कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

महावीर वाणी (भाग--1) प्रवचन--22

कामवासना है दूसरे की खोज(प्रवचनबाइसवां)

दिनांक 7 सितम्‍बर, 1972;
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

ब्रह्मचर्य—सूत्र : 1

      विरई अबंभचेरस्स, काम—भोगरसत्रुणा।
उग्‍गं महव्ययं बम, धारेयव्‍वं सुदुक्करं।।
मूलमेयमहम्मस्स महोदोससमुस्सयं।
तन्हा मेहुणसंसग्गं, निग्गंधा वज्जयन्ति णं।।
विआ ईत्थिसंसग्गो, पणीय रसभोयण।
नरस्सऽत्तगवेसिस्स, विसं तालउडं जहा।।

 जो मनुष्य काम और भोगों के रस को जानता है, उनका अनुभवी है, उसके लिए अब्रह्मचर्य त्यागकर, ब्रह्मचर्य के महाव्रत को धारण करना अत्यन्त दुष्कर है।
निर्ग्रन्थ मुनि अब्रह्मचर्य अर्थात मैथुन—संसर्ग का त्याग करते है, क्योंकि यह अधर्म का मूल ही नहीं, अपितु बड़े दोषों का भी स्थान
जो मनुष्य अपना चित्त शुद्ध करने, स्वरूप की खोज करने के लिए तत्‍पर है उसके लिए देह का शृंगार, स्त्रियों का संसर्ग और स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन दूध, मलाई, घी, मक्खन, विविध मिठाइयां आदि — का सेवन विष जैसा।


का, सेक्स फर्जी मनुष्य के पास एकमात्र ऊर्जा है
एक ही शक्ति है मनुष्य के पास, उस शक्ति को हम कोई भी नाम दें। वह शक्ति दो दिशाओं में गतिमान हो सकती है।
काम—ऊर्जा किसी दूसरे के प्रति गतिमान हो, तो यौन बन जाती है, और काम—ऊर्जा स्वयं के प्रति गतिमान हो तो योग बन जाती है। ऊर्जा एक है, दिशाओं के भेद से सारा जीवन भिन्न हो जाता है।
पानी को हम गर्म करें सौ डिग्री तक तो भाप बन जाता है, हल्का हो जाता है, आकाश की तरफ उड़ने में सक्षम हो जाता है। पानी को हम ठंडा करें शून्य डिग्री के नीचे, पत्थर का बर्फ हो जाता है, भारी हो जाता है। जमीन की गुरुत्वाकर्षण की शक्ति उस पर वजनी हो जाती है।
भाप भी पानी है, बर्फ भी पानी है — भाप आकाश की तरफ उड़ती है, बर्फ जमीन की तरफ गिर जाती है।
ऊर्जा एक है, दिशाएं दो हैं।
जिसे हम यौन कहते हैं, सेक्स कहते हैं, वह उसी एक्स, अज्ञात ऊर्जा का नीचे की तरफ प्रवाह है। शून्य डिग्री के नीचे बर्फ बन जाना है। तब जमीन का गुरुत्वाकर्षण उस पर सघन हो जाता है। वही ऊर्जा, वही एक्स, अज्ञात शक्ति ऊपर की तरफ उठनी शुरू हो जाये, सौ डिग्री के पार, परमात्मा की तरफ, भाप की तरह उठनी शुरू हो जाती है। जमीन का नीचे का खिंचाव समाप्त हो जाता है। शक्ति एक है, दिशाएं अलग हैं।
तो पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि शक्ति एक है। उसके उपयोग पर निर्भर करेगा कि वह आपको कहां ले जाये। दूसरी बात यह समझ लेनी जरूरी है कि शक्ति तटस्थ है। शक्ति स्वयं आपसे नहीं कहती कि क्या करें। शक्ति आपको हेतु नहीं देती, गति नहीं देती। शक्ति तटस्थ आपके भीतर मौजूद है। आप ही जो करना चाहें उस शक्ति का उपयोग करते हैं, शक्ति आपसे कुछ भी नहीं करवाती। आप नीचे की ओर बहाना चाहें तो ऊर्जा नीचे की ओर बहेगी, ऊपर की ओर बहाना चाहें तो ऊपर की ओर बहेगी। निर्णायक आप हैं, शक्ति नही। शक्ति आपके हाथ में है। अगर नीचे ले जायेंगे तो नीचे के जो सुख—दुख हैं वे मिलेंगे। अगर ऊपर ले जायेंगे तो ऊपर के जो अनुभव हैं, वे मिलेंगे।
तीसरी बात समझ लेनी जरूरी है कि इस शक्ति के रूपांतरण के दो उपाय हैं। एक उपाय का नाम है योग, एक उपाय का नाम है तंत्र। दोनों विपरीत हैं। दोनों उपाय जितने विपरीत हो सकते हैं उतने विपरीत हैं, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक है।
मार्ग विपरीत भी एक लक्ष्य पर पहुंचा सकते हैं। इस संबंध में थोड़ी बात समझ लें, फिर यह सूत्र समझना आसान होगा।
तंत्र की मान्यता है कि काम—ऊर्जा का पूरा अनुभव जब तक न हो, तब तक काम—ऊर्जा को रूपांतरित नहीं किया जा सकता। काम—ऊर्जा का जितना गहन अनुभव हो सके, उतना ही काम के रस से मुक्ति हो जाती है। यह महावीर से बिलकुल उलटा सूत्र है।
इसे थोड़ा ठीक से समझ लें तो फिर महावीर का, जो बिलकुल विपरीत दृष्टिकोण है, वह समझना आसान हो जायेगा। कंट्रास्ट में, एक दूसरे को सामने रखकर देखना आसान हो जायेगा।
तंत्र मानता है कि हम केवल उसी से मुक्त हो सकते हैं, जिसका हमें अनुभव हो। लेकिन क्यों? हम उसी से क्यों मुक्त हो सकते हैं, जिसका हमें अनुभव हो? तब तो इसका यह अर्थ होगा कि जिस दिन हमें मोक्ष का अनुभव होगा, हम मोक्ष से मुक्त हो जायेंगे। तब तो इसका यह अर्थ होगा, जिस दिन हमें आनंद का अनुभव होगा हम आनंद से मुक्त हो जायेंगे। तब तो इसका यह अर्थ होगा कि जिस दिन हम आत्मा का अनुभव कर लेंगे, उस दिन आत्मा व्यर्थ हो जायेगी।
नहीं, तंत्र का कहना यह है, जिस अनुभव की पूरी प्रक्रिया से गुजरकर अगर मुइक्त न हो तो समझना कि वह अनुभव स्वभाव है। और जिस अनुभव से गुजरकर शक्‍ति हो जाये, समझना कि वह परभाव है।
उस अनुभव से मुक्ति हो जाती है जिसमें पहले सुख मालूम पड़ता था और पीछे दुख मिलता है। उस अनुभव से शक्ति हो जाती है जिसके ऊपर तो लिखा था अमृत, लेकिन खोल फाड़ने पर जहर मिलता है। उस अनुभव से शक्‍ति हो जाती है जो व्यर्थ सिद्ध हो जाता
इसलिए तंत्र कहता है, काम का पूरा अनुभव आवश्यक है, ताकि काम का रस विलीन हो जाये। क्योंकि काम का रस भ्रांत है। रस है नहीं, प्रतीत होता है। जो प्रतीत होता है, अगर पूरे अनुभव से गुजरा जाये तो विलीन हो जायेगा।
रात के अंधेरे में मुझे एक रस्सी सांप मालूम पड़ती है। उससे मैं कितना ही भाग वह मेरे लिए रस्सी न हो पायेगी, सांप ही बनी रहेगी। तंत्र कहता है, निकट जाऊं, प्रकाश को जला लूं देख लूं जान लूं अनुभव में आ जाये कि रस्सी है; सांप नहीं है, तो भय विलीन हो जायेगा।
कामवासना मालूम होती है स्वर्ग है। मालूम होता है, कामवासना में गहरा आनंद है। अगर वस्तुत: आनंद है तो तंत्र कहता है, छोड़ना पागलपन है। अगर वस्तुत: आनंद नहीं है तो अनुभव से गुजरकर जान लेना जरूरी है कि रस्सी रस्सी है, सांप नहीं है। और जिस दिन यह दिखायी पड़ जायेगा कि अनुभव आनंदहीन है, न केवल आनंदहीन बल्कि दुख परिपूरित है, उस दिन उसे कौन पकड़ना चाहेगा?
