कुल पेज दृश्य
शनिवार, 21 मई 2011
ओशो डाइनैमिक ध्यान--
मंगलवार, 17 मई 2011
ओशो नाद ब्रह्म ध्यान—
रविवार, 15 मई 2011
बुद्ध की भविष्यवाणी—(ओशो की सभागार)
सुभूति ने पूछा भगवान बुद्ध से जो आप बोल रहे है, वह आज आपके संग साथ होने पर भी हम समझ-समझ कर समझ नहीं पाते। क्या आने वाले समय में , युगांतर काल में, आखिरी पाँव सौ वर्षों में, इस सम्यक शिक्षा के पतन काल में जो कि जब इस सूत्र के ये बचन समझायें जा रहे होंगे तो इनके सत्य को समझेंगे?
शनिवार, 14 मई 2011
संभोग से समाधि की और—38
मंगलवार, 3 मई 2011
संभोग से समाधि की और—37 ( विद्रोह क्या है?)
जब बरसता है तुम्हारा माधुर्य—(कविता)
सोमवार, 2 मई 2011
संभोग से समाधि की और—36(जनसंख्या विस्फोट)
शनिवार, 30 अप्रैल 2011
बुद्ध पुरूष कहां पैदा होते है—(कथा यात्रा-015)
आनंद ने कहां, भगवान आपने बताया नहीं उत्तम पुरूष कौन है? कैसे उत्पन्न होते
है? तब भगवान ये सुत्र कहां था। आनंद उत्तम पुरूष सर्वत्र उत्पन्न नहीं होते। वे मध्य देश में उत्पन्न होते है। और जन्म से ही धनवान होते है। वे क्षत्रिय या ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होते है
फिर क्राइस्ट का क्या होगा। फिर मोहम्मद का क्या होगा। ये तो महा धनवान घरों में पैदा नहीं हुए। तो फिर ये बुद्ध पुरूष नहीं है। ये तो बड़ी संक्रीर्णता हो जाएगी। जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजपुत्र थे। सही, हिंदुओं के सब अवतार राजाओं के बेटे है, सही, और बुद्ध भी राजपुत्र है सही। इस लिए इस वचन का बौद्धो ने यहीं अर्थ लिया। कि बुद्ध पुरूष राज घरों में पैदा होते है। महा धनवान।
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—35
लूटने की आस है—(कविता)
गुरुवार, 28 अप्रैल 2011
भगवान बुद्ध का भिक्षुओं को डाटना—(कथा यात्रा-014)
भगवान ने भिक्षुओ का डाटा-(एस धम्मो सनंतनो)एक दिन बहुत से भिक्षु बैठे बात कर रहे थे। पहली बात तो यह है कि भिक्षु बैठकर गपशप करें,यहीं भिक्षु के लिए योग्य नहीं। भिक्षु चुप बैठे, यही योग्य है। भिक्षु उतना ही बोले जीतना अनिवार्य हो। अपरिहार्य हो, भिक्षु होने के बाद बहुत बातें छोड़नी है, उनमें व्यर्थ की चर्चा भी छोड़नी है। नहीं तो फिर सांसारिक और संन्यासी में फर्क क्या रहा?
