तुम कहते थे कोई रात अंधेरी आने दो।
जग के सपनों को तुम जीवित कर जाओगे।
गरल घटक विष कंठों में, भरा है हलाहल।
सूनी आँखों में जीवन कि न अब हलचल।
चलना ही तो है, अंगारों पर चलता
चल।।
विस्मय-विमुग्ध होकर न अब तू आंखें मल।
बस ये पल अपना, जीवन में न कोई
कल।
बदल रहा मन, जो छलता तुझको
पल-पल।
सूख रहा जीवन का झरना, कहता अब
चल।
जो जीवन कल था सपना वो आज बना बोझिल।
कब आकर तुम आशा का दीप बझाओगे।
चुप कानों में कोई मधुर राग गा
जाओगे ।।
जग के सपनों को तुम जीवित कर जाओगे।।
कितनी लहरों पर छिटक रहा जीवन विघटित।
नित लहरों सा क्यों टूट-टूट फिर बनता हूं।
लाखों छवियों में झांक-झांक कर जीता हूं।
लीला सा कोई क्यों लील रहा दिन-प्रतिदिन।
जीवन की पीड़ा से जीता हूं, न अब
मरता हूं।
कोई आस यहां अब नहीं यहां रिझाती है।
थकती धुँधली इन बूढ़ी आँखों को देखो
आशा की कोई एक किरण यहां क्या पाओगे।
क्या सूखे कांटों तुम जीवन भर उप जाओगे।
जग के सपनों को तुम जीवित कर जाओगे।
मत बांधो मुझको रिश्तों की जंजीर से
हम कांटों पर भी हंस-हंस कर जी जायेंगे
इन सूनी आंखों में चाहे आंसू हो हजार
पर होठों पर न आहों को तुम पाओगे
है कितने युग और काल छिपाये है हमने
इस ह्रदय की गहराई में तुम झांके तो जरा
न नाप सकोगे सपनों की लम्बाई को
चाहे वो हो
टूटे बिखरे और
उन तार-तार सपनों में जीवन तड़प रहा
मेरे ह्रदय में आशा को फिर गीत जगा
उन सपनों को आँगन में तुम भर जाओगे।
जग के सपनों को तुम जीवित कर जाओगे।।
दुःख और पीड़ा के आदि तो हम हो ही चूके
कितनी आशा का बोझ लिए हम जीते है
इक मवाद बना जो सड़ता है क्यों युगों-युगों
उसको ही तो हम जीवन कहते है।
क्यों आकर उसको कुरेद रहे जो है आपने
इन आती जाती धुँधली सी परछाइयों में
न रुकता है छवि बन जिसको मैं निहार सकूँ
मरने जीने का न मुझको अब हिसाब कोई
हम युगों-युगों यूं रुलते रहते मिट्टी में
हर कब्र-चिता में दफ़न मुझे तुम पाओगे।
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