यह तंत्र की दृष्टि है। यह एक उपाय है। दूसरा एक उपाय है जो महावीर की दृष्टि है, जो योग की दृष्टि है। और ये दोनों बिलकुल विपरीत हैं, पोलर अपोजिट्स हैं।
महावीर कहते हैं, जिसका अनुभव हो जाये, उससे छुटकारा मुश्‍किल है। महावीर कहते हैं, जिसका हम अनुभव करते हैं तो अनुभव की प्रक्रिया में आदत निर्मित होती है। जितना अनुभव करते हैं, उतनी आदत निर्मित होती है। और आदत का एक दुष्टचक्र है—आदत का एक दुष्टचक्र है। धीरे—धीरे यांत्रिक हो जाता है। एक अनुभव किया, दूसरा अनुभव किया, फिर यह अनुभव हमारे शरीर की, रोयें—रोयें की मांग बन जाती है। फिर इस अनुभव के बिना अच्छा नहीं लगता, और अनुभव से भी अच्छा नहीं लगता। अनुभव करते है तो लगता है कुछ भी न मिला, और अनुभव नहीं करते हैं तो लगता है कुछ खो रहा है। तो अनुभव करते हैं, पछताते हैं और तब फिर खाली जगह मालूम होने लगती है, फिर अनुभव करते हैं।
महावीर कहते हैं, जिसका अनुभव कर लिया जाये, अनुभव आदत का निर्माता हो जाता है., और आदमी जीता है आदत से। आप चौबीस घंटे जो करते हैं, वह सिर्फ आदत है। जरूरी नहीं है कि करने के लिए कोई अंतःप्रेरणा रही हो। ठीक वक्त रोज भोजन करते हैं, उस वक्त शरीर कहता है, भूख लगी है। जरूरी नहीं है कि भूख लगी हो। और घडी अगर बदलकर रख दी जाये, और आप एक बजे रोज भोजन लेते हैं और आपको पता न हो कि घड़ी धोखा दे रही है, अभी ग्यारह ही बजे हैं और घड़ी में एक बज गया, तो आपका पेट खबर देना शुरू करेगा कि भूख लग गयी है। मन को खबर हुई कि एक बज गया, कि आदत दोहरनी शुरू हो जायेगी।
आप जिस वक्त सोते हैं, अगर उसी वक्त न सो जायें तो नींद तिरोहित हो जाती है। अगर नींद वास्तविक थी और आप रोज बारह बजे रात सोते थे, तो एक बजे रात तक और भी तीव्रता से आनी चाहिए। लेकिन अगर बारह बजे नहीं सोये, एक बज गया, तो नींद आती ही नहीं। वह जो बारह बजे की नींद थी, आदतन थी, है बिचुअल थी। वास्तविक नींद नहीं थी। अगर आपको एक बजे भूख लगती है और तीन बज गये, तो आप हैरान होंगे, भूख मर जाती है। बढ़नी चाहिए। अगर वास्तविक भूख है तो एक बजे वाली भूख तीन बजे और गहरी हो जानी चाहिए। लेकिन तीन बजे भूख मर जाती है। क्योंकि भूख आदतन थी।
सभ्य आदमी जितना सभ्य होता है, उतनी आदत से जीता है। न असली भूख रह जाती है, न असली नींद रह जाती है। तब आदमी का काम— अनुभव भी आदत हो जाता है। तब जरूरी नहीं कि भीतर कोई अंतःप्रेरणा हो। पति—पली आदत हो जाते हैं। और आदत दोहरती चली जाती है।
एक बहुत बड़े विचारक डी.एच. लारेंस ने लिखा है कि विवाह अनुभव कम, आदत ज्यादा है। वही कमरा, वही बिस्तर, वही रंग—सेनक, वही पत्नी, वही समय— आदत। डी. एच. लारेंस ने लिखा है कि एक बात मुझे इतनी कष्टकर है जितनी और कोई नहीं। रोज उसी बिस्तर पर सोना। उसने लिखा है कि मैं कहीं भी मरना पसंद करूंगा, बिस्तर पर नहीं। ऐसे आमतौर से निन्यानबे प्रतिशत लतो बिस्तर पर मरते हैं। क्योंकि आदमी बड़ा मजेदार है।
अगर आप हवाई जहाज में बैठे हैं, तो लोग कहते हैं कि मत बैठो। कभी—कभी लाख में एकाध आदमी हवाई जहाज में मरता है। घोड़े पर सवारी करें, तो लोग कहते हैं, मत करो। कभी—कभी हजार में एक आदमी घोड़े से गिरकर मर जाता है। लेकिन कोई आपसे नहीं कहता, बिस्तर पर मत सोओ, निन्यानबे प्रतिशत आदमी बिस्तर पर मरते हैं। अधिकतम दुर्घटनाएं बिस्तर पर घटती हैं। डी. एच. लारेंस ने कहां है, बिस्तर एक आदत है। और ठीक समय पर जैसे भूख लगती है और नींद आती है, ठीक समय पर काम की वृत्ति पैदा हो जाती है। और तब लोग आदतें दोहराते रहते हैं।
महावीर कहते हैं, अनुभव आदत का निर्माण करता है और आदमी आदत से जीता है, होश से नहीं जीता। अगर होश से जीये तो तंत्र की बात ठीक हो सकती है। लेकिन आदमी जीता है आदत से, होश से नहीं जीता। इसलिए महावीर की बात में भी अर्थ है।
महावीर कहते हैं, एक बार आदत बननी शुरू हो जाये तो फिर बनती चली जाती है। बीज को जमीन में मत डालों तो अंकुर नहीं निकलता। एक बार डाल दो तो फिर अंकुर निकलता चला जाता है और वृक्ष बन जाता है। और वृक्ष में हजार करोड़ बीज लग जाते हैं। लेकिन बीज को जमीन में मत डालों, रखा रहने दो तो अंकुर नहीं निकलता है। एक दफा अनुभव में गुजरी, बीज जमीन पकड़ लेता है। और फिर आदत का अंकुर बढ़ना शुरू हो जाता है। फिर वह बढ़ता चला जाता है। फिर वह बड़ा होता चला जाता है।
इसलिए महावीर ने बच्चों को भी दीक्षा का मार्ग खोला। बल्कि महावीर के हिसाब से बच्चे को ही दीक्षा देनी चाहिए। अब तो मनोवैज्ञानकि भी कहते हैं कि सात साल की उम्र के बाद आदमी में बदलाहट मुश्किल हो जाती है। तो अगर सात साल, प्राथमिक सात वर्ष एक ढंग के निर्मित कर दिये जायें तो आदमी फिर उन्हीं ढंगों में जीता चला जाता है। इसलिए पहले सात वर्ष पूरे सत्तर वर्ष की संक्षिप्त कथा हैं। फिर वही दोहरता चला जाता है।
यह बड़ी मजे की बात है, इस पर थोड़ा सोचना जरूरी है कि आदत कितनी अदभुत है। आप अपनी मां को प्रेम करते हैं, सभी बच्चे करते हैं। लेकिन आपने कभी खयाल न किया होगा कि मां का प्रेम भी वैज्ञानिक अर्थों में सिर्फ आदत है। इस पर लारेंज ने बहुत काम किया। और लारेंज ने सल्लीट्यूट मदर्स, परिपूरक माताओं के प्रयोग किये।
जैसे एक बतख का बच्चा पैदा हुआ, तो बत्तख का बच्चा पैदा होता है, तो बत्तख ही उसे सबसे पहले मिलती है। मुर्गी का बच्चा पैदा होता है, तो मुर्गी ही उसे सबसे पहले मिलती है। स्वभावत:, आदमी का बच्चा पैदा होता है, तो पहला दर्शन और पहला अनुभव मां का होता है।
लारेंज ने ऐसे प्रयोग किये कि मुर्गी का बच्चा पैदा हो, तो मुर्गी का उसे अनुभव न हो पाये। मुर्गी छिपा ली जाये। मुर्गी की जगह उसने एक रबर का फुग्गा फुलाकर रख दिया। बच्चे को पहला जो दर्शन हुआ बच्चे को, जो पहला अनुभव हुआ, वह पहला अनुभव अंतिम अनुभव है। पहला अनुभव सबसे गहन अनुभव है। क्योंकि सबसे पहली आदत है। फिर सब कुछ उसके ऊपर निर्मित होगा।
उस बच्चे ने रबर का फुग्गा देखा। वह रबर के फुग्गे के प्रति वैसा ही आसक्त हो गया जैसा मां के प्रति। इसके बाद रबर का फुग्गा हवा में उड़ाया जाये तो बच्चा उसके पीछे दौड़े, लेकिन मां पास हो तो उसकी तरफ ध्यान भी न दे। मां व्यर्थ हो गयी, क्योंकि वह आदत न बन पायी। यह रबर का फुग्गा सार्थक हो गया, यह मां बन गया।
लारेंज कहता है, कि मां का कोई अर्थ नहीं। वह पहली आदत है। लेकिन और बड़े अनुभव हुए। यह जो मुर्गी का बच्चा रबर के गुब्बारे के पास बड़ा हुआ, इसको खाना, इसको पीना, सब यांत्रिक विधि से दिया गया, इसकी मां से नहीं। इसका मां से कोई संबंध नहीं जोड़ा गया। एक बड़ी हैरानी की बात हुई कि इस बच्चे के मन में मादाओं के प्रति कोई रस पैदा नहीं हुआ। वह मुर्गियों में उत्सुक नहीं रहा, उसके जीवन में सेक्स सूख गया।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जिस बच्चे को मां से पहला संपर्क न हो, जीवन में सी से उसके गहरे संबंध न हो पायेंगे। मां ही पहली आदत है। और इसलिए हर आदमी अपनी पत्नी में मां को खोजता रहता है, जाने अनजाने, चेतन अचेतन में मां को खोजता रहता है। और बड़ी कठिनाई यह है कि मां दुबारा मिल नहीं सकती पली में। इसलिए पत्नी से कभी चैन और शांति मिल नहीं सकती। मां पत्नी हो नहीं सकती, और कोई पली मां बनने को राजी नहीं, और कठिनाई तो यह है कि यह अचेतन आकांक्षा है। इसलिए अगर कोई पली मां बनने को राजी हो तो भी पति को दुख होगा।
पुरुषों का इतना आकर्षण स्त्रियों के स्तन में, मां के संबंध में बनी पहली आदत का परिणाम है, और कुछ भी नहीं है। मां से पहली आदत बनी, दूसरी आदत स्तन से बनी। इसलिए पुरुष सी के स्तन में इतने आतुर हैं, इतने उत्सुक हैं।
चित्रकार, मूर्तिकार, फिल्में, वे सब सी के स्तन के आस पास चली जाती हैं। कहांनियां, कविताएं रोमांस, वे सब सी के स्तन के आस पास निर्मित होता चला जाता है। उससे कुछ और पता नहीं चलता सिर्फ इतना ही पता चलता है, जैसे मुर्गी रबर के गुब्बारे के पास आसक्त हो गयी, बच्चा स्तन के प्रति आसक्त हो गया। और का भी मुक्त नहीं हो पाता उस आदत से। का भी मुक्त नहीं हो पाता स्तन की आदत से। वह रस कायम ही रहता है, वह रस बना ही रहता है।
अगर आदतें इतनी महत्वपूर्ण हैं, तो महावीर कहते हैं, जिस अनुभव से छूटना हो उस अनुभव में न उतरना ही उचित है। उतर जाने के बाद छूटना रोज—रोज मुश्किल होता चला जायेगा।
महावीर मनुष्य को एक यंत्र की भांति देखते हैं और निन्यानबे प्रतिशत आदमी यंत्र हैं। तो महावीर कहते हैं, यंत्रवत आदमी का जो जीवन है वह वहीं रोक दिया जाना चाहिए जहां से चीजों की शुरुआत होती है।
क्या इस बात की संभावना है कि अगर एक व्यक्ति को काम के समस्त अनुभवों, परिस्थितियों से बाहर रखा जा सके, तो उसके जीवन में काम का प्रवाह पैदा नहीं होगा?
