कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--073

पैगंबर ताओ के खिले फूल हैं—(प्रवचन—तिहतरवां)
अध्याय 38 : खंड 2
अधःपतन

इसलिए:
जब ताओ का लोप होता है,
तब मनुष्यता का सिद्धांत जन्म लेता है;
और जब मनुष्यता का लोप होता है,
तब न्याय का सिद्धांत जन्म लेता है।
और जब न्याय का भी लोप होता है,
तब कर्मकांड का सिद्धांत पैदा होता है।
अब यह कर्मकांड हृदय की निष्ठा
और ईमानदारी का विरल हो जाना है।
और वही अराजकता की शुरुआत भी है।
पैगंबर ताओ के पूरे खिले फूल हैं।
और उनसे ही मूर्खता की शुरुआत भी होती है।
इसलिए आर्य पुरुष सघनता (नींव) में बसते हैं;
विरलता (अंत) में वे नहीं बसते।
वे फल में बसते हैं; फूल की
खिलावट (अभिव्यक्ति) में वे नहीं बसते।
इसलिए वे एक को इनकार और
दूसरे को स्वीकार करते हैं।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

महावीर वाणी (भाग--2) प्रवचन--05

ये चार शत्रु—(प्रवचन—पांचवां) 

दिनांक 17 सितम्बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

कषाय-सूत्र:

कोहो य माणो य अणिग्गहीया,
माया य लोभो य पवङ्ढमाणा।
चत्तारि एए कसिणा कसाया,
सिंचन्ति भूलाइं पुण्णब्भवस्स।।
पुढवी साली जवा चेव,
हिरण्णं पसुभिस्सह।
पडिपुण्णं नालमेगस्स,
इह विज्जा तवंचरे।।

अनिगृहित क्रोध और मान तथा बढ़ते हुए माया और लोभ, ये चारों काले कुत्सित कषाय पुनर्जन्मरूपी संसार-वृक्ष की जड़ों को सींचते रहते हैं।
चावल और जौ आदि धान्यों तथा सुवर्ण और पशुओं से परिपूर्ण यह समस्त पृथ्वी भी लोभी मनुष्य को तृप्त कर सकने में असमर्थ है, यह जानकर संयम का ही आचरण करना चाहिए।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--072

श्रेष्ठ चरित्र और घटिया चरित्र—(प्रवचन—बहात्‍तरवां)
अध्याय 38 : खंड 1
अधःपतन

श्रेष्ठ चरित्र वाला मनुष्य अपने
चरित्र के प्रति अनजान है;
इसलिए वह चरित्रवान है।
घटिया चरित्र वाला मनुष्य
चरित्र बचाए रखने पर तुला है;
इसलिए वह चरित्र से वंचित है।
श्रेष्ठ चरित्र वाला मनुष्य
कभी कर्म नहीं करता है;
या करता भी है, तो कभी
किसी बाह्य प्रयोजन से नहीं।
घटिया चरित्र वाला व्यक्ति कर्म करता है;
और ऐसा सदा किसी बाह्य प्रयोजन से ही करता है।
श्रेष्ठ दया वाला मनुष्य कर्म करता है;
लेकिन ऐसा वह बाह्य प्रयोजन से नहीं करता है।
श्रेष्ठ न्याय वाला मनुष्य कर्म करता है;
और ऐसा वह बाह्य प्रयोजन से ही करता है।
लेकिन जब श्रेष्ठ कर्मकांड वाला
मनुष्य कर्म करता है और प्रत्युत्तर नहीं पाता,
तब वह अपनी आस्तीन चढ़ा कर दूसरों
पर कर्मकांड लादने की ज्यादती करता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--071

सहजता और सभ्यता में तालमेल—(इकहतरवां)


प्रश्न-सार

1--दलाई लामा भारत क्यों आए?

2--प्रेम के बिना घृणा क्या संभव है?

3--रामकृष्ण और रमण को कैंसर क्यों?

4--सभ्यता और सहजता में तालमेल क्या?

5--अपने यथार्थ का साक्षात्कार कैसे हो?

6--आपकी बातें सुन कर भी बदलाहट क्यों नहीं?

