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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

16-ये प्रेम प्रीत अनमोल रे - (कविता)- परिजात के फूल

16-ये प्रेम प्रीत अनमोल रे  —  (कविता) - मनसा-मोहनी 

इस उम्र के ढलते मोड़ पर,ये प्रेम प्रीत अनमोल रे।

यह पूजा है, यहीं भक्ति है, ये आनंद है बे-तोल रे।

 

परम सुखद है जीवन उसका, जो इन तूफानों में डूबा।

न दर्पण है, न अर्पण है, ये रास्ता है जग से अबूझा।

थके कदम थे, थी राह कठिन भी, जीवन पथ पर उसको ढूंढा।

प्रीत में शीतलता है बसती, इस किसी तराजू से न तोल रे।।

 

द्वार खुले जब मधुर नाद से, प्रेम की गागर पूरा भर गई।

सुप्त पड़ी थी प्रेम की गंगा, गो-मुख बन वो जीवित हो गई।

तुझे निहारूँ, तुझे पुकारूँ, तेरी आहट मेरी धड़कन बन गई।

जीवन को रंगीला बन कर,  जीवन को तुम पूरा रंग गई।

शब्द नहीं अब लब पर आते, न किन्हीं गीत के बोल रे।।

 

सांसों का स्पंदन तू ही बन गई, वीरानों को उपवन कर गई।

प्रेम-प्रीत की एक बूंद से, हृदय का सागर तुम भर गई।

मधुर बोल कोकिला बनकर, जीवन को गीतों सा रच गई।

पल-पल ऐसा जीवन हो गया, पैरो को तू मृदंग दे गई।

साज-साज पर, ताल-ताल पर, राग बने अनमोल रे।

इस उम्र के ढलते मोड़ पर,ये प्रेम प्रीत अनमोल रे।

यह पूजा है, यहीं भक्ति है, ये आनंद है बे-तोल रे।

 (परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 

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