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रविवार, 13 मई 2012

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्--
     कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी। क्‍यों?
क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता।

कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि

कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति:
     यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क को भूख की सूचना देता है। और फिर मस्‍तिष्‍क हम तक इसकी सूचना पहुँचाता है। उसके पास कुछ अपने संकेत होते है। उदाहरण के लिए, जब हमें प्‍यास लगती है, तो मस्‍तिष्‍क ही गले में प्‍यास की अनुभूति को जगा देता है। जब शरीर को पानी चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क गले में प्‍यास के लक्षण जगा देता है। और हमको प्‍यास लगने लगती है। जब हमें भोजन चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क पेट में कुछ निर्मित करने लगता है। और भूख सतानें लगती है।

शनिवार, 12 मई 2012

मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’
सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा।
     तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देख कर जाना जा सकता है।
      उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते है। और वह घटना बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। मैं नौ महीने कहता हूं—क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में इसमे थोड़ी भिन्‍नता होती है। यह निर्भर करता है: समय का जो अंतराल गर्भधारण और जन्‍म के बीच मौजूद रहता है।

शुक्रवार, 11 मई 2012

अन्‍ना कैरेनिना:-लियो टॉलस्टॉय-(056)

अन्‍ना कैरेनिना: लियो टॉलस्टॉय (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)
जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास---
     अन्‍ना कैरेनिना रशियन समाज की एक संभ्रांत महिला की कहानी है। जो अनैतिक प्रेम संबंध जोड़कर अपने आपको बरबार कर लेती है। इस उपन्‍यास में टॉलस्‍टॉय कदम-कदम पर यह दिखाता है कि समाज कैसे स्‍त्री और पुरूष के विषय में दोहरे मापदंड रखता है। अन्‍ना के सगा भाई ऑब्‍लान्‍स्‍की के अनैतिक प्रेम संबंध होते है, और न केवल वह अपितु उसके स्‍तर के कितने ही पुरूष खुद तो पत्‍नी से धोखा करते है, लेकिन अपनी पत्‍नियों से वफादारी की मांग करते है। समाज चाहता है कि पत्‍नी अपने पति की बेवफाई को भूल जाये और उसे माफ कर दे।

स्‍वार्थ पर संयम संपन्न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्‍न पुरूष उपलब्‍ध होता है—पतंजलि

‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्--
तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।
     पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’
      स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग पहचानने का प्रयास करो—परार्थ, दूसरों से अलग। और यह मत सोचना कि जो लोग तुम से अलग है, बहार है, वहीं दूसरे है। वे तो दूसरे है ही। लेकिन तुम्‍हारा शरीर भी दूसरा है। एक दिन तुम्‍हारा शरीर भी मिट्टी में मिल जायेगा। शरीर भी इस पृथ्‍वी का अंश है। तुम्‍हारी श्‍वास भी तुम्‍हारी नहीं है। वह भी दूसरों के द्वारा दी हुई है; वह हवा में वापस लौट जायेगी। बस कुछ थोड़े समय के लिए ही तुम्‍हें श्‍वास दी गयी है। वह श्‍वास उधार मिली हुई है। तुम्‍हें उसे लौटाना ही होगा। तुम यहां नहीं रहोगे। लेकिन तुम्‍हारी श्‍वास यहीं हवाओं में रहेगी। तुम  यहां नहीं रहोगे, लेकिन तुम्‍हारा शरीर पृथ्‍वी में रहेगा। मिट्टी-मिट्टी में मिल जाएगी। जिसे अभी तुम अपना रक्‍त समझते हो, वह नदियों में प्रवाहित हो रहा होगा। सभी कुछ यहीं समाहित हो जाएगा।

बुधवार, 9 मई 2012

जरूथुस्‍त्र--

एक बार पर्शिया का राज विशतस्‍या,  जब युद्ध जीतकर लौट रहा था, तो वह जरथुस्त्र के निवास के निकट जा पहुंचा। उसने इस रहस्‍यदर्शी संत के दर्शन करने की सोची। राज ने जरथुस्त्र के पास जाकर कहा, ‘’मैं आपके पास इसलिए अया हूं कि शायद आप मुझे सृष्‍टि और प्रकृति के नियम के विषय में कुछ समझा सकें। मैं यहां पर अधिक समय तो नहीं रूक सकता हूं, क्‍योंकि मैं युद्ध स्‍थल से लौट रहा हूं। और मुझे जल्‍दी ही अपने राज्‍य में वापस पहुंचना है, क्‍योंकि राज्‍य के महत्वपूर्ण मसले महल में मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।

