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सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

महावीर वाणी (भाग--1) प्रवचन--20

धर्म का मार्ग : सत्‍य का सीधा साक्षात्(प्रवचनबीसवां)


दिनांक 5 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल,बम्‍बई।

धम्म—सुत्र : 3

 जहां सागडिओ जाण, समं हिच्चा महापहं।
विसम मग्गमोइण्णो, अक्से भग्गम्मि सोयई।।
एवं धम्मं विउकम्म, अहम्म पडिवजिया।
वाले मुस्तुमुहं पत्ते, अक्सेभग्गे व सोयई।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
अहम्मं कुणमाणस्स, अफला जन्ति राइओ।।
जा जा वच्चइ रयणी, न सा पडिनियत्तई।
धम्म च कुणमाणस्स, सफला जन्ति राइओ।।
जरा जाव न पीडेई, वाही जाव न वड्ढई।
जाविन्दिया न हायति, ताव धम्म समायरे।।

 जिस प्रकार मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़ विषम (टेढ़े—मेढ़े, ऊबड़—खाबड़) मार्ग पर चल पड़ता है और गाड़ी की धुरी टूट जाने पर शोक करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य जान—बूझकर धर्म मार्ग को छोड़कर अधर्म मार्ग को पकड़ लेता है और अंत में मृत्यु मुख में पहुंचने पर जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।

जो रात और दिन एक बार अतीत की ओर चले जाते है, वे फिर कभी वापस नहीं लौटते हैं। जो मनुष्य अधर्म करता है, उसके वे रात—दिन बिलकुल निष्फल रहते है। लेकिन जो मनुष्य धर्म करता है, उसके वे रात—दिन सफल हो जाते है।
जब तक बुढ़ापा नहीं सताता, जब तक व्याधियां नहीं बढ़ती, जब तक इंद्रियां अशक्त नहीं होती, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए, बाद में कुछ नहीं होगा।


मृत्यु के संबंध में थोड़ी—सी बातें और।
पहली बात—मृत्यु अत्यंत निजी अनुभव है। दूसरे को हम मरता हुआ देखते हैं, लेकिन मृत्यु को नहीं देखते! दूसरे को मरता हुआ देखना, मृत्यु का परिचय नहीं है। मृत्यु आंतरिक घटना है। स्वयं मरे बिना देखने का कोई भी उपाय नहीं है। शायद इसलिए, जब भी हम मृत्यु के संबंध में सोचते है तो ऐसा लगता है, मृत्यु दूसरे की होगी। क्योंकि हमने दूसरों को ही मरते देखा है।
जब हम दूसरे को मरते देखते है तो हम क्या देखते हैं? हम इतना ही देखते हैं कि जीवन क्षीण होता चला जाता है। शरीर से जीवन की ज्योति विदा होती चली जाती है। लेकिन उस क्षण में जहां जीवन और शरीर पृथक होते है, हम मौजूद नहीं हो सकते। केवल वही व्यक्ति मौजूद होता है, जो मर रहा है। तो किसी को मरते हुए देखना, मृत्यु को देखना नहीं है। मृत्यु तो स्वयं ही देखी जा सकती है। आपके लिए कोई दूसरा नहीं मर सकता है, प्रॉक्सी से मरने का कोई उपाय नहीं है। अत्यंत निजी घटना है। उधार मृत्यु का अनुभव नहीं हो सकता।
और हमारा सब अनुभव उधार है। हमने सदा दूसरों को मरते हुए देखा है। शायद इसीलिए, मृत्यु का जो आघात हमारे ऊपर पड़ना चाहिए, वह नहीं पड़ता। उसकी गहराई हमारे खयाल में नहीं आती।
क्या जीवन में कोई और भी ऐसा अनुभव है, जो मृत्यु जैसा हो? एक अनुभव है, लेकिन एक बारगी खयाल भी न आये कि उसका और मृत्यु से कोई संबंध हो सकता है। वह अनुभव है प्रेम।
प्रेम और मृत्यु बड़े एक से अनुभव है। फिर तीसरा कोई भी अनुभव वैसा नहीं है। आपके लिए श्वास भी दूसरा आदमी ले सकता है। आपका हृदय भी, जरूरी नहीं कि आपका ही धड़के, दूसरे का भी आपके लिए धड़क सकता है। आपका हृदय पूरा अलग कर दिया जाये और दूसरे के हृदय से जोड़ दिया जाए, तो भी आप जीवित रह लेंगे। खून भी दूसरे का आपकी नाड़ियों में बह सकता है, श्वास भी यंत्र आपके लिए ले सकता है, लेकिन प्रेम आपके लिए कोई दूसरा नहीं कर सकता है।
प्रेम अत्यंत निजी अनुभव है। मृत्यु और प्रेम बड़े संयुक्त हैं। इसलिए जिन लोगों ने प्रेम के संबंध में गहराई से सोचा है, उन्हें मृत्यु के संबंध में भी सोचना पड़ा। और जिन्होंने मृत्यु की खोज—बीन की है, वे अंततः प्रेम के रहस्य में भी प्रवेश किये है।
कुछ बातें हमारे अनुभव में भी है, जिन्होंने बहुत नहीं सोचा होगा। जैसे, जो आदमी प्रेम से ड़रता है, वह मृत्यु से भी ड़रेगा। जो आदमी मृत्यु से ड़रता है, वह कभी प्रेम में नहीं पड़ेगा। जो व्यक्ति प्रेम की गहराई में उतर गया है, मृत्यु के प्रति बिलकुल अभय हो जाता है। इसलिए प्रेमी निश्‍चितता से मर सकते हैं। प्रेमी को मृत्यु में कोई भय नहीं रह जाता। लेकिन जिसने कभी प्रेम न किया हो, वह मृत्यु से बहुत ड़रेगा। तब एक दुष्ट चक्र निर्मित होता है, एक वीशियस सर्कल बन जाता है। मृत्यु से ड़रता है, इसलिए प्रेम में भी नहीं उतरता, क्योंकि प्रेम का अनुभव भी गहरे में मृत्यु का ही अनुभव है। जब तक कोई पूरी तरह मिटता नही, तब तक प्रेम का जन्म भी नहीं होता।
इसलिए प्रेम एक आध्यात्मिक अर्थों में मृत्यु है। प्रेम वही कर सकता है जो अपने को मिटा लेने को राज़ी हो। जब तक कोई इतना नहीं मिट जाता कि बचे ही नहीं, तब तक प्रेम का फूल नहीं खिलता। इसलिए जिसने प्रेम को जान लिया हो, उसने मृत्यु को भी जान लिया। या जिसने मृत्यु को जान लिया हो, उसने प्रेम को भी जान लिया।
प्रेम और मृत्यु बडी संयुक्त घटनाए है। गहरे आंतरिक तल पर वे एक ही चीज के दो रूप है। यह बहुत हैरानी की बात है। लेकिन, विचारणीय है। मृत्यु तो हम जब मरेंगे, तब होगी। दूसरे को मरते देख कर हम मृत्यु का कोई अनुभव नहीं कर सकते। खुद मरेंगे, तभी अनुभव होगा। लेकिन एक उपाय है प्रेम, जिससे हम मृत्यु का अनुभव आज भी कर सकते हैं।
फिर प्रेम का ही और विराट रूप है, प्रार्थना। फिर प्रेम का ही सार अंश है, ध्यान। वे सब मृत्यु के रूप हैं। हिंदू शास्‍त्रों में तो कहा है कि गुरु मृत्यु है। इसी अर्थ में कहा है कि गुरु के पास तभी कोई पहुंच सकता है, जब वह इस स्थिति में अपने को छोड़ दे, जैसेकि खुद मिट गया। और अगर गुरु के पास मृत्यु घटित न हो, तो गुरु से कोई संबंध नहीं जुड़ता।
श्रद्धा भी मृत्यु है। वह प्रेम का ही एक रूप है। यह मृत्यु तो जीवन के अंत में आएगी, जिसे हम दूसरे में घटते देखते है। लेकिन प्रेम आज भी घट सकता है। प्रार्थना आज भी हो सकती है। ध्यान में आज भी प्रवेश हो सकता है। जो लोग ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं, मृत्यु का भय मिट जाता है। सिर्फ ध्यानी मृत्यु के बाहर हो जाता है, जैसे प्रेमी बाहर हो जाता है। क्यों? इसलिए नहीं कि ध्यान के द्वारा मृत्यु पर विजय हो जाती है, इसलिए भी नहीं कि प्रेम के द्वारा मृत्यु पर विजय हो जाती है। बल्कि इसलिए कि जो प्रेम में मरकर देख लेता है वह जान जाता है कि जो मरता है, वह मैं नहीं हूं। ध्यान में जो मर कर देख लेता है, वह जान जाता है कि जो मरता है, वह मेरी परिधि है, मेरी देह है, मेरा आवरण है, मैं नहीं हूं।
