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सोमवार, 3 नवंबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-26)

विनय—शिष्‍य का लक्षण है—(प्रवचन—छब्‍बीसवां)

दिनांक 11 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, मुम्‍बई।

 विनय—सूत्र:

      आणा—निद्देसकरे, गुरुणमुववायकारए।
इंगिया—ऽऽ गारसंपन्ने, से विणीए त्ति बुच्चई।।
अह पन्नरसहिं ठाणेहिं, सुविणीए ति बुच्चई।
नीयावत्ती अचवले, अमाई अकुऊहले।।
अप्प च अहिक्सिवई, पबन्धं च न कुब्बई।
मेत्तिजमाणो भयई, सुयं लध्‍दुं न मज्जई।।
नय पावपरिक्सेवी, न य मित्तेसु कुप्पई।
अप्पियस्साऽवि मित्तस्त, रहे कल्लाण भासई।।
कलहड़मरवज्जिए, बुद्धे अभिजाइए।
हरिमं पडिसंलीणे, शुइवणीए ति बुच्चई।।

रविवार, 2 नवंबर 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--76)

अष्‍टावक्र : महागीता (भाग—6)

ओशो

(ओशो द्वारा अष्‍टावक्र—संहिता के 246 से 298 सूत्रों पर प्रश्‍नोत्‍तर सहित दिनांक 26 जनवरी से 10 फरवरी 1977 तक ओशो कम्‍यून इंटरनेशनल, पूना में दिए गए सोलह अमृत प्रवचनों का संकलन)

अष्‍टावक्र आज भी वैसे ही नित नूतन है, जैसे कभी रहे होंगे और सदा नित नूतन रहेंगे। यही तो शास्‍त्र की महीमा हे—शाश्‍वत, सनातन और फिर भी नित नूतन।
शास्‍त्र को फिर—फिर मुक्‍त किया जा सकता है। शास्‍त्र कभी बासा नहीं होता; न पुराना होता है। न प्राचीन होता है। क्‍योंकि शास्‍त्र की घटना ही समय के बाहर की घटना है, समय के भीतर की नहीं।
अष्‍टावक्र की गीता पर पुरी के शंकराचार्य भी बोल सकते है लेकिन मौलिक भी यहां होगा: शास्‍त्र को मिटायेंगे और परंपरा को बचायेंगे। परंपरा अष्‍टावक्र की नहीं, अष्‍टावक्र के पीछे आये हुए लोगों ने बनाई है। मैं उनको पोंछे डाल रहा हूं, जिन्‍होंने परंपरा बनाई है। जिन्‍होंने परंपरा बनाई है। कोई सदगुरू परंपरा नहीं बनाता; पर परंपरा बनती है। वह अनिवार्य है। उस परंपरा को बार—बार तोड़ना भी उनका ही अनिवार्य है।

ओशो

एक अोंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--11


ऊचे उपरि ऊचा नाउ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

पउड़ी: 24

अंतुसिफती कहणिअंतुअंतुकरणै देणिअंतु।।
अंतुवेखणि सुणणिअंतुअंतुजापै किआ मनि मंतु।।
अंतुजापै कीता आकारु। अंत न जापै पारावारु।।
अंत कारणि केते बिललाहिताके अंत न पाए जाहि।।
एहु अंत न जाणै कोइ। बहुता कहिऐ बहुता होइ।।
वडा साहिबु ऊचा थाउऊचे उपरि ऊचा नाउ।।
एवडु ऊचा होवे कोइतिसु ऊचे कउ जाणै सोइ।।
जेवड आपि जाणै आपि आप। 'नानक' नदरी करमी दाति।।


