कुल पेज दृश्य

शनिवार, 28 मई 2016

कहे होत अधीर--(प्रवचन--09)



चलहु सखि वहि देस—(प्रवचन—नौवां)

सारसूत्र:

चलहु सखी वहि देस, जहवां दिवस न रजनी।।
पाप पुन्न नहिं चांद सुरज नहिं, नहीं सजन नहीं सजनी।।
धरती आग पवन नहिं पानी, नहिं सूतै नहिं जगनी।।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।।
पलटूदास गुरु नहिं चेला, एक राम रम रमनी।।


चित मोरा अलसाना, अब मोसे बोलि न जाई।।
देहरी लागै परबत मोको, आंगन भया है बिदेस।
पलक उघारत जुग सम बीते, बिसरि गया संदेस।।
विष के मुए सेती मनि जागी, बिल में सांप समाना।
जरि गया छाछ भया घिव निरमल, आपुई से चुपियाना।।
अब न चलै जोर कछु मोरा, आन के हाथ बिकानी।
लोन की डरी परी जल भीतर, गलिके होई गई पानी।।
सात महल के ऊपर अठएं, सबद में सुरति समाई।
पलटूदास कहौं मैं कैसे, ज्यों गूंगे गुड़ खाई।।

वाचक ज्ञान न नीका ज्ञानी, ज्यों कारिख का टीका।।
बिन पूंजी को साहु कहावै, कौड़ी घर में नाहीं।
ज्यों चोकर कै लड्डू खावै, का सवाद तेहि माहीं।।
ज्यों सुवान कछु देखिकै भूंकै, तिसने तो कछु पाई।
वाकी भूंक सुने जो भूंकै, सो अहमक कहवाई।।
बातन सेती नहिं होय राजा, नहिं बातन गढ़ टूटै।
मुलुक मंहै तब अमल होइगा, तीर तुपक जब छूटै।।
बातन से पकवान बनावै, पेट भरै नहिं कोई।
पलटूदास करै सोई कहना, कहे सेती क्या होई।।


नीर बहाने को मन चाहे
काहे पतझड़ भाए

मन इक सागर थाह न जिसकी ध्यान लगाए डुबकी
चुन-चुन सच्चे मोती लाएं नैनन राह गंवाए
काहे पतझड़ भाए
नीर बहाने को मन चाहे

प्रेम जोत का सुंदर धोखा कोमल फूल समान
कांटा चुभ कर लहू बहाए यही प्रीति का दान
पल-पल मन में आग लगाए क्षण-क्षण जी भर आए
काहे पतझड़ भाए
नीर बहाने को मन चाहे

चंदरमा के गोरे मुख पर काली बदरी डोले
जागे दुख और बने चकोरी खाए पवन झकोले
बदले रूप हजारों विरहा क्या-क्या छवि दिखलाए
काहे पतझड़ भाए
नीर बहाने को मन चाहे

वह घड़ी धन्य है जब व्यक्ति को फूलों में भी कांटे दिखाई पड़ने शुरू हो जाते हैं; जब वसंत में भी पतझड़ का आभास मिलता है; और जब जीवन में भी मृत्यु की छाया की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है।
जिसने फूल ही देखे, वह भटका। जिसने फूलों में छिपे कांटे भी देख लिए, वह पहुंचा। जो वसंत में रम गया और पतझड़ को भुला बैठा, वह आज नहीं कल रोएगा, बहुत रोएगा; पछताएगा, बहुत पछताएगा। लेकिन जिसने वसंत में भी पतझड़ को याद रखा, वह दुख के पार हो जाता है, दुख से अतिक्रमण कर जाता है।
जीवन में द्वंद्व है--सुख का, दुख का; जन्म का, मृत्यु का; कांटों का, फूलों का; वसंतों का, पतझड़ों का। इस द्वंद्व में हम एक को पकड़ते हैं और दूसरे से बचना चाहते हैं। यही हमारी व्यथा है, यही हमारी पीड़ा है। जिसे हम पकड़ना चाहते हैं, पकड़ में नहीं आता, छूट-छूट जाता है; और जिससे हम बचना चाहते हैं, बच नहीं पाते, उसकी पकड़ में आ-आ जाते हैं। लेकिन जिम्मेवारी किसी और की नहीं है, हम स्वयं ही जिम्मेवार हैं। क्योंकि जो हमें विपरीत दिखाई पड़ता है वह केवल विपरीत दिखाई ही पड़ता है; है नहीं। कांटे और फूल साथ-साथ हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और जीवन और मृत्यु भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तुम एक पहलू को बचाना चाहो और दूसरे को छोड़ना चाहो, यह कैसे होगा? असंभव नहीं होता है, नहीं हो सकता है। असंभव करने चलोगे तो पीड़ा पाओगे। और यही पीड़ा जन्मों-जन्मों से हम पा रहे हैं।
इसलिए कहता हूं: वह घड़ी धन्य है जब तुम्हें जीवन का द्वंद्व दिखाई पड़ जाए और यह भी दिखाई पड़ जाए कि यह द्वंद्व एक बड़ा षडयंत्र है। जैसे ही यह बात दिखाई पड़ जाएगी, तुम द्वंद्व से ऊपर उठने लगे, अतीत होने लगे। तुम द्रष्टा हो जाओगे फिर; न जीवन, न मृत्यु--दोनों के साक्षी; न दिन, न रात--दोनों के साक्षी; न वसंत, न पतझड़--दोनों के साक्षी; न प्रेम, न घृणा--दोनों के साक्षी। और जो व्यक्ति हर द्वंद्व का साक्षी है वह समाधिस्थ है; वह निर्वाण को उपलब्ध है।
आज के सूत्र इसी द्वंद्वातीत अवस्था की तरफ इशारे हैं, मील के पत्थर हैं। समझोगे उनके इशारों को तो मंजिल बहुत दूर नहीं है। पलटू कहते हैं:
चलहु सखी वहि देस, जहवां दिवस न रजनी।
मित्र, उस देश चलें, जहां न दिन होता है न रात।
पाप पुन्न नहिं चांद सुरज नहिं, नहीं सजन नहीं सजनी।
मित्र, चलें उस देश, जहां पाप-पुण्य का द्वंद्व नहीं है, चांद-सूरज का द्वैत नहीं है, सजन-सजनी का भेद नहीं है। अभेद में चलें! निर्द्वंद्व में उठें!
धरती आग पवन नहिं पानी, नहिं सूतै नहिं जगनी।
उस देश को तलाशें, क्योंकि वही हमारा स्वदेश है। उस घर को खोजें, जहां न जागना होता है न सोना। क्योंकि वही हमारा असली घर है। उसे पा लिया तो अमृत को पा लिया; उससे चूके तो जहर में ही डुबकी खाते रहे। और जन्मों-जन्मों से हम चूक रहे हैं। कितना ही घर बनाओ यहां, गिर-गिर जाता है। यहां बनाए सभी घर ताश के पत्तों के घर सिद्ध होते हैं। कितने ही मजबूत बनाओ, पत्थरों से बनाए हुए महल भी अंततः रेत ही सिद्ध होते हैं। क्योंकि पत्थर भी रेत के अतिरिक्त और कुछ नहीं है--रेत के कणों का ही जोड़ है; जो आज जुड़ा है, कल बिखर जाएगा।
यहां कितना ही भरोसा रखो, सब भरोसे आत्मवंचनाएं हैं। यहां कितनी ही कामनाओं के घोड़े दौड़ाओ, सब सपनों की दौड़ है। कितनी ही नावें चलाओ, सब कागज की नावें हैं। और कितना ही मन फूला-फूला लगे, सब पानी के बबूले हैं--अब टूटे, तब टूटे, देर-अबेर, लेकिन सब बबूले टूट जाएंगे, फूट जाएंगे। हाथ यहां कुछ भी नहीं लगता है। खाली हाथ हम आते हैं और खाली हाथ हम जाते हैं। कुछ गंवा कर भला जाते हों, कमा कर तो कुछ भी नहीं जाते।
बच्चा पैदा होता है तो बंद मुट्ठी आता है; जाता है आदमी तो खुला हाथ जाता है। कम से कम भ्रम तो था बंद मुट्ठी का। कहते हैं: बंधी मुट्ठी लाख की, खुली तो खाक की! ठीक ही कहते हैं। कम से कम बच्चा भ्रम तो लेकर आता है। लेकिन वे सारे भ्रम जीवन तोड़ देता है।
अभागे हैं वे लोग, जो जीवन से पाठ नहीं लेते; जो जीवन की सुनते ही नहीं। जीवन तोड़ता है तुम्हारे भ्रमों को, तुम नये-नये निर्मित करते हो। जीवन धूल-धूसरित करता है तुम्हारे सपनों को, तुम नये-नये निर्मित करते हो। मरते क्षण तक भी तुम सपनों में ही लगे रहते हो--उन्हीं का विस्तार, उसी प्रपंच में। और इसीलिए खुद का घर--जो मिल सकता था, जो दूर भी न था, जो तुम्हारे भीतर ही छिपा था, जो तुम्हारे प्राणों के प्राण में था, जो तुम्हारी अंतरात्मा था--उससे वंचित रह जाते हो।
चलहु सखी वहि देस...
उस देश चलें! और यह देश कहीं दूर नहीं है। यह देश कहीं परदेस में नहीं है। यह देश कहीं आकाशों में नहीं है, पातालों में नहीं है। यह देश तुम्हारे ही भीतर है।
चलहु सखी वहि देस, जहवां दिवस न रजनी।
पाप पुन्न नहिं चांद सुरज नहिं, नहीं सजन नहीं सजनी।।
धरती आग पवन नहिं पानी, नहिं सूतै नहिं जगनी।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।।
न वहां त्याग है, न संग्रह है। न वहां लोक है, समाज है; न वेद है, शास्त्र है; न ही जंगल है, न ही बस्ती है।
पलटूदास गुरु नहिं चेला, एक राम रम रमनी।
वहां सब खो जाते हैं। गुरु-चेले का अंतिम भेद भी खो जाता है। और सब भेद तो खो ही जाते हैं--पति के पत्नी के, भाई के बहन के, मित्र के शत्रु के--जो अंतिम भेद है, प्यारे से प्यारा भेद है, गुरु-शिष्य का भेद भी वहां खो जाता है। वहां तो बचता है एक। अब एक को क्या नाम दें! एक तो अनाम ही होगा। दो हों तो नाम हो सकते हैं।
एक राम रम रमनी।
बस एक राम बच रहता है। यहां राम से अर्थ दशरथ-पुत्र राम से नहीं है। यहां राम से अर्थ है तुम्हारे प्राणों में बसे हुए साक्षी ब्रह्म से। जहां एक राम ही रह जाता है--न कोई भक्त, न कोई भगवान; न कोई दृश्य, न कोई द्रष्टा; जहां एक शुद्ध साक्षी-भाव रह जाता है, दर्पण मात्र, जिसमें कुछ झलकता भी नहीं, इतना द्वंद्व भी नहीं--इस अवस्था को योग ने समाधि कहा है, निर्विकल्प समाधि। महावीर ने शुक्ल-ध्यान की अवस्था कहा है। इतना शुद्ध, इतना पवित्र, इतना पावन--इसलिए शुक्ल, शुभ्र, शुभ्रतम! इसे बुद्ध ने निर्वाण कहा है। जहां अहंकार का दीया बुझ गया। क्योंकि अहंकार के दीये के लिए द्वंद्व चाहिए।
तुम जब बिलकुल अकेले रह जाते हो तो तुम्हें जो अड़चन होती है, शायद तुमने सोचा भी न होगा--क्यों होती है? अकेले में तुम इतने बेचैन क्यों हो जाते हो? अगर दस-पांच दिन अकेला रहना पड़े तो इतने घबड़ा क्यों जाते हो? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि तीन सप्ताह अगर व्यक्ति को बिलकुल एकांत में रहना पड़े तो पागल हो जाए। क्यों? सीधा सा कारण है। सोचा नहीं होगा, प्रयोग नहीं किया होगा, खयाल में नहीं आया होगा।
तुम्हारे अहंकार के जीवित रहने के लिए दूसरे की जरूरत है। अगर दूसरा मौजूद हो तो अहंकार जीता है। तू हो तो मैं जीता है; बिना तू के मैं का कोई अस्तित्व नहीं बचता। जहां तू ही नहीं है वहां मैं भी नहीं है। और जहां मैं नहीं है वहां घबड़ाहट लगेगी कि डूबने लगे--डूबने लगे अतल गहराइयों में! कोई पार मिल सकेगा इस अतल गहराई का, भरोसा नहीं आता। हाथ से छूटने लगे सब सहारे। अब तक अहंकार में जीए हो--मैं हूं! लेकिन जहां तू गया वहां मैं भी गया; फिर जो शेष रह जाता है--
एक राम रम रमनी।
इसलिए तो हम भीड़ तलाशते हैं। इसलिए धर्म के नाम पर भी भीड़ में ही सम्मिलित हो जाते हैं--हिंदू की भीड़, मुसलमान की भीड़, ईसाई की भीड़, जैन की भीड़--भीड़ की तलाश करते हैं। महावीर ने ज्ञान पाया एकांत में। बुद्ध ने ज्ञान पाया एकांत में। जीसस ने ज्ञान पाया एकांत में। लेकिन हम भीड़ तलाशते हैं। हमें अकेलापन काटता है। जितनी बड़ी भीड़ हो उतना हमें आश्वासन मालूम पड़ता है। भीड़ की तलाश राजनीति है और एकांत की तलाश धर्म है। राजनेता को भीड़ चाहिए। बिना भीड़ के उसके प्राण निकलने लगते हैं।

