खो जाएं, श्वास ही श्वास रह जाए।
श्वास ही श्वास। बहुत ठीक! श्वास ही श्वास। मिट जाएं, श्वास ही श्वास रह जाए। डोलने दें शरीर को, कूदने दें। शक्ति जागेगी, शरीर कंपेगा, नाचेगा, फिक्र छोड़ें। आप सिर्फ श्वास की फिक्र करें। दस मिनट लोहार की धौंकनी की तरह। आवाज निकले, निकलने दें...श्वास ही श्वास...श्वास ही श्वास...तेज...और तेज...और तेज...चोट करें...जोर से श्वास की चोट करें, ताकि कुंडलिनी जाग सके। जागेगी, चोट के साथ ही जागेगी। शरीर बिजली से भर जाएगा, बिजली के यंत्र की तरह कांपने-डोलने लगेगा। कांपने-डोलने दें, श्वास ही श्वास लेते चले जाएं।
बहुत ठीक! और आगे बढ़ें...और आगे बढ़ें...पूरी शक्ति लगा देनी है। खयाल कर लें, पीछे कोई बच तो नहीं रहा है आपके भीतर। आने दें...शक्ति जाग रही है, जागने दें...चोट करें...आंख बंद रखें और चोट करें...आंख बंद रखें और चोट करते जाएं। आंख चालीस मिनट तक नहीं खोलनी है। आंख बंद रखें और चोट करें...सात मिनट बचे हैं, गहरी चोट करें...श्वास ही श्वास बचे, और सब मिट जाए...श्वास...श्वास... ध्यान करें, श्वास ही श्वास बचे...श्वास ही श्वास बचे...
बहुत ठीक! देखें, कोई व्यर्थ खड़ा न रह जाए। इधर-उधर न देखने की कोशिश करें। जिसको देखना हो, वह बाहर निकल जाए।
बहुत ठीक! बहुत ठीक! आगे बढ़ें। थोड़े से मित्र पीछे पड़ गए हैं, आगे बढ़ें। दस मिनट में सबको ठीक जगह पर आ जाना है। खयाल कर लें, आप पीछे तो नहीं हैं? शरीर डोलने दें...नाचने दें...आवाज निकले, निकलने दें...बस श्वास ही श्वास रह जाए। बहुत ठीक! बहुत ठीक! और आगे...और आगे...जरा भी बचाएं न, पूरा ही छोड़ दें...
छह मिनट बचे हैं, बढ़ें...बढ़ें...तेज...तेज...तेज...रोएं-रोएं को कंप जाने दें... शरीर का अंग-अंग हिल जाने दें...शक्ति जागेगी, सारा शरीर डोलेगा। पांच मिनट बचे हैं, आधा समय बचा। ताकत लगाएं...ताकत लगाएं...बहुत ठीक! बहुत ठीक! कोई पीछे न रह जाए। संकल्प का स्मरण करें, पूरी ताकत लगा दें। शक्ति जाग रही है...भीतर शक्ति उठती हुई मालूम पड़ेगी...शक्ति भीतर ऊपर की तरफ उठने लगेगी। जोर से चोट करें और शक्ति को उठने दें। जोर से...जोर से...चार मिनट बचे हैं...जोर से...जोर से...जोर से...जोर से...बचाएं नहीं, जोर से...जोर से...जोर से...
बहुत ठीक! तीन मिनट...जोर से...थोड़ा सा समय बचा, तीन मिनट का...पूरी शक्ति लगाएं...। दूसरे चरण में प्रवेश के पहले सारी शक्ति जग जानी चाहिए। रोआं-रोआं शक्ति से भर जाना चाहिए। भरें शक्ति से...भीतर से भी जगेगी, बाहर से भी प्रवेश करेगी, शक्ति मात्र रह जाएगी, स्पंदन मात्र...श्वास...श्वास...जोर से...जोर से...जोर से...