बुधवार, 27 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—34
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
भगवान को भिक्षा न मिलना—(कथा यात्रा-013)
एक दिन भगवान पंचसाला नामक ब्राह्मणों के गांव में भिक्षा टन के लिए गए। मार ने—शैतान ने—पहले ही ग्रामवासियों में आवेश कर ऐसा किय कि भगवान को किसी ने कलछी मात्र भी भिक्षा न दी। ब्राह्मणों का गांव, यह खयाल में रखाना। खतरनाक गांव है। सब पंडित-ज्ञानी है। जब भी बुद्ध पुरूष हुए है तो पंडितों ने उन्हें इनकार किया है। जिन्होंने जीसस को सूली दी, वे पंडित थे, ब्राह्मण थे, पुरोहित थे। येरूशलम के बड़े मंदिर का प्रधान पुरोहित उसमें सम्मिलित था। पुरोहितों की कौंसिल ने निर्णय किया था। जितने बड़े पंडित थे यहूदियों के, सब ने यह निर्णय दिया था कि यह आदमी मार डालने योग्य है। यह आदमी खतरनाक है।
रविवार, 24 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—33
बुधवार, 20 अप्रैल 2011
धर्म और संस्कार—
मंगलवार, 19 अप्रैल 2011
कामवासना ओर प्रेम—
रविवार, 17 अप्रैल 2011
नेता कि अमृत वाणी—(कविता)
विवेकानंद और देव सेन—(कथा यात्रा-0012)
ऐसा हुआ, विवेकानंद एक बड़े विद्वान के साथ ठहरे हुए थे। उनका नाम था, देवसेन। बहुत बड़ा विद्वान, जिसने संस्कृत शास्त्रों का पश्चिमी भाषाओं में अनुवाद किया। देवसेन उपनिषदों के अनुवाद में संलग्न था—और वह सर्वाधिक गहरे अनुवादकों में से एक था। एक नई पुस्तक प्रकाशित हुई थी। विवेकानंद ने पूछा, क्या मैं इसे देख सकता हूं? क्या मैं इसे पढ़ने के लिए ले सकता हूं? देवसेन ने कहा, हां-हां जरूर ले सकते हो, मैंने इसे बिलकुल नहीं पढ़ा है।
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
मौलुंकपुत्र-भगवान बुद्ध—(कथा यात्रा-011)
एक व्यक्ति, कोई जिज्ञासु, एक दिन आया। उसका नाम था मौलुंकपुत्र, एक बड़ा ब्राह्मण विद्वान;
पाँच सौ शिष्यों के साथ आया था बुद्ध के पास। निश्चित ही उसके पास बहुत सारे प्रश्न थे। एक बड़े विद्वान के पास होते ही हैं ढेर सारे प्रश्न, समस्याएं ही समस्याएं। बुद्ध ने उसके चेहरे की तरफ देखा और कहा, मौलुंकपुत्र, एक शर्त है। यदि तुम शर्त पूरी करो,केवल तभी मैं उत्तर दे सकता हूं। मैं देख सकता हूं तुम्हारे सिर में भनभनाते प्रश्नों को। एक वर्ष तक प्रतीक्षा करो। ध्यान करो,मौन रहो। तब तुम्हारे भीतर का शोरगुल समाप्त हो जाए, जब तुम्हारी भी की बातचीत रूक जाए,तब तुम कुछ भी पूछना और मैं उत्तर दूँगा। यह मैं वचन देता हूं।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011
मेरी सेक्स के पार की यात्रा-भाग-2
मेरी सेक्स के पार की यात्रा-भाग-2
उसके बाद तो मैंने और मां ध्यान निर्वाह ने मिल कर बहुत गहरे प्रयोग किये। कितनी ही रातों हम दोनों एक दूसरे के साथ निर्वस्त्र सोये। मेरा तो ध्यान धीरे-धीरे गहरा और परिपक्व हो रहा था। पर उसे कभी-कभार सेक्स के तूफ़ान के कारण काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इस बात का पता मुझे काफ़ी दिनों बाद चला। क्योंकि स्त्री का सेक्स अंतगामी है पुरूष की तरह आप उसके तनाव को देख नहीं सकते। एक रात नाद-ब्रह्मा ध्यान करते एक विचित्र घटना घटी उस की साक्षी हमारी पत्नी मां अदवीता नियति भी थी। असल में प्रत्येक ध्यान में वह हमारे साथ होती थी। इतने दूर तक जाने के बाद मां ध्यान निर्वाह की हिम्मत बढ़ गई फिर उसने समझ और देख लिया की यहां हम ध्यान कर रहे। तब वह भी हिम्मत कर के निर्वस्त्र हो मेरे साथ ध्यान करने लगी। रात के समय एक तो पहले ही काला रंग और उपर से अँधेरा कर लिया जाता था। ध्यान के कमरे में हम केवल ध्यान ही करते थे वरना तो फिर बद कर दिया जाता था। तब निर्वस्त्र होने में किसी को कोई झिझक भी नहीं होती थी। फिर ध्यान के समय हमारी आंखे भी तो बंद रहती थी।
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—32
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
भौतिक समृद्धि ओर आध्यात्मिक खोज--
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
सपनों के पाँच प्रकार—II
रविवार, 10 अप्रैल 2011
सपनों के पाँच प्रकार—
शनिवार, 9 अप्रैल 2011
मेरी सेक्स के पार की यात्रा-मनसा
मेरी सेक्स के पार की यात्रा-(मार्ग की अनुभूतियां)
जीवन में जो भी हम आज
पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है।
पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में उसकी तादम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है।
मनुष्य के मन के सात प्रकार है, वहीं से उसे अपनी यात्रा शुरू करनी होती है परंतु ये
कार्य तो केवल गुरु ही देख सकता है। सेक्स, कृपणता, क्रोध, धूर्तता, मूढ़ता....