एक भूतपूर्व एम.एल.ए.
बस स्टॉप पर
खड़ा हुआ आकर
और थोड़ी देर बाद
गिर पड़ा गश खाकर।
उसकी चेतना उड़ गई
और उसके आस-पास
अच्छी-खासी भीड़ जुड़ गई।

एक आदमी ने लोगों से
अनुरोध किया
कि आप ये भीड़ हटा लीजिए
बेचारे को हवा आने दीजिए।

तब मैंने कहा,
"नहीं! ये भीड़ रहने दीजिए
आपको शायद मालूम नहीं है
कि यह बेहोश पड़ा व्यक्ति
एक हारा हुआ विधायक है
हाल-फिलहाल ये भीड़
इसके लिए लाभदायक है
आप भीड़ हटाने की नादानी
क्यों कर रहे हैं
अरे, भीड़ ने साथ छोड़ दिया था
इसीलिए तो ये दौरे पड़ रहे हैं!'

आदमी भीड़ में जीता है। राजनेता ही नहीं, सभी भीड़ की तलाश करते हैं। परिवार हम बसाते हैं, किसलिए? अकेलापन न अनुभव हो। विवाह करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं--अकेलापन अनुभव न हो, संग-साथ रहे। सबसे बड़ा डर अकेले होने का डर है कि कहीं मैं अकेला न पड़ जाऊं! इसके लिए हम कितने आयोजन करते हैं! अगर हम जीवन को छान कर देखें तो हमारे सारे आयोजन एक बात के हैं कि किसी तरह मुझे यह याद न आए कि मैं नहीं हूं। और बुद्ध कहते हैं कि जो जान ले मैं नहीं हूं, उसने पा लिया सब, उसे मिल गया वह देश--जहां न तू है, न मैं है।
चूंकि हम भीड़ पर निर्भर होते हैं, इसलिए भीड़ से डरते भी हैं, भीड़ से भयभीत भी रहते हैं। भीड़ हमसे जो करवाए हम करते हैं। भीड़ की आज्ञा माननी पड़ती है। भीड़ जो चरित्र दे दे, उसे थोप लेना पड़ता है; चाहे अंतरात्मा गवाही दे या न दे। भीड़ को खुश रखना होता है, क्योंकि बिना भीड़ के हम मुश्किल में पड़ जाते हैं। इसलिए भीड़ अगर युद्ध को जा रही हो तो हम भी चले युद्ध को। अगर भीड़ मंदिर को जला रही हो तो हम भी जलाते हैं मंदिर को। अगर भीड़ मस्जिद को गिराती हो तो हम मस्जिद गिराते हैं। अगर भीड़ हत्याएं करती हो तो हम हत्याएं करते हैं। हिंदू-मुस्लिम दंगे सिर्फ भीड़ों के कारण हैं। कुछ लोग एक भीड़ के हिस्से बन गए हैं, कुछ लोग दूसरी भीड़ के हिस्से बन गए हैं।
इस दुनिया से हिंदू-मुस्लिमों के दंगे, ईसाइयों-मुसलमानों के दंगे नहीं मिटेंगे तब तक, जब तक आदमी अकेला होने की सामर्थ्य नहीं जुटाता। जब तक भीड़ें हैं तब तक दंगे रहेंगे, क्योंकि भीड़ को भी बचने के लिए दंगों की जरूरत है। जैसे तुम्हें बचने के लिए भीड़ की जरूरत है, भीड़ को बचने के लिए दंगों की जरूरत है।
अडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अगर तुम्हारे देश का कोई शत्रु न हो तो झूठा शत्रु पैदा रखो, लेकिन बनाए रखो। जब तक शत्रु है तब तक देश इकट्ठा रहता है, मजबूत रहता है। जैसे ही शत्रु न हुआ वैसे ही देश ढीला पड़ जाता है, सुस्त हो जाता है। अगर सच्चा शत्रु हो तो सौभाग्य; अगर सच्चा शत्रु न हो तो झूठी ही अफवाहें उड़ाए रखो, डराए रखो लोगों को। इस्लाम खतरे में है--तो मुसलमान इकट्ठा रहता है। हिंदू धर्म खतरे में है, हिंदू राष्ट्र खतरे में है--तो लोग चले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में चड्डियां पहन कर कवायद करने। खतरा पैदा रखो, खतरे को जगाए रखो। जब तक खतरा है तब तक तुम इकट्ठे हो; जैसे ही खतरा गया कि तुम बिखरे।
तुम देखते हो, देश में, इस देश में अभी तीस साल पहले अंग्रेजों का राज्य था तो सारा देश इकट्ठा था, क्योंकि दुश्मन एक था, उससे लड़ना था। उससे लड़ना था तो लोग इकट्ठे थे। कोई झगड़ा न था गुजराती और मराठी का, हिंदी बोलने वाले का और तमिल बोलने वाले का--कोई झगड़ा न था। सारा देश इकट्ठा था। अंग्रेज उस इकट्ठेपन से डरा हुआ था। इसलिए उसने एक झगड़ा खड़ा करवा दिया था हिंदू-मुसलमानों का। हिंदुओं को अंग्रेज भड़काते रहे कि तुम्हारा धर्म खतरे में है और मुसलमानों को भड़काते रहे कि तुम्हारा धर्म खतरे में है। इस झगड़े में उलझाए रखे। इस झगड़े में उन्होंने इस देश को दो हिस्सों में तुड़वा दिया। हिंदू-मुसलमान लड़ते रहे।
लोग सोचते थे कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान बंट जाएंगे तो फिर दंगा-फसाद खतम हो जाएगा। मगर नहीं खतम हुआ। हिंदू-मुसलमान अगर बंट गए तो क्या होता है! तो अब और छोटी-छोटी चीजों पर झगड़े शुरू हो गए। तो उत्तर भारत का और दक्षिण भारत का झगड़ा है। तुम अगर रावण की प्रतिमा जलाते हो तो दक्षिण में राम की प्रतिमा जलाई जाएगी। क्योंकि राम उत्तर के थे। उत्तर छाती पर चढ़ा हुआ है। दक्षिण को उत्तर से मुक्त होना है। उत्तर-दक्षिण का झगड़ा होगा, यह कभी सोचा भी न था।
और छोटी-छोटी बातों के झगड़े हैं। नर्मदा का जल किसका है--मध्यप्रदेश का कि गुजरात का? एक छोटी-मोटी तहसील, कि जिला किसका है--कर्नाटक का कि महाराष्ट्र का? छुरेबाजी होगी। बंबई किसकी है--गुजरातियों की कि महाराष्ट्रियनों की? छुरेबाजी हो जाएगी।
आदमी भीड़ में रहता है तो उसे लगता है मैं हूं। और भीड़ दूसरी भीड़ों से लड़ती रहती है तो उसे लगता है कि मैं हूं। अगर कोई लड़ने को न बचे, भीड़ बिखर जाए। तुम्हें मित्रता नहीं बांधती, तुम्हें शत्रुता बांधती है। तुम्हें प्रेम नहीं बांधता, तुम्हें घृणा बांधती है।
इसलिए तुमने देखा, अगर पाकिस्तान से झगड़ा हो रहा हो तो भारतीयों के आपसी झगड़े एकदम शांत हो जाते हैं। अभी पाकिस्तान से पहले निपटें, फिर ये आपसी झगड़े तो पीछे काम में आ जाएंगे; जब कोई और झगड़ा न रहेगा तब इन झगड़ों में समय बिता लेंगे। चीन का हमला हो जाए तो तुम एकदम इकट्ठे हो जाते हो। फिर तुम अपने झगड़े भूल जाते हो। और नहीं तो छोटे-छोटे झगड़े खड़े हो जाते हैं--सिक्खिस्तान चाहिए! बंगालियों को अखंड बंगाल चाहिए!
भीड़ जिंदा नहीं रह सकती बिना भीड़ों से टकराए। ये तुम्हारे राष्ट्र--भारत, पाकिस्तान, चीन, जापान--और क्या हैं सिवाय भीड़ों के नाम? और इनके बचने का राज क्या है? इनके बचने का राज वही है। अगर मूल सूत्र से समझो: तुम नहीं बचोगे अगर अकेले रह जाओ; भीड़ नहीं बचेगी अगर और भीड़ें न रह जाएं।
हम द्वंद्व में जीते हैं। न केवल जीते हैं, बल्कि द्वंद्व को पोषण करते हैं। फिर जिस भीड़ के आधार पर तुम जीते हो, स्वभावतः उससे डरना होगा। अगर वह कहे कि ऐसा भोजन करो, तो वैसा भोजन करना होगा। वह कहे इस ढंग से उठो, इस ढंग से बैठो--तो इस ढंग से उठना होगा, इस ढंग से बैठना होगा। क्योंकि भीड़ बरदाश्त नहीं करती है बगावतियों को, विद्रोहियों को; क्योंकि विद्रोही भीड़ के लिए खतरा हैं, भीड़ को वे तोड़ देंगे, भीड़ को खंड-खंड कर देंगे। भीड़ चाहती है आज्ञाकारी व्यक्ति। आज्ञा का उल्लंघन भीड़ की दृष्टि में सबसे बड़ा पाप है। तो तुम डरते हो। और जब तक तुम एकांत में जी न पाओगे, जब तक तुम अपने भीतर के एकांत में डूब न पाओगे, जब तक तुम ध्यान में रसमग्न न हो पाओगे--तब तक भीड़ तुम्हारी मालिक रहेगी, तुम गुलाम रहोगे।
बीमार नेताजी से डाक्टर ने पूछा, क्या आप पार्टियों में बहुत आते-जाते हैं? आपका पेट खराब है, हाजमा बिगड़ा हुआ है।
हां, मैं पार्टियों में बहुत आता-जाता हूं, नेताजी ने कहा। पहले मैं जनसंघी था, फिर समाजवादी, फिर साम्यवादी, फिर स्वतंत्र पार्टी में, फिर जनता पार्टी में। वहां से स्वर्ण-कांग्रेस में आया और आजकल इंदिरा-कांग्रेस में हूं, क्योंकि अब आसार उसी के नजर आते हैं।
नेता पार्टी का मतलब भी एक ही जानता है--हाजमा भी खराब हो तो भी! उसकी अपनी बंधी भाषा है।
भीड़ से डरोगे, वेद से भी डरोगे। वेद प्रतीक है। मुसलमान हो तो कुरान समझ ले और ईसाई हो तो बाइबिल समझ ले और बौद्ध हो तो धम्मपद समझ ले। तुमने जिस किताब को मान रखा हो, वही वेद है। तुम जिस किताब को मान कर चल रहे हो, वही वेद है।
लोक बेद...
अगर तुम भीड़ से डरोगे तो भीड़ की किताब को भी मान कर चलना पड़ेगा। और भीड़ की किताबों ने क्या-क्या पाप तुमसे नहीं करवा लिए हैं! मनुस्मृति ने क्या-क्या पाप नहीं करवा लिए हैं! लेकिन अगर हिंदू हो तो मनुस्मृति को मान कर चलना ही पड़ेगा। क्योंकि हिंदुओं की भीड़ को बांध कर कौन रखेगा? कोई किताब चाहिए, कोई नियम चाहिए, कोई व्यवस्था चाहिए--वह कौन देगा?
इसलिए किताबें इतनी मूल्यवान हो गई हैं। अपनी बुद्धि मूल्यहीन हो गई है, परायी बुद्धियां मूल्यवान हो गई हैं। मनु महाराज को मरे पांच हजार वर्ष हो गए, लेकिन उनसे छुटकारा नहीं होता। अब भी जब तुम कभी किसी हरिजन को जलाते हो तो उसमें मनु महाराज की किताब का हाथ होता है।
तुम्हें शायद ज्ञात हो या न हो, लेकिन मनुस्मृति ने ब्राह्मण, शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय की अखंड धारा चलाई है, भेद बिलकुल सुनिश्चित कर दिए। इतने सुनिश्चित कि जिनको तुम महापुरुष कहते हो वे भी महापुरुष नहीं मालूम होते।
स्वयं राम ने एक शूद्र के कानों में गरम सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था, क्योंकि उसने वेद को सुनने की हिम्मत की थी। सुनने की हिम्मत, क्योंकि वेद वर्जित है शूद्र के लिए! और राम को तुम मर्यादा-पुरुषोत्तम कहते हो! शायद इसीलिए कहते हो, क्योंकि तुम्हारी मर्यादा से बाहर नहीं गए। तुम्हारी मर्यादा यही थी कि शूद्र वेद को न सुने; पढ़ना तो दूर, सुने भी नहीं। और एक शूद्र ने वेद को सुन लिया, उसके कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया। मर ही गया होगा बेचारा।