दो मिनट...जब मैं कहूं--एक, दो, तीन, तब बिलकुल पागल की तरह श्वास लें।
एक!...पूरी शक्ति लगा दें। दो!...पूरी शक्ति लगा दें। तीन!...पूरी शक्ति लगा दें। बहुत ठीक! एक मिनट की बात है, पूरी शक्ति लगा दें...अपने क्लाइमेक्स, पूरी शक्ति में आ जाएं...बहुत ठीक! कुछ सेकेंड...पूरी शक्ति लगाएं...फिर दूसरे चरण में प्रवेश करना है। उछलें...कूदें...आवाज निकलती है, निकलने दें...श्वास की आखिरी चोट कर लें...

बहुत ठीक! अब दूसरे चरण में प्रवेश करें। शरीर को जो करना है करने दें। नाचना है तो जोर से, चिल्लाना है जोर से, हंसना है जोर से, रोना है जोर से। शरीर में जो भी हो रहा है, जोर से करें। उछलें...कूदें...नाचें...रोएं...चिल्लाएं...मन को खाली कर डालना है। जो भी हो रहा है, जोर से करें। मन को उलीच डालें। दस मिनट में मन बिलकुल खाली हो जाएगा। शक्ति जाग गई है, उसे उलीचें। उलीचें...जोर से उलीचें...जो भी हो रहा है, जोर से...आहिस्ता नहीं, धीमे नहीं, जोर से...चिल्लाएं...नाचें...कूदें...रोएं...हंसें...
बहुत ठीक! कोई पीछे न रह जाए। जोर से आगे बढ़ें। सात मिनट बचे हैं...पूरी शक्ति लगाएं...। शक्ति जाग गई है, बिलकुल जोर से निकाल डालें। बहुत ठीक! जोर से...जोर से...बिलकुल बिजली के यंत्र मात्र रह जाएं। जो भी हो रहा है, जोर से होने दें। नाचें...कूदें...चिल्लाएं...हंसें...रोएं...
छह मिनट बचे हैं, जोर से करें...जोर से करें...फिर हम तीसरे चरण में प्रवेश करेंगे। मन को खाली कर डालें।
पांच मिनट बचे हैं, बिलकुल मन को खाली कर डालें। चिल्लाएं...चिल्लाएं जोर से...इतने लोग हैं, पांच मिनट बचे हैं, तूफान उठा दें...नाचें...नाचें...जोर से नाचें...
चार मिनट बचे हैं, पूरी शक्ति लगा कर उलीच डालें। जो भी निकल रहा है, निकल जाने दें। नाचें...नाचें...नाचें...चिल्लाएं...रोएं...हंसें...जोर से...जोर से...
तीन मिनट बचे हैं। जब मैं कहूं--एक, दो, तीन, तो बिलकुल पागल हो जाएं। सारे पागलपन को बाहर फेंक दें। एक! सारा पागलपन बाहर फेंक दें। दो! फेंकें...फेंकें...जोर से फेंक दें। तीन! फेंकें जोर से...पूरी तरह उलीच डालें...एक मिनट के लिए पूरी शक्ति लगा दें...कोई पीछे न रह जाए। और जोर से...और जोर से...और जोर से... चिल्लाएं...नाचें...जोर से...जोर से...

बस, तीसरे चरण में प्रवेश करें। नाचते रहें, डोलते रहें, भीतर पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? बाहर पूछना है बाहर, भीतर पूछना है भीतर, लेकिन ताकत लगा कर। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? डोलते रहें, डोलते रहें, कूदते रहें, पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? पूरी ताकत लगा दें, सब भूल जाएं, एक ही सवाल रोएं-रोएं से पूछने लगें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? नाचें, डोलें, कूदें, पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मन को बिलकुल थका डालना है। पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? जितने थकेंगे, उतने गहरे विश्राम में जा सकेंगे। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...सात मिनट बचे हैं, पूरी ताकत लगा लें...
पूछें, पूछें--मैं कौन हूं? डोलते रहें, आनंद से डोलते रहें, नाचते रहें, पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...छह मिनट बचे हैं...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पांच मिनट बचे हैं...पूरी शक्ति लगाएं...फिर हम विश्राम में जाएंगे। पूछें, पूछें, पूछें। नाचें, नाचें, कूदें। पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...बिलकुल पागल हो जाएं...चार मिनट बचे हैं...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? पूरी शक्ति लगा दें...तीन मिनट बचे हैं...पूरी शक्ति लगाएं...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...जोर से...जोर से...जोर से...जोर से...जोर से...जोर से...