पउड़ी: 25

बहुता करम लिखिआजाइ। बडा दाता तिलु न तमाइ।।
केते मंगहि जोध अपार। केतिआ गणत नही वीचारु।।
केते खपि तुटहि वेकार
केते लै लै मुकरु पाहिकेते मूरख खाही खाहि।।
केतिआ दूख भूख सद मार। एहि भी दाति तेरी दातारि।।
बंदि खलासी भाणै होइ। होरु आखिसकै कोइ।।
जे को खाइकु आखणि पाइ। ओहु जाणै जेतिआ मुहि खाइ।।
आपे जाणै आपे देइआखहि सि भि केई केइ।।
जिसनो बखसे सिफति सालाह'नानक' पातिसाही पातिसाहु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--10


 आपे जाणै आपु—(प्रवचन—दसवां)

पउड़ी: 22

पाताला पाताल लख आगासा आगास
ओड़क ओड़क भालि थके वेद कहनि इक बात।।
सहस अठारह कहनि कतेबा असुलू इकु धातु।
लेखा होइ त लिखीऐ लेखै होइ विणासु।।
नानक बडा आखीए आपे जाणै आपु।।

 पउड़ी: 23

सालाही सालाहि एती सुरति न पाइया
नदिआ अतै वाह पवहि समुंदिजाणी अहि।।
समुंद साह सुलतान गिरहा सेती मालुधनु
कीड़ी तुलिहोवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि।।

ध्‍यान--सूत्र (ओशो) प्रवचन--09

आमंत्रण--एक कदम चलने का—(प्रवचन—नौवां)


मेरे प्रिय आत्मन्,

न तीन दिवसों में बहुत प्रेम की, और बहुत शांति की, आनंद की वर्षा हमारे हृदयों में रही। और मैं तो उन पक्षियों में से हूं, जिनका कोई नीड़ नहीं होता। और मुझे आपने अपने हृदयों में जगह दी, मेरे विचारों को और मेरे हृदय से निकले हुए उदगारों को आपने चाहा, उन्हें मौन से सुना, उनको समझने की कोशिश की और उनके प्रति बहुत प्रेम प्रकट किया, उस सबके लिए मैं अनुगृहीत हूं। आपकी आंखों में, आपकी खुशी में, और आपकी खुशी में आ गए आंसुओं में मुझे जो दिखायी पड़ा, उसके लिए भी अनुगृहीत हूं।

ध्‍यान--सूत्र (ओशो) प्रवचन--08

समाधि है द्वार—(प्रवचन—आठवां)


मेरे प्रिय आत्मन्,

सत्य क्या है? क्या उसकी प्राप्ति अंशतः संभव है? और यदि नहीं, तो मनुष्य उसकी प्राप्ति के लिए क्या कर सकता है? क्योंकि हरेक मनुष्य संत होना संभव नहीं है। यह पूछा है।

हली बात तो यह, संत होना हरेक मनुष्य की संभावना है। संभावना को कोई वास्तविकता में परिणत न करे, यह दूसरी बात है। यह दूसरी बात है कि कोई बीज वृक्ष न बन पाए, लेकिन हर बीज वृक्ष होने के लिए अपने अंतस से निर्णीत है। यानि हर बीज की यह संभावना है, यह पोटेंशियलिटी है कि वह वृक्ष बन सकता है। न बने, यह बिलकुल दूसरी बात है। खाद न मिले और भूमि न मिले, और पानी न मिले और रोशनी न मिले, तो बीज मर जाए यह हो सकता है, लेकिन बीज की संभावना जरूर थी।

ध्‍यान--सूत्र (ओशो) प्रवचन--07

शुद्धि और शून्यता से समाधि फलित—(प्रवचन—सातवां) 