और अगर राम ऐसे कृत्य कर सकते हैं तो फिर छोटे-मोटे राम जो करते हैं गांव-गांव में, वह सब मर्यादा है! ये छोटे मर्यादा-पुरुषोत्तम!
तुम्हारे महापुरुष भी तुम्हारी मानें तो महापुरुष, तुम्हारी न मानें तो महापुरुष नहीं। यह चमत्कार है कि छोटे-छोटे लोग भी अपने महापुरुषों को अपने पीछे चलवाते हैं। इस जगत का नियम है कि नेता को नेता होना हो तो अनुयायियों के पीछे चलना पड़ता है। यह बड़ा उलटा नियम है। असली नेता वही है, समझदार नेता वही है जो देख ले कि भीड़ कहां जा रही है और सदा भीड़ को देख कर हमेशा भीड़ के आगे हो जाए। पीछे से तो भीड़ के पीछे होता है, वस्तुतः तो भीड़ के पीछे होता है, देख लेता है भीड़ कहां जा रही है। अगर बाएं मुड़ती है भीड़ तो होशियार नेता बाएं मुड़ जाता है; दाएं मुड़ती है भीड़ तो होशियार नेता दाएं मुड़ जाता है! नेता तो ऐसे है जैसे हवा का रुख बताने वाला पंखा होता है, जो हवा का रुख बताता रहता है--बाएं, दाएं, कहां हवा बह रही है, पंखी उसी तरफ उड़ने लगती है।
तुम्हारे महापुरुष भी बिलकुल थोथे हैं। नहीं तो तुम उन्हें महापुरुष मानोगे भी नहीं; तुम उन्हें पत्थर मारोगे, गालियां दोगे। तुम उन्हें जिंदा जला दोगे। और तुमने वही किया है--असली महापुरुषों के साथ तुमने वही किया है। राम को तो मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा है, लेकिन महावीर का उल्लेख भी नहीं किया। हिंदू शास्त्रों में महावीर का कोई उल्लेख नहीं है। क्यों? क्योंकि इसने वेद की मर्यादा नहीं मानी, इसने मनुस्मृति की मर्यादा नहीं मानी। इसने चार वर्णों का नियम नहीं माना और न ही चार आश्रमों का नियम माना। और इतना ही नहीं, यह व्यक्ति वस्त्र छोड़ कर नग्न खड़ा हो गया। इसने सब मर्यादाएं तोड़ दीं। यह बगावती है। इस बगावती को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए महावीर को पत्थर मारे गए, गांव-गांव से खदेड़ा गया, कानों में सींकचे ठोंक दिए गए। भयानक खूंखार कुत्ते महावीर के पीछे छोड़े गए। महावीर को जितना सताया जा सकता था, सताया गया।
वही तुमने बुद्ध के साथ किया। चट्टानें सरकाईं पहाड़ों से--कि बुद्ध नीचे ध्यान कर रहे हैं, उनके ऊपर चट्टान गिर जाए। कहानियां कहती हैं कि चट्टानें बच कर निकल गईं, बुद्ध को छोड़ दिया उन्होंने। ऐसा लगता है कि चट्टानों के पास भी तुमसे ज्यादा समझ है। पागल हाथी बुद्ध के ऊपर छोड़ा गया। लेकिन बुद्ध के चरणों में आकर झुक गया। ऐसा मालूम होता है, तुम पागल हाथियों से भी ज्यादा पागल हो।
मीरा को तुमने जहर पिलाया, मंसूर के हाथ-पैर काट डाले, जीसस को सूली पर लटकाया, सुकरात को मौत की सजा दी।
और राम को तुम कहते हो मर्यादा-पुरुषोत्तम! उनकी मर्यादा क्या है?
पहली मर्यादा कि बूढ़े बाप की गलत आज्ञा मानी। बूढ़े बाप ने बुढ़ापे में विवाह किया है जवान लड़की से, उस जवान लड़की को वचन दे दिया है। इस बूढ़े बाप की आज्ञा मानी; आज्ञाकारी हैं--यह उनकी मर्यादा है! फिर तथाकथित ऋषियों-मुनियों की रक्षा की, पंडित-पुजारियों की--यह उनकी मर्यादा है! शूद्र के कान में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया ताकि फिर दुबारा ऐसी भूल कोई शूद्र न करे--यह उनकी मर्यादा है! इसलिए राम का गुणगान चल रहा है सदियों से, रामलीला चल रही है गांव-गांव। तुलसीदास की चौपाइयां लोगों ने रट ली हैं और सोचते हैं इन चौपाइयों को दोहरा कर वे धार्मिक हो रहे हैं। भीड़ ने राम को इतना सम्मान दिया है, उससे साफ है कि राम भीड़ की मान कर चलते रहे; जैसा भीड़ चाहती थी वैसा ही करते रहे। कुशल राजनीतिज्ञ रहे होंगे, होशियार नेता रहे होंगे!
और तुम वेदों की मानते हो, चाहे वेद कुछ भी कहें।
कोई किताब शाश्वत नहीं है, सब किताबें सामयिक होती हैं, अपने समय के अनुकूल होती हैं। अपने समय के लिए जरूरी भी होती हैं, उपयोगी भी होती हैं, उपादेय भी होती हैं। लेकिन कोई किताब शाश्वत नहीं है।
बाइबिल में लिखा है कि पृथ्वी चपटी है। अब वैज्ञानिकों ने खोज लिया कि पृथ्वी गोल है। अब मुश्किल खड़ी हो गई। वह जो वेद को मान कर चलता है, उसके लिए अड़चन खड़ी हो गई। आज से तीन सौ साल पहले, इस पृथ्वी पर पैदा हुए बड़े से बड़े वैज्ञानिकों में से एक, गैलीलियो को पोप ने बुलवाया अपनी अदालत में माफी मंगवाने को--कि माफी मांगो और कहो कि पृथ्वी चपटी है, गोल नहीं! और सूरज पृथ्वी का चक्कर लगाता है, पृथ्वी सूरज का चक्कर नहीं लगाती।
विज्ञान ने दोनों बातें खोज ली थीं। गैलीलियो की दोनों बातों के लिए काफी प्रमाण थे गैलीलियो के पास कि पृथ्वी गोल है और पृथ्वी सूरज का चक्कर लगाती है, सूरज नहीं। मगर गैलीलियो भी बहुत अलमस्त आदमी रहा होगा। बूढ़ा था, लेकिन बड़ा समझदार रहा होगा। उसने कहा कि ठीक, आप सबको इससे प्रसन्नता होती है कि पृथ्वी चपटी रहे, आपकी मौज! मैं कहे देता हूं--पृथ्वी चपटी है, गोल नहीं। और आपको आनंद मिलता है यह बात जान कर कि सूरज पृथ्वी का चक्कर लगाए, पृथ्वी सूरज का न लगाए। मैं बिलकुल राजी हूं। मुझे क्या अड़चन है? मेरा क्या बनता-बिगड़ता है? मैं कहे देता हूं कि सूरज ही चक्कर लगाता है, पृथ्वी चक्कर नहीं लगाती। लेकिन एक बात ध्यान रहे, मेरे कहने से कुछ भी नहीं होता। पृथ्वी गोल है और गोल ही रहेगी। और पृथ्वी सूरज का चक्कर लगाती है तो चक्कर लगाएगी ही। गैलीलियो की आज्ञा का कुछ भी अर्थ नहीं, मैं कितना ही चिल्लाऊं। मगर मैं कहे देता हूं, मैं क्षमा मांगे लेता हूं, मैं घुटने टेके देता हूं। मैं इस झंझट में नहीं पड़ता, मैं इस तरह की क्षुद्र बातों को व्यर्थ का विवाद नहीं बनाना चाहता। लेकिन मैं क्या करूं?
उसने बार-बार दोहरा कर कहा कि मैं क्या करूं? उसने पोप को अच्छा लथाड़ा। माफी तो मैं मांग रहा हूं, मेरी तरफ से मांग सकता हूं, पृथ्वी के लिए मैं क्या कर सकता हूं! पृथ्वी...आप पृथ्वी को अदालत में बुलाइए।
लेकिन क्या पोप को अड़चन थी? अगर विज्ञान ने यह तथ्य खोज लिया है तो इसे स्वीकार करने में अड़चन क्या थी? एक अड़चन आती है। और वह अड़चन यह है कि अगर बाइबिल की एक बात गलत हो सकती है तो फिर शक पैदा होता है, और बातें भी गलत हो सकती हैं। इस शक से तो बड़ी असुविधा हो जाएगी। एक ईंट खिसक जाए बुनियाद की, तो और ईंटें भी लोग खिसकाने लगेंगे। लोग कहेंगे कि जब तुम्हारे धर्मग्रंथ में ऐसी बुनियादी भूल है, तो क्या पता कि बाकी भी सब भूलें हों! तो वह जो विश्वास का एक गढ़ खड़ा कर रखा है, वह गिरना शुरू हो जाएगा।
इसलिए कोई धर्म अपनी धार्मिक किताब में किसी तरह का विचार स्वीकार नहीं करना चाहता। जैसा लिखा है, बस वैसा; उससे इंच भर इधर-उधर नहीं होना। और कोई धर्मग्रंथ सदा के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। अपने समय की प्रतिछाया होती है उसमें; अपने समय की भाषा होती है; अपने समय के नियम प्रतिबिंबित होते हैं। और ठीक अपने समय के लिए वह उपयोगी भी रहा है। लेकिन उसे सदा के लिए उपयोगी बनाना और सदा के लिए लोगों की छाती पर थोप देना खतरनाक है, महंगा सौदा है। लेकिन हम खुद ही कर लेते हैं। हम लोगों से डरते हैं और हम शास्त्रों से डरते हैं। और ये दोनों भय हमें अपने अंतरतम में नहीं जाने देते।
स्वयं की प्रज्ञा को निखारो। स्वयं की बुद्धि को धार धरो। शास्त्र में नहीं, स्वयं में छिपा है सत्य। और भीड़ में नहीं; पाओगे अगर परमात्मा को तो अपने में, स्वयं में।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।
एक ऐसी भी चैतन्य की दशा है, जहां न संग्रह है, न परिग्रह है, न त्याग है। इस बात को समझना। क्योंकि दुनिया में दो तरह के लोग हैं। होने चाहिए तीसरे तरह के लोग, लेकिन तीसरे तरह के लोग तो कभी-कभी होते हैं--बहुत विरल। दुनिया में दो तरह के लोगों की भीड़ है। एक वे जो संग्रह में जीते हैं--इकट्ठा किए जाओ, भरे जाओ--कुछ भी हो, कूड़ा-करकट, लेकिन भरे जाओ, इकट्ठा किए चले जाओ!
मैं एक मित्र के साथ घूमने निकलता था। एक साइकिल का हैंडल पड़ा था रास्ते के किनारे। उन्हें संकोच तो बहुत लगा, लेकिन मुझसे कहा, माफ करिए! और उन्होंने तो हैंडल उठा लिया।
मैंने कहा, इस जंग लगे हैंडल का, टूटे-फूटे हैंडल का क्या करोगे?
उन्होंने कहा, आप देखिए! ऐसे ही मैंने दो चाक भी इकट्ठे कर लिए हैं। पैडिल भी एक है मेरे पास। जरा देखते जाइए--बनत बनत बनि जाई! एक न एक दिन साइकिल बना कर बता दूंगा।
और जब मैं उनके घर गया, तब तो मैं चकित रह गया, उन्होंने तो कई तरह की चीजें इकट्ठी कर रखी थीं; जिन चीजों का कोई उपयोग नहीं रहा, वे भी सब इकट्ठी कर रखी थीं। उनके घर में रहने की ही जगह नहीं बची थी--टूटा-फूटा फर्नीचर, बर्तन-भांडे, सब...। उनके घर में जो भीतर आता वह बाहर जाता ही नहीं। जो चीज भीतर आ गई वह इकट्ठी होती चली जाती।