मृत्यु से गुजर कर जाना जाता है कि मेरे भीतर कोई अमृत भी है। इस अमृत के बोध से मृत्यु नहीं मिटती। मृत्यु तो घटेगी ही, महावीर को भी घटेगी और कृष्ण को भी घटेगी और बुद्ध को भी घटेगी। मृत्यु तो घटेगी ही, लेकिन तब यह मृत्यु केवल दूसरो के लिए होगी। दूसरे देखेंगे कि महावीर मर गये, और महावीर जानते रहेंगे कि वे नहीं मर रहे हैं। भीतर कोई मृत्यु घटित नहीं होगी, तब मृत्यु बाहरी घटना हो जायेगी, खुद के लिए भी। ऐसा अनुभव न हो पाये तो जीवन व्यर्थ गया।
इसे हम समझ लें तो फिर यह सूत्र समझ में आये।
एक बीज हम बोते है। वृक्ष बढ़ता है, बड़ा होता है। कब आप कहते है कि वृक्ष सफल हुआ? बीज बोया सफल हुआ? जब फल लगते हैं, जब फल पकते हैं, जब फूल खिलते हैं वृक्ष जो दे सकता था, जब पूरा दे देता है, तब हम कहते हैं, सफल हुआ श्रम। जिस वृक्ष पर फल न लगें, बांझ रह जाये, उस वृक्ष को हम सफल न कहेंगे। हम कहेंगे, कहीं अवरोध आ गया, कहीं रास्ता भटक गया, कहीं वृक्ष ऐसे रास्ते पर चला गया, जहां जीवन की निष्पत्ति नहीं होती। जहां जीवन में निर्णय नहीं आता। इस वृक्ष का होना व्यर्थ हो गया।
मनुष्य भी एक वृक्ष है और मनुष्य भी एक बीज है। सभी मनुष्य फल तक नहीं पहुचते। पहुँचना चाहिए। पहुंच सकते है। सभी के लिए संभव है, लेकिन हो नहीं पाता। कुछ लोग भटक जाते हैं। कुछ लोग ऐसे मार्ग पर चले जाते है, जहां उनके जीवन में कोई फल नहीं लगते, और जहां उनके जीवन में कोई फूल नहीं खिलते। और जहां उनका जीवन निष्फल हो जाता है।
जीवन को हम देखें, तो जीवन की अंतिम घटना है मृत्यु। अगर इसे हम ऐसा समझें तो जीवन का जो आखिरी चरण है, शिखर है, वह मृत्यु है। जन्म तो शुरुआत है, मृत्यु अंत है। मृत्यु में ही पता चलेगा कि व्यक्ति का जीवन सफल हुआ या असफल हुआ। अंतिम घड़ी में ही जांच—पड़ताल हो जायेगी। निर्णय हो जाएगा।
अगर आप हंसते हुए मर सकते हैं तो जीवन सफल हुआ, फूल खिल गये। अगर आप रोते हुए ही मरते है तो जीवन व्यर्थ गया, फूल खिल नहीं पाये। क्योंकि जब सब खिल जाता है तो मृत्यु एक आनंद है। जब कुछ भी नहीं खिल पाता तो मृत्यु एक पीड़ा है, क्योंकि मै बिना कुछ हुए मर रहा हूं। समय व्यर्थ गया, अवसर चूक गया। मैं कुछ हो नहीं पाया, जो हो सकता था। जो मेरे भीतर छिपा था वह बाहर न आया। जो गीत मैं गा सकता था, वह अनगाया रह गया। तब पीड़ा है।
हम में से अधिक लोग रोते हुए ही मरते हैं। रोता हुआ मरण इस बात की खबर है कि जीवन असफल गया। मृत्यु जब हंसती हुई होती है, जब मृत्यु फूल की तरह खिलती है, जब मृत्यु एक आनंद होती है, तो उसका अर्थ है कि इस जीवन की गहनताओं में छिपा हुआ जो अमृत था, उसका इस व्यक्ति को पता चल गया। अब मृत्यु सिर्फ विश्राम है। अब मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि अब मृत्यु पूर्णता है, बल्कि अब मृत्यु एक लंबी निष्फल जीवन की समाप्ति नहीं है, बल्कि एक फुलफिलमेंट है, एक पूर्णता है। एक जीवन पूरा हुआ। जैसे कोई नदी मरुस्थल में खो जाये और सागर तक न पहुंच पाये, वैसा अधिक लोगों का जीवन है, कहीं खो जाता है, पूर्ण नहीं हो पाता। जैसे कोई नदी सागर में पहुंच जाये, गीत गाती, नाचती सागर से मिल जाये।
मरुस्थल में भी नदी खो जाती है, सागर में भी नदी खोती है। लेकिन मरुस्थल में नदी असफल हो जाती है, सागर में नदी सफल हो जाती है। इसलिए मरुस्थल में खोती नदी रोती हुई खोयेगी सागर में गिरती हुई नदी नाचती हुई, अहोभाव से भरी हुई। खोना तो दोनों में है।
मृत्यु में हम भी खोते हैं, लेकिन रोते हुए। जैसे मरुस्थल में सब अवसर व्यर्थ हो गया। महावीर भी खोते है, लेकिन हंसते हुए। वह जो अवसर मिला था, उससे जो भी हो सकता था, वह पूरा हो गया है।
इस बात को समझकर सूत्र को समझें।
'जिस प्रकार मूर्ख गाडीवान जान—बूझकर साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़, विषम टेढ़े—मेढ़े, ऊबड़—खाबड़ मार्ग पर चल पड़ता है और गाड़ी की धुरी टूट जाने पर शोक करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी जान—बूझकर धर्म को छोड़, अधर्म को पकड़ लेता है और अंत में मृत्यु के मुख में पहुंचने पर, जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।
इसमें बहुत—सी बातें हैं। एक, महावीर ने बडी अदभुत बात कही है और वह यह कि 'मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर', यह बड़ी उल्टी बात है। अगर गाडीवान मूर्ख है, तो जान—बूझकर क्या अर्थ रखता है, और अगर गाड़ीवान जान—बूझकर ही गलत रास्ते पर चलता है, तो मूर्ख कहने का क्या प्रयोजन, लेकिन महावीर का प्रयोजन है। जब महावीर कहते हैं कि मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर।
मूर्खता अज्ञान का नाम नहीं है। मूर्खता, उन ज्ञानियों के लिए कही जाती है जो जान—बूझकर... बच्चे को हम मूर्ख नहीं कहते, अबोध कहते है। बच्चे को हम, अगर भूल करे, तो मूर्ख नहीं कहते, बच्चा ही कहते है, निर्दोष कहते है, अभी उसे पता ही नहीं है। मूर्ख तो आदमी तब होता है, जब उसे पता होता है और फिर भी जान—बूझकर गलत रास्ते पर चला जाता है।
जानवरों को हम मूर्ख नहीं कह सकते, अज्ञानी तो वे हैं; बच्चों को हम मूर्ख नहीं कह सकते, अज्ञानी वे है। मूर्ख तो हम उनको ही कह सकते हैं जो ज्ञानी भी हैं, तब जान—बूझकर भूल शुरू होती है और जान—बूझकर भूल ही मूर्खता है। लेकिन क्यों कोई जान—बूझकर भूल करता होगा?
क्योंकि सुकरात ने कहा है, कोई जान—बूझकर भूल नहीं कर सकता। यूनान में इस पर लंबा विवाद रहा है और इस विवाद में सारे जगत की संस्कृतियों के अलग—अलग अनुवाद है कि कोई आदमी जब भूल करता है तो जान—बूझकर करता है, या कि अनजान करता है। सुकरात ने कहा है, कोई आदमी जान—बूझकर भूल कर ही नहीं सकता। उसकी बात में भी सच्चाई है। कभी आप जान—बूझकर आग में हाथ डाल सकते हैं? असंभव है। जान—बूझकर कोई कैसे भूल करेगा, क्योंकि भूल दुख देती है, पीड़ा देती है। भूल तो अनजाने ही हो सकती है।
लेकिन महावीर कहते हैं कि जान—बूझकर भी भूल हो सकती है। जान—बूझकर भूल तब हो सकती है जब आप जानते हैं कि आग में हाथ डालने से हाथ जलेगा ही। लेकिन फिर भी ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा सकती हैं कि आप अहंकार वश आग में हाथ डाल दें। अगर यह प्रतियोगिता हो रही हो कि कौन कितनी देर तक आग में हाथ रख सकता है, तो आप जान—बूझकर भी आग में हाथ डाल सकते हैं।
अहंकार के कारण आदमी जान—बूझकर भूलकर सकता है। सिर्फ एक ही कारण है जान—बूझकर भूल करने का, अहंकार के कारण। अगर आपके अहंकार को रस मिलता हो तो आप जान—बूझकर भूलकर सकते हैं। कोई गाड़ीवान क्यों साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़कर, ऊबड़—खाबड़ मार्ग पर चलेगा!