मेरे प्रिय आत्मन्,

साधना की भूमिका के परिधि बिंदुओं पर हमने बात की है। अब हम उसके केंद्रीय स्वरूप पर भी विचार करें।
शरीर, विचार और भाव, इनकी शुद्धि और इनका शुद्ध स्वरूप उपलब्ध करना प्राथमिक भूमिका है। उतना भी हो, तो जीवन में बहुत आनंद फलित होता है। उतना भी हो, तो जीवन में बहुत दिव्यता आती है। उतना भी हो, तो हम अलौकिक से संबंधित हो जाते हैं।
लेकिन वह अलौकिक से संबंध है, अलौकिक में मिलन नहीं। वह अलौकिक से संबंधित होना है, लेकिन अलौकिक से एक हो जाना नहीं। वह परमात्मा को जानना है, लेकिन परमात्मा से सम्मिलित हो जाना नहीं। शुद्धि की भूमिका परमात्मा की तरफ उन्मुख करती है और परमात्मा पर दृष्टि को ले जाती है। उसके बाद शून्य की दृष्टि परमात्मा से मिलन कराती है और परमात्मा से एक कर देती है।

ध्‍यान--सूत्र (ओशो) प्रवचन--06

सम्यक रूपांतरण के सूत्र—(प्रवचन—छठवां)


मेरे प्रिय आत्मन्,

कुछ प्रश्न हैं। प्रश्न तो बहुत-से हैं, उन सबका संयुक्त उत्तर ही देने का प्रयास करूंगा। कुछ हिस्सों में उनको बांट लिया है।

पहला प्रश्न है, वैज्ञानिक युग में धर्म का क्या स्थान है? और धर्म का राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में क्या उपयोग है?

विज्ञान से अर्थ ज्ञान की उस पद्धति का है, जो पदार्थ में छिपी हुई अंतस शक्ति को खोजती है। धर्म से अर्थ उस ज्ञान की पद्धति का है, जो चेतना के भीतर छिपी हुई अंतस शक्ति को खोजती है। धर्म और विज्ञान का कोई विरोध नहीं है, वरन धर्म और विज्ञान परिपूरक हैं।
जो युग मात्र वैज्ञानिक होगा, उसके पास सुविधा तो बढ़ जाएगी, लेकिन सुख नहीं बढ़ेगा। जो युग मात्र धार्मिक होगा, उसके कुछ थोड़े-से लोगों को सुख तो उपलब्ध हो जाएगा, लेकिन अधिकतर लोग असुविधा से ग्रस्त हो जाएंगे।

ध्‍यान--सूत्र (अेाशो) प्रवचन--05

भाव-शुद्धि की कीमिया—(प्रवचन—पांचवां)


मेरे प्रिय आत्मन्,

साधना की परिधि भूमिका के संबंध में हमने दो चरणों पर बातें की हैं, शरीर-शुद्धि और विचार-शुद्धि। शरीर और विचार से भी गहरा तल भाव का, भावनाओं का है। भाव की शुद्धि सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। परिधि की भूमिका और साधना में शरीर और विचार दोनों से ज्यादा भाव की शुद्धि की उपयोगिता है।
यह इसलिए कि मनुष्य विचार से बहुत कम जीता है, मनुष्य भाव से ज्यादा जीता है। यह कहा जाता है कि मनुष्य एक रैशनल एनिमल है, एक बौद्धिक प्राणी है। यह बात उतनी सच नहीं है। आप अपने जीवन में विचार करके बहुत कुछ, बहुत कुछ नहीं करते हैं। आप अधिक जो करते हैं, वह भाव से प्रभावित होता है। आप जो घृणा करते हैं, आप जो क्रोध करते हैं, आप जो प्रेम करते हैं, वह सब भावनाओं से संबंधित होता है, विचारों से संबंधित नहीं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--070

विश्व-शांति का सूत्र: सहजता व सरलता—(प्रवचन—सत्‍तरहवां)

अध्याय 35

विश्व-शांति

ताओ कभी कर्मरत नहीं होता,
तो भी सभी कुछ उसके द्वारा ही कर्मरत है।
यदि सम्राट और भूस्वामी ताओ को अक्षुण्ण रख सकें,
तो संसार आप ही सुधर जाएगा।
और जब सुधर जाए और कर्मरत हो जाए,
तब उस अनाम पुरातन सरलता के द्वारा उसका अनुशासन हो।
यह अनाम पुरातन सरलता (स्पर्धा के लिए) वासना से रहित है।
वासनारहितता से निश्चलता प्राप्त होती है;
और संसार आप ही आप शांति को उपलब्ध होता है।

