कूर्मनाडयां
स्थैर्यम्--
कूर्म-नाड़ी
प्राण की, श्वास
की वाहिका है।
अगर हम
चुपचाप,
शांतिपूर्वक
अपने श्वसन पर
ध्यान दें,
किसी भी ढंग
से श्वास की
लय न बिगड़े, न
तो स्वास तेज
हो, और न ही
धीमी हो, बस
उसे स्वाभाविक
और शिथिल रूप
से चलने दें।
तब अगर हम केवल
श्वास को
देखते रहे, तो
हम धीरे-धीरे
थिर होने लगेंगे।
फिर भीतर किसी
तरह की कोई
हलन-चलन नहीं होगी।
क्यों?
क्योंकि
सभी हलन-चलन,
गति श्वास के
द्वारा ही
होती है। श्वास
से ही पूरी की
पूरी गति होती
है। श्वास ही
सारी हलन-चलन
और गतियों का
संचरण करती
है। जब श्वास
रूक जाती है।
तो व्यक्ति
मर जाता है।
फिर वह चल फिर
नहीं सकता।
हिल-डुल नहीं
सकता।






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