कुल पेज दृश्य

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-23)

ब्रह्मचर्य : कामवासना से मुक्‍तिप्रवचनतेईसवां

दिनांक 8 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

ब्रह्मचर्य—सूत्र : 2

      सद्दे रूवे य गंधे य, रसे फासे तहेव य।
पंचविहे कामगुणे, निच्चसो परिवज्जए।।
    कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं,
    सब्बस्स लोगस्स सदेवगस्स।
          जे काइयं माणसिय च किचि,
          तस्सऽन्तगं गच्छइ वीयरागो।।
 देवदाणव गंधब्बा जक्सरक्ससकिन्नरा।
बंभयारि नमंसन्ति टुकरं जे करेलि तं।।
एस धम्मे धुवे निच्चे, सासए जिणदेसिए।
   सिद्धासिज्झन्ति चाणेण, सिाइस्कृस्सन्तितहाऽवरे।।

 शब्द, रूप गंध, रस और स्पर्श इन पांच प्रकार के काम गुणों को भिक्षु सदा के लिए त्याग दें।
देवलोक सहित समस्त संसार के शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुख का मूल काम—भोगों की वासना ही है। जो साधक इस संबंध में वीतराग हो जाता है, वह शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुखों से छूट जाता है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--066

स्वयं का ज्ञान ही ज्ञान है—(प्रवचन—छियाष्‍ठवां)

अध्याय 33

आत्म-बोध

जो दूसरों को जानता है वह विद्वान है;
और जो स्वयं को जानता है वह ज्ञानी।
जो दूसरों को जीतता है वह पहलवान है;
और जो स्वयं को जीतता है वह शक्तिशाली।
जो संतुष्ट है वह धनवान है;
और जो दृढ़मति है वह संकल्पवान
जो अपने केंद्र से जुड़ा रहता है वह मृत्युंजय है।
और जो मर कर जीवित है वह
चिर-जीवन को उपलब्ध होता है।

ताओ है सागर की भांति। नदियां सागर से पैदा होती हैं और सागर में पुनः खो जाती हैं। ताओ से अर्थ है उस मूल उदगम का, जहां से जीवन पैदा होता है; और उस अंतिम विश्राम का भी, जहां जीवन विलीन हो जाता है। ताओ आदि भी है और अंत भी। प्रारंभ भी वही है और समाप्ति भी वही।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--065

ताओ उपनिषद—(भाग-4) ओशो

ओशो द्वारा लाओत्‍से के ताओ तेह किंग पर दिए गए 127 प्रवचनों में से 21 ( पैंसठ से पचासी ) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन

जीवन में जो भी श्रेष्‍ठ है, अगर वह विनष्‍ट होने के करीब हो, तो पूरी प्रकृति भी उसे बचाने में साथ देती है। लाओत्‍सु की पूरी परंपरा नष्‍ट होने के करीब है। इसलिए दूनियां में बहुत तरह की कौशिश की जायेगी कि वह परंपरा नष्‍ट न हो। उसके बीज कहीं और अंकुरित हो जाये। और स्‍थापित हो जाये। मैं जो बोल रहा हूं वह भी उस बड़े प्रयास का एक हिस्‍सा है।
और लाओत्‍सु को अगर कहींभी स्‍थापित करना हो तो भारत के अतिरिक्‍तओर कहीं स्‍थापित करना बहुत मुश्‍किल है।
इसलिए लाओत्‍सु पर बोलना मैंने चुना है कि शायद कोई बीज आपके मन में पड़ जाए। शायद अंकुरित हो जाए। क्‍योंकि भारत समझ सकता है। निसर्ग की, स्‍वभाव की धारणा को भारत समझ सकता है। क्‍योंकि हमारी भी पूरी चेष्‍टा वही रही है हजारों वर्षों से।

ओशो




स्वर्ग और पृथ्वी का आलिंगन—(प्रवचन—पैंसठवां)

एक अोंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--07


पंचा का गुरु एकु धिआनु—(प्रवचन—सातवां)