पहला प्रश्न:

बौद्ध, जैन, हिंदू धर्म, सभी पुरातन मूल स्वर इस भारत भूमि से विलुप्त हो गए हैं। और आपने कहा भी है कि धर्म के उदय की संभावना अब पश्चिम में है। लेकिन लाओत्से के प्रवचन के प्रथम दिवस ही आपने कहा कि धर्म की एकमात्र संभावना भारत में है। कृपया स्पष्ट करें कि किन विशिष्ट संभावनाओं को जान कर ऐसा आपने कहा है।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--80)

पूनम बन उतरो(प्रवचनपांचवां)

दिनांक 30 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

एक ही प्रश्न उठ रहा है हृदय में और वह भी पहली बार कि कौन है तू? क्या है, कहां पर है? अपने से पूरी—पूरी पहचान हो जाये ताकि एक जान हो जायें। तू तू न रहे, मैं मैं न रहूं। एक दूजे में खो जायें। और जब तक पहचान नहीं होती तब तक एक कैसे हो जायें? और उचित भी यही है कि तभी मैं आपके दरबार में आऊं। आने का मजा भी तभी रहेगा।

 ऐसे अपने मन को धोखे मत देना। निरंतर आदमी बचने की नई—नई तरकीबें खोज लेता है। परमात्मा के द्वार में भी तुम तब जाओगे जब अपने को जान लोगे तो परमात्मा के द्वार में जाने की जरूरत क्या रह जायेगी? और यह अकड़ छोड़ो कि अपने को जानकर पहुंचेंगे, कुछ पात्रता लेकर पहुंचेंगे, कुछ योग्य बनकर पहुंचेंगे।

रविवार, 9 नवंबर 2014

भज गोविंदम मुढ़मते (आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--03

सत्संग से निस्संगता—(प्रवचन—तीसरा)
सूत्र :

का ते कांता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः
कस्य त्वं कः कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः।।
सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम्
निर्मोहत्वे निश्चल चित्तं निश्चलचित्ते जीवनमुक्तिः।।
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः
क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः।।
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम्
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा।।
दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुग्चत्याशावायुः।।
का ते कांताधनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।
क्षणमपि सज्जनसंगतिरेका भवति भवावितरणे नौका।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--40

मिलन होता हैबीसवां प्रवचन

बीचवां प्रवचन,
30 मार्च1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :
1-प्रार्थना क्या है? और क्या प्रार्थना अपने ही लिए है?
2-अहंकार के पास भी कोई संजीवनी है क्या? जाने कहां से, कैसे और क्यों जी—जी आता है!
3-टी. यू. अंग्रेजी—विभागाध्यक्ष तथा शिवपुरी बाबा के कुछ शिष्यों के संदर्भ सहित नेपाल के    एक मित्र का भगवान से प्रश्न—प्रेम के साथ इतना गहरा भय क्यों जुड़ा रहता है?
4-भगवान! अब तैयार हूं। तारीख तेरह अप्रैल को मेरा इकसठवां जन्मदिन है—आपके चरणों में     संन्यस्त होने के लिए आ गिरूंगा।... आप ही मेरे शेष जीवन के एक मात्र आधार सदगुरु और   इष्टदेव हो!
5-भगवान! क्या इस प्यास का कभी अंत होगा जिसने मुझे दीवाना बना दिया है?... आह! किसे मैं अपने हृदय की बात बताऊं? मैं एकदम अजनबी और नितांत अकेला हूं!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--39

प्रेम ही मंदिर हैउन्नीसवा प्रवचन

उन्‍नीसवां प्रवचन
29 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :


अनन्यभकया तदबुद्धिर्बुद्धिलयादत्यन्तम्।। 96।।
आयुश्चिरयितरेषां तु हानिनास्पदत्वात्।। 97।।
संसृतिरेषाम् भक्ति: स्यान्नाज्ञानात् कारणसिद्धे:।। 98।।
त्रीण्येषां नेत्राणि शब्दलिगाक्षभेदादुद्रवत्।। 99।।
आविस्तिरोभावाकिकारा: स्युः क्रियाफलसयोगात्।। 100।।

अथातो भक्ति जिज्ञासा!
अब भक्ति की जिज्ञासा!
ऐसे इन अपूर्व सूत्रों का आज अंतिम दिन आ गया। सोचा, विचारा, पर उससे जिज्ञासा पूरी नहीं होती।

शनिवार, 8 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--38

जगत की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता--प्रेम : (प्रवचनअठारहवां)

28 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :


1-वेदों में वर्णित होमापक्षी की कथा का आशय समझाने के लिए भगवान से निवेदन।

2-क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता है?

3-हे भंते! मा शीला के मन में भाव उठा दीजिए न!...

4-अब हद से गुजर चुकी मुहब्बत तेरी! 

5-प्रार्थना है कि अब रंग चढ़ा दें!