परंतु इस समय पूरी पृथ्वी मानसिक रूप से सेक्स से बीमार है। सेक्स जो शरीर की
जरूरत है, वो हमारे सभ्य होने के साथ-साथ मन पर आ गया। जो
बहुत खतरनाक है। सबसे पहले तो साधक को ये समझ लेना चाहिए की सेक्स शरीर पर कैसे
आये। तब हम उसके पास हो सकते है, कृपणता तो पहला द्वार है
कृपण आदमी न तो प्रेम कर सकता है, न वह केवल धन का गुलाम
होता है, वह कमाता तो है परंतु उसका उपयोग भी नहीं कर पता।
सद्उपयोग की बात तो छोडिये, इस लिए सभी धर्मों ने दान का
बहुत महत्व दिया है, दान पहला द्वार खोने के लिए अति जरूर
है।
परंतु जब साधक ध्यान साधना शुरू करता है तो वही द्वारा जो खुला है उर्जा वहीं से रिसना शुरू कर देती है, क्रोधी अधिक क्रोधी, सेक्सी अधिक सेक्सी, कंजूस अधिक कंजूस, चालाक-कपटी अधिक लंपट होना शुरू हो जाता है। क्यों ऐसा होता है, क्योंकि आपके उसी द्वार से जीवन की अधिकतम उर्जा बहती है। तब हम घबरा जाते है, क्रोध और सेक्स सकारात्मक है, ज्यादा सत साधक इस द्वारा पर जो खड़े होते है वही ध्यान में उतर सकते है, कंजूस, मूढ़़, चालाक....का ध्यान में गहरे उतरना अति कठिन है। जीवन एक उर्जा है सेक्स-क्रोध एक कुदरत की देन है। एक से हम प्रकृति की उत्पति करते है दूसरे से जीवन की रक्षा।
शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011
हे अवतारे—अन्ना हज़ारे—कविता
बुधवार, 6 अप्रैल 2011
जीवित--मधुशाला
सोमवार, 4 अप्रैल 2011
03-सजी दूल्हनियां—(कविता)
मुझे छुपाले खुद में प्रियतम हो गई तो अब सांवलियां।
01-चांद निहारे, पपीहा पुकारे,जीवन में कब हो उजियारे।
एक झलक तो देजा प्रितम, क्यों छुप-छुप करे इशारे।
चलत-चलते थक गई अब तो, मिले न कोई किनारे।
थक गई में तो चलते-चलते,मिला नहीं वो किनारे।
जीवन सांसे छलक रही हे, रीतगई रे गागरियां।
मुझे छूपाले......