इस बात की संभावना नहीं है कि काम का प्रवाह पैदा नहीं होगा। एक दिन बच्चा युवा होगा, शक्ति से भरेगा, ऊर्जा आयेगी, शरीर का यंत्र शक्ति देगा, काम ऊर्जा भर उठेगी। काम से, काम की ऊर्जा से, सारी परिस्थितियां भी रोक ली जायें, तो भी बच्चा भरेगा। लेकिन, एक फर्क पड़ेगा। उस बच्चे के पास आदतों के सुनिश्‍चित मार्ग न होंगे। ऊर्जा भर जायेगी, लेकिन आदतों के बहने के लिए कोई निर्मित मार्ग न होगे। उस बच्चे की ऊर्जा को किसी भी दिशा में रूपांतरित करना आसान होगा।
जिनके मार्ग निर्मित हो गये हैं, उन्हें नये मार्ग बनाना कठिन होता है। क्योंकि ऊर्जा पुराने मार्ग पर बिना श्रम के बहती है। अगर कोई भी मार्ग निर्मित न हो, तो नया मार्ग निर्मित करना बहुत आसान होता है; क्योंकि ऊर्जा बहना चाहती है। और कोई भी मार्ग मिल जाये तो गति से उस मार्ग पर अग्रसर हो जाती है।
महावीर की यही दृष्टि है। वे कहते हैं, काम का अनुभव खतरे में ले जायेगा, फिर ब्रह्मचर्य की तरफ आना मुश्किल होता चला जायेगा। इसलिए अनुभव से बचना।
इसे ध्यान से समझ लें— अनुभव से बचना दमन नहीं है, रिप्रेशन नहीं है। जिसको फ्रायड़ ने दमन कहां है, वह अनुभव से बचना दमन नहीं है। महावीर के लिए अनुभव से बचना ऊर्जा को दबाना नहीं है, अनुभव से बचना ऊर्जा को नया मार्ग देना है। जो ऊर्जा नीचे की तरफ बह रही है, उसे अगर ऊपर की तरफ ले जाना है, तो नीचे की तरफ बहने का अनुभव न हो तो ऊपर की तरफ मार्ग बनाना आसान होगा। लेकिन तब, तंत्र की ओर महावीर के योग की सारी प्रक्रियाएं विपरीत हो जायेंगी, सारी प्रक्रियाएं। तंत्र जो भी करेगा, महावीर के लिए वह गलत हो जायेगा और महावीर जो भी करेंगे, वह तंत्र के लिए गलत होगा।
मेरी दृष्टि में दोनों मार्गों से पहुंचना संभव है। दोनों मार्गों पर अलग—अलग बात पर जोर है ऊपर से, लेकिन भीतर एक ही बात पर जोर है, वह भी आपसे कह दूं।
वह जोर, तंत्र कहता है रस से मुक्ति होगी, अनुभव से। महावीर कहते हैं, रस लेना ही मत, तो मुक्ति होगी। लेकिन रस से शक्‍ति दोनों में केंद्रीय है। रस से शक्‍ति कैसे होगी इन बातों में, दोनों में भेद है।
इसलिए तत्र, उन लोगों के लिए आसान पड़ेगा जो होश जगाने में लगे हैं। जो लोग होश को जगाने में नहीं लगे हैं, उनके लिए तंत्र खतरनाक होगा। इसलिए तंत्र बहुत थोड़े से लोगों के काम की बात मालूम पड़ती है। इसलिए तंत्र का व्यापक प्रभाव नहीं हो सका। लेकिन भविष्य में तंत्र का व्यापक प्रभाव होगा, क्योंकि वह सारा समाज का, जीवन का ढांचा रोज—रोज तंत्र के ज्यादा अनुकूल आता जा रहा है। और लोग अनुभव से, रसविहीन होते चले जा रहे हैं।
यह जानकर आपको हैरानी होगी कि जिन देशों में यौन की जितनी स्वतंत्रता है, यौन के प्रति उतनी ही विरक्ति, पैदा होती जा रही है। जिन मुल्कों में यौन की जितनी. जितनी गुलामी है, जितनी परतंत्रता है, उतनी यौन के प्रति उत्सुकता है। अगर सारा जगत ठीक से समृद्ध हुआ, समृद्ध होने का मतलब दो ही होता है, क्योंकि आदमी की दो ही भूख हैं—एक शरीर की भूख है, जो रोटी से पूरी होती है, मकान से पूरी होती है, सामान से पूरी होती है। और एक यौन की भूख है, जो प्रेम से पूरी होती है। अगर इन दोनों का अतिरेक हो गया तो तंत्र की सार्थकता बढ़ती चली जायेगी। लेकिन अभी भी वह अतिरेक हुआ नहीं है।
और महावीर जो कह रहे हैं वह बिलकुल विपरीत है। उस विपरीतता में जो मौलिक बिंदु है, वह हम खयाल में ले लें तो फिर सूत्र समझ में आ जाये।
तंत्र कहता है, जिससे मुक्त होना है, उसमें जाओ। महावीर कहते हैं, जिससे मुक्त होना है, उसको छुओ ही मत। पहले कदम पर रुक जाओ। क्योंकि अंतिम कदम पर तुम रुक सकोगे, इसका भरोसा कम है।
तंत्र कहता है, अगर शराब से मुक्त होना है तो शराब पीयो और होश को संभालो। शराब की मात्रा उतनी ही बढ़ाते जाओ जितना होश बढता जाये, लेकिन होश सदा ऊपर रहे और शराब कभी भी बेहोश न कर पाये।
और तांत्रिकों ने अदभुत प्रयोग किये। और ऐसे तांत्रिक हैं कि उनको कितना ही नशा पिला दो, बेहोश न कर पाओगे। बेहोशी न आये तो शराब पीयी भी और नहीं भी पीयी। शरीर में तो शराब गयी, और चेतना में शराब का कोई संस्पर्श न हुआ।
तो तंत्र कहता है, चेतना को मुक्त करो, शराब को जाने दो शरीर में, लेकिन चेतना को अछूता रहने दो।
यह कठिन है। लंबी साधना की बात है। और सबके लिए शायद संभव भी नहीं, हालांकि सब करना चाहेंगे। लेकिन तंत्र का सूत्र पूरा करना कठिन है, क्योंकि तंत्र का सूत्र यह है कि होश न खो जाये, तो शराब पीयो।
महावीर कहते हैं, अगर होश खोता हो, तो बेहतर है, पीयो ही मत। लेकिन दोनों एक बात में राजी हैं कि होश नहीं खोना चाहिए। महावीर कहते हैं, पीयो ही मत, कहीं होश न खो जाये। तंत्र कहता है, पीयो और होश को बढ़ाओ।
यह सभी बातों के संबंध में है।
महावीर कहते हैं, मांस नहीं। तंत्र कहता है, मांस का भी प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन तंत्र कहता है, चाहे सब्जी खाओ, चाहे मांस खाओ, भीतर मन में कोई भेद न पड़े। यह बहुत कठिन बात है।
तंत्र कहता है कि अभेद को पाना है, अद्वैत को पाना है तो कोई भेद न पड़े। मांस खाओ तो, सब्जी लो तो, कोई भेद भीतर न पड़े। अगर भेद पड़ गया, तो मांस खाना खतरनाक हो गया। अगर भेद न पड़े भीतर कोई—जहर भी पिया या अमृत भी— भीतर कोई भेद न पड़े। भीतर अनासक्त मन बना रहे, दोनों बराबर मालूम पड़े, तो तंत्र कहता है, तो फिर मांसाहार, मांसाहार नहीं है।
महावीर कहते हैं, यह कठिन है कि भेद न पड़े। जिनके जीवन में हर चीज में भेद है, वह कितना ही कहे कि सोना हमारे लिए मिट्टी है, फिर भी सोना सोना है और मिट्टी मिट्टी है। जिनके जीवन में हर चीज में भेद है, जो इंचभर बिना भेद के नहीं चलते, वह मदिरा और मांस लेकर पानी जैसे पी जायेंगे, इसकी आशा करनी कठिन है। तो महावीर कहते हैं, जहां से गिर जाने का ड़र हो वहां गति मत करो। इसलिए पूरी प्रक्रिया का रूप बदल जायेगा।
'जो मनुष्य काम और भोगों के रस को जानता है, उनका अनुभवी है, उसके लिए अब्रह्मचर्य त्याग कर ब्रह्मचर्य के महाव्रत को धारण करना अत्यंत दुष्कर है।
आदत को तोड़ना अत्यंत दुष्कर है, और आप सब जानते हैं कि काम की आदत गहनतम आदत है। एक आदमी सिगरेट पीता है, उसे छोड़ना मुश्किल है। हालांकि पीनेवाले सभी यह सोचते हैं कि जब चाहें, तब छोड़ दें। पीनेवाले कभी यह नहीं सोचते कि हम कोई अडिक्टेड़ हैं, या हम कोई उसके गुलाम हो गये।
मुल्ला नसरुद्दीन को उसके डाक्टर ने कहां कि अब तुम शराब बंद कर दो, क्योंकि शराब से अडिक्टान पैदा होता है। आदमी गुलाम हो जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहां कि रहने दो, चालीस साल से पी रहा हूं अभी तक अडिक्टेड़ नहीं हुआ, अब क्या खाक होऊंगा ! अनुभव से कहता हूं कि चालीस साल से रोज पी रहा हूं अभी तक अडिक्टेड़ नहीं हुआ।