6-संसार क्या है?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--37

ऊर्ध्वगति का आयाम है परमात्मासत्रहवां प्रवचन

सत्रहवां प्रवचन
27 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :

फलस्माद्वादरायणो दृष्टत्वात्।। 91।।
ब्यूत्कमदप्ययस्तथा दृष्टम्।। 92।।
तदैक्यं नानात्वकैत्वमुपाधियोगहानादादित्यवत्।। 93।।
पृथगिति चेन्नापरेणासम्बन्धात् प्रकाशानाम्।। 94।।
न विकारिणस्तु कारणविकारात्।। 95।।


'फलम् अस्मात् वादरायण दृष्टत्वात्।।
वादरायण कहते हैं कि कर्म स्वयं फलदाता नहीं है; ईश्वर ही कर्मों के फलदाता हैं। ऐसा देखने में भी आता है।

महावीर वाणी (भाग--2) प्रवचन--04

सारा खेल काम-वासना का—(प्रवचन—चौथा) 

दिनांक 16 सितम्बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

प्रमाद-स्थान-सूत्र : 2

रसा पगामंनिसेवियव्वा,
पायं रसा दित्तिकरा नराणं
दित्तं च कामा समभिद्दवन्ति,
दुमं जहा साउफलंपक्खी।।
कामभोगा समयं उवेन्ति,
न यावि भोगा विगइं उवेन्ति
जे तप्पओसीपरिग्गही,
सो तेसु मोहा विगइं उवेइ।।

दूध, दही, घी, मक्खन, मलाई, शक्कर, गुड़, खांड, तेल, मधु, मद्य, मांस आदि रसवाले पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे मादकता पैदा करते हैं और मत्त पुरुष अथवा स्त्री के पास वासनाएं वैसी ही दौड़ी आती हैं, जैसे स्वादिष्ट फलवाले वृक्ष की ओर पक्षी।

महावीर वाणी (भाग--2) प्रवचन--03

एक ही नियम : होश—(प्रवचन—तीसरा)
दिनांक 15 सितम्बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

प्रमाद-स्थान-सूत्र : 1

पमायं कम्ममाहंसु, अप्पमायं तहावरं
तब्भावादेसओ वावि, बालं पंडियमेव वा।।
दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो,
मोहो हओ जस्स न होई तण्हा
तण्हा हया जस्स न होई लोहो,
लोहो हओ जस्सकिंचणाइं।।

प्रमाद को कर्म कहा है और अप्रमाद को अकर्म अर्थात जो प्रवृत्तियां प्रमादयुक्त हैं वे कर्म-बंधन करनेवाली हैं और जो प्रवृत्तियां प्रमादरहित हैं, वे कर्म-बंधन नहीं करतीं। प्रमाद के होने और न होने से मनुष्य क्रमशः बाल-बुद्धि (मूर्ख) और पण्डित कहलाता है।

महावीर वाणी (भाग--2) प्रवचन--02

अलिप्तता और अनासक्ति का भाव-बोध(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 14 सितम्बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

अप्रमाद-सूत्र : 2

वोच्छिन्द सिणेहमप्पणो,
कुमुयं सारइयंपाणियं
से सव्वसिणेहवज्जिए,
समयं गोयम! मा पमायए।।
तिण्णो हु सि अण्णवं महं,
किं पुण चिट्ठसि तीरमागओ
अभितुर पारं गमितए,
समयं गोयम! मा पमायए।।

जैसे कमल शरद-काल के निर्मल जल को भी नहीं छूता और अलिप्त रहता है, वैसे ही संसार से अपनी समस्त आसक्तियां मिटाकर सब प्रकार के स्नेहबंधनों से रहित हो जा। अतः गौतम! क्षणमात्र भी प्रमाद मत कर।
तू इस प्रपंचमय विशाल संसार-समुद्र को तैर चुका है। भला किनारे पहुंचकर तू क्यों अटक रहा है? उस पार पहुंचने के लिए शीघ्रता कर। हे गौतम! क्षणमात्र भी प्रमाद मत कर।

महावीर वाणी (भाग--2) प्रवचन--01


 महावीर वाणी भाग—2
ओशो
(द्वितीय एवं तृतीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला के अंतर्गत दिनांक 13 सितम्‍बर से 21 सितम्‍बर 1972 एवं 25 अगस्‍त से 11 सितम्‍बर 1973 तक भगवान श्री द्वारा दिए गये 27 अमृत प्रवचनों का संकलन)