ऊबड़—खाबड़ मार्ग पर अहंकार को तृप्ति मिलती है। राजमार्ग पर तो सभी चलते हैं, वहां कोई अहंकार को रस नहीं है। जब कोई उल्टे—सीधे मार्ग पर चलता है तो अहंकार को रस मिलता है।
एवरेस्ट पर चढ़ने में कौन सा रस मिलता होगा? एवरेस्ट की चोटी पर खड़े होकर क्या उपलब्धि होती है? जब तेनसिह और हिलेरी पहली दफे एवरेस्ट पर खड़े हो गए होंगे, तो उन्होंने क्या पाया होगा? एक बड़ी सूक्ष्म अहंकार की तृप्ति—जहां कोई भी नहीं पहुंच पाया वहां पहुंचने वाले वे पहले मनुष्य हैं। और तो कुछ भी एवरेस्ट पर मिलने को नहीं है। यात्रा के अंत पर मिलता क्या है? यात्रा के अंत पर मिलता है, अहंकार की तृप्ति।
तो जो आदमी ऊबड़—खाबड़ मार्ग चुनता है जीवन में, वह जानकर चुनता है। सीधे रास्ते पर तो सभी चलते है। राजमार्ग पर चलना भी कोई चलना है? जब आदमी ऐसे बीहड़ रास्ते पर चलता है, जहां चलना दुर्गम है, जहां एक—एक कदम उठाना मुश्किल है, जहां हर घड़ी कष्ट, हर घड़ी खतरा है; तो अहंकार को बड़ा रस आता है।
नीत्शे ने कहा है, 'लिव डेंजरसली, खतरनाक ढंग से जियो।क्योंकि नीत्शे कहता है, जीवन में एक ही तृप्ति है, और वह तृप्ति है पावर, शक्ति। लेकिन शक्ति का अनुभव तभी होता है, जब हम विपरीत से जूझते हैं। सरल के साथ शक्ति का अनुभव नहीं होता। जहां कोई भी चल सकता है, वहां शक्ति का कैसा अनुभव? जहां बच्चे भी निरापद चल लेते हैं, जहां अंधे भी चल लेते हैं, वहां शक्ति का क्या अनुभव? शक्ति का अनुभव तो वहां है, जहां कदम—कदम पर कठिनाई है, जहां पहुंचना असंभव है। इसलिए अहंकारी ऐसे रास्ते चुनता है, जो पहुंचाने के लिए नहीं होते हैं, सिर्फ अहंकार के संघर्ष के लिए होते हैं।
मूर्ख गाड़ीवान जान—बूझकर ऊबड़—खाबड़ विषम रास्ते चुन लेता है, क्योंकि वहां उसके अहंकार की प्रतिष्ठा हो सकती है। तो मूर्खता का गहनतम सूत्र है अहंकार। मूर्खता का संबंध ज्ञान से नहीं है, अज्ञान से नहीं है। मूर्खता का संबंध अहंकार से, इगो से है। जितना अहंकारी व्यक्ति होगा, उतना मूर्ख होगा।
मजा यह है कि आप अपने ज्ञान का उपयोग भी अपनी मूर्खता के लिए कर सकते हैं, क्योंकि आप अपने ज्ञान से भी अपने अहंकार को भर सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने ज्ञान से भी अपने अहंकार को ही भर रहा हो, तो यह प्रयास मूर्खतापूर्ण है।
अज्ञान से तो लोग भूलें करते हैं, लेकिन ज्ञान से भी लोग भूल करते हैं। और बडी से बड़ी भूल जो ज्ञान से हो सकती है, वह यह कि हम अपने इस अहंकार को खड़ा करने के लिए गलत मार्ग चुन लें, जान—बूझकर। आपको भी खयाल होगा जिंदगी में, कई बार विषम मार्ग चुनने में बड़ा सुख मिलता है। कठिन है जो, लंबा है जो रास्ता, विघ्न जहां बहुत हैं, आपदाएं जहां हैं, विपत्तियां जहां हैं; उसे चुनने में बड़ा रस आता है।
रस क्या है? जीतने का रस। जब रास्ते में कोई विपत्ति होती है, तब हम जीतते हैं। जब रास्ते में कोई विपत्ति नहीं होती, तो क्या खाक जीतना! इसलिए जो लोग इस भांति चलते हैं, उनके जीवन में हजार जटिलताएं खड़ी हो जाती हैं। उनका सारा जीवन, एक ही गणित को मानकर चलता है; जहां विपत्ति हो, जहां बाधा हो, जहां अड़चन हो, जो असंभव मालूम पड़े, उसे करने में उन्हें रस आता है। और इस जगत में अधर्म से असंभव कुछ भी नहीं। अधर्म इस जगत में सबसे असंभव है। एवरेस्ट चढ़ा जा सकता है, चांद पर उतरा जा सकता है, मंगल पर भी आदमी उतर ही जायेगा, लेकिन यह कुछ भी असंभव नहीं है। अधर्म सबसे असंभव है। अधर्म का मतलब क्या? कल मैंने आपको कहा, धर्म का अर्थ है स्वभाव; अधर्म का अर्थ है स्वभाव के विपरीत। निशित ही स्वभाव के विपरीत जाना सबसे असंभव बात है। आदमी स्वभाव के विपरीत जा ही कैसे सकता है? स्वभाव का अर्थ ही है कि जिसके विपरीत आप न जा सकें। जैसे आग ठंडी होना चाहे, तो यह स्वभाव के विपरीत हुआ। जैसे पानी ऊपर चढ़ना चाहे, तो यह स्वभाव के विपरीत हुआ। ऐसे ही अधर्म का अर्थ है, जो स्वभाव के विपरीत है, वही टेढ़ा—मेढ़ा है।
धर्म तो बहुत सरल और सीधा है; लेकिन मजा है कि धर्म में भी हम तभी उत्सुक होते हैं, जब वह टेढ़ा—मेढ़ा हो। सीधे धर्म में हम जरा भी उत्सुक नहीं होते। कोई बताये कि इतने उपवास करो, ऐसे खड़े रहो रातभर, नंगे रहो, कि कोड़े मारो शरीर को, कि सुखाओ, हड्डी—हड्डी हो जाओ; तब जरा रस आता है कि हां, यह कोई बात हुई।
जब धर्म भी टेढा—मेढा हो तो मूर्ख गाड़ीवान उत्सुक होता है। इसलिए ध्यान रखना, धर्म की तरफ जो उत्सुकता दिखाई पड़ती है, उसमें नब्बे—नब्बे भी कम—निन्यानबे प्रतिशत मूर्ख गाड़ीवान होते हैं। जिनका कुल कारण यह होता है कि कोई असंभव करने जैसा दिखाई पड़ रहा है। तब उनको बड़ा रस आता है। अगर उनको कहो कि आराम से बैठकर भी, छाया में भी, धर्म उपलब्ध हो सकता है, धर्म का सारा रस ही खो जायेगा। आसान हुआ, रस खो गया। बुद्धिमान आदमी को आसान हो तो रस बको। लेकिन अहंकारी आदमी को, आसान हो तो रस खो जायेगा।
इसे थोड़ा ठीक से समझ लें।
तपश्रर्या का अधिकतम रस टेढे—मेढेपन के कारण है। जब आप अपने को सता रहे होते हैं, तब आपको लगता है, हां, कुछ कर रहे हैं। तब आपको लगता है, कुछ कर रहे हैं! भूखे हैं, पानी नहीं पी रहे हैं; तब आपको लगता है, आप कुछ कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि बड़ा दुर्गम है, बड़ा अस्वाभाविक है। भूख स्वाभाविक है, भूखा रह जाना अस्वाभाविक है। भूख सहज है, भूख के विपरीत लड़ना असहज है। लेकिन जितना असहज हो, धारा के विपरीत हो, उतना हमें लगता है कि हां, कुछ अहंकार को रस आ रहा है। इसलिए तपस्वियों से ज्यादा प्रखर अहंकार और कहीं खोजना मुश्किल है। झोंपडे में रह रहा है, तो अहंकार बक्की। झाड़ के नीचे है तो और बढ़ जायेगा। धूप में खड़ा रहे, तो और बढ़ जायेगा। अगर विश्राम करता ही नहीं, खड़ा ही रहता है तपस्वी, तो और बढ़ जायेगा।
यह सारी की सारी चेष्टा सिकंदर और नेपोलियन की चेष्टा से भिन्न नहीं है। लेकिन हमें दिखती है भिन्न, क्योंकि हमारी समझ नहीं है। इस चेष्टा का एक ही अर्थ है कि जो असंभव है, वह हम करके दिखा दें। अगर आदमी सहज जी रहा हो, तो हमें खयाल में भी नहीं आ सकता है कि वह धार्मिक हो सकता है।
सहज आदमी हमारे खयाल में नहीं आता कि धार्मिक भी हो सकता है। लेकिन कबीर ने कहा है, 'साधो, सहज समाधि भली'। कारण है कहने का। सहज का अर्थ यह जो महावीर कह रहे है, वह समझदार आदमी, जो सीधे—सादे, साफ—सुथरे राजमार्ग को चुनता है; इसलिए कि कहीं पहुंचना है, इसलिए नहीं कि कुछ जीतना है।
ये दोनों अलग दिशाएं है। कहीं पहुंचना है, तो व्यर्थ श्रम लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है तब बीच में बाधाएं खड़ी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन अगर कहीं पहुंचना नहीं है, सिर्फ अहंकार अर्जित करना है यात्रा में, तो फिर बाधाएं होनी चाहिए। तो आदमी अपने हाथ से भी बाधाएं निर्मित करता है। पैदल जाता है, तीर्थयात्रा को। मुझसे तीर्थयात्री कहते हैं कि जो मजा पैदल जाकर तीर्थयात्रा करने का है, वह ट्रेन में बैठकर जाने में नहीं है।