आप जो भी करते हैं, सोचते हैं, जब चाहें तब छोड़ दें, इतना आसान नहीं है। जरा—सी आदत भी छोड़नी आसान नहीं। आदत बड़ी वजनी है। आपकी आत्मा आदत से बहुत कमजोर है। एक छोटी—सी आदत छोड़ना चाहें, तब आपक़ो पता चलेगा कि कितना मुश्किल है, लेकिन काम तो गहनतम आदत है, क्योंकि बायोलाजिकल है, जैविक है।
गहनतम आपके प्राणों में काम की ऊर्जा छिपी है, क्योंकि आदमी का जन्म होता है काम से, उसका रोआं—रोआं निर्मित होता है काम से, उसका एक—एक कोष्ठ पैदा होता है काम के कोष्ठ से।
आप काम का ही विस्तार हैं। आप हैं इसलिए जगत में कि आपके माता—पिता, उनके पिता, उनकी मां करोड़ों—करोड़ों वर्ष से काम ऊर्जा को फैला रहे हैं। आप उसका एक हिस्सा हैं। आपके माता—पिता की कामवासना का आप फल हैं।
इस फल के रोयें—रोयें में, कण—कण में कामवासना छिपी है। और सब आदतें ऊपरी हैं। कामवासना गहनतम आदत है। इसलिए महावीर कहते हैं, अगर आदत निर्मित होनी शुरू हो जाए तो अत्यंत दुष्कर है। फिर अब्रह्मचर्य का त्याग करके ब्रह्मचर्य में प्रवेश करना अत्यंत दुष्कर है।
असंभव वे नहीं कहते, इसलिए तंत्र का पूर्ण निषेध नहीं है। दुष्कर कहते हैं। और निश्‍चित ही, जिनको सिगरेट पीना छोड़ना मुश्किल हो, उनके लिए महावीर ठीक ही कहते हैं। जो सिगरेट भी न छोड़ सकते हों, वे सोचते हों कि काम के अनुभव को छोड़ देंगे, तो वे आत्महत्या में लगे हैं। उनके लिए यह संभव नहीं होगा।
इसलिए तंत्र की भी शर्तें भी बड़ी अजीब हैं। तत्र पहले और सब तरह की आदतें तुड़वाता है, और जब निश्‍चित हो जाता है तांत्रिक गुरु कि सब तरह की आदतें टूट गयीं तब, तब वह इन गहन प्रयोगों के लिए आज्ञा देता है।
तंत्र की शर्तें कठोर हैं। तंत्र मानता है, जब तक प्रत्येक सी में मां का दर्शन न होने लगे, न केवल मां का, बल्कि जब तक प्रत्येक सी में तारा का, दुर्गा का, देवी का, भगवती का, परम मां का, जगत जननी का स्मरण न होने लगे, तब तक तंत्र नहीं कहता कि संभोग के द्वारा समाधि उपलब्ध हो सकेगी।
तो तंत्र की प्राथमिक प्रक्रियाओं में सी में मां का दर्शन, परम जननी का दर्शन। इसके प्रयोग हैं। इसलिए सभी तांत्रिक ईश्वर को मां के रूप में देखते हैं, पिता के रूप में नहीं। और जब मां दिखायी पड़ने लगे प्रत्येक सी में, तभी तंत्र का प्रयोग किया जा सकता है।
और तंत्र के प्रयोग की जो पूरी आयोजना है, वह अति कठिन है। अति कठिन इसलिए है कि पहले सी को तिरोहित करना होता है। वह समाप्त हो जाये, विलीन हो जाये, सी मौजूद न रहे, और तब ही उसके साथ संभोग में परम पवित्र भाव से प्रवेश करना होता है। अगर क्षण भर को भी वासना आ जाये, तो तंत्र का प्रयोग असफल हो जाता है। लेकिन वह दूभर है। महावीर कहते हैं, दुष्कर है। आसान आदमी के लिए यही है कि वह जिससे मुक्त होना चाहता हो, उसकी आदत निर्मित न करे।
यह आसान क्यों है? क्योंकि जब ऊर्जा भीतर भरती है तो बहना चाहती है। ऊर्जा का लक्षण है बहना। जैसे नदी बहती है सागर की तरफ, ऐसे ऊर्जा भी किसी से मिलने के लिए बहती है।
ये मिलन दो तरह के हो सकते हैं। यह मिलन या तो अपने से बाहर घटित होगा कि किसी पुरुष का सी से, किसी स्‍त्री का पुरुष से। यह एक बहाव है। एक और बहाव है भीतर की तरफ, अपने से ही मिलने का। यह जो आंतरिक बहाव है, अगर बाहर बहने की आदत न हो तो शक्ति खुद इतनी भर जायेगी कि वह भीतर के द्वार खटखटाने लगेगी और भीतर बढ़ना शुरू हो जायेगी।
ब्रह्मचर्य पर इतना जोर इसी कारण है। इस कारण कि शक्ति इतनी होनी चाहिए कि वह शक्ति खुद भी मार्ग खोजने लगे, और नीचे की कोई आदत न हो, बाहर की कोई आदत न हो,दूसरे के प्रति बहने की कोई आदत न हो, तो मार्ग न मिले। और जब मार्ग नहीं मिलता और शक्ति बढ़ती चली जाती है और बांध तोड़ना चाहती है, तब साधक आसानी से भीतर जानेवाला मार्ग खोल सकता है। शक्ति खुद ही सहयोगी हो जाती है, खोलने के लिए।
इसलिए महावीर कहते हैं, 'निर्ग्रंथ मुनि अब्रह्मचर्य अर्थात मैथुन संसर्ग का त्याग करते हैं। क्योंकि यह अधर्म का मूल ही नहीं, अपितु बड़े से बड़े दोषों का भी स्थान है।
अगर ऊर्जा बाहर की तरफ बहती है, तो समस्त अधर्म का मूल है। क्योंकि धर्म की परिभाषा हमने की है, स्वभाव। धर्म का अर्थ हुआ, अपने को पा लेना। अधर्म का फिर अर्थ हुआ, अपने से बाहर किसी को पाने की कोशिश, दी अदर, दूसरे को पाने की कोशिश। धर्म का अर्थ है, स्वयं को पाना; तो अधर्म का अर्थ हुआ, पर को पाना। इसलिए कामवासना से ज्यादा अधर्म कुछ भी नहीं हो सकता। क्योंकि कामवासना का अर्थ ही है, दूसरे की खोज। धर्म का अर्थ है, अपनी खोज।
तो महावीर कहते हैं, ' अधर्म का मूल है, और बड़े से बड़े दोषों का स्थान भी।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
हमारे जीवन में जितने दोष पैदा होते हैं, उनमें निन्यानबे प्रतिशत कामवासना से संबंधित होते हैं। आदमी अगर धन इकट्ठा करने के लिए पागल हो जाता है, तो उसे चाहे पता हो न पता हो, आदमी धन इसलिए पाना चाहता है कि अंततः धन से कामवासना पायी जा सकती है। आदमी पद पाना चाहता है, यश पाना चाहता है अंतत: इसीलिए कि उससे कामवासना ज्यादा सुगमता से पूरी की जा सकती है। आदमी जीवन में और जो—जो करने निकल पड़ता है उस सब के पीछे गहन में कामवासना छिपी होती है। यह दूसरी बात है कि वह पूरा न कर पाये। वह साधन को ही पूरा करने में लगा रहे और साध्य तक न पहुंच पाये। यह दूसरी बात है। लेकिन गहन में साध्य एक ही होता है।
क्यों ऐसा है? क्योंकि आदमी कामवासना का विस्तार है और आदमी के भीतर मैंने कहां, दो भूखे हैं, आप जब भोजन करते हैं तो यह आपके जीवन की सुरक्षा है, और जब आप यौन में उतरते हैं तो यह जाति के जीवन की सुरक्षा है। वह भी एक भोजन है।
आप अगर भोजन करना बंद कर दें, तो आप मरेंगे। अगर आप कामवासना बंद कर दें, तो आप जाति को मारने का कारण बनते हैं। इसलिए जर्मनी के बड़े प्रसिद्ध विचारक इमेनुअल काट ने तो ब्रह्मचर्य को अनीति कहां है। और उसके कारण हैं कहने के, उसका कहना यह है कि अगर सारे लोग ब्रह्मचर्य का पालन करें तो जीवन तिरोहित हो जायेगा। और काट कहता है, नीति का यह नियम है, ऐसा नियम, जिसका सब लोगों पालन कर सकें। जिसका सब लोगों पालन न कर सकें और अगर सब लोग पालन करें, तो जीवन जो कि नीति का आधार है, संभावना है, वही तिरोहित हो जाये, तो वह अनीति है।