कोई धन इकट्ठा करता है, कोई ज्ञान इकट्ठा करता है। कुछ हैं जो त्याग इकट्ठा करने लगते हैं, मगर इकट्ठा करना जारी रहता है। यह क्यों ऐसा होता है? इकट्ठा करने की यह इतनी दौड़ क्यों है? यह परिग्रह का इतना पागलपन क्यों है?
हम बहुत खाली मालूम होते हैं। आत्मज्ञान के बिना व्यक्ति खाली है ही। और खालीपन काटता है; इसे किसी तरह भर लो! लोग ज्यादा भोजन करके भर लेते हैं।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि लोग ज्यादा भोजन इसीलिए कर लेते हैं कि खालीपन लगता है। ज्यादा कपड़े इकट्ठे कर लेते हैं, क्योंकि खालीपन लगता है। कुछ भी इकट्ठा करो, इकट्ठा करने का यह जो रोग है, यह तुम्हारे भीतर की रिक्तता का सूचक है। पश्चिम में बहुत रिक्तता का बोध है, इसलिए पश्चिम में इकट्ठा करे जाओ चीजों को। और यहां भी, चीजें उतनी नहीं हैं, सुविधा उतनी नहीं है इकट्ठी करने की, इसलिए लोग कूड़ा-करकट ही इकट्ठा करते हैं--मगर कुछ न कुछ इकट्ठा करते जाओ। इकट्ठा करने में एक तरह की भ्रांति होती है कि हम भरे-पूरे हैं।
भरा-पूरा तो आदमी सिर्फ तभी होता है जब राम से भरता है। फिर याद दिला दूं: दशरथ के बेटे राम से मतलब नहीं है। दशरथ के बेटे राम से तो मुझे कुछ लेना-देना ही नहीं है। राम से मेरा अर्थ है--परमात्मा से, आत्मा की परम अवस्था से। जब आत्मा प्रकाशित होती है, जब आत्मा का राज्य उपलब्ध होता है, तब तुम लगोगे भरे-पूरे। अन्यथा खाली लगोगे। और कितना ही भरो, कितनी ही चीजों से भर लो--पद से, प्रतिष्ठा से, नाम से--कुछ भी न होगा।
एक अंतर्राष्ट्रीय भोज-सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें दूर-दूर देशों से आए हुए महारथी सम्मिलित हुए थे। सम्मेलन में सबसे ज्यादा भोजन करने वाले व्यक्ति को सम्मानित किया जाने वाला था तथा उसे अनेक उपहार दिए जाने वाले थे। प्रतियोगिता आरंभ हुई और अंततः चंदूलाल ने दो सौ पूरियां, चार सौ रसगुल्ले, दो सौ प्लेट दही-बड़े, चार सौ कचौड़ियां और अस्सी गिलास शरबत पीकर अंत तक मैदान में अपने को जमाए रखा। निर्णायकों ने घबड़ा कर उसे विजयी घोषित किया कि कहीं मर-मरा न जाए। वह तो अभी तत्पर था और। वह तो कहता था, और थोड़ा चल जाने दो। रिकार्ड ही कायम कर देना है! मगर निर्णायक घबड़ा गए, उन्होंने कहा कि रिकार्ड कायम हो गया। मगर हम पर भी दया करो, नहीं तो हम पकड़े जाएंगे। अगर तुम मर गए तो पुलिस हमें सताएगी।
उन्होंने उसे विजयी घोषित किया और पुरस्कार लेने के लिए स्टेज पर आमंत्रित किया। बामुश्किल उठ सका चंदूलाल। तुम खुद ही सोच लो कैसे उठा होगा। मगर उठ गया।
अहंकार की तृप्ति जो न करवा ले थोड़ा है। मुर्दा उठ आते हैं। कोई मर जाए, उसके कान में अगर जाकर कह दो कि अरे, यह भी कोई वक्त है मरने का! अभी चुनाव पास, जीतने का मौका! और तुम हैरान मत होना अगर वह उठ कर बैठ जाए।
किसी तरह चंदूलाल उठ कर खड़ा हो गया, स्टेज पर पहुंचा। पुरस्कार लेने के बाद लोगों को संबोधित करते हुए बोला, दोस्तो! मैं आज यहां इस प्रतियोगिता में सम्मिलित हुआ हूं, कृपया इस बात को मेरी पत्नी तक न पहुंचने दें, अन्यथा वह मुझे आज का खाना नहीं देगी और मैं भूखा रह जाऊंगा।
लोग भरे जाते हैं, भरे जाते हैं। फिर भी भरता नहीं कुछ; फिर भी खाली के खाली रह जाते हैं।
मुझे एक कहानी बहुत प्रीतिकर है--सूफियों की कहानी है। एक फकीर ने एक सम्राट के द्वार पर अपना भिक्षापात्र रखा। सुबह-सुबह थी और सम्राट अपने बगीचे से घूम कर महल में प्रवेश कर रहा था। सम्राट ने कहा, क्या चाहते हो?
फकीर ने कहा, क्या का सवाल नहीं है। एक बात चाहता हूं कि मेरा भिक्षापात्र खाली न रहे। चाहे कंकड़-पत्थरों से भर दो, मगर भर दो। रिक्तता काटती है। खाली नहीं रहना चाहता। मेरा भिक्षापात्र भर दो।
सम्राट ने कहा, यह भी कोई बहुत बड़ा सवाल है! इतना छोटा सा भिक्षापात्र, अभी भरवाए देते हैं!
लेकिन उस फकीर ने फिर कहा कि देखना, खयाल रखना। शर्त यह है कि भिक्षापात्र भरना चाहिए, नहीं तो हटूंगा नहीं द्वार से।
सम्राट ने कहा, अरे पागल! तूने मुझे समझा क्या है, कोई भिखमंगा समझा है? अपने वजीरों को बुला कर कहा कि भर दो सोने से इसका भिक्षापात्र!
स्वर्ण-अशर्फियां डाली गईं। मगर उसका भिक्षापात्र अदभुत था। डाली गईं स्वर्ण-अशर्फियां, आवाज भी न करें और खो जाएं। खन-खन की आवाज भी न हो। जैसे किसी अतल गहराई में गिर गईं! छोटा सा भिक्षापात्र और जब झांक कर देखो तो उनका पता ही न चले। खजाना खाली होने लगा। दोपहर हो गई, सारी राजधानी इकट्ठी हो गई, खबर आग की तरह फैल गई कि सम्राट ने एक झंझट ले ली। बड़े-बड़े युद्ध जीता, एक फकीर से हारा जा रहा है। और फकीर अपना भिक्षापात्र लिए खड़ा है और अपना चमीटा बजा रहा है। और वह कहता है कि तब तक नहीं हटूंगा...जब शर्त स्वीकार की है तो मेरा भिक्षापात्र भर दो। और राजा के आंसू निकले आ रहे हैं और राजा की कमर टूटी जा रही है। हीरे-जवाहरात भी चले गए, सोना-चांदी भी चला गया। जो कुछ भी था पास, सब समाप्त हो गया। सांझ होतेऱ्होते खजाने खाली हो गए। वजीरों ने कहा, अब हमारे पास कुछ भी नहीं है।
सम्राट उसके पैरों पर गिर पड़ा और कहा, मुझे क्षमा करो! मगर जाने के पहले एक राज बता जाओ, तुम्हारे इस भिक्षापात्र का क्या रहस्य है?
उस फकीर ने कहा, इसका कोई रहस्य नहीं है। इसे मैंने आदमी की खोपड़ी से बनाया है। न आदमी की खोपड़ी कभी भरती है, न यह भिक्षापात्र कभी भरता है। इसका कोई बड़ा राज नहीं है। ऐसे ही मरघट पर यह खोपड़ी मिल गई थी, इसको घिस-घिस कर, ठीक-ठाक करके मैंने भिक्षापात्र बना लिया। जब मैंने बनाया था भिक्षापात्र, मुझे भी यह राज पता नहीं था। वह तो जब मैंने चीजें इसमें रखीं और खो गईं, तब मैं चौंका कि वाह! वाह रे आदमी! जिंदा में भी चमत्कार, मर कर भी चमत्कार!
वही चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और...
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है।
तो एक तरफ परिग्रह वाले लोग हैं, जो इकट्ठा करते चले जाते हैं। फिर इकट्ठा करते-करते थक जाते हैं, बुरी तरह थक जाते हैं। थक जाते हैं तो उलटा करने लगते हैं। सोचते हैं परिग्रह से तृप्ति नहीं मिली तो त्याग से मिलेगी। पहले धन इकट्ठा करते थे, अब धन छोड़ कर भागते हैं। पहले स्त्रियों के पीछे भागते थे; अब स्त्रियां देखीं कि एकदम भागते हैं, उनकी तरफ पीठ करके भागते हैं। जो-जो पहले किया था उससे उलटा करने लगते हैं। जैसे कोई आदमी सोचता हो कि शीर्षासन करेंगे तो जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
अगर बुद्धू शीर्षासन करे तो क्या तुम सोचते हो बुद्ध हो जाएगा? शीर्षासन करके और बुद्धू मालूम पड़ेगा, और महाबुद्धू हो जाएगा। कम से कम पैर के बल था, थोड़ी-बहुत बुद्धि की संभावना थी, अब वह भी न रही।
लेकिन मनुष्य के जीवन का एक तर्क है--एक काम करके जब थक जाता है तो तत्क्षण दूसरी अति पर चला जाता है। स्वभावतः उसे लगता है ऐसा करने से नहीं हुआ, इससे विपरीत करके देख लूं। इसलिए भोगी हैं, परिग्रही हैं और त्यागी हैं।
और तुम यह चकित होओगे जान कर: जितना भोगी समाज हो उतना ही उसमें त्यागियों का आदर होता है। क्योंकि भोगी को त्याग का तर्क समझ में आता है। उसके मन में भी लग रहा है कि कुछ मिल तो रहा नहीं है, इकट्ठा तो कर रहा हूं, कुछ मिल तो रहा नहीं है। अभी अपनी सामर्थ्य कम है, आत्मबल कम है, संकल्प कम है। जब संकल्प होगा तो हम भी त्याग कर और मुनि हो जाएंगे।
तुम देखते हो, इस देश में जैनियों के पास सर्वाधिक धन है, सर्वाधिक सुविधा--और जैन ही सर्वाधिक त्याग के पक्षपाती! परिग्रह है और त्याग का पक्षपात! ऊपर से देखने में विपरीत मालूम होता है, मगर भीतर एक ही तर्क का फैलाव है। जैन अपने मुनि से जितने त्याग की अपेक्षा करता है उतना कोई समाज अपने साधुओं से नहीं करता। मुसलमान अपने फकीर से इतने त्याग की आशा नहीं करते। क्योंकि मुसलमान के पास अभी कुछ है ही नहीं, अभी वह थका ही नहीं है परिग्रह से, तो त्याग की अपेक्षा कैसे करे? लेकिन जैन अपने फकीर से बहुत त्याग की अपेक्षा करते हैं। जैन श्रावक तो बिलकुल जांचते ही रहते हैं अपने मुनि को, कि कहीं जरा सी भूल-चूक मिल जाए कि इसको ठिकाने लगा दें! कब उठता, कब बैठता; क्या खाता, क्या पीता; कितना खाता, कितना पीता--सब जांच-पड़ताल रखते हैं। व्रत-उपवास नियम से करता कि नहीं करता--सब तरह का हिसाब रखते हैं। मगर धोखा देने वाले रास्ते निकाल ही लेते हैं।
कुछ दिनों पहले जैनों के एक तीर्थ शिखरजी में नग्न दिगंबर जैन मुनि पकड़े गए एक ऐसे मामले में, पुलिस थाने ले जाना पड़ा उनको, कि कल्पना भी नहीं की जा सकती! जैनियों ने काफी रिश्वत देकर, खिला-पिला कर बात को दबाया कि अखबारों तक न पहुंच जाए, क्योंकि जैन मुनि और ऐसे मामले में! दो जैन मुनि झगड़ पड़े और एक-दूसरे की मार-पीट कर दी।
