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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

17-वो न्यारी मतवाली पेंसिल - (कविता) - परिजात के फूल

17-वो न्यारी मतवाली पेंसिल - (कविता) -मनसा-मोहनी 

कविता जब श्‍याम-सलोने रंग में उतरती।

कैसे दिखती सुकन्या सी कोमल क्वाँरी।

उस का तन कितना चिकना और मरमरी बन जाता,

कैसे छुई मुई सी निरखती।

जब वह चलती है तो कैसी यौवन की

अँगड़ाई लेती सी लगती है।

उसका वो स्वरूप कैसा स्‍फटिक गौरवमय झाँक रहा होता है,

संगमरमर सी बन कैसे एक ताज महल सी खड़ी इतराती है।

और चलती, या शायद वो कैसे मचलती लगती है,

इतराती, इठलाती, दिखती भी मुस्कराती मन को भाती है।

कैसी नव यौवन सी है भाषित,

न थकती,

न रुकती,

मानो है वो कोई नृत्यांगना,

रूनक–झनक गूँजती उसकी पायल।

और फिर कभी शरमाती,

मुंह में उँगली दबाए देखती,

देखती कजरारी आंखों से

और में भूल जाता सारी दुनिया,

कुछ क्षण के लिए डूब जाता उनमें।

वो न्यारी मतवाली....पेन्सिल ।।

(नोट-पहले मैं कविता पैंसिल से ही लिखता था, उससे तीन चार पैंसिल हमेशा मेज पर छिल कर रख लेता था। उससे गति भी तेज होती थी और मिाटान भी आसान था)

(परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 

 


 

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