दिनांक
11 सितम्बर, 1972;
द्वितीय
पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर
हाल,
मुम्बई।
विनय—सूत्र:
आणा—निद्देसकरे, गुरुणमुववायकारए।
इंगिया—ऽऽ
गारसंपन्ने, से विणीए
त्ति बुच्चई।।
अह
पन्नरसहिं
ठाणेहिं, सुविणीए
ति बुच्चई।
नीयावत्ती
अचवले, अमाई
अकुऊहले।।
अप्प च
अहिक्सिवई, पबन्धं च
न कुब्बई।
मेत्तिजमाणो
भयई, सुयं
लध्दुं न
मज्जई।।
नय
पावपरिक्सेवी, न य
मित्तेसु
कुप्पई।
अप्पियस्साऽवि
मित्तस्त, रहे
कल्लाण भासई।।
कलहड़मरवज्जिए, बुद्धे
अभिजाइए।
हरिमं
पडिसंलीणे, शुइवणीए
ति बुच्चई।।