फिर तो ब्रह्मचर्य भी नहीं पाला जा सकता। अगर जीवन तिरोहित हो जाये, तो जो नियम की पूर्णता स्वयं ही नियम को नष्ट कर देती हो, वह नियम नैतिक नहीं है। एक अर्थ में ठीक है। आप किसी को मारते हैं, यह हिंसा है। आप अगर कामवासना को रोक लेते हैं तो भी आप उनकी हिंसा कर रहे हैं, जो इस कामवासना से पैदा हो सकते थे।
कांट के हिसाब से ब्रह्मचर्य हिंसा है। जो हो सकते थे, जो जन्म ले सकते थे उनको आप रोक रहे हैं। तो कांट कहता है, कोई आदमी अगर भूखा रहे तो यह उतना बड़ा पाप नहीं है, क्योंकि वह अपने लिए कुछ.. अपने ऊपर कुछ कर रहा है। ठीक है, स्वतंत्र है। लेकिन कोई आदमी ब्रह्मचारी रहे तो खतरनाक है, क्योंकि इसका. इसका अर्थ हुआ कि वह जाति को नष्ट करने का उपाय कर रहा है। लेकिन कांट की सोचने की एक सीमा है। इस जीवन के अलावा कांट के लिए और कोई जीवन नहीं है। इस जीवन के पार और कोई रहस्य का लोक नहीं है।
महावीर कहते हैं कि जो ऊर्जा इस जगत में प्राणियों को जन्म देने के काम आती है वही ऊर्जा स्वयं को उस जगत में जन्म देने के काम आती है। ऊर्जा वही है— आत्म जन्म, खुद का ही पुनर्जन्म, उसके ही लिए काम आती है।
तो महावीर के तर्क अलग हैं। महावीर कहते हैं— और अब तो विज्ञान समर्थन देता है, एक संभोग में कोई दस करोड़ सेल, वीर्याणु छूटते हैं— तो महावीर कहते हैं, एक संभोग में दस करोड़ जीवन छूटते हैं, दो घंटे के भीतर वे सब मर जाते हैं। तो प्रत्येक संभोग में दस करोड़ जीवन की हत्या का पाप है। और एक आदमी अगर अपने जीवन में संयमपूर्वक संभोग करे तो चार हजार संभोग कर सकता है। चार हजार संभोग में, प्रति संभोग में दस करोड़ जीवाणु नष्ट होते हैं। तो आप गणित को फैला दें। अगर आपके दस—पांच बच्चे पैदा भी हो जाते हैं तो अरबों खरबों जीवन की हत्या पर।
जीवन बड़ा अदभुत है। दस करोड़ जीवाणु छूटते हैं संभोग में और उनमें संघर्ष शुरू हो जाता है उसी वक्त। बाजार में ही प्रतियोगिता नहीं है, दिल्ली में ही प्रतियोगिता नहीं है। जैसे ही दस करोड़ ये जीवाणु खी योनि में मुक्त होते हैं, इनमें संघर्ष शुरू हो जाता है। ये दस करोड़ लड़ने लगते हैं आपस में कि कौन आगे निकल जाये। क्योंकि एक ही सी अंडे तक पहुंच सकता है। वे जो ओलंपिक में दौड़े होती हैं वे कुछ भी नहीं हैं। बड़ी से बड़ी दौड़, जिसका आपको पता भी नहीं चलता, जिस पर सारा जीवन निर्भर होता है, वह बड़े अज्ञात में होती है। ये दस करोड़ धावक दौड़ पड़ते हैं। इनमें से एक पहुंच पाता है। बाकी सब मर जाते हैं रास्ते में और वह एक भी सदा नहीं पहुंच पाता।
जितनी जमीन की संख्या है इस वक्त, इतनी संख्या एक आदमी पैदा कर सकता है। साढ़े तीन अरब लोग हैं। एक—एक आदमी के पास उसके वीर्य में इतने जीवाणु हैं कि साढ़े तीन अरब लोग पैदा कर दें। एक आदमी एक जीवन में इतनी हत्याएं करता है। ये सब मर जाते हैं, ये बच नहीं सकते।
महावीर का हिसाब यह है कि यह बड़ी हिंसा है इसलिये अब महावीर अब्रह्मचर्य को हिंसा कहते हैं। यह बड़ी भारी महान हिंसा है क्योंकि इतने प्राण! यह सारी की सारी ऊर्जा रूपांतरित हो सकती है और इस सारी ऊर्जा के आधार पर स्वयं का नव—जन्म हो सकता है।
फिर महावीर यह भी नहीं मानते कि इस जगत का होना कोई अनिवार्यता है। यह न हो तो कुछ हर्जा नहीं है। क्योंकि इसके होने से सिवाय हर्जे के और कुछ भी नहीं होता। यह पृथ्वी खाली हो तो हर्जा क्या है? आप न हुए तो ऐसा क्या बिगड़ जाता है? फूल ऐसे ही खिलेंगे, चांद ऐसा ही निकलेगा, समुद्र ऐसी ही दहाड़ मारेगा, हवाएं इतनी ही ज्ञान से बहेंगी, सिर्फ बीच में आपके मकानों की बाधा न होगाई। आपके होने न होने से फर्क पड़ता है? आप नहीं हुए तो क्या होता है? आपके होने से जमीन सिर्फ एक नरक बन जाती है।
महावीर कहते हैं, यह जो चेतना रोज—रोज शरीर में उतरती है, उपद्रव ही पैदा करती है। इसे शरीर से मुक्त करना है और किसी दूसरे लोक में इसको जन्म देना है, जहां कोई संघर्ष नहीं है। मोक्ष और संसार में इतना ही अर्थ है।
संसार में हर चीज संघर्ष है, हर चीज, चाहे आपको पता चलता हो या न पता चलता हो। यहां एक आस भी मैं लेता हूं तो किसी की श्वास छीनकर लेता हूं। यहां मैं जीता हूं तो किसी को मार कर जीता हूं। यहां होने का अर्थ ही किसी को मिटाना है। यहां कोई उपाय ही नहीं है, यहा जीवन मौत से ही चलता है। यहां हिंसा भोजन है। चाहे कोई मांस खाता हो या न खाता हो, पशु—पक्षी मारता हो न मारता हो; लेकिन कुछ भी खाता हो, सब भोजन हिंसा है। हिंसा से बचा नहीं जा सकता। कोई उपाय नहीं है।
तो महावीर कहते हैं, एक ऐसा लोक भी है चेतना का, जहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, जहां कोई संघर्ष नहीं है। ध्यान रहे, सारा संघर्ष शरीर के कारण है। आत्मा के कारण कोई भी संघर्ष नहीं है। इस पृथ्वी पर भी जो लोग आत्मा को पाने में लगते हैं, उनका किसी से कोई संघर्ष नहीं है।
अगर मैं धन पा रहा हूं तो किसी का छीनूंगा। अगर मैं सौदर्य की खोज कर रहा हूं तो किसी न किसी को कुरूप कर दूंगा। मैं कुछ भी कर रहा हूं बाहर के जगत में कोई न कोई छिनेगा, कोई न कोई पीछे पड़ेगा। लेकिन अगर मैं ध्यान कर रहा हूं अगर मैं भीतर शांत होने की कोशिश कर रहा हूं अगर मैं भीतर एक अंतर्यात्रा पर जा रहा हूं मौन, होश खोज रहा हूं तो मैं किसी से कुछ भी नहीं छीन रहा हूं। मुझसे किसी को कोई नुकसान नहीं होता, मुझसे किसी को लाभ हो सकता है।
महावीर के होने से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ, लाभ बहुत हुआ है। लेकिन संसार में, जितना बड़ा आदमी हो, उतना ज्यादा नुकसान पहुंचानेवाला होता है। वह बड़ा किसी भी दिशा में हो। उसका बड़प्पन ही निर्भर होता है दूसरे से छीनने पर।
संसार में छीना—झपटी नियम है, क्योंकि शरीर छीना—झपटी का प्रारंभ है। वह मां के गर्भ से ही शुरू हो जाती है, छीना—झपटी। वह फिर जीवनभर चलती जाती है।
मोक्ष का अर्थ है, जहां शुद्ध है चेतना, शरीर से मुक्त। जहां कोई संघर्ष नहीं है। जहां होना, दूसरे की हत्या और हिंसा पर निर्भर नहीं है।
तो महावीर कहते हैं, इस ऊर्जा का उपयोग उस जगत में प्रवेश के लिए है। यह प्रवेश दूसरे की तरफ दौड़ने से कभी भी न होगा। और कामवासना दूसरे की तरफ दौड़ती है। कामवासना दूसरे से बांधती है, और कामवासना दूसरे पर निर्भर करा देती है। इसलिए कामवासना से जुड़े हुए व्यक्तियों में सदा कलह बनी रहेगी। कलह का मतलब केवल इतना ही है, कि कोई भी आदमी गुलाम नहीं होना चाहता। और कामवासना गुलाम बना देती है।