रविवार, 6 मई 2012

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्—पतंजलि योग सूत्र

ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है।
      और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही एक मात्र ऐसा तारा है, जो पूर्णतया गति विहीन है, उसमें कोई गति नहीं है, वह थिर है। लेकिन यह बात सच नहीं है। उसमें गति है, लेकिन उसकी गति बहुत धीमी होती है। लेकिन फिर भी यह बहुत प्रतीकात्‍मक है: हमको अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेना है जो कि गति विहीन हो, जिसमे किसी प्रकार की गति न हो, पूरी तरह थिर हो। वहीं हमारा स्‍वभाव है, केवल वहीं हमारी वास्‍तविक अस्‍तित्‍व है। हमारा सच्‍चा स्‍वरूप है: ध्रुव तारे जैसा—गति विहीन, पूर्णरूपेण गति। क्‍योंकि जब भीतर कहीं गति नहीं होती है, तब शाश्‍वतता होती है। जब गति होती है, समय भी होता है।

शक्‍तियां है जो मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है—पतंजलि (योग-सूत्र)

ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी।
      जो व्‍यक्‍ति बह्या संसार की और बढ़ रहा होता है, वह चंद्र से सूर्य की और से होता हुआ संसार में जा रहा होता है। और जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं के भीतर जा रहा है, उसकी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और, और फिर चंद्र से भी पार की तरफ जा रही होती है। जो व्‍यक्‍ति अंतस की यात्रा पर जा रहा होता है। और एक वह व्‍यक्‍ति जो बह्या संसार की यात्रा पर जो रहा होता है उनके लक्ष्‍य और उद्देश्‍य एकदम अलग-अलग होते है, एकदम विपरीत होते है।

शनिवार, 5 मई 2012

आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--

ऊर्जा बह्मांड़—

आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?
       इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।
       सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।

शुक्रवार, 4 मई 2012

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है। हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर लेना—इतना ही। लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है। और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है। उन पांचों भागों को समझ लेना, वे बहुत महत्‍वपूर्ण है।
पहला है प्राण,
दूसरा है अपान,
तीसरा है समान,
चौथा उदान,
पाँचवाँ है व्‍यान।
      यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है। और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है।

बुधवार, 2 मई 2012

एक काली अमावस—लादेन (कविता)

काल बन कर निगल गई
उस काली परछाई को
हो गई जो समय के गर्त में दफ़न
जो समझता था अपने को काल का पर्यायवाची
कलंक-कलुषित जीवन
मिटा दिया उस काल ने फिर एक बार
कि शायद ले सके कोई सुंदर रूप
कोई मां भर से उस कुरूप चेहरे पर
फिर से एक नया रंगरूप
और खिला सके उसके ह्रदय में भी
प्रेम का कोई नया अंकुर
तपीस कम कर दे उस
धधकते दावा कूल की

मंगलवार, 1 मई 2012

गाड़रवारा—एक परिक्रमा---(भाग--1)

मुल्‍ला जी—(आनंद मोहम्‍मद)
      मुल्‍ला जी, हां ये नाम सुन का आप भी जरूर थोड़ा चोंकोगे। मैं भी उसे देख कर थोड़ी दे के लिए अवाक सा रह गया। मन पर चल रहा विचारों का शोर थोड़ी देर के लिए थम गया था, वह पथ कुछ क्षण के लिए सूना हो गया था। मैं उसे अपलक देखा ही रह गया। सफेद नमाजी टोपी, चेहरे पर हल्‍की दाढ़ी, रंग का थोड़ा सांवला, मोटे होठ, और गहरी काली आंखे.....जो आपको कुछ क्षण के लिए किसी गहरे-शीतल एकांत में ले जायेंगे। जी हां, ‘’ओशो’’ का एक सन्‍यासी का नाम है, मुल्‍ला जी( आनंद मोहम्‍मद) जो एक कट्टर मुसलिम परिवार में पैदा हुआ। और अपने लड़क पन में ही बगावत कर ओशो से जूड़ गया। जिस उम्र में बच्‍चें को कुछ समझ नहीं होती, या यूं कह लो वह यार दोस्‍तों में मौज़ मस्‍ती कर के अपने जीवन को खत्‍म कर रहे होता है। उस समय यह अंजान और बेबूझी सी उस डगर वर बालक ओशो के उस अथाह समुद्र में कैसे गोते लगा गया, गोते ही नहीं लगाये, वह संन्‍यास ले कर उस में पूर्णता से डूब भी गया।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