पउड़ी: 16

पंच परमाण पंच परधानपंचे पावहि दरगहि मानु।।
पंचे सोहहि दरि राजानुपंचा का गुरु एकु धिआनु।।
जे को कहे करै वीचारूकरतै कै करणे नाही सुमारू।।
धौलु धरमु दइधा का पूतु। संतोष थापि रखिया जिनि सूति।।
जे को बूभै होवै सचिआरूधवलै उपरि केता भारू।।
धरति होरू परै होरू होरूतिसते भारू तले कवणु जोरू।।
जीअ जाति रंगाके नाव। सभना लिखिया वुड़ी कलाम।।
एहु लेखा लिखि जाणै कोइ। लेखा लिखिआ कोता होइ।।
केता ताणु सुआलिहु रूपुकेती दाति जाणै कौणु कूतु।।
कीता पसाउ एको कवाउतिसते होए लख दरिआउ।।
कुदरति कवण कहा वीचारूवारिया न जावा एक वारू।।
जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।

एक अोंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--06


ऐसा नामु निरंजनु होइ—(प्रवचन—छठवां)


पउड़ी: 12

मंनै की गति कही न जाइ। जे को कहै पिछै पछुताइ।।
कागद कलम न लिखणहारूमंनै का बहि करनि विचारू।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

पउड़ी: 13

मंनै सुरति होवै मनि बुधिमंनै सगल भवन की सुधि।।
मंनै मुहि चोटा न खाइमंनै जम के साथ न जाइ।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।


पउड़ी: 14

मंनै मारग ठाक न पाइ। मंनै पति सिउ परगटु जाइ।।
मंनै मगुचलै पंथुमंनै धरम सेती सनबंधु।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

पउड़ी: 15

मंनै पावहि मोखु दुआरुमंनै परवारै साधारु।।
मंनै तरै तारे गुरु सिख। मंनै नानक भवहिभिख।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--74)

अवनी पर आकाश गा रहा(प्रवचनचौहदवां)

दिनांक 24 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

पहला प्रश्न :

पूर्वीय मनीषा सदगुरूओं को मनोवैज्ञानिक का संबोधन क्यों नहीं देती? क्या सदगुरु मनोवैज्ञानिक से किन्हीं अर्थों में बिलकुल भिन्न है? कृपा करके समझाइए।

नोवैज्ञानिक मनस्विद नहीं है। मन के संबंध में जानता है, मन को नहीं जानता। मन के संबंध में जानना एक बात है, मन को जानना बिलकुल दूसरी। मन के संबंध में जानना तो मन से ही हो जाता है। मन को जानना मन के पार गए बिना नहीं होता। साक्षी जानता है मन को। मन को जानने के लिए मन से भिन्न होना पड़ेगा, पार होना पड़ेगा। मन से ऊपर उठना पड़ेगा। मन से जो घिरे हैं वे मन को न जान पाएंगे।
जिन्होंने ऐसा जाना कि हम मन ही हैं वे तो मन को कैसे जान पाएंगे? जिसे भी हम जानते हैं उससे थोड़ी दूरी चाहिए फासला चाहिए, तभी तो परिप्रेक्ष्य पैदा होता है। मैं तुम्हें देख रहा हूं क्योंकि तुम दूर हो। तुम मुझे सुन रहे हो क्योंकि मैं दूर हूं।

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--064

मार्ग है बोधपूर्वक निसर्ग के अनुकूल जीना—(प्रवचन—चौंसठवां)

प्रश्न-सार

1--मृतकों को भोजनादि देने का क्या अर्थ है?

2--कैसे जानें कि प्रकृति के हम अनुकूल हैं?

3--प्रकृति के अनुकूल चलें तो समाज का क्या होगा?

4--निसर्ग के अनुकूल होने से पशु जैसे तो नहीं हो जाएंगे?

5--हठी कुपुत्र को सुधारने के लिए क्या करें?