स्वभावत: कैसे हो सकता है? लेकिन जो और आगे बढ़ गये है गाड़ी को टेढ़े—मेढ़े उतारने में, वह जमीन पर साष्टांग दंड़वत करते हुए तीर्थयात्रा करते हैं। उनका वश चले अगर, तो वे शीर्षासन करते हुए भी यह तीर्थयात्रा करें। लेकिन तब जो मजा आयेगा, निश्‍चित ही वह पैदल करनेवालों को नहीं आ सकता। क्यों? वह मजा क्या है? वह तीर्थ पहुंचने का मजा नहीं है। वह अहंकार निर्मित करने का मजा है। जो कोई नहीं कर सकता, वह मैं कर रहा हूं।
धर्म हो, कि धन हो, कि यश हो, जो भी हो; हम मार्ग इरछे—तिरछे चुनते है जानकर, महावीर कहते है, वह अधर्म है। असल में अधर्म तिरछा ही होगा, सीधा नहीं होता। कभी आपने खयाल किया है? एक झूठ बोलें, तो बड़ी तिरछी यात्राएं करनी पड़ती हैं। सच बोलें, सीधा। सच बिलकुल वैसा है, जैसे इक्‍युलिड़ की रेखा—दो बिंदुओं के बीच सबसे कम दूरी। इक्‍युलिड़ की व्याख्या है रेखा की—दो बिंदुओं के बीच सबसे कम दूरी। तो रेखा सीधी होती है। दो बिंदुओं के बीच जितना लंबा चक्कर लगाते जायें, उतनी रेखा बड़ी तिरछी होती चली जाती है।
सत्य भी दो बिंदुओं के बीच सबसे कम दूरी है। असत्य, सबसे बड़ी लंबी यात्रा है। इसलिए एक असत्य, फिर दूसरा, फिर तीसरा। एक को संभालने के लिए एक लंबी श्रृंखला है। बडा मजा है कि सत्य को संभालने के लिए कोई श्रृंखला नहीं होती। एक सत्य अपने में काफी होता है। सत्य एटामिक है। एक अणु काफी है।
झूठ शृंखला है, सीरीज है। एक झूठ काफी नहीं है। एक झूठ को दूसरे झूठ का सहारा चाहिए। दूसरे झूठ को और झूठों का सहारा चाहिए, और झूठ हमेशा अधर में अटका रहता है, कितना ही सहारा देते जाओ, उसके पैर जमीन से नहीं लगते। क्योंकि हर झूठ जो सहारा देता है वह खुद भी अधर में होता है। आप सिर्फ पोस्टपोन करते हैं, पक्के जाने को, बस। जब मैं एक झूठ बोलता हूं तब तत्काल मुझे दूसरा झूठ बोलना पड़ता है कि पक्का न जाऊं। दूसरा बोलता हूं तीसरा बोलना पड़ता है कि पकड़ा न जाऊं। फिर यह भय कि पक्का न जाऊं, तो मै स्थगित करता जाता हूं। हर झूठ थोड़ी राहत देता है, फिर नए झूठ को जन्म देता है।
सत्य सीधा है।
यह बड़ी हैरानी की बात है कि सत्य को याद रखने की भी जरूरत नहीं है, सिर्फ झूठ को याद रखना पड़ता है। इसलिए जिनकी स्मृति कमजोर है, वे झूठ नहीं बोल सकते। झूठ बोलने के लिए स्मृति की कुशलता चाहिए। क्योंकि लंबी याददाश्त चाहिए। एक झूठ बोला है, उसकी पूरी शृंखला बनानी पड़ेगी। यह वर्षों तक चल सकती है। इसलिए झूठ बोलनेवालों का मन बोझिल होता चला जाता है। सच बोलनेवाले का मन खाली होता है, कुछ रखना नहीं पड़ता। कुछ संभालना नहीं पड़ता।
धर्म भी एक सीधी यात्रा है, सरल यात्रा है। लेकिन धर्म में हमें रस नहीं, रस हमें टेढे—मेढेपन में है; क्योंकि रस हमें अहंकार में है।
अभी स्पास्की और बॉबी फिशर में शतरंज की होड़ थी। अगर स्पास्की पहले दिन ही कह दे कि लो तुम जीत गये। इतनी सरल हो अगर जीत, तो जीत में कोई रस न रह जायेगा। जीत जितनी कठिन है, जितनी असंभव है, जितनी मुश्‍किल है, उतनी ही रसपूर्ण हो जाती है। और मजा यह है, आदमी इसके लिए कैसे—कैसे उपाय करता है! शतरंज बड़ा मजेदार उपाय है। आदमी एक नकली युद्ध करता है—नकली! कुछ भी नहीं है वहां, न हाथी हैं, न घोड़े हैं, न कुछ है—नकली है सब, लेकिन रस असली है। रस वही है जो असली हाथी घोडे से मिलता है। बिलकुल वह महंगा धंधा था। पुराने लोग उस धंधे को काफी कर चुके।
खेल, युद्ध का संक्षिप्त अहिंसात्मक संस्करण है। उसमें भी हम लड़ते हैं नकली साधनों से, लेकिन थोड़ी ही देर में नकली साधन भूल जाते हैं और असली हो जाते हैं। कोई घोड़ा क्या घोड़ा होगा मैदान पर, जो शतरंज के बोर्ड पर हो जाता है। क्यों? आखिर इस नकली लकड़ी के घोड़े में इतना रस? यह असली कैसे हो जाता है? जिस घोड़े पर भी अहंकार की सवारी हो जाये, वह असली हो जाता है। अहंकार चलता है, घोड़े थोड़े ही चलते हैं! फिर जितनी कठिनाई हो, जितनी असंभावना हो और जितना सस्पेंस हो, और जितना संदेह हो जीत में, उतनी ही बात बढ़ती चली जाती है।
आदमी ने बहुत उपाय किये है, जिनसे वह जो सीधा संभव है, उसको भी बहुत लंबी यात्रा करके संभव करता है। इसे महावीर कहते हैं, जान—बूझकर, साफ—सुथरे राजमार्ग को छोड़कर। जैसा मूर्ख गाड़ीवान पछताता है।
कब पछताता है मूर्ख गाड़ीवान? जब धुरी टूट जाती है। जब गाडी उल्टे—सीधे रास्ते पर, पत्थरों पर, ककड़ी पर, मरुस्थल में उलझ जाती है कहीं, और गाड़ी की धुरी टूट जाती है। जब एक चाक बहुत ऊपर और एक चाक बहुत नीचे हो जाता है, तब धुरी टूटती है।
धुरी टूटने का मतलब है कि दोनों चाक जहां समान नहीं होते, असंतुइलत हो जाते हैं। वहां धुरी टूट जाती है। वहां दोनों को संभालने वाली धुरी टूट जाती है। तब पछताता है, तब दुखी होता है, लेकिन तब कुछ भी नहीं किया जा सकता। तब कुछ भी करना मुश्‍किल हो जाता है।
जीवन में भी हम धुरी को तोड़कर ही पछताते हैं। जो पहले समझ लेता है, वह कुछ कर सकता है। जो तोड़कर ही पछताने का आदी है, तो जीवन ऐसी घटना नहीं है कि तोड़कर पछताने का कोई उपाय हो। जो मृत्यु के बाद ही पछताएगा, उसके लिए फिर पीछे लौटने का उपाय नहीं है। हम भी पछताते है जब धुरी टूट जाती है। धुरी हमारी भी तब टूटती है जब असंतुलन बड़ा हो जाता है, एक चाक ऊपर और एक चाक बहुत नीचे हो जाता है।
यह होगा ही तिरछे रास्तों पर।
'अधर्म को पकड़ लेता है, और अंत में मृत्यु के मुख में पहुंचने पर जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।
अधर्म को हम पकड़ते ही इसलिए हैं, अहंकार की वहां तृप्ति है। और धर्म को हम इसीलिए नहीं पकड़ते है कि वहां अहंकार से छुटकारा है। धर्म की पहली शर्त है, अहंकार छोड़ो। वही अड़चन है। अधर्म का निमंत्रण है, आओ, अहंकार की तृप्ति होगी। वही चुनौती है, वही रस है। अधर्म के द्वार पर लिखा है, बढ़ाओ अहंकार को, बड़ा करो। धर्म के द्वार पर लिखा है, छोड़ दो बाहर, अहंकार को। भीतर आ जाओ।
तो जिनको भी इस बात में रस है कि मैं कुछ हूं उन्हें धर्म की तरफ जाने में बड़ी कठिनाई होगी। जो इस बात को समझने की तैयारी में हैं कि मैं ना कुछ हूं उनके लिए धर्म का द्वार सदा ही खुला हुआ है। जिनको जरा भी है कि मैं कुछ हूं वे अधर्म में खींच लिए जायेंगे —चाहे वे मंदिर जायें, मस्जिद जायें, गुरुद्वारा जायें, कहीं भी जायें —जिनको यह रस है कि मैं कुछ हूं जो मंदिर में प्रार्थना करते वक्त भी यह देख रहे हैं कि कितने लोगों ने मुझे प्रार्थना करते देखा, जो यह देख रहे हैं कि कितने लोग मुझे तपस्वी मानते हैं, उपासक मानते है, कितने लोग मुझे साधु मानते है; जो अभी भी उसमें रस ले रहे हैं वे कहीं से भी यात्रा करें, उनकी यात्रा ऊबड़—खाबड़ मार्ग पर, अधर्म के रास्ते पर हो जायेगी।