रविवार, 3 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—31
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011
संभोग से समाधि की और—30
सोमवार, 28 मार्च 2011
सादगी भरा व्यक्ति और प्रसन्नता—
एक सादगी भरा व्यक्ति जान लेता है कि प्रसन्नता जीवन का स्वभाव है। प्रसन्न रहने के लिए किन्हीं कारणों की जरूरत नहीं होती। बस तुम प्रसन्न रह सकते हो। केवल इसीलिए कि तुम जीवित हो। जीवन प्रसन्नता है जीवन आनंद है लेकिन ऐसा संभव होता है केवल एक सहज सादे व्यक्ति के लिए ही। वह आदमी जो चीजें इकट्ठी करता रहता है, हमेशा सोचता है कि इन्ही चीजों के कारण उसे प्रसन्नता मिलने वाली है....। आलीशान भवन, धन, सुख-साधन, वह सोचता है कि इन्हीं चीजों के कारण वह प्रसन्न है। समस्या धन-दौलत की नहीं है, समस्या है आदमी की दृष्टि की जो धन खोजने का प्रयास करती है। दृष्टि यह होती है, जब तक मेरे पास ये तमाम चीजें नहीं हो जाती है, मैं प्रसन्न नहीं हो सकता हूं। यह आदमी सदा दुखी रहेगा। एक सच्चा सादगी पसंद आदमी जान लेता है कि जीवन इतना सीधा सरल है कि जो कुछ भी है उसके पास, उसी में वह खुश हो सकता है। इसे किसी दूसरी चीज के लिए स्थगित कर देने की उसे कोई जरूरत नहीं है। शनिवार, 26 मार्च 2011
क्या आप फिर से एक और जन्म ले सकते है?
हां, एक बार मैंने कहा था कि यदि इसकी आवश्यकता हुई तो मैं आऊँगा वापस। लेकिन अब मैं कहता हूं कि ऐसा असंभव है। अत: कृपा करना, थोड़ी जल्दी करना। मेरे फिर से आने की प्रतीक्षा मत करना। मैं यहां हूं केवल थोड़ और समय के लिए ही। यदि तुम सचमुच ही सच्चे हो तो जल्दी करना, स्थगित मत करना। एक बार मैंने कहा था वैसा लेकिन मैंने कहा था उन लोगों से, जो उस क्षण तैयार न थे। मैं सदा ही प्रत्युत्तर देता रहा हूं। मैंने ऐसा कहा था उन लोगों से जो कि तैयार न थे। यदि मैंने उनसे कहा होता कि मैं नहीं आ रहा हूं। तो उन्होंने एकदम गिरा ही दी होती सारी खोज। उन्होंने सोच लिया होता कि, फिर यह बात संभव ही नहीं है। मैं ऐसा एक जनम में नहीं कर सकता। और वे वापस नहीं आ रहे, तो बेहतर है कि शुरू ही न करना। एक जन्म में उपलब्ध होने के लिए यह एक बहुत बड़ी चीज है। लेकिन अब मैं तुमसे कहता हूं कि मैं यहाँ और नहीं आ रहा हूं। वैसा संभव नहीं है। मुझे लग रहा है कि अब तुम तैयार हो इसे समझने के लिए और गति बढ़ा देने के लिए।शुक्रवार, 25 मार्च 2011
बुधवार, 23 मार्च 2011
01-दसघरा गांव की दस कहानियां--(मनसा-मोहनी)
01-नीम का दर्द-(कहानी)
(दसघरा की दस कहानियां)नीम के उस पेड़ को अपनी विशालता, भव्यता और सौंदर्य पर बहुत गर्व था। गर्व हो भी क्यों न प्रत्येक प्राणी उसके रंग रूप और आकार को देख कर कैसा गदगद हो उठता था। पक्षी उस पर आकर कैसे अठखेलिया करते थे। एक दूसरे के साथ चिलौल-झपटमार करते थे। कैसे आपस में लड़ते झगड़ते कूदते-फुदकते इस डाल से उस डाल पर मचलते रहते थे। उन पक्षियों का नाद कैसे मधुर गीतों की किलकारीयों जैसा लगाता था। मानो आपके कानों में कहीं दूर से महीन घंटियों का मधुर नाद आ रहा हो। कोई अपनी चोंच टहनियों पर रगड़-रगड़ कर उसे साफ़ करने की कोशिश कर रहा होता था। कोई चोंच मार कर आपस में प्रेम प्रदर्शित करते दिखते थे। आप बस यूं