ठीक क्षण आ गया, जोर से ताकत लगाएं। दो मिनट बचे हैं, जब मैं कहूं--एक, दो, तीन, तो पूरी ताकत लगा देनी है।
एक! बिलकुल पागल हो जाएं। भूलें सब।
दो! बिलकुल पागल हो जाएं।
तीन! पूरी शक्ति लगा दें।
बहुत ठीक! और जोर से...एक मिनट की बात है...फिर हम विश्राम करेंगे। कूदें, उछलें, नाचें, पूछें। पीछे न रह जाएं, जोर से पूछें। बहुत ठीक! आखिरी सेकेंड...जोर में आ जाएं...फिर हम विश्राम करेंगे--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...

बस ठहर जाएं...बस ठहर जाएं...सब छोड़ दें...पूछना, सब छोड़ दें...नाचना, कूदना, सब छोड़ दें...जैसे बूंद सागर में खो जाए, ऐसे खो जाएं। सब छोड़ दें...बूंद जैसे सागर में खो जाए, ऐसे खो जाएं। सब मौन, सब मौन हो गया। सब शांत, सब शांत हो गया। सब शून्य, सब शून्य हो गया। खो गए, मिट गए...जैसे मर ही गए। परमात्मा में खो जाना ही जीवन है। खो गए, मिट गए। जैसे मर ही गए। परमात्मा में खो जाना ही अमृत को पा लेना है। प्रकाश ही प्रकाश शेष रह गया है। चारों ओर अनंत प्रकाश शेष रह गया है। प्रकाश ही प्रकाश से भर जाएं। चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है, उस प्रकाश के सागर में खो गए।
अनंत प्रकाश है, अनंत-अनंत प्रकाश है। चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है। डूब जाएं, एक हो जाएं। प्रकाश ही प्रकाश, अनंत प्रकाश, चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है। डूब जाएं, खो जाएं, स्वाद ले लें, इस प्रकाश के साथ एक हो जाएं। आनंद ही आनंद के झरने फूट रहे हैं भीतर, आनंद ही आनंद, आनंद ही आनंद। भर जाने दें, सब ओर आनंद की लहरों को भर जाने दें। आनंद की तरंगें रोएं-रोएं में समा जाने दें। भीतर आनंद की वर्षा हो रही है। भीतर आनंद के झरने फूट रहे हैं। भीतर आनंद ही आनंद बरस रहा है।
आनंद ही आनंद। प्रकाश ही प्रकाश। चारों ओर परमात्मा के सिवाय और कोई भी नहीं है। वही है, वही है, स्मरण करें, स्मरण करें, पहचानें। चारों ओर परमात्मा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। आकाश में, हवाओं में, सूरज की किरणों में, पृथ्वी में, चारों ओर परमात्मा के सिवाय और कोई भी नहीं है। पहचानें उसके मंदिर को। पहचानें उसके मार्ग को। चारों ओर सिवाय परमात्मा के और कोई भी नहीं है।
परमात्मा ही परमात्मा। हृदय की धड़कन में वही, बाहर वही, भीतर वही। स्मरण करें, स्मरण करें, परमात्मा ही है। फिर कैसा दुख? फिर कैसी मृत्यु? फिर कैसा तनाव? फिर कैसी अशांति? परमात्मा है तो आनंद ही आनंद है। परमात्मा है तो अमृत ही अमृत है। परमात्मा है तो आलोक ही आलोक है।
चारों ओर अनंत प्रकाश, प्रकाश ही प्रकाश, कि हजारों सूरज फीके पड़ जाएं, ऐसे प्रकाश में खड़े हो गए हैं। चारों ओर आनंद ही आनंद, कि सागर छोटे पड़ जाएं, ऐसे आनंद में डूब गए हैं। पी लें, रोएं-रोएं में भर जाने दें। हृदय की धड़कन-धड़कन में भर जाने दें। आनंद ही आनंद, आनंद ही आनंद, अनंत आनंद। प्रकाश ही प्रकाश, अनंत प्रकाश। चारों ओर परमात्मा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। बाहर भी वही, भीतर भी वही; परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। वही है सत्य, वही है जीवन।