मैं यहां एक अनूठा प्रयोग कर रहा हूं, जैसा कभी नहीं किया गया है। यह मनुष्‍य जाति के इतिहास में पहली घटना है। जहां सारे धर्म एक साथ डूब रहे है। और बिना किसी प्रयास के यहां बैठकर हम दोहराते नहीं कि अल्‍लाह ईश्‍वर तेरा नाम, सबको सन्‍मति दे भगवान। यह हम दोहराते नहीं परंतु यहां ये घट रहा है। यहां अल्‍लाह और ईश्‍वर एक के ही नाम है। इसे कहने की जरूरत नहीं है। हुए जा रहे है एक। यहां किसी को पता नहीं चलता। कौन हिंदू है। कौन मुसलमान है, कौन ईसाई है, कौन यहूदी है, कौन सिख है। यहां सब इकट्ठे है।
और सारे जगत की सम्पदा मेरी है। मैं आध्‍यात्‍मिक सम्‍पदा का अपने को हकदार घोषित करता हूं, उसमें जरा भी कुछ छोड़ने को राज़ी नहीं हूं, क्‍यों उसे छोटा करूं। पूरा मनुष्‍य जाति का इतिहास मेरा है। और यही मैं चाहता हूं। कि तुम्‍हारा भी हो जाये। इस लिए तुम ये बातें हीं छोड़ दो—भारतीय और गैर भारतीय। तुम्‍हें यह फिकिर ही मिट जानी चाहिए। ये चमड़ी के रंग और ढ़ंग, इन पर तुम ध्‍यान न दो। ये आदते गलत है। ये संस्‍कार ओछे है। इनका विदा करो।
मनुष्‍यता एक है और यह पृथ्‍वी एक हो जाये, तो शांति हो, तो सौमन्‍यस्‍यहो तो एक भाइचारा हो, एक प्रेम जगे और जगत के न मालूम कितने कष्‍ट अपने आप समाप्‍त हो जायें।
ओशो



समय और मृत्‍यु का अंतर्बोध—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 13 सितम्‍बर, 1972
द्वितीय पर्युषण व्‍याखानमाला,
पाटकर हाल , बम्‍बई।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भज गोविंद मुढ़मते (आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--02

क्षणभंगुर का आकर्षण—(प्रवचन—दूसरा)

प्रश्न-सार

1—क्या ज्ञान और भजन में, ज्ञान और भक्ति में  कोई  अंतर्संबंध है?

2—क्या सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता ही आकर्षण का कारण नहीं है?

3—क्या स्व को विसर्जित कर देने पर समूचा अस्तित्व रक्षा करता है?

4—क्या बिना योग्यता के भी रिक्त सिंहासन पर भगवान विराजेंगे?

5—शंकराचार्य का जोर स्त्री-पुरुष के शरीर में वैराग्य की भावना पर है, परंतु आपका नहीं--कुछ कहें।

6—मन घोर संदेहवादी, पदार्थवादी है। आप कहते हैं, सब परमात्मा है--क्या इस पर विश्वास करना ईमानदारी होगी?

भज गोविंद मूढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--01

भज गोविंदम मूढ़मते—(आदि शंक्राचार्य)

(दिनांक 11-11-1975 से 20-11-1975 तक ओशो आश्रम पूना में बोले गये श्री आदि शंकराचार्य के सूत्रो पर ओशो जी दस अमृत प्रवचन।) 

स मधुर गीत का पहला पद शंकर ने तब लिखा, जब वे एक गांव से गुजरते थे, और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को व्याकरण के सूत्र रटते देखा। उन्हें बड़ी दया आई, मरते वक्त व्याकरण के सूत्र रट रहा है यह आदमी! पूरा जीवन भी गंवा दिया, अब आखिरी क्षण भी गंवा रहा है! पूरे जीवन तो परमात्मा को स्मरण नहीं किया, अब भी व्याकरण में उलझा है! व्याकरण के सूत्र रटने से क्या होगा?
शंकर की सारी वाणी में 'भज गोविन्दम्' से मूल्यवान कुछ भी नहीं है। क्योंकि शंकर मूलतः दार्शनिक हैं। उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत जटिल है; वह शब्द, शास्त्र, तर्क, ऊहापोह, विचार है। लेकिन शंकर जानते हैं कि तर्क, ऊहापोह और विचार से परमात्मा पाया नहीं जा सकता; उसे पाने का ढंग तो नाचना है, गीत गाना है; उसे पाने का ढंग भाव है, विचार नहीं; उसे पाने का मार्ग हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। इसलिए शंकर ने ब्रह्म-सूत्र के भाष्य लिखे, उपनिषदों पर भाष्य लिखे, गीता पर भाष्य लिखा, लेकिन शंकर का अंतरतम तुम इन छोटे-छोटे पदों में पाओगे। यहां उन्होंने अपने हृदय को खोल दिया है।

ओशो

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--20


नानक नदरी नदरि निहाल—(प्रवचन—बीसवां)

पउड़ी: 38
जतु पहारा धीरजु सुनिआरुअहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

सलोकु:

पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु
दिवस राति दुइ दाई दाइआ खेले सगलु जगतु।।
चंगिआइआ बुरिआइआ वाचै धरमु हदूरि
करमी आपा आपणी के नेड़े के दूरि।।
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि
'नानक' ते मुख उजले केती छूटी नालि।।



जतु पहारा धीरजु सुनिआरुअहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।