कह लीजिए की उस नीम के पेड़ के चारों और एक रौनक मेला लगा रहता था। उस सब को देख कर नीम भी मारे खुशी के पागल हुआ जाता था। उस नीम का तना हमारे आंगन में जरूर था पर उसकी शाखा-प्रशाखा दूर पड़ोसियों के छत और आंगन तक पसरी फैली हुई थी। वो इतना ऊँचा और विशाल था कि ये बटवारे की छोटी-छोटी चार दीवारी उसकी महानता के आगे बहुत ही बोनी और छोटी थी। उसकी विशालता के आगे इन दीवारों की उँचाई का कोई महत्व नहीं रह गया था। या यूं कह लीजिए कि नीम कि उँचाई के आगे ये बटवारे की दीवारें बहुत बोनी ही लगती थी। जड़ें और तना भले ही हमारे आंगन में हो, परन्तु उसकी छत्र छाया का आशीर्वाद दूर दराज के घरों को भी उतना ही मिलता था। ये शायद उसकी बुजुर्ग और महानता का ही वरदान था।
संभोग से समाधि की और—29
सोमवार, 21 मार्च 2011
चाय का अन्वेषक— बोधिधर्म
एक बौद्ध भिक्षु अपना दैनिक जीवन चाय से आरंभ करता है। उषा काल में, इसके पूर्व कि वह ध्यान करने जाए, वह चाय पीता है। ध्यान कर लेने के उपरांत वह चाय पीता है। और वह इसे बहुत धार्मिक ढंग से, बहुत गरिमा पूर्वक और अहो भाव पूर्वक पीता है। इसे कभी एक समस्या के रूप में नहीं सोचा गया; वस्तुत: बौद्धो ने ही इसकी खोज की थी। ऐतिहासिक रूप से यह बोधि धर्म से संबंधित है।रविवार, 20 मार्च 2011
अस्तित्व की आधारभूत संरचना—
अब मैं तुम्हें तुम्हारे अस्तित्व की एक परम आधारभूत यौगिक संरचना के बारे में बताता हूं।
जैसे कि भौतिकविद सोचते है कि यह सब और कुछ नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉन, विद्युत-उर्जा से निर्मित है। योग की सोच है कि यह सब और कुछ नहीं वरन ध्वनि-अणुओं से निर्मित है। अस्तित्व का मूल तत्व, योग के लिए ध्वनि है। क्योंकि जीवन और कुछ नहीं बल्कि एक तरंग है। जीवन और कुछ नहीं बल्कि ध्वनि की एक अभिव्यक्ति है।शुक्रवार, 18 मार्च 2011
संभोग से समाधि की और—28
गुरुवार, 17 मार्च 2011
सिद्घपुरुष और संबोधी व्यक्ति में भेद—
सिद्ध पुरूष—में वह सारी शक्तियां जिनकी योग बात करता है, और पतंजलि बात करेंगे जिनके बारे में—वे उसे आसानी से उपलब्ध होंगी। वह चमत्कारों से भरा होगा; उसका स्पर्श चमत्कारिक होगा। कोई भी चीज संभव होगी क्योंकि उसके पास निन्यानवे प्रतिशत विधायक मन होता है। विधायकता एक सामर्थ्य है, एक शक्ति है। वह बहुत शक्तिशाली होगा। लेकिन फिर भी वह संबोधी को उपलब्ध तो नहीं है। और वास्तविक बुद्ध की अपेक्षा इस व्यक्ति को तुम आसानी से बुद्ध कहना चाहोगे। क्योंकि संबोधी को उपलब्ध व्यक्ति तो तुम्हारे पार ही चला जाता है। तुम नहीं समझ सकते उसे; वह अगम्य हो जाता है।बुधवार, 16 मार्च 2011
विवेकानंद और वेश्या– (कथा यात्रा)
ऐसा हुआ कि विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्यक्ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वह महाराज भक्त था विवेकानंद और रामकृष्ण का। जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्सव आयोजित कर दिया। उसने स्वागत उत्सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्याओं को भी बुला लिया। अब जैसा महा राजाओं का चलन होता है; उनके अपने ढंग के मन होते है। वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्याओं को लेकर संन्यासी का स्वागत करना उपयुक्त नहीं है। पर कोई और ढंग वह जानता ही नहीं था। उसने हमेशा यही जाना था कि जब तुम्हें किसी का स्वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।मंगलवार, 15 मार्च 2011