इसका मतलब यह हुआ कि जो आदमी स्वयं में कम उत्सुक है और स्वयं को दिखाने में ज्यादा उत्सुक है, वह अधर्म के रास्ते पर चला जाता है। जिस आदमी को इसमें कम रस है कि मैं क्या हूं और इसमें ज्यादा रस है कि लोग मेरे संबंध में क्या सोचते हैं, वह अधर्म के रास्ते पर चला जाता है। जो लोगों की आंखों में एक प्रतिबिंब बनाना चाहता है, एक इमेज, वह अधर्म के रास्ते पर चला जाता है।
धर्म के रास्ते पर तो केवल वे ही जा सकते हैं, जो स्वयं में उत्सुक हैं। स्वयं की वास्तविकता में, स्वयं के आवरण, आभूषण, स्वयं की साज—सज्जा, स्वयं के शृंगार, दूसरों की आंखों में बनी स्वयं की प्रतिमा में जिनकी उत्सुकता नहीं है, केवल वे ही धर्म के रास्ते पर जा सकते हैं। क्योंकि दूसरे तो तभी आदर देते हैं, जब आप कुछ असंभव करके दिखाएं। दूसरे तो तभी आपको मानते हैं, जब आप कोई चमत्कार करके दिखायें। दूसरे तो आपको तभी मानते हैं, जब आप कुछ ऐसा करें, जो वे नहीं कर सकते हैं। तब।
जब आप किसी को आदर देते हैं तो आपने कभी खयाल किया है, आपके आदर देने का कारण क्या होता है? सदा कारण यही होता है कि जो आप नहीं कर सकते, वह यह आदमी कर रहा है। अगर आप भी कर सकते हैं, तो आप आदर न दे सकेंगे।
आप जाते है, कोई सत्य साईं बाबा एक ताबीज हाथ से निकाल कर दे देते है, तो आप आदर करते हैं। एक मदारी आदर न कर सकेगा। ताबीज तो कुछ भी नहीं, वह कबूतर निकाल देता है हाथ से। वह जानता है कि इसमें आदर जैसा कुछ भी नहीं है, यह साधारण मदारीगीरी है। वह आदर न दे सकेगा। आप आदर दे सकेंगे, क्योंकि आप नहीं कर सकते। जो आप नहीं कर सकते, वह चमत्कार है। फिर यह ताबीजों से ही संबंधित होता तो बहुत हर्जा न था, क्योंकि ताबीजों में बच्चों के सिवाय कोई उत्सुक नहीं होता, न कबूतरों में कोई बच्चों के सिवाय उत्सुक होता है; लेकिन यह और तरह से भी संबंधित है।
आप एक दिन भूखे नहीं रह सकते, और एक आदमी तीस दिन का उपवास कर लेता है, तब आपका सिर उसके चरणों में लग जाता है। यह भी वही है, इसमें भी कुछ मामला नहीं है। आप ब्रह्मचर्य नहीं साध सकते और एक आदमी बाल ब्रह्मचारी रह जाता है, आपका सिर उसके चरणों में लग जाता है। यह भी वही है, कोई फर्क नहीं है। कोई भी फर्क नहीं है।
कारण सदा एक ही है भीतर हर चीज के, कि जो आप नहीं कर सकते। तब इसका यह मतलब हुआ कि अगर आपको भी अहंकार की तृप्ति करनी हो तो आपको कुछ ऐसा करना पड़े, जो लोग नहीं कर सकते। या कम से कम दिखाना पड़े कि आप कर सकते हैं, जो लोग नहीं कर सकते।
तो जो व्यक्ति अहंकार में उत्सुक है, वह सदा ही तिरछे रास्तों में उत्सुक होगा। ताबीज पेटी से निकाल कर आपके हाथ में दे देना बिलकुल सीधा काम है, लेकिन पहले ताबीज को छिपाना, और फिर इस तरकीब से निकालना कि दिखाई न पड़े, कहां से निकल रहा है, तिरछा काम है। तिरछा है तो आकर्षक है, आपको भी पता चल जाए कि ताबीज कैसे पेटी से कपड़े की बांह के भीतर गया, फिर बांह से कैसे हाथ तक आया, एक दफा आपको पता चल जाये, चमत्कार तिरोहित हो जाये। फिर दुबारा आपको इसमें कोई श्रद्धा न मालूम होगी।
आपको भी पता चल जाये कि भूखा रहने की तरकीब क्या है, फिर उपवास में भी आपकी श्रद्धा न रह जायेगी। आपको भी पता चल जाये कि ब्रह्मचारी रहने की तरकीब क्या है, फिर आपको उसमें भी रस न रह जायेगा।
जो भी आप कर सकते हैं.. .यह बड़े मजे की बात है कि किसी आदमी की अपने में श्रद्धा नहीं है। जो भी आप कर सकते हैं, उसमें आपकी कभी श्रद्धा नहीं होगी। जो दूसरा कर सकता है, और आप नहीं कर सकते है, तो श्रद्धा होती है। तो जो भी आदमी अहंकार खोज रहा है—अहंकार का मतलब, दूसरों की श्रद्धा खोज रहा है, सम्मान खोज रहा है—वह आदमी तिरछे रास्ते चुन लेगा।
मूर्ख गाड़ीवान ऐसे ही मूर्ख नहीं है, बहुत समझदारी से मूर्ख है। उस मूर्खता में एक विधि है।
महावीर कहते हैं, लेकिन जीवन के रास्ते पर भी यही होता है। मनुष्य जान—बूझकर धर्म को छोड़कर अधर्म को चुन लेता है। आपको साफ—साफ पता होता है, यह सरल और सीधा रास्ता है; लेकिन उसमें अहंकार की तृप्ति नहीं होती। तब आप तिरछा रास्ता चुनते हैं। यह जान—बूझकर चुनते हैं। इसको समझ लेना जरूरी है। क्योंकि अगर आप बिना जाने—बूझे चुनते हैं तब बदलने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए महावीर का जोर है कि आप जान—बूझकर चुनते हैं। अगर आप बिना जाने—बूझे चुनते हैं तब तो फिर बदलने का कोई उपाय नहीं है। अगर जान—बूझकर चुनते हैं, तो बदलाहट हो सकती है।
बदलाहट का अर्थ ही यह है कि आप ही मालिक हैं चुनाव के। आपने ही चाहा था इसलिए तिरछे रास्ते पर गये। आप चाहेंगे तो सीधे रास्ते पर आ सकते हैं। यह आपकी चाह ही है जो आपको भटकाती है। इसमें कोई दूसरा पीछे से काम नहीं कर रहा है। फ्रायड़ कहता है, आदमी जान—बूझकर कुछ भी नहीं करता, धर्म और अधर्म के बीच यही विकल्प है। फ्रायड़ कहता है, मनुष्य जान—बूझकर कुछ भी नहीं करता, सब अनकांशस होता है, सब अचेतन होता है, जानकर आदमी कुछ भी नहीं करता। फ्रायड़ ने यह बात पिछले पचास सालों में इतने जोर से पश्‍चिम के सामने सिद्ध कर दी। और वह आदमी अदभुत था। उसकी खोज में कई सत्य थे, लेकिन अधूरे सत्य थे और अधूरे सत्य असत्यों से भी खतरनाक सिद्ध होते हैं। क्योंकि अधूरा सत्य, सत्य भी मालूम पड़ता है और सत्य होता भी नहीं। और कोई भी आदमी अश्रे सत्य को नहीं पकड़ता है। जब अधूरे सत्य को पकड़ता है, तो उसे पूरा सत्य मानकर पकड़ता है। तब उपद्रव शुरू हो जाते हैं।
फ्रायड़ ने पश्चिम को समझा दिया कि आदमी जो भी कर रहा है, वह सब अचेतन है। अगर यह बात सच है, तो फिर आदमी के हाथ में परिवर्तन का कोई उपाय नहीं। इसलिए शराबी ने सोचा कि अब मैं कर भी क्या सकता हूं। व्यभिचारी ने सोचा, अब उपाय भी क्या है! यह सब अचेतन है, यह सब हो रहा है। इसमें मैं कुछ भी नहीं कर सकता।
और इस सदी ने बिना जाने जगत के इतिहास का सबसे बड़ा भाग्यवाद जन्माया। भाग्यवादी कहते थे, परमात्मा कर रहा है; फ्रायड़ कहता है, अचेतन कर रहा है। लेकिन एक बात में दोनों राजी हैं कि हम नहीं कर रहे हैं। हमारे हाथ में बात नहीं है। परमात्मा कर रहा है। विधि ने लिख दिया खोपड़ी पर, वह हो रहा है। फ्रायड़ कहता है, पीछे से अचेतन चला रहा है, और हम चल रहे हैं। जैसे कोई गुइड्डयों को नचा रहा हो। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। पहले परमात्मा नचाता था गुइड्डयों को, अब अनकांशस, अचेतन नचा रहा है। सिर्फ शब्द बदल गये हैं। लेकिन आदमी के हाथ में कोई ताकत नहीं।
महावीर परमात्‍मा के भी खिलाफ हैं और अचेतन के भी। महावीर कहते हैं, तुम जो भी कर रहे हो, ठीक से जानना, तुम कर रहे हो। आदमी को इतना ज्यादा उत्तरदायी किसी दूसरे ने कभी नहीं माना, जितना महावीर ने माना। महावीर ने कहा कि अंततः तुम ही निर्णायक हो, और इसलिए कभी भूलकर नहीं कहना कि भाग्य ने, विधि ने, परमात्मा ने, किसी ने करवा दिया। जो तुमने किया है, तुमने किया है। इसमें जोर देने का कारण है और वह कारण यह है कि जितना यह स्पष्ट होगा कि मैं कर रहा हूं उतनी ही बदलाहट आसान है। क्योंकि अगर मैं अपने चुनाव से उल्टे रास्ते पर नहीं गया हूं भेजा गया हूं तो जब मैं भेजा जाऊंगा सीधे रास्ते पर तो चला जाऊंगा। जब मैं भेजा गया हूं उल्टे रास्ते पर, तो मैं कैसे लौट सकता हूं? जब भेजेगी प्रकृति, भेजेगी नियति, भेजेगा परमात्मा, तो ठीक है, मैं लौट जाऊंगा। न मैं गया, न मैं लौट सकता हूं। मैं एक पानी में बहता हुआ तिनका हूं। मेरी अपनी कोई गति नहीं है, मेरा अपना कोई संकल्प नहीं है।