सूर्य उगता है, डूबता भी है। श्वास आती है, जाती भी है। तारे घूमते हैं; मौसम परिवर्तित होते हैं। प्रकृति का विराट कर्म चलता है, लेकिन बिलकुल अकर्म जैसा। वहां कोई कर्ता नहीं है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--069

शक्ति पर भद्रता की विजय होती है—(प्रवचन—उनहत्‍तरवां)
अध्याय 36

जीवन की लय

सत्ता से जिसे गिराना है,
पहले उसे फैलाव देना पड़ता है।
जिसे दुर्बल करना है,
पहले उसे बलवान बनाना होता है।
जिसे नीचे गिराना है,
पहले उसे शिखरस्थ करना होता है।
जिससे छीन लेना है,
पहले उसे दे देना होता है।
-- यही सूक्ष्म प्रकाश या दृष्टि है।
शक्ति पर भद्रता की विजय होती है:
मछली को गहरे पानी में ही रहने देना चाहिए;
और राज्य के तेज हथियारों को
वहां रखना चाहिए जहां उन्हें कोई देख न पाए।

न्म के साथ मृत्यु को देखना कठिन है। लेकिन दिखाई पड़े या न दिखाई पड़े, जन्म मृत्यु की शुरुआत है; वह मृत्यु का ही पहला कदम है। पर जन्म पर हम प्रसन्न होते हैं; मृत्यु में हम दुखी होते हैं। काश, हम देख पाएं कि जन्म ही मृत्यु का प्रारंभ है तो जन्म की खुशी भी समाप्त हो जाए

शनिवार, 1 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--32

अभीप्सा व प्रतीक्षा की एक साथ पूर्णता—प्रार्थना की पूर्णताबारहवां प्रवचन


 दिनांक 22 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--धर्म क्या है? और आप कैसा धर्म पृथ्वी पर लाना चाहते हैं?

 2--तेरे ही इशारे पर मैंने अपना पूरा प्यार उंडेल दिया। तुझमें उसीको और उसमें तेरे ही रूप    को देखती हूं। क्या मेरी आंखें धोखा खा रही हैं, प्रभु?

       3--आगरा से निकलनेवाले एक पत्र 'रजनीश—प्रेम ' के बाबत एक मित्र का अजीब—सा प्रश्न!

 4--संन्यास लेने के संबंध में अनिर्णय में पडे एक मित्र की समस्या!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--31

पदार्थ: अणुशक्ति: :चेतना: प्रेमशक्ति—ग्‍यारहवां प्रवचन


 दिनांक 21 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 लध्वपि भक्ताधिकारे महत्वक्षेपकमपरसर्वहानात्।। 76।।
तक्मानत्वादनन्यधर्म: खले बालीवत्।। 77।।
अनिन्द्ययोन्यधिक्रियतेपारम्पर्यात् सामान्यवत्।। 78।।
अतोह्यविपक्कभावानामपि तल्लोके।।79 ।।
क्रमैकणत्युपपत्तेस्तु।। 80 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--30

धर्म है मनुष्य के गीत का प्रकट हो जानादसवां प्रवचन


दिनांक 20 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--कार्ल मार्क्स के एक प्रसिद्ध वचन पर प्रश्न।

 2--आपके पास बैठने से जितने शून्य व खाली होते हैं उतना ध्यान करने से नहीं होते हैं। फिर   भी क्या ध्यान की जरूरत है?

 3--आपको समझने में मुझसे बहुत भूल हुई। क्षमा मांगता हूं। आपकी देखना का सारसूत्र क्या   हैं?