अहिंसा! नग्न! अब झगड़े को है भी क्या पास? झगड?ने के लिए भी कोई निमित्त चाहिए! मगर निमित्त था। दोनों ने अपनी पिच्छी में...पिच्छी होती है साथ, जिससे जमीन साफ करने को कि कोई चींटी इत्यादि न मर जाए, उसमें डंडा होता है, उस डंडे को पोला करके सौ-सौ के नोट उसमें भर रखे हैं और दोनों ने तय कर रखा था कि आधा-आधा बांटेंगे। जिसके डंडे में ये नोट थे वह जरा ज्यादा रखना चाहता था। स्वभावतः, क्योंकि रखे उसने, झंझट उसने उठाई, खतरा उसने मोल लिया। मगर दूसरे को राज पता था; उसने कहा, राज मैंने छिपाया, नहीं तो कभी की मिट्टी पलीद हो जाती है। बराबर हिस्सा बंटना चाहिए।
इसी पर झगड़ा हो गया। और तो कुछ था नहीं, बस वही पिच्छियां थीं, उन्हीं से एक-दूसरे की पिटाई कर दी। कुछ गांव के लोगों ने देख लिया, उन्होंने पुलिस में खबर कर दी। पुलिस थाने में दिगंबर जैन मुनि मौजूद--और तब यह सब राज खुला कि झगड़ा नोटों का है!
अब तुम कभी सोच भी नहीं सकते कि दिगंबर जैन मुनि अपनी पिच्छी की डंडी में और नोट रखे होगा! अब की बार दिगंबर जैन मुनि मिले तो पहले पिच्छी की डंडी देखना, पीछे नमस्कार करना। मगर अब उन्होंने कोई दूसरी तरकीब निकाल ली होगी, क्योंकि वह बात तो पकड़ी जा चुकी।
जहां नियम है वहां नियम से बचने के लिए चालाकियां भी निकल आती हैं। अब क्या भेद रहा? और फिर जब तुम त्यागते हो तो किसलिए? उसमें भी आशा है--कि पुण्य होंगे, पुण्य के फल मिलेंगे स्वर्ग में। मगर वही व्यवसाय, वही वाणिज्य, वही व्यवसाय-बुद्धि, वही गणित--जरा भी कहीं अंतर नहीं है।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।
पलटू कहते हैं कि न तो संग्रह है और न त्याग; न भोग, न योग--इन दोनों के ऊपर जो जाए वही पाता है। अतियों से जो मुक्त हो उसी की उपलब्धि है।
पलटूदास गुरु नहिं चेला, एक राम रम रमनी।
जब एक ही रह जाए...और वह एक कौन है? उस एक का क्या नाम है? उस एक का क्या स्वरूप है?
साक्षी-भाव उसका नाम, साक्षी-भाव उसका स्वरूप। संग्रह में भी कर्ता आ जाता है और त्याग में भी कर्ता आ जाता है। और जहां कर्ता आ गया वहां संसार आ गया। कर्ता यानी संसार का द्वार।
जहां भी होओ--चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी होओ चाहे भोगी--एक बात खयाल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो--तो पर्याप्त। बस यह साक्षी-भाव सतत बहने लगे, चौबीस घंटे बहने लगे, सपने में भी बना रहे, सपने में भी दिखाई पड़ता रहे कि मैं साक्षी हूं--फिर तुम्हारे ऊपर कोई कालिख न रह जाएगी, कोई कलुष न रह जाएगा, कोई कल्मष न रह जाएगा। तुम परम शुद्ध परमात्मा को अनुभव कर लोगे! वह तुम्हारे भीतर विराजमान है, एक क्षण को भी वहां से हटा नहीं है। लेकिन तुम भागे-भागे हो--कभी भोग में, कभी त्याग में।
त्याग से भी बचो, भोग से भी बचो; उन दोनों में बहुत भेद नहीं है।
मुल्ला नसरुद्दीन, ऐसा लगता है कि ये दो कप तुम्हें किसी प्रतियोगिता में मिले होंगे--मुल्ला के घर आए हुए एक मेहमान ने चांदी के दो कपों को देख कर पूछा।
हां, मुझे अखिल विश्व-संगीत-प्रतियोगिता में ये ईनाम में मिले थे।
अच्छा! कब-कब मिले थे?
सन उन्नीस सौ छप्पन में।
एक ही प्रतियोगिता में दो कप क्यों मिले?
जब मैंने गायन-वादन प्रारंभ किया तब यह छोटा सा कप मिला--मुल्ला नसरुद्दीन ने समझाया--और बाद में गाना बंद करवाने के लिए उन्होंने यह बड़ा वाला कप ईनाम में दिया।
गाना शुरू करो कि गाना बंद करो--ये एक ही प्रक्रिया के दो अंग हुए। भोग या त्याग, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस सत्य को जितना गहरा अपने भीतर उतर जाने दो उतना अच्छा है।
मुल्ला नसरुद्दीन रोज अभ्यास करता है, वर्षों से अभ्यास करता है संगीत का। और जब भी अभ्यास करता है तो उसकी पत्नी बाहर आकर टहलने लगती है। एक दिन मैंने उसकी पत्नी से पूछा, यह बात क्या है? जैसे ही मुल्ला राग छेड़ता है, उसने भरा आलाप, कि तू लाख काम छोड़ कर एकदम बाहर क्यों निकल आती है? और जब तक वह बंद नहीं करता अभ्यास, बाहर ही टहलती रहती है!
उसने कहा, इसलिए ताकि मोहल्ले वाले यह न समझें कि मैं उसकी पिटाई कर रही हूं।
और मुल्ला नसरुद्दीन का अभ्यास भी जानने योग्य है। बस एक ही तार को सितार के, वह खींचता रहता है। थोड़े दिन तक तो लोगों ने बरदाश्त किया। सुबह, सांझ, रात, वक्त-बेवक्त बस एक ही स्वर निकालता रहता है। आखिर मुहल्ले वालों ने उसकी पत्नी से प्रार्थना की कि भई यह किस तरह का अभ्यास हो रहा है? एक ही सुर सुन-सुन कर हम दीवाने हुए जा रहे हैं। कभी-कभी तो ऐसी हालत हो जाती है कि अपना सिर दीवाल से फोड़ लें कि क्या करें! इसका एक सुर बजता ही रहता है!
मुल्ला की पत्नी ने कहा, मैं भी क्या करूं! मैंने उनसे प्रार्थना की है कि आप यह एक सुर बजाना बंद करो। दुनिया में हमने और भी वादक देखे हैं, कई सुर बजाते हैं, सब तार छेड़ते हैं।
नसरुद्दीन ने कहा, उनको अभी अपना सुर मिला नहीं, वे उसकी खोज कर रहे हैं। मुझे मिल गया, अब मैं क्यों खोजूं? जब मिल ही गया तो मैं उसी को बजाता हूं।
एक रात एक पड़ोसी ने खिड़की खोली और नसरुद्दीन से कहा, नसरुद्दीन, अब बंद भी करो बड़े मियां, चार बज गए! अगर एक मिनट और बजाया तो मैं खिड़की से कूद कर आत्महत्या कर लूंगा।
नसरुद्दीन ने कहा कि तुम्हारी मर्जी। मुझे तो सितार बंद किए दो घंटे हो चुके।
अब तुम सोच सकते हो, लोगों की क्या हालत हो गई होगी! पगला गए हैं! अभी भी उनको सुनाई पड़ रहा है, वह दो घंटे से बंद ही कर चुका है। उसने कहा, मैं तो सो रहा था, तुमने बुलाया तो नींद में से उठा हूं। इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है।
एक तरफ वे लोग हैं जो भागे जा रहे हैं वस्तुओं की तरफ पागलों की तरह! एक धुन सवार है, एक सुर उनको पकड़ गया है--किसी को धन का, किसी को पद का, किसी को प्रतिष्ठा का। फिर किसी तरह थक जाते हैं, तो भी पुरानी आदत नहीं छूटती, विपरीत दौड़ने लगते हैं--त्याग, साधुता, संतत्व। मगर दौड़ वही, चाल वही, राग वही! वही पुराना ढंग, वही पुराना मन! जाना है दोनों के पार।
चलहु सखी वहि देस, जहवां दिवस न रजनी।।
पाप पुन्न नहिं चांद सुरज नहिं, नहीं सजन नहीं सजनी।।
धरती आग पवन नहिं पानी, नहिं सूतै नहिं जगनी।।
लोक बेद जंगल नहिं बस्ती, नहिं संग्रह नहिं त्यगनी।।
पलटूदास गुरु नहिं चेला, एक राम रम रमनी।।
चित मोरा अलसाना, अब मोसे बोलि न जाई।
अगर द्वंद्व से ऊपर उठ जाओ, अगर दो को पीछे छोड़ दो और एक हो जाओ, तो यह घटना घटेगी--
चित मोरा अलसाना...
मन निश्चल हो जाएगा, थिर हो जाएगा, अचल हो जाएगा।
चित मोरा अलसाना, अब मोसे बोलि न जाई।
अचानक तुम पाओगे: एक ऐसी शांति, एक ऐसी गहन शांति तुम्हारे भीतर उतरी है--जो तुम्हारी निर्मित नहीं है; जो तुमने ठोंक-पीट कर अपने को किसी तरह आरोपित नहीं कर ली है; जो तुमने जबरदस्ती योगासन इत्यादि लगा कर, अपने को समझा-बुझा कर, बांध-बूंध कर खड़ी नहीं कर ली है। एक अपूर्व शांति तुम उतरती हुई पाओगे--आकाश से, अनंत से, विराट से! या अपने भीतर उगते हुए पाओगे। मगर तुम्हारा कृत्य नहीं होगी वह--प्रसादरूप!
चित मोरा अलसाना...
प्रसादरूप चित्त निश्चल हो जाता है।
अब मोसे बोलि न जाई।
अब बोलना मुश्किल हो जाता है।
लोग हैं जिनसे बिना बोले नहीं रहा जाता। उन्हें चाहिए ही चाहिए कोई जिससे वे बोलें, चाहे बोलने को कुछ भी न हो। बोलने को है भी क्या? लेकिन लोग बोले जा रहे हैं। सारी पृथ्वी पर चर्चा चल रही है, शोरगुल मचा हुआ है। तुम रुकना भी चाहो तो रुक नहीं सकते।
लोग रात में भी नींद में बड़बड़ा रहे हैं। दिन में ही नहीं बोलते, रात में भी बोल रहे हैं। और अगर उनको अकेला छोड़ दो दो-चार-दस दिन रहने के लिए, तो अकेले में खुद से ही बातें करने लगेंगे। वैज्ञानिक कहते हैं, इक्कीस दिन लगेंगे उन्हें अकेले में अपने से बात करने में। बस इक्कीस दिन के बाद बरदाश्त के बाहर हो जाएगा। फिर वे खुद ही बोलेंगे और खुद ही जवाब देंगे। आखिर किसी चीज में तो अपने को उलझाएंगे। बातें इतनी इकट्ठी हो जाएंगी इक्कीस दिन में उनके भीतर कि बहने लगेंगी--ऊपर से बहने लगेंगी, अब कोई सुने कि न सुने।
मुल्ला नसरुद्दीन चंदूलाल से कह रहा था, चंदूलाल, मेरी पत्नी बड़ी अजीब है, अकेले में ही बोलती रहती है!
चंदूलाल ने कहा, है तो मेरी भी इतनी ही अजीब, मगर उसको एक भ्रांति है, वह सोचती है कि मैं सुन रहा हूं। हालांकि सुनता कौन है!
एक बड़े मनोवैज्ञानिक से उसके शिष्य ने पूछा कि मैं तो थक जाता हूं बीमारों की बातें सुन-सुन कर। पागलों की बातें सुन-सुन कर कौन न थक जाएगा! और आप सुबह आते ताजा और शाम दिन भर न मालूम पच्चीसों मरीजों की बकवास सुन कर जब लौटते हैं तब भी ताजा! और यह उम्र! इसका राज क्या है?
उस बूढ़े मनोवैज्ञानिक ने कहा, इसका राज कुछ भी नहीं। सुनता ही कौन है!
मैं एक राजनेता को जानता था--कैलासनाथ काटजू। उनके दोनों कान खराब थे। वे जब तक यंत्र न लगाएं तब तक सुन नहीं सकते थे। और जब भी कोई उनसे कुछ शिकायत करने आए, वे पहला काम करते थे यंत्र निकाल कर रख देते थे। ये होशियारों के लक्षण हैं। मैंने उनसे पूछा कि यह आपने तरकीब कैसे खोजी?