सामाजिक तल पर भारत बड़ा कठोर है—ओशो

प्रश्न—भारतीय संस्‍कृति बड़ी सहिष्‍णु संस्‍कृति रही है। बुद्ध ईश्‍वर को नहीं मानते थे, पतंजलि ने भी ईश्‍वर को इंकार कर दिया था। जब आप अमेरिका में पाँच वर्ष रहे, तब क्‍या आपने इस फर्क को देखा?

ओशो—मैंने फर्क देखा है। फर्क यह है कि जहां तक चिंतन का सवाल है, भारत बहुत उदार और सहिष्‍णु है; लेकिन जहां सामाजिक आचरण का सवाल आता है, वहां वह बड़ा कठोर हो जाता है। सामाजिक जीवन के संबंध में अमेरिका बड़ा उदार है, लेकिन चिंतन आदि के बारे में बहुत हठी और अड़ियल है। उनके विचारों का स्‍तर देखा जाए, तो अमेरिका के सर्वाधिक शिक्षित लोगों को भारत के देहाती लोगों की तरह बात करते हुए पाया है। और उन्‍हें अपनी मूढ़ता दिखाई नहीं देती।
      जब मैं कारागृह में था तो वहां का जेलर मुझमें उत्‍सुक हुआ। पूरा जेल ही मुझमें उत्‍सुक था। जेलर मुझसे मिलने आया। काफी पढ़ा लिखा, अनुभवी बूढा आदमी था। वह बोला, मैं आपको यह बाइबल देने आया हूं। ये ईश्‍वर के वक्‍तव्‍य है।

उजाला—कविता

कब तक खड़ा रहेगा ये उजाला
मेरे द्वारा पर और करता रहेगा
यूं तन्‍हा मेरा इंतजार...
पर मैं हूं कि आंखें बंद किये
उलझा हूं किन्‍हीं अंधेरी गलियों में
और ढूंढ रहा हूं, उन आस्‍था और विश्‍वासों में
कुछ वादे और गिले सिकवा
जो कभी के दफ़न हो गये है
नैतिकता और संस्‍कारों के तले
किसी अनबूझी कब्र में

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

स्त्री पहली बार चरित्रवान हो रही है—ओशो

ओशो—तुम्‍हारे चरित्र का एक ही अर्थ होता है, बस कि स्‍त्री पुरूष से बंधी रहे, चाहे पुरूष कैसा ही गलत हो। हमारे शास्‍त्रों में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है। कि अगर कोई पत्‍नी अपने पति को—बूढ़े, मरते, सड़ते, कुष्‍ठ रोग से गलते पति को भी—कंधे पर रख कर वेश्‍या के घर पहुंचा दे तो हम कहते है: ‘’यह है चरित्र, देखो क्‍या चरित्र है। मरते पति ने इच्‍छा जाहिर की कि मुझे वेश्‍या के घर जाना है। और स्‍त्री इसको कंधों पर रख कर पहुंचा आयी।‘’ इसको गंगा जी में डूबा देना था, तो चरित्र होता। यह चरित्र नहीं है, सिर्फ गुलामी है, यह दासता है और कुछ भी नहीं।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

दांपत्‍य जीवन अशांत क्‍यों ?--ओशो

ओशो—एक बच्‍चा अपनी मां को प्रेम करता है। और मां खुश होगी कि बच्‍चा मा को प्रेम करता है। और वह बच्‍चे को कितना प्रेम करती है, लेकिन बच्‍चे के मन में मां के प्रेम की जो तस्‍वीर बनती चली जायेगी, मां भी नहीं सोच सकती। बच्‍चा भी नहीं सोच सकता कि अंतत: यही प्रेम उसकी जिंदगी को भी उपद्रव में डाल सकता है। अगर बच्‍चे के मन में अपनी मां की तस्‍वीर पूरी तरह बैठ गयी तो वह जिंदगी भर पत्‍नी में अपनी मां को खोजेगा। जो नहीं मिल सकता है।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