महावीर का यह जोर कि तुम जान—बूझकर गलत कर रहे हो, कारणवश है और वह कारण यह है कि अगर जान—बूझकर रहे हो तो ही बदलाहट हो सकती है। नहीं तो फिर कोई ट्रांसफामेंशन, मनुष्य के जीवन में फिर कोई क्रांति संभव नहीं है। इसलिए महावीर बड़े साहस से ईश्वर को बिलकुल इंकार कर दिये, क्योंकि ईश्वर के रहते महावीर को लगा कि आदमी को सदा एक सहारा होता है कि वह जो करेगा, उसकी बिना आज्ञा के तो पत्ता भी नहीं हिलता, तो हम कैसे हिलेगे। तो हम कहते हैं, उसकी आज्ञा के बिना पता नहीं हिलता। अब हम व्यभिचारी हैं अब हम कैसे व्यभिचार से हिल जायें! जब वह हिलायेगा, उसकी मर्जी।
आदमी बेईमान है, अपने परमात्माओं के साथ भी। आदमी बड़ा कुशल है और परमात्मा भी कुछ कर नहीं सकता। आदमी को जो उससे बुलवाना है, बुलवाता है। जो उससे करवाना है, करवाता है। मजा यह है कि परमात्मा की बिना आज्ञा के पत्ता हिलता है, या नहीं हिलता है, यह तो पता नहीं, आपकी बिना आज्ञा के परमात्मा भी नहीं हिल सकता। वह आप ही उसको हिलाते रहते हैं, जैसी मर्जी आप ही अंततः निर्णायक है।
इसलिए महावीर कहते है 'जान—बूझकर'। लेकिन कितना ही कोई जान—बूझकर गलत रास्ते पर जाये, रास्ता तो गलत ही होगा, और गलत रास्ते पर धुरी टूटेगी ही। रास्ते के गलत होने का मतलब ही इतना है कि जहां धुरी टूट सकती है। और तो कोई मतलब नहीं है। इसलिए अधर्म में गया हुआ आदमी रोज टूटता चला जाता है। निर्मित नहीं होता, बिखरता है।
चोरी करके देखें, झूठ बोल कर देखें, बेईमानी करके देखें, धोखा करके देखें, किसी की हत्या करें, होगा क्या? आपकी आत्मा की धुरी टूटती चली जाती है, आप भीतर टूटने लगते है। भीतर इंटिग्रेशन, अखंड़ता नहीं रह जाती, खण्ड—खण्ड हो जाता है। कभी कुछ, जिसको धर्म कहा है, वह करके देखें तो भीतर अखंड़ता आती है।
इसको ऐसा सोचें कि जब आप झूठ बोलते है, तब आपके भीतर टुक्के—टुक्ते हो जाते है,एक आत्मा नहीं होती। एक हिस्सा तो भीतर कहता ही रहता है कि मत करो, गलत है। एक हिस्सा तो जानता ही रहता है कि यह सच नहीं है। आप सारी दुनिया को झूठ बोल सकते है, लेकिन अपने से कैसे बोलिएगा? भीतर तो पता चलता ही रहता है कि यह झूठ है। इसलिए सतह पर भर आप झूठ के लेबल चिपका सकते हैं, आपकी अंतरात्मा तो जानती है कि यह झूठ है। इसलिए आप इकट्ठे नहीं हो सकते।
आपकी परिधि और आपके केंद्र में विरोध बना रहेगा। भीतर कोई कहता ही रहेगा कि यह झूठ है, यह नहीं, यह नहीं बोलना था। जो बोला है वह ठीक नहीं था। यह भीतर खष्ड—खष्डकर जायेगा।
अब जो आदमी हजार झूठ बोल रहा है, उसके हजार खष्ड हो जायेंगे लेकिन जो आदमी सच बोल रहा है, उसके भीतर कोई खण्ड नहीं होता। क्योंकि सच के विपरीत कोई कारण नहीं होता। और मजा यह है कि अगर कभी विपरीत भी हो, जैसा कि सच बोलते में भी कभी परिधि कहती है, मत बोलो, नुकसान होगा; लेकिन तब भी सच आता है भीतर से और झूठ आता है बाहर से।
भीतर हमेशा मजबूत होता है। इसलिए परिधि ज्यादा देर टिक नहीं पाती, टूट जाती है। लेकिन जब आप झूठ बोलते हैं परिधि की मानकर, तब कभी भी कितना ही बोलते चले जायें, टिक नहीं सकता। रोज संभालें, फिर भी नहीं संभलता क्योंकि भीतर गहरे में आप जानते ही है कि यह झूठ है। वह हजार तरह से निकलने की कोशिश करता है। इसलिए जो आदमी झूठ बोलता है वह भी किसी से बता देता है कि यह झूठ है।
आप जानते है क्यों? हम सब अपने इटिमेसीज रखते है, आंतरिकताए रखते है, जहां हम सब बता देते हैं। उससे मन हल्का होता है। नहीं बता पाये दुनियां को, कोई फिकर नहीं, अपनी पत्नी को तो बता दिया! इससे राहत मिलती है। वह जो सच है भीतर, धक्के दे रहा है। उसे प्रगट करो। नहीं है हिम्मत कि सारी दुनिया को प्रगट कर दें, तो किसी को तो बता पाते हैं।
इस दुनिया में उस आदमी से अकेला कोई भी नहीं, जिसके कोई भी इतना निकट नहीं है, जिससे कम से कम वह झूठ बता सके कि जो—जो मैं गलत कर रहा हूं वह यह है। मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि प्रेम का लक्षण ही यह है कि जिसके सामने तुम पूरे सच्चे प्रगट हो जाओ। अगर एक भी ऐसा आदमी नहीं है जगत में, जिसके सामने आप पूरे नग्‍न हो सकते है अंतःकरण से, तो आप समझना आपको प्रेम का कोई अनुभव नहीं हुआ है।
लेकिन जो आदमी सारे जगत के सामने अंतःकरण से नग्‍न हो सकता है, उसको प्रार्थना का अनुभव हुआ है। एक व्यक्ति के सामने भी आप पूरे सच हो जाते हैं तो जो क्षणभर को राहत मिलती है, जो सुगंध आती है, जो ताजी हवाएं दौड़ जाती हैं प्राणों के आर पार, वे भी काफी हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति समस्त जगत के सामने सच हो जाता है, जैसा है, वैसा ही हो जाता है, तब उसके जीवन में दुर्गंध का कोई उपाय नहीं है।
महावीर धर्म कहते हैं, स्वभाव की सत्यता को, जैसा है भीतर वैसा ही। कोई टेढ़ा—मेढा नहीं। ठीक वैसा ही, नग्‍न जैसे दर्पण के सामने कोई खड़ा हो। ऐसा जो सहज है भीतर, वह जगत के सामने प्रगट हो जाये। इस अभिव्यक्ति का, सहज अभिव्यक्ति का जो अंतिम फल है वह है, मृत्यु मोक्ष बन जाती है। और हमारे समस्त झूठों के संग्रह का जो अंतिम फल है, पूरा जीवन एक असत्य, अप्रामाणिक अन—आथेटिक यात्रा हो जाती है। चलते बहुत हैं, पहुंचते कहीं भी नहीं। दौड़ते बहुत हैं, मंजिल कोई भी हाथ नहीं आती। सिर्फ मरते हैं। जीवन कहीं पहुंचाता नहीं, सिर्फ भटकाता है। जो रात और दिन एक बार अतीत की ओर चले जाते हैं, वे फिर कभी वापस नहीं लौटते। जो मनुष्य अधर्म करता है, उसके वे रात—दिन बिलकुल निष्फल जाते हैं। लेकिन जो मनुष्य धर्म करता है, उसके वे रात—दिन सफल हो जाते हैं।
महावीर के लिए सफलता का क्या अर्थ है? बैंक बैलेंस? कि कितने लोग आपको मानते हैं? कि कितने अखबार आपकी तस्वीर छापते हैं? कि कितनी नोबल प्राइज आपको मिल जाती हैं? नहीं, महावीर इसे सफलता नहीं कहते। थोड़ा सा उनकी जिंदगी देखें जिनको नोबल प्राइज मिलती है। उनमें से अधिक आत्महत्या कर लेते है। जो आत्महत्या नहीं करते, वे मरे—मरे जीते है।
अर्नेस्ट हेमिंग्वे का नाम सुना होगा। कौन इतनी सफलता पाता है? नोबल प्राइज है, धन है, प्रतिष्ठा है, सारे जगत में नाम है। उससे बड़ा कोई लेखक न था उसके समय में। लेकिन अर्नेस्ट हेमिंग्वे अंत में आत्महत्या कर लेता है। बड़ी अदभुत सफलता है। बाहर इतनी सफलता और भीतर इतनी पीड़ा है कि आत्महत्या कर लेनी पड़ती है। अपने को सहना मुश्किल हो जाता है, तभी तो कोई आत्महत्या करता है। जब अपने को बर्दाश्त करना आसान नहीं रह जाता, एक—एक पल, एक—एक घड़ी आदमी अपने को भारी पड़ने लगता है, तभी तो मिटाता है!