संभोग से समाधि की और—27
मनुष्य की आत्मा, मनुष्य के प्राण निरंतर ही परमात्मा को पाने के लिए आतुर है। लेकिन किस मनुष्य को? कैसे परमात्मा को? उसका कोई अनुभव, उसका कोई आकार, उसकी कोई दिशा मनुष्य को ज्ञात नहीं है। सिर्फ एक छोटा सा अनुभव है, जो मनुष्य को ज्ञात है। और जो परमात्मा की झलक दे सकता है। वह अनुभव प्रेम का अनुभव है।रविवार, 13 मार्च 2011
संभोग से समाधि की और—26
जिस दिन दुनिया में सेक्स स्वीकृत होगा, जैसा कि भोजन, स्नान स्वीकृत है। उस दिन दुनिया में अश्लील पोस्टर नहीं लगेंगे। अश्लील किताबें नहीं छपेगी। अश्लील मंदिर नहीं बनेंगे। क्योंकि जैसे-जैसे वह स्वीकृति होता जाएगा। अश्लील पोस्टरों को बनाने की कोई जरूरत नहीं रहेगी।शुक्रवार, 11 मार्च 2011
संभोग से समाधि की और—25
आदमी के मन का नियम उलटा है। इस नियमों का उलटा नहीं हो सकता है। हां कुछ जो बहुत ही कमजोर होंगे, वह शायद नहीं आ पायेंगे तो रात सपने में उनको भी वहां आना पड़ेगा। मन में उपवाद नहीं मानते है। जगत के किसी नियम में कोई अपवाद नहीं होता। जगत के नियम अत्यंत वैज्ञानिक है। मन के नियम भी उतने ही वैज्ञानिक हे।बुधवार, 9 मार्च 2011
गुरु की खोज—
गुरु की खोज जितनी सरल और सहज हम समझते है। शायद उतनी आसान नहीं है। गुरु की खोज एक प्रतीक्षा है। और गुरु तुम्हें दिखाया नहीं जा सकता। कोई नहीं कह सकता,’’यहां जाओ और तुम्हें तुम्हारा सद्गुरू मिल जायेगा। तुम्हें खोजना होगा, तुम्हें कष्ट झेलना होगा, क्योंकि कष्ट झेलने और खोजने के द्वारा ही तुम उसे देखने के योग्य हो जाओगे। तुम्हारी आंखे स्वच्छ हो जायेगी। आंसू गायब हो जायेगे। तुम्हारी आंखों के आगे आये बादल छंट जायेंगे और बोध होगा कि यह सद्गुरू है।मंगलवार, 8 मार्च 2011
हंसी कि छ: कोटियां—
सोमवार, 7 मार्च 2011
स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—24
मेरे एथिक्स के प्रोफेसर और मेरे पंचानवे प्रतिशत अंकजब मैं विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था। मैंने एथिक्स, निति शास्त्र लिया था। मैं उस विषय के प्रोफेसर के केवल एक ही लेक्चर में उपस्थित हुआ। मुझे तो विश्वास ही नहीं आ रहा था कि कोई व्यक्ति इतना पुराने विचारों का भी हो सकता है। वे सौ साल पहले जैसी बातें कर रहे थे। उन्हें जैसे कोई जानकारी ही नहीं थी। कि नीति शास्त्र में क्या-क्या परिवर्तन हो चुके है। फिर भी उस बात को में नजर अंदाज कर सकता था। वे प्रोफेसर एकदम उबाऊ आदमी थे।
और जैसे कि विद्यार्थियों को बोर करने की उन्होंने कसम खा ली थी। लेकिन वह भी कोई खास बात न थी। क्योंकि मैं उस समय सौ सकता था। लेकिन इतना ही नहीं वे झुंझलाहट भी पैदा कर रहे थे। उनकी कर्कश आवाज उनके तौर-तरीके,उनका ढंग, सब बड़ी झुंझलाहट ले आने वाले थे। लेकिन उसके भी अभ्यस्त हुआ जा सकता था। लेकिन वह बहुत उलझे हुए इंसान थे। सच तो यह है मैंने कभी कोई ऐसा आदमी नहीं देखा जिसमें इतने सारे गुण एक साथ हो।