डूब जाएं, बिलकुल डूब जाएं। खो जाएं, बिलकुल खो जाएं। जैसे बूंद सागर में गिर जाए, ऐसे गिर जाएं, सागर से एक हो जाएं।
नहीं बचे, मिट गए, समाप्त हो गए। वही रह गया है, जो जन्म के पहले था। वही रह गया, जो मृत्यु के बाद भी है। वही बच रहा, जो सदा बच रहता है। स्मरण करें, पहचानें। जन्म के पहले भी जो था, मृत्यु के बाद भी जो बचेगा, वही बच रहा है। लहर खो गई, सागर ही बच रहा है। प्रकाश ही प्रकाश, दूर तक, अनंत तक, जहां तक खयाल आता है प्रकाश ही प्रकाश है। आनंद ही आनंद, गहरे से गहरे में, जहां तक समझ पड़ता है, वहां आनंद ही आनंद है। प्रकाश के फूल खिलते चले गए हैं और आनंद की वीणा बजने लगी है। आनंद के स्वर फूट रहे हैं, प्रकाश के फूल खिल रहे हैं।
अब दोनों हाथ जोड़ लें, सिर झुका लें उसके अज्ञात चरणों में। चारों ओर उसके ही चरण हैं। चारों ओर वही है। दोनों हाथ जोड़ लें, सिर झुका लें, उसे धन्यवाद दे दें। प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है! छोड़ दें उसके चरणों में। चारों ओर उसके ही चरण हैं। प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है! छोड़ दें उसके चरणों में, सिर रख दें उसके चरणों में, समर्पित कर दें अपने को, जैसे कोई पूजा के फूल चढ़ाए ऐसे अपने को चढ़ा दें। प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है! प्रभु की अनुकंपा अपार है!
अब दोनों हाथ छोड़ दें। आहिस्ता से आंख खोल लें। आंख न खुले तो दोनों हाथ आंख पर रख लें, फिर दो-चार गहरी श्वास ले लें, फिर अपनी जगह बैठ जाएं।
दो बातें आपसे कह दूं और हम विदा हों। जो खड़े हैं उनसे बैठते न बने तो जल्दी न करें, दो-चार गहरी श्वास लें, आहिस्ता-आहिस्ता बैठें। जो गिर गए हैं वे भी जल्दी न करें, दो-चार गहरी श्वास लें और आहिस्ता-आहिस्ता उठें। अपनी जगह बैठ जाएं। दो बात आपसे कह दूं, फिर हम विदा हों। आहिस्ता से बैठें। बैठते न बने तो थोड़ी देर खड़े रहें, दो-चार गहरी श्वास लें, फिर बैठें। उठते न बने तो थोड़ी देर पड़े रहें, दो-चार गहरी श्वास लें, फिर उठें। दो-चार गहरी श्वास लें, दो-चार गहरी श्वास लें, फिर आहिस्ता से बैठ जाएं। जो गिर गए हैं, वे भी दो-चार गहरी श्वास लें, धीरे-धीरे उठ आएं। दो-चार गहरी श्वास ले लें, फिर धीरे से बैठ जाएं। जो गिर गए हैं वे भी दो-चार गहरी श्वास लें और आहिस्ता से उठ आएं।
दो बातें। प्रयोग आपने ठीक से किया, पूरी मेहनत ली, काफी मित्र गहरे गए। फिर भी थोड़े से मित्र खड़े रह जाते हैं, उनकी नासमझी को कुछ भी नहीं किया जा सकता। इतनी बार मैंने कहा कि भीतर आंख खोल कर न खड़े हों। फिर भी दोत्तीन जन भीतर भी आंख खोल कर खड़े रह जाते हैं। उनकी तरफ मैं देखता हूं तो वे जल्दी से आंख बंद कर लेते हैं, नहीं देखता हूं तो फिर आंख खोल लेते हैं। बच्चे ऐसा करें तो क्षमा किए जा सकते हैं, लेकिन बूढ़े भी ऐसा करें तो बड़ी कठिनाई हो जाती है। देखना है, बाहर खड़े होकर देखें, उसकी कोई मनाही नहीं, लेकिन भीतर मत खड़े हों। यहां दूसरों को भी नुकसान पहुंचता है, आपको भी नुकसान पहुंचता है। मजे से बाहर खड़े हो जाएं और देखते रहें।