बहुत से प्रश्न हैं।

एक मित्र ने पूछा है कि इजिप्त के पिरामिड के संबंध में आपने कहा कि उनकी सभ्यता, संस्कृति ऊंचाई के एक शिखर पर थी। लेकिन उन लोगों ने पिरामिडों के भीतर मनुष्यों के मृत शरीर रखे हैं, ममीज रखी हैं; और उनमें खाना-पीना, कपड़े, जवाहरात, इस तरह का सामान भी रखा है, ताकि उनको मरने के बाद के सफर में काम आए। तो यह समझाएं कि जो इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हुए सभ्य लोग थे, क्या उन्हें यह भी पता नहीं था कि मरने के बाद यह कुछ भी काम नहीं आता है?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--063

विजयोत्सव ऐसे मना जैसे कि वह अंत्येष्टि हो—(प्रवचन—तैरष्‍ठवां)

अध्याय 31 : खंड 2

अनिष्ट के शस्त्रास्त्र

विजय में भी कोई सौंदर्य नहीं है।
और जो इसमें सौंदर्य देखता है,
वह वही है, जो रक्तपात में रस लेता है।
और जिसे हत्या में रस है,
वह संसार पर शासन करने की
अपनी महत्वाकांक्षा में सफल नहीं होगा।
(शुभ लक्षण की चीजें वामपक्ष को चाहती हैं,
अशुभ लक्षण की चीजें दक्षिणपक्ष को।
उप-सेनापति वामपक्ष में खड़ा होता है,
और सेनापति दक्षिणपक्ष में।
अर्थात, अंत्येष्टि क्रिया की
भांति यह मनाया जाता है।)
हजारों की हत्या के लिए
शोकानुभूति जरूरी है,
और विजय का उत्सव अंत्येष्टि
क्रिया की भांति मनाया जाना चाहिए।

हिंसा में कौन उत्सुक है? हत्या में किसका रस है? और विध्वंस किसकी अभीप्सा बन जाती है? इसे हम थोड़ा समझ लें; फिर इस सूत्र पर विचार आसान होगा।
सिगमंड फ्रायड ने इस सदी में मनुष्य के मन में गहरा से गहरा प्रवेश किया है। इस सदी का पतंजलि कहें उसे। सिगमंड फ्रायड की गहनतम खोज मनुष्य की दो आकांक्षाओं के संबंध में है। उन दो को सिगमंड फ्रायड ने कहा है--एक को जीवेषणा और दूसरे को मृत्यु-एषणा। आदमी जीना भी चाहता है, इसकी भी वासना है, और आदमी के भीतर मरने की भी वासना है।

महावीर वाणी-(प्रवचन-22)

कामवासना है दूसरे की खोज(प्रवचनबाइसवां)

दिनांक 7 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

ब्रह्मचर्य—सूत्र : 1

      विरई अबंभचेरस्स, काम—भोगरसत्रुणा।
उग्‍गं महव्ययं बम, धारेयव्‍वं सुदुक्करं।।
मूलमेयमहम्मस्स महोदोससमुस्सयं।
तन्हा मेहुणसंसग्गं, निग्गंधा वज्जयन्ति णं।।
विआ ईत्थिसंसग्गो, पणीय रसभोयण।
नरस्सऽत्तगवेसिस्स, विसं तालउडं जहा।।

 जो मनुष्य काम और भोगों के रस को जानता है, उनका अनुभवी है, उसके लिए अब्रह्मचर्य त्यागकर, ब्रह्मचर्य के महाव्रत को धारण करना अत्यन्त दुष्कर है।
निर्ग्रन्थ मुनि अब्रह्मचर्य अर्थात मैथुन—संसर्ग का त्याग करते है, क्योंकि यह अधर्म का मूल ही नहीं, अपितु बड़े दोषों का भी स्थान
जो मनुष्य अपना चित्त शुद्ध करने, स्वरूप की खोज करने के लिए तत्‍पर है उसके लिए देह का शृंगार, स्त्रियों का संसर्ग और स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन दूध, मलाई, घी, मक्खन, विविध मिठाइयां आदि — का सेवन विष जैसा।

महावीर वाणी-(प्रवचन-21)

सत्‍य सदा सार्वभौम है(प्रवचनइक्‍कीसवां)

दिनांक 6 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पयुषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

सत्‍य--सूत्र :

  निच्चकालऽप्पमत्तेणं, मुसावायविवज्जण।
भासियब्ब हिय सच्चं, निच्चाऽऽउत्तेण रूर।।
तहेव सावज्जऽणुमोयणी गिरा,
ओहारिणी जा य परोवघायणी।
से कोह लोह भय हास माणवो,
न हासमाणो वि गिर वएज्‍जा।।