 4--परमात्मा की सर्वव्यापकता पर एक मित्र का प्रश्न। स्वामी ब्रह्म वेदाaत के संबंध में प्रश्न। कुछ भी नया करने में भयभीत होता हूं। इस भय से मुक्त कैसे होऊं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--29

भक्ति अकर्मण्यता नहीं, अकर्ताभाव हैनौवां प्रवचन :


 दिनांक 19 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 सुकृतजत्वात् परहेतुभावाश्च क्रियासु श्रेयस्य:।।७१।।
गौणं त्रैविध्यमितरेण स्तुत्यर्थत्वात् साहचर्यम्।। ७२।।
बहिरन्तरस्थमुभयमवेष्टि सर्ववत्।।७३।।
भूयसामननुष्ठितिरिति चेदाप्रयाणमुपसंहारान्महत्स्वपि।। ७४।। 
स्मृतिकीत्यों: कथादेश्चातौ प्रायश्चित्‍तभावात्।। ७५।।

 शांडिल्य ने भक्ति को दो खंडों में बांटा। एक साधनरूप भक्ति, एक साध्यरूप भक्ति। साधनरूप भक्ति को उन्होंने गौणी—भक्ति कहा और साध्यरूप भक्ति को परा— भक्ति। उस विभाजन की ही गहराई और विस्तार में आज के सूत्र हैं।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--28

सुख से चुकाओ मूल्य परमात्मा को पाने का—आठवां प्रवचन

दिनांक 18 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--आपको सुनता हूं तो अपने जीवन की व्यर्थता देखकर बहुत उदास हो जाता हूं।... 

 2--आपको पाकर पा रहा हूं कि सब पा गया हूं। हालांकि लोग कहते हैं मैं पागल हो गया हूं।...

 3--परमात्मा को पाने के लिए किस तरह मूल्य चुकाना होगा? क्या सक्रिय ध्यान शरीर को कष्ट     देना नहीं है?


पहला प्रश्‍न:


मैं आपको ' तो अपने जीवन की व्यर्थता देखकर उदास हो जाता '। मुझे उबारें मुझे पहला प्रश्न : सुनता हू बहुत हू बचाए! 

महावीर वाणी-(प्रवचन-25)

अरात्रि भोजन : शरीरऊर्जा का संतुलन(प्रवचनपच्‍चीसवां)

      दिनांक 10 सितम्‍बर, 1972;
      द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
      पाटकर हाल, बम्‍बई।

अरात्रि—भोजन—सूत्र :

      अत्थंगयंमि आइज्‍चे, पुरत्था य अणुग्गए।
आहारमाइयं सव्‍वं, भणसा वि न पत्थए।।
पाणिवह—मुसावायाऽदत्त मेहुण—परिग्गहा विरओ।
राइभोयणविरओ, जीवो भवइ अणासवो।।

 सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद श्रेयार्थी को सभी प्रकार के भोजन—पान आदि की मन से भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन, परिग्रह और रात्रि—भोजन से जो जीव विरत रहता है, वह निराश्रव अर्थात निर्दोष हो जाता है।

महावीर वाणी-(प्रवचन-24)

संग्रह : अंदर के लोभ की झलक(प्रवचनचौबीसवां)

दिनांक 9 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण, व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

अपरिग्रह—सूत्र:

 न सो परिग्गह बुत्तो, नायपुत्तेण ताइणा।
मूच्‍छा परिग्गहो द्वी, इइ बुतं महेसिणा।।
लोहस्सेस अणुकोसी, मन्ने अन्नरामवि।
जे सिया सन्निहिकामे, गिही पब्बइए न से।।

 प्राणिमात्र के संरक्षक ज्ञातपुत्र ( भगवान महावीर) ने कुछ वस्‍त्र आदि स्थूल पदार्थों के रखने को परिग्रह नहीं बतलाया है। लेकिन इन सामग्रियों में असक्ति, ममता व मूर्छा रखना ही परिग्रह है, ऐसा उन महर्षि ने बताया है।
संग्रह करना, यह अंदर रहने वाले लोभ की झलक है। अतएव मैं मानता हूं कि जो संग्रह करने की वृत्ति रखते हैं, वे गृहस्थ हैं, साधु नहीं।