उन्होंने कहा, और क्या करूं? मार डालेंगे! इनकी बकवास सुन-सुन कर...इनको भी लगता रहता है कि मैं सुन रहा हूं; ये भी प्रसन्न और मैं भी प्रसन्न। ये समझे कि सुन लिया और प्रसन्न घर लौटते हैं और मैं हांऱ्हूं करता रहता हूं।
तुम भी अगर गौर करोगे तो तुम लोगों की बात इसी तरह सुनते हो, नहीं तो पगला जाओगे। कौन सुनता है! कौन किसकी सुनता है! तुम्हें वह आदमी बहुत बोर करने वाला मालूम पड़ता है जो तुम्हारी नहीं सुनता है--जो अपनी ही सुनाए जाता है; जो इतना बलवान है कि पिलाए चला जाता है। तुम लाख बचने का उपाय करो, वह छोड़ता ही नहीं।
एक तो ऐसी अवस्था है मनुष्य की, जब तुम रुकना चाहो तो रुक नहीं सकते, बोलते ही चले जाते हो; और एक ऐसी अवस्था भी आती है परम मौन की, कि बोलना कठिन हो जाता है, एक-एक शब्द खींचना पड़ता है। सत्य का अनुभव तो उस परिपूर्ण, शांत, मौन अवस्था में होता है। लेकिन सत्य के साथ जगती है करुणा और करुणा कहती है कि जो जाना है, वह जनाओ। करुणा कहती है, जो पाया है वह लुटाओ। और तब शब्द नहीं मिलते।
चित मोरा अलसाना, अब मोसे बोलि न जाई।
पलटू कहते हैं: एक वक्त था कि बोल ही बोल चलता था--काम, बेकाम; जरूरत, गैर-जरूरत; और अब ऐसी घड़ी आई कि चित्त अलसा गया है, निश्चल हो गया है। अब बोलने की घड़ी आई, बोला नहीं जाता। अब मौका आया कि कुछ कहूं, कि कुछ कहने योग्य मेरे पास है--और शब्द नहीं जुटते।
देहरी लागै परबत मोको...
और एक वक्त था कि भागा फिरता था, पहाड़ लांघ जाता। शांति ही न थी तो आपाधापी थी, भाग-दौड़ थी। सात समंदर लांघ जाता। और अब हालत यह आ गई है: देहरी लागै परबत मोको! वह जो घर की देहरी है, उसके बाहर जाने का मन नहीं होता।
देहरी लागै परबत मोको, आंगन भया है बिदेस।
अपना ही आंगन विदेश हो गया है। अपने आंगन में भी जाने का मन नहीं रहा--जाने का ही मन नहीं रहा। मन ही नहीं रहा। सारा व्यवसाय क्षीण हो गया, सारा व्यापार बंद हो गया। मन की गति खो गई, मन की चंचलता खो गई। और अब मौका था कि जाता, क्योंकि लोग हैं जो भटक रहे हैं। अब था कि उन्हें हिलाता-डुलाता। अब था कि कुछ कहता उनसे। अब मेरी बात में कुछ प्रामाणिकता थी। अखबार में पढ़ी बात न थी। वेद और कुरान में पढ़ी बात न थी। लिखालिखी की है नहीं, देखादेखी बात! जब तक लिखालिखी की थी, खूब कहा, खूब सुना; अब देख लिया, अब कहने का क्षण आया, मगर अब कहने के लिए शब्द नहीं।
देहरी लागै परबत मोको, आंगन भया है बिदेस।
पलक उघारत जुग सम बीते...
आंख खोलने की ही तबीयत नहीं होती।
पलक उघारत जुग सम बीते...
ऐसा लगता है, जैसे कि आंख खोलने में हजारों साल लग जाते हों। इतनी मुश्किल मालूम होती है छोटी सी बात: आंख का खोलना!
बिसरि गया संदेस।
है मेरे पास देने को, मगर कैसे दूं, शब्द बिसर गए! संदेश जिन शब्दों में दिया जा सकता था, वे शब्द बिसर गए। एक भाव है, लेकिन शब्द नहीं मिलते। एक गीत है, लेकिन गान नहीं मिलता। संगीत है, लेकिन वाद्य नहीं मिलता। घूंघर आज हाथ लगे हैं, मगर पैर कहां जिन पर बांधूं? आकाश उपलब्ध हो गया है, लेकिन पंख कट गए!
विष के मुए सेती मनि जागी, बिल में सांप समाना।
वासना के जहर से आत्मा जग गई है, लेकिन सारा ऊहापोह, सारा विचार, मन की सारी प्रक्रियाएं ऐसी हो गई हैं जैसे कोई आदमी आ जाए और सांप डर कर अपने बिल में समा जाए। मैं क्या जाग गया, मन का सांप डर कर अपने बिल में समा गया!
पलटू बड़ी कीमत की बात कह रहे हैं। यह सारे संतों की पीड़ा है। और ऐसा नहीं है कि संत नहीं बोले। बोले, खूब बोले! महावीर चालीस वर्ष जिंदा रहे ज्ञान के बाद। झरी वाणी। बुद्ध बयालीस वर्ष जिंदा रहे। सतत बोले--सुबह बोले, सांझ बोले। फिर भी बोल नहीं पाए! जो बोलना था वह अबोला ही रह गया। जो गाना था वह गीत गाया नहीं जा सका। कहा, कहने के सब तरह से प्रयास किए, लेकिन सब प्रयास असफल हो गए। उपनिषद असफल प्रयास हैं, कुरान असफल प्रयास है, धम्मपद असफल प्रयास है। महाकरुणा है उस प्रयास में, लेकिन प्रयास सफल नहीं हुआ।
कभी सफल नहीं होगा। जिसे निःशब्द में जाना है उसे शब्द में बांधने का न कोई उपाय है, न हो सकता है। उसे तो गुरु के पास निःशब्द होकर, बैठ कर ही जाना जा सकेगा। उसे तो गुरु के साथ डुबकी मारनी पड़ेगी, तो पा सकोगे। गुरु का हाथ पकड़ लो तो हो सकता है। गुरु के शब्द पकड़ोगे, चूक जाओगे।
जरि गया छाछ भया घिव निरमल...
जैसे घी बनाते हैं तो जब शुरू-शुरू में घी को आंच देते हैं तो जितनी छाछ बच रहती है घी में, वह छुन-छुन करती, आवाज करती, जलती; लेकिन जब छाछ जल जाती है और सिर्फ घी रह जाता है, तो चुप हो जाता है, सब छुन-मुन बंद हो जाती है।
जरि गया छाछ भया घिव निरमल, आपुई से चुपियाना।
बिलकुल चुप हो जाता है। बोल नहीं सूझते। मौन सहज हो जाता है। जिन्होंने जाना है उन्हें अपने ज्ञान के पर्वत-शिखरों से तुम्हारी अंधेरी घाटियों तक आना बड़ा मुश्किल हो जाता है। बड़ी कोशिश करते हैं, पुकार देते हैं! मगर तुम शब्द समझ सकते हो और उनके पास जो संदेश है, अब शब्द का नहीं, निःशब्द का है। इसलिए सत्संग से तो हो सकता है, अध्ययन-मनन से नहीं हो सकता, पठन-पाठन से नहीं हो सकता।
सदगुरु क्या कहते हैं, इसमें सार नहीं है; सदगुरु क्या हैं, इसमें सार है। सदगुरुओं से जुड़ना हो तो उनके शब्दों को कंठस्थ मत कर लेना, नहीं तो तोते हो जाओगे। सदगुरुओं से जुड़ना हो तो उनके निःशब्द से अपने को जोड़ना, उनके मौन से अपने को जोड़ना। उनके पास बैठना चुप्पी में। उनके सन्नाटे को पीना। बस उनके पास बैठते-बैठते, उठते-बैठते किसी दिन तार से तार मिल जाएंगे, किसी दिन जुगलबंदी बंध जाएगी। किसी दिन उनके साथ तुम्हारा हृदय धड़कने लगेगा--एक लयबद्ध होकर। उस दिन स्वाद मिलेगा।
अब न चलै जोर कछु मोरा, आन के हाथ बिकानी।
पलटू कहते हैं, अब मेरा जोर नहीं चलता। अब तो मैं परलोक के हाथ बिक गया--आन के हाथ बिकानी! जब तक अपना जोर चलता था तब तक अपने पास देने को कुछ न था। यह देखते हो विरोधाभास! और अब देने को कुछ है तो अपना जोर नहीं चलता। आन के हाथ बिकानी! अब तो परमात्मा जो चाहे करवाए। उसकी मर्जी! उसकी मर्जी ही संत का जीवन।
लोन की डरी परी जल भीतर...
जैसे नमक की डली को किसी ने पानी में डाल दिया।
लोन की डरी परी जल भीतर, गलिके होई गई पानी।
वह भी गल कर पानी हो गई। यही हमारी हालत है, पलटू कहते हैं। भीतर क्या गए, मन की जो लोन की डरी थी, वह भीतर जाते-जाते डूबती गई, डूबती गई; खोती गई, खोती गई। और जब कोई अपने बिलकुल केंद्र पर पहुंचता है तो मन बिलकुल शून्य हो जाता है। मैं ही खो गया। रह जाता है परमात्मा। रह जाती है उसकी सुवास; हों जिनके पास नासापुट अनुभव करने वाले, कर लें। रह जाता है उसका प्रकाश; हों जिनके पास आंखें, देख लें। रह जाता है उसका वाद्यहीन संगीत, स्वरहीन संगीत; हों जिसके पास कान, सुन ले। हो जिसके पास हृदय, अनुभव कर ले।
सात महल के ऊपर अठएं, सबद में सुरति समाई।
अब तो मेरी स्मृति, मेरा बोध, मेरा भाव, मेरा अस्तित्व सब, उस अनाहत नाद में समा गया है।
सात महल के ऊपर अठएं...
सात चक्र हैं मनुष्य के। पहला चक्र तो कामवासना का है, जहां अधिक लोग जीते हैं। उनका जीवन वही। उनका सोचना-विचारना वही। दिन वहीं, रात वहीं। उनके सपने वही। एक ही चीज उनके पीछे घूमती रहती है--कामवासना।
उससे थोड़े ऊपर उठते हैं तो दूसरे केंद्र हैं। हृदय के केंद्र पर प्रेम का आविर्भाव होता है। हृदय मध्य में है। तीन केंद्र हृदय के नीचे हैं; उनमें कामवासना, धन-वासना, पद-वासना, इनकी दौड़ रहती है। मध्य पर केंद्र है प्रेम का, हृदय का। और फिर हृदय के ऊपर तीन केंद्र हैं। वहां न धन है, न पद है, न काम है। फिर निरंतर समाधि की तरफ बढ़ना शुरू हो जाता है। हृदय के ऊपर कंठ का केंद्र है। कंठ के केंद्र पर प्रवेश होते ही विचार खो जाते हैं; जैसे कंठ अवरुद्ध हो जाता है। फिर उसके ऊपर तीसरी आंख, तृतीय नेत्र का केंद्र है। उस पर आते ही भाव खो जाते हैं, भावनाएं खो जाती हैं। और विचार न रहे, भाव न रहे, तो मन गया, क्योंकि मन इन दो से ही बना है। उसके ऊपर सातवां केंद्र है--सहस्रार। जिसकी ऊर्जा सहस्रार तक पहुंच जाती है--प्रतीक है यह तो--कि जैसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल उसके भीतर खिल उठता है!
मगर ये तो सात केंद्र हैं। पलटू बहुत गहरी बात कह रहे हैं। पलटू कह रहे हैं: सात महल के ऊपर अठएं। इन सात महलों के ऊपर एक आठवां भी है। क्योंकि जहां कमल है, अभी वहां भी स्थूल मौजूद है। फिर आठवां क्या है? कमल की सुवास--जो उड़ चली आकाश में। उस आठवें महल को पा लेना मोक्ष है, कैवल्य है, निर्वाण है। सातवें पर जो पहुंच गया, उसे आठवां मिल ही जाता है, अनिवार्यरूपेण। जिसका फूल खिल गया, उसकी गंध अपने आप विसर्जित होती है, उसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता। सातवें तक श्रम करना होता है; आठवां सहज घटित होता है।