सेक्‍स से मुक्‍ति: सत्‍यम शिवम् सुंदरम्

प्रश्‍न—किसी ने ओशो से पूछा कि वह सेक्‍स से थक गया है।
ओशो—सेक्‍स थकान लाता है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि इसकी अवहेलना मत करो। जब तक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते, तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते। जब तक तुम इसकी व्‍यर्थता को नहीं पहचान लेते तब तक बदलाव असंभव है।
      यह अच्‍छा है कि तुम सेक्‍स से तंग आते जा रहे हो। और स्‍वाभाविक भी है। सेक्‍स का अर्थ ही यह है कि तुम्‍हारी ऊर्जा नीचे की और बहती है। तुम ऊर्जा गंवा रहे हो। ऊर्जा को ऊपर की और जाना चाहिए तब यह तुम्‍हारा पोषण करती है। तब यह शक्‍ति लाती है। तुम्‍हारे भीतर कभी न थकाने वाली ऊर्जा के स्‍त्रोत बहने शुरू हो जाते है—एस धम्‍मो सनंतनो।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सेक्‍स और भोजन का गहरा--ओशो

प्रश्न—मेरे बदन में बहुत काम-ऊर्जा है। जब मैं नाचती हूं, कभी-कभी में महसूस करती हूं कि मैं पूरी दुनिया को खत्‍म कर दूंगी और किसी स्‍थिति में इतना क्रोध और हिंसा मेरे भीतर उबलती है कि मैं अपनी ऊर्जा को ध्‍यान की तरफ नहीं ले जाती पाती हूं, यह मुझे पागल कर देती है। मैं काम-वासना में नहीं जाना चाहती हूं परंतु हिंसक ऊर्जा ज्‍वालामुखी की तरह जल रही है। मेरे लिए यह बर्दाश्‍त के बाहर है और यह मुझे आत्‍महत्‍या करने जैसा लगता है। कृपया कर मुझे समझाए कि कैसे मैं अपनी ऊर्जा को सृजनात्‍मकता दूँ।
ओशो—यह समस्‍या मन की बनाई हुई है। न कि ऊर्जा की। अपनी ऊर्जा की सुनो। यह सही दिशा दिखा रही है। यह काम-ऊर्जा नहीं है जो समस्‍या पैदा कर रही है। यह कभी जानवरों में, वृक्षों में, पक्षियों में किसी तरह की समस्‍या पैदा नहीं करती। ऊर्जा समस्‍या पैदा करती है क्‍योंकि तुम्‍हारे मन का ढंग गलत है।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

भोजन की टेबल आनंदपूर्ण होनी चाहिए: ओशो

भोजन की टेबल आनंदपूर्ण होनी चाहिए: ओशो
      जो हम खाते है, उससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह है कि हम उसे किस भाव-दशा में खाते है। उससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। आप क्‍या खाते है। यह उतना महत्‍वपूर्ण नहीं है। जितना यह महत्‍वपूर्ण है कि आप किस भाव-दिशा में खाते है। आप आनंदित खोते है, या दुखी खाते है, उदास खाते है, चिंता में खाते है, या क्रोध से भरे हुए खाते है, या मन मार कर खाते है। अगर आप चिंता में खाते है, तो श्रेष्‍ठतम भोजन के परिणाम भी पायजनस होंगे। ज़हरीले होंगे। और अगर आप अपने आनंद में खाते रहे है, तो कई बार संभावना भी है कि जहर भी आप पर पूरे परिणाम न ला पाये। बहुत संभावना है। आप कैसे खाते है। किस चित की दशा में खाते है?

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

जवान रहना है तो मौन हो जाओ? –आइंस्‍टीन की क्रांतिकारी खोज

अल्‍बर्ट आइंस्टीन ने खोज की और निश्‍चित ही यह सही होगी, क्‍योंकि अंतरिक्ष के बारे में इस व्‍यक्‍ति ने बहुत कठोर परिश्रम किया था। उसकी खोज बहुत गजब की है। उसने स्‍वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी क्‍योंकि उसे भय था कि कोई उस पर विश्‍वास नहीं करेगा। खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है। परंतु खोज इतनी महत्‍वपूर्ण थी की उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जग जाहिर करने का तय किया।