आप किसी को प्रेम करते हैं, तो आप उस पर निर्भर हो जाते हैं। उसके बिना आपको सुख, संतोष, क्षणभर के लिए जो झलक मिलती हो वह नहीं मिल सकती। वह उसके हाथ में है, चाबी उसके हाथ में है, और उसकी चाबी आपके हाथ में हो जाती है। चाबियां बदल जाती हैं। पत्नी की चाबी पति के हाथ में, पति की चाबी पत्नी के हाथ में। निश्‍चित ही गुलामी अनुभव होनी शुरू हो जाती है। जिसके कारण हमें सुख मिलता है, उसके हम गुलाम हो जाते हैं और जिसके कारण हमें दुख मिल सकता है, उसके कारण भी हम गुलाम हो जाते हैं। फिर गुलामी के प्रति विद्रोह चलता है।
अभी एक बहुत विचारशील मनोवैज्ञानिक ने एक किताब लिखी है—दी इंटीमेट एगइनमी। वह पति—पली के संबंध में किताब है— आंतरिक शत्रु। आंतरिकता भी बनी रहती है, शत्रुता भी चलती रहती है। शत्रुता अनिवार्य है। पति—पत्नी के बीच मित्रता आकस्मिक है, शत्रुता अनिवार्य है। मित्रता सिर्फ इसलिए है ताकि शत्रुता टूट ही न जाये, जुड़ी रहे। बनी रहे, चलती रहे। जब टूटने के करीब आ जाती है, तो मित्रता है। फिर मित्रता जमा देती है उखड़ा रूप। फिर शत्रुता शुरू हो जाती हैं। शत्रुता अनिवार्य है। उसका कारण है, क्योंकि जिसके प्रति हम निर्भर हो जाते हैं, उसके प्रति दुर्भाव शुरू हो जाता है। उससे बदला लेने का मन हो जाता है, वह दुश्मन हो जाता है।
महावीर कहते हैं कि जब तक हम दूसरे के प्रति बह रहे हैं, तब तक हम गुलाम रहेंगे। कामवासना सबसे बड़ी गुलामी है। इसलिए ब्रह्मचर्य को सबसे बड़ी स्वतंत्रता कहां है और इसलिए ब्रह्मचर्य को मोक्ष का अनिवार्य हिस्सा मान लिया महावीर ने।
'जो मनुष्य अपना चित्त शुद्ध करने, स्वरूप की खोज करने के लिए तत्‍पर है, उसके लिए देह का शृंगार, स्रियों का संसर्ग, और स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन का सेवन विष जैसा है।
जिसे अपना चित्त शुद्ध करना हो, जिसे स्वरूप की उपलब्धि करनी हो, क्यों उसके लिए देह का शृंगार, क्यों उसके लिए स्‍त्री का संसर्ग या पुरुष का संसर्ग, और स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन विष जैसा है? क्यों?
इसके कारण हम ठीक से ध्यान में ले लें।
देह का शृंगार हम करते ही इसलिए हैं कि हमारी उत्सुकता किसी और में है। देह का शृंगार कोई अपने लिए नहीं करता, सदा दूसरे के लिए करता है। जिसके प्रति हम आश्वस्त हो जाते हैं, उसके लिए फिर हम देह का शृंगार नहीं करते। इसलिए दूसरों की पत्नियां ज्यादा सुंदर मालूम पड़ती है, अपनी पत्‍नियां उतनी सुंदर नहीं मालूम पड़ती। क्योंकि पत्नियां आश्वस्त हो जाती हैं पति के प्रति। अब रोज—रोज शृंगार करने की कोई जरूरत नहीं। जिसको जीत ही लिया, अब उसकी जीतने का रोज—रोज क्या कारण है? तो पति उनकी असली शक्ल देखता है। उससे वह ऊब जाता है। पड़ोसी उनकी नकली शक्ल देखते हैं, जो बाहर तैयार होकर आती हैं; इसलिए पड़ोसी उनमें रस लेते मालूम पड़ते हैं।
पश्चिम में मनोवैज्ञानिक समझाते हैं सी को, अगर पति को सदा ही अपने में उत्सुक रखना हो तो सदा ही वह रोज—रोज जीते, इसके उपाय करते रहना चाहिए। जीत निशित न हो जाये क्योंकि जीत जब निश्‍चित हो जाती है, तो पुरुष का रस खो जाता है। पुरुष जीत में उत्सुक है। दूसरे की पली कम सुंदर भी हो, तो भी ज्यादा आकर्षक मालूम हो सकती है। क्योंकि आकर्षण जीत में है। जितना दुरुह हो जाये, उतना मुश्‍किल मालूम पड़ने लगता है। जितना मुश्किल मालूम पड़ने लगे, उतनी चुनौती मिलती है।
शृंगार हम करते ही दूसरों के लिए हैं, अपने लिए नहीं। अगर आपको अकेले जंगल में छोड़ दिया जाये, तो आप सोचें कि आप क्या करेंगे? आप शृंगार नहीं करेंगे और भला कुछ भी करें। सजाके नहीं, क्योंकि सजाने का मतलब है, किसके लिए?
इसलिए हमने इंतजाम कर रखा था, पति मर जाये तो फिर हम विधवा सी को सजने नहीं देते, क्योंकि हम उससे पूछते हैं कि किसके लिए? वह अगर अपने लिए ही सज रही थी, तो विधवा को भी सजने में क्या हर्ज है? वह पति के लिए सज रही थी। अब चूंकि पति नहीं है, इसलिए किसके लिए? और अगर विधवा को हम सजते देखें, तो शक पैदा होता है कि उसने कहीं न कहीं पति की तलाश शुरू कर दी है; इसलिए हम उसको सजने नहीं देते। उसको हम सब तरफ से कुरूप करने की कोशिश करते हैं।
बड़े मजे की बात है कि क्या सौदर्य दूसरे के लिए है? असल में सौंदर्य एक फंदा है, एक जाल है जिसमें हम किसी को फंसाना चाहते है।
महावीर कहते हैं, जब दूसरे में उत्सुकता ही नहीं तो शृंगार का क्या प्रयोजन? इसलिए महावीर ने कहां, तुम जैसे हो, अपने लिए अगर तुम पृथ्वी पर अकेले होते तो वैसे ही रहो। इसलिए महावीर नग्‍न हो गये। इसलिए महावीर ने शरीर की सजावट छोड़ दी। इसका यह मतलब नहीं है कि महावीर शरीर के शत्रु हो गये। न। इसका यह भी मतलब नहीं कि महावीर ने अपने शरीर को कुरूप कर लिया, क्योंकि वह तो दूसरी अतिशयोक्ति होती।
सौदर्य भी अगर हम निर्माण करते हैं, तो दूसरे के लिए, कुरूपता भी अगर निर्माण करते हैं, तो दूसरे के लिए। जिस दिन पत्नी नाराज हो उस दिन वह पति के सामने सब तरह से कुरूप रहेगी, सजेगी नहीं। यह भी दूसरे के लिए। अगर सजने से सुख देने का उपाय था, तो कुरूप रहकर दुख देने का उपाय है।
महावीर ने दूसरे का खयाल छोड़ दिया। अपने लिए जैसा जी सकते थे वैसा जीने लगे। इससे वे कुरूप नहीं हो गये, बल्कि सही अर्थों में पहली दफा एक सौंदर्य निखरा, जो दूसरे के लिए नहीं था, जो अपने ही भीतर से आ रहा था, जो अपने ही लिए था, जो स्वभाव था।
शृंगार झूठ है, और इसलिए शृंगार में छिपा हुआ सौदर्य एक धोखा है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि शृंगार की चेष्टा वह जो वास्तविक सौंदर्य होना चाहिए था, उसकी कमी की पूर्ति है। इसलिए जितनी सुंदर सी होगी, उतना कम शृंगार करेगी। जितनी कुरूप स्‍त्री होगी, उतना ज्यादा शृंगार करेगी। कुरूप समाज सब तरह से आभूषणों से लद जायेगा। सुंदर समाज आभूषणों को छोड़ देगा। हम कमी पूर्ति कर रहे हैं, लेकिन दृष्टि दूसरे पर है —दृष्टि सदा दूसरे पर है।
पुरुष क्यों इतना शृंगार नहीं करता? पुरुष कुछ और करता है क्योंकि स्त्रियां सौंदर्य में कम उत्सुक हैं, शक्ति में ज्यादा उत्सुक हैं। पुरुष शक्ति में कम उत्सुक हैं सौंदर्य में ज्यादा उत्सुक हैं, इसलिए स्त्रियां पूरी जिंदगी शृंगार में बिताती हैं। पुरुष शृंगार की फिक्र नहीं करता। उसका कारण है। उसका कारण इतना है कि पुरुष के लिए शक्ति अगर हो उसके पास, तो वही सी की उत्सुकता का कारण है। कितना धन उसके पास है, कितना बलिष्ठ शरीर उसके पास है, यह सी के लिए मूल्यवान है।
सी के मन में सौदर्य का अर्थ शक्ति है। पुरुष के मन में सौदर्य का अर्थ कमनीयता है, कोमलता है, शक्ति नहीं। पर पुरुष शक्ति को बढ़ाने में लगा रहता है, जिस चीज से भी शक्ति मिलती है, धन से मिलती है, यश से मिलती है, तो धन की दौड़ करता है, यश की दौड़ करता है। मगर वह भी दूसरे के लिए है।