तो जिसको इतनी सफलता है चारों तरफ, इतना यश, गौरव है, वह भी भीतर इतनी दिक्कत में पड़ा है! भीतर की धुरी टूट गयी है। सारी दुनिया तारीफ कर रही है चकों की, धुरी तो दुनिया को दिखायी नहीं पड़ती, वह तो भीतर है, स्वयं को दिखायी पड़ती है। सारी दुनिया चांदी के वर्क, सोने के वर्क लगा रही है चाको पर; और सारी दुनिया कह रही है, क्या अदभुत चके हैं, कितनी—कितनी ऊबड़—खाबड़ यात्राएं कीं! और भीतर धुरी टूट गयी, वह गाड़ी ही जानती है कि अब क्या होना है! इन चकों पर लगे हुए सितारे काम नहीं पड़ेंगे। अंत में तो धुरी ही.. .उस धुरी की सफलता महावीर के लिए क्या हो सकती है? महावीर के लिए सफलता एक ही है।
समय तो बीत जाता है। उस समय में हम दो काम कर सकते हैं—या तो उस समय में हम अपनी आत्मा को इकट्ठा कर सकते हैं, या उस समय में हम अपनी आत्मा को बिखेर सकते हैं, तोड़—तोड़, टुकड़े—टुकड़े कर सकते है।
समय तो बीत जायेगा, फिर लौटकर नहीं आता, लेकिन उस समय में हमने जो किया है, वह हमारे साथ रह जाता है। वह कभी नहीं खोता इस बात को ठीक से समझ लें।
समय तो कभी नहीं लौटता, लेकिन समय में जो घटता है, वह कभी नहीं जाता। वह सदा साथ रह जाता है। तो मैंने क्या किया है समय में, उससे मेरी आत्मा निर्मित होती है। महावीर ने तो आत्मा को समय का नाम ही दे दिया है। महावीर ने तो कहा है, आत्मा, यानी समय। ऐसा किसी ने भी दुनिया में नहीं कहा। क्योंकि महावीर ने कहा कि समय तो खो जायेगा, लेकिन समय के भीतर तुमने क्या किया है, वही तुम्हारी आत्मा बन जायेगी, वही तुम्हारा सृजन है।
तो हम समय के साथ विध्वंसक हो सकते है, सृजनात्मक हो सकते है। विध्वंसक का अर्थ है कि हम जो भी कर रहे हैं उससे हमारी आत्मा निर्मित नहीं हो रही है। झूठ बोलने से एक आदमी की आत्मा निर्मित नहीं होती। चोरी करने से आत्मा निर्मित नहीं होती। धन मिल सकता है, झूठ बोलने से यश मिल सकता है। सच तो यह है किं बिना झूठ बोले यश पाना बड़ा मुश्किल है। बिना चोरी किए धन पाना बहुत मुश्किल है। जब धन मिलता है तो निन्यानबे प्रतिशत चोरी के कारण मिलता है, एक प्रतिशत शायद बिना चोरी के मिलता हो। जब प्रतिष्ठा मिलती है तो निन्यानबे प्रतिशत झूठ, प्रचार से मिलती है; एक प्रतिशत शायद, उसका कोई निश्रय नहीं है।
एक बात तय है कि अधर्म से जो भी मिलता है, उससे आपकी आत्मा निर्मित नहीं होती। अधर्म से जो भी मिलता है, वह आत्मा की कीमत पर मिलता है। बाहर तो कुछ मिलता है, भीतर कुछ खोना पड़ता है। हम हमेशा मूल्य चुकाते है।
जब आप झूठ बोलते है, तो मैं इसलिए नहीं कहता कि झूठ मत बोलें, कि इससे दूसरे को नुकसान होगा। दूसरे को होगा कि नहीं होगा, यह पका नहीं है। आपको निशित हो रहा है, यह पका है। दूसरा अगर समझदार हुआ, तो आप के झूठ से कोई नुकसान नहीं होने वाला है; और दूसरा अगर नासमझ है, तो आपके सत्य से भी नुकसान हो सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण आप है। अंततः जब आप कुछ भी गलत कर रहे है, तो आप भीतर आत्मा के मूल्य में चुका रहे है; व्यर्थ का एक कंक्खू, इकट्ठा कर रहे हैं और भीतर एक आत्मा का खण्ड खो रहे है। महावीर इसको असफलता कहते है कि एक आदमी जीवन में सब कुछ इकट्ठा कर ले और आखिर में पाये, कि खुद की धुरी टूट गयी, सब पा ले और आखिर में पाये, कि खुद को खोकर पाया है यह, तब मृत्यु के क्षण में जो पछतावा होता है, लेकिन तब समय वापस नहीं आ सकता।
पुनर्जन्म की सारी भारतीय धारणाएं इसीलिए हैं कि पिछला समय तो वापस नहीं आ सकता। नया समय आपको दुबारा मिलेगा। पुराने समय को लौट आने का कोई उपाय नहीं, लेकिन नया जन्म मिलेगा। फिर से नया समय मिलेगा। लेकिन जिन्होंने पुराने समय में मजबूत आदतें निर्मित कर ली है, संस्कार भारी कर लिए है, वे नये समय का फिर से वैसा ही उपयोग करेंगे।
थोड़ा सोचें, अगर कोई आपसे कहे कि आपको हम फिर से जन्म दे देते है; आपका क्या करने का इरादा है? तो आप क्या करेंगे? सोचें थोड़ा, तो आप पायेंगे कि जो आपने अभी किया है, थोड़ा बहुत माडिफाइड़, इधर—उधर थोड़ा बहुत हेर—फेर, पली थोड़ी और अच्छी नाकवाली चुन लेंगे, कि मकान थोड़ा और नये डिजाइन का बना लेंगे। करेंगे क्या?
मुल्ला नसरुद्दीन से मरते वक्त किसी ने पूछा था कि फिर से जन्म मिले तो क्या करोगे? तो उसने कहा, जो पाप मैंने बहुत देर से शुरू किये, वे जल्दी शुरूकर दूंगा, क्योंकि जो पाप मैंने किये, उनके लिए मुझे कोई पछतावा नहीं होता। जो मैं नहीं कर पाया हूं उनका हमेशा मुझे पछतावा रहता है।
आप ही खयाल करना, पाप का पछतावा बहुत कम लोगों को होता है। जो आप पाप नहीं कर पाये, उसका पछतावा सदा बना रहता है। और करके पछताना उतना बुरा नहीं है, न करके पछताना बिलकुल व्यर्थ है।
कभी आपने खयाल किया कि जो—जो आप नहीं कर पाये हैं, जो चोरी नहीं कर पाये, उसके लिए भी पछता रहे हैं। जो झूठ नहीं बोल पाये उसके लिए भी पछताते हैं। जो बेईमानी अगर कर लेते!... तो अभी कहीं के गवर्नर होते, या कहीं चीफ मिनिस्टर होते, नहीं कर पाये। नाहक जेल गये और आये। जरा सी तरकीब लगा लेते, तो मन पीड़ा झेलता चला जाता है।
अगर आपको नया समय भी मिले, तो आप पुनरुक्ति ही करेंगे; क्योंकि आपको मूल खयाल में नहीं है कि आपने जो किया, वह क्यों किया? वह अहंकार के कारण आपने गलत रास्ता चुना। अगर अहंकार मौजूद है, आप फिर गलत रास्ता चुनेंगे। फिर गलत रास्ता चुनेंगे।
अहंकार प्रवृत्ति है—गलत रास्ता चुनने की। अगर अहंकार खो जाए, तो आप समय का उपयोग कर सकते हैं। इसलिए महावीर ने अंतिम सूत्र में बात कही— 'जब तक बुढ़ापा नहीं सताता, जब तक व्याधियां नहीं सताती, जब तक इंद्रियां अशक्त नहीं होतीं, तब तक धर्म का आचरण कर लेना चाहिए। बाद में कुछ भी नहीं होगा।
यहां हिंदू और जैन विचार में एक बहुत मौलिक भेद है। हिंदू विचार सदा से मानता रहा है कि संन्यास, धर्म, ध्यान, योग सब बुढ़ापे के लिए है। अगर महावीर ने इस विचार में कोई बड़ी से बड़ी क्रांति पैदा की तो इस सूत्र में है। वह यह कि यह बुढ़ापे के लिए नहीं है।
बड़े मजे की बात है कि अधर्म जवानी के लिए है, और धर्म बुढ़ापे के लिए भोग जवानी के लिए, और योग बुढापे के लिए। क्यों? क्या योग के लिए किसी शक्ति की जरूरत नहीं है? जब भोग तक के लिए शक्ति की जरूरत है, तो योग के लिए शक्ति की जरूरत नहीं है? लेकिन उसका कारण है—उसका कारण है, और वह कारण यह है कि हम भलीभांति जानते हैं, कि भोग तो बुढ़ापे में किया नहीं जा सकता, योग देखेंगे। हो गया तो ठीक है, न हुआ तो क्या हर्ज है। भोग छोड़ा नहीं जा सकता, योग छोडा जा सकता है। तो भोग तो अभी कर लें और योग को स्थगित रखें। जब भोग करने योग्य न रह जायें, तब योग कर लेंगे।