जो मित्र देखने चले आते हैं उनसे कहूंगा कि करके भी देखें। क्योंकि बाहर से जो देख रहे हैं, कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। लोग नाचते-कूदते दिखाई पड़ेंगे, उनके भीतर क्या हो रहा है इसका कुछ भी पता नहीं चलेगा। और जो उनके भीतर हो रहा है वही है असली बात, वही दिखाई पड़ जाए तो कुछ दिखाई पड़ा, अन्यथा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। कुछ चीजें हैं जो बाहर से दिखाई पड़ सकती हैं, कुछ चीजें हैं जो भीतर से ही दिखाई पड़ सकती हैं। ध्यान और धर्म तो ऐसी चीज है जो भीतर से ही दिखाई पड़ सकती है, बाहर से दिखाई नहीं पड़ सकती।
बाहर से भी देखें, एक दिन बाहर खड़े होकर देख लें, दूसरे दिन भीतर खड़े होकर भी देखें। बाहर से खड़े होकर, बातचीत करके, हंस कर यह मत समझ ले कोई कि बहुत समझदार है। बाहर से खड़े होकर यह देख कर न समझ ले कोई कि ये लोग पागल हैं और मैं बुद्धिमान हूं। असल में, दूसरे को पागल समझना सेफ्टी मेजर से ज्यादा नहीं है। अपने को बचाने की कोशिश है।
और इस दुनिया में पागलों को छोड़ कर दूसरों को कोई पागल नहीं समझता। पागल अपने को पागल कभी नहीं समझता, यही उसका लक्षण है। पागलखानों में चले जाएं, तो पागल अपने को भर पागल नहीं समझता है। अगर पागल अपने को पागल समझ ले तो उसका पागलपन ठीक होना शुरू हो जाता है।
दूसरे को पागल समझ लेना बहुत आसान है। जीसस को भी लोग पागल समझते हैं, मीरा को भी, कबीर को भी, बुद्ध को भी, महावीर को भी। इस जगत पर, इस पृथ्वी पर, परमात्मा की खोज में जो भी गया है वह पागल ही दिखाई पड़ा है उन सबको जो धन और पद की खोज को बुद्धिमानी समझते हैं। जो दिल्ली की खोज को बुद्धिमानी समझते हैं, मोक्ष का खोजी उन्हें पागल मालूम पड़ता है। जो तिजोरियों की खोज को बुद्धिमानी समझते हैं, मंदिर का खोजी उन्हें पागल मालूम पड़ता है।
लेकिन एक बार किसी को पागल समझने के पहले, अपने बाबत सोच लेना कि आप क्या खोज रहे हैं? जो आप खोज रहे हैं उसका कितना मतलब है? और जो आप खोज रहे हैं वह बहुत लोगों ने पा लिया था, फिर उन्होंने क्या पाया? हाथ खाली के खाली विदा हो जाते हैं।
जिन मित्रों ने सुबह प्रयोग किया है, सांझ उनसे मैं चाहूंगा कि इतनी ही गति सांझ के प्रयोग में भी लाएं, तो परिणाम हजार गुने गहरे हो जाएंगे। जो लोग सुबह इतना नाचे-कूदे हैं, जिनके भीतर इतनी शक्ति जागी है, वे सांझ को भी खड़े होकर ही प्रयोग करें।
कोई आपके सवाल होंगे तो सांझ को लिख कर दे देंगे, उनकी हम सांझ बात कर लेंगे। जिन्हें कोई व्यक्तिगत सवाल हों, वे ढाई से तीन के बीच, जब तक ध्यान चलता है किसी भी दिन मुझसे आकर मिल लें और बात कर लें।

सुबह की हमारी बैठक पूरी हुई।