इसलिए बहुत संतों ने आठवें की बात ही नहीं की है। ऐसा नहीं कि उनको आठवें का पता नहीं था। आठवें की बात ही क्या करनी है; वह तो अपने से होता है। सात तक श्रम है, साधना है। सात तक सीढ़ियां हैं, जो हमें पार करनी हैं। आठवें की बात करने की कोई जरूरत नहीं है।
जैसे कोई माली तुम्हें बीज बोने की कला सिखाए, तो बीज के संबंध में बताए, खाद के संबंध में बताए--भूमि को कैसे तैयार करो, कंकड़-पत्थर कैसे अलग करो, घास-पात कैसे हटाओ--यह सब समझाए। कब बीज बोओ, ठीक घड़ी, ठीक मुहूर्त में, कब वर्षा आएगी, कब वसंत आएगा--सब समझाए। फिर कितना पानी दो, कितना न दो, कैसी बागुड़ लगाओ, कब तक वृक्ष को रक्षा की जरूरत होगी--यह सब समझाए। फिर कब वृक्ष में फूल लगेंगे, यह भी समझाए। लेकिन यह थोड़े ही समझाएगा कि फिर आखिर में फूलों में से गंध उठेगी। वह तो उठेगी ही! इसलिए बहुत संतों ने आठवें की बात नहीं की है।
पलटू ने आठवें की बात की है, ताकि तुम्हें याद रहे कि असली घटना तो तब घटती है जब फूल भी पीछे छूट जाता है, सहस्रदल कमल भी पीछे छूट जाता है, और उड़ चले तुम आकाश की तरफ! उड़ चले अनंत की तरफ! हो गए लीन विराट में! ब्रह्माकार हो गए!
कल किसी ने प्रश्न पूछा था कि मैं सच में ही ब्राह्मण होना चाहता हूं, मैं क्या करूं?
आठवें महल में पहुंचना पड़े। वहीं पहुंच कर कोई ब्राह्मण होता है। लेकिन लोग तो पहले पर ही रहते हैं। और जो भी पहले पर रहता है वह शूद्र; वह चाहे ब्राह्मण घर में पैदा हुआ हो, चाहे वैश्य घर में, चाहे क्षत्रिय घर में, चाहे शूद्र घर में, कोई फर्क नहीं पड़ता। कामवासना के केंद्र पर ही जो अटके रह जाते हैं वे शूद्र। लेकिन अधिक लोग, सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोग वहीं अटके रह जाते हैं। हमने उसी को जीवन मान लिया है। जीवन बहुत बड़ा है। तुम महल के बाहर ही रह गए। महल में कक्ष के भीतर कक्ष हैं, खजानों के भीतर खजाने हैं।
सात महल के ऊपर अठएं, सबद में सुरति समाई।
पलटूदास कहौं मैं कैसे, ज्यों गूंगे गुड़ खाई।।
कहना चाहता हूं, कह नहीं सकता हूं। गूंगे का गुड़ हो जाता है सत्य। लेकिन इतना कह सकता हूं कि किस-किस से बचना। यह तो नहीं कह सकता, क्या मैंने पाया; लेकिन यह कह सकता हूं, किस-किस से बचा तो पाया। नकारात्मक रूप से कह सकता हूं। यह तो नहीं कह सकता कि परमात्म-अनुभव क्या है, लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि परमात्म-अनुभव क्या-क्या नहीं है।
इस बात को खयाल में रखना। दो उपाय हैं कहने के। एक तो उपाय है कि सीधा बता दो। कोई पूछे--गुलाब का फूल कहां है? अंगुली रख कर बता दो कि यह रहा गुलाब का फूल। क्योंकि गुलाब का फूल स्थूल है, अंगुली रखी जा सकती है। लेकिन सूक्ष्म अनुभवों पर अंगुलियां नहीं रखी जा सकतीं। अंगुलियां सूक्ष्म नहीं हैं, स्थूल हैं। सूक्ष्म अनुभवों को नेति-नेति के ढंग से समझाना होता है; कहना पड़ता है--यह नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं...। और जब सब निषेध हो जाता है तब कहा जाता है: अब जो शेष रह गया, वही है।
वाचक ज्ञान न नीका ज्ञानी, ज्यों कारिख का टीका।
इसलिए पलटूदास कहते हैं, इतना मैं कह सकता हूं कि पढ़े-लिखे से जो ज्ञान मिलता है वह असली ज्ञान नहीं है। असली ज्ञान क्या है, मत पूछो मुझसे। ज्यों गूंगे गुड़ खाई! उस संबंध में तो मुझे चुप रहने दो। मगर नकली क्या है, यह मैं तुम्हें बताए देता हूं।
वाचक ज्ञान न नीका ज्ञानी...
जो पढ़-लिख कर ज्ञानी हो गया है, वह असली ज्ञानी नहीं है; वह बुद्धपुरुष नहीं है; वह जिन नहीं है।
ज्यों कारिख का टीका।
वह तो ऐसा है जैसे किसी ने कोलतार का टीका लगा लिया हो। टीका जैसा लगता है कोलतार का टीका भी, लेकिन वह कोई असली तिलक नहीं है। असली तिलक तो केवल उनको ही लगता है जिनका तीसरा नेत्र खुल जाता है। तिलक का राज यही है। क्यों हम तिलक लगाते हैं? कहां हम तिलक लगाते हैं? वह ठीक वही स्थल है जो तीसरे नेत्र का स्थल है। आकांक्षा है तिलक में कि कभी तीसरी आंख खुले। सुहागिन स्त्री तिलक लगाती है, टीका लगाती है, मांग भरती है। ये प्रतीक हैं सिर्फ। ये प्रतीक हैं इस बात के कि उसका प्रेम इस ऊंचाई तक पहुंचे, नीचे ही न भटकता रह जाए। शूद्र के लोक में ही न रह जाए, ब्राह्मण बने। उसका प्रेम इस लोक तक पहुंचे कि तीसरी आंख खुले। इतना ही नहीं, मांग भरी जाती है। मांग प्रतीक है केवल सातवें का--सहस्रदल कमल खिले! वही असली सुहागरात है, वही असली सुहाग है, क्योंकि वहीं मिलन होता है। परमात्म-मिलन कहो, आत्म-मिलन कहो, सत्य से मिलन कहो। वहीं समाधि लगती है।
वाचक ज्ञान न नीका ज्ञानी, ज्यों कारिख का टीका।
पढ़ा-लिखा ज्ञान ज्ञान नहीं है। पढ़ा-लिखा भी बस पढ़ा-लिखा मूरख समझो। अज्ञान तो भीतर छिपा है, पढ़े-लिखे में ढांक लिया है।
सरकारी पक्ष की ओर से मुल्ला नसरुद्दीन को गवाही के तौर पर अदालत में पेश किया गया था। अभियुक्त के वकील ने मुल्ला से जिरह करते हुए पूछा, अच्छा यह बताओ मुल्ला, जब तुमने कत्ल होते हुए देखा था उस समय तुम घटनास्थल से कितनी दूर थे?
मुल्ला नसरुद्दीन तत्क्षण बोला, पंद्रह गज, दो फीट, नौ इंच।
वकील ने कहा, हद हो गई! तुम तो इस इत्मीनान से बोल रहे हो जैसे तुमने नाप लिया हो। नौ इंच...इंच-इंच! क्या तुम वहां नाप कर खड़े थे?
मुल्ला बोला, हां, मैंने नापा था--कत्ल के पहले नहीं, कत्ल के बाद।
वकील ने पूछा, क्यों? इसकी क्या जरूरत थी? नापने की क्या जरूरत थी?
मुल्ला ने कहा, क्योंकि मैं पहले से ही जानता था कि कोई बेवकूफ वकील जरूर इस प्रकार का सवाल पूछेगा।
पंडितों के सवाल और जवाब दो कौड़ी के हैं। सवाल भी दो कौड़ी के, जवाब भी दो कौड़ी के। सवाल भी सच्चे नहीं, जवाब भी सच्चे नहीं। स्वयं अनुभव नहीं हुआ है तो कैसे जवाब सच्चे हो सकते हैं?
मालकिन, कल कचरे में ये सोने की अंगूठियां, छल्ले, इयर-रिंग्स और चांदी की पायलें मिलीं। आप अपना सामान जरा होश-हवास के साथ सम्हाल कर रखा करें--नौकरानी ने कहा--मान लीजिए अगर कुछ गुम हो गया तो मेरी ही बदनामी होगी। कोई यह न कहेगा कि आप खुद अपनी धन-संपत्ति के प्रति लापरवाह हैं; दोष आपका ही है।
फिक्र मत करो--मालकिन ने रहस्य खोला--ये सब चीजें नकली हैं।
वह तो मैं भी तुरंत समझ गई थी--नौकरानी ने उदास होकर कहा--तभी तो आपको देने आई हूं।
तुम भी जानते हो कि पंडित नकली हैं। पंडित भी जानते हैं कि वे नकली हैं। मगर तुम असली से डरते हो, क्योंकि असली के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। नकली सस्ता है। जितना नकली उतना सस्ता। जितना असली उतना महंगा। असली के लिए तो कीमत चुकानी ही होगी। शायद जीवन से चुकानी होगी।
वाचक ज्ञान न नीका ज्ञानी, ज्यों कारिख का टीका।
बिन पूंजी को साहु कहावै, कौड़ी घर में नाहीं।
कौड़ी भी घर में नहीं है तुम्हारे तथाकथित पंडित-पुरोहितों के--और बिन पूंजी को साहु कहावै--और बिना पूंजी का साहूकार बना बैठा है।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर में एक रात चोर घुसे। चोर बड़े सम्हल कर चल रहे थे, लेकिन मुल्ला एकदम से झपट कर अपने बिस्तर से उठा, लालटेन जला कर उनके पीछे हो लिया। चोर बहुत घबड़ाए। उसने मौका ही नहीं दिया भागने का। वह ठीक दरवाजे पर खड़ा हो गया लालटेन लेकर। चोरों ने कहा कि भई, तुम तो सो रहे थे, एकदम नींद से कैसे उछल पड़े?
मुल्ला ने कहा, घबड़ाओ मत, चिंता न लो। भागने की जल्दी न करो। अरे मैं तो सिर्फ तुम्हें सहायता देने के लिए लालटेन जला कर...अंधेरे में कैसे खोजोगे? तीस साल हो गए इस घर में मुझे खोजते हुए, एक कौड़ी नहीं मिली। और तुम अंधेरे में खोज रहे हो, मैंने दिन के उजाले में खोजा। इसलिए लालटेन जला कर तुम्हारे साथ आता हूं; अगर कुछ मिल गया, बांट लेंगे।
और भी मैंने एक कहानी सुनी है कि एक रात मुल्ला के घर चोर घुसे। पड़ोस में से भी कई सामान चुरा कर ले आए थे, फिर मुल्ला के घर में गए। जब तक वे अंदर गए, मुल्ला अपना कंबल ओढ़े सोया था, उसने कंबल जमीन पर बिछा दिया और खुद बिस्तर पर लेट गया। लौट कर आए, बड़े हैरान हुए चोर कि यह मामला क्या है! यह कंबल इसने जमीन पर क्यों बिछा दिया है? उनको घर में कुछ मिला भी नहीं, उन्होंने कहा चलो कंबल ही ले चलो। अब जो है सो ठीक। कंबल में उन्होंने पड़ोस के लोगों का जो सामान ले आए थे वह बांधा और जब बाहर निकले तो मुल्ला भी बिलकुल चुपचाप बिना आहट किए उनके पीछे हो लिया।
आधी दूर जाकर उनको शक हुआ कि कोई पीछे है। लौट कर देखा तो मुल्ला। कहा, नसरुद्दीन, तुम हमारे पीछे क्यों आ रहे हो?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, भई, बहुत दिन से मैं घर बदलने की सोच रहा था। अब जो मेरे पास था, तुम ले ही आए, तो मैंने सोचा चलो घर बदल लूं। जहां कंबल रहेगा वहीं हम भी रहेंगे।
चोरों ने हाथ-पैर पड़े और कहा, बाबा अपना कंबल ले जाओ, मगर कम से कम दूसरों की चीजें जो कंबल में हैं, वे तो हमें लौटा दो।