महावीर कहते हैं, यह दूसरे के लिए होना, यही संसार है। अपने लिए हो जाना मुक्ति है। यह जो दूसरे के लिए होने की चेष्टा है इसमें शृंगार भी होगा, स्त्रियों का संसर्ग भी होगा—स्‍त्री से या पुरुष से मतलब नहीं है—विपरीत यौन से। विपरीत यौन के पास रहने की आकांक्षा होगी। क्योंकि जब भी विपरीत यौन पास होगा, तभी आपको लगेगा, आप हैं। और जब वह पास नहीं होगा तभी आप उदास हो जायेंगे, लगेगा आप नहीं हैं।
तो देखें, अगर बीस पुरुष बैठे हों, उनमें चर्चा चल रही हो और फिर एक सुंदर सी उस कमरे में आ जाये, तो कमरे की रौनक बदल जाती है। चेहरे बदल जाते है, चर्चा में हल्कापन आ जाता है, भारीपन मिट जाता है, विवाद की जगह ज्यादा संवाद मालूम पड़ने लगता है। क्यों? बीस ही पुरुष, सी के आते अनुभव पहली दफा करते हैं कि वे पुरुष हैं। वह सी की जो मौजूदगी है वह उनके पुरुष के प्रति सचेतना बन जाती है। उनकी रीढ़ें सीधी हो जायेंगी, वे ठीक संभल कर बैठ जायेंगे, टाई ठीक कर लेंगे, कपड़े वगैरह सब सुधार लेंगे। विपरीत मौजूद हो गया, आकर्षण शुरू हो गया।
विपरीत का आकर्षण है। इसलिए पुरुषों के अगर क्लब हों, तो उदास होंगे, अकेले पुरुषों के क्लब बिलकुल उदास होंगे। वहा कोई रौनक न होगी। अकेली स्त्रियों की भी अगर बैठक हो तो थोड़ी बहुत देर में, जो स्त्रियां मौजूद नहीं हैं, जब उनकी निंदा चुक जायेगी, तो सब फालतू मालूम पड़ने लगेगा।
दो स्रियों में मित्रता भी मुश्किल है। मित्रता का एक ही कारण हो सकता है कि अगर कोई तीसरी सी दोनों की शत्रु हो तो—कोई उपाय नहीं है। पुरुषों में मित्रता हो जाती है, क्योंकि उनके बहुत शत्रु हैं चारों तरफ। मित्रता बनाते ही हम इसलिए हैं कि शत्रु के खिलाफ लड़ना है। स्त्रियों में कोई मैत्री नहीं बन सकती है। और उनकी अगर बैठक हो तो उसमें चर्चा योग्य भी कुछ नहीं हो सकता, सब छिछला होगा। लेकिन एक पुरुष को प्रवेश करा दें और सारी स्थिति बदल जायेगी।
यह अचेतन सब होता है। यह अचेतन सब होता है, इसके लिए चेतन रूप से आपको कुछ करना नहीं होता है। आपकी ऊर्जा ही करती है।
दूसरे की हम तलाश करते हैं, ताकि हम अपने को अनुभव कर सकें। विपरीत को हम खोजते हैं, ताकि हमें अपना पता चल सके।
इसलिए महावीर कहते हैं, विपरीत का संसर्ग—जिसे ब्रह्मचर्य साधना है, जिसे स्वरूप की तलाश करनी है उसे छोड़ देना चाहिए। खयाल ही विपरीत का छोड़ देना चाहिए। क्योंकि आत्मा विपरीत से नहीं जानी जा सकती, केवल शरीर विपरीत से जाना जा सकता है।
शरीर के तल पर आप स्‍त्री हैं, पुरुष है। आत्मा के तल पर आप न सी हैं, न पुरुष हैं। अगर आत्मा को खोजना है, तो विपरीत का कोई उपयोग नहीं है। अगर शरीर की ही खोज जारी रखनी है, तो विपरीत के बिना कोई उपयोग नहीं है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि कभी न कभी सी और पुरुष अलग—अलग नहीं थे। बाइबिल की कहांनी बड़ी सच मालूम पड़ती है। बाइबिल में कहांनी है कि ईश्वर अकेला रहते—रहते ऊब गया, अकेला— अकेला रहे तो कोई भी ऊब जाये। उसने आदम को पैदा किया। फिर आदम अकेला ऊबने लगा, तो उसकी पसली निकाल कर उसने हब्बा, ईव को पैदा किया, सी को पैदा किया।
कीर्कगार्ड ने बड़ा गहरा मजाक किया है। उसने कहां, पहले ईश्वर अकेला ऊब रहा था। फिर उसने आदम को पैदा किया। फिर आदम और ईश्वर ऊबने लगा। फिर उसने आदम की हड्डी से ईव को पैदा किया। फिर ईव अबेल आदम ऊबने लगे, उन्होंने बच्चे पैदा किये—केन और अबेल को पैदा किया। फिर केन, अबेल, आदम, ईव, ईश्वर, सब ऊबने लगे। पूरा परिवार ऊबने लगा। तो फिर उन्होंने पूरा संसार पैदा किया, और अब पूरा संसार ऊब रहा है।
लेकिन बाइबिल की कहांनी कहती है कि आदम की हड्डी से ईश्वर ने ईव को पैदा किया। यह बात अब तक तो मिथ, पुराण कल्पना थी; लेकिन विज्ञान की खोजों ने सिद्ध किया कि इसमें एक सच्चाई है।
जैसे हम पीछे लौटते हैं जीवन में तो अमीबा, जो पहला जीवन का अंकुरण है पृथ्वी पर, उसमें सी और पुरुष एक साथ हैं। उसका शरीर दोनों का है। उसको पत्नी खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता। उसकी पत्नी उसके साथ ही जुड़ी है, वह पति पत्नी एक है। वह पहला रूप है अमीबा। फिर बाद में, बहुत बाद में अमीबा टूटा और उसके दो हिस्से हुए।
इसलिए स्‍त्री पुरुष में इतना आकर्षण है, क्योंकि बायोलाजी के हिसाब से वे एक बड़े शरीर के दो टूटे हुए हिस्से हैं, इसलिए वे पास आना चाहते हैं। निकट आना चाहते हैं, जुड़ना चाहते हैं फिर से। संभोग उनकी जुड्ने की कोशिश है। इस कोशिश में उन्हें जो क्षणभर का मेल मालूम पड़ता है, वही उनका सुख है। यह जो जुड्ने की कोशिश है, शरीर के तल पर अर्थपूर्ण है क्योंकि आधे— आधे हैं दोनों, और दोनों को अधूरापन लगता है। पर आत्मा के तल पर न कोई पुरुष है, न कोई सी है।
इसलिए महावीर कहते हैं, जो स्वरूप को खोज रहा हो, शरीर को नहीं, उसके लिए विपरीत के संसर्ग की सार्थकता तो है ही नहीं, खतरा भी है। क्योंकि जैसे ही विपरीत मौजूद होगा, उसका शरीर प्रभावित होना शुरू हो जायेगा। वह कितना ही अपने को रोके, उसके शरीर के अणु विपरीत के प्रति खिंचने लगेंगे। यह खिंचाव वैसा ही है जैसे हम चुंबक को रख दें और लोहे के कण उसकी तरफ खिंच आयें।
जैसे ही पुरुष मौजूद होगा, सी मौजूद होगी, दोनों के शरीरों के कण का रुख आकर्षण का हो जाता है; वे एक दूसरे के करीब आने को उत्सुक हो जाते हैं। आपकी इच्छा और अनिच्छा का सवाल नहीं है। आपकी बायोलाजी, आपके शरीर का ढांचा, आपकी बनावट, आपका होना ऐसा है कि स्त्री और पुरुष के करीब होते ही तत्काल खिंचाव शुरू हो जाता है। उस खिंचाव को आप रोकते हैं, क्योंकि वह मेरी पत्नी नहीं है, वह मेरा पति नहीं है, आप उसको रोकते हैं। वह सभ्यता है, संस्कृति है, नियम है, लेकिन खिंचाव शुरू हो जाता है। वह खिंचाव आपको आत्मा के तल पर जाने से रोकेगा। आपकी ऊर्जा नीचे की तरफ बहने लगेगी।
इसलिए महावीर कहते हैं, यह संसर्ग खतरनाक है ब्रह्मचर्य के साधक को। स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन भी, वे कहते हैं, खतरनाक है। विष जैसा है, क्यों? क्योंकि आपकी जो भी वीर्य ऊर्जा है, वह आपके पौष्टिक भोजन से निर्मित होती है। आपकी जो भी कामवासना है वह पौष्टिक भोजन से निर्मित होती है।
तो महावीर कहते हैं, इतना भोजन लो, जिससे शरीर चल जाता हो, बस। इससे ज्यादा भोजन, जो अतिरिक्त शक्ति देगा, वह कामवासना बनती है। तो महावीर कहते हैं, यह जो अतिरिक्त भोजन है, यह तुम्हें नहीं मिलता, तुम्हारी कामवासना को मिलता है।
इस थोड़ी बात को हम समझ लें।