 सदा अप्रमादी व सावधान रहते हुए असत्य को त्याग कर हितकारी सत्य—वचन ही बोलना चाहिए। इस प्रकार का सत्य बोलना सदा बड़ा कठिन होता है।
श्रेष्ठ साधु पापमय, निश्रयात्मक और दूसरों को दुख देने वाली वाणी न बोलें। इसी प्रकार श्रेष्ठ मानव को क्रोध, लोभ, भय और हंसी—मजाक में भी पापवचन नहीं बोलना चाहिए।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-20)

धर्म का मार्ग : सत्‍य का सीधा साक्षात्(प्रवचनबीसवां)

दिनांक 5 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल,बम्‍बई।

धम्म—सुत्र : 3

 जहां सागडिओ जाण, समं हिच्चा महापहं।
विसम मग्गमोइण्णो, अक्से भग्गम्मि सोयई।।
एवं धम्मं विउकम्म, अहम्म पडिवजिया।
वाले मुस्तुमुहं पत्ते, अक्सेभग्गे व सोयई।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
अहम्मं कुणमाणस्स, अफला जन्ति राइओ।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
धम्म च कुणमाणस्स, सफला जन्ति राइओ।।
जरा जाव न पीडेई, वाही जाव न वड्ढई।
जाविन्दिया न हायति, ताव धम्म समायरे।।

 जिस प्रकार मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़ विषम (टेढ़े—मेढ़े, ऊबड़—खाबड़) मार्ग पर चल पड़ता है और गाड़ी की धुरी टूट जाने पर शोक करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य जान—बूझकर धर्म मार्ग को छोड़कर अधर्म मार्ग को पकड़ लेता है और अंत में मृत्यु मुख में पहुंचने पर जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।

महावीर वाणी-(प्रवचन-19)

धर्म : एक मात्र शरण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

     दिनांक 4 सितम्‍बर, 1972;
      द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
      पाटकर हाल, बम्‍बई।

धम्म—सूत्र : 2

      जरामरणवेगेण, वुज्झमाणाण पाणिणं।
धम्मों दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं।।

 जरा और मरण के तेज प्रवाह में बहते हुए जीव के लिए धर्म ही एकमात्र द्वीप, प्रतिष्ठा, गति और उत्तम शरण है।

रस्‍तु ने कहा है कि—यदि मृत्यु न हो, तो जगत में कोई धर्म भी न हो। ठीक ही है उसकी बात, क्योंकि अगर मृत्यु न हो, तो जगत में कोई जीवन भी नहीं हो सकता मृत्यु केवल मनुष्य के लिए है।
इसे थोड़ा समझ लें।
पशु भी मरते है, पौधे भी मरते है, लेकिन मृत्यु मानवीय घटना है। पौधे मरते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मृत्यु का कोई बोध नहीं है। पशु भी मरते हैं, लेकिन अपनी मृत्यु के संबंध में चिंतन करने में असमर्थ है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--062

युद्ध अनिवार्य हो तो शांत प्रतिरोध ही नीति है—(प्रवचन—बासठवां)

अध्याय 31 : खंड 1

अनिष्ट के शस्त्रास्त्र

सैनिक, सबसे बढ़ कर, अनिष्ट के औजार होते हैं,
और लोग उनसे घृणा करते हैं।
इसलिए, ताओ से युक्त धार्मिक पुरुष उनसे बचता है।
सज्जन असैनिक जीवन में वामपक्ष अर्थात
शुभ के लक्षण की ओर झुकता है;
लेकिन युद्ध के मौकों पर वह दक्षिणपक्ष अर्थात
अशुभ के लक्षण की ओर मुड़ जाता है।
सैनिक अनिष्ट के शस्त्र-अस्त्र होते हैं,
वे सज्जनों के लिए शस्त्र नहीं हो सकते।
जब सैनिकों का उपयोग अनिवार्य हो जाए,
तब शांत प्रतिरोध ही सर्वश्रेष्ठ नीति है।

स सूत्र को समझने के लिए कुछ प्रारंभिक बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात: वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी का सारा विकास अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा हुआ है; मनुष्य की सारी प्रगति हिंसा के कारण हुई है।