तुम्हारे पंडित-पुरोहितों के पास क्या है? अनुभव की कौड़ी भी नहीं! मगर साहूकार बने बैठे हैं। अंधों में काने राजा हो जाते हैं।
ज्यों चोकर कै लड्डू खावै, का सवाद तेहि माहीं।
अगर चोकर के लड्डू बनाओगे, उसमें क्या कोई स्वाद होने वाला है!
ज्यों सुवान कछु देखिकै भूंकै, तिसने तो कछु पाई।
अगर कुत्ता भौंकता है कुछ देख कर तो शायद कुछ पा भी ले।
वाकी भूंक सुने जो भूंकै, सो अहमक कहवाई।
लेकिन कुछ कुत्ते ऐसे अहमक होते हैं कि कोई दूसरा कुत्ता भौंक रहा है तो वे भौंकने लगते हैं। कुत्तों में ऐसे अहमक होते हैं; एक कुत्ता भौंके, तुम थोड़ी देर में पाओगे मोहल्ले भर के कुत्ते भौंक रहे हैं। लेकिन कुत्तों का अहमकपन क्षमा किया जा सकता है; लेकिन आदमियों में भी ऐसे अहमक हैं।
पंडित ऐसे ही अहमक हैं। कोई बुद्ध बोला, कोई बुद्ध जागा--चलो ठीक, उसने कुछ पाया, कुछ बोला, कुछ जागरण बांटा। लेकिन दूसरे बैठे हैं जो जल्दी से लिख कर और शास्त्र तैयार कर लेंगे।
यहां एक डाक्टर आते थे। पढ़े-लिखे आदमी हैं। मगर हैं वेटनरी डाक्टर; सो पढ़ा-लिखा भी कुछ ज्यादा नहीं है; पशुओं के संबंध में जानकारी है। मैं उनको देखता कि वे हमेशा नोट ले रहे हैं। मैं इधर बोल रहा हूं और वे नोट लेने में लगे हैं--तेजी से!
मैंने उन्हें बुलाया। मैंने कहा, तुम करते क्या हो? तुम पशुओं के साथ रहते-रहते खराब तो नहीं हो गए? तुम्हारी बुद्धि तो ठीक है? मैं बोलता हूं, तुम एकदम लिखने में लगे हो!
वे कहते हैं, मैं इसलिए लिख लेता हूं ताकि बाद में काम आएगा।
मैंने कहा, अभी समझ में नहीं आ रहा, बाद में क्या खाक काम आएगा! पहले समझ तो लो। और जिसने समझ लिया उसे नोट करने की जरूरत नहीं है।
मैं विश्वविद्यालय में अध्यापक था, मेरा यह अनुभव है: जो विद्यार्थी नोट करते हैं, वे गधे हैं--निपट गधे! मैं विद्यार्थी भी था, मैं कभी नोट नहीं किया। मेरे एक प्रोफेसर इससे बहुत नाराज थे। क्योंकि सारे विद्यार्थी नोट कर रहे हैं, मैं उनके सामने ही बैठा रहूं। उन्होंने मुझसे कहा कि नोट क्यों नहीं करते? मैंने कहा, मैं कोई गधा नहीं हूं। मैं समझ रहा हूं, बात खतम हो गई। नोट करने का क्या है?
और मैं जब शिक्षक हो गया विश्वविद्यालय में, तो मैं सिर्फ एक ही चीज पर एतराज करता था कि कोई नोट न करे। क्योंकि नोट करने का मतलब ही यह है कि तुम समझने से चूक रहे हो। तुम्हारा ध्यान नोट करने में लगा है। और जब अभी मैं मौजूद तुम्हें समझा रहा हूं, नहीं समझ में आ रहा है, तो कल तुम अपनी किताब में से अपने ही नोट को पढ़ोगे, समझ पाओगे?
मुल्ला नसरुद्दीन पकड़ा गया किसी चोरी में। उससे कहा अदालत ने, मजिस्ट्रेट ने, कि तुम दस्तखत करो।
उसने कहा कि मैं लिखना तो जानता हूं, पढ़ना नहीं जानता।
मजिस्ट्रेट ने कहा, तुमसे कह ही कौन रहा है कि तुम पढ़ो? तुम लिखो!
उसने लिखना शुरू किया सो अंत ही न आए। रजिस्टर का पूरा पन्ना लिख मारा, दूसरा पन्ना जब लिखने लगा, मजिस्ट्रेट ने कहा, रुको, क्या पूरा रजिस्टर खराब कर दोगे! और मैं देख रहा हूं, मेरी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है, क्या लिख रहे हो?
मुल्ला ने कहा, वह मैंने तुमसे पहले ही कह दिया कि मुझे लिखना आता है, पढ़ना मुझे आता नहीं। दस्तखत कर रहा हूं। न मुझे शुरू का पता है न मुझे अंत का। अब क्या लिखा है कौन जाने!
मैंने उन डाक्टर को बुला कर कहा कि यह लिखना बंद करो, समझने की कोशिश करो। दीया जला हो, उसकी रोशनी में देखने की कोशिश करो। तुम दीये की तस्वीर बना रहे हो! फिर अंधेरे में तस्वीर लेकर घूमना, उससे कुछ रोशनी नहीं होगी। और तब तुम दीये को गाली दोगे कि दीया गलत रहा होगा; यह कैसा दीया! भूल सब तुम्हारी है।
बुद्ध बोलते हैं, पंडित इकट्ठा कर लेते हैं। यह तुम चकित होओगे जान कर कि महावीर तो क्षत्रिय थे, जैनों के चौबीस तीर्थंकर क्षत्रिय थे, लेकिन महावीर के जो गणधर थे वे सब ब्राह्मण। यह बड़ी हैरानी की बात है। क्षत्रिय तीर्थंकर के जितने गणधर थे, जितने प्रमुख शिष्य थे, वे सब ब्राह्मण पंडित। और उन्होंने ही महावीर के वचन लिखे। वह पंडित अपनी आदत से बाज नहीं आ सकता। और पंडित जो लिखेगा वह गलत हो जाएगा। उसे लिखना ही भर आता है, पढ़ना नहीं आता!
खलील जिब्रान की बड़ी प्रसिद्ध कहानी है, कि एक कुत्ता नेता हो गया। अब कुत्ता नेता हो जाए तो समझाए क्या? वह कुत्तों को यह समझाने लगा कि देखो, हमारी कुत्ते की जाति का कितना पतन हो गया! कहां हमने सतयुग देखे, स्वर्णऱ्युग देखे, रामराज्य...और कहां यह कलियुग! और कारण? कारण है तुम्हारा अकारण भौंकना। इसमें ही सारी शक्ति खराब हो रही है। इसी में हम पिटे जा रहे हैं। नहीं तो मनुष्यों को हम कभी का ठिकाने लगा देते। आज हमारा राज्य होता। मगर तुम्हारे भौंकने में सब शक्ति निकल जाती है।
कुत्तों को बात तो जंचती, बात तो सच है कि दिन-रात भौंक-भौंक कर परेशान हो रहे हैं। फिर बेकार ही भौंक रहे हैं। कार निकली, भौंके। पोस्टमैन निकला, भौंके। पुलिसवाला निकला, भौंके। संन्यासी निकला, भौंके। कुत्ते कुछ यूनिफॉर्म के खिलाफ हैं; कोई भी यूनिफॉर्म वाला निकले, एकदम भौंके! बात तो जंचे कुत्तों को, मगर भौंकना रोकें भी कैसे! रोकें तो बड़ी अड़चन होती है, एकदम गले में खुजलाहट उठती है। कई कुत्तों ने अभ्यास भी किया कि नेता कहता ठीक है, मगर नहीं रोक पाए।
आखिर नेता बूढ़ा होने लगा और थक गया कह-कह कर। उसने कहा, देखो, अब मेरे जाने का भी वक्त आ गया, तुम सुनोगे कभी या नहीं?
एक अमावस की रात कुत्तों ने कहा कि बात ठीक है, अब नेता बूढ़ा हो गया, पता नहीं कब चल बसे, एक दिन तो कम से कम इसकी मान लें! आज अमावस की रात, खाते हैं कसम कि रात चाहे कितनी ही उत्तेजना हो और कितने ही प्रलोभन मिलें, चाहे कितनी ही सुविधाएं मिलें भौंकने की, कितने ही पुलिसवाले निकलें, पोस्टमैन निकलें, संन्यासी निकलें--निकलने दो। आंख ही बंद करके कोनों में, अंधेरों में पड़े रहेंगे, मगर भौंकेंगे नहीं। गले में खुजलाहट उठेगी, पी जाएंगे, घूंट पी लेंगे अपने दुख का, मगर जाहिर न करेंगे।
सब कुत्ते एक-एक कोने में दब कर पड़ रहे आंख बंद करके, कि न देखेंगे न भौंकेंगे। नेता घूमना शुरू किया। उसको कोई मिले ही नहीं जिसको वह उपदेश दे। वह उसके खुद के गले में जोर से खराश उठने लगी। वह अब तक भौंकने से इसीलिए तो बचा था कि भौंकने लायक उसके पास ताकत ही नहीं बचती थी। सुबह से सांझ तक समझाना, रात थक कर सो जाए, सुबह से फिर समझाना। उसका भौंकना समझाने में निकला जा रहा था। आज पहली दफा झंझट आई। आज पहली दफा उसको पता चला कि हूं तो मैं भी कुत्ता, नेता ही हो गया तो क्या होता है! इतने जोर से खुजलाहट उठने लगी, ऐसी भयंकर खुजलाहट, जनम-जनम की रुकी हुई खुजलाहट...बहुत खोजा उसने कि कोई एकाध भौंक दे तो टूट पडूं। ऐसा समझाऊं, ऐसा समझाऊं कि कभी नहीं समझाया था। मगर कोई नहीं भौंका सो नहीं भौंका। कुत्ते भी जिद मार कर बैठ गए थे, वे आंख ही नहीं खोल रहे थे।
आखिर एक ही उपाय रहा, उस नेता ने एक गली में गया और भौंका। बहुत मजा आया। कई जन्मों से यही भौंकने का काम बंद किए हुए था। और जैसे ही उसने भौंका, फिर कुत्तों ने कहा कि कोई बेईमान तोड़ दिया कसम को! अब हम पर भी क्यों लागू रहे? सारी बस्ती भौंकी। और ऐसी भौंकी कि जैसी कभी नहीं भौंकी थी, क्योंकि उस दिन संयम का एकदम बांध टूटा। जैसे जैनियों का होता है न पर्युषण के बाद, वैसा उस दिन कुत्तों का हुआ, एकदम टूट पड़े!...सब्जियों के भाव एकदम तीन गुने हो जाते हैं!...दस दिन किसी तरह भौंकने को रोके रहे, रोके रहे, रोके रहे; फिर ग्यारहवें दिन ऐसे टूटते हैं कि दस दिन का बदला। जब सारा गांव भौंकने लगा, नेता बड़ा प्रसन्न, फिर चला, फिर समझाने लगा कि देखो जी, लाख दफे कहा कि यही हमारे पतन का कारण है।
तुम्हारे पंडित तुम्हें समझा रहे हैं, क्योंकि समझाने में उनके अहंकार को एक तृप्ति मिलती है। मगर तुमसे उनमें कोई भेद नहीं है। और वे भौंक रहे हैं, क्योंकि वेदों में ऐसा लिखा है, उपनिषदों में ऐसा लिखा है, कुरान में, बाइबिल में ऐसा लिखा है। अहमक हैं! ठीक कहते हैं पलटू--
वाकी भूंक सुने जो भूंकै, सो अहमक कहवाई।
बातन सेती नहिं होय राजा, नहिं बातन गढ़ टूटै।
बातों से न तो कोई राजा होता है और न बातों से गढ़ टूटते हैं।
मुलुक मंहै तब अमल होइगा, तीर तुपक जब छूटै।
तब होगा तुम्हारा साम्राज्य, जब तीर छूटे, तोप छूटे। कुछ करो! कुछ जीवन को रूपांतरित करने के लिए करो!
बातन से पकवान बनावै, पेट भरै नहिं कोई।
पलटूदास करै सोई कहना, कहे सेती क्या होई।।
बात कर-कर के पकवान नहीं बनते, भूख नहीं मिटती।
पलटूदास करै सोई कहना...
जिस दिन कर लो उस दिन कहना। जिस दिन जान लो उस दिन कहना। जिस दिन पहचान लो उस दिन पुकार देना।
पलटूदास करै सोई कहना, कहे सेती क्या होई।
सिर्फ कहने से क्या होगा अगर जाना न हो! जब तुम्हारा दीया जले तो रोशनी दिखाना। जब तुम्हारा फूल खिले तो सुगंध को उड़ जाने देना।

आज इतना ही।