एक अनिवार्य शक्ति जरूरी है। चलने, उठने—बैठने, काम करने, बोलने इस सबके लिए एक खास केलरी की शक्ति जरूरी है। उतनी केलरी शरीर में लग जाती है। उसके अतिरिक्त जो आपके पास बचता है, वही आपकी कामवासना को मिलता है।
ध्यान रखें, हमारे पास जब भी कुछ अतिरिक्त बचता है—जब भी, शरीर में नहीं, बाहर भी— अगर आपके बैंक बैलेंस में आपके खर्च और व्यवस्था और जीवन की व्यवस्था को बचाकर कुछ बचता है, तो वह भोग और विलास में लगेगा। उसका कोई और उपयोग नहीं है।
अतिरिक्त हमेशा विलास है। इसलिए जिन समाजों के पास समृद्धि बढ़ेगी वे विलासी हो जायेंगे। यह बड़ी कठिनाई है।
गरीब की अपनी तकलीफें हैं, अमीर की अपनी तकलीफें हैं। गरीब की जीवन की जरूरतें पूरी नहीं हैं, इसलिए बेईमान हो जायेगा, चोर हो जायेगा, अपराधी हो जायेगा। अमीर के पास जरूरत से ज्यादा है, इसलिए विलासी हो जायेगा। संतुलन बड़ा मुश्किल है।
महावीर कहते हैं, संतुलन, सम्यक, उतना भोजन जितने से शरीर का काम चल जाता हो। उससे कम भी नहीं, उससे ज्यादा भी नहीं। महावीर का जोर सम्यक आहार पर है। इतना, कि जितने से काम चल जाता हो। लेकिन हम ज्यादा लिए चले जाते हैं। इसमें जो चीजें गिनायी हैं उन्होंने—दूध, मलाई, घी, मक्खन—यह थोड़ा सोचने जैसी है।
दूध असल में अत्याधिक कामोत्तेजक आहार है और मनुष्य को छोड़कर पृथ्वी पर कोई पशु इतना कामवासना से भरा हुआ नहीं है, और उसका एक कारण दूध है। क्योंकि कोई पशु बचपन के कुछ समय के बाद दूध नहीं पीता, सिर्फ आदमी को छोड़ कर। पशु को जरूरत भी नहीं है। शरीर का काम पूरा हो जाता है। सभी पशु दूध पीते हैं अपनी मां का, लेकिन दूसरों की माताओं का दूध सिर्फ आदमी पीता है, और वह भी आदमी की माताओं का नहीं, जानवरों की माताओं का भी पीता है।
दूध बड़ी अदभुत बात है, और आदमी की संस्कृति में दूध ने न मालूम क्या—क्या किया है, इसका हिसाब लगाना कठिन है। बच्चा एक उम्र तक दूध पीये, यह नैसर्गिक है। इसके बाद दूध समाप्त हो जाना चाहिए। सच तो यह है, जब तक मां के स्तन से बच्चे को दूध मिल सके, बस तब तक ठीक है। उसके बाद दूध की आवश्यकता नैसर्गिक नहीं है। बच्चे का शरीर बन गया, निर्माण हो गया —दूध की जरूरत थी, हड्डी थी, खून था, मांस बनाने के लिए—स्ट्रक्चर पूरा हो गया, ढांचा तैयार हो गया। अब सामान्य भोजन काफी होगा। अब भी अगर दूध दिया जाता है, तो यह सारा दूध कामवासना का निर्माण करता है। यह अतिरिक्त है। इसलिए वात्सायन ने काम सूत्र में कहां है कि हर संभोग के बाद पत्नी को अपने पति को दूध पिलाना चाहिए। ठीक कहां है।
दूध जिस बड़ी मात्रा में वीर्य बनाता है, और कोई चीज नहीं बनाती। क्योंकि दूध जिस बड़ी मात्रा में खून बनाता है और कोई चीज नहीं बनाती। खून बनता है, फिर खून से वीर्य बनता है। तो दूध से निर्मित जो भी है, वह कामोत्तेजक है। इसलिए महावीर ने कहां है, वह उपयोगी नहीं है। खतरनाक है, कम से कम ब्रह्मचर्य के साधक के लिए खतरनाक है। ठीक है, कामसूत्र में और महावीर की बात में कोई विरोध नहीं है। भोग के साधक के लिए सहयोगी है, तो योग के साधक के लिए अवरोध है। फिर पशुओं का दूध है वह। निशित ही पशुओं के लिए, उनके शरीर के लिए, उनकी वीर्य—ऊर्जा के लिए जितना शक्तिशाली दूध चाहिए, उतना पशु मादाएं पैदा करती ??
जब एक गाय दूध पैदा करती है, तो आदमी के बच्चे के लिए पैदा नहीं करती, सांड़ के लिए पैदा करती है। और जब आदमी का बच्चा पीये उस दूध को और उसके भीतर सांड़ जैसी कामवासना पैदा हो जाये, तो इसमें कुछ आश्रर्य नहीं है। वह आदमी का आहार न था। इस पर अब तो वैज्ञानिक भी काम करते हैं, और आज नहीं कल हमें समझना पड़ेगा कि अगर आदमी में बहुत—सी पशु प्रवृत्तियां
है, तो कहीं उनका कारण पशुओं का दूध तो नहीं है। अगर उसकी पशु प्रवृत्तियों को बहुत बल मिलता है, तो उसका कारण पशुओं का आहार तो नहीं है!
आदमी का क्या आहार है, यह अभी तक ठीक से तय नहीं हो पाया। लेकिन वैज्ञानिक हिसाब से अगर आदमी के पेट की हम जांच करें, जैसा कि वैज्ञानिक किये हैं, तो वे कहते है, आदमी का आहार शाकाहारी ही हो सकता है। क्योंकि शाकाहारी पशुओं के पेट में जितना बड़ा इंटेस्टाइन की जरूरत होती है, उतनी बड़ी इंटेस्टाइन आदमी के भीतर है। मांसाहारी जानवरों की इंटेस्टाइन छोटी होती है, जैसे शेर की, बहुत छोटी. होती है। क्योंकि मांस पचा हुआ आहार है, बड़ी इंटेस्टाइन की जरूरत नहीं है। पचा पचाया है, तैयार है भोजन। उसने ले लिया, वह सीधा का सीधा शरीर में लीन हो जायेगा। बहुत छोटे पाचन यंत्र की जरूरत है।
इसलिए बड़े मजे की बात है कि शेर चौबीस घंटे में एक बार भोजन करता है। काफी है। बंदर शाकाहारी है, देखा आपने उसको! दिनभर चबाता रहता है। उसकी इंटेस्टाइन बहुत लंबी हैं। और उसको दिनभर भोजन चाहिए। इसलिए वह दिनभर चबाता रहेगा।
आदमी का भी बहुत मात्रा में एक बार खाने की बजाय, छोटी—छोटी मात्रा में बहुत बार खाना उचित है। वह बंदर का वंशज है। और जितना शाकाहारी हो भोजन, उतना कम कामोत्तेजक है। जितना मांसाहारी हो उतना कामोत्तेजक होता जायेगा।
दूध मांसाहार का हिस्सा है। दूध मांसाहार है, क्योंकि मां के खून और मांस से ही निर्मित होता है। शुद्धतम मांसाहार है। इसलिए जैनी, जो अपने को कहते हैं हम गैर—मांसाहारी है, कहना नहीं चाहिए, जब तक वे दूध न छोड़ दें।
केकर ज्यादा शुद्ध शाकाहारी है क्योंकि वे दूध नहीं लेते। वे कहते हैं, दूध एनिमल स्प है। वह नहीं लिया जा सकता। लेकिन दूध तो हमारे लिए पवित्रतम है, पूर्ण आहार है, सब उससे मिल जाता है, लेकिन बच्चे के लिए, और वह भी उसकी अपनी मां का। दूसरे की मां का दूध खतरनाक है। और बाद की उम्र में तो फिर दूध—मलाई और घी और ये सब और उपद्रव है। दूध से निकले हुए। मतलब दूध को हम और भी कठिन करते चले जाते हैं, जब मलाई बना लेते हैं, फ्रि मक्सन बना लेते है, फिर घी बना लेते है, तो घी शुद्धतम कामवासना हो जाती है। और यह सब अप्राकृतिक है, और इनको आदमी लिए चला जाता है। निशित ही, उसका आहार फिर उसके आचरण को प्रभावित करता है।
तो महावीर ने कहां है, सम्यक आहार, शाकाहारी आहार, बहुत पौष्टिक नहीं केवल उतना जितना शरीर को चलाता है। ये सम्यक रूप से सहयोगी हैं उस साधक के लिए, जो अपनी तरफ आना शुरू हुआ।
शक्ति की जरूरत है, दूसरे की तरफ जाने के लिए शांति की जरूरत है, स्वयं की तरफ आने के लिए। अब्रह्मचारी, कामुक शक्ति के उपाय खोजेगा। कैसे शक्ति बढ़ जाये। शक्तिवर्द्धक दवाइयां लेता रहेगा, कैसे शक्ति बढ़ जाये। ब्रह्मचारी का साधक कैसे शक्ति शांत बन जाये, इसकी चेष्टा करता रहेगा। जब शक्ति शांत बनती है तो भीतर बहती है। और जब शांति भी शक्ति बन जाती है, तो बाहर बहनी शुरू हो जाती है।

 आज इतना ही पांच मिनट रुके।