लेकिन ध्यान रखना, वही शक्ति, जो भोग करती है, वही शक्ति योग करती है। दूसरी कोई शक्ति आपके पास है नहीं। आदमी के पास शक्ति तो एक ही है; उसी से वह भोग करता है, उसी से वह योग करता है। इसलिए महावीर की दृष्टि बड़ी वैज्ञानिक है। महावीर कहते हैं कि जिस शक्ति से भोग किया जाता है, उसी से तो योग किया जाता है। वह जो वीर्य, वह जो ऊर्जा संभोग बनती है, वही वीर्य, वही ऊर्जा, तो समाधि बनती है। जो मन भोग का चिंतन करता है, वही मन तो ध्यान करता है। जो शक्ति क्रोध में निकलती है, वही शक्ति तो क्षमा में खिलती है। उसमें फर्क नहीं है, शक्ति वही है। शक्ति हमेशा तटस्थ है, न्यूट्रल है। आप क्या करते हैं, इस पर निर्भर करता है।
एक आदमी अगर ऐसा कहे कि धन मेरे पास है, इसका उपयोग मैं भोग के लिए करूंगा, और जब धन मेरे पास नहीं होगा तब जो बचेगा, उसका उपयोग दान के लिए करूंगा।
मुल्ला नसरुद्दीन मरा तो उसने अपनी वसीयत लिखी। वसीयत में उसने लिखवाया अपने वकील को कि लिखो, मेरी आधी संपत्ति मेरी पत्नी के लिए, नियमानुसार। मेरी आधी संपत्ति मेरे पांच पुत्रों में बांट दी जाये; और बाद में जो कुछ बचे गरीबों को दान कर दिया जाये। लेकिन वकील ने पूछा, कुल संपत्ति कितनी है? मुल्ला ने कहा, यह तो कानूनी बात है, संपत्ति तो बिलकुल नहीं है। संपत्ति तो मैं खतम कर चुका हूं। लेकिन वसीयत रहे, तो मन को थोड़ी शांति रहती है; कि कुछ करके आये, कुछ छोड़ कर आये।
करीब—करीब जीवन ऊर्जा के साथ हमारा यही व्यवहार है।
महावीर कहते हैं, ' भोग के जब क्षण हैं, तभी योग के भी क्षण हैं'। भोग जब पकड़ रहा है, तभी योग भी पकड़ सकता है। इसलिए महावीर कहते हैं, जब बुढापा सताने लगे, जब व्याधियां बढ जायें, और जब इंद्रियां अशक्त हो जायें, तब धर्म का आचरण नहीं हो सकता है; तब सिर्फ धर्म की आशा हो सकती है; आचरण नहीं।
आचरण शक्ति मलता है। इसलिए जिस विचारधारा में, बुढापे को धर्म के आचरण की बात मान लिया गया, उस विचारधारा में बुढ़ापे में सिवाय भगवान से प्रार्थना करने के फिर कोई और उपाय बचता नहीं। इसलिए लोग फिर राम नाम लेते हैं आखिर में। फिर और तो कुछ कर नहीं सकते, कुछ और तो हो ही नहीं सकता है। जो हो सकता था, वह सारी शक्ति गवां दी; जिससे हो सकता था, वह सारा समय खो दिया। जब शक्ति प्रवाह में थी और ऊर्जा जब शिखर पर थी, तब हम कचरा—कुड़ा बीनते रहे। और जब हाथ से सारी शक्ति खो गयी, तब हम आकाश के तारे छूने की सोचते हैं। तब सिर्फ हम आंख बांध कर, बंद करके राम नाम ले सकते हैं।
राम नाम अधिकतर धोखा है। धोखे का मतलब? राम नाम में धोखा है, ऐसा नहीं, राम नाम लेनेवाले में धोखा है। धोखा इसलिए है कि अब कुछ नहीं कर सकते, अब तो राम नाम ही सहारा है। साधु संन्यासी बिलकुल समझाते रहते है कि यह कलियुग है, अब कुछ कर तो सकते नहीं। अब तो बस राम नाम ही एक सहारा है। लेकिन मतलब इसका वही होता है जो आमतौर से होता है। किसी बात को आप नहीं जानते तो आप कहते हैं, सिर्फ भगवान ही जानता है। उसका मतलब, कोई नहीं जानता। राम नाम ही सहारा है। उसका ठीक मतलब कि अब कोई सहारा नहीं है।
महावीर कहते हैं इसके पहले की शक्तियां खो जायें, उन्हें रूपांतरित कर लेना। इसके पहले... और बड़े मजे की बात यह है कि जो उन्हें रूपांतरित कर लेता है खोने के पहले, शायद उसे बुढ़ापा कभी नहीं सताता। क्योंकि बुढ़ापा वस्तुत: शारीरिक घटना कम और मानसिक घटना ज्यादा है। महावीर भी तो शरीर से बूढ़े हो जायेंगे, लेकिन मन से उनकी जवानी कभी नहीं खोती।
इसलिए हमने महावीर का कोई चित्र बुढ़ापे का नहीं बनाया, न कोई मूर्ति बुढ़ापे की बनायी। क्योंकि वह बनाना गलत है। महावीर बूढ़े हुए होंगे, और उनके शरीर पर झुर्रईयां पड़ी होंगी, क्योंकि शरीर किसी को भी क्षमा नहीं करता।
और शरीर के नियम है, वह महावीर की फिक्र नहीं करता, किसी की फिक्र नहीं करता। उनकी आंखें भी कमजोर हो गयी होंगी, उनके पैर भी ड़गमगाने लगे होंगे, शायद उन्हें भी लकड़ी का सहारा लेना पड़ा हों—कुछ पता नहीं। लेकिन हमने कभी उनके बुढ़ापे की कोई मूर्ति नहीं बनायी, क्योंकि वह असत्य है। तथ्य तो हो सकती है, फैक्ट तो हो सकती है, लेकिन वह असत्य होगी।
महावीर के बाबत सच्ची खबर उससे न मिलेगी। वह भीतर से सदा जवान बने रहे, क्योंकि बुढ़ापा वासनाओं में खोई गयी शक्तियों का भीतरी परिणाम है। बाहर तो शरीर पर बुढ़ापा आयेगा, वह समय की धारा में अपने आप घटित हो जायेगा, लेकिन भीतर जब शरीर की शक्तियां वासना में गवांयी जाती हैं, अधर्म में, टेढ़े—मेढ़े रास्तों पर, जब धुरी टूट जाती है, तब भीतर भी एक बुढ़ापा आता है, एक दीनता।
वासना में बिताये हुए आदमी का जीवन सबसे ज्यादा दुखद बुढ़ापे में हो जाता है। और बहुत कुरूप हो जाता है। क्योंकि धुरी टूट चुकी होती है और हाथ में सिवाय राख के कुछ भी नहीं होता, सिर्फ पापों की थोड़ी सी स्मृतियां होती हैं और वह भी सालती हैं। और समय व्यर्थ गया, उसकी भी पीड़ा कचोटती है।
इसलिए बुढ़ापा हमें सबसे ज्यादा कुरूप मालूम पड़ता है। होना नहीं चाहिए। क्योंकि बुढ़ापा तो शिखर है जीवन का, आखिरी। सर्वाधिक सुंदर होना चाहिए। इसलिए जब कभी कोई बूढ़ा आदमी जिंदगी में गलत रास्तों पर न चलकर सीधे सरल रास्तों से चला होता है, तो बुढ़ापा बच्चों जैसा निर्दोष, पुन: हो जाता है। और बच्चे इतने निर्दोष नहीं हो सकते। क्योंकि अज्ञानी है। बुढ़ापा एक अनुभव से निखरता और गुजरता है। इसलिए बुढ़ापा जितना निर्दोष हो सकता है—और कभी सफेद बालों का सिर पर छा जाना— अगर भीतर जीवन में भी इतनी शुभ्रता आती चली गयी हो, तो उस सौंदर्य की कोई उपमा नहीं है।
जब तक का आदमी सुंदर न हो, तब तक जानना कि जीवन व्यर्थ गया है। जब तक बुढ़ापा सौदर्य न बन जाये, लेकिन बुढ़ापा कब सौदर्य बनता है? जब शरीर तो बूढ़ा हो जाता है, लेकिन भीतर जवानी की ऊर्जा अक्षुण्ण रह जाती है। तब इस बुढ़ापे की झुार्रियों के भीतर से वह जवानी की जो अक्षुण्ण ऊर्जा है, जो वीर्य है, जो शक्ति है, जो बच गयी, जो रूपांतरित हो गयी, उसकी किरणें इन बुढ़ापे की झुर्रियों से बाहर पड़ने लगती हैं, तब एक अनूठे सौदर्य का जन्म होता है।
इसलिए हमने महावीर, बुद्ध, राम, कृष्ण किसी का भी बुढ़ापे का कोई चित्र नहीं रखा है। अच्छा किया हमने। हम ऐतिहासिक कौम नहीं है। हमें तथ्यों की बहुत चिंता नहीं है, हमें सत्यों की फिक्र है जो तथ्यों के भीतर छिपे होते हैं, गहरे में छिपे होते हैं। इसलिए हमने उनको जवान ही चित्रित किया है।
महावीर कहते है, जब है शक्ति, तब उसे बदल डालो। पीछे पछताने का कोई भी अर्थ नहीं है।

 आज इतना ही।
पांच मिनट रुके, कीर्तन करें, फिर जायें।