दिनांक 8
सितम्बर, 1972;
द्वितीय
पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर
हाल, बम्बई।
ब्रह्मचर्य—सूत्र
: 2
सद्दे
रूवे य गंधे य, रसे फासे
तहेव य।
पंचविहे
कामगुणे, निच्चसो
परिवज्जए।।
कामाणुगिद्धिप्पभवं
खु दुक्खं,
सब्बस्स
लोगस्स
सदेवगस्स।
जे
काइयं माणसिय
च किचि,
तस्सऽन्तगं
गच्छइ
वीयरागो।।
देवदाणव
गंधब्बा
जक्सरक्ससकिन्नरा।
बंभयारि
नमंसन्ति
टुकरं जे
करेलि तं।।
एस
धम्मे धुवे
निच्चे, सासए
जिणदेसिए।
सिद्धासिज्झन्ति
चाणेण, सिाइस्कृस्सन्तितहाऽवरे।।
शब्द, रूप गंध,
रस और
स्पर्श इन
पांच प्रकार
के काम गुणों
को भिक्षु सदा
के लिए त्याग
दें।
देवलोक
सहित समस्त
संसार के
शारीरिक तथा
मानसिक सभी
प्रकार के दुख
का मूल काम—भोगों
की वासना ही
है। जो साधक
इस संबंध में
वीतराग हो
जाता है, वह
शारीरिक तथा
मानसिक सभी प्रकार
के दुखों से
छूट जाता है।




